कमलनाथ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत खास थे! कमलनाथ ने 1970 के दशक में यूथ कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। उस समय उनकी पहचान संजय गांधी के अभिन्न मित्र के रूप में थी। 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार का गठन हुआ। हालांकि, कुछ महीने बाद ही गैर-कांग्रेसी गठबंधन में बिखराव शुरू हो गया। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और समाजवादी नेता राजनारायण के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। संजय गांधी ने राजनारायण के असंतोष को बुनाने की रणनीति बनाई और इसमें कमलनाथ उनके सारथी बने।राजनारायण के असंतोष को हवा देने के लिए संजय गांधी उनसे मिलना चाहते थे, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। सरकारी एजेंसियां कांग्रेस नेताओं, और खासकर संजय गांधी के हर कदम पर नजर रख रही थी। राजनारायण के असंतोष का अंदाजा भी सरकार को था। इसलिए उन पर भी सरकारी एजेंसियों की निगाहें थीं। एजेंसियों से बचने के लिए कमलनाथ ने नायाब तरीका निकाला। वे अपनी गाड़ी में संजय गांधी और राजनारायण को बिठाकर दिल्ली के सुनसान इलाकों की ओर निकल जाते। उनकी गाड़ी कहीं रुकती नहीं थी। वे कई घंटों तक दिल्ली की सड़कों पर यूं ही चक्कर काटते रहते। इ स मीटिंग की बातें बाहर न आ जाएं, इसलिए कमलनाथ ही ड्राइवर बन जाते थे।

कमलनाथ ने संजय और राजनारायण की गुपचुप मुलाकातें तो करवाई हीं, उन्होंने कांग्रेस के प्रति सहानुभूति रखने वाले उद्योगपतियों को भी इस अभियान के साथ जोड़ा। ऐसे ही एक उद्योगपति थे कपिल मोहन जो मोहन मीकिंस कंपनी के मालिक थे। कहा जाता है कि कमलनाथ कई बार संजय गांधी को लेकर कपिल मोहन के पूसा रोड स्थिथ घर लेकर गए। बाद में इन बैठकों में राजनारायण भी शामिल होने लगे।

कमलनाथ की पहल पर हुई इन बैठकों में मोरारजी देसाई सरकार को गिराने की रणनीति तैयार की गई। राजनारायण के असंतोष को इतनी हवा दी गई कि मोरारजी देसाई के साथ उनके रिश्ते टूट के कगार पर पहुंच गए। अंततः जनता पार्टी सरकार का पतन हो गया। इसमें बाद कांग्रेस के समर्थन से चरण सिंह कुछ दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने, लेकिन तब तक कांग्रेस की सत्ता में वापसी तय हो चुकी थी। 1980 में लोकसभा के चुनाव हुए और कांग्रेस जबरदस्त बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गई।जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद कांग्रेस में कमलनाथ की हैसियत अचानक बढ़ गई। 1980 में इंदिरा गांधी ने उन्हें मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया। यह बेहद महत्वपूर्ण फैसला था क्योंकि 1977 के चुनाव में पूरे उत्तर और मध्य भारत में कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत मिली थी- छिंदवाड़ा और नागौर। इसके बावजूद 1980 में गार्गीशंकर मिश्रा का टिकट काटकर कमलनाथ को छिंदवाड़ा से उम्मीदवार बनाया गया। माना जाता है कि जनता पार्टी सरकार को गिराने में उनकी भूमिका को देखते हुए इंदिरा ने कमलनाथ को यह गिफ्ट दिया था, लेकिन यह पूरा सच नहीं है।

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के ठीक बाद संजय गांधी गिरफ्तार हो गए। उन्हें तिहार जेल में रखा गया था। तब इंदिरा गांधी उनकी सुरक्षा के लिए बेहद चिंतित रहने लगीं। उन्होंने कमलनाथ को अपनी चिंता बताई। कमलनाथ ने ऐसा तरीका निकाला कि इंदिरा की चिंता तो खत्म हुई ही, कमलनाथ हमेशा के लिए गांधी परिवार के विश्वासपात्र बन गए।अंततः जनता पार्टी सरकार का पतन हो गया। इसमें बाद कांग्रेस के समर्थन से चरण सिंह कुछ दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने, लेकिन तब तक कांग्रेस की सत्ता में वापसी तय हो चुकी थी। 1980 में लोकसभा के चुनाव हुए और कांग्रेस जबरदस्त बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गई।जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद कांग्रेस में कमलनाथ की हैसियत अचानक बढ़ गई। 1980 में इंदिरा गांधी ने उन्हें मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया। यह बेहद महत्वपूर्ण फैसला था क्योंकि 1977 के चुनाव में पूरे उत्तर और मध्य भारत में कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत मिली थी- छिंदवाड़ा और नागौर। इसके बावजूद 1980 में गार्गीशंकर मिश्रा का टिकट काटकर कमलनाथ को छिंदवाड़ा से उम्मीदवार बनाया गया। माना जाता है कि जनता पार्टी सरकार को गिराने में उनकी भूमिका को देखते हुए इंदिरा ने कमलनाथ को यह गिफ्ट दिया था, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। कमलनाथ ने कोर्ट में जानबूझकर जज से लड़ाई कर ली। इसके बाद अवमानना के मामले में उन्हें भी सात दिन के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया। इस दौरान वे हमेशा संजय गांधी के साथ रहे और इंदिरा को चिंतामुक्त कर दिया।