Monday, July 15, 2024
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जानिए सुब्रत रॉय सहारा और उनके दोस्त की कहानी!

आज हम आपको सुब्रत रॉय सहारा और उनके दोस्त की कहानी सुनाने जा रहे हैं! सहारा इंडिया ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय सहारा और कभी सत्ता के गलियारों का दमदार किरदार रहे अमर सिंह की एक सी कहानी थी। दोनों जिगरी दोस्त थे। दोनों ने बुलंदी देखा। ग्लैमर हो या खेल की दुनिया, कारोबार हो या राजनीति दोनों की गहरी पैठ थी। एक को पावरफुल पावर ब्रोकर के तौर पर जाना गया तो दूसरा भी सियासी दुनिया में दोस्ती के लिए जाना जाता था। इन दोनों दोस्तों की एक सी कहानी थी। बुलंदी से तन्हाई तक की कहानी। बुलंदी के वक्त तो जैसे हर पल महफिल हो मगर वक्त ने करवट क्या ली तन्हा सा हो गए। यह भी संयोग ही है कि दोनों की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई।कारोबार की दुनिया में कभी सुब्रत रॉय सहारा की तूती बोलती थी। गरीबों के लिए छोटी बचत की उनकी योजनाएं तब सुपर हिट हुईं जब देश की मुट्ठीभर आबादी की ही बैंकों तक पहुंच थी। ये चीज सहारा ग्रुप के पक्ष में गई। लाखों लोग अपनी कमाई का एक हिस्सा सहारा ग्रुप में जमा करने लगे। ग्रुप तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने लगा। एक दौर था जब सुब्रत रॉय सहारा के पास अपनी एयरलाइन थी। आईपीएल की टीम थी। रियल एस्टेट सेक्टर में दबदबा था। फॉर्म्युला वन की टीम थी। लंदन और न्यू यॉर्क में आलीशान होटल थे। भारतीय क्रिकेट टीम की स्पॉन्सशिप थी। लेकिन सितारे ऐसे गर्दिश में गए कि तन्हा रह गए। इतने तन्हा कि विदेश में रह रहे उनके दोनों बेटों के पास उन्हें आखिरी विदाई देने तक का वक्त नहीं था।

 अमर सिंह को यारों का यार माना जाता था। बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन जब मुश्किल दौर में फंसे और दिवालिया हो गए थे तब सुब्रत रॉय सहारा ही उनका सहारा बने थे। तब अमर सिंह ने ही अमिताभ की सहारा से मुलाकात कराई थी। अमर सिंह की वजह से सुब्रत रॉय सहारा मुलायम सिंह यादव के भी करीबियों में शुमार हो गए। यूपी में मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान सहारा का कारोबारी साम्राज्य भी दिन-दुना रात-चौगुना के हिसाब से बढ़ता रहा। इसी तरह समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का रसूख भी लगातार बढ़ता गया। उनके सियासी रसूख का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि जब यूपीए-1 के दौरान अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील को लेकर लेफ्ट ने मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया तब अमर सिंह ही सरकार के तारणहार बने थे। यूपीए-1 सरकार गिरने से बच गई जिसका बड़ा श्रेय समाजवादी पार्टी और खासकर अमर सिंह को जाता है। सुब्रत रॉय सहारा और अमर सिंह का अपने-अपने क्षेत्र में एक अलग ही रुतबा था। लेकिन वक्त ने करवट ली और सब कुछ बदल गया। दोनों ने अलग-अलग इंटरव्यू में अपनी टीस को जाहिर किया था।

अमर सिंह आखिरी वक्त में कितने तन्हा थे ये 2013 में दिए उनके एक इंटरव्यू से जाहिर होता है। उन्होंने कहा था, ‘बिग मैन सिंड्रोम ये है कि वे हमेशा सोचते हैं कि वे आप पर अहसान कर रहे हैं। वे सोचते हैं कि आपके साथ डिनर करके वे आपको इज्जत बख्श रहे हैं। वे आपका खाना खाएंगे लेकिन उसकी तारीफ नहीं करेंगे। वे इस तरह की बात कहेंगे- आपकी मीठी पकवान में बहुत शुगर है, इसने मुझे डायबिटीज दे दिया या फिर कहें कि नमक बहुत तेज था, मेरा ब्लड प्रेशर मुझे परेशान कर रहा। जिंदगी एक बहुत बड़ी शिक्षक है। उसने मुझे एक सबक सिखाया कि ये तथाकथित बड़े लोग जैसे अंबानी और बच्चन, ये सोचते हैं कि वे आप पर अहसान कर रहे हैं। आपको सेवा करने का मौका देकर आप पर उपकार कर रहे हैं।’

संयोग से 2013 में ही सुब्रत रॉय सहारा ने भी एक इंटरव्यू में अपना दर्द जाहिर किया था। उन्होंने तब कहा था कि उनकी दुर्गति के लिए 2004 में उनका सोनिया गांधी पर दिया बयान जिम्मेदार है। 2004 में विदेशी मूल का मुद्दा काफी गरम था और सहारा ने कहा था कि विदेशी मूल के किसी व्यक्ति को शीर्ष पद नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, 2013 वाले इंटरव्यू में ‘सहारा श्री’ ने अपनी मुश्किलों के लिए सोनिया को जिम्मेदार नहीं बताया था। उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस के बड़े नेता जो सोनिया गांधी को खुश करना चाहते थे और उनके और नजदीक जाना चाहते थे, उन्होंने उनकी तरफ से मुझे निशाने पर लिया। सोनिया गांधी ने खुद ऐसा नहीं किया जैसा कि उस समय लगता था।’

सुब्रत रॉय सहारा की हर प्रमुख राजनीतिक दलों में तगड़ी पैठ थी। मुलायम सिंह यादव के तो वे करीबी थे ही, बाकी दलों के तमाम नेताओं से भी उनकी अच्छी दोस्ती थी। 2012 में वह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में भी दिखे थे। 2013 में दिल्ली के एक होटल में उन्होंने विशाल जलसा किया था जिसमें सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, शीला दीक्षित, प्रतिभा पाटिल, मीरा कुमार, दिग्विजय सिंह और फारूक अब्दुल्ला जैसे दिग्गजों ने शिरकत की थी। कहा जाता है कि उन्होंने सोनिया गांधी से भी ‘अदावत’ खत्म करने की पहल की। कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, राजीव शुक्ला जैसे करीबियों के जरिए उन्होंने मनमोहन सिंह और अहमद पटेल तक संदेश भी भिजवाए लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने उनके ‘दोस्ती के हाथ‘ को कोई भाव नहीं दिया।

अमर सिंह और सुब्रत रॉय सहारा दोनों जेल भी गए। पहले सिंह और बाद में सहारा। संयोग से सुब्रत रॉय को भी तिहाड़ जेल की उसी कोठरी में बंद किया गया जहां कभी सिंह को बंद किया गया था। 2011 में अमर सिंह को 2008 के ‘वोट फॉर कैश’ मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें तिहाड़ की वीआईपी जेल नंबर 3 में एक 8×8 फीट की कोठरी में रखा गया। 2014 में जब सुब्रत रॉय सहारा गिरफ्तार हुए तो उन्हें भी इसी कोठरी में रखा गया था।

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