आज हम आपको बताएंगे कि आसाराम और राम रहीम की जमारत में आखिर क्या अंतर है! यौन उत्पीड़न मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट ने आसाराम को इलाज के लिए 7 दिन की पैरोल मंजूर की है। ऐसे में 11 साल में यह पहली बार होगा जब आसाराम जेल से बाहर आएगा। उसे इलाज के लिए महाराष्ट्र ले जाया जाएगा। इससे पहले डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम को 21 दिन की फरलो मंजूर हो गई। अपने आश्रम में दो महिलाओं के साथ रेप मामले में दोषी राम रहीम को 20 साल की सजा मिली हुई है। फरलो के बाद वह भी जेल से बाहर आ सकेगा। ऐसे में जानते हैं कि आखिर यह पैरोल और फरलो क्या होता है। दरअसल पैरोल और फर्लो वर्ष 1894 के कारागार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं।पैरोल कैदी के जेल से आने की एक व्यवस्था है। इसमें कैदी की सशर्त रिहाई होती है। यह आमतौर पर कैदी के व्यवहार पर निर्भर करती है। पैरोल कैदी का अधिकार नहीं है। यह कैदी को विशेष परिस्थितियों में दिया है। इसमें इलाज, परिवार या सगे संबधियों की शादी या मौत जैसी वजह शामिल है।तबीयत बिगड़ने पर उसे जोधपुर के एम्स में भर्ती कराया गया था। इसके बाद अब आसाराम ने फिर से पैरोल के लिए अर्जी दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया । कोर्ट ने आसाराम को इलाज के लिए 7 दिन की पैरोल दे दी गई। यदि सक्षम प्राधिकारी यह मानता है कि कैदी के बाहर आना समाज के हित में नहीं होगा तो उसे पैरोल नहीं दी जाती है। पैरोल भी दो तरह की होती है-कस्टडी पैरोल और दूसरा नियमित पैरोल। कस्टडी पैरोल में कैदी कस्टडी में ही बाहर आता है। यदि किसी से मिलना है तो भी वह पुलिस की मौजूदगी में ही मिलेगा। वहीं, रेगुलर पैरोल में वह स्वतंत्र रूप से घूम फिर सकता है।
फरलो भी सजा के दौरान छुट्टी की एक व्यवस्था है। यह आमतौर पर सजायाफ्ता कैदियों के लिए होती है। फरलो कैदी का अधिकार होता है। यह उसे समय-समय पर दिया जाता है। यह लंबी अवधि के कारावास के मामलों में दिया जाता है। कभी-कभी यह बिना किसी कारण के कैदी को अपने परिवार के साथ संपर्क बनाए रखने के साथ ही सजा के नाकारात्मक परिणाम कम करने के लिए भी दिया जाता है। हालांकि, अगर जेल अधिकारी को लगता है कि कैदी का बाहर आना शांति के लिए खतरा है तो उसे फरलो नहीं दी जाती है। फरलो जेल सुपरिटेंडेंट की राय के आधार पर ही दिया जाता है। फरलो साल में 14 दिन के लिए हो सकता है। हालांकि, इसे बढ़ाया भी जा सकता है।
बता दे कि आसाराम पहले भी जोधपुर के एक निजी आयुर्वेदिक अस्पताल में इलाज करवा चुका हैं। यहां उसे पुलिस सुरक्षा में रखा गया था। इस दौरान उसका इलाज पुणे के डॉक्टरों की देखरेख में करवाया गया था। बाद में तबीयत बिगड़ने पर उसे जोधपुर के एम्स में भर्ती कराया गया था। इसके बाद अब आसाराम ने फिर से पैरोल के लिए अर्जी दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया । कोर्ट ने आसाराम को इलाज के लिए 7 दिन की पैरोल दे दी गई।
आसाराम इससे पहले भी अपनी बीमारी का हवाला देकर पैरोल मांग चुके हैं, लेकिन उसकी मांग पूरी नहीं हो सकी थी। 20 जून को, आसाराम ने 20 दिन की पैरोल के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन पैरोल कमेटी ने इसे मंजूर नहीं किया था। बता दें कि 85 वर्षीय आसाराम 2013 से जोधपुर जेल में बंद हैं। बता दें कि पैरोल और फर्लो वर्ष 1894 के कारागार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं।पैरोल कैदी के जेल से आने की एक व्यवस्था है। इसमें कैदी की सशर्त रिहाई होती है। यह आमतौर पर कैदी के व्यवहार पर निर्भर करती है। पैरोल कैदी का अधिकार नहीं है। यह कैदी को विशेष परिस्थितियों में दिया है। फरलो भी सजा के दौरान छुट्टी की एक व्यवस्था है। यह आमतौर पर सजायाफ्ता कैदियों के लिए होती है। फरलो कैदी का अधिकार होता है। यह उसे समय-समय पर दिया जाता है।जोधपुर पुलिस ने आसाराम को 2013 में इंदौर से गिरफ्तार किया था। उस पर अपने आश्रम में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने का आरोप था। पांच साल तक चले मुकदमे के बाद, 25 अप्रैल 2018 को अदालत ने आसाराम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।