आज हम आपको बुजुर्गों की मानसिकता के बारे में कुछ बताने वाले हैं! हर शख्स अपने तरीके से जिंदगी जीता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने बाद बच्चों की भी चिंता होती है और इसलिए कुछ पैसे या संपत्ति जोड़कर रखते हैं। लेकिन 83 साल की दादी चित्रा विश्वनाथन की सोच एक कदम आगे की है। वह नहीं चाहती हैं कि उनके जाने के बाद उनकी आलमारी को बच्चे खाली करें। दादी कहती हैं, ‘मैं सब कुछ खाली करके मरना चाहती हूं।’ हो सकता है आपको पढ़ने या सुनने में थोड़ा अजीब लगे लेकिन चित्रा ने फेसबुक पेज पर यही लिखा है। वह कहना चाहती हैं कि मौत आने से पहले वह अपनी हर चीज को बांट देना चाहती हैं। उनके पास जो कुछ सामान हैं, पुरस्कार या कलेक्शन हैं, वो सब कुछ अपने जीते जी खाली कर देना चाहती हैं। उनका इरादा यह है कि जिन लोगों को वह ये सब दें वे इसका मूल्य समझें और बाद में इस्तेमाल भी करें।

उन्होंने लिखा, ‘यह पोस्ट मुख्य रूप से वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कृपया इसे गलत या बीमार मानसिकता न समझें। यह प्रैक्टिकल बात है।’ उन्होंने इसी तरह की स्वीडिश अवधारणा का भी जिक्र किया जिसे ‘dostadning’ कहते हैं। यह दो शब्दों से मिलकर बना है डेथ do और क्लीनिंग stadning यानी जब कोई शख्स मरने से पहले घर में मौजूद अपनी चीजों को हटा दे जिससे उसके घरवालों को बाद में इस बड़े टास्क से दो चार न होना पड़े।मेरी कोंडो को आज के समय में इस प्रक्रिया Decluttering यानी अनावश्यक चीजों को हटाने का गुरु कहा जाता है। कई बुजुर्गों ने उनकी इस प्रक्रिया का पालन किया है। हालांकि डेथ क्लीनिंग का कॉन्सेप्ट 2017 में एक किताब से आया था। मार्गरेटा मैगनसन ने स्वीडिश डेथ क्लीनिंग नाम से किताब लिखी थी और इसके बाद यह पूरी दुनिया में प्रचलित हो गया। भारत में भी अब बड़ी संख्या में बुजुर्ग अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में घर खाली कर देते हैं।

जीवनभर लोग तमाम चीजें अपनी आलमारी, बक्से में रखते हैं। पुरानी किताब में गुलाब की सूखी पंखुड़ी हो या बच्चे के पहने पहले कपड़े, ऐसी चीजें घर में जमा रहती हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आपके जाने के बाद उसका क्या होगा? अब 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग इस पर गंभीरता से सोचने लगे हैं। बुजुर्ग चित्रा कहती हैं, ’60 साल के बाद मेरी मां ने नए कपड़े खरीदने बंद कर दिए थे क्योंकि वह कहा करती थीं कि यह दिखाता है कि आप और ज्यादा जीना (लंबा जीवन) चाहती हैं और उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि जब मैं 70 साल की हुई तो मैंने हैंडीक्राफ्ट प्रदर्शनी में जाना बंद कर दिया। वहां जाकर मैं सजाने के सामान लेकर आती थी और वह फूड शो में देखने को मिलता था।

पति के गुजरने के बाद वह अपने बच्चों के पास रहने लगीं। उन्होंने बच्चों से भी कहा कि वे जो भी चाहें, घर से ले लें। इसके बाद उन्होंने अपने ग्लासवेयर कलेक्शन को खाली कर दिया। बहुत कम चीजें अपने पास रखीं। कई गैजेट और जरूरी चीजें परिवारवालों और दोस्तों में बांट दी। उन्होंने कहा, ‘यह फैसला थोड़ा मुश्किल था लेकिन देने में अलग खुशी मिली।’ इतिहासकार नंदिता कृष्णा कहती हैं कि महामारी के दौरान 70 साल की उम्र होने पर उन्होंने अपने जीवन में कई बदलाव किए हैं। हां, डेथ क्लीनिंग का मतलब यह नहीं है कि आप हर उस चीज से छुटकारा पा लें, जिसे आप पसंद करते हो।फैसला करें कि कब से शुरू करना है। ज्यादातर लोग 60 या 70 साल की उम्र के बाद ऐसा करते हैं।

पहले बड़ी चीजों से शुरूआत करें जैसे फर्नीचर और फिर तस्वीरों जैसी भावनात्मक चीजों को भी शामिल करें।परिवार के लोगों से कहिए कि वे जिस चीज को रखना चाहें रख लें।जीवनभर लोग तमाम चीजें अपनी आलमारी, बक्से में रखते हैं। पुरानी किताब में गुलाब की सूखी पंखुड़ी हो या बच्चे के पहने पहले कपड़े, ऐसी चीजें घर में जमा रहती हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आपके जाने के बाद उसका क्या होगा? अब 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग इस पर गंभीरता से सोचने लगे हैं। बुजुर्ग चित्रा कहती हैं, ’60 साल के बाद मेरी मां ने नए कपड़े खरीदने बंद कर दिए थे क्योंकि वह कहा करती थीं कि यह दिखाता है कि आप और ज्यादा जीना (लंबा जीवन) चाहती हैं और उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि जब मैं 70 साल की हुई तो मैंने हैंडीक्राफ्ट प्रदर्शनी में जाना बंद कर दिया। वहां जाकर मैं सजाने के सामान लेकर आती थी और वह फूड शो में देखने को मिलता था। बाकी दोस्तों में बांट दें।जरूरतमंदों को दान भी कर सकते हैं।बाकी बचे जीवन के लिए कुछ चीजें दान कर सकते हैं। एक नोट भी बना लीजिए कि आपके जाने के बाद कौन सी चीजों को हटाना है जिससे घरवालों को बाद में उसे फेंकने या दान करने में अपराध बोध न हो।