कहां से शुरू हुई पूरी कहानी-
इस 15 अगस्त को रिहा किए गए 11 दोषियों की कहानी 2002 में हुए प्रचलित और सुर्खियों में रहे बिलकिस बानो गैंग रेप केस से जुड़ी हुई है ,जिसे दबाने की कोशिश की गई थी। दरअसल ये पूरी कहानी साल 2002 में शुरू हुई जब अयोध्या से लौट रहे राम भक्तों से भरे ट्रेन की एक बोगी को जला देने के बाद दंगे भड़के गए थे उस समय साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी को जला दिया गया था। बिलकिस बानो जो 5 महीने की प्रेग्नेंट थी उस समय अपने पति और एक 3 साल की बच्ची के साथ गुजरात के दाहोद जिले में रहती थी उसी समय ईस्टर सेलिब्रेशन के दौरान वह अपने परिवार के साथ अपने पिता के घर सिंगवाद गई थी। जो की गुजरात का एक जिला है। जिसके 3 दिन बाद अयोध्या से का कारसेवक अहमदाबाद साबरमती एक्सप्रेस से वापस आ रहे थे। जिसकी एक बोगी S6 में आग लगा दी जाती है। जिस से वहां दंगे बढ़ जाते हैं। गुजरात के कई और इलाकों से भी दंगों की खबरें आने लगती हैं लोग बचने की चाह में इधर उधर भागने लाते हैं।
इसी दौरान लोग अपने परिवार से बिछड़ कर एक समूह बनाकर भाग रहे थे ताकि इन दंगों से बचा जा सके। तो बिलकीस उनकी मां और उनकी 3 साल की बच्ची अपनी जान बचाने के लिए अपने पति और भाई से अलग एक समूह में भागती हैं ताकि उन्हें कोई पहचान ना सके। जिस समूह में बिलकिस भागी थी उस समूह में 16 अन्य लोग भी थे। वो लोग और बिल्किस 1 दिन के लिए गुजरात के एमएलए के घर रुकते हैं और उसके बाद एक आदिवासी समूह के साथ मिलकर रहने लगते हैं और उन्हीं की तरह कपड़े पहनते हैं ताकि लोग उन्हें ना पहचान सके लेकिन कुछ ही दिनों बाद 25 से 30 लोग एक उजली गाड़ी में वहां पहुंच जाते हैं जहां बिलकिस् ,अपनी मां और बच्चे और उन अन्य 16 लोगो के साथ होती हैं। बिल्किस पहले से ही उन लोगों को जान रही होती हैं क्योंकि वह सारे लोग उन्हीं के गांव के होते हैं क्योंकि बिलकिस उस समय प्रेग्नेंट थी उनकी बच्ची छोटी थी और उनकी मां बुढी थी यह तीन लोग वहां से भाग नहीं पाते । बाकी समूह के लोग वहां से अपनी जान बचाने के लिए भाग जाते हैं। इन तीन लोगों के अलावा कुछ 7 लोग और भी थे जो वहां से भाग नहीं पाते है । इसके बाद यह 25 से 30 लोग बिलकिस or उनकी माँ के साथ रेप करते हैं फिर बिलकिस की 3 साल की बेटी को मार देते हैं। और बचे हुए लोगों को भी मौत के घाट उतार देते हैं। बिलकिस बानो इस वजह से बच जाती हैं क्योंकि वो लोग समझते हैं कि वह मर चुकी है। जिसके दो-तीन घंटे बाद उन्हें होश आता है तो वह अपने परिवार के लोगों को वहां मरा हुआ पाती हैं। उसके बाद वह रात भर वहीं पेड़ के नीचे छुपकर अपनी रात गुजरती हैं फिर सुबह होते ही वहां आदिवासी लोगों से कपड़े मांगती हैं और एक होमगार्ड को अपनी आपबीती सुनाती हैं जिसके बाद वह होमगार्ड उन्हें लिमखेड़ा पुलिस स्टेशन ले जाता है जहां गवाही के दौरान उनकी रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ की जाती है क्योंकि पुलिस आरोपियों को बचाने की कोशिश में रहती है। बिलकिस के साथ हुई उस रात की घटना को वहां के पुलिस अफसर (सोमनाथ) अपनी f.i.r. रिपोर्ट में बिल्कुल अलग तरीके से लिखते हैं ताकि दोषियों को सजा ना मिले। इसका खुलासा तब होता है जब सीबीआई की जांच टीम इस घटना से जुड़े सबूतों को इकट्ठा कर रही होती है। उस समय के पुलिस के fir के अनुसार पुलिस का कहना होता है कि बिलकिस की कहानी झूठी है और इसमें कोई भी सच्चाई नहीं है जिसके बाद इस केस को बंद कर दिया जाता है।
कुछ समय बाद बिलकिस को एक रिफ्यूजी कैंप में शिफ्ट किया जाता है जहां बिलकिस अपने साथ हुई सारी घटना को लोगों के सामने रखती हैं और वहां की फाउंडर सुग्र बेन और लतीफा बेन इस बात को सीबीआई इन्वेस्टिगेशन तक ले जाती हैं। जहां सीबीआई इस मामले की जांच करती है और लोगों के सामने सच्चाई लाती हैं।
जिसके बाद उन 11 लोगों को कोर्ट उम्र कैद की सजा सुनाती है। जिसके तहत गलत f.i.r. लिखने के जुर्म में पुलिस अफसर और गलत मेडिकल रिपोर्ट देने के जुर्म में डॉक्टर को भी सजा मिलती है।
दरअसल ये मामला चर्चा में इसलिए दोबारा है क्योंकि इस 15 अगस्त को उन 11 दोषियों को सुप्रीम कोर्ट ने रिहा कर दिया है। दरअसल मामला गुजरात का था पर पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाने की शिकायत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला महाराष्ट्र ट्रांसफर कर दिया था। 2008 में मुंबई की सीबीआई टीम ने उन 11 दोषियों के खिलाफ उम्र कैद की सजा सुनाई थी। यह सभी दोषी 14 साल से जेल में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे, जिसके बाद उनमें से एक दोषी राधेश्याम शाही ने धारा 432 और 433 के तहत गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया ताकि उनकी सजा माफ कर दी जाए। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस फैसले को सुनाने की जिम्मेदारी उनकी नहीं बल्कि महाराष्ट्र कोर्ट की है क्योंकि उनकी सजा महाराष्ट्र के हाईकोर्ट ने दी थी इसके बाद राधेश्याम शाही ने महाराष्ट्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट में माफी याचिका दायर की थी। जो की माँ ली गई,जिसके उपरांत गृह मंत्रालय के अनुस्मारक मापदंडों को पूरा करने के लिए तीन चरणों में कैदियों को रिहा किया जाएगा 15 अगस्त 2022, 26 जनवरी 2023 और 15 अगस्त 2023 ।
किस योजना के तहत रिहा हो रहे कैदी
आजादी के अमृत महोत्सव को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने एक योजना शुरू की जिसमें 60 वर्ष से अधिक आयु के कैदी, महिला और ट्रांसजेंडर साथ ही शारीरिक रूप से एक अक्षम पुरुषों को दोषी ठहराया जाता है और उन्हें अपनी सजा को आधे से अधिक पूरा कर लिया है तो गृह मंत्रालय के दिशा निर्देशों के अनुसार आगे की सजा जारी की जाएगी इसमें गरीब कैदी भी शामिल है जिन्होंने अपनी सजा पूरी कर ली है और जुर्माने का भुगतान नहीं करने की वजह से जेल में है तो उन्हें रिहाई मिल सकती है।
बिलकिस बानो का क्या है कहना-
बिलकिस बानो ने कहा कि इस फैसले को लेने से पहले किसी ने उनकी सुरक्षा के बारे में नहीं पूछा और ना ही सोचा। वहीं बिलकिस बानो कि वकील शोभा का कहना है कि यह काफी अन्याय पूर्ण फैसला है और जब उन्हें पता चला कि 15 अगस्त 2022 को बिलकिस बानो के परिवार और उनकी जिंदगी को बर्बाद करने वाले उनसे उनकी 3 साल की बच्ची को छीनने वाले 11 दोषियों को आजाद कर दिया गया है तो उनका 20 साल पुराना वह अतीत उनके सामने एक बार फिर आ खड़ा हुआ।
ए आई एम आई एम प्रमुख ओवैसी ने कहा कि भाजपा बलात्कारियों के साथ खड़े रहने की नीति बना रही है उन्होंने कहा कि जहां कुछ लोग की जाती अपने अपराध की जघन्य प्रकृति के बावजूद जेल से अपनी रिहाई की सुरक्षा कर सकती है । वहीं कुछ अन्य लोगों की जाति या धर्म उन्हें बिना सबूत के ज्ञात करने के लिए पर्याप्त है।
कौन है यह 11 दोषी जिन्हें रिहा किया गया है
इस साल 15 अगस्त को गुजरात सरकार की माफी नीति के तहत स्वतंत्रता दिवस के दिन जसवंत नाई ,शैलेश भट्ट, राधेश्याम शाह, केसरभाई वोहानियां, प्रदीप मोधाधिया ,विपिन चंद्र जोशी, गोविंद नाई, बांकाभाई वोहानियां, राजूभाई सोनी और रमेश चंदाना को गोधरा उप कारागार से रिहा किया गया है।
जिसमें से राधेश्याम शाह ने सुप्रीम कोर्ट से सजा में रियायत की गुहार लगाई थी।
इंसाफ के लिए 6 साल भटकती रही बानो
अपने जीवन के इस सबसे बड़े जंग की लड़ाई में बानो अकेले ही 6 साल लड़ती रही और संघर्ष करती रही। उन्होंने 20 बार घर बदले और धमकियों के कारण अपने परिवार के साथ इधर उधर भटकती रही जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस केस की सुनवाई गुजरात से बाहर करवाने की मांग की। सुनवाई के दौरान बिलकिस ने सभी आरोपियों को पहचान लिया था 2008 की CBI कि स्पेशल कोर्ट ने उन सभी को गर्भवती महिला के साथ रेप ,हत्या और गैर कानूनी तौर पर एक जगह इकट्ठा होने के लिए उम्र कैद की सजा सुनाई थी। जिस पर मुंबई हाई कोर्ट ने भी सहमति जताई थी । उनमें से सात अन्य आरोपियों को सबूत के अभाव में छोड़ दिया गया था।
इस दोष में कुल 18 लोग शामिल थे जिसकी सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी । जिनमें से एक की मौत पहले ही हो चुकी थी।