क्या कैराना सीट पर हो रही है दो परिवारों की सियासी जंग?

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वर्तमान में कैराना सीट पर दो परिवारों की सियासी जंग हो रही है! उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना के नाम पर ही स्थानीय लोकसभा क्षेत्र का नाम पड़ा है। यहां के लोग दो किस्सों को बखूबी जानते हैं। पहला किस्सा तो करीब 120 साल पुराना है। यहां के हसन और सिंह परिवार के बीच सियासी अदावत चलती है। दोनों राजनीतिक घरानों के पूर्वज एक ही हैं। गुर्जर परिवार की कलस्यान खाप से ताल्लुक रखने वाले कुनबे का एक परिवार धर्मांतरण के बाद मुस्लिम बन गया था। इन्हीं दोनों परिवार के लोग बीते कई सालों से राजनीति में दो ध्रुवों पर हैं। दूसरा किस्सा करीब 8 साल पहले का है, जो हिंदुओं के पलायन से जुड़ा है। घर बेचकर पलायन के मुद्दे ने कैराना को सुर्खियों में ला दिया था। इस बार का लोकसभा चुनाव भी यहां पर इन दोनों मुद्दों के इर्द-गिर्द ही घूमता है। गुर्जर बिरादरी के एक ही परिवार से निकले चौधरी हुकुम सिंह और चौधरी मुनव्वर हसन के परिवार बीते साढ़े तीन दशक से राजनीतिक रूप से प्रतिद्वंदी हैं। इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव में हुकुम परिवार से प्रदीप सिंह चौधरी बीजेपी के टिकट से चुनावी मैदान में हैं। वहीं हसन परिवार से इकरा हसन राजनीतिक शुरुआत कर रही हैं। इंग्लैंड से पढ़ाई करके लौटीं 30 साल की इकरा इस बार कैराना में काफी मजबूती से चुनाव लड़ रही हैं।

इकरा के पिता पूर्व सांसद मुनव्‍वर हसन की 2008 में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उस समय मुनव्वर के बेटे नाहिद हसन और बेटी इकरा हसन छोटे-छोटे थे। तब उनकी मां तबस्सुम हसन ने पति की सियासी विरासत को संभालते हुए 2009 में कैराना लोकसभा सीट पर चुनाव जीता था। फिर नाहिद मैदान में आए और विधानसभा में दांव आजमाना शुरू किया। अब इकरा भी राजनीति में आ गई हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाई नाहिद हसन को जेल हो जाने की वजह से इकरा ने ही चुनाव प्रचार की कमान संभाली और भाई की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। लंदन से लौटने के बाद से वह लगातार क्षेत्र में सक्रिय बनी हुई हैं। लंबे समय तक ब्रिटेन में रहने के बावजूद अपनी सादगी के लिए पसंद की जाने वाली इकरा हसन को अखिलेश यादव ने कैराना लोकसभा सीट से मैदान में उतारा है।

कैराना के एक व्यस्त चौराहे पर फल विक्रेता फुरकान सिद्दिकी ने बताया कि नाहिद भाई को बेकसूर होते हुए भी जेल भेजा गया, तब इकरा इंग्लैंड से पढ़ाई करके वापस लौटीं। दो साल से वह परिवार की तरफ से राजनीतिक कमान संभाल रही हैं। इस बार चुनाव में वह खुद हैं और हम लोग साथ हैं। वहीं रेडीमेड गार्मेंट्स विक्रेता मुन्ना खान ने कहा कि इकरा अभी युवा हैं और राजनीतिक-सामाजिक रूप से समर्पित हैं। हम सभी लोग उसे पसंद करते हैं। चुनाव में निश्चित तौर पर उसकी जीत होगी। इकरा ने खुद हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बताया कि कैराना में हम लोगों को खास चुनौती नहीं मिल रही है। बीजेपी की तरफ से राष्ट्रीय मुद्दों को पेश किया जा रहा है लेकिन कैराना में पब्लिक के बीच जाने पर स्थानीय मुद्दे ही हावी हैं। यहां की जनता हमारे साथ खड़ी है। 2014 में कैराना लोकसभा सीट से बीजेपी के हुकुम सिंह ने 5 लाख 65 हजार 909 वोट के साथ जीत हासिल की थी। यहां दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नाहिद हसन को 3 लाख 29 हजार 81 वोट मिले थे। हुकुम सिंह के निधन के बाद कैराना लोकसभा सीट पर साल 2018 में उपचुनाव हुए थे।

कैराना का एक और पहलू भी है। वह है- पलायन। 2016 में बीजेपी के तत्कालीन सांसद हुकुम सिंह ने इलाके से बड़ी संख्या में हिंदू परिवारों के पलायन कर जाने का आरोप लगाया। उन्होंने 346 परिवार की लिस्ट भी जारी की, जो उत्पीड़न की वजह से अपना घर बेचकर दूसरी जगह चले गए। यह मामला सुर्खियों में आया और खूब सियासी विवाद हुआ। विवाद का तूफान तो थम गया लेकिन दाग अभी भी हैं। कैराना की टीचर्स कॉलोनी में हिंदू परिवार कथित तौर पर घर बेचने के बाद बस गए। आरडीएस कोचिंग चलाकर 200 बच्चों को पढ़ाने वाले एस. शर्मा ने बताया कि अभी हम सबका फोकस और अधिक बच्चों को शिक्षित करके कुछ बेहतर बनाने पर है। अतीत में जो हो चुका, उसे भुला देना ही ठीक है।

कुछ ऐसी ही बात किराना की दुकान चलाने वाले अक्षित गर्ग ने भी कही। उन्होंने पलायन के मुद्दे पर कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया। लेकिन बीजेपी कार्यालय में शक्ति सिंह ने लड्डू खिलाते हुए चुनाव से पहले ही जीत दर्ज करने की बात कही। उन्होंने कहा कि यहां पर हिंदुओं का पलायन हुआ। अपराध का स्तर बढ़ा हुआ है। कोई भी इंसान अपराध को लेकर सहज कैसे हो सकता है। लोग अभी भी इन सवालों को पूछ रहे हैं। बाबूजी हुकुम सिंह के परिवार ने हम लोगों के काफी कुछ किया है। सब लोग उनके साथ हैं।