Thursday, March 5, 2026
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क्या बीजेपी ने कांग्रेस को कर दिया है निहत्था?

वर्तमान में बीजेपी ने कांग्रेस को निहत्था कर दिया है! अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में विपक्षी गठबंधन इंडिया की ओर से एक भी नेता शामिल नहीं हुए। निमंत्रण मिलने के बाद भी कांग्रेस, सपा, जेडी यू, आरजेडी, एनसीपी, शिवसेना और टीएमसी ने समारोह का बहिष्कार किया। डीएमके नेता स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने राम मंदिर को लेकर विवादित बयान भी दिए। तमिलनाडु में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लाइव टेलिकास्ट पर विवाद भी हुआ। मगर 22 जनवरी को पूरे देश में खासकर हिंदी पट्टी में जो माहौल बना है, उसकी तुलना राम लहर से की जा रही है। राम नाम का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। सोशल मीडिया में रामलला के विग्रह ट्रेंड कर रहे हैं। गांव-गलियों में अयोध्या और राम छाए हुए हैं। माना जा रहा है कि राम लहर का असर अप्रैल में होने लोकसभा चुनाव में भी दिखेगा। जाति के सहारे लोकसभा चुनाव की नैया पार करने की प्लानिंग कर रहे विपक्षी गठबंधन को अब राम लहर पार्ट-2 से जूझना होगा। 1991 में भी राम लहर राज्यों में जाति की राजनीति को छका चुका है। कम से कम हिंदी पट्टी में राम लहर की अनदेखी नहीं की जा सकती है, जहां 290 लोकसभा सीटें हैं। 22 जनवरी को जब पीएम नरेंद्र मोदी अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा कर रहे थे, तब विपक्ष के अधिकतर नेता खामोश थे। इंडिया गठबंधन के तीन नेता इस धार्मिक उत्सव के मौके पर एक्टिव दिखे। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ सुंदरकांड का पाठ किया। ममता बनर्जी कोलकाता में सभी धर्मगुरुओं के साथ सद्भाव यात्रा निकाली। उद्धव ठाकरे नासिक के उस राम मंदिर में गए, जहां पीएम मोदी अपने 11 दिवसीय व्रत के शुरुआत में पहुंचे थे। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी असम में न्याय यात्रा पर थे। शंकरदेव मंदिर में एंट्री नहीं मिलने पर वह हैबोरगांव में धरने पर बैठे रहे। अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, लालू यादव और शरद पवार जैसे दिग्गजों ने क्या किया, इसकी डिटेल मीडिया में नहीं आई। एक्सपर्ट मानते हैं कि राम मंदिर जैसे आयोजनों से दूरी बनाकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने चुनाव से पहले बड़ी चूक कर दी है, जिसकी भरपाई करना मुश्किल है। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा, टीडीपी प्रमुख एन. चंद्राबाबू नायडू और जनसेना के नेता पवन कल्याण समेत आए फिल्मी सितारे, क्रिकेटर समेत तमाम सेलिब्रेटी मौजूद रहे। अनिल अंबानी, मुकेश अंबानी, अमिताभ बच्चन, रजनीकांत समेत सभी फिल्म स्टार घंटों राम मंदिर प्रांगण में बैठे रहे, जबकि ये सारे अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त माने जाते हैं। आम दिनों में इनकी झलक के लिए लोग तरस जाते हैं। मीडिया से बातचीत में इन सेलिब्रेटिज इसे सौभाग्य का अवसर माना। ऐसे में विपक्षी दलों की नेताओं की गैरमौजूदगी पर भी खूब चर्चा हुई। लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी राम मंदिर का क्रेडिट लेगी तो विपक्ष की गैरहाजिरी को मुद्दा बनाएगी, यह भी तय है।

नवंबर-दिसंबर में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की गारंटी का जादू चला। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह ने नरेंद्र मोदी की गारंटी को और मजबूत दिया है। इससे पहले नरेंद्र मोदी की अपील पर कोरोना के दौरान लोगों ने थालियां बजाई थीं। दीये भी जलाए थे। इसकी काफी आलोचना भी हुई, मगर राम मंदिर के नाम पर फिर लोगों ने सोमवार शाम को दिवाली मनाई। इसके साथ ही 2024 में मंडल बनाम कमंडल करने की विपक्ष के प्लान को भी बड़ा झटका लगा है। इंडिया गठबंधन बनने के बाद से ही कांग्रेस, जेडी यू और आरजेडी जैसे राजनीतिक दल जातीय जनगणना को तुरुप का इक्का मान रहे थे। बिहार में नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना की रिपोर्ट जारी करने के बाद ओबीसी आरक्षण की सीमा भी बढ़ा दी। कांग्रेस शासित राज्यों में भी राहुल गांधी ने जातीय जनगणना कराने का वादा किया। अब राम लहर पार्ट-2 में जाति वाला दांव कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। जिन युवाओं को 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा, राम मंदिर आंदोलन और 1992 में बाबरी विध्वंस को जानने का मौका नहीं मिला, वे नए वोटर राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के साक्षी बने। इससे उलट इन युवाओं को मंडल कमिशन लागू होने के बाद हुए आरक्षण आंदोलन की भनक तक नहीं है।

1989 के भारतीय आम चुनाव में बीजेपी को 85 सीटें मिली थीं। उसका वोट प्रतिशत 7.74 प्रतिशत से बढ़कर 11.36 फीसदी हो गया। वी पी सिंह की सरकार बनी। बीजेपी ने सरकार को बाहर से समर्थन दिया। 1990 में वी पी सिंह ने मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा कर दी। सारे देश में आरक्षण के समर्थन और विरोध में आंदोलन शुरू हो गया। तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 26 अगस्त, 1990 को बैठक बुलाई और राम मंदिर आंदोलन को तेज करने का फैसला किया। 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। बिहार में लालू यादव की सरकार ने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। फिर समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से चार महीने की सरकार चलाई। मई-जून 1991 में मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 120 सीटें जीतीं और उसे कुल 20.07 फीसदी वोट मिले। मंडल कमिशन लागू करने वाले जनता दल 59 सीटों पर सिमट गई। जनता दल का वोट प्रतिशत 17.79 से खिसककर 11.73 प्रतिशत हो गया। 20 मई 1991 को पहले चरण की वोटिंग हुई। 21 मई 1991 को राजीव गांधी की श्रीपेरम्बदूर में हत्या हो गई और कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल पड़ी। अगर राजीव गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो लोकसभा चुनाव के नतीजे अलग ही होते।

लोकसभा चुनाव से पहले कैसा होगा देश का बजट?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि लोकसभा चुनाव से पहले देश का बजट कैसा होगा! नरेंद्र मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम चरण में है। सरकार इस कार्यकाल का आखिरी बजट 1 फरवरी को पेश करेगी। अयोध्या राम मंदिर में राललला की प्राण-प्रतिष्ठा से पूरे देश में जोश और जज्बे की नई लहर है जिसके दम पर बीजेपी लोकसभा चुनावों में रिकॉर्ड जीत दर्ज करने की उम्मीद कर रही है। हालांकि, बीजेपी सिर्फ राम मंदिर के भरोसे लोकसभा चुनावों में जाने के पक्ष में नहीं है। वैसे भी इस बार बीजेपी अपना वोटर बेस में बड़ी वृद्धि करने की रणनीति पर गंभीरता से आगे बढ़ रही है। इस उद्देश्य को हासिल करने की दिशा में पार्टी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है। इस वजह से उम्मीद की जा रही है कि मोदी सरकार इस बार के बजट के जरिए और इससे इतर भी कुछ लोकलुभावन कदम उठा सकती है। हम यहां उन संभावित फैसलों की चर्चा कर रहे हैं जिनको लेकर अटकलें लग रही हैं कि मोदी सरकार आम लोगों को चुनावी तोहफा दे सकती है! नौकरी-पेशा वर्ग का बड़ा तबका बीजेपी समर्थक है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले 2023-24 के बजट में सिर्फ यह कहा था कि टैक्स की नई व्यवस्था के तहत 7 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी वालों को टैक्स से पूरी तरह छूट मिलेगी। वित्त वर्ष 2022-23 में नई टैक्स रिजीम पेश की गई तब टैक्स छूट की सालाना आय की सीमा 5 लाख रुपये तय की गई थी। वहीं, पुराने टैक्स स्लैब में 10 लाख रुपये से ही ज्यादा की इनकम पर 30% टैक्स लागू है जो अधिकतम दर है। पुराने टैक्स रिजीम में वित्त वर्ष 2017-18 में ही आखिरी बदलाव हुआ जब वित्त मंत्री अरुण जेटली थे। उन्होंने अरुण जेटली ने 2.5 लाख से 5 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी पर टैक्स 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही आयकर कानून, 1961 के सेक्शन 87ए के तहत टैक्स छूट की सीमा को 3.5 लाख तक की सालाना आय वालों पर लागू कर दिया। इसके तहत 3.5 लाख तक की सालाना आय वालों को टैक्स में 2.5 हजार रुपये की छूट दे दी गई। इस कारण 3 लाख रुपये तक की सालान इनकम वाले पूरी तरह टैक्स मुक्त हो गए जबकि 3.5 लाख तक की सालाना आमदनी पर टैक्स की रकम 5 हजार रुपये से घटकर 2,500 रुपये रह गई। उम्मीद की जा रही है कि लंबे समय के इंतजार के बाद मोदी सरकार ओल्ड टैक्स रिजीम में भी टैक्स छूट की सीमा साला 5 लाख रुपये से बढ़ाएगी।

मोदी सरकार के पास पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती का बढ़िया मौका है। इंडियन ऑइल, हिंदुस्तान पावर, भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियां अभी प्रति लीटर पेट्रोल पर 11 रुपये जबकि प्रति लीटर डीजल पर 6 रुपये का मोटा मुनाफा कमा रही हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए (ICRA) ने मंगलवार की रिपोर्ट में बताया कि सितंबर 2023 से ही कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेज गिरावट आई है। इस बीच सरकारी ऑइल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में एक बार भी कटौती नहीं की है। पिछली बार मोदी सरकार ने 22 मई, 2022 को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में क्रमशः आठ रुपये और छह रुपये की कमी थी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतरमण अंतरिम बजट में फ्लैट खरीदारों के लिए राहत की घोषणा कर सकती है। दरअसल, रियल एस्टेट डेवलपर्स’ एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने आगामी बजट के लिए अपनी विश लिस्ट में सरकार से होम लोन के मूलधन और ब्याज पर टैक्स छूट की सीमा बढ़ाने की मांग की है। इसका उद्देश्य आवासीय संपत्तियों की मांग को बढ़ावा देना है। क्रेडाई ने किफायती घर की परिभाषा में संशोधन की भी वकालत की है। अपने बजट पूर्व सिफारिशों के हिस्से के रूप में क्रेडाई ने हाउसिंग लोन पर ब्याज के भुगतान पर आयकर की धारा 80सी टैक्स छूट बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है, जो अभी 1.5 लाख रुपये तक सीमित है। एक विकल्प के रूप में क्रेडाई ने हाउसिंग लोन के इंट्रेस्ट पेमेंट पर एकमुश्त रकम की छूट का प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा, क्रेडाई ने इस बात पर जोर डाला है कि 2017 में 45 लाख रुपये निर्धारित अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं हुआ है और यह रकम बढ़ाई जाए।

विपक्ष मोदी सरकार पर ‘रोजगार विहीन विकास’ के ढर्रे पर चलने का आरोप लगाता है। लोकसभा चुनावों में विपक्ष के इन आरोपों को ताकत न मिल जाए, इसकी चिंता सरकार को भी सता रही होगी। आंकड़ों के मुताबिक, हर साल 10 लाख से ज्यादा युवा देश के वर्कफोर्स में शामिल होते हैं। इनके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बनेंगे तो भारत को बड़ी युवा आबादी से संभावित फायदे की राह कठिन हो जाएगी। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ग्रामीण क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बजट आवंटन बढ़ा सकती हैं। वहीं, सेवाओं और रसायनों जैसे उद्योगों को शामिल करने के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन पीएलआई कार्यक्रमों के दायरे को व्यापक बनाने के लिए कुछ प्रोत्साहन की घोषणा भी की जा सकती है।

सरकार नेशनल पेंशन स्कीम को और आकर्षक बनाने के लिए जमा और निकासी पर टैक्स छूट बढ़ा सकती है, खासकर 75 साल से ऊपर के बुजुर्गों के लिए। उधर, पेंशन फंड नियामक पीएफआरडीए ने कर्मचारी भविष्य निधि कार्यालय ईपीएफओ से कहा है कि वह एंप्लॉयर के योगदान पर टैक्स के मामले में ‘समानता’ लाए। अभी कर्मचारियों के लिए फंड के निर्माण में एंप्लॉयर के अंशदान में असमानता है। इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ते के 10 प्रतिशत तक के कंपनी के अंशदान को एनपीएस के मामले में टैक्स से छूट दी गई है, जबकि ईपीएफओ के मामले में यह अंशदान सीमा 12 प्रतिशत है। यानी, ईपीएफओ से कहा गया है कि वो पेंशन फंड में एंप्लॉयर के योगदान के लिए टैक्स छूट की सीमा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करे। वहीं, केंद्र सरकार सरकार के कर्मियों के लिए यह सीमा 14 प्रतिशत है। उम्मीद की जा रही है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस संबंध में कुछ घोषणाएं अंतरिम बजट में कर सकती हैं। दरअसल, सरकार को टैक्स से ज्यादा कमाई होने की उम्मीद है। इस कारण उसके खजाने में इतने पैसे होंगे कि मिडल क्लास के नौकरी-पेशा तबके को राहत देने और कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर सके। समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस वित्तीय वर्ष में इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स का कलेक्शन अच्छा रहा है। डायरेक्ट टैक्स का कुल कलेक्शन बजट अनुमान से करीब 1 लाख करोड़ रुपये ज्यादा रहने की उम्मीद है। इस बढ़े हुए फंड का इस्तेमाल मनरेगा (मनरेगा), स्कूल के मिड-डे मील जैसे पोषण कार्यक्रमों और पेंशन योजनाओं जैसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर होने वाला है। सरकार आयुष्मान भारत जैसी मौजूदा स्वास्थ्य और शिक्षा योजनाओं के लिए फंडिंग को भी जारी रखेगी। दूसरी तरफ, सरकार इनकम टैक्स और होम लोन पर राहत देकर लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा दांव चल सकती है।

क्या पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना बीजेपी का बड़ा प्लान है?

पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना बीजेपी का बड़ा प्लान साबित हो सकता है! बिहार के बड़े नेता कर्पूरी ठाकुर की जयंती के 100 साल पूरा होने के ठीक एक दिन पहले नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देकर चौंका दिया। इस एक फैसले से आम चुनाव से पहले दिल्ली से लेकर पटना तक राजनीति तेज हो गई। भारत रत्न के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने X पर कहा, ‘मुझे इस बात की बहुत प्रसन्नता हो रही है कि भारत सरकार ने समाजिक न्याय के पुरोधा महान जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर यह निर्णय देशवासियों को गौरवान्वित करने वाला है। पिछड़ों और वंचितों के उत्थान के लिए कर्पूरी जी की अटूट प्रतिबद्धता और दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर अमिट छाप छोड़ी है। यह भारत रत्न न केवल उनके अतुलनीय योगदान का विनम्र सम्मान है, बल्कि इससे समाज में समरसता को और बढ़ावा मिलेगा।’ वहीं, बिहार के CM नीतीश कुमार ने कहा कि कर्पूरी ठाकुर जी को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिया जाना हार्दिक प्रसन्नता का विषय है। केंद्र सरकार का यह अच्छा निर्णय है। यह सम्मान दलितों, वंचितों और उपेक्षित तबकों के बीच सकारात्मक भाव पैदा करेगा। हम हमेशा से ही उन्हें भारत रत्न देने की मांग करते रहे हैं। वर्षों की पुरानी मांग आज पूरी हुई है।

पिछले कुछ दिनों से बिहार में पिछड़े की राजनीति जोरों पर है। बीजेपी के हिंदुत्व और राम मंदिर फैक्टर से मुकाबले के लिए नीतीश कुमार ने बिहार में जाति जगनणना का कार्ड खेला। महागठबंधन सरकार ने न सिर्फ जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए बल्कि इसके बाद पिछड़ों के लिए आरक्षण की सीमा भी बढ़ाई। वहीं, बुधवार को जेडीयू की रैली में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी अजेंडे में था। बीजेपी को पता था कि आरजेडी के मुस्लिम और यादव वोट समीकरण और साथ में नीतीश कुमार के पिछड़े वोट के सियासी गणित को हराना इतना आसान नहीं है। ऐसे में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के साथ ही बीजेपी ने पिछड़ों की राजनीति और नीतीश के वोट में सेंध लगाने की कोशिश है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर सामाजिक न्याय को बड़ी मान्यता दी गई है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से बिहार की तमाम राजनीतिक दलों ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग भी की है।

कर्पूरी ठाकुर के बहाने बीजेपी बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और सटे राज्यों में भी बड़ा अभियान शुरू कर सकती है। पहले भी नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने विपक्ष के प्रतीकों को अपने पाले में करने की सफल राजनीति की है। ऐसे में बीजेपी ने एक फैसले से दो शिकार किए हैं और मंडल-कमंडल दोनों कार्ड को अपने पाले में करने की कोशिश की है। केंद्र के फैसले पर जेडीयू वरिष्ठ नेता और पार्टी की राजनीतिक सलाहकार के. सी. त्यागी ने कहा कि जेडीयू हमेशा से कर्पूरी को जननायक माना है। पार्टी उन्हें अपने आदर्शों में शामिल रखती है। ऐसे में अगर भारत रत्न मिलता है तो इससे उन्हें खुशी होती है और इसमें राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए। फैसले का स्वागत आरजेडी ने भी किया। आरजेडी सांसद मनोज झा ने इसके लिए नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को क्रेडिट दिया। उन्होंने कहा, ‘पूरे अंचल के सामाजिक न्याय के प्रणेता स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न देने के लिए बाध्य सत्ता को बहुजन सरोकारों का उभार समझ में आया। इसके लिए नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को बधाई। पहले जातिगत जनगणना और फिर आरक्षण का दायरा बढ़ाना डरा गया उन्हें।’

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर क्या यह नीतीश कुमार को आम चुनाव से पहले बीजेपी का सियासी संदेश है? कुछ दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि एनडीए से गए अगर कोई पुराने सहयोगी वापस आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है। तभी से आम चुनाव से पहले बिहार में सियासी सस्पेंस जारी था। कहा गया कि नीतीश कुमार I.N.D.I.A. गठबंधन से लेकर कई मुद्दों पर असहज है। यह भी कहा गया कि वह लोकसभा के साथ राज्य में अपनी अगुआई में विधानसभा चुनाव भी चाहते हैं। इन्हीं अटकलों के बीच उन्होंने एनडीए संयोजक का पद भी ठुकराया। ऐसे में बीजेपी का कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना कहीं न कहीं बीजेपी-जेडीयू के बीच न सिर्फ तल्खी को कम कर सकती है बल्कि संवाद का पुल भी बना सकती है। ऐसे में बुधवार को पटना में होने वाली नीतीश कुमार की रैली पर सबकी नजर रहेगी कि वहां नीतीश क्या बोलते हैं।

जानिए इस बार के गणतंत्र दिवस की खास बातें!

आज हम आपको इस बार के गणतंत्र दिवस की कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं! गणतंत्र दिवस परेड में इस बार पहली बार भारत की नारी शक्ति पूरे कर्तव्य पथ पर छाई रहेगी। परेड में 80 फीसदी महिलाएं होंगी। ऐसा पहली बार है जब बड़ी संख्या में ऑल विमिन दस्ते मार्च करेंगे। भारतीय सेना की आर्टिलरी महिला ऑफिसर भी पहली बार कर्तव्य पथ पर दिखाई देंगी। साथ ही सेना की मिडियम रेंज सर्फेस टू एयर मिसाइल भी पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होगी। फ्रांस का मार्चिंग दस्ता भी परेड का हिस्सा होगा और फ्रांसीसी फाइटर जेट राफेल भी उड़ान भरेंगे।सेना के दिल्ली एरिया के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल सुमित मेहता ने बताया कि परेड में 80 फीसदी महिलाएं होंगी। पहली बार ट्राई सर्विस दस्ता यानी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की महिलाओं का दस्ता भी कर्तव्य पथ पर मार्च करेगा। इसमें आर्मी की सीएमपी की महिलाएं और नेवी और एयरफोर्स की महिला अग्निवीर होंगी, जिसे इंडियन आर्मी की ऑफिसर लीड करेंगी। CAPF का भी ऑल विमिन दस्ता है और BSF के ऊंट पर सवार दस्ते में महिलाएं भी होंगी। परेड की शुरुआत भी महिलाएं भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ करेंगी।

फ्रांस का फॉरेन लीजन का मार्चिंग दस्ता भी परेड में शामिल होगा। मेजर जनरल सुमित मेहता ने बताया कि परमवीर और अशोक चक्र विजेताओं के पीछे फ्रांस का मार्चिंग दस्ता होगा। जब फ्रांस का दस्ता मार्च कर रहा होगा तो उसके साथ ही आसमान पर फ्रांस के दो राफेल फाइटर जेट और मल्टी रोल ट्रांसपोर्ट टैंकर उड़ान भरेंगे। यह ट्रांसपोर्ट टैंकर एक बार में दो फाइटर जेट को रीफ्यूल कर सकता है। फ्रांस के राफेल जेट अपने बेस से उड़ान भरकर आएंगे और फिर लौट जाएंगे।परेड में पहली बार भारतीय सेना का MRSAM मिडियम रेंज सर्फेस टू एयर मिसाइल सिस्टम दिखेगा। इसे लीड करेंगी भारतीय सेना की लेफ्टिनेंट सुमेधा तिवारी। लेफ्टिनेंट तिवारी ने बताया कि इस मिसाइल की खासियत यह है कि यह दुश्मन के ड्रोन, फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल को लॉन्ग रेंज में ही इंगेज कर उन्हें नष्ट करता है। यह हमारे क्रिटिकल असेस्ट्स को एरिया एयर डिफेंस देता है। मल्टी फंक्शनल रेडार भी कर्तव्य पथ पर दिखाई देगा। ये अडवांस रेडार है जो MRSAM सिस्टम को पूरे एरिया की जानकारी देता है। इसकी रेंज करीब 300 किलोमीटर है। MRSAM लॉन्चर से सुपरसोनिक मिसाइल को लॉन्च करते हैं।

भारतीय सेना की आर्टिलरी महिला ऑफिसर भी पहली बार परेड में शिरकत करेंगी। पिछले साल से ही सेना ने अपनी आर्टिलरी आर्म को महिला ऑफिसर्स के लिए खोला है। पिछले साल अप्रैल में 5 महिला ऑफिसर आर्टिलरी में शामिल हुई और पांच महिला ऑफिसर सितंबर में आर्टिलरी का हिस्सा बनीं। भारतीय सेना में इंफ्रेंट्री के बाद सबसे बड़ी आर्म आर्टिलरी ही है। आजादी के बाद कई जंग में आर्टिलरी रेजिमेंट ने अपना लोहा मनवाया है। युद्ध के मैदान में आर्टिलरी को गेम चेंजर कहा जाता है।

फ्रांस के साथ भारत की सामरिक और राजनयिक दोस्ती लगातार मजबूत हो रही है और गणतंत्र दिवस समारोह इसका गवाह रहा है। भारतीय नौसेना को फ्रांस से जल्द ही राफेल-एम फाइटर जेट मिलने हैं और तीन स्कॉर्पीन सबमरीन भी मिलनी हैं। इस बार फ्रांस के राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि हैं। बताया कि परेड में 80 फीसदी महिलाएं होंगी। पहली बार ट्राई सर्विस दस्ता यानी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की महिलाओं का दस्ता भी कर्तव्य पथ पर मार्च करेगा। इसमें आर्मी की सीएमपी की महिलाएं और नेवी और एयरफोर्स की महिला अग्निवीर होंगी, जिसे इंडियन आर्मी की ऑफिसर लीड करेंगी। CAPF का भी ऑल विमिन दस्ता है और BSF के ऊंट पर सवार दस्ते में महिलाएं भी होंगी। परेड की शुरुआत भी महिलाएं भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ करेंगी।यह छठी बार है जब फ्रांस के राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस परेड में अतिथि हैं। पिछले साल अप्रैल में 5 महिला ऑफिसर आर्टिलरी में शामिल हुई और पांच महिला ऑफिसर सितंबर में आर्टिलरी का हिस्सा बनीं। भारतीय सेना में इंफ्रेंट्री के बाद सबसे बड़ी आर्म आर्टिलरी ही है। आजादी के बाद कई जंग में आर्टिलरी रेजिमेंट ने अपना लोहा मनवाया है। युद्ध के मैदान में आर्टिलरी को गेम चेंजर कहा जाता है।फ्रांस इकलौता ऐसा देश हैं जिसके राष्ट्रपति सबसे ज्यादा बार भारत के गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर आए हैं। 2016 में भी फ्रांस के राष्ट्रपति मुख्य अतिथि थे और तब भी फ्रांस का मार्चिंग दस्ता परेड में शामिल हुआ था।

एएमयू पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

हाल ही में एएमयू पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक बयान दे दिया है! केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एएमयू की स्थापना की वकालत करने वाले मुसलमानों ने खुद ही संस्थान के सांप्रदायिक चरित्र का त्याग कर दिया था और 1920 में इसके प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण के अधीन सौंप दिया था। उन्होंने खुद कहा था कि एएमयू के गठन के पीछे उद्देश्य राष्ट्रीय महत्व का एक संस्थान बनाना था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अजीज बाशा मामले में 1967 के फैसले पर पुनर्विचार करने के खिलाफ तर्क दिया जिसमें एएमयू को गैर-अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया गया था। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एफिलियेटेड मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल एमएओ कॉलेज की गवर्निंग सोसाइटी का विघटन 1920 एक्ट के तहत कर दिया गया था ताकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के समान एक राष्ट्रीय संस्थान बनाया जा सके।

एसजी तुषार मेहता ने इस बात पर जोर डाला कि एएमयू के सांप्रदायिक चरित्र और इसके प्रशासन पर मुस्लिम नियंत्रण को त्यागने के लिए एमएओ कॉलेज के संरक्षकों को समुदाय के भीतर ही विरोध का सामना करना पड़ा था। ये संरक्षक अंग्रेजों के वफादार माने जाते थे। मेहता ने कहा कि जामिया मिलिया इस्लामिया को एक वैकल्पिक संस्थान के रूप में बनाया गया था जिसने संविधान पूर्व और संविधान के बाद के युग के दौरान सेंट स्टीफंस कॉलेज के समान अपने अल्पसंख्यक दर्जे को बरकरार रखा था। एएमयू संरक्षकों का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार से मान्यता प्राप्त एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना था, जिससे छात्र क्राउन के तहत रोजगार के लिए पात्र हो सकें। मेहता ने जोर देकर कहा कि एमएओ कॉलेज के पास खुद की अल्पसंख्यक संस्थान की पहचान जारी रखकर ब्रिटिश नियंत्रण से बचने का विकल्प था। हालांकि, उन्होंने यह विकल्प नहीं चुना।

मेहता ने आगे कहा कि अंग्रेजों के वफादारों ने एएमयू की स्थापना के दौरान प्रशासन का अधिकार छोड़ दिया था ताकि ब्रिटिश शासन उसके लिए कानून बना सके। इस व्यवस्था को संविधान लागू होने के बाद बदला नहीं जा सकता है, क्योंकि एएमयू के प्रशासन का फैसला तब हो चुका था जब ‘मौलिक अधिकार’ की संकल्पना आई नहीं थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह संविधान बनने से पहले जो संस्थान अस्तित्व में आ गए थे, उसे संविधान के अनुच्छेद 30 के चश्मे से नहीं देखा जा सकता, जो शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के लिए भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की गारंटी देता है। मेहता ने तर्क दिया कि एएमयू की स्थापना की ओर ले जाने वाली घटनाओं ने संकेत दिया कि यह एक सांप्रदायिक संस्थान नहीं था।

एएमयू के इस तर्क के जवाब में कि 1920 के अधिनियम का उसके अल्पसंख्यक चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और इसका उद्देश्य केवल अपनी डिग्री को मान्यता देना था, मेहता ने बताया कि एएमयू का अस्तित्व 1920 के अधिनियम में निहित था जिसने ब्रिटिश सरकार को व्यापक नियंत्रण प्रदान किया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित करने का विकल्प अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण और रेग्युलेशन जैसे अन्य संवैधानिक दायित्वों का पालन करने से छूट नहीं देता है। अल्पसंख्यक दर्जे को बरकरार रखा था। एएमयू संरक्षकों का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार से मान्यता प्राप्त एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना था, जिससे छात्र क्राउन के तहत रोजगार के लिए पात्र हो सकें। मेहता ने जोर देकर कहा कि एमएओ कॉलेज के पास खुद की अल्पसंख्यक संस्थान की पहचान जारी रखकर ब्रिटिश नियंत्रण से बचने का विकल्प था। पूर्व और संविधान के बाद के युग के दौरान सेंट स्टीफंस कॉलेज के समान अपने अल्पसंख्यक दर्जे को बरकरार रखा था। एएमयू संरक्षकों का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार से मान्यता प्राप्त एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना था, जिससे छात्र क्राउन के तहत रोजगार के लिए पात्र हो सकें।

मेहता ने जोर देकर कहा कि एमएओ कॉलेज के पास खुद की अल्पसंख्यक संस्थान की पहचान जारी रखकर ब्रिटिश नियंत्रण से बचने का विकल्प था। हालांकि, उन्होंने यह विकल्प नहीं चुना।हालांकि, उन्होंने यह विकल्प नहीं चुना।अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने जोर देकर कहा कि अल्पसंख्यकों की पसंद की स्वतंत्रता को संवैधानिक रूप से स्वीकृत रेग्युलेशनों और आवश्यकताओं को कमजोर नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक राज्य उस विकल्प का उल्लंघन नहीं करता है,धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की गारंटी देता है। मेहता ने तर्क दिया कि एएमयू की स्थापना की ओर ले जाने वाली घटनाओं ने संकेत दिया कि यह एक सांप्रदायिक संस्थान नहीं था। तब तक अनुच्छेद 30 बरकरार रहता है। बहस बुधवार को भी जारी रहेगी।

आखिर कौन है धर्मनिरपेक्षता के कट्टर दुश्मन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि धर्मनिरपेक्षता के कट्टर दुश्मन आखिर कौन है! अयोध्या के राम मंदिर में कल का प्राण प्रतिष्ठा समारोह भारतीयों की भारत और हिंदुओं की हिंदू धर्म की नई खोज में एक प्रमुख मील का पत्थर है। भाजपा और संघ परिवार ने समारोह का राजनीतिकरण कर दिया, विपक्ष के कई दलों ने इस पर सवाल उठाते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार किया। ऐसे सभी मुद्दों से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है भारत और हिंदू धर्म की नई परिभाषा का पहलू। भारत की मूल हिंदू पहचान पर लगी मोहर अयोध्या से भी आगे की कहानी कहती है। राम मंदिर से पहले वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन में महाकाल कॉरिडोर और मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान के आसपास कॉरिडोर की योजना की शुरुआत हुई थी। पारंपरिक हिंदी पट्टी के बाहर एक प्रमुख घटना ओडिशा में भी देखी गई। वहां मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर के आसपास के क्षेत्रों का कायाकल्प करने का प्रयास किया। इसी प्रयास में श्री मंदिर परिक्रमा प्रकल्प का उद्घाटन अयोध्या के मेगा समारोह से बमुश्किल पांच दिन पहले किया गया था। हिंदू धर्म के पवित्र स्थानों का विस्तार और नवीनीकरण भारतीय सभ्यता-संस्कृति के पुनर्जागरण की दीर्घकालिक योजना का एक हिस्सा भर हैं। इसमें राजनीतिक और गैर-राजनीतिक दखल और इरादे, दोनों हैं। ध्यान रहे कि यह प्रक्रिया 2014 में शुरू नहीं हुई थी जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। इस पुनरुत्थानवादी प्रवृत्ति की चिंगारी पहली बार 1980 के दशक में रामानंद सागर के रामायण के दूरदर्शन प्रसारण के दौरान देखी गई थी, जिसे लाखों लोगों ने परिवारिक समूहों में देखा। टीवी वालों के घर पड़ोसियों और दूर के लोगों का तांता लगा करता था। यह वह क्षण था जब हिंदू विरासत का अंतर्निहित ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रांसफर किया जा रहा था। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर स्वतंत्रता के बाद ‘सेक्युलर’ प्रॉजेक्ट के चलते रोक लगा दी गई थी।

जो रामायण के प्रथम प्रसारण के वक्त किशोर या युवा था, आज उनके बच्चे किशोर या युवा हैं। बड़ी बात है कि इन युवाओं और किशोरों की नई पीढ़ी भी 40 साल पूर्व की अपनी पिछली पीढ़ी की तरह ही अतीत के प्रति उत्साहित और उत्सुक है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और फिर रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर घटनाओं के छोटे-छोटे विवरण टीवी चैनलों पर नियमित रूप से दिए गए। इसने नई पीढ़ी की उत्सुकता और उत्साह को नए स्तर पर पहुंचा दिया। उसे इन बातों में गहरी दिलचस्पी जग गई कि प्राण प्रतिष्ठा का मतलब क्या है, गर्भगृह किसे कहते हैं, प्रायश्चित और कर्मकुटी पूजा क्या हैं। इसमें संदेह नहीं कि चुनावी नफा-नुकसान देखने वाला कोई भी नेता या दल हिंदुत्व के विस्तार पर टिप्पणी किए बिना नहीं रह सकता क्योंकि राम मंदिर का मतलब केवल एक मंदिर नहीं है। यहां जटायु, वाल्मीकि, सबरी, ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र के मंदिर हैं, जो न केवल श्री राम से बल्कि हिंदी क्षेत्र के विभिन्न जाति समूहों और संप्रदायों से भी जुड़े हुए हैं। स्पष्ट रूप से जो प्रयास किया जा रहा है- वह है रामायण की विराट कथा को छोटे-छोटे आख्यानों में पिरोना जो कुछ जाति और आदिवासी समूहों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

दरअसल, यह हिंदू धर्म के मूल आधार का ही प्रतीक है कि यह कहानियों के माध्यम से हजारों वर्षों तक विकसित हुआ। इसीलिए तो यह सनातन है। इसका कोई संस्थापक नहीं। इसमें कोई हठधर्मिता नहीं, कोई कट्टरपंथ नहीं। इसके बड़े महाकाव्यों रामायण और महाभारत ने पौराणिक कहानियों के साथ पूरे उपमहाद्वीप का ध्यान खींचा। छोटी परंपराओं से जुड़े लोग अपनी स्थानीय कहानियों को उन महाकाव्यों से जोड़कर खुश थे। हिंदू धर्म कभी भी ऊपर से नीचे तक एक जैसे आदर्शों का प्रतीक नहीं रहा, लेकिन कभी-कभार जब भी कोई बड़ी कहानी कल्पना के फलक पर छा जाती हैं तो स्थानीय कहानियां उसमें सहजता से समा जाती हैं। संक्षेप में हिंदुत्व का पॉलिटिकल प्रॉजेक्ट भी इसी बारे में है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत धर्मनिरपेक्षता के उस भाव से दूर हो रहा है जिसे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का खूब समर्थन मिला था।

अब यह धारणा जड़ें जमा रही है कि हिंदू सांस्कृतिक उत्थान के बिना देश के मानसिक कल्याण की कल्पना नहीं की जा सकती है। नेहरू युग में वामपंथी उदारवादियों के अभिजात्य वर्ग ने राष्ट्र निर्माण की जो कसौटियां तय की थीं, उन पर खरे उतरने के लिए हिंदुओं के लिए अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान त्यागना अनिवार्य कर दिया गया। इसके ठीक उलट, उसी वामपंथी उदारवादियों की जमात ने अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहित किया कि वो अपनी विरासत का पूरे रौब से सार्वजनिक प्रदर्शन करें। देर-सबेर यह पाखंड खत्म होना ही था। अयोध्या में अपनी संस्कृति पर गौरव कर रहे हिुंदुओं का हुजूम इसी की गवाही है।

एक सवाल जो अच्छे इरादे वाले बुद्धिजीवी पूछ रहे होंगे वो यह है कि इस हिंदू पहचान के दावे का अंतर सामुदायिक संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, खासकर इस धारणा के आलोक में कि एक औसत मुस्लिम राम मंदिर से नाराज है। हालांकि,

पूछने की जरूरत यह है कि क्या हिंदुओं पर मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचार के इतिहास पर नाज करने की परंपरा दो प्रमुख धार्मिक समुदायों के बीच उदारतापूर्ण संबंध का आधार हो सकता है? क्या झूठ की बुनियाद पर भरोसा खड़ा किया जा सकता है? यदि समझदार मुसलमान अयोध्या मंदिर के उद्घाटन से हिंदुओं में आई वास्तविक सकारात्मकता को स्वीकार कर सकते हैं तो क्या उन्हें इस बात पर आत्मनिरीक्षण भी नहीं करना चाहिए कि अतीत में मूर्तियां तोड़कर बहुसंख्यक समुदाय की आत्मा पर किस हद तक चोट पहुंचाई गई थी?

एक सवाल और भी है। कुछ रिपोर्ट बताते हैं कि प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की चार महीने की सरकार के दौरान दोनों पक्ष राम जन्मभूमि पर समझौते के करीब थे, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने फिर वही किया जो आज तक करते आए हैं। उन्होंने

‘राष्ट्र के लिए इतिहासकारों की रिपोर्ट’ पेश की, जिसमें कुछ तथ्यों के साथ बहुत सारे झूठ मिलाए गए और कहा गया कि उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों से बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर होने की पुष्टि नहीं होती है। यकीनन, धर्मनिरपेक्षता को हिंदुओं या मुसलमानों के बीच ‘सांप्रदायिक’ तत्वों की तुलना में वामपंथियों ने अधिक नुकसान पहुंचाया है।

एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में अयोध्या के पुनर्जन्म के बाद अब हिंदुओं के बीच जो सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बयार चली है, उसे ‘धर्मनिरपेक्षता’ की रक्षा के नाम पर आसानी से रोका नहीं जा सकता है। हिंदू धर्म में धार्मिक/आध्यात्मिक जीवन को लौकिक आचार से कभी अलग नहीं किया गया है। इसके चार पुरुषार्थ यानी जीवन के लक्ष्य न केवल धर्म और मोक्ष को महत्व देते हैं, बल्कि अर्थ यानी धन की प्राप्ति और काम यानी सीमा के भीतर मानवीय इच्छाओं की पूर्ति को भी महत्व देते हैं। हिंदू लोकाचार आध्यात्मिक और लौकिक जीवन को एक-दूसरे के विपरीत नहीं देखता। धर्मनिरपेक्षता के वाम उदारवादी संस्करण ने अनावश्यक रूप से एक को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया, जिससे एक ऐसा संघर्ष पैदा हो गया है जिसका भारतीय इतिहास में कभी कोई आधार नहीं रहा है।

क्या राम मंदिर के अक्षत भेजना, RSS का था बड़ा प्लान?

राम मंदिर के अक्षत भेजना RSS का बड़ा प्लान बन चुका है!राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से विपक्ष के तमाम राजनीतिक दलों ने दूरी बनाए रखी। सभी के अपने-अपने तर्क थे। किसी को ये भाजपा का कार्यक्रम लगा, तो किसी ने कहा कि निर्माण पूरा होने के बाद वह दर्शन करने आएंगे। बहरहाल, लोकसभा चुनाव से ऐन पहले हुए बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर राष्ट्रीय सेवक संघ की एक अहम रणनीति ने कहीं न कहीं भारतीय जनता पार्टी की राहें और आसान की हैं। दरअसल प्रतिष्ठा समारोह से पहले देश भर में ‘अक्षत निमंत्रण कार्यक्रम’ चलाया गया। विश्व हिंदू परिषद से लेकर संघ के तमाम अनुषांगिक संगठन और भाजपा संगठन के बूथ लेवल तक के कार्यकर्ताओं ने इसमें जोर-शोर से हिस्सा लिया। देश भर में 12 करोड़ परिवारों तक अक्षत वितरण होने का अनुमान है। खास बात ये है कि अक्षत वितरण का ये कार्यक्रम एक प्रकार से अनाधिकारिक ‘सर्वे’ भी था। आइए समझते हैं कैसे? दरअसल अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरकार्यवाह भैया जी जोशी ने श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों के साथ बैठक हुई थी। इस दौरान अक्षत निमंत्रण कार्यक्रम की पूरी व्यवस्था की कमान संभाल रहे पदाधिकारियों के साथ प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आयोजन, प्रबंधन पर विस्तार से मंथन किया गया था।

इसके बाद अक्षत वितरण कार्यक्रम को आरएसएस के संपर्क अभियान की तरह चलाने की रणनीति बनी। खास बात ये थी कि राम मंदिर आंदोलन के बाद ये आरएसएस का अब तक का सबसे बड़ा संपर्क अभियान बन गया। रणनीति बनी कि देश के पांच लाख गांवों और 12 करोड़ से ज्यादा परिवारों तक ये अक्षत निमंत्रण पहुंचाया जाएगा। आरएसएस के सभी अनुषांगिक संगठनों को इसमें लगाया गया। वहीं मंदिर आंदोलन की अगुवाई करने वाले विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के साथ संस्कार भारती, किसान भारती और विद्यार्थी परिषद को भी लगाया गया। भाजपा संगठन की तरफ से भी अपने बूथ लेवल तक के कार्यकर्ताओं को घर-घर अक्षत निमंत्रण पहुंचाने में लगाया।

अक्षत निमंत्रण के दौरान लोगों को मंदिर आंदोलन में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद की भूमिका भी बताई गई। यही नहीं राष्ट्रवाद के मुद्दे भी गिनाए गए। अक्षत निमंत्रण के बाद गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले महिलाओं के समूहों के माध्यम से कलश यात्रा, मंदिरों में सामूहिक सुंदरकांड का पाठ, भण्डारे आदि के आयोजन में भी कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जनता से संपर्क साधा। इस दाैरान एक प्रोफार्मा भी कार्यकर्ताओं को भरना होता था। इस प्रोफार्मा में हर घर के मुखिया का नाम, उनका पता और फोन नंबर के साथ ही उस परिवार का व्यवहार कार्यकर्ताओं के प्रति कैसा रहा? ये भी दर्ज किया गया। जानकारी के अनुसार एक बड़ा डेटा देश भर से जुटाया जा चुका है। जमीन स्तर से मिली इस फीडबैक का असर चुनाव तक होने वाले भविष्य के कार्यक्रमों में भी दिखेगा।

इस फीडबैक का बड़ा लाभ भाजपा की लोकसभा चुनाव की रणनीति में मिलने वाला है। इसी महीने लखनऊ में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी एवं प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह ने प्रदेश के सभी मोर्चों की संयुक्त बैठक बुलाई थी। आरएसएस के सभी अनुषांगिक संगठनों को इसमें लगाया गया। वहीं मंदिर आंदोलन की अगुवाई करने वाले विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के साथ संस्कार भारती, किसान भारती और विद्यार्थी परिषद को भी लगाया गया। भाजपा संगठन की तरफ से भी अपने बूथ लेवल तक के कार्यकर्ताओं को घर-घर अक्षत निमंत्रण पहुंचाने में लगाया।इसमें चुनाव से पहले कई अभियानों और कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संगठन का माइक्रो मैनेजमेंट साझा किया गया। इसमें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी ने कहा कि सभी मोर्चे अपने-अपने अभियानों व कार्यक्रमों के माध्यम से लगातार युवा, किसान, महिला, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अल्पसंख्यक वर्ग के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व की केन्द्र सरकार व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की प्रदेश भाजपा सरकार के सेवा, सुशासन व गरीब कल्याण को समर्पित कार्यों को लेकर उनके बीच पहुंचे।

नवमतदाता अभियान, नमो वारियर्स, लखपति दीदी, बस्ती सम्पर्क, हॉस्टल संवाद, कैम्पस सम्पर्क, किसान संवाद, चाय पर संवाद, घर-घर सम्पर्क, लेखक सम्पर्क, स्मार्ट महिला सम्मेलन, स्पोटर्स महिला समूह सम्पर्क, एनजीओ सम्पर्क, सेल्फी विथ लाथार्थी तथा कमल मित्र जैसे अभियानों के माध्यम से मोर्चो को युवाओं, महिलाओं, किसानों, पिछड़ो, अनुसूचित वर्ग, आदिवासियों व अल्पसंख्यको के साथ सतत सम्पर्क व सतत संवाद के माध्यम से मोदी जी व योगी जी के नेतृत्व की सरकारों के कार्यो के लेखा-जोखा के साथ चर्चा करना है।

जब राम सेना पर चलाई गई ताबड़तोड़ गोलीबारिया!

एक ऐसा समय जब राम सेना पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गई! देवरिया के महेश मणि 2 नवंबर 1990 की तारीख कभी नहीं भूल पाएंगे। विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के आह्वान पर महेश कई रामभक्तों के साथ कारसेवा करने अयोध्या गए थे। जहां शांति पूर्वक रामधुन गा रहे निहत्थे कारसेवकों पर तत्कालीन मुलायम सिंह की सरकार ने अंधाधुंध गोलियां चलवाई थी। पुलिस की गोली से सैकड़ों कार सेवकों की मौत हो गई थी। रामभक्तों के खून से अयोध्या की सड़के लाल हो गई थी। महेश को भी गोली लगी थी। 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से कारसेवक जहां खुश है, वहीं उन्हें निमंत्रण पत्र न मिलने का मलाल भी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर सदियों से आंदोलन होता आया है। देवरिया के राम भक्तों ने भी उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और गोलियां भी खाईं। 1990 में कार सेवा करने अयोध्या गए यहां के काफी संख्या में रामभक्त गंभीर रूप से घायल हुए थे। महेश मणि और चंद्रशेखर को गोलियां भी लगी थी। महेश मणि ने बताया कि विश्व हिंदू परिषद अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल जी ने 30 नवंबर 1990 को अयोध्या में करने का ऐलान किया था। उनके आह्वान पर देश भर के राम भक्त अयोध्या पहुंचे थे। देवरिया जिले से 165 रामभक्तों का जत्था अयोध्या जाने के लिए 24 नवंबर को पैदल ही लिए रवाना हुआ। इस दौरान प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और वह विरोध में थे। सरकार के निर्देश पर राम भक्तों को रोकने के लिए सड़क से लेकर खेतों, और पगडंडियों पर भी पुलिस का पहरा लगा था। महेश ने बताया कि हम सभी लोग यहां से रात को निकले। रास्ते में पुलिस ने कई कार सेवकों को पड़कर जेल में डाल दिया। पुलिस को चकमा देने के लिए हम लोग किसान और व्यापारी के भेष में छोटे-छोटे टुकड़ों में यात्रा करने लगे। जहां लोग थक जाते, वहीं किसी गांव में विश्राम करते थे। गांव के लोग भी कर सेवकों की खूब सेवा करते थे।

रास्ते में पुलिस से छुपते छुपाते नदी नालों को पार करते हुए हम लोग बस्ती पहुंचे। वहां पंजाब, आंध्र प्रदेश समेत विभिन्न प्रदेशों के कार सेवकों से मुलाकात हुई। 6 दिन की पैदल यात्रा के बाद 30 अक्टूबर को हम लोग अयोध्या पहुंचे। सुबह 9 बजे के लगभग वहां कारसेवकों की अपार भीड़ जुट गई। अशोक सिंघल के नेतृत्व में हम लोग जय श्री राम का नारा लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। अयोध्या के हनुमान तिराहे के पास पुलिसवालों से सामना हो गया। पुलिस की लाठी से अशोक सिंघल का सिर फट गया और उनको गंभीर चोटें आई। पुलिसवालों ने निहत्थे कर सेवकों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। इससे कारसेवकों में भगदड़ मच गई और सभी लोग इधर-उधर छुप गए। अशोक सिंघल के घायल होने के बाद उमा भारती ने कार सेवकों का हौसला बढ़ाते हुए 2 नवंबर 1990 को अयोध्या पहुंचने का ऐलान किया। 2 नवंबर को हम सभी उमा भारती के नेतृत्व में कार सेवा के लिए आगे बढ़ने लगे। रास्ते में हनुमान गढ़ी पर पुलिस ने कार सेवकों को रोकने के लिए पहले लाठी चार्ज किया। इसके बाद गोलियां चलानी शुरू कर दी। कटरा पुल, कनक भवन समेत सभी चौराहों पर पुलिसवाले कारसेवकों को घेर कर गोली चलाने लगे। देवरिया के चंद्रशेखर को पैर में गोली लगी और वह घायल हो गए।

पुलिस की गोली से घायल होकर गिरे कार्यकर्ताओं को हम कार सेवक ही कंधे पर लाद कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचते थे। महेश के मुताबिक लगभग 100 कार्यकर्ताओं ने उनके सामने पुलिस की गोली से घायल होकर दम तोड़ा था। कोठारी बंधुओं की भी मौत हुई। अयोध्या की सड़के कर सेवकों के खून से लाल हो गई थी। एक घायल कार सेवक को उठाते वक्त पुलिस की गोली महेश के जबड़े में भी लगी। महेश घायल होकर बेहोश हो गए और होश आया तो अपने आप को अयोध्या के श्रीराम अस्पताल में पाया। पूरा अस्पताल पुलिस की गोली से घायल राम भक्तों से भरा पड़ा था। महेश की स्थित गंभीर होने पर उन्हें अयोध्या से फैजाबाद जिला अस्पताल लाया गया। जहां ऑपरेशन हुआ और स्वस्थ होने के बाद वह घर लौटे। महेश ने बताया कि प्रशासन ने हमें भी मृत मान लिया था और मृतकों की सूची में हमारा भी नाम था। महेश मणि ने बताया 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हम सभी की जीत है। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी जी को विशेष बधाई। मगर इस बात का मलाल भी है कि सरकार उन रामभक्तों को भूल गई, जिन्होंने कार सेवा के दौरान अपने को बलिदान कर दिया। हमें भी निमंत्रण मिलना चाहिए था।

जब राम मंदिर के लिए राम भक्तों का नहीं रहा खुशी का ठिकाना!

हाल ही में राम मंदिर के लिए राम भक्तों का खुशी का ठिकाना नहीं रहा! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या के मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अपने संबोधन में कालचक्र की बात की। उन्होंने कहा कि एक बार फिर कालचक्र बदलेगा और साकारात्मक दिशा में बढ़ेगा। समय के लिए यह भी कहा जाता है कि वो सबसे ज्यादा बलवान है, उसके आगे सारी शक्तियां शून्य हैं- मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान। अयोध्या में राम जन्मभूमि पर इस्लामी आक्रांता के अत्याचार की निशानी मिटाने की संघर्ष गाथा भी समय की शक्ति का अनुभव कराते हैं। एक वक्त था जब अयोध्या में कारसेवकों पर उत्तर प्रदेश की पुलिस ने गोलियां चलाईं और एक वक्त आया है जब रामभक्तों पर वायुसेना के हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा की गई। 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद वीएचपी का शुरू हुआ राम मंदिर आंदोलन कई रामभक्तों का सबकुछ छीन लिया तो कई को हिंदू हृदय सम्राट की ख्याति दिला दी। उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा उन्हीं शख्सियतों में शामिल हैं जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को आकाश की ऊंचाई दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। दोनों की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में मुलाकात हुई तो एक-दूसरे से लिपटकर जार-बेजार रोईं। दोनों की नम आंखों वाली तस्वीरों ने खूब चर्चा बटोरीं। लेकिन एक तस्वीर बहुत कम ही नजरों से गुजर सकी जिसमें उमा भारती ने साध्वी ऋतंभरा के गले में इस तरह हाथ डाले हैं, मानो वो उनकी पीठ पर चढ़ी हों। यह तस्वीर बहुत खास क्योंकि इसने दशकों पुरानी उस दृश्य की याद दिला दी है जब मंदिर आंदोलन आग की दरिया से गुजर रहा था।

वो दिन 6 दिसंबर, 1992 का था। वही दिन जब अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बने बाबरी मस्जि के ढांचे को कारसेवकों ने ध्वस्त कर दिया था। उसी दिन की एक तस्वीर मीडिया की सुर्खियां बटोरने लगीं। उस तस्वीर में भी उमा भारती हैं। इसी मुद्रा में जैसा वो साध्वी ऋतंभरा के साथ सोमवार को दिखीं। तब साध्वी की जगह मुरली मनोहर जोशी थे। उमा भारती बीजेपी के इस दिग्गज नेता की पीठ पर सवार दिखती हैं। दावा किया गया कि यह तस्वीर बाबरी विध्वंस के बाद की है। कहा जाता है कि बाबरी का ढांचा गिरने की खबर से उमा इतनी उत्साहित हो गईं कि वो उछाल मारकर मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर लद गईं। हालांकि, उमा भारती ने इसका जोरदार खंडन किया। वो कहती हैं कि यह तस्वीर 6 दिसंबर, 1992 की ही है, लेकिन बाबरी विध्वंस से घंटों पहले की जब अयोध्या में कारसेवक जुट रहे थे और उनसे संवाद चल रहा था।

बहरहाल, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि जब वो केरल के धनुषकोडी में थे तो सोच रहे थे कि भगवान राम जब समुद्र के रास्ते लंका जा रहे थे तो वह एक कालचक्र के परिवर्तन का सूचक था। आज फिर लगता है कि कालचक्र बदलेगा। पहले आक्रांताओं के अत्याचार से सदियों पीड़ित रहे हिंदुओं को आजादी के बाद भी अपने ही देश में दशकों तक दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया। राम मंदिर के निर्माण को जानकार लोग हिंदू पुनर्जागरण का प्रतीक मान रहे हैं। उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा उन्हीं शख्सियतों में शामिल हैं जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को आकाश की ऊंचाई दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। दोनों की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में मुलाकात हुई तो एक-दूसरे से लिपटकर जार-बेजार रोईं। दोनों की नम आंखों वाली तस्वीरों ने खूब चर्चा बटोरीं। लेकिन एक तस्वीर बहुत कम ही नजरों से गुजर सकी जिसमें उमा भारती ने साध्वी ऋतंभरा के गले में इस तरह हाथ डाले हैं, मानो वो उनकी पीठ पर चढ़ी हों।

अगर यह पुनर्जागरण है तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव भविष्य पर भी होगा। यह तस्वीर बाबरी विध्वंस के बाद की है। कहा जाता है कि बाबरी का ढांचा गिरने की खबर से उमा इतनी उत्साहित हो गईं कि वो उछाल मारकर मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर लद गईं। हालांकि, उमा भारती ने इसका जोरदार खंडन किया। वो कहती हैं कि यह तस्वीर 6 दिसंबर, 1992 की ही है, लेकिन बाबरी विध्वंस से घंटों पहले की जब अयोध्या में कारसेवक जुट रहे थे और उनसे संवाद चल रहा था।करोड़ों हिंदुओं के लिए कालचक्र भले ही बदलने वाला हो, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा जैसी राम मंदिर आंदोलन की नायिकाओं के लिए तो बदल चुका है। दोनों के आंखों से झर-झर बहते आंसू तो आगंतुक कालचक्र के पांव पखार रहे थे।

क्या मालदीव को ले डूबेंगे मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू?

मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू अब मालदीव को ले डूबने पर तुले हैं! चीन का जासूसी जहाज ‘जियांग यांग होंग 03’ मालदीव जा रहा है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने इस कदम से मानो चीन को भारत के दरवाजे पर ही बुला लिया है। उसी मालदीव ने हाइड्रोग्राफिक सर्वे पानी के नीचे का अध्ययन के लिए भारत के साथ मिलकर किए जाने वाले काम को रोकने को कहा है। मालदीव इसे अपनी स्वायत्तता में दखल मानता है। लेकिन उसे चीन से कोई दिक्कत नहीं! मालदीव का यह रुख तब सामने आया है जब हाल ही में श्रीलंका ने चीनी जासूसी जहाजों को अपने बंदरगाहों में आने से मना कर दिया। ऐसे में भारत के पड़ोस में एक कदम आगे, दो कदम पीछे जैसी स्थिति बन गई है। कुछ दिन पहले ही लक्षद्वीप का मसला सामने आया था, जिससे पता चला कि मालदीव की नई सरकार के नेतृत्व में भारत-मालदीव संबंधों में तनाव आने वाला है। मालदीव के उप-मंत्रियों द्वारा पीएम मोदी का अपमान और भारत के बारे में अपमानजनक बातें करने से भारत में काफी नाराजगी थी। लेकिन मुइज्जू ने सिर्फ भारत पर निर्भरता कम करने की रट लगाते रहे। मुइज्जू सरकार ने भारत से कई मांगें की हैं, लेकिन इन मुद्दों को हल करने के लिए भारत के किसी भी प्रस्ताव का जवाब नहीं दिया है। यूएई में मुइज्जू और मोदी की मुलाकात के बाद भी मालदीव का कोई जवाब नहीं आया। लगभग 77 भारतीय रक्षाकर्मी मालदीव में आपातकालीन मेडिकल और रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए दो भारतीय ध्रुव हेलीकॉप्टर और एक डोर्नियर विमान का संचालन कर रहे हैं। मुइज्जू सरकार ने 17 मार्च को होने वाले संसदीय चुनावों से ठीक पहले 15 मार्च तक मालदीव से इन भारतीय सैनिकों को वापस लेने का एकतरफा अल्टीमेटम दिया है। दूसरी तरफ, मालदीव तुर्की से सैन्य ड्रोन खरीद रहा है। हाल ही में चार क्षेत्रीय देशों के कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन में श्रीलंका, मॉरीशस और भारत ने भाग लिया, लेकिन मालदीव नहीं आया। इसके उलट मुइज्जू चीन की ग्लोबल सिक्यॉरिटी इनिशिएटिव में शामिल हो गए।

मालदीव और चीन के संबंधों को अब विस्तृत रणनीतिक सहकारी साझेदारी में अपग्रेड कर दिया गया है। मालदीव पर पहले से ही चीन का 1.3 अरब डॉलर का कर्ज है, जो मालदीव के कुल कर्ज का एक बड़ा हिस्सा है। अब मुइज्जू ने चीन को अपने देश का ‘निकटतम विकास साझेदार’ बताया है। चीन ने मालदीव को 13 करोड़ डॉलर का अनुदान भी दिया है। मुइज्जू को न सिर्फ यह उम्मीद है कि चीन लोन रीपेमेंट को रीशेड्यूल करेगा, बल्कि रास माले में आवास, स्वास्थ्य और पर्यटन के बुनियादी ढांचे और एक वाणिज्यिक बंदरगाह जैसे उनके चुनावी वादों को पूरा करने में भी मदद करेगा। भारत ने मालदीव को बड़ी परियोजनाओं और बजट सहायता से सहारा दिया है, फिर भी मालदीव पर कोई वित्तीय बोझ नहीं पड़ा। बावजूद इसके मालदीव अब श्रीलंका जैसे कर्ज के जाल में फंसता दिख रहा है। मुइज्जू चीन के साथ मुफ्त व्यापार समझौते (एफटीए) को आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे मालदीव पर कर्ज बढ़ सकता है। चीनी पर्यटकों के मालदीव टुअर से भी यह अंतर नहीं भर पाएगा। हाल ही में माले के मेयर के चुनावों में विपक्षी उम्मीदवार की जीत हुई, जो पहले खुद मुइज्जू का पद था। इसका मतलब है कि संसदीय चुनावों से पहले मुइज्जू ‘भारत हटाओ’ और कट्टरपंथी इस्लामी विचारों को और हवा दे सकते हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब वो अपने गुरु और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन से विरासत में मिली पार्टी को मजबूत करने की चुनौती से निपट रहे हैं। सरकारी वेबसाइट पर 152 उप-मंत्रियों की लिस्ट इसी का संकेत है।

मालदीव में इस्लाम दशकों से उदारवादी, बल्कि प्रगतिशील रहा है, जहां बड़े नेता कट्टरपंथी विचारों से दूर रहे हैं। लेकिन मुइज्जू की सरकार शायद मालदीव को पहले से ज्यादा इस्लामिक बनाने का लक्ष्य लेकर चलने वाली पहली सरकार होगी। उन्होंने पिछले महीने क्रिसमस का त्योहार मनाने पर रोक लगा दी थी, हालांकि रिजॉर्ट्स में मनाने की इजाजत दी थी। मालदीव ने आबादी के औसत के लिहाज से सबसे ज्यादा जिहादियों को इराक और सीरिया में आईएसआईएस के साथ लड़ने के लिए भेजा है। ऐसे इस्लामिक तत्वों को बढ़ावा देने से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में अल-कायदा के खिलाफ।

मालदीव में बहुदलीय लोकतंत्र 2008-09 में ही आया। इस सफर में भारत हमेशा साथ खड़ा रहा, चाहे 2004 का सुनामी हो, 2014 का पीने के पानी का संकट हो या 2020 का कोविड। मालदीव के बड़े भाई के स्तर से भारत को घटाना तो समझ में आता है, लेकिन चीन को वो जगह देने का दांव भारी पड़ सकता है। मालदीव को जल्द ही पता चल सकता है कि चीन के गले लगाकर वो आजादी भी खो देंगे जो थोड़ी-बहुत बची है। उन्हें भारत को ‘रौबदार’ कहने और चीन को हमारे रणनीतिक और सुरक्षा क्षेत्र में लाने जैसा काम करने से बचने की जरूरत है। भारत को भी ‘मालदीव का बहिष्कार करो’ जैसे नारे लगाने से बचना चाहिए। भारत को अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए धैर्य रखना चाहिए, लेकिन दृढ़ता भी जरूरी है। कम्पाल में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई ‘खरी बातचीत’ नई परिस्थिति के अनुकूल दिशा में उठाया गया पहला कदम है।