Thursday, March 5, 2026
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आखिर जनता क्यों करती है ट्रोल ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जनता ट्रोल क्यों करती है! मुंबई इंडियंस के नए कप्तान पांड्या आजकल कई दिक्कतों से जूझ रहे हैं। एक तरफ लगातार तीन मैच हारकर उनकी टीम इस वक्त आईपीएल प्वाइंट्स टेबल में आखिरी पायदान पर है। वहीं दूसरी तरफ हार्दिक को इस आईपीएल सीजन में ग्राउंड पर हूटिंग और सोशल मीडिया पर भद्दी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। रोहित शर्मा की जगह कप्तान बनाए जाने के बाद से ही हार्दिक हेटर्स के निशाने पर हैं। हार्दिक पांड्या को ग्राउंड से लेकर सोशल मीडिया तक, हेटर्स बुरी तरह जलील कर रहे हैं। कोई उन्हें छपरी कह रहा है तो कोई उन्हें ‘बेवफा’ बोल रहा हैं। हेटर्स मर्यादा की सीमा लांघकर पांड्या पर ऐसे-ऐसे शब्दों के बाण चला रहे हैं, जिनका सभ्य समाज में जिक्र तक नहीं किया जा सकता। आखिर पांड्या का कसूर क्या है? अगर एक युवा खिलाड़ी अपने करियर की बेहतर संभावनाओं की तलाश में एक टीम को छोड़कर दूसरी टीम में शामिल हो जाता है तो इसमें कौन सा गुनाह है? दरअसल पांड्या आईपीएल की ‘गुजरात टाइटंस’ टीम को छोड़कर ‘मुंबई इंडियंस’ टीम में बतौर कप्तान शामिल हुए हैं। लेकिन हेटर्स उन पर ऐसे हमला बोल रहे हैं कि जैसे वो इंडिया की जगह पाकिस्तान से खेल रहे हैं। हेटर्स मुंबई इंडियंस की हार का गुस्सा पांड्या पर भद्दे-भद्दे कमेंट करके निकाल रहे हैं। मुंबई इंडियंस की टीम इससे पहले भी आईपीएल मैच लगातार हारती रही है, इसमें कोई नई बात नहीं है। बाकी टीमें भी हारती हैं, लेकिन हार्दिक को जिस तरह से मैदान से लेकर सोशल मीडिया तक ट्रोल किया जा रहा है, वो परेशानी की बात है। हेटर्स को सोचना होगा अल्फाजों के जरिए किसी की ‘मॉब लिचिंग’ का अधिकार किसी के पास नहीं है। जब सड़क पर किसी एक शख्स को लोगों की भीड़ मिलकर पीटती है तो उसे ‘मॉब लिंचिंग’ कहा जाता है। सड़क पर मॉब लिचिंग से शरीर जख्मी होता है। लेकिन अल्फाजों के जरिए एक शख्स को टारगेट करना और उसपर भद्दे-भद्दे कमेंट करना दिल और दिमाग दोनों को हिलाकर रख देता है। शायद पांड्या भी आजतक इसी दर्द से गुजर रहे हैं। पांड्या ये तकलीफ झेलने वाले कोई पहले शख्स नहीं है। बॉलीवुड और सोशल मीडिया स्टार भी आए दिन हूटिंग और ट्रोलिंग का शिकार होते हैं। फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत समेत कई सेलिब्रिटी भी इस तकलीफ को झेल चुके हैं। वहीं एल्विश यादव, अंजलि अरोड़ा समेत अन्य सोशल मीडिया स्टार भी हूटिंग और ट्रोलिंग के दर्द को अच्छे से समझते हैं। यहां सवाल खड़ा होता है कि एक भीड़ को किसी के चरित्र का चीरहरण का अधिकार कौन देता है? भीड़ मानसिकता एक दीमक की तरह है जो धीरे-धीरे सभ्य समाज की पंरपराओं और मर्यादाओं को खा रही हैं।

आज हम सोशल मीडिया के युग में जी रहे है। इंटरनेट पर साइबर क्राइम के अलावा एक और बड़ी समस्या है, जो अब खतनाक रूप धारण करती जा रही है। हंसी मजाक और टांग खींचने से शुरु हुआ ट्रोलिंग, अब इंटरनेट के बदलते स्वरूप के चलते चरित्र हनन जैसी गंभीर समस्या बनता जा रहा है।

सोशल मीडिया पर लोग अपना असली नाम छिपाकर दूसरों को आसानी से परेशान कर सकते हैं। ये ट्रोलिंग कई कारणों से हो सकती है। कभी-कभी ध्यान खींचने के लिए, कभी-कभी मनोरंजन के लिए, बदला लेने के लिए, या फिर बोरियत मिटाने के लिए। लेकिन इस बात के बारे में सोचना होगा कि आपकी ट्रोलिंग से किसी को गंभीर परेशानी हो सकती है। जब सोशल मीडिया पर किसी को टारगेट कर ट्रोल किया जाता है तो ट्रोलिंग का शिकार हो रहा है शख्स घबराहट , डिप्रेशन, समाज से कट जाना , गहरे सदमे में जाना, खाने की आदतों में बदलाव , नशे की चीज़ों का इस्तेमाल, खुद को कमतर समझना आदि मानसिक परेशानियों की चपेट में आ सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत सभी नागरिकों को अपने विचार रखने की आजादी दी गई है और सोशल मीडिया के जरिए लोगों ने इस आजादी का इस्तेमाल भी किया है। लेकिन, इस आजादी की भी एक सीमा है और इसमें दूसरे कानूनों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब समेत अन्य सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंटेंट, भड़काऊ कंटेंट या फिर अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत पैदा करने वाला कंटेंट शेयर नहीं कर सकते। भारत के आईटी नियम के अनुसार साइबर क्राइम में सजा का प्रावधान है। ये सजा 3 साल से लेकर आजीवन कारावास तक है।साथ ही जुर्माने का प्रावधान एक लाख से 10 लाख रुपए तक है।

जब किसी एक शख्स को सरेआम भीड़ की ओर से मानसिक यातनाएं दी जाती है। भद्दे-भद्दे कमेंट और गाली गलौज की जाती है। सोशल मीडिया पर मीम्स और जोक्स बनाकर हमला बोला जाता है। तब पीड़ित शख्स के अलावा पीड़ित शख्स का पूरा परिवार डिप्रेशन में आ जाता है। सोचिए जब किसी शख्स पर भद्दी-भद्दी टिप्पणी की जाती हैं तो उस शख्स की बहन को कैसा लगता होगा? उस शख्स की मां क्या महसूस करती होगी? उस शख्स के पिता को कैसा फील होता होगा? उसकी पत्नी और बच्चे कितना घुटते होंगे? हेटर्स आगे से किसी को टारगेट करने से पहले इन सवालों का जवाब खुद से जरूर मांग लें।

क्या बीजेपी में आकर नेताओं के धुल जाते हैं पाप?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी में आकर नेताओं के पाप धुल जाते हैं या नहीं! देश में लोकसभा चुनाव को लेकर हलचल काफी तेज है। चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। दरअसल शराब घोटाले के आरोप में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल तिहाड़ जेल में बंद हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी विपक्षी दलों के नेताओं को चुन-चुनकर टारगेट कर रही है। बीजेपी में शामिल होने के बाद नेताओं से भ्रष्टाचार के आरोप हटा लिए जा रहे हैं। इस बीच इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में है कि 2014 के बाद से कथित भ्रष्टाचार के लिए विपक्ष के 25 नेता जो केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का सामना कर रहे थे, बीजेपी में शामिल हुए और उनमें से 23 को राहत मिल गई। उनके खिलाफ जांच या तो बंद हो गई या ठंडे बस्ते में चली गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है कि 2014 के बाद जिन प्रमुख राजनेताओं का जिक्र किया जा रहा है, वे विपक्षी दलों से बीजेपी में शामिल हो गए थे। इनमें से 10 कांग्रेस से हैं, एनसीपी और शिवसेना से चार-चार, टीएमसी से तीन, टीडीपी से दो और समाजवादी पार्टी और वाईएसआरसीपी से एक-एक नेता शामिल है। विपक्षी दलों के पार्टी बदलने के बाद जांच एजेंसी की कार्रवाई अमूमन निष्क्रिय रही है। इस सूची में शामिल 6 राजनेता आम चुनाव से कुछ हफ्ते पहले अकेले इसी साल बीजेपी में गए हैं। 2022 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच से पता चला था कि 2014 के बाद जब एनडीए सत्ता में आया तो कैसे प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने 95 प्रतिशत प्रमुख विपक्षी राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई की। विपक्ष इसे ‘वॉशिंग मशीन’ के जरिए भ्रष्टाचार के आरोपों को धोने की कवायद बताता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 और 2023 की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान केंद्रीय कार्रवाई का एक बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र पर केंद्रित था। 2022 में एकनाथ शिंदे गुट ने शिवसेना से अलग होकर बीजेपी के साथ नई सरकार बना ली। एक साल बाद अजित पवार गुट एनसीपी से अलग हो गया और सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में शामिल हो गया। अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल के मामले भी बंद हो गए हैं। कुल मिलाकर महाराष्ट्र के 12 प्रमुख राजनेता 25 की सूची में हैं, जिनमें से 11 नेता 2022 या उसके बाद बीजेपी में चले गए, जिनमें एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस के चार-चार शामिल हैं। इनमें से कुछ मामले गंभीर हैं।

शुभेंदु अधिकारी इस समय पश्चिम बंगाल में बीजेपी के कद्दावर नेता और नेता प्रतिपक्ष हैं। ममता सरकार में मंत्री रहे शुभेंदु से सीबीआई ने शारदा घोटाला मामले में पूछताछ की थी। टीएमसी आरोप लगाती रही है कि जब अधिकारी टीएमसी में थे तो जांच एजेंसियां उन्हें परेशान करती थी लेकिन, बीजेपी में जाते ही उन्हें क्लीन चिट मिल गई। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खिलाफ मामले भी अटके हुए हैं। हिमंता को 2014 में सारदा चिटफंड घोटाले में सीबीआई की पूछताछ और छापेमारी का सामना करना पड़ा था, लेकिन 2015 में उनके बीजेपी में शामिल होने के बाद से उनके खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ा है। चव्हाण इस साल बीजेपी में शामिल हो गए, जबकि आदर्श हाउसिंग मामले में सीबीआई और ईडी की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है।

25 मामलों में से केवल दो में कार्रवाई नहीं रुकी। इनमें पूर्व कांग्रेस सांसद ज्योति मिर्धा और पूर्व टीडीपी सांसद वाईएस चौधरी का है। दोनों नेताओं के बीजेपी में शामिल होने के बाद भी ईडी द्वारा ढील दिए जाने का कोई सबूत नहीं है। कम से कम अभी तक तो कोई सबूत नहीं मिला। सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग से इस बारे में कमेंट मांगने पर द इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि उनके सवालों का जवाब नहीं दिया। हालांकि, सीबीआई के एक अधिकारी ने कहा कि एजेंसी की सभी जांच सबूतों पर आधारित हैं। जब भी सबूत मिलते हैं उचित कार्रवाई की जाती है। उन मामलों के बारे में पूछे जाने पर जहां आरोपी के पक्ष बदलने के बाद एजेंसी ने अपना रास्ता बदल लिया है, अधिकारी ने कहा, ‘कुछ मामलों में विभिन्न कारणों से कार्रवाई में देरी होती है। लेकिन वे खुले हैं।’ ईडी के एक अधिकारी ने कहा कि उसके मामले अन्य एजेंसियों की एफआईआर पर आधारित हैं। अगर अन्य एजेंसियां अपना मामला बंद कर देती हैं, तो ईडी के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। फिर भी, हमने ऐसे कई मामलों में आरोपपत्र दायर किए हैं। जिन मामलों में जांच चल रही है, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी।

आखिर कौन है तीन बार सांसद रहे भुवनेश्वर प्रसाद मेहता?

आज हम आपको तीन बार सांसद रहे भुवनेश्वर प्रसाद मेहता के बारे में जानकारी देने वाले है! लोकसभा चुनाव को लेकर देश भर में माहौल बन चुका है। चुनाव आयोग की ओर से शेड्यूल की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम राजनीतिक दल रैलियों में जुट गए हैं। पीएम मोदी की हालिया रैलियों पर नजर डालें तो एक बात तो साफ है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वह विरोधियों को परिवारवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने का मन बना चुके हैं। राजनीति में जब भ्रष्टाचार की बात हो रही है तब हम अपने संसद के सदस्य रह चुके ऐसे राजनेता की कहानियां बता रहे हैं जो कहीं ना कहीं ईमानदारी और संघर्ष के प्रतीक माने जाते रहे हैं। लेकिन उनकी जिंदगी के पन्ने पलटकर देखे जाएं तो पता चलता है कि वह भारतीय संसद के लिए किसी रत्न से कम नहीं रहे। सीरीज की पहली कहानी झारखंड के पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता की है।झारखंड के हजारीबाग लोकसभा सीट से पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के नेता रहे। राजनीति में भुवनेश्वर प्रसाद मेहता का जिक्र आते ही एक ईमानदार और बेदाग छवि वाले नेता का चेहरा लोग याद करते हैं। तीन बार संसद में हजारीबाग का प्रतिनिधित्व कर चुके भुवनेश्वर प्रसाद मेहता 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाग्य आजमाना चाहते हैं, लेकिन उनकी पार्टी और इंडिया गठबंधन उन्हें मौका देती है या नहीं, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन यह बात जरूर है कि ईमानदारी और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का जिक्र आने पर भुवनेश्वर प्रसाद मेहता की जिंदगी से युवा नेताओं को काफी कुछ सीखने की जरूरत है। हजारीबाग के कटकमसांडी प्रखंड के लुपुंग में प्रसादी मेहता पास के गांव की रहने वाली मुनिया देवी को ब्याह कर लाए थे। शादी के कुछ साल बाद ही उन दोनों को एक बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने भुवनेश्वर प्रसाद मेहता रखा। भुवनेश्वर अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े रहे। 7वीं तक गांव में पढ़ने के बाद भुवनेश्वर प्रसाद हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए हजारीबाग चले गए। यहां उन्होंने पांच रुपये किराए पर एक कमरा लिया और पढ़ाई में जुट गए। पैसे की तंगी के चलते भुवनेश्वर हर शनिवार को पैदल अपने गांव चले जाते और वहां से सप्ताह भर का दाल, चावल, आलू, तेल, सब्जी आदि लेकर पैदल ही हजारीबाग वाले कमरे पर आ जाते।

9वीं में पहुंचने पर भुवनेश्वर प्रसाद छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और 15-20 रुपये की आमदनी कर परिवार से खर्च लेना बंद कर दिया। अच्छे नंबरों से इंटर पास होने के बाद कॉलेज में पहुंचे, लेकिन ट्यूशन पढ़ाना जारी रखा। तब तक वह ट्यूशन से 400 रुपये तक कमा लेते। साथ ही उन्हें हर महीने 25 रुपये छात्रवृति भी मिल जाती। इसी बीच भुवनेश्वर का रुझान राजनीति की तरफ हुआ। उन्होंने कॉलेज में पिछड़ा वर्ग छात्र संघ बनाया और बाद में छात्रसंघ चुनाव में जीत दर्ज कर महासचिव बने। ग्रेजुएशन कंप्लीट होने के बाद भुवनेश्वर ने सरकारी नौकरी तलाशने के बजाय अपने गांव लौटे और एक स्कूल खोला, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह आर्थिक कमी के चलते बंद हो गई। इसके बाद भुवनेश्वर प्रसाद तेनुघाट में विद्युत संयंत्र के लिए ठेकेदारी करने लगे, यहां उन्होंने सिंचाई कामगार यूनियन बनाया। उस दौर में बिहार के कद्दावर समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर की ओर से भुवनेश्वर को पार्टी ज्वाइन करने का ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया और 1966 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए।

कामरेड मंजूर हसन से प्रेरित होकर भुवनेश्वर प्रसाद मेहता तब से लेकर आज तक मजदूरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस वजह से वह अब तक 45 बार जेल जा चुके हैं। कई बार पुलिस की पिटाई में अधमरा भी हो चुके हैं। चुनावी राजनीति में भी भुवनेश्वर सघर्ष करने से पीछे नहीं हटे। इस वजह से उनके समर्थक उन्हें ‘जायंट किलर’ कहते हैं। भुवनेश्वर प्रसाद CPI के टिकट पर पहली बार हजारीबाग विधानसभा सीट से उतरे। महज 5000 रुपये खर्च कर चुनाव में भाग्य आजमाया, लेकिन हार मिली। इसके बाद वह उपप्रमुख और मुखिया का भी चुनाव जीते।

करीब 45 साल से सक्रिय राजनीति में रहने वाले भुवनेश्वर प्रसाद मेहता आज की राजनीति में धन और बल के बढ़ते प्रभाव से बेहद दुखी रहते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह से संसद में 300 से ज्यादा सांसद करोडपति हैं, वह लोकतंत्र के लिए बेहद दुखद है। आज जिस तरह से चुनाव में पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले समय में गरीब, ईमानदार और स्वच्छ छवि के लोग चुनाव नहीं जीत पाएंगे। वह मानते हैं कि राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिए योग्य युवाओं को आगे आना चाहिए। भुवनेश्वर प्रसाद मेहता की ईमानदारी का आलम यह है कि इतने लंबे समय तक संसद और विधान सभा के सदस्य रहने के बावजूद आज की चकाचौंध वाली जिंदगी से दूर हैं। वह आज भी पूर्व जनप्रतिनिधि के रूप में मिलने वाली पेंशन का एक फीसदी पार्टी कोष में जमा करते हैं। राजनीति में परिवारवाद के विरोधी रहे भुवनेश्वर प्रसाद की तीन बेटियां और एक बेटे अच्छी शिक्षा हासिल कर नौकरी कर परिवार का पालन पोषण करते हैं।

जब नेहरू को राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह ने दी थी चुनौती !

एक ऐसा समय था जब राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह ने नेहरू को चुनौती दी थी! राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह ने आजादी की लड़ाई में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सहयोग किया। कांग्रेस पार्टी के रामगढ़ अधिवेशन को सफल कराने में भी पूरा साथ दिया। इतना ही नहीं कामाख्या नारायण सिंह ने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपना राज उन्हें समर्पित करने का प्रस्ताव भी दिया। लेकिन देश को आजादी मिलने के कुछ ही महीने पहले उनकी पंडित जवाहर लाल नेहरू से ऐसी अनबन हुई कि जब तक कामाख्या नारायण सिंह जीवित रहे, कांग्रेस पार्टी को रामगढ़ राजा के प्रभाव वाले इलाके में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। दूसरी तरफ रामगढ़ राजपरिवार के कई सदस्यों को पहले आम चुनाव से लेकर 1970 के दशक तक लगातार सफलता मिलती रही। अलग झारखंड राज्य गठन के बाद भी रामगढ़ राज परिवार के सदस्य सौरभ नारायण सिंह को सफलता मिली। अब भी परिवार के कई सदस्य कांग्रेस और बीजेपी से जुड़ कर सक्रिय में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। झारखंड की राजनीति के पुराने जानकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार बताते है कि कामाख्या नारायण सिंह आजादी की लड़ाई के अंतिम दौर में एक दिन प. जवाहर लाल नेहरू से मिलने दिल्ली पहुंचे। जिस वक्त राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह प. नेहरू से मिलने पहुंचे, उस वक्त प. नेहरू पार्टी के कुछ अन्य नेताओं के साथ चर्चा में व्यस्त थे, इस कारण राजा रामगढ़ की बातों पर पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाए। इस व्यवहार से कामाख्या नारायण सिंह प. नेहरू पर भड़क गए और उन्होंने प. नेहरू को अपने प्रभाव क्षेत्र में चुनौती देने का ऐलान कर दिया। प. नेहरू के आवास से गुस्से से बाहर निकले कामाख्या नारायण सिंह ने अलग पार्टी बनाने का फैसला लिया। 1946 में कामाख्या नारायण सिंह ने छोटानागपुर-संतालपरगना जनता पार्टी का गठन किया। पहले आम चुनाव में उन्होंने लोकसभा की जगह बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

रामगढ़ राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह ने खुद 1951 के बिहार विधानसभा चुनाव में एक साथ चार सीटों पर जीत हासिल की। कामाख्या नारायण सिंह को अपनी पार्टी छोटानागपुर संताल परगना जनता पार्टी के टिकट पर बगोदर, पतारबार, गोमिया और बड़कागांव विधानसभा सीट से जीत मिली। वहीं उनकी पार्टी के राम नारायण सिंह पहले लोकसभा चुनाव में हजारीबाग पश्चिम सीट से विजयी रहे। जबकि 1957 के लोकसभा चुनाव में छोटानागपुर संताल परगना जनता पार्टी के तीन उम्मीदवार विजयी हुए, जिसमें चतरा से विजया राजे, गिरिडीह से कुरैशी एसए मतिन और हजारीबाग से ललित राजे लक्ष्मी विजयी रहीं। इसके अलावा 1962 के चुनाव में उनकी पार्टी के 7 सांसद हो गए और 50 विधायकों के साथ कामाख्या नारायण सिंह विपक्ष के नेता बने।

1967-68 में बिहार में जब पहली बार गैर कांग्रेस दलों की सरकार बनी, तो इसमें रामगढ़ राजा की बड़ी भूमिका रही। उनके परिवार के ही भाई कुंवर बसंत नारायण सिंह, मां शशांक मंजरी देवी, पत्नी ललिता राजलक्ष्मी और पुत्र टिकैट इंद्र जितेंद्र नारायण सिंह कई बार सांसद और विधायक बने। कामाख्या नारायण सिंह खुद बिहार सरकार में मंत्री रहे। उनके भाई कुंवर बसंत नारायण सिंह और पत्नी ललिता राजलक्ष्मी भी मंत्री बनीं। कामाख्या नारायण सिंह के सहयोग से ही हजारीबाग के कैलाशपति सिंह और रंका के गोपीनाथ सिह बिहार सरकार में मंत्री बने थे।

पुराने हजारीबाग जिले यानी चतरा, हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा, बोकारो और रामगढ़ में तो जिस किसी को भी कामाख्या नारायण सिंह ने चुनाव में खड़ा किया, वे जीतते रहे। आजादी के पहले और बाद में जिस समय कांग्रेस की तूती बोलती थी, कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता कामाख्या नारायण सिंह के खिलाफ कैंप करते, फिर भी ये चुनाव जीत जाते थे। उनका प्रभाव इतना था कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार धनबाद सहित आरा और छपरा से भी चुनाव जीतते थे। 1967 से लेकर 1970 के बीच बिहार की राजनीति में काफी उथल-पुथल रहा। इसी दौरान 6 मई 1970 को कामाख्या नारायण सिंह ने कोलकाता सिथत अपने आवास में अंतिम सासें लीं। उनके निधन को लेकर यह अफवाह उड़ाई कि कामाख्या नारायण सिंह का निधन नहीं हुआ, बल्कि संपत्ति के कई विवादों में उलझने से अपने को बचाने के लिए वे चुपचाप विदेश खिसक गए हैं। उनकी जगह किसी दूसरे मृत व्यक्ति की अंत्येष्टि की गई है। हालांकि यह बेसिर पैर की बात थी।

रामगढ़ राजपरिवार के अंतिम राजा कामाख्या नारायण सिंह की मौत के बाद कुंवर बसंत नारायण सिंह दल-बल के साथ भारतीय जनसंघ में शामिल हो गए। जिसके कारण इस राष्ट्रीय पार्टी को झारखंड के इलाके में राजनीतिक जमीन की प्राप्ति हुई। बाद में भारतीय जनता पार्टी की इस क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ मजबूत हुई। कुंवर बसंत नारायण सिंह खुद कई बार हजारीबाग लोकसभा सीट से के सांसद रहे।

जयंत चौधरी के लिए क्या बोले शाहिद सिद्दीकी?

हाल ही में शाहिद सिद्दीकी ने जयंत चौधरी पर एक विवादित बयान दिया है! लोकसभा चुनाव 2024 में सभी की नजरें मुस्लिम वोटरों पर गड़ी हुई हैं। यूपी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मुसलमानों की ठीकठाक आबादी है। अकेले यूपी में 20 फीसदी के करीब मुसलमान वोटर हैं। साथ ही 29 लोकसभा सीट ऐसी हैं, जिन पर मुस्लिम वोटर जीत-हार की निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। इसी क्रम में NDA का हिस्सा बनते ही एक बड़े मुस्लिम नेता ने राष्ट्रीय लोकदल का साथ छोड़ दिया है। RLD के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शाहिद सिद्दीकी ने पार्टी से इस्तीफा देते हुए कहा कि मैं खामोशी से देश के लोकतांत्रिक ढांचे को समाप्त होते नहीं देख सकता हूं। मुख्यमंत्रियों की गिरफ्तारी से भी आहत हूं। इसके साथ ही उन्होंने माफिया मुख्तार अंसारी की मौत मामले में जांच की मांग की थी। गुजरात के गोधराकांड के बाद तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू करने पर सपा ने उन्हें निष्कासित कर दिया था। शाहिद सिद्दीकी ने बताया कि उन्होंने RLD मुखिया जयंत चौधरी को अपना इस्तीफा भेज दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल की सदस्यता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद से अपना त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने कहा कि आज देश के संवैधानिक ढांचों और लोकतंत्र के ऊपर हमला है। ऐसे में किसी का चुप रहना पाप है। शाहिद ने कहा कि बीजेपी नेताओं से अपील करता हूं कि उन्हें अटल जी के रास्ते को अपनाना चाहिए और राजधर्म निभाने की बात करनी चाहिए। आज जिस तरीके से मुख्यमंत्रियों को गिरफ्तार किया जा रहा है। नेताओं के 15-15 साल पुराने मुकदमे निकाले जा रहे हैं। चुनाव के ठीक समय ऐसा होना ये राजधर्म नहीं है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बीजेपी नेता जो अटल जी और बीजेपी की नीति में विश्वास करते हैं, उन्हें भी इसका विरोध करना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों के लीडरों से अपील है कि भारत का लोकतंत्र सबसे महत्वपूर्ण है। सत्ता आती जाती रहती है। इमरजेंसी का हमने विरोध किया था। हमने जेल काटी थी। ये इसलिए नहीं किया कि हम इंदिरा गांधी या कांग्रेस के विरोधी थे। हम देश के हित में खड़े होना चाहते थे। आज भी हम देश के हित में खड़े होना चाहते हैं। सवाल इस समय बीजेपी, आरएलडी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का नहीं है। सवाल हिंदुस्तान और लोकतंत्र का है। पूरी दुनिया में हमारी पहचान हमारे लोकतंत्र की वजह से है। इस पहचान और इज्जत को आगे बढ़ाना है।

मऊ से 5 बार के विधायक माफिया मुख्तार अंसारी की मौत पर भी आरएलडी के उपाध्यक्ष रहे शाहिद सिद्दीकी ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी। शाहिद ने इस मामले में जांच की मांग की थी। उन्होंने कहा कि मुख्तार अंसारी महान स्वतंत्रता सेनानी और महात्मा गांधी के सहयोगी डॉ. एम.ए. अंसारी के परिवार से आते हैं। स्थानीय माफिया द्वारा उनके परिवार पर किए गए हमलों के कारण वो (मुख्तार अंसारी) आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो गए थे। उनकी मौत की पूरी जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह संदिग्ध परिस्थितियोंपूर्व राज्यसभा सांसद शहीद सिद्दीकी राष्ट्रीय लोकदल में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। शाहिद पत्रकार होने के साथ ही नई दिल्ली से प्रकाशित उर्दू साप्ताहिक पत्रिका के मुख्य संपादक भी हैं। शाहिद सिद्दीकी का जन्म 1951 में पत्रकारों और लेखकों के परिवार में हुआ था। उनके पिता मौलाना अब्दुल वहीद सिद्दीकी एक पत्रकार और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता थे। शाहिद सिद्दीकी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। 1997-99 तक कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रमुख रह चुके हैं। बाद में शाहिद सपा में शामिल हो गए थे। 2002 से 2008 तक सपा में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वो राज्यसभा सांसद रहे चुके हैं। जुलाई 2008 में बसपा में शामिल हो गए थे, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ बोलने के कारण उन्हें 2009 में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। में हुई है।

पेशे से पत्रकार शाहिद सिद्दीकी को गोधरा कांड के बाद अल्पसंख्यक विरोधी दंगों पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने के लिए उन्हें जुलाई 2012 में समाजवादी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। उस इंटरव्यू में मोदी ने कहा था कि अगर मैं दोषी हूं तो मुझे फांसी दे दो। कवर-पेज साक्षात्कार छह पृष्ठों का था और इसमें गुजरात में मुसलमानों की स्थिति, गोधरा के बाद के दंगे और अन्य संवेदनशील मुद्दे शामिल थे। सिद्दीकी ने उन्हें अस्वीकार करने के समाजवादी पार्टी के रुख को महज एक मजाक करार देते हुए कहा था कि मैं मुलायम सिंह यादव सहित समाजवादी पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं की उपस्थिति में पार्टी में शामिल हुआ था, इसलिए यह मजाक वास्तव में दुखद है।

वहीं, इससे पहले आरएलडी के तीन नेताओं ने एकसाथ पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, जिसमें आरएलडी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष रहे आरिफ महमूद का नाम भी शामिल था। आरिफ महमूद ने मुसलमानों की अनदेखी करने को लेकर RLD मुखिया जयंत चौधरी पर आरोपों की बौछार की थी। आरिफ महमूद ने आरोप लगाया था कि जयंत चौधरी का अल्पसंख्यकों के प्रति कोई रुझान नहीं था। जब भी हम अपनी समस्याओं को उनके सामने रखते थे तो कभी भी उन्होंने उन समस्याओं को कंसीडर नहीं किया। कार्यालय में अल्पसंख्यक का बोर्ड लगा था, उसे भी निकाल कर फेंक दिया गया। दफ्तर में अलपसंख्यकों को बैठने तक की जगह नहीं दी थी। उन्होंने बताया कि हमारे अध्यक्ष रहते हुए जयंत चौधरी कभी भी अल्पसंख्यको की मीटिंग में नहीं आए। वो रोजा इफ्तार से भी परहेज करने लगे थे।

लोकसभा चुनाव में किसकी होगी हार किसकी होगी जीत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि लोकसभा चुनाव में किसकी हार होगी और किसकी जीत होगी! आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। सात चरणों में होने वाले चुनाव की वोटों की गिनती 4 जून को होगी और 19 अप्रैल को पहले चरण का चुनाव होने वाला है। रविवार को एक तरह से इंडिया गठबंधन दिल्ली में संयुक्त रैली से चुनावी अभियान के अंतिम चरण की शुरुआत कर सकता है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी दिन मेरठ से बीजेपी के अभियान की शुरूआत कर सकते हैं। भले आम चुनाव 543 लोकसभा सीटों पर हो रहा हो, लेकिन दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा, यह दिशा उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 सीटें ही करेंगी। 2019 और 2014 आम चुनाव में भी अगर नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से गद्दी पर बैठे तो इसके पीछे इन दोनों राज्यों का विशाल जनादेश ही था। 2019 में बीजेपी गठबंधन को दोनों राज्यों में 103 सीटें मिली। पिछली बार तो UP में समाजवादी और BSP के गठबंध्न के बावजूद बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की। इस बार BSP अलग है। साथ ही जयंत बीजेपी के साथ हैं। जानकारों के अनुसार, बीजेपी इस बार इन दोनों राज्यों में कुछ सीटें बढ़ाने की उम्मीद ही कर रही है। वहीं, विपक्ष को पता है कि अगर इन दोनों राज्यों में बीजेपी की सीटें कम नहीं हुई तो लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना बेहद कठिन होगा।

विपक्ष इस बार बीजेपी को रोकने के लिए एक सीट, एक उम्मीदवार देने की कोशिश कर रहा है। विपक्ष का मानना है कि अगर बीजेपी के सामने एक साझा उम्मीदवार रहा और वोट नहीं बंटे तो मोदी की अगुवाई में NDA को रोका जा सकता है। लेकिन ऐसा कितनी सीटों पर होगा, अभी यह तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। UP जैसे बड़े राज्य में मायावती साथ नहीं आईं। ऐसे में अंतिम लाइन अप सामने आने के बाद तस्वीर साफ होगी। बीजेपी का दावा है कि ऐसा होने से भी फर्क नहीं पड़ेगा। इसके लिए वह 2019 के चुनाव परिणाम का हवाला दे रही है, जब पार्टी को 223 सीटों पर 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले।

मोदी सरकार ने पिछले 10 वर्षों में बीजेपी का चरित्र बहुत हद तक बदलने में सफलता पाई है। इसके लिए सामाजिक आधार को भी बदलने की कोशिश भी बहुत हद तक सफल भी रही। चाहे उज्ज्वला योजना हो या गरीबों को घर देने की योजना या फिर किसानों को हर साल 6 हजार रुपये अनुदान, मोदी ने गरीबों के बीच अपने वोट को विस्तार दिया है। इसे ‘बॉटम ऑफ पिरामिड वोट’ कहा जाता है। पहले बीजेपी की पकड़ इस वर्ग में कमजोर हुआ करती थी। विपक्ष इसमें सेंध लगाने के लिए लोक-लुभावने वादे के साथ उतरी है।

इस बार आम चुनाव में कई नए तरह के गठबंधन बने। पहले विपक्ष ने इंडिया गठबंधन के नाम पर प्रयोग किया। हालांकि, नीतीश कुमार के एनडीए में जाने और ममता बनर्जी के सीट समझौते से अलग होने के बाद इसे झटका भी लगा। लेकिन कई जगह चुनावी गणितीय आंकड़ों में वह निश्चित तौर पर मजबूत दिखे। इसे काउंटर करने के लिए अंतिम समय में बीजेपी ने भी एनडीए ताबड़तोड़ कई दलों को मिलाया। हालांकि ओडिशा-पंजाब में समझौता नहीं हो पाया। चुनाव सिर्फ गणित से नहीं जीते-लड़े जाते हैं। इसके लिए केमेस्ट्री भी जरूरी है। जो गठबंधन गणित मजबूत कर केमेस्ट्री को अपने पक्ष में करने में सफल होगा, उसके लिए परिणाम और बेहतर निकलेगा।

अंत में जिस राजनीतिक दल का सिस्टम बेहतर होगा, नजदीकी मुकाबले वाले चुनाव में जो अपने वोटरों को बूथ तक लाने में सफल रहेंगे वही अडवांटेज में रहेगा। जाहिर है इसमें पैसा और दूसरे संसाधन भी अहम फैक्टर होंगे। इनके बीच बूथ मैनेजमेंट भी चुनाव की दिशा तय करेगा। संघ-बीजेपी के बीच किस तरह की केमेस्ट्री चुनाव तक बनती है, विपक्षी दल बीजेपी के राजनीतिक संसाधन को किस तरह काउंटर करते हैं। बीजेपी इस बार इन दोनों राज्यों में कुछ सीटें बढ़ाने की उम्मीद ही कर रही है। वहीं, विपक्ष को पता है कि अगर इन दोनों राज्यों में बीजेपी की सीटें कम नहीं हुई तो लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना बेहद कठिन होगा।चुनाव प्रचार को कितना विस्तार देते हैं, इन सब बातों से भी चुनाव तय होगा। अभी तक विपक्ष कोई मजबूत नैरेटिव नहीं लाया है। वहीं, मोदी की अगुआई में बीजेपी 400 पार के नारे के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सफल हो गई है।

क्या अब गांव की फ्री बिजली पर लगाई जाएगी रोक?

अब गांव की फ्री बिजली पर रोक लगाई जा सकती है! चुनाव के समय राजनीतिक दल मुफ्त उपहार देने की होड़ में लगे रहते हैं। कुछ तो किफायती होते हैं, लेकिन गांवों में फ्री बिजली ऐसी नहीं है। पंजाब, जो कभी सबसे अमीर राज्य था, अब औसत से थोड़ा ऊपर ही रह गया है। इसका एक बड़ा कारण है मुफ्त ग्रामीण बिजली, जिसने भारी राजकोषीय घाटा पैदा कर दिया है। इससे यह भारत का सबसे अधिक कर्जदार राज्य बन गया है। यह प्रदेश बुनियादी ढांचे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में निवेश करना तो दूर की बात, वेतन देने में भी असमर्थ है। पंजाब पर मौजूदा कर्ज का 80 फीसदी मुफ्त बिजली के कारण है, जो अन्य सभी राज्यों के लिए एक चेतावनी है। यहीं नहीं अब एक नई और अधिक भयावह चेतावनी आती दिख रही है।जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए, पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन को फेज आउट किया जा रहा है। सभी ट्रांसपोर्ट और ग्रामीण मशीनों का विद्युतीकरण समय के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा। इसलिए, जैसे-जैसे गाड़ियों में पेट्रोल और डीजल की जगह बिजली का इस्तेमाल बढ़ेगा, ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी मांग आसमान छूने लगेगी। ऐसे में मुफ्त ग्रामीण बिजली की बजटीय लागत बढ़ जाएगी। दोपहिया वाहनों का विद्युतीकरण तेजी से आगे बढ़ रहा है। पिछली तिमाही में इलेक्ट्रिक टूव्हीलर्स की बिक्री में 34 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। 2023-24 में इसकी कुल बिक्री 1.5 मिलियन को पार कर जाएगी। एक इलेक्ट्रिक टूव्हीलर की कीमत पेट्रोल से चलने वाली बाइक से अधिक होती है, लेकिन इसकी चलने की लागत बहुत सस्ती होती है। पेट्रोल पर इतना अधिक टैक्स लगाया जाता है कि इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर चलाने की आजीवन लागत पहले से ही पेट्रोल आधारित गाड़ियों की तुलना में बहुत कम है। कंज्यूमर्स अपने मौजूदा टूव्हीलर्स को नहीं छोड़ेंगे, लेकिन नई खरीद बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक विकल्पों की होगी। थ्रीव्हीलर्स गाड़ियों में ये तेजी से देखने को मिल रहा है, जहां आजीवन लागत महत्वपूर्ण है।

इलेक्ट्रिक टूव्हीलर किफायती हैं, भले ही उपभोक्ता बिजली के लिए भुगतान कर रहे हों। जैसे कि शहरों में देखने को मिला है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां बिजली फ्री या लगभग मुफ्त है, इलेक्ट्रिक टूव्हीलर्स की लागत में जबरदस्त फायदा है। जल्द ही बाजार लगभग पूरी तरह से इलेक्ट्रिक हो जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में मोटरसाइकिल पर्सनल ट्रांसपोर्ट का एक मानक रूप बन गई है। मैंने चार साल पहले गुजरात में एक रिसर्च प्रोजेक्ट में पाया कि सरदार सरोवर बांध के विस्थापित आदिवासियों में से, जो अब मुख्यधारा के गांवों में बस गए हैं, 61% के पास मोटरसाइकिलें थीं। उनके पहले के पड़ोसियों में से जो अभी भी जंगल के गांवों में रहते हैं, 31 फीसदी के पास मोटरसाइकिलें थीं। यह प्रतिशत बढ़ता ही रहेगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री भी बढ़ रही है, खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे बड़े किसानों वाले राज्यों में। जब भी किसी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण होता है, तो किसान अपने मुआवजे के पैसे से कार खरीदते हैं। कारों का विद्युतीकरण टूव्हीलर की तुलना में अधिक समय लेगा। लेकिन टाटा पहले से ही तीन इलेक्ट्रिक ब्रांड – टियागो, पंच और नेक्सॉन गाड़ियां बेच रहा है। महिंद्रा के पास एक इलेक्ट्रिक एसयूवी है। इलेक्ट्रिक कार की लागत इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की तुलना में बहुत कम है। लेकिन अगर बिजली मुफ्त है, तो इलेक्ट्रिक कारें अनबीटेबल हो जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री, विशेष रूप से वे जो शहरीकरण की ओर अग्रसर हैं, तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।

हैवी व्हीकल्स का विद्युतीकरण अधिक कठिन होगा। लेकिन टेस्ला सहित कई वैश्विक कंपनियां पहले से ही इलेक्ट्रिक ट्रक बना रही हैं। यह केवल समय की बात है कि सभी प्रकार की कृषि मशीनरी – ट्रैक्टर, कीटनाशक स्प्रेयर, कंबाइन हार्वेस्टर, हैप्पी सीडर – भी बिजली से संचालित होने लग जाएंगी। इलेक्ट्रिक व्हीकल की प्रमुख लागत बैटरी में होती है। बैटरी की संख्या (और इसलिए लागत) जरूरी वर्कलोड के साथ बढ़ती है। यह टूव्हीलर्स के लिए सबसे कम और ट्रैक्टर-ट्रकों के लिए सबसे अधिक है। लेकिन अगर बिजली मुफ्त है, तो इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर, ट्रक और कंबाइन हार्वेस्टर जल्दी ही किफायती हो जाएंगे।

आगे का रास्ता क्या है? केंद्र और राज्य सरकारों को बिजली पर सब्सिडी देने की विनाशकारी प्रतिस्पर्धा को रोकने के लिए एक साथ आने की जरूरत है। किसानों को बिजली के लिए भुगतान करना चाहिए, ताकि उन्हें इसके इस्तेमाल को संरक्षित करने के लिए प्रोत्साहन मिले। बिजली की कीमतों को फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइज (MSP) में रिफ्लेक्ट किया जा सकता है। इसके अलावा, राज्य सरकारों की ओर से दी जाने वाली पीएम किसान और अन्य कैश अनुदान स्कीम को बढ़ाया जा सकता है। यह राजनीतिक रूप से पेचीदा होगा। किसान पहले ही सड़कों को अवरुद्ध करने और ट्रांसपोर्ट को रोक की अपनी क्षमता दिखा चुके हैं। वो निश्चित रूप से मुफ्त बिजली को समाप्त करने का विरोध करेंगे, लेकिन यह काम जरूरी है।

क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में पकड़ी गई है कभी गलतियां?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में कभी गलतियां पकड़ी गई है या नहीं या उसे पर ऐसे ही विवाद खड़ा हो गया है! लोकसभा चुनाव की गहमा-गहमी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इस बीच ईवीएम के साथ दिए गए वोट को देखने के लिए लगाई जाने वाली वीवीपैट मशीन फिर से चर्चा में है। विपक्ष हर मतदाता को वीवीपैट से निकली पर्चियों को देने की वकालत करता है जबकि चुनाव आयोग इसके खिलाफ है। आयोग का तर्क है कि अगर सारे चुनाव में वीवीपैट की पर्चियों को हर वोटर को देना शुरू कर दिया जाएगा तो फिर पुराने समय में बैलेट पेपर और ईवीएम के साथ होने वाले चुनाव में क्या फर्क रह जाएगा? हम फिर से पुराने युग में नहीं लौट जाएंगे? इसमें वोट देने और फिर वोटों की गिनती करने में लंबा समय लगता है। वीवीपैट एक ऐसी मशीन है, जो चुनाव के समय ईवीएम के साथ कनेक्ट की जाती है। इसे मतदाता द्वारा अपनी पसंद की पार्टी और उम्मीदवार को दिए गए वोट को डबल चेक करने के लिए लगाया जाता है। वोटर अपने उम्मीदवार और पार्टी को ईवीएम में बटन दबाकर वोट देता है तो वीवीपैट मशीन एक पर्ची जेनरेट करती है। वह पर्ची सात सेकंड तक मतदाता को वीवीपैट मशीन में लगे शीशे के एक बॉक्स में दिखाई देती है। इसके बाद वहां से ऑटोमेटिक कटकर वीवीपैट मशीन के अंदर ही गिर जाती है। पर्ची में मतदाता द्वारा दिए गए वोट पर उस उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है। इसका मकसद यह होता है कि अगर कोई उम्मीदवार चुनाव संपन्न होने के बाद ऐसा आरोप लगाता है कि ईवीएम से वोट में कोई गड़बड़ी की गई है, तो तमाम पर्चियों का उस विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र के लिए ईवीएम में पड़ी वोट से मिलान कराया जाता है। दोनों के वोट एक समान होने पर उस चुनाव को वैलिड घोषित कर दिया जाता है।

चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि 2017 से वीवीपैट का इस्तेमाल 100 फीसदी होना शुरू हो गया। पहली बार 2019 के लोकसभा चुनावों में 100 फीसदी वीवीपैट का इस्तेमाल किया गया। इसमें हर विधानसभा क्षेत्र के पांच पोलिंग स्टेशनों को रैंडमली चुनकर वीवीपैट की सभी पर्चियों का ईवीएम में पड़े वोटों के साथ मिलान कराया जाता है। अगर कैंडिडेट शिकायत करता है तो वहां के रिटर्निंग ऑफिसर के पास यह अधिकार होता है कि वह पूरी विधानसभा या फिर जरूरत के मुताबिक लोकसभा सीट पर पड़े सभी वोटों का सौ फीसदी वीवीपैट की पर्चियों के मिलान का आदेश दे सकता है।

विपक्ष चाहता है कि वीवीपैट की सभी पर्चियों को वोट देने वाले मतदाता को दिया जाए। फिर EVM में दिए गए वोट से संतुष्ट होते हुए उस पर्ची को वहीं एक बॉक्स में डाल दे, ताकि कोई उम्मीदवार किसी तरह की धांधली होने की शिकायत करता है या फिर कोर्ट जाता है तो उनका मिलान कराया जा सके। राजनीतिक पार्टियां चाहती हैं कि वीवीपैट में अभी जो पर्ची जनरेट होती है, वह तुरंत वहीं कटकर मशीन के अंदर ही ना गिरे, वह वोटर को मिले। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।

चुनाव आयोग और आयोग के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कहना है कि देशभर में 2017 के बाद से एक भी मामला ऐसा सामने नहीं आया, जिसमें ईवीएम में पड़े वोट और वीवीपैट की पर्चियों के रिजल्ट अलग-अलग आए हों। 2017 में गोवा में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान चार विधानसभा सीटों पर पड़ी वोट में गड़बड़ी की शिकायत की गई थी। इन चारों सीटों पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों का मिलान कराया गया। चारों के रिजल्ट सही निकले। रावत का सवाल है कि आज के दौर में भी सारी ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों का मिलान किया जाने लगा तो फिर ईवीएम का मतलब ही क्या रह जाएगा? उनका कहना है कि ऐसा किया जाने लगा तो देश फिर से बैलट पेपर युग में चला जाएगा। आज भारत में वोटों की गिनती होने के कुछ ही घंटे में रिजल्ट आपके सामने होता है जो दुनिया में सबसे अधिक तेज रिजल्ट देने वाला है।

शुरुआत में 479 पोलिंग स्टेशनों की वीवीपैट पर्चियों के मिलान की बात हुई थी। आयोग को यह कम लगे। आयोग ने कहा कि हर विधानसभा क्षेत्र का कम-से-कम एक पोलिंग स्टेशन को वीवीपैट की पर्चियों से मिलाया जाएगा। इसके बाद यह आंकड़ा बढ़कर 4,300 से भी अधिक पहुंच गया। बाद में कुछ राजनीतिक पार्टियां सुप्रीम कोर्ट चली गईं। कोर्ट ने एक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन की जगह हर विधानसभा के पांच पोलिंग स्टेशन पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों से मिलान की बात कही। अब पूरे देश में आम चुनाव के लिए बने 10 लाख 50 हजार पोलिंग स्टेशनों में 21 हजार से अधिक पोलिंग स्टेशनों पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों का मिलान कराया जाता है। आज तक एक भी पोलिंग स्टेशन का रिजल्ट ईवीएम और वीवीपैट में अलग-अलग नहीं निकला।

क्या देश में बढ़ रहे हैं अमीरी गरीबी के विवाद?

वर्तमान में देश में अमीरी गरीबी के विवाद बढ़ते ही जा रहे हैं! क्या भारत हाल के दशकों में तेज आर्थिक विकास के बावजूद आय और संपत्ति के बंटवारे के मामले में दुनिया के कुछ सबसे अधिक गैर-बराबर मुल्कों में से एक बनता जा रहा है? पेरिस स्थित World Inequality Lab की एक ताजा रिपोर्ट, ‘The Rise of the Billionaires Raj’ के मुताबिक, पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से भारत में तेजी से बढ़ रही आर्थिक गैर-बराबरी बीते साल 2022-23 में ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जो कि ब्रिटिशकालीन भारत के 1922 के दशक की तुलना में भी ज्यादा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आबादी में शीर्ष एक फीसदी सुपर अमीरों का देश की आय और संपत्ति में हिस्सा बढ़ते हुए क्रमशः 22.6% और 40.1% तक पहुंच गया है। इस मामले में भारत दुनिया के चुनिंदा देशों की सूची में सबसे ऊपरी पायदान पर पहुंच गया है।

यह रिपोर्ट बताती है कि देश में Dollar Billionaires की संख्या वर्ष 1991 में जहां सिर्फ एक थी, वह 2011 में बढ़कर 52 और 2022 में तिगुने से ज्यादा बढ़कर 162 हो गई। इन तीन दशकों में Billionaires की संपत्ति में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। कुल आय में उनका हिस्सा वर्ष 1991 में जहां एक फीसदी से भी कम था, वह 2022 में उछलकर 25% तक पहुंच गया। दरअसल, 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से तेज आर्थिक वृद्धि के बीच जहां एक ओर गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई, वहीं आर्थिक गैर-बराबरी में तेज बढ़ोतरी भी हुई। कई अर्थशास्त्री और सरकारी रिपोर्टें भी समय-समय पर इस विरोधाभास को उजागर करते रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा ताजा रिपोर्ट में पेश इन तथ्यों से लगाया जा सकता है… देश में शीर्ष 10% भारतीय राष्ट्रीय आय का 60% हिस्सा बटोर ले जाते हैं लेकिन निचली 50% आबादी के खाते में मात्र 15% हिस्सा ही आता है।वर्ष 2022-23 के आंकड़ों के मुताबिक, एक औसत भारतीय की सालाना आय 2.3 लाख रुपये है, लेकिन शीर्ष एक फीसदी सुपर अमीरों की औसत सालाना आय 53 लाख रुपये है, जो आम भारतीय की औसत सालाना आय से 23 गुणा ज्यादा है। आबादी के निचले 50% भारतीयों की औसत सालाना आय सिर्फ 71 हजार रुपये राष्ट्रीय औसत का एक तिहाई और बीच के 40% भारतीयों की औसत सालाना आय 1.65 लाख रुपये राष्ट्रीय औसत का लगभग दो तिहाई है। शीर्ष एक फीसदी सुपर अमीर राष्ट्रीय आय का 22.6% ले जाते हैं, लेकिन उनमें से भी शीर्ष 0.1%, 0.01% और 0.001% अमीरों के हिस्से में राष्ट्रीय आय का क्रमशः 10%, 4.3% और 2.1% आता है।

यह रिपोर्ट चार अर्थशास्त्रियों ने तैयार की है, जिनमें फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी के अलावा नितिन कुमार भारती, लुकास चांसेल और अनमोल सोमंची शामिल हैं। रिपोर्ट के लिए इन लोगों ने राष्ट्रीय आय, सकल परिसंपत्तियों, आयकर के आंकड़ों, अमीरों की सूचियों के अलावा आय-उपभोग और संपत्ति सर्वेक्षणों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने यह भी माना है कि भारत में आय और संपत्ति संबंधी आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं और उनमें कई विसंगतियां हैं। इस आधार पर कई आलोचक इस शोध रिपोर्ट के दावों पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं।

कुछ साल पहले जाने-माने अर्थशास्त्री प्रो. जगदीश भगवती और नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के बीच चली चर्चित बहस के केंद्र में भी यही सवाल था। मुद्दा यह था कि आर्थिक वृद्धि दर को तेज करने या राष्ट्रीय आय और संपत्ति के न्यायसम्य वितरण सुनिश्चित करने में से किसे प्राथमिकता देनी चाहिए? दूसरे, क्या नीति-निर्माताओं को गैर-बराबरी पर अंकुश लगाने के लिए सुपर अमीरों पर ऊंची दरों से टैक्स या संपत्ति कर लगाने जैसे कदम उठाने चाहिए? उनके मुताबिक, इससे आर्थिक गैर-बराबरी बढ़ती है तो उसे लेकर नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। उनका तर्क है कि भारत में पिछले तीन दशकों में तेज आर्थिक वृद्धि के कारण गरीबी कम करने में मदद मिली है। इसलिए पुनर्वितरण के बजाए आर्थिक वृद्धि पर जोर बना रहना चाहिए। इस कारण वे मानते हैं कि सुपर अमीरों पर टैक्स बढ़ाने या उनकी संपत्ति पर संपदा कर लगाने से निवेश पर उल्टा असर पड़ेगा और आर्थिक वृद्धि को धक्का लग सकता है।

नीति-निर्माताओं के लिए यह दुविधा का विषय है। लेकिन यहां गांधी जी की बात याद रखनी चाहिए कि कोई भी फैसला करने से पहले सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को याद करना और उसकी भलाई को तरजीह देनी चाहिए। यही नहीं, अब तो दुनिया भर में Billionaires की बड़ी संख्या सुपर अमीरों पर टैक्स की दरें बढ़ाने की मांग कर रही है ताकि गैर-बराबरी पर अंकुश लगाया जा सके और सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बड़ा और मजबूत बनाया जा सके। इस साल दावोस में 250 से ज्यादा Billionaires ने यह मांग दोहरा कर नीति-निर्माताओं के लिए रास्ता खोल दिया है।

क्या संजय सिंह की जमानत से आम आदमी पार्टी को मिलेगी राहत ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या संजय सिंह की जमानत से आम आदमी पार्टी को राहत मिलेगी या नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने आप नेता संजय सिंह को जमानत दी तो यह कानूनी सवाल उठ गया कि क्या दिल्ली शराब घोटाले के बाकी आरोपियों को भी इसका लाभ मिल सकेगा? हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि यह मामला नजीर नहीं बनेगा। तो क्या अन्य आरोपियों को इस फैसले का लाभ नहीं मिलेगा? वैसे कानूनी जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस ऑर्डर के बाद बाकी आरोपियों की ओर से भी जमानत की गुहार लगाई जा सकती है, लेकिन ईडी के रुख पर काफी कुछ निर्भर करेगा। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट विकास सिंह बताते हैं कि राइट टु साइलेंस भी मौलिक अधिकार है। किसी भी आरोपी को उसके चुप रहने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और कोई जांच एजेंसी यह नहीं कह सकती कि आरोपी चुप रहकर उसे सहयोग नहीं कर रहा है। सहयोग का मतलब यह नहीं है कि आरोपी गुनाह कबूल कर ले। तेलंगाना हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि चुप रहना भी मौलिक अधिकार है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट खुद अपने एक अन्य फैसले में कह चुका है कि ईडी के समन के बावजूद उसे सहयोग न करना गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता। साथ ही, रिमांड के वक्त यह देखना जरूरी है कि गिरफ्तारी वैलिड है या नहीं।

मौजूदा मामले में संजय सिंह छह महीने से जेल में थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संजय सिंह के पास से रिकवरी नहीं है। ईडी से सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या संजय सिंह को हिरासत में रखने की आवश्यकता है? संजय सिंह छह महीने से जेल में हैं। ईडी ने जब कहा कि उन्हें जमानत दिए जाने से आपत्ति नहीं है, तब सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी है। आबकारी नीति मामले में आप नेताओं की गिरफ्तारी हुई है और पहले नेता को जमानत मिली है। ऐसे में अब आनेवाले दिनों में बाकी आरोपियों के लिए एक राह जरूर बनी है, ताकि वे जमानत की अर्जी दाखिल कर सकें।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट एमएल लाहौटी बताते हैं कि अगर किसी आरोपी को दूसरे आरोपी से आमना-सामना न करना हो तो ऐसे आरोपी को जमानत मिलना मुश्किल होता है। हालांकि, अगर पूछताछ हो चुकी हो और आगे जांच के दौरान पूछताछ की जरूरत न हो तो उस आधार पर बाकी आरोपी भी जमानत की मांग कर सकते हैं। तब उस विशेष केस में ईडी का क्या रुख रहता है, यह भी अहम है क्योंकि मौजूदा मामले में ईडी ने सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर खुद कहा कि जमानत दिए जाने पर उसे आपत्ति नहीं है। ऐसे में बाकी मामलों में जब जमानत पर सुनवाई होगी, तब ईडी का रुख भी देखना होगा कि ईडी को कोई आपत्ति है या नहीं? या वह मेरिट पर जमानत का विरोध कर रही है। अगर मेरिट पर जमानत का ईडी विरोध करती है तो फिर उस केस विशेष में अदालत केस की मेरिट पर जमानत का फैसला देगी।

सीनियर क्रिमिनल लॉयर रमेश गुप्ता का कहना है कि संजय सिंह को जमानत देने का ईडी ने विरोध नहीं किया है। अब बाकी मामले में ईडी का रुख क्या होता है, यह भी देखना होगा। हालांकि अन्य आरोपियों की ओर से जमानत की अर्जी दाखिल किए जाने का रास्ता जरूर खुलेगा। वैसे भी, सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा था कि ट्रायल में अगर देरी हो तो आरोपी जमानत की अर्जी दाखिल कर सकता है। अभी हाल ही में 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पीएमएल की धारा 45 के संवैधानिक अधिकार को नहीं छीन सकता और यह सिसोदिया के केस में साफ किया जा चुका है। अगर ट्रायल में देरी हो रही है तो कोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के अधिकार पर कोई रोक नहीं है।

अदालत ने कहा था कि यहां अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और आजादी के अधिकार का मसला है। ऐसे में ट्रायल में देरी के आधार पर जमानत देने में कोई बाधा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग केस के ट्रायल में अगर देरी हो तो जमानत दिए जाने पर रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना ने मनी लॉन्ड्रिंग केस से संबंधित एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा था कि पीएमएलए एक्ट की धारा 45 ऐसे मामले में जमानत दिए जाने पर रोक नहीं लगाती है, जिसमें ट्रायल में देरी हो।

संजय सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट में ईडी ने कहा है कि उन्हें जमानत दिए जाने पर आपत्ति नहीं है। अब ऐसे में बाकी मामले में यह सवाल उठेगा कि क्या अन्य मामले में भी आरोपी को हिरासत में रखना जरूरी है? तब ईडी का जवाब देखना दिलचस्प होगा। हालांकि ट्रायल में होने वाली देरी के आधार पर भी जमानत अर्जी दाखिल की जा सकती है। गौरतलब है कि इस मामले में आप नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन, बीआरएस नेता के. कविता आदि जेल में हैं।