Friday, September 20, 2024
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क्या इंदिरा गांधी के लिए भी लाई गई थी लौह शिला?

एक समय ऐसा था जब इंदिरा गांधी के लिए लौह शिला लाई गई थी! अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर में रामलला की मूर्ति के लिए नेपाल से दो बड़ी शिलाएं भारत पहुंच चुकी हैं। ये पवित्र शालीग्राम की शिलाएं हैं, जिनसे भगवान राम और माता सीता के बाल विग्रह निर्मित किए जाएंगे। ये शिलाएं नेपाल के जनकपुर से 26 जनवरी को अयोध्या के लिए रवाना की गई थीं। इन शिलाओं का रास्ते में हजारो लोगों ने पूजन किया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब एक जगह से दूसरी जगह इतनी विशाल शिलाएं भेजी गई हों। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की समाधि पर भी एक बड़ी शिला रखी गई है, जिसे इसी तरह ट्रक और ट्रेन में लादकर ओडिशा की सुदंरगढ़ खदानों से दिल्ली लाया गया। आज हम आपको इसी शिला की कहानी बता रहे हैं। बता दें कि इंदिरा गांधी का समाधि स्थल राजधानी दिल्ली में है, जिसे शक्ति स्थल कहा जाता है। इस समाधि पर एक बड़ी शिला रखी गई है। इस विशाल पत्थर का वजन 25 टन है। अब आप सोच रहे होंगे कि पूर्व प्रधानमंत्री की समाधि पर ये पत्थर क्यों लगाया गया है। दरअसल, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इंदिरा गांधी की याद में स्मारक बनाने का फैसला लिया, तो उन्होंने सोचा कि एक ऐसा स्मारक बनाया जाए, जो आयरन लेडी की चट्टान जैसी इच्‍छा शक्ति को प्रस्तुत करे। इसके बाद उनकी समाधि स्थल पर लोह अयस्क की एक शिला लगाने का फैसला किया गया। इसी चट्टान की वजह से इसका नाम शक्ति स्थल रखा गया।

सरकार ने इंदिरा गांधी की समाधि के लिए ओडिशा से शिला लाने का फैसला कर लिया, लेकिन इसे दिल्ली तक लाना आसान काम नहीं था। ये शिला ओडिशा के राउरकेला से करीब 100 किलोमीटर दूरी पर बने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की बरसुआन खदान से लाई जानी थी। शिला के सर्च ऑपरेशन का जिम्मा तत्कालीन जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर सैलेन मुखर्जी को दिया गया। इस शिला की खोज सैलेन मुखर्जी और राउरकेला स्टील प्लांट के रिटायर्ड मैनेजर रमेश चंद्र मोहंती ने की। बाद में इंदिरा गांधी के करीबी पुपुल जयकर की सहमति से इसे इंदिरा गांधी की समाधि पर रखा गया।

लाल रंग के जैस्पर किस्म के पत्थर को खोज निकाला। बताया जाता है इस शिला को चुनने के पीछे एक और वजह भी थी। दरअसल इसका आकार हाथ के पंजे की तरह है, जो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी है।शिला ओडिशा के राउरकेला से करीब 100 किलोमीटर दूरी पर बने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की बरसुआन खदान से लाई जानी थी। शिला के सर्च ऑपरेशन का जिम्मा तत्कालीन जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर सैलेन मुखर्जी को दिया गया। इस शिला की खोज सैलेन मुखर्जी और राउरकेला स्टील प्लांट के रिटायर्ड मैनेजर रमेश चंद्र मोहंती ने की। बाद में इंदिरा गांधी के करीबी पुपुल जयकर की सहमति से इसे इंदिरा गांधी की समाधि पर रखा गया। इसके अलावा शिला पर जैकहैमर ड्रिलिंग की वजह से कुछ छेद भी दिखाई देते हैं, जो इंदिरा गांधी के शरीर पर लगी गोलियों के निशान की याद दिलाते हैं। मुखर्जी और मोहंती ने इंदिरा की समाधि के लिए शिला तो खोज ली, लेकिन इसके 25 टन वजन की वजह से दिल्ली तक ले जाना बेहद मुश्किल था। सबसे बड़ी समस्या था बरसुआन खदानों से इसे नीचे तक लेकर आना। ये दूरी करीब 10 किलोमीटर की थी और ये पूरा इलाका पहाड़ी था।शिला ओडिशा के राउरकेला से करीब 100 किलोमीटर दूरी पर बने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की बरसुआन खदान से लाई जानी थी। शिला के सर्च ऑपरेशन का जिम्मा तत्कालीन जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर सैलेन मुखर्जी को दिया गया।

इस शिला की खोज सैलेन मुखर्जी और राउरकेला स्टील प्लांट के रिटायर्ड मैनेजर रमेश चंद्र मोहंती ने की।शिला ओडिशा के राउरकेला से करीब 100 किलोमीटर दूरी पर बने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की बरसुआन खदान से लाई जानी थी। शिला के सर्च ऑपरेशन का जिम्मा तत्कालीन जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर सैलेन मुखर्जी को दिया गया। इस शिला की खोज सैलेन मुखर्जी और राउरकेला स्टील प्लांट के रिटायर्ड मैनेजर रमेश चंद्र मोहंती ने की। बाद में इंदिरा गांधी के करीबी पुपुल जयकर की सहमति से इसे इंदिरा गांधी की समाधि पर रखा गया। बाद में इंदिरा गांधी के करीबी पुपुल जयकर की सहमति से इसे इंदिरा गांधी की समाधि पर रखा गया। इसे एक क्रेन की मदद से बड़े मैक ट्रेलर पर लोड किया गया। इस मैक ट्रेलर की मदद से इसे खदान से राउरकेला तक लाया गया। इस दौरान करीब 3 घंटे तक रोड को बंद किया गया था। इसके बाद राउरकेला से एक स्पेशल ट्रेन में लादकर इसे दिल्ली भेजा गया। इस ट्रेन को भी रेलवे ने क्लीयरेंस रूट दिया था।

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