आखिर क्या था ऑपरेशन ब्लू स्टार?

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आज हम आपको ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में जानकारी देने वाले हैं! खालिस्तानी आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सिखों के पावन तीर्थस्थल स्वर्णमंदिर से मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था। यह ऑपरेशन 1 जून से लेकर 10 जून, 1984 तक अंजाम दिया गया। ऑपरेशन ब्लूस्टार की नौबत कैसे आई, इसके लिए इतिहास में काफी पहले यानी 1971 तक जाना होगा। बात तब की है, जब भारत-पाकिस्तान के बीच जंग हुई और भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया। इसी जंग से एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसी जंग में पाकिस्तान को यह अहसास हो गया कि वह भारत को कभी आमने-सामने के युद्ध में नहीं हरा सकता है। डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, 1976 में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल जिया उल हक ने एक मिलिट्री डॉक्ट्रिन बनाई। इसका नाम था-ब्लीड इंडिया विद् अ थाऊजैंड कट्स। इसके तहत ये फैसला लिया गया कि हम भारत को सीधे युद्ध में नहीं हरा सकते, इसलिए भारत को अलग-अलग जगह से वार करेंगे और उसे गहरा घाव देंगे। इससे भारत की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति बिगड़ेगी। जनरल जिया ही बाद में तख्तापलट करके पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने।

लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, जनरल जिया ने 1980 में अपनी मिलिट्री डॉक्ट्रिन का इस्तेमाल भारत के पंजाब में किया। दरअसल, उस समय एक राजनीतिक पार्टी चुनाव हार चुकी थी, उसने एक अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले को समर्थन देना शुरू किया। उसकी हर सही-गलत बात को तूल देना शुरू किया। उसी वक्त से पंजाब में आतंकवाद का बोलबाला शुरू हुआ। इससे पहले से ही पंजाब में खालिस्तानी उग्रवादियों की मांगों को पाकिस्तान ने शह देना शुरू किया और उसे पैसे देने लगे। अपनी किताब ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार: द ट्रू स्टोरी’ में ऑपरेशन ब्लू स्टार के सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ ने लिखा है कि उन्हें यह जानकारी मिली थी कि कुछ ही दिनों में खालिस्तान की घोषणा होना जा रही थी और उसे रोकने के लिए ऑपरेशन को जल्द से जल्द अंजाम देना जरूरी था। उन्होंने ही स्वर्ण मंदिर से खालिस्तानी उग्रवादियों को निकाल बाहर किया था।

पंजाब की समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित मांगों को लेकर शुरु हुई थी। 1973 और 1978 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उन्होंने स्वायत्तता की मांग की थी। इन्हीं मांगों को लेकर अकालियों और निरंकारियों के बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को हिंसक झड़प हुई। इसमें 13 अकाली मारे गए। रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले ने हिस्सा लिया। उस समय कांग्रेस पर ये आरोप लगे कि अकालियों के जनाधार को कमतर करने के लिए कांग्रेस ने भिंडरावाले को समर्थन देना शुरू किया। यहीं से पंजाब में हिंसक घटनाओं की शुरुआत हुई।

डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी बताते हैं कि सितंबर 1981 में पंजाब केसरी अखबार समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हो गई। जालंधर, तरणतारण, अमृतसर, फरीदकोट और गुरदासपुर में हुई हिंसक घटनाओं में कई लोगों की जान गई। इन सभी में भिंडरावाले का नाम जुड़ा। यह भी कहा गया कि वह ये सब पाकिस्तान के इशारे और उसके पैसों पर कर रहा है। लोगों को भिंडरावाले के साथ जुड़ता देख अकाली दल ने भी भिंडरावाले का समर्थन करना शुरू कर दिया। 1982 में भिंडरावाले ने चौक महता गुरुद्वारा छोड़कर पहले स्वर्ण मंदिर परिसर में गुरु नानक निवास में जगह बनाई और इसके कुछ महीने बाद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त में जगह बना ली।

पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह पर 1982 में हमला हुआ। अप्रैल, 1983 में डीआईजी एएस अटवाल की हत्या दिनदहाड़े हरमंदिर साहिब परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद पंजाब रोडवेज की एक बस में घुसे बंदूकधारियों ने जालंधर के पास पहली बार कई हिंदुओं को मार डाला तो केंद्र की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया। पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। पानी सिर से गुजर चुका था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार का फैसला लिया।

किताब के अनुसार, स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस जरनैल सिंह भिंडरावाले, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के लड़ाकों ने चारों तरफ खासी मोर्चाबंदी कर रखी थी। पंजाब से गुजरने वाली ट्रेनों और बसों पर रोक लगा दी गई। उस समय सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ को उग्रवादियों को स्वर्ण मंदिर परिसर से बाहर निकालने की जिम्मेदारी दी गई। इसका जिक्र ऑपरेशन ब्लू स्टार के सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ की किताब में भी किया गया है। उन्हें बुलबुल बराड़ भी कहा जाता था।

1 जून से ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया गया। सेना के जवान स्वर्ण मंदिर की पवित्रता का सम्मान करते हुए अपने चमड़े के जूते, बेल्ट उतारकर परिसर में घुसे। सेना की इस कार्रवाई पर उग्रवादियों ने अंदर से हमले करने शुरू कर दिए। उससे पहले सेना ने 4 घंटे तक लाउडस्पीकर से उग्रवादियों से सरेंडर की अपील की। मगर, उग्रवादियों ने बदले में जबरदस्त गोलीबारी करनी शुरू कर दी। तब पांच जून को बख्तरबंद गाड़ियों और टैंकों का इस्तेमाल करना पड़ा। आखिरकार 6 जून को भिंडरावाले मारा गया। इस ऑपरेशन का सबसे खौफनाक नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर, 1984 को हत्या हो गई। इसके बाद देश में दंगे भड़क उठे थे।