आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में उपचुनाव होने वाले हैं! उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मैदान में तीन क्षेत्रों के उप चुनाव ने राजनीतिक गर्मी बढ़ा दी है। राजनीतिक माहौल को गरमाया हुआ है। भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक मैदान में अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। मैनपुरी लोकसभा सीट पर मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उप चुनाव हो रहा है। यहां से लगातार मुलायम या फिर उनके परिवार के सदस्य चुनाव जीतते रहे हैं। वहीं, रामपुर में 10 बार के विधायक आजम खान की सदस्यता छिनने के बाद विधानसभा उप चुनाव हो रहा है। आजम खान की प्रतिष्ठा इस सीट से जुड़ी हुई हैं। वहीं, खतौली में भाजपा विधायक विक्रम सैनी के खिलाफ कोर्ट की ओर से सजा का ऐलान होने के बाद उप चुनाव कराए जा रहे है। आजम और विक्रम सैनी को दो या दो साल से अधिक की सजा हुई और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत उनकी सदस्यता चली गई। चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लग गया। ऐसे में भाजपा खतौली को दोबारा अपने कब्जे में करने की कोशिश कर रही है। वहीं, मैनपुरी और रामपुर में सपा के किले को ढाहने का प्रयास भी हो रहा है। ऐसे में इन सीटों का समीकरण काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

मैनपुरी लोकसभा सीट पर यादव जिस तरफ जाएंगे, जीत उसी की होगी। यहां से सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनावी मैदान में हैं। वहीं, भाजपा ने रघुराज शाक्य पर दांव खेल दिया है। उम्मीदवारों की घोषणा ने मैनपुरी से लेकर लखनऊ तक की राजनीति को गरमा दिया। समाजवादी पार्टी से नाराज चल रहे शिवपाल यादव के कभी करीबी रहे रघुराज शाक्य को टिकट देकर भाजपा ने एक साथ कई तीर छोड़े। रघुराज शाक्य को इटावा से सांसद बनाने वाले मुलायम सिंह यादव थे। ऐसे में उन्हें मुलायम का करीबी बताया जाता रहा। लेकिन, वर्ष 2017 में जब शिवपाल सपा से अलग हुए तो रघुराज उनके साथ हो गए। फिर शाक्य और यादव वोट बैंक की राजनीति की। मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में जातिगत गणित का सवाल है तो 17 लाख से अधिक मतदाताओं वाले इस लोकसभा क्षेत्र में करहल, जसवंतनगर, किशनी, भोगांव और मैनपुरी सदर विधानसभा क्षेत्र आते हैं।

लोकसभा के 17 लाख मतदाताओं में एक ही जाति की बात करें तो करीब 4.30 लाख यादव मतदाता हैं। इसके बाद दूसरा नंबर 2.90 लाख शाक्य मतदाताओं का आता है। इसके बाद सभी दलित जातियों के वोट भी करीब 1.80 लाख हैं। 2 लाख से अधिक क्षत्रिय और एक लाख 20 हजार से अधिक ब्राह्मण वोटों की भी संख्या है। 60 हजार मुस्लिम, 70 हजार वैश्य, एक लाख से अधिक लोधी मतदाता भी चुनाव को प्रभावित करते हैं। ऐसे में अगर यादव वोट एक साथ आ जाए तो फिर अन्य उम्मीदवारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही कारण है भाजपा के उम्मीदवार घोषित होने से पहले मैनपुरी विधायक और मंत्री जयवीर सिंह ने शिवपाल यादव की रणनीति पर नजर होने की बात कही थी।

मैनपुरी में इस बार 13 उम्मीदवार चुनावी मुकाबले में उतरे हैं। हालांकि, अभी नामांकन की प्रक्रिया पूरी कराई गई है। माना जा रहा है कि इसमें से कुछ उम्मीदवार चुनावी मैदान से पर्चा वापस ले सकते हैं। ऐसे में मुलायम सिंह यादव की विरासत डिंपल यादव को सौंपा गया है। उप चुनाव की राजनीति में डिंपल यादव बढ़त बनाती दिख रही हैं। हालांकि, भाजपा के रघुराज शाक्य अपने शाक्य वोट बैंक के साथ-साथ दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने में कामयाब हो गए तो फिर डिंपल यादव की मुसीबत बढ़ा सकते हैं। अखिलेश और शिवपाल के साथ आने के बाद भाजपा अपनी राजनीति को गरमाने की कोशिश कर सकती है।

रामपुर में मुस्लिम वोट बैंक के पास जीत की चाबी है। रामपुर विधानसभा सीट साल 1952 में अस्तित्व में आई। सपा नेता आजम खान रामपुर सीट से 10 बार विधायक चुने गए। पिछले दिनों एमपी एमएलए कोर्ट की ओर से हेट स्पीच केस में 3 साल की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी सदस्यता छिन गई और छह सालों तक चुनाव लड़ने पर रोक लग गई है। ऐसे में भले ही इस चुनाव में आजम खान चुनावी मैदान में नहीं उतरेंगे, लेकिन उनकी धमक सुनाई देगी। अपने अजीज असिम रजा को एक बार फिर चुनावी मैदान में उतार कर सपा में अपनी ताकत का अहसास आजम ने करा दिया है। आजम खान ने पहली बार वर्ष 1980 में रामपुर सीट से चुनावी जीत दर्ज की। इसके बाद 1985, 1989, 1991 और 1993 के विधानसभा चुनावों में जीते। वर्ष 1996 में कांग्रेस के अफरोज अली खान को इस सीट पर जीत मिली। इसके बाद 2002 में हुए यूपी चुनाव में एक बार फिर आजम ने इस सीट पर कब्जा जमाया। 2007, 2012 और 2017 के यूपी चुनाव में भी भाजपा ने जीत दर्ज की। इसके बाद आजम ने लोकसभा चुनाव 2019 में रामपुर सीट से लड़ाई लड़ी और जीते। 2019 उप चुनाव में उनकी पत्नी तंजीन फात्मा ने यहां से चुनावी लड़ाई लड़ी। वे रामपुर का रण जीतने में कामयाब रहीं।

यूपी चुनाव 2022 में रामपुर से 10वीं बार एमएलए चुने गए आजम खान की इस बार सदस्यता गई तो उन्होंने परिवार के किसी सदस्य को मैदान में नहीं उतारा। रामपुर लोकसभा सीट पर भाजपा के घनश्याम लोधी से हारने वाले आसिम रजा क को मैदान में उतारा है। वहीं, सपा नेता मोहम्मद आजम खान के धुर विरोधी आकाश सक्सेना पर एक बार फिर भाजपा ने भरोसा जताया है। आजम खान को 27 माह तक सलाखों के पीछे रखवाने से लेकर सजा करवाने तक में भाजपा युवा नेता आकाश सक्सेना का बड़ा हाथ रहा है। दो पैन कार्ड, दो पासपोर्ट, दो जन्म प्रमाण पत्र समेत कई मामलों में आकाश सक्सेना सीधे-सीधे मुकदमे में वादी हैं। कई में कोर्ट में आजम और उनके परिवार पर चार्जफ्रेम कराने में मजबूत गवाही दे चुके हैं। जौहर यूनिवर्सिटी से जमीनें छिनवाने में भी आकाश का ही हाथ रहा है। उन्होंने न सिर्फ शिकायतें कीं, बल्कि राजस्व परिषद तक केस के मुख्य निगरानीकर्ता रहे।

आजम से आकाश की यह अदावत जगजाहिर है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी इस बात को अच्छी तरह से जानता और समझता है। यही वजह है आकाश सक्सेना पर कोई बड़ा पद न होते हुए भी वाई श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। अब जब टिकट का नंबर आया तो आकाश सक्सेना पर ही पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने दोबारा भरोसा जताया है। रामपुर से 11 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। लेकिन, मुख्य मुकाबला आकाश और आसिम रजा में ही होता दिख रहा है। एक बार फिर आसिम रजा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रामपुर में कुल वोटरों की संख्या 3,87,385 है। इसमें पुरुष वोटर्स 2,05,971 और महिला वोटर्स 3,87,385 हैं। क्षेत्र के जातीय समीकरण की बात करें तो यहां मुस्लिम वोटर्स करीब 80 हजार हैं। वहीं, दूसरे नंबर पर वैश्य 35 हजार आते हैं। इनके अलावा लोधी 35 हजार, एससी 15 हजार और यादव 10 हजार वोटर्स हैं। इनके अलावा दलित वोटरों की संख्या भी काफी ज्यादा है। ऐसे में अगर मुस्लिम वोटरों में बिखराव नहीं होता है तो आजम की चल सकती है। लेकिन, आकाश वैश्य, लोधी और दलित वोटरों को जोड़कर बड़ा खेल कर सकते हैं।

खतौली विधानसभा सीट पर राष्ट्रीय लोक दल अपनी दावेदारी को पुख्ता करने में जुट गया है। हालांकि, पार्टी में बगावत जैसी स्थिति भी बनती दिखी। गुटबाजी भी दिखने लगी है। मुजफ्फरनगर की इस सीट पर किसान आंदोलन और राकेश टिकैत के प्रभाव के बाद भी भाजपा का विजय रथ रोकने में सपा-रालोद गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया था। हालांकि, इस बार जयंत चौधरी पूरे जोर-शोर से जुटे हुए हैं। दावा जीत का कर रहे हैं। विक्रम सिंह सैनी को दंगे के एक मामले में सजा के बाद यह सीट खाली हुई है। भाजपा ने राजकुमारी सैनी को टिकट थमा दिया है। पिछले चुनाव में विक्रम सैनी ने सपा के चंदन सिंह चौहान को मात दी थी। इस बार राजकुमारी सैनी के सामने मदन भैया की चुनौती है। बसपा पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी। इस बार चुनावी मैदान से बाहर है। ऐसे में मुकाबला आमने-सामने का है। जयंत चौधरी ने 13 नवंबर से बड़ी-बड़ी जनसभाओं के जरिए माहौल बनाना शुरू कर दिया है।