मॉल के बाहर बने संकरे फुटपाथ की दोनों ओर की सड़कों पर खड़े दोपहिया वाहनों के चलते अधेड़ उम्र का व्यक्ति वहां से निकलने में जद्दोजहद कर रहा है। चंद मीटर दूर, एक महिला के पीछे से तेजी से गुजरते वाहनों के कारण उसे मजबूरन मुख्य सड़क पर धकेल दिया जाता है, क्योंकि फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा है। क्या ऐसा आपके शहर में भी होता है? जब तक आप इसका जवाब तैयार करें, मैं आपको सोमवार को लिखे मेरे आर्टिकल पर ले चलता हूं, जहां मैंने लिखा था, “भारत में होम डिलीवरी बिजनेस में अल्ट्रा क्विक डिलीवरी सिस्टम छाने वाला है।’ उस दिन सैकड़ों प्रतिक्रियाएं आईं, जहां दैनिक भास्कर के पाठकों ने दिल की बात लिखी और रोष व्यक्त किया कि कैसे इस सुविधा से समाज बड़ी त्रासदी की ओर बढ़ रहा है। एक पाठक सतीश आर. बंसल ने पत्र लिखकर गुस्सा जाहर किया, “अल्ट्रा क्विक डिलीवरी सिर्फ सहूिलयत नहीं बल्कि अभिशाप है’। उन्होंने लंबी-चौड़ी सूची बता दी कि कैसे पड़ोस में चलकर अपनी चीजें खुद लेने का आनंद, शहर में उड़ते दोपहिया वाहन किरकिरा करने वाले हैं। पहले तो मुझे लगा कि वह जरूरत से ज्यादा भावनात्मक हो रहे हैं, लेकिन दिन समाप्त होते-होते साबित हो गया कि वह 100% सही थे। इस सोमवार को बेंगलुरु से मेरे एक कजिन ने देर रात फोन करके बताया कि अकेले एक दिन 9 नवंबर को बेंगलुरु ट्राफिक पुलिस ने 2670 डिलीवरी एजेंट्स का चालान करके 13.8 लाख रु. जुर्माना पसूला, वो भी आठ घंटे की शिफ्ट में। मैं यहां दोहराऊंगा कि जुर्माने का ये आंकड़ा सिर्फ डिलीवरी एजेंट्स का है, इसमें बाकी दोपहिया मालिक शामिल नहीं हैं। उसने बताया कि आधे से ज्यादा जुर्माने वन-वे में एंट्री, फुटपाथ पर गाड़ी चलाने, नो-एंट्री में घुसने, रेड सिग्नल जंप करने, फुटपाथ पर गाड़ी खड़ी करने से जुड़े थे। ये सारे यातायात अपराध पैदल चलने वालों के लिए जोखिम खड़ा करते हैं। बाकी आधा जुर्माना हेलमेट नहीं पहनने, या ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन चलाने का था, जो कि राइडर की अपनी सुरक्षा का मसला था। दिलचस्प बात यह है कि इसी पुलिस ने साल 2024 के पहले 10 महीनों में बेंगलुरु की नौ ई-कॉमर्स कंपनियों के केवल 10 हजार डिलीवरी एजेंट्स से ट्रैफिक उल्लंघन के लिए जुर्माना वसूला था। संख्या में यह असमानता अब उन्हें आने वाले दो महीनों में कम से कम 20 हजार गिग वर्कर्स को प्रशिक्षित करने के लिए मजबूर कर रही है। वहीं पुलिस ने अपने सर्वे में पाया कि नौकरी की तलाश में गांवों से शहरों की ओर आने वाले गिग वर्कर्स की संख्या में भारी उछाल आया है और उन्हें ट्रैफिक नियमों की ज्यादा जानकारी नहीं है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या हमें सर्वे करने की आवश्यकता है जब हर कोई डिलीवरी एजेंट्स में कोई ट्रैफिक सेंस नहीं देख सकता है। ट्रैफिक नियमों के बारे में सख्त हुए बिना आप डिलीवरी राइडर्स में एक जिम्मेदार ड्राइविंग संस्कृति का निर्माण कैसे कर सकते हैं? अब मैं आप सभी से पूछना चाहता हूं कि आखिरी बार कब आपने अपनी कॉलोनी के आसपास टहलने का समय निकाला, खासकर यदि आप एक आकार लेते शहर में रह रहे हैं? भले ही आपने वॉक की हो, लेकिन क्या यह तनावपूर्ण रही? जहां ऐसे विचार आए हुए होंगे कि ‘हमें पता नहीं, बाइकर्स कहां से आकर टकरा जाएं।’ जैसा कि उन अखबार के पाठक सतीश जी ने महसूस किया कि आसपड़ोस में वॉक करने जाना पहले छोटी-छोटी खुशियां हुआ करती थीं, जिसे हम कोई तवज्जो नहीं देते थे और आज इसका अस्तित्व कम से कम मेट्रो शहरों में समाप्त हो गया है। यदि कोई बुजुर्ग व्यक्ति, रोजमर्रा का कुछ सामान खरीदने के लिए पड़ोस की दुकान पर जाता है, तो घर के युवा तब तक चिंता करते हैं जब तक कि वह व्यक्ति सुरक्षित नहीं लौट आते। फंडा यह है कि हमारे ट्रैफिक रेगुलेटर यह क्यों भूल जाते हैं कि हर वाहन मालिक कहीं न कहीं पैदल यात्री होता है। धीमे चलने वाले इस समाज को अगर हम जगह नहीं देंगे, तो तेजी से आगे बढ़ते इस समाज को कभी न कभी तकलीफ होगी। तेजी से बढ़ने वाले समाज को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी दिन उनकी गति भी मंद पड़ जाएगी।
एन. रघुरामन का कॉलम:टेक्नोलॉजी हमें जोड़ती है या अकेलेपन की जमीन तैयार करती है?
यूनिवर्सिटी कैंटीन की हालिया विजिट में मैंने देखा कि डायनिंग हॉल में एकदम खामोशी थी। बीच में कभी-कभी यहां ज्यादा खामोशी होती है क्योंकि छात्र अपने फोन में व्यस्त होकर कुछ टाइप करते रहते हैं। अचानक मुझे अहसास हुआ कि अब एक-दूसरे से बात करना उनकी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा। मैं चुपचाप बैठ गया और उन्हें देखता रहा। उनका बायां हाथ बहुत आराम से अपनी मनचाही बात टाइप करने में व्यस्त था और उनमें से ज्यादातर ने मुझे वहां बैठे नहीं देखा, जबकि वे जानते थे कि मैं कौन हूं। दिलचस्प है कि उन्होंने इसका दिखावा करने के लिए जरूर अपना सिर ऊंचा किया कि उन्हें कितनी इमोजी मिली, जिसमें लव वाले सिंबल बने हुए थे। तब मुझे अहसास हुआ कि एक से लेकर तीन प्रेम चिह्नों तक वाली इमोजी हैं। जिस व्यक्ति को कम लव साइन वाली कम इमोजी मिलती हैं, वो तुरंत फायर वाली इमोजी (ईर्ष्या) भेज देता है। इन इमोजी से एक-दूसरे को जज करने वाली तुलना, ईर्ष्या की भावना और फोमो यानी किसी चीज को खोने का डर आ जाता है। ये बच्चे समझने में भूल कर रहे हैं कि ये एप ही इस तरह से डिजाइन किए हैं कि नौजवान प्रेरित हों, ताकि वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करें और अपनी जिंदगी के सबसे ग्लैमर भरे पलों के बारे में डालने पर एक-दूसरे से मान्यता मिले, इसमें लाइक और दोबारा शेयर भी शामिल है। मैंने देखा कि उनमें से एक छात्र अपनी ही पोस्ट डिलीट कर रहा था क्योंकि उसे उतने लाइक नहीं मिले और इससे उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची। डिलीट करने के बाद वो छात्र वहां से उठा और तब उसने देखा कि मैं उसे देख रहा था। तुरंत उसने कोहनी मारकर साथी छात्र को इशारा किया और एक के बाद एक बेमन से फोन से ध्यान हटाया। लेकिन उन्होंने ऐसे घूरा, इससे मुझे लगा कि मैंने उनके निजी समय में घुसपैठ कर दी हो। बातचीत शुरू करने के लिए मैंने उनमें से कुछ छात्रों से पूछा, क्या पिछले एक घंटे में तुम लोगों ने किसी से भी बात की? तब ज्यादातर को अहसास हुआ कि साढ़े तीन घंटे की क्लास के बाद उन्होंने बात ही नहीं की। जब वे क्लासरूम में लौटे, उनमें से अधिकांश लड़के फिर से फोन स्क्रीन में मगन हो गए। तब मुझे अहसास हुआ कि टैक्स्ट मैसेज भेजना, डिजिटल कम्युनिकेशन का सबसे लोकप्रिय तरीका है और यह असल संवाद में सबसे बड़ी बाधा है। उनमें से किसी ने भी घर पर एक फोन तक नहीं किया और मुझे भरोसा है कि घर से आए कॉल को भी उन्होंने नजरअंदाज कर दिया होगा। दर्जनों अध्ययनों ने साबित किया है कि टेक्स्ट मैसेजिंग पर हद से ज्यादा निर्भरता, जिसमें कॉल गौण हो जाते हैं, इसमें अगर लोग एक-दूसरे से वास्तविक रूप में नहीं जुड़ते, तो अकेलापन हो सकता है। शोध में कहा गया कि अगर कोई मित्र मैसेज का जवाब देने में देर लगाता है, तो इससे चिंता व अकेलापन बढ़ता है। देर से जवाब देने वालों को लोग मैसेज करना बंद कर देते हैं। अध्ययन में ये भी कहा गया कि जब लोग सोशल साइट्स पर जीवन की सारी बातें साझा करने लगते हैं, तो वे वास्तविक तरीके से खुद का प्रतिनिधित्व नहीं करते। एक समय बाद ये गैर-वास्तविकता ही उनकी असलियत बन जाती है। मैं वास्तव में नहीं जानता कि वे किसी के साथ प्रामाणिक बातचीत के कुछ क्षणों को क्यों याद करना चाहते हैं, जबकि वे आपकी आवाज सुन सकते हैं और चेहरा देख सकते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि यह पीढ़ी स्ट्रीमिंग ऐप्स में बिंज वॉचिंग कर पाती है क्योंकि वे अपनी स्क्रीन पर अनंत काल तक देखने के आदी हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इन सर्वेक्षणों में सोशल मीडिया के उपयोग, संदेश और बिंज वॉचिंग में सहसंबंध पाया गया। इसमें भी कोई ताज्जुब नहीं कि ये युवा हमसे पूछे बिना अगले एपिसोड को स्वचालित रूप से चलाने वाले मनोरंजन ऐप्स को बंद नहीं करते हैं। यही कारण है कि मैंने ऐप सेटिंग्स में प्रोफाइल मैनेज करने वाले विकल्प पर क्लिक करके ‘ऑटोप्ले नेक्स्ट एपिसोड’ को बंद किया है। और हम घर पर देखते हुए आगे कुछ भी देखने से पहले एक-दूसरे की सहमति पूछते हैं। यह एपिसोड देखते समय एक दूसरे के साथ बातचीत करने का अवसर देता है। फंडा यह है कि टेक्नोलॉजी से जुड़ते हुए मानवीय संबंधों से समझौता न करें।
मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:विपक्ष को राजनीति के कुछ जरूरी सबक सीखने चाहिए
एक जीवंत लोकतंत्र को मजबूत विपक्ष की जरूरत होती है। लेकिन उसे ऐसे विपक्ष की जरूरत नहीं है, जो सरकार के हर फैसले का विरोध करे। ये सच है कि आलोचना लोकतंत्र की जीवन-रेखा है और सरकारों को जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन अगर विपक्षी नेता बिना सोचे-समझे फैसलों की निंदा करते हैं, तो उनकी खुद की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। यहां कुछ सबक दिए जा रहे हैं, जो विपक्षी नेताओं को भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सीखने चाहिए। पहला सबक : मुद्दों की पहचान करें और समाधान सुझाएं। वक्फ (संशोधन) विधेयक का उदाहरण लें, जिसकी वर्तमान में जेपीसी द्वारा समीक्षा की जा रही है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार द्वारा वक्फ बोर्ड द्वारा किसानों के जमीन अधिग्रहण पर जारी किए नोटिस को तुरंत वापस लेने का फैसला दिखाता है कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से कितना संवेदनशील है। वक्फ अपने में कानून है। उसके फैसले के खिलाफ अदालत में अपील नहीं की जा सकती। लेकिन अगर जेपीसी में विपक्षी दल वक्फ का समर्थन करते हैं, तो वे न केवल किसानों बल्कि अन्य छोटे भूस्वामियों के साथ अपनी चुनावी संभावनाओं को भी नुकसान पहुंचाएंगे। दूसरा सबक : जब सरकार एलएसी पर चीन के साथ कोई महत्वपूर्ण समझौता करती है तो सेंटीमीटर और मिलीमीटर की बढ़त या नुकसान के बारे में बहस न करें। यह सफलता महीनों और वर्षों की कठिन कूटनीतिक बातचीत और चुनौतीपूर्ण माहौल में एलएसी पर सख्त सैन्य रुख बनाए रखने के बाद मिली है। जहां प्रशंसा की जानी चाहिए, वहां प्रशंसा करें। तीसरा सबक : विदेश यात्रा के दौरान कभी भी विदेशी दर्शकों के सामने भारत का अपमान न करें। लोकतंत्र में कोई गंभीर विपक्षी नेता ऐसा नहीं करता। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस नियम को बार-बार तोड़ा है। इसने उन्हें ही कमजोर किया है, देश को नहीं। चौथा सबक : विशिष्ट मुद्दों से निपटने के लिए श्वेत पत्र जारी करें, जिसमें प्रमुख क्षेत्रों पर विशेषज्ञों की राय शामिल हो। कांग्रेस को विपक्षी नेताओं के साथ मिलकर अनौपचारिक शैडो-कैबिनेट बनानी चाहिए, जिसमें विपक्षी नेताओं को उनकी विशेषज्ञता के दायरे में आने वाले क्षेत्रों पर नीतियां बनाने का काम सौंपा जाए। उदाहरण के लिए, व्यक्तिगत कर सुधारों पर पी. चिदम्बरम और कनाडा के साथ विवाद पर शशि थरूर। इससे सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के बजाय रचनात्मक संबंध बनेगा। पांचवां सबक : चिकित्सा, कानून और उद्योग जैसे व्यवसायों के विपरीत, राजनेताओं का दायित्व है कि वे किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं के लिए उपलब्ध उम्मीदवारों की पसंद को व्यापक बनाएं। वायनाड में चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गांधी ने वंशवाद की राजनीति का बचाव किया। उन्होंने कहा कि मतदाता राजनीतिक वंशों के लिए वोट करते हैं। जबकि लोकतंत्र में नेताओं का कर्तव्य प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को बढ़ावा देना होता है। मतदाताओं के लिए उपलब्ध विकल्प को एक ही परिवार के सदस्य तक सीमित करके मतदाताओं को सबसे सक्षम उम्मीदवारों को चुनने से वंचित किया जा रहा है। राजनीतिक वंशवाद की तुलना व्यवसाय से लेकर फिल्मों तक में वंशवाद से करना मतदाताओं को गुमराह करना है। छठा सबक : रोजगार प्रदान करने वाले और धन का सृजन करने वाले उद्योगपतियों का अपमान करना अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है। वे अर्थव्यवस्था का विस्तार करते हैं और कंस्ट्रक्शन, कारखानों और लॉजिस्टिक्स में श्रमिकों को काम प्रदान करते हैं। अदाणी पर प्रहार करके राहुल गांधी एक ऐसे उद्योगपति का अपमान करते हैं, जिन्होंने साधारण स्तर से शुरुआत करके 40 से अधिक वर्षों में यह मुकाम पाया है। सातवां सबक : विपक्षी नेताओं को राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए, भले इसके लिए सरकार से सहमत होना पड़े। कनाडा से विवाद पर विपक्षी नेताओं को जस्टिन ट्रूडो से सवाल करना चाहिए था। उन्हें पन्नू की भी सार्वजनिक निंदा करनी चाहिए थी। इसके बजाय विपक्ष ने एक उदासीन चुप्पी बनाए रखी। आठवां सबक : कांग्रेस को हरियाणा में पार्टी की अप्रत्याशित हार के कारणों की जांच करनी चाहिए। जाहिर है कि उसने 2024 के लोकसभा चुनाव में जीती गई 99 सीटों के नतीजों को गलत पढ़ा। इनमें से 56 सीटें इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के कारण उसे मिली थीं। जहां कांग्रेस-भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था, वहां कांग्रेस को केवल 43 सीटें मिलीं, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली सीटों से एक कम है। ये सच है कि आलोचना लोकतंत्र की जीवन-रेखा है और सरकारों को जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन अगर विपक्षी नेता बिना सोचे-समझे फैसलों की निंदा करते हैं, तो उनकी खुद की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
मनोज जोशी का कॉलम:इमिग्रेशन पर ट्रम्प की नीतियों का असर भारत पर भी पड़ेगा
डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका के लगभग सभी हिस्सों में हिस्पैनिक मतदाताओं, युवाओं और बिना कॉलेज की डिग्री वाले लोगों का समर्थन जुटाकर अमेरिकी इलेक्टोरेट को नया रूप दे दिया है। रिपब्लिकंस ने लोकलुभावन चुनाव-अभियान चलाया था, जिसमें वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा से श्रमिकों को बचाने का वादा किया गया और करों में कटौती की पेशकश की। इसने कामकाजी वर्ग के मतदाताओं और गैर-श्वेत अमेरिकियों के बीच ट्रम्प की ताकत को बढ़ाया और लगभग हर जगह उनके वोट-शेयर में इजाफा हुआ। ट्रम्प की जीत में जिन तमाम फैक्टर्स ने योगदान दिया है, उनमें से शायद सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था की स्थिति रही है। सीएनएन एग्जिट पोल से पता चला है कि ट्रम्प के मतदाताओं में से 51% ने कहा था कि अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, जबकि 20% ने कहा था कि इमिग्रेशन का मसला सबसे जरूरी है। यहां पर आप धारणाओं का अंतर देख सकते हैं। हकीकत यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था हाल के वर्षों में अच्छा प्रदर्शन कर रही है, हालांकि मुद्रास्फीति के कारण बनने वाली धारणाओं के चलते एडिसन रिसर्च एग्जिट पोल में लगभग दो-तिहाई मतदाताओं ने कहा कि अर्थव्यवस्था खराब हालत में है। उनमें से 46% ने कहा कि उनकी वित्तीय स्थिति चार साल पहले (जब बाइडेन और हैरिस ने पिछला चुनाव जीता था) से भी बदतर है, जबकि 2020 में 20% ने ही ऐसा कहा था। धारणाएं किस तरह काम करती हैं, यह इससे स्पष्ट है कि अधिकांश डेमोक्रेट्स को लगा अर्थव्यवस्था बहुत अच्छी स्थिति में है, जबकि रिपब्लिकंस को लगा कि यह इतनी अच्छी नहीं है। जब एग्जिट पोल में पूछा गया कि चार साल पहले की तुलना में आपकी पारिवारिक स्थिति कैसी है तो 82% डेमोक्रेट्स ने कहा अच्छी है, जबकि 81% रिपब्लिकंस ने जवाब दिया खराब है। ट्रम्प ने कहा कि अवैध इमिग्रेंट्स देश में घुसपैठ कर रहे हैं। उन्होंने उन्हें सभी प्रकार के अपराधों के लिए दोषी ठहराया। यह पूछे जाने पर कि कानूनी दस्तावेजों के बिना इमिग्रेंट्स के साथ क्या किया जाना चाहिए, 75% डेमोक्रेट्स ने कहा कि उन्हें कानूनी स्थिति के लिए आवेदन करने का मौका दिया जाना चाहिए, जबकि 87% रिपब्लिकंस ने कहा कि उन्हें देश से बाहर भेज देना चाहिए। अब सत्ता में आने के बाद ट्रम्प अवैध प्रवासियों के डिपोर्टेशन को प्राथमिकता देंगे। बाइडेन के कार्यकाल के पहले तीन वर्षों में अमेरिका की दक्षिणी सीमा पर अवैध रूप से क्रॉसिंग औसतन 20 लाख थी, हालांकि तब से इसमें कमी आई है। अमेरिकी चुनावों में इमिग्रेशन का मसला कितना महत्वपूर्ण था, यह इस बात से स्पष्ट है कि ट्रम्प ने हिस्पैनिक मतदाताओं के बीच अपना समर्थन बढ़ाया। परम्परागत रूप से, मध्य और दक्षिणी अमेरिका से हिस्पैनिक इमिग्रेंट्स अमेरिका में प्रवासियों की सबसे बड़ी संख्या है। एडिसन रिसर्च द्वारा किए एक एग्जिट पोल के अनुसार, हिस्पैनिक मतदाताओं में ट्रम्प के हिस्से में 14% अंकों का तेज बदलाव हुआ। खुद को हिस्पैनिक बताने वाले करीब 46% मतदाताओं ने ट्रम्प को चुना, जबकि 2020 में ट्रम्प को उनके 32% ही वोट मिले थे। हिस्पैनिक अमेरिकियों को लगा कि कानूनी इमिग्रेशन का रास्ता खुला रहना चाहिए, लेकिन अवैध इमिग्रेशन से केवल अव्यवस्था ही फैलती है, जिसका उन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। नया ट्रम्प प्रशासन निश्चित रूप से अवैध इमिग्रेशन पर नकेल कसेगा और अमेरिका की वीजा नीतियों को भी सख्त करेगा। इनका असर भारत पर भी पड़ेगा। 2021 में, प्यू रिसर्च ने बताया था कि अमेरिका में करीब 725,000 भारतीय बिना दस्तावेजों के रह रहे हैं, जिसने उन्हें वहां तीसरा सबसे बड़ा ऐसा समूह बना दिया। इस साल अवैध रूप से अमेरिकी सीमा पार करने की कोशिश में हर घंटे 10 भारतीय गिरफ्तार किए गए। इसके अलावा ट्रम्प कुशल पेशेवरों को प्रभावित करने वाली नीतियां भी लागू करेंगे, विशेष रूप से एच-1बी, एफ-1 और एच4 (जीवनसाथी के लिए) वीजा रखने वाले। अमेरिकी प्रवेश को कम करने के अलावा वीजा प्राप्तकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। भारतीय छात्रों को भी एफ-1 (शिक्षा) वीजा पर प्रतिबंधों के साथ सख्त वीजा नियंत्रण का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि ट्रम्प ने अपने पिछले कार्यकाल में कहा था कि वे कानूनी इमिग्रेशन के मार्ग के रूप में कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के समान अंक-आधारित प्रणाली के लिए खुले रहेंगे। यदि नया ट्रम्प प्रशासन इस रास्ते पर चलता है तो इससे कुशल भारतीय प्रवासियों के लिए रास्ता खुल सकता है। ट्रम्प की नई इमिग्रेशन नीति को लागू होने में दो साल तक लग सकते हैं। लेकिन इस अवधि में इससे हजारों भारतीयों के जीवन पर असर पड़ेगा- वे जो अमेरिका में रह रहे हैं और वे भी जो वहां जाने की योजना बना रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:मन पर काम करें तो दिमाग अपने आप काबू में रहेगा
अधिकांश लोगों का दिमाग ज्यादातर मौकों पर चलता ही रहता है। इस ओवर थिंकिंग के कारण तनाव, अवसाद और हिंसात्मक प्रवृत्ति आने लगती है। हमें इस बात पर लगातार ध्यान देना चाहिए कि हमारा दिमाग कब-कब चलता है। पूजा में, भोजन करते समय, किसी घटना में, किसी व्यक्ति को देखकर दिमाग चल पड़ता है। दिमाग पर काम करें तो ध्यान रखना कि दिमाग एक परदा है और मन एक ऐसा प्रोजेक्टर है, जो उस परदे पर फिल्म दिखाता है। काम मन पर करिए, दिमाग रूपी परदा अपने आप कंट्रोल में आ जाएगा। और क्योंकि मन या तो भविष्य में घिरा हुआ है या अतीत की बात सोचता है, इसलिए इसे वर्तमान में टिकाना चाहिए। और उसके लिए, हमें एक शून्य पैदा करना है। अभी हम मोबाइल के प्रकाश में डूबे हुए हैं, थोड़ी देर के लिए ध्यान करिए। जो एक शून्य है, अंधकार है। ध्यान से शांति देने वाला एंडोर्फिन हॉर्मोन सरलता से तैयार हो जाता है। इस दिमाग के पीछे के प्रोजेक्टर पर काम करें, तो दिमाग सही ढंग से सही जगह चलेगा।
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:धर्म को जानने से कहीं ज्यादा उसे जीना जरूरी है
सर्वाधिक पर्वों वाला मास कार्तिक पूरा हो गया। आज से मार्गशीर्ष मास शुरू हो रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण ने महीनों में स्वयं को मार्गशीर्ष बताया है। इसी महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रीकृष्ण ने गीता उपदेश दिया था। इस महीने की एक और खासियत है। गुरु नानक देव की जयंती। हम जिस दौर में जी रहे हैं, यह बहुत तेजी से बदलने का वक्त है। बदलाव जीवन में जरूरी है। गुरु नानक देव में बहुत विशेषताएं थीं। उसमें से एक विशेषता थी कि उन्होंने धर्म को एकदम नई दृष्टि से देखा और लोगों के जीवन में उतारा। आज प्रबंधन की दुनिया में कहते हैं कि वो ही लोग सफल होंगे, जो हुनरमंद होंगे। यानी आपकी भूमिका से ज्यादा आपके हुनर यानी स्किल काम करेंगे। यही प्रयोग किया था नानक जी ने। उन्होंने कहा था कि आप कितने धर्मिक हैं, यह बात महत्वपूर्ण नहीं है। आप धर्म को कितना जानते हैं, यह उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है और उससे भी अधिक जरूरी है कि आप धर्म को कितना जीते हैं। क्योंकि धर्म जीवनशैली होना चाहिए।
डॉ. नरेश त्रेहान का कॉलम:हृदय रोगों की रोकथाम के लिए नजरिया बदलना होगा
वायु प्रदूषण एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट तो है ही, यह एक घातक महामारी भी पैदा कर रहा है- हृदय रोग की। वायु प्रदूषण से दिल को धीरे-धीरे नुकसान होता रहता है और फिर यह गंभीर समस्या बन सकती है। हमने हृदय रोग के मामलों में भोजन और व्यायाम से जुड़े जोखिमों से निपटने की दिशा में काफी प्रगति की है, लेकिन यह जंग तब तक नहीं जीत सकते जब तक वायु प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं होगा। यह जरूरी है क्योंकि जो लोग स्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं, उन्हें भी वायु प्रदूषण का खतरा बना रहता है। हृदय रोग पहले से ही भारत में मौत का प्रमुख कारण है और वायु प्रदूषण इस समस्या को बढ़ा रहा है। यानी हृदय रोग की रोकथाम के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। हालांकि वायु प्रदूषण पूरे शरीर को प्रभावित करता है, लेकिन हृदय पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। इससे होने वाले नुकसान नसों को सख्त और संकरा बना देते हैं। इससे खून का थक्का जमने, बीपी बढ़ने, दिल का इलेक्ट्रिक सिस्टम बाधित होने, नसों की उम्र समय से पहले बढ़ने और संचार प्रणाली में सूजन जैसे खतरे बढ़ते हैं। समय के साथ, इससे प्लाक बनने लगता है और दिल के दौरे जैसा तनाव होता है। हमारा शरीर अनियमित धड़कन, थकान, सीने में परेशानी और सांस लेने में कठिनाई के जरिए इसका संकेत देता है। जिन दिनों प्रदूषण ज्यादा होता है, ये प्रभाव इतने गंभीर हो सकते हैं कि दिल का दौरा पड़ सकता है। अनुमान है कि साल में पीएम2.5 के प्रति 10 mcg/m3 के संपर्क से दिल का दौरा पड़ने का खतरा 15-30% और मृत्यु दर 20% बढ़ जाती है। वायु प्रदूषण सालाना 90 लाख से ज्यादा लोगों की जान लेता है, जिनमें से लगभग 70% मौतें परिवेशीय वायु गुणवत्ता के कारण होने वाली हृदय संबंधी बीमारियों से होती हैं। भारत में वायु प्रदूषण स्तर, हमारे खुद के वार्षिक एंबियंट स्टैंडर्ड, पीएम2.5 के 40 mcg/m3 से ज्यादा है। अध्ययनों से पता चलता है कि हमारी लगभग एक तिहाई आबादी, इस स्टैंडर्ड से कम गुणवत्ता की हवा वाले इलाकों में रहती है। हमारे लिए ये आंकड़े एक गंभीर और अनूठी चुनौती हैं। भारत- जो दुनिया की हृदय रोग राजधानी है और जहां दिल का पहला दौरा पड़ने की औसत आयु सिर्फ 50 वर्ष है- में वायु प्रदूषण, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापे और कोलेस्ट्रॉल जैसी एक साथ होने वाली बीमारियों की पहले ही गंभीर स्थिति को और बढ़ा रहा है। इस संकट से सिर्फ बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों को ही खतरा नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक विकास पर असर डालकर भारत के भविष्य के लिए भी खतरा बन सकता है। हवा को सुरक्षित बनाने के लिए बेहतर कानून, नीतियां, तकनीक और कार्यान्वयन के साथ नैदानिक तैयारी जरूरी है। जैसे-जैसे राष्ट्रीय नीतियां दीर्घकालिक वायु गुणवत्ता सुधार की दिशा में प्रगति कर रही हैं, हमारे चिकित्सीय ज्ञान और हेल्थकेयर क्षमताओं को भी आगे बढ़ना होगा। उच्च प्रदूषण वाले दिनों के लिए तो वैज्ञानिक सुझाव मौजूद हैं, लेकिन हमें स्वस्थ और कमजोर आबादी, दोनों की मदद के लिए साल भर के दिशानिर्देशों की जरूरत है। नियमित व्यायाम हृदय की मांसपेशियों और रक्त वाहिकाओं को मजबूत बनाता है, जिससे उनकी प्रदूषण के नुकसान को झेलने की क्षमता बढ़ती है। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर आहार, प्रदूषण से होने वाले ऑक्सीडेटिव तनाव को बेअसर करने में मदद करता है, जबकि अच्छी नींद व तनाव प्रबंधन से जलन-सूजन कम होती है। खूब पानी पीने से टॉक्सिन साफ करने में मदद मिलती है और स्वस्थ वजन बनाए रखने से हृदय संबंधी तनाव कम हो जाता है। हालांकि ये आदतें हमें दूषित हवा में सांस लेने के खतरों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाएंगी। उच्च प्रदूषण वाले दिनों में सोच-समझकर बाहरी गतिविधियों की योजना बनाएं। घर से तभी निकलें जब जरूरी हो। फेस मास्क पहनने चाहिए, पर जिन्हें हृदय संबंधी रोग हैं उन्हें पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। स्वास्थ्य प्रणाली को भी अपग्रेड होना होगा। हृदय रोग की पहचान की जांचों में हवा की गुणवत्ता के आंकड़े शामिल किए जा सकते हैं। स्थानीय वायु गुणवत्ता मॉनिटर और पहने जा सकने वाले डिवाइसों से प्रदूषित हवा में रहने से जुड़ा रियल-टाइम डेटा मिल सकता है और प्रदूषण से जुड़े जरूरी मापदंडों को ट्रैक किया जा सकता है। इसे बायोकेमिकल मार्कर या इंफ्लेमेशन और दिल के समग्र स्वास्थ्य मापदंडों के साथ देखने पर, डॉक्टर किसी व्यक्ति में वायु प्रदूषण के प्रति संवेदनशीलता को समझ सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
एन. रघुरामन का कॉलम:आपके पास जो भी हो वह दें, लेकिन दें जरूर
संतोष पटेल का गांव देवगांव मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में सबसे छोटे गांवों में से एक है, जहां 2011 में 1500 से ज्यादा लोग नहीं थे। 2009 में जब वे इंजीनियरिंग करने अपने गांव से भोपाल आए तो शायद उनका पूरा संयुक्त परिवार उस समय गांव का सबसे बड़ा परिवार रहा होगा, क्योंकि आज उनका एक बड़ा परिवार है, जिसके सदस्यों की संख्या 120 है। वे गरीब थे और संघर्ष कर रहे थे। वे भोपाल में अप्सरा टॉकिज क्षेत्र में रहते थे, जहां सभी आय वर्ग के लोगों का निवास था, मुख्य रूप से निम्न और मध्यम वर्ग के। पटेल के आवास में बिजली की सुविधा भी नहीं थी, इसलिए उन्होंने केरोसिन लैंप में पढ़ाई की। पेट भरने के लिए उन्होंने अजीब जगहों पर काम किया। सब्जी खरीदते समय उनकी दोस्ती एक सब्जी के ठेले वाले सलमान खान से हुई, जो भोपाल के एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पांच भाई और तीन बहनें हैं। जब संतोष के पास सब्जियां खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे, तो सलमान उन्हें रोटी के साथ खाने के लिए कुछ भटे-टमाटर दे देते थे। बदले में संतोष उस भीड़ भरे बाजार में सब्जी की दुकान चलाने में उनकी मदद करते थे। ऐसा नहीं है कि सलमान संतोष को ज्यादा देते था और दूसरे गरीब छात्रों की मदद नहीं करते थे। उन्होंने उनकी भी मदद की, लेकिन संतोष के साथ उनका एक खास रिश्ता रहा। दुकान बंद करने के बाद भी वे कुछ भटे-टमाटर अलग रख लेते थे, यह सोचकर कि छोटा लड़का भूखा न सोए। ऐसा भी नहीं है कि हर रोज सब्जियां मुफ्त मिलती थीं, लेकिन दोनों के बीच की केमिस्ट्री में पैसे किसी भी तरह से नहीं आ पाते थे। इस रिश्ते ने उन्हें अच्छा दोस्त बना दिया। पटेल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। वे अपने गांव लौट आए और पन्ना में वनरक्षक की नौकरी करने लगे। उन्होंने पुलिस बल में शामिल होने के लिए पढ़ाई जारी रखी और 2017 में एमपीपीएससी पास कर ली। उन्होंने बैतूल और निवारी में डीएसपी के तौर पर काम किया, जो भोपाल से क्रमश: 150 और 322 किमी दूर हैं। लेकिन वे कभी वापस लौटकर सलमान का शुक्रिया अदा नहीं कर पाए। पटेल वर्तमान में ग्वालियर में तैनात हैं और इंस्टाग्राम पर 24 लाख फॉलोअर्स के साथ जाने-माने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स में से एक हैं। वे अपने संघर्ष की कहानियां साझा करते हैं, गरीब परिवारों के छात्रों से मिलते हैं, उन्हें स्कूल यूनिफॉर्म और बैग उपहार में देते हैं, और वीडियो बनाते हैं जिनमें वे किसानों के साथ कविताएं साझा करते हैं। सलमान की याद इतने सालों तक उनके दिमाग में रही लेकिन उनकी व्यस्त नौकरी ने उन्हें राजधानी भोपाल लौटने की अनुमति नहीं दी। सौभाग्य से, उन्हें पिछले सप्ताह चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए भोपाल बुलाया गया। शनिवार को एक पुलिसकर्मी को अप्सरा टॉकिज के पास रुकते और अपनी ओर आते देख सलमान चिंतित हो गए। लेकिन वे तुरंत संतोष को पहचान गए और उन्हें सलाम किया। देखने वाले हैरान रह गए, क्योंकि यह पहली बार था, जब किसी पुलिसकर्मी ने सब्जी विक्रेता को न केवल कुछ मिठाइयां और पैसे दिए, बल्कि उन्हें गले भी लगाया, क्योंकि असली दोस्त लंबे समय के बाद मिले थे। बाद में उन्होंने अपनी 14 साल की यात्रा के विवरण साझा किए। वेब-सीरीज की तरह लगने वाली इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों को कुछ देने की आदत है। सलमान ने सब्जियां इसलिए दीं क्योंकि उनके पास न केवल सब्जियां थीं बल्कि उनका मानना था कि किसी को भी बिना भोजन के नहीं सोना चाहिए, जबकि डीएसपी भी स्कूल की वर्दी और बैग खरीदकर संघर्षरत छात्रों को देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि शिक्षा किसी के जीवन को उनके जैसा बना सकती है। फंडा यह है कि जिस चीज में आपका विश्वास है और जो आपके पास बहुतायत में है, उसे समाज को लौटाएं। अगर आपके पास एक मुस्कराहट के सिवा कुछ नहीं तो हर किसी से मुस्कराकर ही मिल लें। चाहे जो हो, देने को आदत बनाएं, क्योंकि इससे समाज बेहतर बनता है।
आरती जेरथ का कॉलम:महाराष्ट्र के चुनाव में शरद पवार पर सबकी नजरें रहेंगी
महाराष्ट्र का यह विधानसभा चुनाव अब तक का सबसे गहमागहमी वाला और भ्रमित करने वाला चुनाव भी है। और सभी की नजरें शरद पवार पर हैं। मराठा बाहुबली पवार का राज्य की राजनीति में चार दशकों से दबदबा रहा है, फिर चाहे वे मुख्यमंत्री रहे हों या सत्ता के पीछे की शक्ति। दो बार वे विपक्ष में रहे। आज 83 की उम्र में उन्हें अहसास है कि शायद यह उनका आखिरी दांव है। देश के इस सबसे अमीर राज्य- जो सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों के मामले में भी दूसरे नंबर पर है- में पवार के पास राजनीति की दिशा तय करने का यह आखिरी मौका है। वे अपनी विरासत और एनसीपी का भविष्य मजबूत करना चाहेंगे। वे यह भी जानते हैं कि महाराष्ट्र के नतीजों से आने वाले महीनों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होगी। अगर भाजपा का महायुति गठबंधन हारता है, तो इससे हरियाणा में उसकी हालिया जीत को तुक्का मान लिया जाएगा। साथ ही, उसके भविष्य पर वे सवाल फिर उठने लगेंगे, जो लोकसभा चुनाव के बाद उठे थे। दूसरी ओर, शरद पवार के प्रयासों के साथ, कांग्रेस और शिवसेना के उद्धव ठाकरे वाले गुट को मिलाकर बने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की जीत से न केवल इंडिया ब्लॉक मजबूत होगा, बल्कि भारतीय राजनीति के महारथी और विपक्ष के रणनीतिकार के तौर पर पवार की छवि और मजबूत हो जाएगी। जाहिर है, उस शख्स के लिए बहुत कुछ दांव पर है, जिसका नाम महाराष्ट्र का पर्याय बन गया है। उम्र और स्वास्थ्य ने उन्हें शारीरिक रूप से भले धीमा कर दिया हो, दिमाग पहले जैसा ही तेज है। एमवीए उनकी ही रचना थी। जब गठबंधन में रहते हुए 2019 का विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद, संयुक्त शिवसेना और भाजपा सरकार बनाने के लिए सहमति पर पहुंचने में विफल रहे, तो पवार ने एक जादूगर की तरह एमवीए को अपनी टोपी से बाहर निकाला था। उन्हें इसकी कीमत तीन साल बाद चुकानी पड़ी, जब भाजपा ने पहले एकनाथ शिंदे को अलग करके शिवसेना और फिर उनके भतीजे अजित पवार को अलग करके पवार की अपनी पार्टी एनसीपी को विभाजित कर दिया। यह शरद पवार के लिए बहुत बड़ा झटका था और तब से वे प्रतिशोध लेना चाह रहे थे। उन्हें लोकसभा चुनावों में मौका मिला, जब उन्होंने महायुति को हराने और महाराष्ट्र की 48 में से 30 सीटें जीतने में एमवीए की मदद की। महाराष्ट्र और यूपी में हार ने ही भाजपा को बहुमत के आंकड़े से नीचे ला दिया था और उसे गठबंधन सरकार बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। अब पवार दूसरे राउंड की तैयारी कर रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि यह भाजपा को महाराष्ट्र से बाहर करने का अंतिम दौर होगा। साफ है कि एमवीए में फैसले कौन ले रहा है। सीट बंटवारे के फॉर्मूले को लेकर उद्धव की शिवसेना और कांग्रेस के बीच अंत तक खींचतान चली। समझौता कराने के लिए शरद पवार को बुलाया गया। पवार ने न केवल समझौता कराया, बल्कि अपने लिए सीटों का बड़ा हिस्सा हासिल कर फायदा भी पाया। शरद पवार ने जो फॉर्मूला निकाला, वह गौर करने लायक है। पवार का मुख्य प्रभाव क्षेत्र पश्चिमी महाराष्ट्र का चीनी उत्पादक क्षेत्र है। इस क्षेत्र में विधानसभा की 70 सीटें हैं। लोकसभा चुनावों में, पवार ने केवल 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें उन 70 में से लगभग 65 विधानसभा सीटें आती हैं। हैरानी की बात यह थी कि उनके जैसा कद्दावर नेता इतनी कम सीटों पर समझौता कर गया। लेकिन एक चतुर राजनेता होने के नाते शरद पवार ने केवल उन निर्वाचन क्षेत्रों में लड़ने का विकल्प चुना, जहां उन्हें लगा कि भतीजे अजित पवार द्वारा उनकी पार्टी को बांटने के बावजूद वे जीत सकते हैं। हुआ भी यही। महाराष्ट्र में बाकी पार्टियों की तुलना में पवार का स्ट्राइक रेट सबसे ज्यादा था। उन्होंने 10 में से 8 सीटें जीतीं। लोकसभा चुनाव के बाद से, उन्होंने अपनी पार्टी में सबकुछ ठीक करने के लिए कड़ी मेहनत की है। वे अजित के गुट के सात महत्वपूर्ण दलबदलुओं को वापस ले आए और बेटी सुप्रिया सुले, भतीजे रोहित और पोते युगेंद्र के बीच उत्तराधिकार को लेकर क्रम तय किया। उन्होंने आत्मविश्वास दिखाते हुए परिवार के गढ़ बारामती में अजित के खिलाफ युगेंद्र को मैदान में उतारा है। यह लंबे समय तक उनकी अपनी सीट रही है। अजित पवार की पार्टी विधानसभा चुनाव में 87 सीटों पर लड़ने के लिए तैयार है। इससे अजित को न केवल अपनी एनसीपी की पकड़ मजबूत बनाने का मौका मिलेगा, बल्कि विदर्भ व मराठवाड़ा समेत अन्य इलाकों में भी पंख फैलाने का मौका मिलेगा। लेकिन शरद पवार एमवीए की ओर से हर चाल सोच-समझकर चल रहे हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)
जमुई में PM के सामने नीतीश बोले-अब कहीं नहीं जाऊंगा:प्रधानमंत्री ने 6640 करोड़ के प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की, झाल और नगाड़ा बजाया
पीएम नरेंद्र मोदी तीन दिन में दूसरी बार बिहार आए। जमुई के बल्लोपुर में शुक्रवार को वो भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए। पीएम ने बिरसा मुंडा के नाम पर 150 रुपए का सिक्का और 5 रुपए का स्मारक डाक टिकट जारी किया है। पीएम ने ये स्मारक सिक्का और डाक टिकट बिरसा मुंडा के वंशज को भेंट भी किया। इस दौरान पीएम ने 6,640 करोड़ रुपए से अधिक की योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। इसके अलावा दो जनजातीय फ्रीडम फाइटर म्यूजियम और दो जनजातीय रिसर्च सेंटर का उद्घाटन भी किया। 40 मिनट के भाषण में आदिवासियों पर फोकस नीतीश कुमार के बाद पीएम मोदी मंच पर पहुंचे। करीब 40 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने आदिवासियों पर फोकस किया। परिवारवाद और आदिवासियों की अनदेखी को लेकर पिछली सरकारों को घेरा। नीतीश कुमार की तारीफ भी की। आदिवासियों ने राजकुमार राम को भगवान राम बनाया पीएम मोदी ने कहा कि ‘आदिवासी समाज वो है, जिसने राजकुमार राम को भगवान राम बनाया। आदिवासी समाज ने भारत की संस्कृति और आजादी की रक्षा के लिए, सैकड़ों सालों की लड़ाई को नेतृत्व दिया। आजादी के बाद के दशकों में आदिवासी इतिहास के योगदान को मिटाने के लिए कोशिश की गई। इसके पीछे भी स्वार्थ भरी राजनीति थी। राजनीति ये कि भारत की आजादी के लिए केवल एक ही दल को श्रेय दिया जाए।’ हमारी सरकार ने आदिवासी कल्याण मंत्रालय बनाया PM ने कहा कि ‘पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में ही अलग से आदिवासी कल्याण मंत्रालय बना। पहले आदिवासियों के लिए 25 हजार करोड़ से भी कम का बजट था। हमारी सरकार ने इसे 5 गुना बढ़ाकर सवा लाख करोड़ तक पहुंचाया।’ श्रीनगर और सिक्किम आदिवासी रिसर्च सेंटर का उद्घाटन उन्होंने कहा कि ‘हमारी सरकार ने आदिवासी विरासत को संरक्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। आदिवासी कला और संस्कृति के लिए समर्पित कई लोगों को पद्म आदिवासी कला और संस्कृति के लिए समर्पित कई लोगों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। हमने रांची में भगवान बिरसा के नाम पर एक विशाल संग्रहालय शुरू किया है। आज श्रीनगर और सिक्किम में दो आदिवासी अनुसंधान केंद्रों का भी उद्घाटन किया गया है। आदिवासियों की चिकित्सा प्रणाली से देश-दुनिया को फायदा PM ने कहा कि ‘एनडीए सरकार ने लेह में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा रिग्पा, अरुणाचल में नॉर्थ ईस्टर्न इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद एंड फोक मेडिसिन रिसर्च की स्थापना की है। भारत में WHO का ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन भी बनाया जा रहा है, इससे भारतीय आदिवासियों की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को देश और दुनिया तक पहुंचने में मदद मिलेगी।’ PM के सामने नीतीश फिर बोले- अब कहीं नहीं जाऊंगा वहीं कार्यक्रम में सीएम नीतीश कुमार ने फिर से कहीं और न जाने की बात दोहराई। उन्होंने कहा कि ‘हम लोग हमेशा से साथ में थे। बीच में कुछ लोग गलती कर दिया। 1995 से हम लोग साथ रहे हैं। इसलिए हम लोग कहीं भी इधर-उधर नहीं जाएंगे। दो बार गलती हुआ लेकिन अब हमेशा साथ रहेंगे।’ PM मोदी ने झाल और नगाड़ा बजाया आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा को जानिए आगे सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए PM मोदी के कार्यक्रम के पल-पल की अपडेट…

