Thursday, April 3, 2025
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आखिर दशहरा और अपने मन की बुराई के लिए क्या कहते हैं बॉलीवुड स्टार्स?

आज हम आपको बताएंगे कि दशहरा और अपने मन की बुराई के लिए बॉलीवुड स्टार्स क्या विचार रखते हैं! कई बार ऐसा होता है कि मैं आस -पास की चीजों को लेकर नकारात्मक हो जाती हूं, शक करने लगती हूं। मुझे उस तमाम प्रक्रिया पर शक होने लगता है और ऐसे में मैं उस सोच से दूर होती जाती हूं कि जो होता है कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है, तो मैं अपने भीतर के नकारात्मकता के रावण का नाश करना चाहती हूं। मैं विश्वास करने पर ज्यादा ठहरना चाहती हूं। जहां तक समाज की बात है, तो एक अरसे से मैं देख रही हूं कि लोगों का अच्छाई से विश्वास उठ -सा गया है। हम भी आम तौर पर यही बोलते हैं कि जो कामयाब है, वो जरूर शातिर होगा।हम इस सोच से दूर हो गए हैं कि सचाई और ईमानदारी के बलबूते पर कुछ हासिल किया जा सकता है। हम जानते हैं कि मेहनत करने से फल मिलेगा, हम करते भी हैं, मगर उसी के साथ हम आक्रामक भी होते हैं और कई बार खुद को बहुत ज्यादा पुश कर देते हैं। मगर मैं ये मानती हूं कि शॉर्ट टर्म में भले मेहनत और सचाई का फल न मिले, मगर लॉन्ग रन तक धूर्तता नहीं चल सकती। आखिर में तो सच और अच्छे की ही जीत होनी है। इसलिए मैं चाहती हूं कि समाज में लोग अच्छाई और सच का दामन न छोड़ें। दशहरे के दौरान हमें अपने भीतर के उन रावण को जलाना चाहिए जो हमारे जीवन और करियर में बाधा उत्पन्न करता है। मैं बहुत भावुक हूं .हालांकि मैं खुद को मानसिक रूप से मजबूत मानती हूं, मगर मुझे लगता है कि मुझे मुझे थोड़ा और प्रैक्टिकल होने की जरूरत है क्योंकि आसक्ति अक्सर दर्द की ओर ले जाती है। यह वो रावण है, जिसे मैं अपने जीवन से निकालना चाहती हूं। मैं लोगों पर बहुत जल्दी भरोसा भी कर लेती हूं, जिसका मुझे अक्सर खामियाजा भुगतना पड़ता है। इसके अलावा क्रोध रूपी रावण से भी मैं जूझती रहती हूं, तो मैं अपने भीतर के गुस्से के रावण को जलता देखना चाहती हूं। समाज में तो अनगिनत रावण हैं, मगर महिलाओं की बात करें, तो मैं सोचती हूं कि हम समानता क्यों नहीं प्राप्त कर सकते? 21वीं सदी में भी हम अभी भी महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा कर रहे हैं। बेटों को ऐसे माहौल में बड़ा करना जरूरी है, जहां वे महिलाओं का सम्मान करना सीखें। समाज को महिलाओं का उत्थान और सशक्तिकरण करना चाहिए, उन्हें वह सम्मान और अधिकार देना चाहिए, जिसकी वे हकदार हैं। जब महिलाओं को सशक्त बनाया जाता है, तो यह दुनिया में संतुलन और सकारात्मकता लाता है। फिल्मों और धारावाहिकों में अक्सर बुराई पर अच्छाई की जीत होते दर्शाया जाता है, मगर इस चक्कर में ध्यान रखना होगा कि कोई आपकी अच्छाई का फायदा न उठाए। दशहरा के दौरान क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता जैसी बुराई को खत्म करना जरूरी है। जब आप अपने अंदर की नकारात्मकता को खत्म करते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से अपने जीवन में सकारात्मक स्थितियों को आकर्षित करते हैं।

कई बार अज्ञानता और तुरत-फुरत प्रतिक्रिया देना मुसीबत का कारण बन जाता है, क्योंकि ये दुर्गुण हालत को और देते हैं, तो मैं चाहता हूं कि मेरे भीतर समझ और ज्ञान की रौशनी रहे और मैं चीजों को सोच -समझ कर आगे बढ़ाऊं। इस दशहरे पर, मेरा लक्ष्य सकारात्मक रूप से काम करना और खुद को नकारात्मकता से मुक्त करना है। जहां तक समाज का सवाल है, तो मैं चाहता हूं कि समाज आत्म-सुधार पर ध्यान केंद्रित करे। बदलाव व्यक्तिगत स्तर पर होता है, और हालांकि मुझे यकीन नहीं है कि सामूहिक प्रयास कितने सफल होंगे, लेकिन यह सब जागरूकता पर वापस आता है। एक बार जब आप अपने आस-पास की दुनिया के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो आप उन मुद्दों को संबोधित कर सकते हैं। यदि आप अनभिज्ञ हैं, तो आपके मन में हमेशा यह रवैया रहेगा कि ‘मुझे क्या फर्क पड़ता है?’ लेकिन सच तो यह है कि इससे फर्क पड़ता है। मेरे लिए बुराई पर अच्छाई की जीत की अवधारणा, सिर्फ एक अवधारणा नहीं है, यह एक वास्तविकता है, एक अस्तित्वगत सत्य है जिसके साथ हमें जीना चाहिए। विशेष रूप से नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान, यह उन नौ रातों में बुराई पर विजय पाने के बारे में है। अंतिम दिन, दशहरा, इस जीत का जश्न मनाता है। यह तम, रज और सत्व के गुणों पर नियंत्रण पाने के बारे में भी है। इसलिए, यह केवल एक अवधारणा नहीं है, यह एक वास्तविकता है। इसलिए, हमारी संस्कृति में, दशहरा के बाद कई त्यौहार मनाए जाते हैं – दिवाली, छठ पूजा, और भी बहुत कुछ। जब तक आप अपने भीतर की बुराई पर विजय नहीं पा लेते, तब तक अच्छाई को सही मायने में नहीं देखा जा सकता।

लंबे समय से में अपने गुस्से और अधीरता जैसी खामियों से लड़ रही हूं। आज दशहरा के दिन मैं अपने भीतर के क्रोध और बेसब्री के रावण का दहन करना चाहती हूं। अपने जीवन में मैंने यदि अपनी इन कमियों पर विजय पा ली, तो मैं और ज्यादा समझदार और संतुलित व्यक्ति बन जाऊंगी और यह मेरे समुचित विकास में बहुत बड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन होगा। सामाजिक स्तर पर मैं इस साल करप्शन और असहिष्णुता के रावण को खत्म होते देखना चाहूंगी। ये मुद्दे हमारे सामाज को जहरीला बनाते हैं। यह जरूरी है कि हम सामूहिक रूप से इन विनाशकारी ताकतों को खत्म करने और सभी के बीच सहानुभूति, सम्मान और समझ को प्रोत्साहित करने वाले मूल्यों को बढ़ावा देने की दिशा में काम करें। मुझे लगता है कि आदिकाल से ही अच्छाई और बुराई की लड़ाई चली आ रही है। सामाज में फैली असमानता, शोषण, हक न मिलाना, गरीबों का गरीब होते जाना जैसे कई रावण हैं, काश इन सारे रावणों का विनाश हो।

मेरा मानना है कि बुराई पर अच्छाई की जीत यही दर्शाती है कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, जीत हमेशा सच की होगी। इसी सोच पर मेरा विश्वास मुझे सही काम करते रहने और सकारात्मक बने रहने को प्रेरित करता है। अपने भीतर के रावण की बात करूं, तो कई बार मैं बहुत ज्यादा ओवर थिंकिंग कर लेता हूं। कई बार उन चीजों को लेकर परेशान होता हूं, जो मेरे नियंत्रण में हैं ही नहीं। मुझे लगता है, मुझे पानी के प्रवाह की तरह बहते रहना सीखना होगा। मैं नफरत और असहिष्णुता के रावण को खत्म होते देखना चाहूंगा। समाज में बहुत ज्यादा नेगेटिविटी है और अगर नफरत हमें खोखला कर रही है। अगर हम धर्म, जाति, ऊंच-नीच की नफरत का नाश कर सकें, तो ये दुनिया बेहतर बन सकती है।

 

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