Thursday, April 3, 2025
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जानिए दीपावली पर मां काली की पूजा का शुभ मुहूर्त एवं महत्व!

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्य शिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते, जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते!

इस मंत्र का उच्चारण तो आपने कभी ना कभी किया ही होगा, यह मां महिषासुर मर्दिनी यानी मां काली का सबसे प्रिय मंत्र है! मां काली को दुख भंजनी कहा जाता है, मां काली हमेशा से ही अपने भक्तों और प्रिय जनों के लिए दुष्टों का संहार करती आई है! मां काली के रूप की बात करें तो वह काले रंग का है और मुद्रा में माँ ने हाथों में खड़ग धारण कर रखा है, यही नहीं मां के मुख मंडल पर क्रोध है और मुंह से जीभ निकली हुई है! आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जब पृथ्वी पर दुष्टों और आतताइयों का वर्चस्व हो गया था, तब मां दुर्गा ने काली का रूप धारण करके उन सभी दुष्टों का अंत किया था! मां काली को सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, असम और झारखंड के इलाकों में दिवाली के दिन पूजा जाता है! बंगाली परंपरा में दीपावली को काली पूजा ही कह कर भी संबोधित किया जाता है!

दीपावली की रात को मां लक्ष्मी के साथ-साथ मां काली की भी पूजा की जाती है, इसलिए इसे काली चौदस कहा जाता है! इस साल 23 अक्टूबर की रात चौदस लगी है और 24 अक्टूबर की शाम तक पूजा हो सकती है! आपको बता दें कि हिंदू धर्म के अनुसार काली पूजा के दिन ही मां काली 64 हजार योगिनियों के साथ प्रकट हुई थीं! उन्होंने रक्तबीज सहित कई असुरों का संहार किया था, इसलिए बंगाली समुदाय के लोग इस पूजा को शक्ति पूजा के रूप में भी मानते हैं!

साल 2022 में काली पूजा सोमवार 24 अक्टूबर 2022 को पूजी गयी! काली पूजा का शुभ मुहूर्त 11.40 PM से 25 अक्टूबर 12.31 AM तक होगा! इसी के साथ अमावस्या तिथि की शुरुआत 24 अक्टूबर 2022 को शाम 05:27 बजे से 25 अक्टूबर 2022, 4.18 PM तक होगी!

हिंदू धर्म के अनुसार काली माता भक्तवत्सल होती है, माता के अंदर ममतामई मुरत छुपी होती है! दिवाली के दिन माता की पूजा करने से सुख शांति आती है और माता की कृपा मिलती है! काली पूजा करने से भक्तों की  मनोकामनाएं पूर्ण होती है! इन सभी कारणों की वजह से काली माता की पूजा को दिवाली पर करना बहुत शुभ माना जाता है!

काली चौदस की पूजा में अगरबत्ती, धूप, फूल, काली उरद दाल, गंगा जल, हल्दी, हवन सामग्री, कलश, कपूर, कुमकुम, नारियल, देसी घी, चावल, सुपारी, शंख, पूर्णपतत्र, निरंजन, लकड़ी जलाने के लिए माचिस, गुड़, लाल, पीले रंग रंगोली के लिए, रुई आदि सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। मां काली की पूजा रात के समय की जाती है, इसलिए भक्तों को माता की पूजा करते समय स्नान कर लेना चाहिए और साफ वस्त्र पहनकर ही माता की पूजा करें!

इसके बाद काली पूजा करने के लिए एक चौकी लें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं, इस पर मां काली की फोटो या मूर्ति स्थापित करें!

गणेश जी को प्रथम पूज्य देव माना जाता है, इसलिए सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें और उसके बाद पंचामृत से काली माता को स्नान करवाएं!

फिर मां को लाल चुनरी अर्पित करें और साथ ही लाल फूल की माला पहनाएं, यहि नहीं मां को तिलक, हल्दी, रोली और कुमकुम भी लगाएं, साथ ही श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें!

इसके पश्चात पूजा के दौरान काली मां के आगे सरसों के तेल का दीपक जलाएं, मां काली को सिंदूर भी अर्पित करें और मां की कथा सुनें! काली गायत्री मंत्र या मां के बीज मंत्रों का जाप करें, फिर मां की आरती करें! मां को भोग लगाने के बाद प्रसाद को सभी में वितरित करें!

काली चौदस के दिन रात्रि में मां काली की उपासना करने से साधक को मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। मान्यता है की काली चौदस पर काली पूजा करने से शत्रु पर विजय प्राप्ति का वरदान मिलता है। जो साधक तंत्र साधना करते हैं काली चौदस के दिन महाकाली की साधना को अधिक प्रभावशाली मानते हैं।

मां काली के पूजन को पश्चिम बंगाल में धूमधाम से किया जाता है, इस दिन कई मंदिरों में अलग-अलग परंपराओं और प्रथाओं के अनुसार पूजा की जाती है! शवशिवा काली मंदिर जिसकी स्थापना 1789 में पश्चिम बंगाल के राजा चंद्रराय के पुरोहित चंद्रशेखर शर्मा ने कराई थी। आगे से देखने पर इस विग्रह में शव के ऊपर शिव और शिव के ऊपर काली जबकि पीछे से शिवलिंग के दर्शन होते हैं। मंदिर समिति के सचिव देवाशीष दास की देखरेख में मुख्य पूजा 24 अक्तूबर की शाम होगी। अन्नकूट की झांकी 26 अक्तूबर को सजेगी।

इस तरह पूरे देश में अलग-अलग मंदिरों में अलग-अलग प्रकार से माता की पूजा की जाती है और माता का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है!

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