Thursday, March 5, 2026
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आखिर नुसरत जहां को ममता बनर्जी ने क्यों किया दूर?

हाल ही में ममता बनर्जी ने नुसरत जहां को अपने से दूर कर दिया है! पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने रविवार को प्रदेश की सभी 42 लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची की घोषणा की। इस बार पार्टी ने कुछ मौजूदा सांसदों को उम्मीदवार नहीं बनाया है। इसमें नुसरत जहां का नाम प्रमुख है। टीएमसी ने बसीरहाट लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद नुसरत जहां की जगह अपने पूर्व सांसद हाजी नुरुल इस्लाम को मैदान में उतारा है। दरअसल एक तरफ पाम एवेन्यू फ्लैट कांड और दूसरी तरफ हालिया संदेशखाली घटना के चलते नुसरत जहां का नाम आगामी लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची से हटा दिया गया है। हालांकि इसको लेकर पहले भी अटकलें थीं लेकिन रविवार को सार्वजनिक बैठक में घोषित तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची के साथ तस्वीर साफ हो गई। बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी पार्टी नेतृत्व के एक वर्ग ने नुसरत जहां की उम्मीदवारी पर आपत्ति जताई थी। हालांकि अंतिम निर्णय तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी और पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लेना था। इस सीट से किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के प्रमुख लोगों को पार्टी में मनोनीत करने का निर्णय लिया गया है। हालांकि संदेशखाली के मामले में समीकरण कुछ हद तक बदल जाता है। संदेशखाली इसी लोकसभा क्षेत्र में आता है। पिछली बार इस सीट से भारी अंतर से जीत हुई थी। इस बार भी राज्य की सत्ताधारी पार्टी उसी लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहती है।आखिरकार नुसरत जहां का नाम उम्मीदवारों की लिस्ट से हटा दिया गया।

सांसद नुसरत जहां पर आरोप था कि वो पाम एवेन्यू संस्था से जुड़ी थीं। उस संस्था ने कई वरिष्ठ नागरिकों को ठगा है। ईडी के अधिकारियों ने नुसरत जहां से पूछताछ की। तृणमूल कांग्रेस उस घटना की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी। इसके अलावा पार्टी के एक वर्ग के बीच यह भी शिकायत थी कि बशीरहाट सीट के जिला स्तरीय नेतृत्व से उनका जुड़ाव काफी कम हो गया है। लोकसभा चुनाव से काफी पहले तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा केंद्रवार एक सर्वे कराया था। ऐसे में नुसरत जहां की इस सीट से स्वीकार्यता पर भी सवाल उठता है। दरअसल संदेशखाली में इतने सारे कांडों के बाद भी उन्हें एक बार भी संदेशखाली जाते हुए नहीं देखा गया। बीजेपी की तरफ से यहां से मोहम्मद शमी को उतारने की चर्चा है।पार्टी ने दूसरी अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती को भी टिकट नहीं दिया है। वे जादवपुर से चुनाव जीती थीं। इसको लेकर पहले भी अटकलें थीं लेकिन रविवार को सार्वजनिक बैठक में घोषित तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची के साथ तस्वीर साफ हो गई।पार्टी की एक और स्टार नेता सयानी घोष ने भी इस पर सवाल उठाए हैं।

बशीरहाट क्षेत्र में मुख्य रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते हैं। काफी समय से पार्टी के भीतर इस केंद्र में ‘नया चेहरा’ तलाशने का काम शुरू हो गया था। इस सीट से किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के प्रमुख लोगों को पार्टी में मनोनीत करने का निर्णय लिया गया है। हालांकि संदेशखाली के मामले में समीकरण कुछ हद तक बदल जाता है। संदेशखाली इसी लोकसभा क्षेत्र में आता है। पिछली बार इस सीट से भारी अंतर से जीत हुई थी। इस बार भी राज्य की सत्ताधारी पार्टी उसी लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहती है।

तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की 42 लोकसभा सीटों के लिए 30 उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कोलकाता की रैली में किया। इस में बंगाली फिल्म अभिनेत्री नुसरत जहां को पार्टी ने फिर से चुनाव मैदान में नहीं उतारा है। नुसरत जहां 2019 में टीएमसी के टिकट पर बशीरहाट से जीती थी। बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र में ही संदेशखाली आता है। बीजेपी की तरफ से यहां से मोहम्मद शमी को उतारने की चर्चा है।पार्टी ने दूसरी अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती को भी टिकट नहीं दिया है। वे जादवपुर से चुनाव जीती थीं। इसको लेकर पहले भी अटकलें थीं लेकिन रविवार को सार्वजनिक बैठक में घोषित तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची के साथ तस्वीर साफ हो गई। बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी पार्टी नेतृत्व के एक वर्ग ने नुसरत जहां की उम्मीदवारी पर आपत्ति जताई थी। हालांकि अंतिम निर्णय तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी और पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लेना था।उन्होंने कुछ दिन पहले लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देते हुए अपना त्यागपत्र ममता बनर्जी को सौंपा था।पार्टी ने जादवपुर से सयानी घोष को टिकट दिया है। पार्टी की तरफ बिहार से ताल्लुक रखने वाले पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद को बर्दवान पश्चिम से टिकट दिया गया है। तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी डायमंड हार्बर सीट से चुनाव लड़ेंगे।

क्या ममता बनर्जी को जीत दिला पाएंगे क्रिकेटर यूसुफ पठान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या क्रिकेटर यूसुफ पठान ममता बनर्जी को जीत दिला पाएंगे या नहीं! तृणमूल कांग्रेस टीएमसी ने 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए गुजरात के रहने वाले क्रिकेटर युसूफ पठान को राज्य की बहरामपुर लोकसभा से उम्मीदवार बनाया है। कोलकाता की रैली में युसूफ पठान मौजूद थे। रैली में उन्होंने थम्स अप करके लोगों का अभिवादन स्वीकार किया। रैली के बाद युसूफ पठान की मुलाकात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हुई। इस दौरान युसूफ पठान ने विक्ट्री साइन बनाकर अपनी खुशी का इजहार किया। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से बहरामपुर का टिकट मिलने के बाद युसूफ पठान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मैं ममता बनर्जी का सदैव आभारी हूं, कि उन्होंने टीएमसी परिवार में मेरा स्वागत किया और संसद में लोगों की आवाज बनने के लिए जिम्मेदारी सौंपी है। मैं लोगों के प्रतिनिधि के रूप में, गरीबों और वंचितों का उत्थान के काम करूंगा। यही मेरा कर्तव्य है। मैं यही हासिल करने की उम्मीद करता हूं। टीएमसी ने कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड पर हुई पार्टी की रैली को JonogorjonSabha का नाम दिया था।

युसूफ पठान गुजरात के वडोदरा शहर से ताल्लुक रखते हैं। वे काफी गरीब परिवार से आते हैं। उनके पिता वडोदरा शहर के बीचाेचीच एक पुरानी मस्जिद में रहते थे। मांडवी की इसी मस्जिद युसुफ और इरफान का बचपन बीता। दोनों पास के एक ग्राउंड में खेलने जाते थे। बाद में दोनों भाई टीम इंडिया और फिर आईपीएल के लिए खेले। युसूफ पठान को पशुओं से काफी प्रेम हैं। वे एनीमल लवर के तौर पर जाने जाते हैं। पठान परिवार में अभी तक कोई राजनीति में नहीं गया है। यह पहला मौका होगा जब युसूफ पठान राजनीति में कदम रख रहे हैं।

बहरामपुर सीट से अभी कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी सांसद हैं। कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा का नेता बनाया था। काफी विवादों के बाद भी पार्टी ने उन्हें लोकसभा में नेता के पद पर बरकरार रखा था। बहरामपुर सीट के समीकरण की बात करें तो यह सीट मुर्शीदाबाद जिले में आती है। इस सीट पर कुल मतदाताओं में 66 फीसदी मुस्लिम हैं।चौधरी 1999 से लगातार जीतते आ रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने ममता बनर्जी से बढ़ती तनातनी के बीच कहा था कि मैं चुनाव लड़कर और जीतकर यहां तक पहुंचा हूं। मैं जानता हूं कि कैसे लड़ना है और कैसे जीतना है। 2019 के चुनावों में अधीर रजंन को 45.43 फीसदी वोट मिले थे। तृणमूल कांग्रेस को 39.23 फीसदी, बीजेपी को 10.99फीसद वोट मिले थे। टीएमसी के मुस्लिम कार्ड से अधीर रंजन की जीत अधर में अटकने की संभावना जताई जा रही है। लोकसभा क्षेत्र की सात विधानसभा क्षेत्रों में छह पर टीएमसी और 1 पर बीजेपी का कब्जा है।

वहीं तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की हुगली सीट से रचना बनर्जी को उम्मीदवार बनाया है। रचना बनर्जी दीदी नंबर वन शो करके सुर्खियों में आई थी। उनके कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पहुंची थी। बंगाल में जबरदस्त लोकप्रियता रखने वाली रचन बनर्जी जो अपने शो दीदी नंबर-1 के जानी जाती हैं। तृणमूल कांग्रेस हुगली लोकसभा सीट से उन्हें उम्मीदवार घोषित किया है। जब ममता बनर्जी टेलीविजन शो में रचना बनर्जी के साथ नजर आई थी। तभी से उनके राजनीति में आने की अटकलें शुरू हो गई थीं। टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी रचना बनर्जी के शो में तीन मार्च को नजर आई थीं।

तृणमूल कांग्रेस की कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में भी रचना बनर्जी ममता बनर्जी के साथ चलीं। रैली में टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने रचना बनर्जी के नाम का ऐलान किया। रचना बनर्जी बांग्ला फिल्मों का जाना-पहचाना नाम हैं, हालांकि वे पिछले कई सालों से बड़े पर्दे से दूर थीं, लेकिन इसके बाद भी उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। वे टेलीविजन के जरिए टीआरपी के शिखर पर बैठी हुई हैं। वर्तमान में रचना बनर्जी पूरे बंगाल में दीदी नंबर 1 के नाम से जानी जाती हैं। 49 साल की रचना बनर्जी मिस कलकत्ता भी रह चुकी हैं। वे दीदी नंबर 1 शो होस्ट करती हैं। यह शो जी बांग्ला पर आता है। रचना बनर्जी ने पहली शादी अपने को स्टार सिद्वांत मोहपात्रा से की थी। इसके बाद 2004 में तलाक ले लिया था। रचना इसके बाद प्रोबल बासु के साथ बंधन में आई थीं। उन्होंने 2016 में उनसे भी तलाक ले लिया था। रचना बनर्जी के एक बेटा है।

तृणमूल कांग्रेस से टिकट मिलने के बाद हुगली की लड़ाई काफी दिलचस्प हो गई है। इस सीट पर दो हीरोईनों के बीच फाइट होगी। अभी यहां बीजेपी की लॉकेट चटर्जी सांसद हैं। लॉकेट पहले से ही राजनीति में अनुभवी थीं। रचना पहली बार इस लड़ाई में उतर रही हैं। तृणमूल उनके लिए प्रचार की रणनीति बना रही है। 2019 के चुनावों में बीजेपी की लॉकेट चटर्जी हुगली सीट से जीती थीं। बीजेपी ने टीएमसी से सीट छीन ली थी। 2014 और 2009 में यहां से टीएमसी की डॉ. रत्ना डे जीती थीं। 2019 में लॉकेट चटर्जी ने डॉ रत्ना डे को 73,362 वोटों से हराया था।

क्या बंगाल में ममता और कांग्रेस के बीच चल रही है खटास?

वर्तमान में बंगाल में ममता और कांग्रेस के बीच खटास चल रही है! राजनीति में कब कौन दोस्त से विरोधी बन जाए कोई नहीं जानता। बंगाल की सियासत में कुछ ऐसा ही घटनाक्रम सामने आया जब विपक्षी INDIA गठबंधन में शामिल रहीं ममता बनर्जी की टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में अपने कैंडिडेट्स के नाम का ऐलान कर दिया। कांग्रेस लगातार इस कोशिश में थी ममता बनर्जी से वार्ता कर उन्हें गठबंधन में जोड़े रखा जाए। हालांकि, ममता के मन में तो कुछ और ही था। यही वजह है कि उन्होंने काफी पहले साफ कर दिया था कि वो अकेले चुनाव मैदान में उतरेंगी। उनका कांग्रेस से गठबंधन का कोई प्लान नहीं था। अब उन्होंने बंगाल की सभी 42 सीटों पर कैंडिडेट उतार भी दिए और कांग्रेस देखती रह गई। इतना ही नहीं टीएमसी नेतृत्व ने कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी के सामने कड़ी चुनौती पेश कर दी है। पार्टी ने अधीर रंजन के सामने पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को उम्मीदवार बनाया है। जैसे ही अधीर Vs यूसुफ पठान का नाम आया तो हर किसी के मन में सवाल यही उठे कि क्या दीदी ने कांग्रेस के इस दिग्गज को उनकी मौजूदा संसदीय सीट पर ही फंसा दिया। हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट की, जहां से कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी सांसद हैं। वो पांच बार से लगातार इस सीट पर चुने जाते रहे हैं। 1999 में पहली बार उन्होंने यहां से जीत दर्ज की। उसके बाद अधीर रंजन चौधरी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2019 लोकसभा चुनाव में वो लगातार 5वीं बार यहां से सांसद बने। हालांकि, 2024 को लेकर ममता बनर्जी ने तगड़ा दांव चलते हुए पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को उनके मुकाबले में उतार दिया। जैसे ही टीएमसी ने उम्मीदवारों का नाम घोषित किया सवाल यही उठे कि क्या जानबूझकर ममता दीदी ने ये दांव चला है।

दरअसल, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी हमेशा से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ बयानबाजी में एक्टिव रहे। INDI अलायंस के दौरान भी कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश ममता बनर्जी को साथ रखने की थी लेकिन अधीर रंजन का अंदाज बिल्कुल अलग था। उन्होंने इस गठबंधन का लगातार विरोध किया। खुद टीएमसी की ओर से साफ कर दिया गया था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं होने में बड़ा रोल अधीर रंजन चौधरी का था। अब जिस तरह से 2024 के रण में टीएमसी ने बहरामपुर की सियासी पिच पर पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को उतारा वो किसी मास्टरस्ट्रोक से कम नहीं लग रहा।

ऐसा इसलिए क्योंकि बहरामपुर सीट बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में आती है। इस इलाके को लेकर कहा जाता है कि यहां कुल मतदाताओं में 66 फीसदी मुस्लिम हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में अधीर रंजन ने 45.43 फीसदी वोट हासिल कर शानदार जीत दर्ज की थी। वहीं तृणमूल कांग्रेस की बात करें तो उन्हें 39.23 फीसदी और बीजेपी को 10.99 फीसदी वोट मिले थे। इस क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों को ज्यादा संख्या को ध्यान में रखते हुए ही टीएमसी ने मुस्लिम कार्ड चला है। पार्टी को लग रहा कि यूसुफ पठान के चुनाव मैदान में आने से वोट बंट सकते हैं। ऐसे में अधीर रंजन की सीट फंस सकती है। ये इसलिए भी है क्योंकि बीजेपी भी इस सीट पर दावेदारी करेगी। बहरामपुर लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो इस इलाके में सात विधानसभाएं भी आती हैं। मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो सात में से छह सीटें टीएमसी और एक सीट पर बीजेपी का कब्जा है। हालांकि, खुद अधीर रंजन चौधरी राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं। ऐसे में वो कोई ऐसा चांस नहीं लेंगे जिससे बहरामपुर सीट पर कोई खेला न हो जाए। वैसे भी वो 2014 और 2019 में मोदी लहर के बावजूद अपनी सीट को अच्छे मार्जिन से बचाते आए हैं।

बात करें युसूफ पठान की तो उन्होंने क्रिकेट के मैदान में बैटिंग और बॉलिंग दोनों ही क्षेत्रों में अच्छी खासी सुर्खियां बटोरी। उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट के साथ-साथ आईपीएल में भी शानदार प्रदर्शन किया। यूसुफ पठान 2007 में हुए टी-20 वर्ल्ड कप और 2011 में वनडे विश्वकप जीतने वाली टीम इंडिया का हिस्सा भी रहे। वो गुजरात के वडोदरा शहर के रहने वाले हैं। अभी तक उनके परिवार से किसी ने राजनीति में एंट्री नहीं मारी। हालांकि, ममता बनर्जी ने इस चुनाव में उन्हें कांग्रेस दिग्गज अधीर रंजन के मुकाबले में उतारने का फैसला लिया। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि यूसुफ पठान जिस तरह से क्रिकेट की पिच पर धुआंधार बैटिंग के लिए जाने जाते थे, क्या राजनीति के मैदान में भी उसी तेवर से उतरेंगे। हालांकि, उनके चुनावी रण में एक बड़ा फैक्टर ‘बाहरी’ कैंडिडेट का भी होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि यूसुफ गुजरात से हैं। ऐसे में क्या बहरामपुर की आवाम उन पर अपना भरोसा जताएगी?

दुनिया के सबसे खतरनाक एनाकोंडा में से एक!

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इसी संगठन की वन्यजीव व्यापार पर ‘कार्गो ऑफ क्रुएल्टी’ नाम से एक रिपोर्ट है। इसमें कहा गया है कि पश्चिम अफ्रीकी देशों में खेतों पर बॉल पाइथॉन का व्यापार बहुत खराब है। उन्हें फार्म में बहुत ही अस्वच्छ परिस्थितियों में रखा जाता है। कई बार तो ये क्रूरता की हद तक पहुंच जाता है. दरअसल, बॉल पाइथॉन सभी व्यापार कानूनों का उल्लंघन करते हुए घाना, टोगो और बेनिन के बीच व्यापार करता है। ये सब उस सांप के अस्तित्व के लिए बेहद खतरनाक है. बात यहीं ख़त्म नहीं होती. संकट के और भी कारण हैं. शोध से पता चलता है कि पश्चिम अफ्रीका के साथ-साथ अन्य देशों में बॉल अजगर का प्रजनन करने वाले लोग सांप की प्रजनन प्रक्रिया को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करते हैं। वे अधिक अंडे और बच्चे पैदा करने के उद्देश्य से कृत्रिम रूप से प्रजनन बढ़ाते हैं। इतना ही नहीं, सांपों को इस तरह से पाला जाता है कि बॉल पाइथॉन को अलग-अलग रंग यानी ‘कलर मॉर्फ’ मिल जाते हैं, जिससे उन्हें शारीरिक नुकसान होता है।

टोगो और बेनिन में बॉल पायथन शिकारियों ने हाल ही में शोधकर्ताओं को बताया कि पांच साल पहले जंगल में पाए जाने वाले सांपों की संख्या अब नहीं रही। बॉल पायथन के शोधकर्ता और पक्षी विज्ञानी नील डेक्रूज़ के अनुसार, इस सांप को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा ‘असुरक्षित’ घोषित किया गया है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने अपने देशों में पश्चिम अफ्रीका से निर्यात होने वाले बॉल पायथन पर प्रतिबंध लगा दिया है। बॉल पाइथॉन का व्यापार इस स्तर तक पहुंच गया है कि साइटें साँप के व्यापार के विभिन्न पहलुओं की फिर से जांच कर रही हैं।

‘एक देश एक वोट’ चाहती थी रामनाथ कोविंद कमेटी, ‘सर्वसम्मति से’ तैयार रिपोर्ट में क्या हैं सिफारिशें?

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लोकसभा-विधानसभा ही नहीं. रामनाथ कोविन्द समिति की रिपोर्ट में बाद में नगर पालिकाओं और पंचायतों को भी ‘एक वोट’ प्रक्रिया में शामिल करने की बात कही गई है। पूरे देश में ‘एक देश एक वोट’ (एक देश एक चुनाव) की व्यवस्था तुरंत लागू की जानी चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी रिपोर्ट में यह सिफारिश की है. गुरुवार को कोविंद, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और समिति के अन्य सदस्यों ने राष्ट्रपति भवन जाकर द्रौपदी को रिपोर्ट सौंपी. प्रकाशित खबर में दावा किया गया है कि अनुशंसा है.

कोविंद ने कहा कि आठ खंडों में विभाजित 18,000 पन्नों की रिपोर्ट समिति के सदस्यों की सहमति के आधार पर तैयार की गई थी। इसी हफ्ते लोकसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना ​​है कि उससे पहले इस कदम को लेकर नया विवाद पैदा होने की आशंका है. संयोग से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश भर में लोकसभा चुनावों के साथ सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने के उद्देश्य से पिछले साल 1 सितंबर को समिति का गठन किया था। छह महीने तक संवैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं की समीक्षा करने के बाद, कोविंद समिति ने 2029 से ‘एक देश, एक वोट’ नीति के कार्यान्वयन के लिए कई सिफारिशें कीं। इसमें लोकसभा और सभी विधान सभाओं में एक साथ मतदान कराने के लिए आवश्यक वैकल्पिक कानूनी और प्रशासनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण का आह्वान किया गया है। समिति ने ‘एक देश एक वोट’ के क्रियान्वयन को सही ठहराते हुए सबसे पहले विकास और वित्तीय वृद्धि का जिक्र किया. रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक मतदान से पहले अलग से मानक चुनाव नियमों की घोषणा से विकास कार्यक्रम बाधित होते हैं। जिसका वित्तीय विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। एकजुट होकर मतदान करने से इससे बचा जा सकता है।

लोकसभा-विधानसभा ही नहीं. बाद में, कोविन्द समिति ने कहा कि ‘एक वोट’ कार्यक्रम को नगर पालिकाओं और पंचायतों तक भी बढ़ाया जाएगा। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि अगले चरण में लोकसभा-विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के भीतर नगर निगम और पंचायत चुनाव कराने की भी व्यवस्था की जानी चाहिए। समिति के मुताबिक इस मामले में एक मतदाता सूची काम करेगी. सरकारी एवं नगर पंचायतों के कर्मचारियों को अन्य सेवाओं में नियोजित करना संभव हो सकेगा।

विपक्षी दल पहले ही सवाल उठा चुके हैं कि ‘एक वोट’ प्रणाली लागू होने के बाद अगर केंद्र या राज्य में चुनी गई कोई सरकार पांच साल पहले ही गिर जाए तो क्या होगा? इस संबंध में, कोविन्द समिति की रिपोर्ट में सिफारिश की गई कि यदि आवश्यक हो तो शेष अवधि के लिए चुनाव अलग से आयोजित किए जा सकते हैं। लेकिन भारतीय संविधान के अनुसार चुनी हुई सरकार का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है। परिणामस्वरूप, मोदी सरकार को इस मामले में संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

संयोग से, विपक्षी दल शुरू से ही ‘एक देश एक वोट’ प्रणाली की आलोचना करते रहे हैं। उनके मुताबिक, इस नीति के जरिए मोदी सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव शैली की प्रणाली को घुमा-फिरा कर पेश करने की कोशिश कर रही है. विपक्षी नेतृत्व ने यह भी आरोप लगाया कि यह संघीय ढांचे और संसदीय लोकतांत्रिक सोच के खिलाफ है. खासकर बीजेपी विरोधी क्षेत्रीय दलों को डर है कि अगर ‘एक देश, एक वोट’ की नीति लागू की गई तो लोकसभा की ‘लहर’ में विधानसभाएं ‘बह’ जाएंगी.

कांग्रेस, तृणमूल, सीपीएम समेत विभिन्न विपक्षी दलों का आरोप है कि संघीय ढांचे में सांसदों और विधायकों के चुनाव में जो विविधता संभव है, वह बीजेपी के आक्रामक अभियान के सामने ध्वस्त हो जाएगी. वे पहले ही ‘एक देश, एक वोट’ नीति के ख़िलाफ़ आगे बढ़ चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग के अनुसार, भाजपा की गणना यह है कि यदि लोकसभा चुनाव होते हैं तो विपक्षी दलों के लिए सीटों से समझौता करना आसान होगा। लेकिन साथ ही, यदि विधानसभा वोटों को जोड़ा जा सके, तो कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय दलों का टकराव अपरिहार्य है।

हालाँकि, लोकसभा चुनाव के साथ सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने के पीछे मोदी सरकार का तर्क यह है कि इससे चुनाव की लागत कम हो जाएगी। एक वोटर लिस्ट में दो चुनाव होने से सरकारी कर्मचारियों पर काम का बोझ कम हो जायेगा. चुनाव आचार संहिता के कारण सरकार के विकास कार्य बार-बार नहीं रुकेंगे। केंद्र का दावा है कि नीति आयोग, विधि आयोग, चुनाव आयोग ने भी इस विचार को नीतिगत समर्थन दिया है. संयोग से, 2014 में पहली बार प्रधान मंत्री पद की शपथ लेने के बाद, मोदी ने ‘एक देश एक वोट’ की अवधारणा को सार्वजनिक किया था। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने पिछले बादल सत्र में राज्यसभा में कहा था कि केंद्र ‘एक देश, एक वोट’ लागू करने के लिए विधि आयोग से संपर्क करेगा.

ईडी के गिरफ्त में है शाहजहां! ईडी की ओर से दो गाड़ियों को जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई हैl

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ईडी ने शाहजहां और भाई की कार का पता लगाया, दुकान मालिक ने कहा, ‘मैंने पुलिस को सूचित कर दिया है’ जिस दुकान में कार रखी गई थी, उसके मालिक ने बताया कि उनके बड़े बेटे ने शाहजहां को यह जगह किराए पर दी थी। उन्होंने मामले की मौखिक सूचना स्थानीय थाने को भी दी. सीबीआई को शाहजहां शेख के फोन के बारे में जानकारी मिली. इसी सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को निलंबित तृणमूल नेता शाहजहां की एक कार के बारे में पता चला। जासूसों ने उसके भाई आलमगीर की एक कार का भी पता लगाया है। गाड़ी संदेशखाली के शाहजहां मार्केट के पास एक किराना दुकान के गोदाम के पास खड़ी थी. ईडी का दावा, इन्हें छुपाया गया. जिस दुकान में कार रखी गई थी, उसके मालिक ने  बताया कि उनके बड़े बेटे ने यह जगह शाहजहां को किराए पर दी थी। उन्होंने मामले की मौखिक सूचना स्थानीय थाने को भी दी. ईडी की ओर से दो गाड़ियों को जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

शाहजहां मार्केट में किराने की दुकान है. इसके साथ ही गोदाम है. गोदाम का दरवाजा बंद था. ईडी के अधिकारियों ने खोला ताला. इसके बाद देखा जा सकता है कि गोदाम में आइसक्रीम फ्रीजर है. चार गाड़ियाँ हैं. इनमें से एक शाहजहाँ का और दूसरा उसके भाई आलमगीर का है। वे ‘थोर’ और एसयूवी कारें हैं। दुकान के बगल वाले गोदाम में जहां कार रखी हुई थी, दुकान के एक कर्मचारी ने कहा, ”मुझे नहीं पता कि यह किसकी कार है.” ड्राइवर कार रखता है, मुझे पता है.” उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने शाहजहां को कार रखते नहीं देखा.

मोसेलेम शेख, जिसके स्थान पर कार रखी गई थी, उन्होंने कहा कि उनके बड़े बेटे ने कार रखने के लिए शाहजहां को 3000 टका में जगह किराए पर दी थी। पिछले दिसंबर तक. मोसेलेम ने कहा कि उस वक्त वह संदेशखाली में नहीं थे. जब शाहजहाँ का मामला सामने आया तो वह स्थानीय पुलिस स्टेशन गया और मौखिक रूप से कार रखने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने कार को पुलिस स्टेशन से दूर ले जाने की ‘सलाह’ दी थी.

ईडी के अधिकारियों ने शाहजहां शेख के खिलाफ आयात-निर्यात मामले में गुरुवार को संदेशखाली के कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया। उन्होंने धमाखाली के पास एक थोक मछली बाजार और बाजार के भागीदारों में से एक नजरुल मोल्ला के घर की भी तलाशी ली। इसके बाद शाहजहां मार्केट स्थित गोदाम को खुलवाकर तलाशी ली गई। वहां चार कारें दिखीं. इनमें से एक का नाम शाहजहाँ के नाम पर और दूसरे का नाम उसके भाई आलमगीर के नाम पर रखा गया है।

उधर, शाहजहां के फोन के बारे में भी सीबीआई को अहम जानकारी मिली है. जांच एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक, उन्हें पता चला है कि फोन नष्ट नहीं किया गया था. उन्हें इस बारे में भी कुछ जानकारी मिली कि फोन कहां हो सकता है. सीबीआई सूत्रों के मुताबिक ये सारी जानकारी खुद शाहजहां ने पूछताछ के दौरान दी. शाहजहां ने जांचकर्ताओं को बताया कि उसने यह जानते हुए फोन हटा दिया कि यह खतरनाक हो सकता है।

सीबीआई को लगता है कि ईडी पर हमले में शाहजहां का फोन अहम सुराग है. उन्हें ये भी लगता है कि शाहजहां के फोन में कई अहम जानकारियां हो सकती हैं. ईडी मामले के अलावा राशन भ्रष्टाचार मामला और यहां तक ​​कि गुरुवार को संदेशखाली में जिस नए आयात-निर्यात भ्रष्टाचार मामले की जांच ईडी कर रही है, उसमें शाहजहां के मोबाइल फोन से कई अज्ञात सूत्र हाथ लग सकते हैं.

अदालत ने संदेशखालिक मामले में गिरफ्तार शाहजहां शेख को अगले आठ दिनों तक सीबीआई हिरासत में रखने का आदेश दिया. बशीरहाट अदालत ने उन्हें उसी मामले में आठ दिनों के लिए सीबीआई हिरासत में भेजने का आदेश दिया, जिस मामले में पुलिस ने नजत पुलिस स्टेशन में स्वत: संज्ञान मामला दर्ज किया था। इसके अलावा, सीबीआई ने उन सात लोगों को भी हिरासत में रखने का अनुरोध किया, जिन्हें संदेशखालिकांडे मामले में राज्य पुलिस ने गिरफ्तार किया था. बशीरहाट कोर्ट ने सातों आरोपियों को पांच दिन तक सीबीआई की हिरासत में रखने का आदेश दिया.

इससे पहले कोर्ट ने शाहजहां के खिलाफ ईडी अधिकारियों पर हमले के आरोप में दर्ज मामले में शाहजहां को 14 मार्च तक सीबीआई की हिरासत में भेजने का आदेश दिया था. गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई के वकील ने दावा किया कि अगर अब शाहजहां को जमानत दी गई तो केस पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा, सीबीआई ने नजत पुलिस स्टेशन में पुलिस द्वारा शाहजहां के खिलाफ दर्ज मामले में आरोपियों की 14 दिन की हिरासत भी मांगी। शाहजहां के वकील ने दलील दी कि सीबीआई उसे रिमांड पर लेने की दलील नहीं दे सकती. हालाँकि, सीबीआई के अनुरोध के जवाब में, बशीरहाट अदालत ने पुलिस द्वारा शुरू किए गए मामले में शाहजहाँ को सीबीआई हिरासत में रखने का आदेश दिया। हालांकि, उन्हें 14 दिन की बजाय आठ दिन तक सीबीआई की हिरासत में रहना होगा.

गौरतलब है कि राशन वितरण भ्रष्टाचार मामले में ईडी अधिकारियों ने 5 जनवरी को संदेशखाली के सरबेरिया स्थित शाहजहां के घर पर छापेमारी की थी. लेकिन ईडी के अधिकारियों को वहां जाकर ‘परेशान’ होना पड़ा. शाहजहाँ की सेना पर हमले का आरोप। उसके बाद ‘संदेशखाली के बाघ’ के नाम से मशहूर शाहजहाँ 55 दिनों तक लापता रहा। उन्हें राज्य पुलिस ने 56 दिनों के बाद 29 फरवरी को गिरफ्तार किया था। बशीरहाट अदालत ने उन्हें 10 दिन की हिरासत में भेजने का आदेश दिया. वह सीआईडी ​​की हिरासत में थे. बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने शाहजहां को सीबीआई को सौंपने को कहा. संदेशखालिकांडे की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई के हाथ में है.

TMC ममता बनर्जी को लगी बड़ी चोट

गंभीर रूप से घायल हुईं मुख्यमंत्री, माथा फटा और बह रहा खून, एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने गृह परिसर में टहलने के दौरान गिरने से गंभीर रूप से घायल हो गईं। उन्हें एसएसकेएम अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल सूत्रों के मुताबिक उनके माथे पर टांके लगाए जाएंगे. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने घर के परिसर में टहलने के दौरान गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गईं। उन्हें एसएसकेएम अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल सूत्रों के मुताबिक उनके माथे पर टांके लगाए जाएंगे. तृणमूल के एक्स हैंडल (पूर्व में ट्विटर) ने ममता के माथे के फटने की तस्वीर जारी की है. सामने आई तस्वीर में ममता प्रेतवाधित अवस्था में नजर आ रही हैं।

तृणमूल सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ममता गुरुवार को कालीघाट आवास परिसर में टहल रही थीं. उसी समय वह किसी तरह गिर गया। आगे गिरने के कारण माथे पर चोट लग गयी. खून निकलने लगा. जब उन्हें पहली बार घर के अंदर ले जाया गया, तो उन्हें तुरंत एसएसकेएम अस्पताल में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। डॉक्टरों ने कहा कि माथे पर टांके लगाने होंगे. अस्पताल सूत्रों के मुताबिक, ममता के जख्म काफी गहरे हैं। लेकिन खून बंद कर दिया गया है. सीटी स्कैन कराया जाएगा. मेडिकल बोर्ड का भी गठन किया जा रहा है. मुख्यमंत्री डॉक्टरों की निगरानी में हैं. अस्पताल सूत्रों के मुताबिक, ममता अब बेहोश नहीं हैं.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने ट्वीट कर मुख्यमंत्री के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने एक्स हैंडल पर लिखा, ”मैं बंगाल की मुख्यमंत्री के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूं.” मुख्यमंत्री के घायल होने की खबर मिलते ही घाटल से निवर्तमान तृणमूल सांसद देब ने पार्टी की बैठक रोक दी. इसके बाद वह घाटल के विशालाक्षी मंदिर में पूजा करने गये.

तृणमूल सूत्रों के मुताबिक, गुरुवार शाम जब यह घटना हुई तब तृणमूल के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ममता के कालीघाट स्थित घर पर थे. ममता को उनकी कार से एसएसकेएम अस्पताल ले जाया गया. अभिषेक ने गुरुवार दोपहर जलपाईगुड़ी के मैनागुड़ी में बैठक की. वहां से कोलकाता लौटने के बाद वह सीधे अभिषेक के लिए कालीघाट स्थित ममता के घर पहुंचे। वे मुख्यमंत्री से मिलने गये. हादसे के वक्त अभिषेक घर पर ही थे। अभिषेक ने करीबियों को बताया कि मुख्यमंत्री के माथे पर गहरा घाव है. यह तुरंत स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे हुआ. लेकिन माना जा रहा है कि ममता चलते-चलते गिर गईं।

इसके अलावा और भी कई संभावनाएं सामने आई हैं. ममता के करीबी लोगों का कहना है कि इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि घर में टहलते समय वह किसी से टकरा गई हों या किसी ने उन्हें धक्का दिया हो या नहीं.

अभिषेक के साथ लता बनर्जी, फिरहाद हकीम, माला रॉय, सुब्रत बख्शी, शोवनदेव चट्टोपाध्याय एसएसकेएम अस्पताल गए। छोटे भाई बाबुन बनर्जी भी गये. बुधवार को बबून की टिप्पणी से राज्य की राजनीति सक्रिय हो गयी. बाबुन ने लोकसभा चुनाव में हावड़ा दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार के रूप में मैदान में नहीं उतारे जाने पर अपना गुस्सा व्यक्त किया। इस बारे में शोर पढ़कर ममता ने कठोर भाषा में उनकी निंदा की। उसने छोटे भाई को धमकी दी और घोषणा की कि वह उससे सारे रिश्ते तोड़ देगा। (यह समाचार अभी प्रकाशित हुआ है। विवरण शीघ्र ही आ रहे हैं। कुछ देर बाद पेज को ‘रिफ्रेश’ करें, आपको नवीनतम समाचार दिखाई देगा। समाचार को त्वरित रूप से वितरित करते समय भी हमें सूचना की सच्चाई से अवगत रहना होगा। इसीलिए कोई भी ‘ समाचार’ (हम इसे तब तक प्रकाशित नहीं करते जब तक हम इसके बारे में आश्वस्त न हों। ‘फर्जी समाचार’ के समय में यह दृष्टिकोण और भी महत्वपूर्ण है)।

क्या लोकसभा चुनाव के साथ प्रदेश की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा होगी? चुनाव आयोग इस पर विचार कर रहा है. बरहनगर और भागबंगोला दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में वर्तमान में कोई विधायक नहीं है। उपचुनाव पर अंतिम फैसला लेने के लिए आयोग शुक्रवार को बैठक करेगा. राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय इस संबंध में शुक्रवार सुबह 11 बजे बैठक करेगा. मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना के जिलाधिकारी वहां रहेंगे. इदरीस अली मुर्शिदाबाद की भागबंगोला सीट से विधायक थे. 16 फरवरी को उनका निधन हो गया। जिसके चलते वह सीट खाली हो गई है. बराहनगर सीट भी फिलहाल खाली है. क्योंकि तापस रॉय ने उस केंद्र के विधायक पद से इस्तीफा दे दिया है. इसके बाद वह 6 मार्च को तृणमूल छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. इन दोनों केंद्रों पर छह महीने के भीतर उपचुनाव होने हैं. इसके मुताबिक सीईओ कार्यालय शुक्रवार को बैठक में चर्चा कर जानकारी आयोग के दिल्ली मुख्यालय को भेजने जा रहा है।

जानिए 28 बार शादी करने वाले सांसद की कहानी!

आज हम आपको 28 बार शादी करने वाले सांसद की कहानी सुनाने जा रहे हैं! खुला बदन, शरीर पर सिर्फ एक धोती और नंगे पांव बिना चप्पल-जूते पहने कई किलोमीटर की पैदल यात्रा करने वाले बागुन सुम्ब्रुई की पहचान पूरे देश में बहुपत्नियों के लिए भी हैं। बागुन सुम्ब्रुई के बारे में कहा जाता है कि अपने 94 साल के जीवन काल में उन्होंने 58 महिलाओं से शादी की। बहुपत्नी प्रथा के समर्थक बागुन सुम्ब्रुई कई महिलाओं के साथ शादी की बात खुद भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते थे। वर्ष 2018 में निधन के कुछ महीने पहले एक साक्षात्कार में बागुन सुम्ब्रुई ने बताया कि बहुपत्नियों का मामला एक बार बिहार विधानसभा में भी उठा। उनकी पत्नियों के बारे में एक रिपोर्ट भी तैयार की गई, जिसमें 28 महिलाओं ने खुद को बागुन सुम्ब्रुई का पति बताया था। बागुन सुम्ब्रुई खुद स्वीकार करते थे कि उन्होंने वैसी महिलाओं को अपना संरक्षण दिया, तो परित्यक्ता, विधवा और सामाजिक प्रताड़ना की शिकार थी। ऐसी महिलाएं उनके पास आती थी, तो बागुन सुम्ब्रुई हरसंभव मदद करते थे। बागुन बताते थे कि कुछ महिलाएं उनके पास सिर्फ इसलिए आती थी कि वो अपना नाम उनके साथ जोड़ कर सरकारी नौकरी या अन्य योजनाओं का लाभ लेने की कोशिश करती थी। इसमें कई महिलाओं को कामयाबी भी मिली। बागुन ये भी कहते थे कि अपने जीवनकाल में कभी वे किसी महिला के पीछे नहीं भागे, बल्कि जिस भी महिला को उनसे शादी करनी होती थी वे खुद उनके पास आती थी। महिलाएं निराश न हो, इस वजह से वो उनसे शादी कर लेते थे। कई आदिवासी महिलाएं शोषण का शिकार होने के बाद उनके पास पहुंचती थी। ऐसी लड़कियों को भी उन्होंने सहारा देने का काम किया। इनमें से जब किसी महिला को कोई नया साथी मिला तो वे उन्हें छोड़कर चली भी गईं। हालांकि उन्हें किसी के आने या जाने पर कोई ऐतराज नहीं था।

सांसद और विधायक के साथ कोल्हान क्षेत्र के कद्दावर नेता रहे बागुन सुम्ब्रुई ने इतनी शादियां की, कि उनमें से कई महिलाओं का नाम उन्हें अंतिम समय में याद तक नहीं रहा। हालांकि करीब 94 साल के अपने जीवन में उन्होंने पांच पत्नियों और कई बच्चों के साथ लंबे समय तक पारिवारिक जीवन बिताया। पांच पत्नियों में दशमती सुम्ब्रई, चंद्रवती सुम्ब्रई, पूर्व मंत्री मुक्तिदानी सुम्ब्रई, दयंती सुम्ब्रई और अनिता बलमुचू सुम्ब्रई शामिल हैं। इनमें से दशमती, चंद्रवती और मुक्तिदानी की मौत काफी पहले ही हो गई थी, जबकि अंतिम समय में दयतंती सुम्ब्रई अलग रहती थी और बागुन सुम्ब्रई अनिता बलमुचू सुम्ब्रई के साथ रहते थे।

बागुन सुम्ब्रुई अलग झारखंड राज्य आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक थे। झारखंड आंदोलन की कमान संभालने के बाद बागुन सुम्ब्रुई ने ‘बिहार झारखंड छोड़ो’ का नारा दिया। बागुन सुम्ब्रई ने 1980 के दशक में आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने का काम किया। इस आंदोलन में स्थानीय जनजातीय ‘हो’ भाषा नहीं जानने वाले 480 बाहरी शिक्षकों को चिह्नित किया गया। इन सभी को खदेड़ कर क्षेत्र से भागने के लिए मजबूर कर दिया गया। बागुन सुम्ब्रुई के नेतृत्व में आंदोलन इतना उग्र हुआ कि बाहरी शिक्षक, कर्मचारी और ठेकेदार को पकड़कर उनपर भेलवा तेल ज्वलनशील तेल डाल दिया जाने लगा। इस आंदोलन में बागुन पूरे कोल्हान क्षेत्र में नायक के रूप में उभरे।

अलग झारखंड राज्य की आवाज 1947 में आजादी मिलने के साथ ही उठने लगी थी। बागुन सुम्ब्रुई ने जयपाल सिंह मुंडा के साथ मिलकर लंबे समय तक संघर्ष किया। इस बीच जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी ‘झारखंड पार्टी’ का विलय कांग्रेस में कर दिया, तो बागुन सुम्ब्रुई ने ‘अखिल झारखंड पार्टी’ का गठन कर आंदोलन को धारदार बनाने की कोशिश की। आंदोलन के दौरान 1968 में बागुन सुम्ब्रुई को गिरफ्तार कर लिया गया। पहले उन्हें पटना ले जाया गया, बाद में हजारीबाग केंद्रीय कारा में रखा गया। अलग झारखंड राज्य नहीं मिलने से बागुन सुम्ब्रुई काफी आक्रोशित रहते थे। कभी-कभी उन्हें लगता था कि अब अलग राज्य उनके जीवित रहते नहीं मिलेगा। इसलिए उन्होंने आंदोलन के दौरान पैदा हुए पुत्र का नाम ‘हिटलर’ रख दिया। बागुन सुम्ब्रुई का मानना था कि अगर वे अलग राज्य लेने में असफल रहते हैं, तो उनका बेटा हिटलर अवश्य अलग राज्य ले लेगा। बेटे का नाम विमल सुम्ब्रुई उर्फ हिटलर हैं।

बागुन सुम्ब्रुई ने 1967 में पहली बार चाईबासा विधानसभा सीट से जीत हासिल की। लेकिन दो साल बाद ही फिर से उन्हें चुनाव का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1969, 1972 और 2000 में भी वे चाईबासा विधानसभा सीट से निर्वाचित हुए। साल 1977 में बागुन सुम्ब्रुई पहली बार सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र के सांसद निर्वाचित हुए। इसके बाद 1980, 1984, 1989 और 2004 में सिंहभूम संसदीय क्षेत्र से विजयी रहे। लंबी बीमारी के बाद 22 जून 2018 को बागुन सुम्ब्रुई का निधन हो गया।

जानिए जन्म देने वाले बाप की अद्भुत कहानियाँ!

आज हम आप सभी को जन्म देने वाले बाप की अद्भुत कहानियाँ बताने जा रहे हैं! बाप-बेटे के रिश्ते पर बनीं इस फिल्म में एक बेटा अपने पिता को दुश्मनों से बचाने के लिए हर हद पार कर देता है। बेटा जानता है बिना पिता के उसका कोई वजूद नहीं है। रील हो या रीयल लाइफ, पिता का किरदार बच्चों के जीवन का आधार होता है। पिता का प्यार और डांट, दोनों अनमोल हैं। इसकी कोई कीमत नहीं होती। पिता को यूं ही ‘आसमान’ नहीं कहते हैं, पिता अपने बच्चों की एक खुशी पर सब कुछ कुर्बान कर देता है। वहीं बच्चों पर कुछ आफत आए तो वो सारी दुनिया से भी लड़ जाता है। पिछले कुछ दिनों से पिता की ‘दिलदारी’ और ‘लाचारी’ की दो भावुक तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं। एक तस्वीर है भारत के मशहूर उद्योगपति मुकेश अंबानी और उनके बेटे अनंत की और दूसरी तस्वीर है राजस्थान में तैनात सब इंस्पेक्टर नरेश शर्मा और उनके 21 महीने के बेटे हृदयांश की। जहां एक तरफ मुकेश अंबानी ने अपने बेटे की प्री-वेडिंग इवेंट पर एक हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च कर दिए, वहीं दूसरी तरफ नरेश शर्मा अपने 21 महीने के बेटे को गंभीर बीमारी ‘स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी’ से बचाने के लिए 17.5 करोड़ रुपये जुटाने में लगे हैं। यह रकम जुटाना उनके लिए ‘एवरेस्ट’ पर चढ़ाई करने से भी कठिन चुनौती है। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी है, उन्हें पूरी उम्मीद है कि वह अपने बेटे को दर्द और तकलीफ से उबार लेंगे। नरेश शर्मा अपने बेटे की जान बचाने के लिए दरबदर भटक रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए वह अपने बेटे के इलाज के लिए मदद मांग रहे हैं। नरेश कुमार पेशे से पुलिस इंस्पेक्टर हैं। आमतौर पर पुलिस महकमे के लोगों को सख्त मिजाज वाला समझा जाता है। लेकिन जब बेटा तकलीफ में हो तो पुलिसवाले की आंखों में भी आंसुओं की सुनामी आ जाती है। नरेश शर्मा भी अपने आंसुओं को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, बेटे के लिए मदद की गुहार लगाते वक्त वह खूब रो रहे हैं। बच्चों की खुशी का लम्हा हो या दुख का पल, पिता के आंसू छलक ही जाते हैं। देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी भी अपने बेटे अनंत के प्री-वेडिंग इवेंट में भावुक हो गए थे और उनकी आंखों से आंसू छलक गए थे। दरअसल अनंत अंबानी ने अपने प्री-वेडिंग इवेंट में दिल छू लेने वाली स्पीच दी थी। अनंत ने उनकी प्री-वेडिंग के पल को खूबसूरत बनाने के लिए अपने माता-पिता को थैंक्स कहा था। उन्होंने उन हेल्थ इश्यू के बारे में भी बताया जिनका वह बचपन से सामना कर रहे हैं और कैसे उनके माता-पिता ने उन्हें कभी कष्ट महसूस नहीं होने दिया। दरअसल 2017 में अपने एक इंटरव्यू में अनंत अंबानी की मां नीता अंबानी ने बताया था कि उनका बेटा गंभीर अस्थमा से पीड़ित था, इसलिए उन्हें उसे बहुत सारे स्टेरॉयड पर रखना पड़ा, जिसके चलते अनंत का वजन फिर से बढ़ गया था। अस्थमा के इलाज में स्टेरॉयड दवाओं का उपयोग श्वसन नलिकाओं को खोलने में मदद करता है, जिससे सांस की समस्या से राहत मिलती है। हालांकि इसके साइड इफेक्ट में वजन बढ़ना भी शामिल है।

राजस्थान के धौलपुर जिले के मनियां पुलिस थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर नरेश शर्मा का 21 महीने का बेटा हृदयांश गंभीर बीमारी ‘स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी’ से पीड़ित है। इस बीमारी की वजह से हृदयांश अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता है। डॉक्टर ने इलाज के लिए 17.5 करोड़ रुपये का एक इंजेक्शन ZOLGESMA की जरूरत बताई है। इतनी बड़ी रकम का इंतजाम करना हृदयांश के पिता नरेश के लिए संभव नहीं है। नरेश ने अपने बेटे हृदयांश की जान बचाने के लिए एक अभियान शुरू किया है। नरेश क्राउड फंडिंग के जरिए पैसा इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब पर ह्रदयांश को बचाने की मुहिम चल पड़ी है। सोशल मीडिया पर ह्रदयांश की बीमारी के बारे में जानकर उसकी मदद के लिए हजारों लोग आगे आए हैं। वहीं राजस्थान के पुलिस महानिदेशक यूआर साहू ने भी सब इंस्पेक्टर नरेश शर्मा के बेटे के लिए अपील जारी की है। डीजीपी साहू ने पुलिस विभाग के सभी आईपीएस अधिकारियों और कर्मचारियों को एक पत्र जारी करके नरेश शर्मा के बेटे ह्रदयांश की जान बचाने के लिए सहयोग करने की अपील की है। कई आईपीएस अफसर भी ह्रदयांश की मदद के लिए मुहिम चला रहे हैं। कुछ आईपीएस अफसरों ने 51,000 तो कुछ अफसरों ने 25-25 हजार रुपये की सहयोग राशि दी है।

21 महीने के हृदयांश को स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी नाम की बीमारी है। ये काफी दुर्लभ बीमारी है। इसके सिर्फ एक ही इलाज है। इसमें Zolgensma नाम का इंजेक्शन लगाया जाता है। दुनिया की सबसे महंगा इंजेक्शन एक बार फिर चर्चा में है। यह वन-टाइम जीन थेरेपी है जिसका यूज स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (SMA) से जूझ रहे बच्चों के इलाज में किया जाता है। हालांकि यह भारत में अप्रूव्ड नहीं है लेकिन डॉक्टर की सलाह और सरकार की मंजूरी के बाद इसका आयात किया जा सकता है। यह दुनिया की सबसे महंगी दवा है। भारत में इसकी एक डोज की कीमत 17 करोड़ रुपये बैठती है।

Zolgensma को स्विस कंपनी नोवार्तिस ने विकसित किया है। यह दुर्लभ जेनेटिक बीमारी एसएसए के इलाज में काम आती है। एसएमए एक घातक, न्यूरोमस्कुलर और प्रोग्रेसिव आनुवंशिक बीमारी है। यह खासतौर से ब्रेन की नर्व सेल्स और रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचाती है। एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में 10,000 से 25,000 बच्चे और वयस्क इस बीमारी से जूझ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि बहुत कम मरीज दवा को खरीद पाते हैं, इसलिए इसकी कीमत बहुत ऊंची बनी रहती है। दुनिया में एसएमए के इलाज के लिए केवल तीन दवाओं को मंजूरी मिली है। इन्हें बनाने वाली कंपनियां बायोजेन, नोवार्तिस और रॉश है। इसकी भारी कीमत के बावजूद एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे एसएमए के इलाज और केयर में आने वाले खर्च को काफी हद तक ऑफसेट किया जा सकता है। नोवार्तिस की वेबसाइट के मुताबिक इस दवा को 45 देशों में मंजूरी मिली है और अब तक दुनियाभर में 2,500 मरीजों का इलाज किया जा चुका है। कंपनी का दावा किया है उसने 36 देशों में करीब 300 बच्चों को मुफ्त में जीन थेरेपी दी है।

आखिर लोकसभा चुनाव से पहले क्यों हो रही है मिसिंग वोटर की चर्चा?

वर्तमान में लोकसभा चुनाव से पहले मिसिंग वोटर की चर्चा हो रही है! जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे ध्यान उन बड़ी संख्या में रजिस्टर्ड वोटर्स पर जाता है जो अलग-अलग वजहों से मतदान में हिस्सा नहीं ले पाते। करीब 30 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स हैं जो अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए क्योंकि वे लंबे समय से दूसरी जगह पर रहते हैं? ये ‘लापता मतदाता’ मुख्य रूप से प्रवासी हैं, जिनका वोटिंग लिस्ट में पता उनके मौजूदा निवास स्थान से मेल नहीं खाता। परिणामस्वरूप, वे मतदान करने में असमर्थ रहते हैं। अपने रजिस्टर्ड एड्रेस में विसंगतियों के कारण वो वोटिंग में शामिल नहीं हो पाते। ‘लापता मतदाता’ के रूप में ये वोटर्स ज्यादातर प्रवासी हैं जो चुनावी प्रक्रिया से बाहर रह जाते हैं। हालांकि, अब चुनाव आयोग ने इन ‘लापता मतदाताओं’ के लिए ही रिमोट इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के इस्तेमाल का प्रस्ताव दिया है। इस प्रक्रिया के जरिए कोशिश यही है कि ऐसे मतदाता भी वोटिंग में हिस्सा ले सकें जो अपने रजिस्टर्ड एड्रेस से दूर रहते हैं। इनकी वोटिंग से संभावना जताई जा रही कि आंकड़े में 30 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है। नए मतदाताओं के आने से न केवल मतों की संख्या में बढ़ोतरी होगी, बल्कि कई और मुद्दे भी सामने आएंगे। इसके राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता होगी। इन लापता मतदाताओं के आने से चुनावी रणनीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। ये वोटर्स, जो मुख्य रूप से युवा, अविवाहित लोग हैं, पारंपरिक ग्रामीण मतदाताओं से अलग होते हैं। उनकी शहरी पृष्ठभूमि और अनुभव देश में राजनीति के भविष्य को नया आकार देंगे।

अगर चुनाव आयोग इन ‘लापता मतदाताओं’ के लिए रिमोट इलेक्ट्रॉनिक मशीनें लगाने की अपनी योजना में सफल हो जाता है, तो इससे मौजूदा वोटिंग पर्सेंट में बड़ी छलांग लग सकती है। ये आंकड़ा 30 फीसदी तक और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में न केवल अधिक वोट डाले जाएंगे, बल्कि सियासी पार्टियों को नए सिरे से इन वोटर्स को फोकस करते हुए प्लानिंग करनी पड़ेगी। इन नए मतदाताओं के आने से लॉन्ग टर्म चुनाव रणनीतियों में बड़े बदलाव को प्रेरित करेंगे। ये अब शहर में रहकर कमाने वाले लोग हैं। ये वोटर्स ज्यादातर युवा होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि 60 से ऊपर के लगभग 71 फीसदी लोग गांवों में ही रहते हैं। ये विशेषताएं मिलकर निश्चित रूप से भविष्य की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ेंगी।

उदाहरण के लिए, अगर कोई प्रत्यक्ष फील्ड डेटा का इस्तेमाल करता है, तो दिल्ली और बेंगलुरु में अधिकांश प्रवासी 16 से 30 वर्ष की आयु के हैं। इनमें भी अधिकतर अविवाहित युवा हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ज्यादातर युवा ही अपने गृह राज्य, गृह जिले से बाहर काम के लिए महिलाओं की तुलना में ज्यादा पलायन करते हैं। वे बाहर रहकर भी अकसर अकेले होते हैं क्योंकि उनका आर्थिक भविष्य अनिश्चित है। ये ‘लापता मतदाता’ आम तौर पर पुरुष होते हैं क्योंकि जब महिलाएं पलायन करती हैं तो इसका मुख्य कारण शादी होता है। उनका वैवाहिक घर उन्हें एक स्थिर एड्रेस और मतदाता सूची में एक पक्का रजिस्ट्रेशन देता है। हालांकि महिला की शादी किसी ऐसे शख्स से होती है जिसकी नौकरी अनिश्चित है तो वो भी ‘लापता मतदाता’ के रूप में पुरुष के साथ ही शामिल होंगी।

ऐसा नहीं है कि झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले सभी लोग वोट देने से चूक जाते हैं। लगभग 70 फीसदी घुमंतू नहीं हैं लेकिन वे जिस घर में रहते हैं उसके मालिक हैं। वो अपने पत्नी और बच्चों के साथ रहते हैं। शायद ही ऐसे लोग ‘लापता मतदाताओं’ में से होंगे। श्रमिकों का एक निश्चित पता हो, इसके लिए उन्हें नौकरी की सुरक्षा की आवश्यकता है और इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। अनौपचारिक श्रम से कॉरपोरेट घरानों को तुरंत फायदा होता है, लेकिन निम्न वर्ग को वोटिंग के विशेषाधिकार और सार्थक स्किल हासिल करने से वंचित रखा जाता है। उद्योग सार्वजनिक रूप से योग्य श्रमिकों की कमी के बारे में शिकायत करता है, लेकिन राष्ट्रीय कौशल विकास निगम को बहुत कम राशि का योगदान देता है। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे से पता चलता है, महिलाएं छोटे पैमाने के उद्यम में भी अधिक सक्रिय हो रही हैं। स्टडी से पता चला है कि जब पत्नियां और माएं काम करना शुरू करती हैं, तो राजनीतिक मामलों में उनकी रुचि भी बढ़ती है। पहले से ही, 2019 के चुनावों में, महिलाओं का वोटिंग पर्सेंट पुरुष मतदाताओं से अधिक थी। हालांकि, अगर ‘लापता मतदाताओं’ को चुनाव के लिए वापस लाया जाता है, तो चुनाव में पुरुषों की संख्या बढ़ जाएगी।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब प्रवासी उचित शहरी नौकरी पाने में विफल रहता है, तो इसका कारण प्रयास की कमी नहीं है। अधिकांश शहरी प्रवासी मैट्रिकुलेट और स्नातक हैं, और निश्चित रूप से साक्षर से कहीं अधिक हैं। इसलिए, अगर चुनाव आयोग ‘लापता मतदाता’ को साथ लाने की उम्मीद करता है तो यह वास्तव में एक बड़ा फैसला होगा। ये लोकतांत्रिक मशीनरी के दायरे को व्यापक बना रहा है।

एक बार जब ‘लापता मतदाताओं’ को अपना स्थान मिल जाए, तो यह संभावना नहीं है कि राजनीतिक घोषणापत्र उन मुद्दों की ओर अधिक निर्णायक रूप से झुकेंगे जो सीधे तौर पर पुरुष प्रवासियों से संबंधित हैं। इसका असर गांव छोड़ चुके पुरुषों की जगह भरने वाली महिला कामगारों पर भी पड़ेगा। कोई चाहे जिस ओर देखे, पार्टियों को नए सिरे से सोचना होगा। मिसिंग वोटर्स को आकर्षित करने के लिए स्किल और नौकरी के स्थायित्व पर ध्यान देना पहले से ज्यादा जरूरी होगा। ठाणे, बेंगलुरु, मुंबई, पुणे और सूरत जैसे शहर, जाहिर तौर पर बेहद अहम होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि ये शहरी केंद्र 25 फीसदी से अधिक नौकरी चाहने वाले प्रवासियों को आकर्षित करते हैं। इसलिए यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि वहां कई ‘लापता मतदाता’ मिलेंगे। यह अतीत को सुधारने का समय है। वर्षों तक ‘मिसिंग वोटर्स’ को भुला दिया गया, लेकिन अब इन्हें और अनदेखा नहीं किया जा सकता।