अब यूपी में विपक्षी पार्टियां एक हो सकती है! पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा की बहुमत वाली जीत की यात्रा में उत्तर प्रदेश का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यहीं से चुनाव लड़ते हैं। इस कारण भी पूरे चुनाव में यूपी की चर्चा जोर-शोर से होती रहती है। चुनावी साल में यूपी के बारे में न केवल बात होगी बल्कि राम मंदिर के उद्घाटन के जरिए राष्ट्रीय चर्चा का रुख भी तय होगा। विपक्षी समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आरएलडी भाजपा के बढ़ते कदम को रोकने के लिए जाति और स्थानीय भावनाओं को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं बसपा जैसी अन्य पार्टियां, जिनके पास अच्छा वोट शेयर है, तटस्थ बनी हुई हैं। जहां तक बात छोटे दलों की है तो वो बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर आकर्षित हुए हैं। भाजपा ने 2014 में यूपी की 80 में से 71 सीटें 42% वोट शेयर के साथ जीती थीं। दो सीटें भाजपा की सहयोगी अपना दल ने जीती थीं। 2019 में बसपा, सपा और आरएलडी ने मिलकर भाजपा को टक्कर दी। फिर भी पार्टी ने 62 सीटें बड़े अंतर से जीत लीं और वोटों की हिस्सेदारी बढ़कर 50% हो गई। 2024 में भाजपा 2014 से भी बेहतर प्रदर्शन करना चाहती है। राम मंदिर का उद्घाटन एक ऐसा तरूप का इक्का है जिसके दम पर भाजपा विपक्षियों को पूरी तरह चित करने की उम्मीद कर रही है। पार्टी ने जल्दी काम करना शुरू कर दिया है। भाजपा ने उन सीटों की पहचान की है जो उसने यूपी में कभी नहीं जीती थीं और जहां 2019 में हार मिली थी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, 2019 में जिन सीटों पर भाजपा को हार मिली थी, उन पर विशेष ध्यान देकर पार्टी ने राज्य में और 20 लाख मतदाता जोड़े हैं। पार्टी उन सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पहले करने की योजना बना रही है जिन पर उसने 2019 में जीत नहीं दर्ज की थी। यह रणनीति हाल ही के विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी के लिए कारगर रही थी, इसलिए इसे आगामी लोकसभा में दोहराना चाहती है।
उत्तर प्रदेश की भाजपा इकाई के अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि हम चुनाव के कारण लोगों के पास जा रहे हैं। भाजपा का हर कार्यकर्ता सालभर लोगों के संपर्क में रहता है। हम हमेशा चुनाव के लिए तैयार रहते हैं।’ चौधरी यूपी में चल रहे कई विकास कार्यों के बारे में भी बात करते हैं। वो कहते हैं, ‘पीएम मोदी के नेतृत्व में यूपी बदल गया है। इस कारण लोग मोदी और भाजपा पर भरोसा करते हैं।’ 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए थे। उसमें भाजपा की दोबारा जीत के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी एसबीएसपी जैसी छोटी पार्टियां भी भाजपा की ओर आकर्षित हुई हैं। पीएम नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के कार्यक्रम पहले ही शुरू हो चुके हैं। 22 जनवरी को मोदी राम मंदिर का उद्घाटन करेंगे। पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे लोकसभा चुनाव तक मंदिर उद्घाटन का उत्साह बनाए रखें।
समाजवादी पार्टी सपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल आरएलडी सीट बंटवारे पर चर्चा में हैं। सभी ने 2022 का विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आगे टिक नहीं पाए। उस चुनाव में सपा अपना वोट 10 से 32 प्रतिशत बढ़ाकर सबसे ज्यादा फायदे में रही। उसे 2012 में भी 32 प्रतिशत वोट नहीं मिले थे, जब उसने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। इसी प्रदर्शन की बदौलत सपा और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगामी लोकसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक के अगुआ बने। 2024 के लोकसभा चुनाव दरअल 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों का प्रैक्टिस सेशन भी है। अखिलेश ने कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। पार्टी प्रवक्ता और विश्लेषक सुधीर पंवार ने बताया कि सपा को अब पिछले एक साल में भाजपा और बसपा की तरह कैडर-आधारित पार्टी के रूप में संगठित किया गया है और यह अब एक औपचारिक संगठन है। इंडिया ब्लॉक में बसपा की अनुपस्थिति में अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ – पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक का नारा गढ़ा है और बसपा के मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक समानता, जातिगत जनगणना और बेरोजगारी पार्टी के अभियान का मुख्य हिस्सा हैं। पार्टी वर्तमान में उम्मीदवार चयन पर काम कर रही है। सर्वेक्षण चल रहे हैं और अखिलेश यादव व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। 2004 और 2009 के चुनावों में क्रमशः 35 और 23 लोकसभा सीटें जीतने के अपने सुनहरे दिनों के बाद सपा ने पिछले दो चुनावों में पांच-पांच सीटें ही जीती हैं। आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में हार के बाद पार्टी के पास लोकसभा में केवल तीन सांसद हैं।
अब तक एनडीए और इंडिया दोनों से दूरी बनाए रखने वाली बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने घटते वोट बैंक को रोकने की कठिन चुनौती का सामना करेगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी, लेकिन 2019 में सपा और आरएलडी के साथ गठबंधन में उसने 10 सीटें जीत ली थीं।
हालांकि, अनुसूचित जाति के मतदाता बसपा का मुख्य आधार बने हुए हैं, लेकिन पार्टी के अंदर में ही एमबीसी जातियों के लिए ‘स्टेपनी वोट’ का तंज कसा जाता है। पार्टी के अधिकांश प्रमुख चेहरे, जो अपनी जाति, खासकर एमबीसी के बीच लोकप्रिय हैं, पहले ही बसपा छोड़कर सपा में शामिल हो चुके हैं। बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए दो प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रही है। बसपा के लिए यह स्वाभाविक है कि वह पहले अपने अनुसूचित जाति के वोटों को बरकरार रखे। दूसरा काम एमबीसी के बीच युवा चेहरों की तलाश करना है। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में पार्टी के लिए दोनों काम कठिन हैं। मायावती का अकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुनने का फैसला स्पष्ट रूप से अनुसूचित जातियों के बीच युवा मतदाताओं को लुभाने का लक्ष्य साधने के लिए है। पार्टी अपने मूल अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपने राजनीतिक विरोधियों से बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। राजभर, शाक्य, सैनी और निषाद जैसे एमबीसी मतदाताओं को एनडीए और इंडिया दोनों ही खेमे लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।