आज हम आपको बताएंगे की हिट एंड रन पर हंगामा क्यों हो रहा है! हिट-एंड-रन मामलों के लिए भारतीय न्याय संहिता में नए प्रावधानों के खिलाफ ट्रक ऑपरेटरों की हड़ताल ने पूरे देश की रफ्तार रोक दी। खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति से लेकर परिवहन सेवाएं ठप्प हो गईं। हालात बिगड़ते देख सरकार ने भी ‘पैनिक’ बटन दबाने में देर नहीं लगाई। मंगलवार को देर शाम उसने वाहन चालकों के साथ सुलह का रास्ता निकाल लिया। सरकार के साथ यूनियनों ने भी ड्राइवरों को काम पर वापस लौटने की अपील की। ये ड्राइवर बीएनएस में हिट-एंड-रन मामलों को लेकर किए गए कड़े प्रावधानों से नाराज थे। ऐसे मामलों में 10 साल की सजा और सात लाख रुपये के जुर्माने के प्रावधान ने उनका पारा चढ़ा दिया था। सरकार ने साफ कर दिया कि नए कानून और प्रावधान लागू नहीं हुए हैं। इस पर कोई भी फैसला ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के साथ बातचीत के बाद लिया जाएगा। नए प्रावधानों के खिलाफ ड्राइवरों का विरोध सिक्के का एक पहलू है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी है। उसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं और उनमें होने वाली मौतों का बढ़ता ग्राफ बेहद डराने वाला है। इनमें हिट-एंड-रन मामलों की भी हिस्सेदारी है। आइए, यहां आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं कि क्यों हमें सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़े प्रावधानों की जरूरत है? इस बारे में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़े होश उड़ाने वाले हैं। इनसे पता चलता है कि 2022 में कुल सड़क दुर्घटनाओं और इनमें होने वाली मौतों में हिट-एंड-रन मामलों की हिस्सेदारी 14.6 फीसदी और 18.1 फीसदी थी। 2021 में यह संख्या 16.8 फीसदी और 11.8 फीसदी थी।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं या इनमें होने वाली मौतों का कोई एक बड़ा कारण नहीं है। इसमें कई कारण शामिल हैं। जैसे आमने-सामने की टक्कर। पीछे या बगल से चोट। एक्सीडेंट और इनमें होने वाली मौतों में इनकी लगभग बराबर की हिस्सेदारी है। सटीक तौर पर कहें तो 2022 में नौ प्रकार की सड़क दुर्घटनाओं और इनसे जुड़ी मौतों के आंकड़ों में हिट-एंड-रन का हिस्सा पांचवें और दूसरे स्थान पर था। सरकार के आंकड़े कहते हैं कि 2022 में कुल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 72 फीसदी और इन सड़क दुर्घटनाओं में हुईं मौतों में 71 फीसदी ओवर स्पीडिंग के कारण हुईं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि नेशनल हाईवे पर सामान्य सड़कों की तुलना में दुर्घटना का ज्यादा खतरा होता है। जहां 2022 में कुल सड़क लंबाई में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों की हिस्सेदारी सिर्फ 4.9 फीसदी थी। वहीं, सड़क दुर्घटनाओं में कुल मौतों का 60.5 फीसदी इन सड़कों पर हुईं।
जिन वाहनों ने सड़क दुर्घटनाएं कीं और जो वाहन इसका शिकार हुए उसका भी डेटा है। आंकड़ों से पता चलता है कि क्राइम और विक्टिम वीकल दोनों के मामले में दोपहिया वाहन सबसे आगे रहे। टू-वीलर की आपस में टक्कर का आंकड़ा सबसे अधिक है। जहां तक ट्रकों और लॉरियों का सवाल है, तो वे क्राइम वीकल ग्रुप जिन वाहनों से एक्सीडेंट हुआ में दूसरे नंबर पर रहे। उनके सबसे बड़े शिकार दोपहिया वाहन थे।
अगर मुकदमा पूरा हुआ हो तो नहीं। अन्य दुर्घटनाओं की तुलना में हिट-एंड-रन मामलों में सजा का आंकड़ा बेहतर है। उदाहरण के लिए जिन हिट-एंड-रन मामलों की सुनवाई 2022 में पूरी हुई, उनमें सजा की दर 47.9 फीसदी थी। अन्य दुर्घटनाओं के लिए यह दर महज 21.8 फीसदी थी। यहां तक कि हत्या और गैर इरादतन हत्या में भी सजा की दर कम थी। यह 43.8 फीसदी और 38.7 फीसदी थी। हालांकि, यह और बात है कि अन्य अपराधों की तरह हिट-एंड-रन के 90 फीसदी से अधिक मामले एक साल अदालतों में लंबित रहते हैं। यह ट्रेंड 2022 से पहले के वर्षों में भी यही था।
यहां जिन अन्य तीन अपराधों का जिक्र किया गया है, उनमें पुलिस को हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने में ज्यादा समय लगता है। 2022 में पुलिस की ओर से निपटाए गए हिट-एंड-रन मामलों में से केवल 66.4 फीसदी में आरोप पत्र दायर हुए। वहीं, हत्या के 81.5%, गैर इरादतन हत्या के 84% और 79.6% अन्य दुर्घटनाओं के मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए। हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल नहीं होने का एक बड़ा कारण है। वह यह है कि पुलिस को सच जानने के बावजूद भी सबूत नहीं मिलते हैं। 2022 में पुलिस की ओर से निपटाए गए हिट-एंड-रन मामलों में से 28% में अपर्याप्त सबूत या कोई सुराग नहीं होना रहा। हत्या के 11%, गैर इरादतन हत्या के 9% और अन्य दुर्घटनाओं के 11% मामले में ऐसा देखा गया। इससे पता चलता है कि हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने की दर के कम होने के पीछे अपराधी को न ढूंढ पाना एक कारण हो सकता है। शायद भारतीय दंड संहिता आईपीसी की जगह लेने वाले भारतीय न्याय संहिता बीएनएस में इस बात का भी ध्यान रखा गया था।