ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या अब मुस्लिम धर्म में दो या तीन शादियाँ होंगी या नहीं! मुस्लिम पुरुष को बहुविवाह का अधिकार है लेकिन उसे प्रत्येक पत्नी को समान तरह से रखना होगा। हाई कोर्ट ने कहा है कि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष को बहु विवाह की इजाजत है और उसे एक समान तरह से पत्नियों को ट्रीट करना होगा और अगर वह ऐसा करने में विफल रहता है तो यह क्रुएल्टी के दायरे में आएगा। पति की ड्यूटी है कि वह अपनी पत्नी का सही तरह से देखभाल करे। इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने उक्त व्यवस्था देते हुए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल रखा है जिसमें फैमिली कोर्ट ने क्रुएल्टी के ग्राउंड पर पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति और उसके परिवार वालों ने शुरुआत में पहली पत्नी के साथ प्रताड़ना की थी और बाद में मुस्लिम पुरुष ने दूसरी शादी कर ली थी और फिर उसके साथ वह रहने लगा था। हाई कोर्ट ने कहा कि पुरुष ने अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी को एक तरह से ट्रीट रख रखाव नहीं किया, जबकि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष के लिए यह बाध्यता है कि वह पत्नियों को एक तरह से रखे। इस्लामिक कानून के तहत मुस्लिम पुरुष बहु विवाह कर सकता है लेकिन पत्नियों को एक तरह से रखना होगा। हाई कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी का जो बयान था उसमें कहा गया कि उसके पति ने उसके साथ प्रताड़ना की थी और यह भी कहा कि जब वह प्रेगनेंट थी उस दौरान पति और उसके परिजनों ने उसके साथ गलत व्यवहार किया और उसके साथ क्रुएल्टी की और ऐसा खाना खिलाया गया जिससे उसे एलर्जी थी।
उसकी प्रेगनेंसी के दौरान सही तरह से साड़ी न पहने जाने के कारण सास ने ताने मारे। जब एक बार उसका गर्भपात हुआ तो उसकी ननद ने इसे कहा कि वह बच्चा जन्म देने के काबिल नहीं है। तमाम प्रताड़ना से तंग आकर उसने पति का घर छोड़ दिया था। उसके पति ने उसके बाद दूसरी शादी कर ली और दूसरी पत्नी के साथ रह रहा है। वहीं पति ने तमाम आरोपों को निराधार बताया। तमाम परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी ने यह तथ्य साफ किया है कि पति ने उसके साथ समान व्यवहार नहीं किया जैसा कि दूसरी पत्नी के साथ कर रहा है।
पति ने पहली पत्नी का सही तरह से देखभाल नहीं किया। पहली पत्नी ने क्रुएल्टी ग्राउंड पर तलाक की मांग की और कहा कि उसके साथ दूसरी पत्नी की तरह उसके पति ने व्यवहार नहीं किया और एक तरह से देखभाल नहीं की। फैमिली कोर्ट ने पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की। इसके बाद मामला हाई कोर्ट में आया था। हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि पति अपने वैवाहिक दायित्व के निर्वहन में विफल रहा है। पति की ड्यूटी है कि वह अपनी पत्नी का सही तरह से देखभाल करे। अगर पत्नी किसी कारण से नाराज होकर अलग भी होती है तो वह प्रयास करे कि वह उसे वापस लाए। इस मामले में ऐसा कोई प्रयास नहीं हुआ और असलियत यह है कि पति ने पहली पत्नी की सही तरह से देखभाल नहीं की और दूसरी शादी कर ली। ऐसे में पहली पत्नी के साथ पति ने क्रुएल्टी की है और इसी कारण पहली पत्नी अपने मायके चली गई। बता दें कि हाई कोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल रखा है जिसमें क्रूरता के ग्राउंड पर पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की गई थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति और उसके परिवार वालों ने शुरुआत में पहली पत्नी को प्रताड़ित किया। गर्भावस्था में भी उसके साथ सही व्यवहार नहीं हुआ। इससे तंग आकर पहली पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया। बाद में मुस्लिम पुरुष ने फिर शादी कर ली और दूसरी पत्नी के साथ वह रहने लगा था। हाई कोर्ट ने कहा कि पुरुष ने अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी को एक तरह से ट्रीट नहीं किया, जबकि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष के लिए यह बाध्यता है कि वह पत्नियों को एक तरह से रखे।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि क्रूरता के मामलों में अदालत को वैवाहिक संबंध बहाल करने का आदेश पारित करने से पहले अन्य परिस्थितियों पर भी गौर करना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने एक व्यक्ति की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें अलग रह रही पत्नी के कहने पर पारिवारिक अदालत द्वारा अपनी शादी को तोड़ने को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद की खंडपीठ ने हेमसिंह उर्फ टिंचू द्वारा दायर पहली अपील को खारिज करते हुए कहा कि एक बार क्रूरता साबित होने पर तलाक मांगा जा सकता है। हालांकि, उसके बाद पार्टियां अपना आचरण कैसा रखेंगी, यह एक प्रासंगिक तथ्य हो सकता है।