अब कोई भी ताकतवर देश कमजोर देश के सामने अपनी सेना नहीं लाना चाहता क्योंकि उसे डर है ग्रे जोन वॉरफेयर का! बदलते वक्त में युद्ध का तरीका भी बदल गया है। कहे-सुने के साथ-साथ यह अक्सर अनुभव भी किया जाने लगा है। पड़ोसी देश चीन का पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से तनाव जारी रखना भी इसी नए तरीके के युद्ध का ही एक उदाहरण है। हालांकि, कुछ दिनों पहले पेट्रोलिंग पॉइंट 15 PP 15 से भारत और चीन, दोनों की सेनाएं पीछे हटी हैं, लेकिन डेमचॉक और देपासांग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की सेनाएं अब भी एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले खड़ी हैं। ऐसे में चीन की चाल को समझना मुश्किल हो रहा है। इसी माहौल में भारत के थल सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने कहा है कि हमें अपनी ‘ग्रे जोन’ की युद्ध-क्षमता बढ़ानी होगी। उन्होंने राजधानी दिल्ली में आयोजित इंडिया डिफेंस कॉन्क्लेव में कहा, ‘हमें भी ग्रे जोन कैपिबलिटीज को विकसित करने की जरूरत है।’ उधर, नौसेना प्रमुख एडमिरल हरिकुमार ने एक अन्य सम्मेलन में कहा कि युद्ध अब सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़े जाते बल्कि लोगों के दिमागों में भी लड़े जा रहे हैं। दरअसल, नौसेना प्रमुख ने भी ग्रे जोन वॉरफेयर टैक्टिक्स की तरफ ही इशारा किया है। भारतीय सेना को अहसास है कि चीन ने इसमें महारत हासिल कर ली है और उससे निपटने के लिए हमें भी इस कला में पारंगत होना होगा। आइए जानते हैं कि आखिर ग्रे जोन वॉरफेयर क्या है और भारत को इसमें निपुण होने के लिए किन चीजों की दरकार होगी।
ग्रे जोन वॉरफेयर मूलतः सैन्य कार्रवाइयों से इतर दुश्मन को अलग-अलग मोर्चों पर कमजोर करने की तरकीब है जिसके तहत युद्ध काल में ही नहीं, शांति काल में भी अलग-अलग अभियान चलते रहते हैं। चीन की ‘सलामी स्लाइसिंग’ पॉलिसी इसी ग्रे जोन वॉरफेयर का एक हिस्सा है। चीन ने इस युद्ध कौशल में अपने आपको काफी मजबूत बनाया है। इतना ही नहीं, पड़ोसी देशों को कर्ज के जाल में फांसने की रणनीति हो या बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव जैसा ढांचागत अभियान, चीन इनके जरिए ग्रे जोन वॉरफेयर को ही बढ़ावा देता है। सामान्य समझ तो कहती है कि लोन देकर चीन पड़ोसियों की मदद करता है जबकि बीआरआई जैसे प्रॉजेक्ट्स से पड़ोसी देशों में ढांचागत सुधारों की पहल की जाती है, लेकिन उसके पीछे की मंशा बिल्कुल विपरीत होती है। चीन इन तरकीबों से न केवल दूसरे देशों को अपनी शर्तें मानने पर बाध्य करता है बल्कि उसकी संप्रभुता और सीमाओं का भी अतिक्रमण करता है।
नेवी चीफ एडमिरल आर हरिकुमार ने कहा है, ‘भौगोलिक सीमाओं से इतर युद्ध के अखाड़े सजेंगे। यह समुद्र में, जमीन पर, हवा में, सूचनाओं दुनिया और डिजिटल वर्ल्ड में, यहां तक कि हमारे दिमाग में भी लड़ा जाएगा।’ सूचना तकनीक के जमाने में हम कैसे प्रभावित होते हैं, दुश्मन को पता होता है। इसलिए नई युद्ध नीति में दुश्मन देश की जनता का मन बदलकर, उनका समर्थन हासिल करने पर भी जोर दिया जाता है। इस काम को इतनी सफाई से अंजाम दिया जाता है कि दुश्मन देश के आम नागरिक अपने ही देश और वहां की सरकार के खिलाफ हो जाते हैं। स्वाभाविक है अगर देश के अंदर ही बंटवारा हो जाए तो दुश्मन का काम आसान हो जाता है। गैर-सरकारी संगठन, निजी हित में देशहित को दांव पर लगा देने की फिराक में बैठे लोगों एवं संगठनों के समूह, सोशल मीडिया और एवं सूचना के अन्य माध्यम इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इतना ही नहीं, कई बार राजनीतिक दल भी दुश्मन देश के ग्रे जोन वॉरफेयर के औजार के रूप में काम करने लगते हैं।
एक्सपर्ट्स ग्रे जोन वॉरफेयर की कोई सुनिश्चित परिभाषा तो नहीं मानते हैं, लेकिन इस बात पर सभी एकमत हैं कि फिजिकल वॉर से इतर जो भी गतिविधियां दुश्मन देश को परेशान करने वाली हों, वो दरअसल ग्रे जोन वॉरफेयर का ही हिस्सा होती हैं। इसमें अलग-अलग मोर्चों पर खतरों (Hybrid Threats) की उत्पत्ति, तीक्ष्ण शक्तियों (Sharp Power) का उपयोग, राजनीतिक युद्ध (Political Warfare), छवि खराब करने की चाल, अनियमित संघर्ष और स्वतंत्र फैसले लेने में रुकावटें पैदा करने जैसे हथियारों का इस्लेमाल किया जाता है। अमेरिका समेत तमाम लोकतांत्रिक देशों के रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन, कोरिया जैसे तानाशाही शासन वाले देश इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति करते हैं क्योंकि वहां लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार काफी सीमित होते हैं। इस कारण उन देशों की सरकारें जनता के प्रति जवाबदेही से बच जाती हैं क्योंकि उन्हें सवालों का सामना ही नहीं करना पड़ता है। ऐसी शासन व्यवस्था में किसी दूसरे देश के प्रति फर्जी खबरें प्रचारित करने, सोशल मीडिया ट्रोल की फौज खड़ा करना, आतंकियों की फंडिंग और सैन्य स्तर पर छोटे-छोटे उकसावों को बढ़ावा देना आसान होता है।
हमारे एक और पड़ोसी देश पाकिस्तान को ही ले लें। वह जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की फंडिंग आज से नहीं कर रहा है। उसकी खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) आतंकी फंडिंग के लिए भारत में अलग-अलग देशों के जरिए ड्रग्स की सप्लाई भी करता है। वह भारत के अलग-अलग अंदरूनी मामलों को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में अलगाव की भावना भड़काने का हर संभव प्रयास करता रहता है। बात जाति की हो या धर्म की, आए दिन विवादित मुद्दों पर पाकिस्तानी टूलकिट का पर्दाफास होता रहता है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रे जोन वॉरफेयर का लक्ष्य दूरगामी परिणाम हासिल करना होता है। परंपरागत युद्ध में जिस तरह हार-जीत का फैसला हो जाता है, उससे उलट इसमें एक समय सीमा में हार-जीत की कल्पना नहीं की जाती है। ग्रे जोन वॉरफेयर लगातार चलते रहने वाला अभियान है, चाहे माहौल शांतिपूर्ण ही क्यों न रहे। बिना ध्यान हटाए दुश्न को अंदर और बाहर से कमजोर करते रहने का अभियान ही ग्रे जो वॉरफेयर का असली मुकाम है। कुल मिलाकर कहें तो पारंपरिक युद्ध की एक मंजिल होती है- जीत। ग्रे जोन वॉरफेयर का रास्ता ही उसकी मंजिल है।