Friday, March 6, 2026
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क्या मल्लिकार्जुन खड़गे बने गठबंधन के संयोजक!

मल्लिकार्जुन खड़गे विपक्ष के गठबंधन के संयोजक बन चुके हैं! विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A. इंडियन नैशनल डिवेलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को गठबंधन का चेयरपर्सन चुना है। ये फैसला शनिवार को गठबंधन की हुई वर्चुअल बैठक में लिया गया गया। इंडिया ब्लॉक की इस पांचवीं मीटिंग में 10 पार्टियों के नेता शामिल हुए। इसमें शामिल सभी दलों ने खरगे को इंडिया ब्लॉक का चीफ बनाए जाने पर सहमति दे दी है। हालांकि, इसका औपचारिक ऐलान गठबंधन के बाकी नेताओं से चर्चा के बाद किया जाएगा। शनिवार को हुई वर्चुअल मीटिंग में न तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शामिल हुई थीं और न ही उनकी पार्टी टीएमसी से कोई और प्रतिनिधि शामिल हुआ। इसी तरह समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और शिवसेना यूबीटी के प्रमुख उद्धव ठाकरे भी शामिल नहीं हुए। बैठक से पहले ये अटकलें थीं कि इसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाए जाने का फैसला हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आखिर खरगे को इंडिया गठबंधन का चेयरपर्सन बनाए जाने का मतलब क्या है? मल्लिकार्जुन खरगे को इंडिया ब्लॉक का चीफ बनाने का कहीं ये मतलब तो नहीं कि वह विपक्ष की तरफ से लोकसभा चुनाव में पीएम पद के उम्मीदवार होंगे? वैसे भी पिछली मीटिंग में अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने खरगे को गठबंधन की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि दलित समुदाय से आने वाले खरगे को पीएम फेस बनाने से चुनाव में विपक्ष को फायदा होगा। तो क्या खरगे को विपक्ष की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार माना जा सकता है? इसका जवाब है- नहीं। गठबंधन का चेयरपर्सन होना अलग बात है, पीएम पद के लिए दावेदार होना अलग। यूपीए के दौरान सोनिया गांधी गठबंधन की चेयरपर्सन थीं लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। इसलिए गठबंधन का चेयरपर्सन बनाए जाने को पीएम पद की उम्मीदवारी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

इंडिया ब्लॉक का संयोजक या मुखिया कौन होगा, ये तय करना एक बड़ी चुनौती थी। विपक्ष इस बड़ी चुनौती से पार पा लिया है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो सीट शेयरिंग की है। लोकसभा चुनाव में बमुश्किल 3-4 महीने बचे हैं लेकिन विपक्षी गठबंधन अबतक यही नहीं तय कर पाया है कि किस राज्य में कौन सी पार्टी कितनी सीटों पर लड़ेगी। अभी यह तय हो जाए तो आगे ये तय करना भी चुनौती होगी कि किन-किन सीटों पर कौन पार्टी लड़ेगी। हालांकि, इसे लेकर बातचीत चल रही है। गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रभाव है इसलिए वह सीट शेयरिंग को लेकर क्षेत्रीय दलों के साथ अलग-अलग बैठकें कर रही है। शनिवार की बैठक में नीतीश कुमार ने भी सीट शेयरिंग को सबसे बड़ी चुनौती बताया। ममता बनर्जी के बैठक में शामिल नहीं होने को भी सीट शेयरिंग की जटिलता से जोड़कर देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब, दिल्ली जैसे राज्यों में सीट शेयरिंग फॉर्म्युला तय करना विपक्ष के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है। ये मामल इतना जटिल है कि अगर इसे सही से हल नहीं किया गया तो चुनाव से पहले हो सकता है कि कुछ पार्टियों की राह गठबंधन से अलग भी हो जाए।

मल्लिकार्जुन खरगे को गठबंधन का चेयरपर्सन बनाए जाने के बाद अब गठबंधन का कोई संयोजक भी चुना जाएगा, इसकी संभावना कम है। वैसे चेयरपर्सन और कन्वेनर यानी संयोजक ये दोनों पद एक साथ भी रह सकते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में गठबंधनों पर नजर डालें तो इसकी संभावना बहुत कम है। कांग्रेस की अगुआई में इससे पहले जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) था, उसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी थीं। यूपीए में कोई संयोजक नहीं था। दूसरी तरफ, अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से बीजेपी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में संयोजक का पद रहा है, चेयरपर्सन का नहीं। जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता एनडीए के संयोजक रह चुके हैं। फिलहाल उसमें संयोजक पद खाली है। अब खरगे को चेयरपर्सन बनाए जाने के बाद नीतीश कुमार को विपक्षी गठबंधन का संयोजक बनाए जाने को लेकर चलने वालीं अटकलों पर विराम लग गया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मीटिंग के दौरान सोनिया गांधी समेत कुछ बड़े नेताओं ने नीतीश कुमार को संयोजक बनाए जाने की पेशकश की लेकिन नीतीश ने उसे ठुकरा दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने ही सबसे पहले विपक्षी दलों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया। असल में वही इंडिया गठबंधन के शिल्पकार हैं। इसलिए समय-समय पर उन्हें गठबंधन का संयोजक बनाए जाने की अटकलें लगती रहती थीं। ये भी अटकलें लगती थीं कि इसमें देरी की वजह से नीतीश कुमार नाराज हैं। अब गठबंधन की पांचवीं बैठक से साफ हो गया कि वह संयोजक नहीं बनने वाले तो क्या इससे बिहार के सीएम वाकई नाराज हैं? कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि मीटिंग के दौरान नीतीश कुमार ने ही कहा कि कांग्रेस से ही किसी नेता को गठबंधन का चेयरपर्सन बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी पद में दिलचस्पी नहीं है, वह अपने लिए कोई पद नहीं चाहते हैं। वह सिर्फ ये चाहते हैं कि गठबंधन मजबूत हो। नीतीश कुमार ने कहा कि एकजुटता जरूरी है।

श्री राम प्राण प्रतिष्ठा के लिए VHP ने किस-किस को दिया न्योता?

श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा के लिए VHP ने दिग्गजों को न्योता दे दिया है! राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को अब बमुश्किल 9 दिन ही बचे हैं। 22 जनवरी को अयोध्या नगरी में दीवाली पहले ही आ गई। 22 जनवरी को भगवान राम अपने घर लौट रहे हैं। अयोध्या सहित पूरा भारत जश्न के मूड में आ गया है। इस बीच वीआईपी लोगों को निमंत्रण देने का क्रम जारी है। इसी कड़ी में शनिवार को विश्व हिंदू परिषद ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, एक्टर अरुण गोविल को न्योता भेजा गया है! विश्व हिंदू परिषद ने अमित शाह, जेपी नड्डा और राजनाथ सिंह को आज राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण भेजा है। वीएचपी ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा, भारत के रक्षा मंत्री व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री राजनाथ सिंह और भारत के गृह मंत्री एवं जिनका राम मंदिर की वर्तमान स्थिति लाने में महत्वपूर्ण योगदान है श्री अमित शाह को 22 जनवरी को श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण सौंपा। श्री जगत प्रकाश नड्डा जी ने निमंत्रण स्वीकार किया और कहा कि वह आएंगे। श्री अमित शाह और श्री राजनाथ सिंह ने मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया तथा कहा कि वे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से चर्चा करके आने व दर्शन करने की तिथि शीघ्र तय करेंगे। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार व मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष श्री नृपेंद्र मिश्रा उपस्थित रहे।

देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी राम मंदिर का निमंत्रण मिला है। वीएचपी ने बताया कि भारत की महामहिम राष्ट्रपति आदरणीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी को 22 जनवरी को श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण सौंपा। उन्होंने इस पर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया तथा कहा कि अयोध्या आने व दर्शन करने का शीघ्र समय तय करेंगी। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री राम लाल, विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार व मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष श्री नृपेंद्र मिश्रा उपस्थित रहे। विश्व हिंदू परिषद ने इसके अलावा 14 जनवरी को मास्टर-ब्लास्टर के नाम से मशहूर और पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर को भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का न्योता दिया है। कप्तान रोहित शर्मा, विराट कोहली के बाद सचिन तीसरे क्रिकेटर हैं जिन्हें राम मंदिर का न्योता दिया गया है। रोहित और कोहली के भी शामिल होने की उम्मीद है।

राम के किरदार से हर भारतवासी के दिल में बसने वाले एक्टर अरुण गोविल को भी राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण मिला है। इस अवसर पर अरुण गोविल ने कहा कि मुझे बड़ी खुशी है कि मुझे राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण मिला, और मैं इस कार्यक्रम को देखने के लिए अयोध्या जाने को बहुत उत्साहित हूं। अरुण गोविल ने रामानंद सागर की रामायण में भगवान राम का किरदार निभाया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चीफ मोहन भागवत को भी इससे दो दिन पहले राम मंदिर कार्यक्रम का न्योता मिल चुका है। विश्व हिंदू परिषद ने विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार और अयोध्या राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने दिल्ली में यह निमंत्रण सौंपा। भागवत को दिल्ली में निमंत्रण मिला है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर और वरिष्ठ नेताओं में से एक लालकृष्ण आडवाणी 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होंगे। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने इसकी पुष्टि कर दी है। अमित शाह और श्री राजनाथ सिंह ने मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया तथा कहा कि वे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से चर्चा करके आने व दर्शन करने की तिथि शीघ्र तय करेंगे। पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर को भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का न्योता दिया है। कप्तान रोहित शर्मा, विराट कोहली के बाद सचिन तीसरे क्रिकेटर हैं जिन्हें राम मंदिर का न्योता दिया गया है। रोहित और कोहली के भी शामिल होने की उम्मीद है।इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार व मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष श्री नृपेंद्र मिश्रा उपस्थित रहे।हालांकि आलोक कुमार ने यह भी बताया कि ज्यादा उम्र होने की वजह से आडवाणी मंदिर से जुड़े सभी कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाएंगे लेकिन 22 जनवरी को वह उपस्थित रहेंगे। उनके स्वास्थ्य को देखते हुए वहां हर तरह की व्यवस्था कर दी गई है।

आखिर नीतीश कुमार क्यों नहीं बन पाए विपक्ष के INDIA गठबंधन के संयोजक?

हाल ही में नीतीश कुमार विपक्ष के INDIA गठबंधन के संयोजक नहीं बन पाए! बिहार के सीएम और जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने I.N.D.I.A गठबंधन का संयोजक बनने से इनकार कर दिया है। नीतीश ने शनिवार को विपक्षी गठबंधन की वर्चुअल बैठक में साफ कर दिया कि उनकी किसी पद में कोई दिलचस्पी नहीं है। जदयू की ओर से बैठक में नीतीश के अलावा ललन सिंह और प्रदेश के मंत्री संजय झा शामिल हुए थे। कांग्रेस ने नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस पर बिहार के सीएम ने कह दिया कि कांग्रेस को ही ब्‍लॉक का चेयरमैन बनना चाहिए। फिर कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को विपक्षी गठबंधन का चीफ बनाने पर मुहर लग गई।इसी तरह की स्थिति कई दूसरे राज्‍यों में भी है। कहीं नीतीश को यह एहसास तो नहीं होने लगा है कि इन्‍हें साथ लाने में ही बहुत वक्‍त निकल जाएगा। साथ आने के बाद भी बीजेपी को इन दलों से कितनी टक्‍कर मिल पाएगी, यह भी कह पाना मुश्किल है। नीतीश के फैसले के बाद अब हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है। आखिर नीतीश कुमार ने संयोजक बनने से क्‍यों मना कर दिया? आइए, यहां समझने की कोशिश करते हैं कि यह फैसला लेते हुए उनके मन में क्‍या बातें हो सकती हैं। नीतीश कुमार राजनीति के पुराने घाघ हैं। अपने कदमों से वह बड़े-बड़ों को कन्‍फ्यूज कर देते हैं। वह कब क्‍या कदम उठा जाएं कोई नहीं जानता। नीतीश पाला बदलने के लिए भी जाने जाते हैं। नीतीश ने संयोजक का पद ठुकराकर लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में जाने का विकल्‍प खुला रखा है। अगर वह ऐसा नहीं करते तो यह ऑप्‍शन उनके लिए बंद हो जाता। फिर उन पर पूरे गठबंधन को साथ लेकर चलने की मजबूरी बन जाती। अब गठबंधन से जुड़े रहने की मजबूरी से वह मुक्‍त हो गए हैं।

शुरू से ही विपक्षी गठबंधन के भविष्‍य को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस गठबंधन में ऐसे तमाम दल हैं जो आपस में कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। वैचारिक रूप से भी ये हमेशा अलग रहे हैं। बंगाल का ही उदाहरण लेते हैं। राज्‍य में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों में हमेशा ठनी रही है। इनका आपस में कोई गठजोड़ होना ही टेढ़ी खीर है। इसी तरह की स्थिति कई दूसरे राज्‍यों में भी है। कहीं नीतीश को यह एहसास तो नहीं होने लगा है कि इन्‍हें साथ लाने में ही बहुत वक्‍त निकल जाएगा। साथ आने के बाद भी बीजेपी को इन दलों से कितनी टक्‍कर मिल पाएगी, यह भी कह पाना मुश्किल है।

बेशक, I.N.D.I.A ब्‍लॉक की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए किसी चेहरे का ऐलान नहीं हुआ है। लेकिन, नीतीश कुमार का नाम हमेशा इससे जोड़कर देखा जाता है। उनकी पार्टी के कई नेता बार-बार उन्‍हें पीएम के चेहरे के तौर पर पेश करते रहे हैं। कन्‍वीनर के पद को ठुकराकर वह कहीं यह संकेत तो नहीं दे रहे कि अब प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश करने से कम कुछ भी काम नहीं करने वाला है। संयोजक पद को ठुकराने के फैसले को तमाम नीतीश कुमार की ओर से अपने अपमान के जवाब के तौर पर भी देख रहे हैं। उन्‍हें लगता है कि नीतीश I.N.D.I.A गठबंधन के सहयोगियों के व्यवहार से दुखी थे। इससे पहले हुई बैठक में ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने विपक्ष की ओर से पीएम पद के लिए मल्लिकार्जुन खरगे के नाम का प्रस्‍ताव किया था।अपने कदमों से वह बड़े-बड़ों को कन्‍फ्यूज कर देते हैं। वह कब क्‍या कदम उठा जाएं कोई नहीं जानता। नीतीश पाला बदलने के लिए भी जाने जाते हैं। नीतीश ने संयोजक का पद ठुकराकर लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में जाने का विकल्‍प खुला रखा है। अगर वह ऐसा नहीं करते तो यह ऑप्‍शन उनके लिए बंद हो जाता। नीतीश के फैसले के बाद अब हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है। आखिर नीतीश कुमार ने संयोजक बनने से क्‍यों मना कर दिया? आइए, यहां समझने की कोशिश करते हैं कि यह फैसला लेते हुए उनके मन में क्‍या बातें हो सकती हैं। नीतीश कुमार राजनीति के पुराने घाघ हैं। अपने कदमों से वह बड़े-बड़ों को कन्‍फ्यूज कर देते हैं। वह कब क्‍या कदम उठा जाएं कोई नहीं जानता।फिर उन पर पूरे गठबंधन को साथ लेकर चलने की मजबूरी बन जाती। अब गठबंधन से जुड़े रहने की मजबूरी से वह मुक्‍त हो गए हैं। यह और बात है कि इसे लेकर कोई सहमति नहीं बनी थी। हालांकि, इसे लेकर जदयू के नेताओं की ओर से आक्रामक प्रतिक्रियाएं आई थीं।

भारत चीन सीमा विवाद पर क्या बोले विदेश मंत्री?

हाल ही में भारत चीन सीमा विवाद पर विदेश मंत्री ने बयान दिया है! विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने बेबाक बोल के लिए जाने जाते हैं। हाजिरजवाबी में उनका कोई सानी नहीं है। देशी हो या विदेशी मंच, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उनके जवाब सुनने लायक होते हैं। इसी कड़ी में विदेश मंत्री जयशंकर आज नागपुर के टाउन हॉल में आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनसे चीन के साथ चल रहे मसले और दुनिया में भारत की ताकत से संबंधित सवाल पूछा गया। जयशंकर ने दोनों का ही बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया। चीन के साथ रिश्तों पर जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा कि सीमा पर तनाव का हल निकलने तक भारत-चीन के रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। दुनिया में भारत की बढ़ती धाक पर कहा कि दुनिया का कोई बड़ा मसला ऐसा नहीं है, जिस पर फैसला लेने से पहले भारत से राय-मशविरा न किया जाए। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया में बढ़ती भारत की धमक से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए कहा कि अब दुनिया का कोई बड़ा मसला तय नहीं होता, जिसमें नई दिल्ली से सलाह-मशविरा न हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत बदल चुका है और दुनिया इसे पहले की तरह नहीं देखती। जयशंकर ने आगे कहा कि भारत का स्वभाव ‘स्वतंत्र’ रहने का है। इसी वजह से हमें अलग-अलग लोगों के साथ अपने हितों को साधना होता है, न कि किसी और के अधीन बनना होता है। जयशंकर ने आगे कहा कि भारत का कद लगातार बढ़ रहा है और आज दुनिया उसे पहले की तरह नहीं देखती। उन्होंने कहा, ‘आज कई देश हमारी ताकत और प्रभाव को देखते हैं। हम 10 साल पहले दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थे, अब हम पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और कुछ ही सालों में हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। हम बदल गए हैं और दुनिया का नजरिया भी हमारे बारे में बदल गया है।’

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘अमृत काल’ की बात करते हैं, तो समझिए ये 10 साल नींव का काम करेंगे। इन्हीं 10 सालों पर अगले 25 सालों की इमारत खड़ी होगी। उनसे पूछा गया कि भारत कैसे अलग-अलग संगठनों का हिस्सा बनकर काम करती है जैसे क्वाड और ब्रिक्स में जो परस्पर विरोधी हितों वाले देशों के समूह हैं? इस सवाल पर विदेश मंत्री ने कहा कि भारत स्वतंत्र है और उसे अलग-अलग लोगों के साथ तालमेल बिठाकर अपने हितों को साधने का तरीका सीखना होगा। जयशंकर ने आगे कहा कि हम कम से कम 5000 साल पुरानी सभ्यता हैं, दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश, दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। हमारा स्वभाव आजाद रहने का है। हम किसी और के अधीन या उनकी कंपनी का हिस्सा नहीं बन सकते, न ही बनना चाहिए। क्योंकि हम स्वतंत्र हैं, हमें अलग-अलग लोगों के साथ संबंध बनाकर अपने हितों की रक्षा करनी सीखनी होगी।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन को दो टूक शब्दों में क्लियर मैसेज दे दिया। नागपुर के कार्यक्रम में जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि बॉर्डर पर तनाव का हल निकलने तक भारत-चीन के रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। जयशंकर ने याद दिलाया कि 2020 में चीन ने सीमा समझौते का उल्लंघन करते हुए लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर सैनिकों की तैनाती बढ़ाई थी। इस वजह से सीमा पर अब भी तनाव बना हुआ है। जयशंकर ने कहा कि मैंने अपने चीनी समकक्ष को साफ कह दिया है कि सीमा पर हल निकलने तक रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। अगर सीमा पर तनाव बना रहेगा, तो आप उम्मीद न करें कि बाकी रिश्ते भी अच्छे रहेंगे। यह सोचना गलत है कि आप लड़ाई करेंगे और साथ ही हमारे साथ व्यापार भी करेंगे। ऐसा नहीं हो सकता।

जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत और चीन के बीच तनावपूर्ण संबंध दोनों देशों के बीच के महत्वपूर्ण रिश्ते को प्रभावित करेंगे, तो उन्होंने समझाया कि 1962 के युद्ध के बाद से ही दोनों देशों के बीच कुछ समझौते हुए हैं। हालांकि, चीन ने उन समझौतों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा, ‘पिछले कुछ सालों में भारत और चीन के बीच संबंध अच्छे या आसान नहीं रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे पास उनके साथ कुछ लिखित समझौते थे, जिनका उन्होंने उल्लंघन किया है।’ जयशंकर ने भारत-चीन संबंधों के इतिहास पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच संबंध काफी तनावपूर्ण हो गए थे। इतने तनावपूर्ण कि हमें चीन में अपना राजदूत भेजने में 14 साल लग गए। उन्होंने आगे कहा, ‘युद्ध 1962 में हुआ था और हमें वहां राजदूत भेजने में 14 साल लग गए। और फिर 26 साल बाद पहली बार हमारे प्रधान मंत्री राजीव गांधी चीन गए थे।’

विदेश मंत्री ने कहा कि 2020 में चीन ने समझौते का उल्लंघन किया और एलएसी पर सैनिकों को लाया। जयशंकर ने आगे कहा कि 2020 में, उन्होंने समझौते के बावजूद इसका उल्लंघन किया। उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बड़ी मात्रा में सैनिकों को तैनात किया । कोविड के दौरान भी, हमने वहां एक बड़ी सेना तैनात की और अपनी सेना को स्थानांतरित कर दिया और तब से, दोनों पक्षों की सेनाएं एक-दूसरे के खिलाफ हैं। इस बात पर जोर देते हुए कि भारत ने इसकी शुरुआत नहीं की। जयशंकर ने कहा कि अगर वे अपने सैनिकों को हमारे सामने लाते हैं, तो हमें उनका मुकाबला करना होगा।

आखिर शुरू हो ही गई राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा?

राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू हो चुकी है! लोकसभा चुनाव की हलचल के बीच कांग्रेस, राहुल गांधी के नेतृत्व में मणिपुर की राजधानी इंफाल से ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू करने जा रही है। यह यात्रा इंफाल के निकट थोबल से शुरू होगी और मार्च के तीसरे सप्ताह यानी 20 मार्च को मुंबई में इसका समापन होगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे इस यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे। ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा ‘ शुरू करने से पहले राहुल गांधी थोबल में खोंगजोम युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे। यह एक ऐतिहासिक स्मारक है, जिसका उद्घाटन 2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया था। यात्रा के दौरान राहुल गांधी हर दिन दो सभाओं को संबोधित करेंगे। इसके अलावा, वह हर दिन समाज के विभिन्न वर्गों के 20 से 25 लोगों से मिलेंगे। वह सामाजिक संगठनों के सदस्यों के साथ भी बातचीत करेंगे। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि अगले 11 दिनों के दौरान यात्रा पूर्वोत्तर के पांच राज्यों से होकर गुजरेगी। 23 जनवरी को राहुल गांधी घोषणापत्र के सिलसिले में गुवाहाटी में लोगों से जनसंवाद करेंगे। कांग्रेस ने इस यात्रा के लिए विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के अपने सहयोगी दलों के नेताओं को भी आमंत्रित किया है और उसे उम्मीद है कि विभिन्न राज्यों में इस गठबंधन से जुड़े दलों के प्रमुख नेता यात्रा का हिस्सा बनेंगे। रमेश ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शनिवार को ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों के नेताओं को यात्रा में भाग लेने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया।

कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले निकाली जा रही यह यात्रा 67 दिन में 15 राज्यों और 110 जिलों से होकर गुजरेगी।‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान लगभग 6,700 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी। यात्रा ज्यादातर बस से होगी, लेकिन कहीं-कहीं पदयात्रा भी होगी। ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरेगी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सात सितंबर 2022 से 30 जनवरी 2023 तक कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाली थी। उनकी 136 दिन की इस पदयात्रा में 12 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के 75 जिलों और 76 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए 4,081 किलोमीटर की दूरी तय की गई थी।

राहुल गांधी की ये यात्रा जिन 15 राज्यों से गुजरेगी, उन राज्यों में लोकसभा की कुल मिलाकर 357 सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन को देखें तो इन राज्यों में कांग्रेस की स्थिति बहुत ही खराब है। कितनी खराब इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इन 357 सीटों में पार्टी महज 14 पर ही जीत हासिल कर पाई थी। भारत जोड़ो न्याय यात्रा वाले राज्यों में से 5 तो ऐसे हैं जहां 2019 में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी। ये हैं- मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल, राजस्थान और गुजरात। इतना ही नहीं, सियासी लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे यूपी समेत यात्रा रूट के 7 राज्यों में कांग्रेस पिछली बार महज 1 सीट पर सिमट गई थी। इस यात्रा के जरिए कांग्रेस अपना सियासी वजूद मजबूत करने की कोशिश करेगी।

इस यात्रा को आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव अगले साल अप्रैल-मई में होने की संभावना है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ कोई चुनावी यात्रा नहीं है, बल्कि देश के लिए न्याय की मांग करना है। हालांकि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से एक सप्ताह पहले आरंभ हो रही उसकी इस यात्रा को लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय से जुड़ा विमर्श खड़ा करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया, ‘आजकल प्रधानमंत्री देश को अमृतकाल के सुनहरे सपने दिखा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि पिछले 10 साल अन्याय काल निकले। अन्याय काल की कोई बात नहीं होती, सिर्फ अमृतकाल की बड़ी बड़ी बातें होती हैं।’ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सात सितंबर 2022 से 30 जनवरी 2023 तक कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाली थी। उनकी 136 दिन की इस पदयात्रा में 12 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के 75 जिलों और 76 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए 4,081 किलोमीटर की दूरी तय की गई थी। यात्रा रूट के 7 राज्यों में कांग्रेस पिछली बार महज 1 सीट पर सिमट गई थी। इस यात्रा के जरिए कांग्रेस अपना सियासी वजूद मजबूत करने की कोशिश करेगी। कहना है कि यह यात्रा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अन्याय के खिलाफ है। रमेश ने कहा, ‘संविधान की बुनियाद न्याय है, इसलिए ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ निकाली जा रही है।’

आखिर बिलकिस बानो केस क्यों था महत्वपूर्ण?

वर्तमान में बिलकिस बानो केस को बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है! पिछले हफ्ते मानवाधिकारों से जुड़े सभी लोगों को खुशी हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों में बिलकिस बानो के परिवार के 11 दोषी बलात्कारी-हत्यारों को वापस जेल भेज दिया। इसके साथ ही सजा में छूट देने के लिए गुजरात हाई कोर्ट की खिंचाई की। जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों ने बढ़ती उम्र और ‘अच्छे व्यवहार’ के आधार पर 14 साल की सजा काटने के बाद रिहाई की मांग की थी। क्या जेल में अच्छा व्यवहार 2002 में उनके राक्षसी व्यवहार की भरपाई कर सकता है? गर्भवती बिलकिस बानो उस समय अपने माता-पिता से मिलने जा रही थी। हत्यारों में परिवार के पड़ोसी शामिल थे। बिलकिसस कहती हैं कि उनमें से एक ने मेरी बेटी को मेरी गोद से छीन लिया और उसे जमीन पर पटक दिया। इससे उसका सिर पत्थर से टकरा गया। बिलकिस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उसकी चचेरी बहन, जिसने दो दिन पहले बच्चे को जन्म दिया था, के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। उसके नवजात बच्चे को भी मार दिया गया। हमलावरों ने परिवार के कम से कम 14 सदस्यों की हत्या कर दी। बिलकिस बेहोश हो गई और हमलावरों ने उसे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया। अकेले सिर्फ उसकी ही जान बच गई थी। अपने परिवार के नरसंहार के बाद, बिलकिस पुलिस के पास गई, लेकिन उस समय के सांप्रदायिक माहौल में, उन्होंने उसके परिवार के हत्यारों के पीछे जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में बिलकिस ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा नए सिरे से जांच का आदेश दिया। इससे हत्यारों के अपराध के स्पष्ट सबूत सामने आए। गुजरात न्याय प्रणाली की समस्याओं और बिलकिस को धमकियों के कारण, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में ट्रांसफर कर दिया। साथ ही मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने हत्यारों को दोषी पाया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हममें से कई लोगों ने सराहना की। हत्यारों की शीघ्र रिहाई के लिए कोई भी याचिका महाराष्ट्र हाई कोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी जिसने उन्हें जेल में डाल दिया था। इसके बजाय, दोषियों ने गुजरात की अदालतों का दरवाजा खटखटाया, जिन्हें पहले न्याय देने के लिए अयोग्य माना गया था। व्यापक आक्रोश के कारण, उन अदालतों ने 11 दोषी हत्यारों को रिहा कर दिया। इससे भी बदतर, दोषियों की रिहाई का जश्न मनाया गया। स्थानीय राजनेताओं ने उन्हें माला पहनाई और नायकों की तरह व्यवहार किया। बिलकिस बानो की पीड़ा बहुत अधिक थी।

इस स्तंभकार ने स्वामीनॉमिक्स में ‘जो लोग फांसी के फंदे के लायक हैं उन्हें माला नहीं पहनाई जानी चाहिए’ शीर्षक से लेख लिखा था। इसमें कहा गया था कि भारत में न्याय की गुणवत्ता अप्रत्याशित हो सकती है, और कभी-कभी बुराई की जीत होती है और निर्दोष लोग जेल में बंद हो जाते हैं। लेकिन क्या हम अन्याय से इतने स्तब्ध हो गए हैं कि हम भय महसूस करने की अपनी क्षमता खो रहे हैं? सौभाग्य से, सुप्रीम कोर्ट ने भय महसूस कराने की अपनी क्षमता नहीं खोई है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि गुजरात हाई कोर्ट ने कानून की प्रारंभिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। चूंकि सजा महाराष्ट्र अदालत द्वारा पारित की गई थी, इसलिए किसी भी शीघ्र रिहाई को उसी अदालत में भेजा जाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात न्याय प्रणाली के पूर्वाग्रहों की आलोचना पहली बार नहीं की है।

2008 में, गुजरात पुलिस-न्याय प्रणाली में पक्षपात के आरोपों से चिंतित, सुप्रीम कोर्ट ने नौ प्रमुख दंगा मामलों की फिर से जांच करने के लिए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल एसआईटी नियुक्त किया। एसआईटी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बरी कर दिया, जबकि निचले स्तर के अन्य लोगों को अभियोजन के योग्य पाया। इसके बाद हजारों मुकदमे चले। हालांकि, आलोचकों ने कहा कि एसआईटी वास्तव में स्वतंत्र नहीं थी, क्योंकि इसके तत्कालीन प्रमुख आरके राघवन के अलावा, आधे सदस्य गुजरात पुलिस से थे। एसआईटी ने पाया कि गुजरात की एक मंत्री, माया कोडनानी, नरोदा पाटिया में भीड़ को ‘उकसाने’ की दोषी थीं। कोडनानी पर मुकदमा चलाया गया और एक सेशन कोर्ट ने उसे दंगे का ‘सरगना’ कहा था। उसे दोषी पाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। हालांकि, उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में अपील की, जिसने उन्हें 2018 में बरी कर दिया। पिछले साल अहमदाबाद की विशेष सुनवाई अदालत ने उन्हें दूसरे दंगों के मामले में भी बरी कर दिया था। मामलों में बरी होने के साथ, वह राजनीति में फिर से प्रवेश कर सकती हैं। गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की है।

2002 के दंगों के हर मामले को दूसरे राज्यों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है। लेकिन निश्चित रूप से निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सबसे प्रमुख मामलों की सुनवाई राज्य के बाहर की जानी चाहिए, जैसा कि बिलकिस मामले में हुआ। वैकल्पिक तौर पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट ले जाया जाना चाहिए। एक और हाई-प्रोफाइल मामला गुजरात के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट का है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया। इसमें आरोप लगाया गया कि गुजरात पुलिस को 2002 में हिंदू दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए कहा गया था। गुजरात सरकार ने हिरासत में मौत के मामले में पर्यवेक्षी अपराध के 1990 के पुराने मामले के लिए भट्ट को निलंबित कर दिया और मुकदमा चलाया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें गुजरात में निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था। इसे गुजरात हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। भट्ट और कोडनानी दोनों पर अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय को देना चाहिए।

जब पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खोला राम मंदिर का ताला!

एक ऐसा समय जब पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला खोला था! अयोध्या पर आज कहा जा रहा है कि राजनीति हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अयोध्या को राजनीतिक एजेंडे के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन, अयोध्या पर राजनीति कब नहीं हुई? यह कोई दावे के साथ नहीं सकता है। राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के लिए मुगल शासक बाबर ने अपने सिपहसालार मीरबाकी के जरिए मंदिर गिरवाई। मस्जिद बनवाया। वह भी तो एक राजनीतिक प्रपंच ही था। अंग्रेजों ने बांटवारा कर भारतीय समाज को दो भागों में बांटा। लोगों को बांटकर 200 सालों तक राज करते रहे। जाते- जाते देश के दो टुकड़े कर गए। तो क्या उसे राजनीतिक नहीं कहेंगे। 1949 में मस्जिद में जब रामलला प्रगट हुए तो उन्हें दोबारा चबूतरे तक लाने में देश- प्रदेश की सत्ता के पसीने छूट गए। तब क्या मुद्दा राजनीतिक नहीं था। लेकिन, धर्म और राजनीति का जो खेल 1984 में शुरू हुआ, वह अलग था। मैं अयोध्या हूं और मैं आपको आज 1986 का प्रभु रामलला के दर पर लगे ताला खुलने की उस कहानी को सुनती हूं। सुनिए और विचार कीजिए कि क्या बिना राजनीति के इस कार्य को पूरा कराया गया। देश में नई गठित भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक मौके जैसा था। उसने कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व को आधार बनाकर हिंदुत्व की विचारधारा की ऐसी राजनीति की कि अगले 30 सालों में पार्टी ने देश में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। 22- 23 दिसंबर की रात बाबरी मस्जिद परिसर में रामलला के प्रगट होने के बाद विवाद गहरा गया था। फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी परिसर में रामलला और उनके परिजनों की मूर्ति मिलने के बाद वहां ताला लगवाने का आदेश जारी किया। निचली अदालत के आदेश के खिलाफ बार- बार अपील की जाती रही, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही थी। लेकिन, 1986 में मेरे राम ने अलग ही लीला दिखाई। स्थानीय वकील उमेश चंद्र पांडेय की ओर से एक याचिका दायर की गई। इसमें रामलला का ताला खुलवाने और पूजा की मांग की गई। एक इंटरव्यू में वकील उमेश चंद्र पांडेय ने कहा है कि 1984 में अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद का राम मंदिर निर्माण को लेकर पहला सम्मेलन हुआ। उस समय वकालत के साथ उमेश पत्रकारिता से जुड़े थे। वे भी इसे कवर करने पहुंचे थे।

विश्व हिंदू परिषद के मंच से राम मंदिर को लेकर कई दावे किए गए। इसी क्रम में जस्टिस एसएन काटजू की ओर से कहा गया कि पूजा स्थल पर ताला लगाने का कोई प्रशासनिक आदेश नहीं है। इसके बाद उमेश चंद्र ने रिकॉर्ड खोजना शुरू किया। उन्हें कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिसमें पूजा स्थल पर ताला लगाए जाने का आदेश हो। पूरी पड़ताल करने के बाद 25 जनवरी 1986 को उमेश चंद्र ने फैजाबाद सिविल कोर्ट में सदर मुंसिफ के सामने ताला खुलवाने की अर्जी दायर की। सदर मुंसिफ ने कोई आदेश जारी नहीं किया। अर्जी पर कहा गया कि इस मामले के सभी दस्तावेज हाई कोर्ट के पास हैं।

28 जनवरी 1986 को सदर मुंसिफ के आदेश पर उमेश चंद्र ने जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट में अपील दायर की। 31 जनवरी 1986 को जिला जज पूरे दिन इस याचिका पर अर्जेंट सुनवाई की। उमेश चंद्र ने कोर्ट से साफ कहा कि उनकी यह अपील प्रशासन के खिलाफ है। वह मुस्लिम पक्ष के खिलाफ नहीं हैं। एक फरवरी को सुनवाई की अगली तारीख दी गई। डीएम इंदु प्रकाश पांडेय और एसपी करमवीर सिंह कोर्ट में तलब किए गए। डीएम और एसपी दोनों ने अदालत में हाजिर हुए। उन्होंने कहा कि हमें ताला खुलने से कोई ऐतराज नहीं है। ताला खुलने से लॉ एंड ऑर्डर को किसी प्रकार का खतरा नहीं होने का दावा किया गया। जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट ने दोनों को सुनने के बाद ताला खोलने का आदेश दे दिया।

जिला जज केएम पांडेय के आदेश का त्वरित पालन कराया गया। आजाद भारत में कोर्ट के आदेश का इस तेजी से पालन का यह पहला मामला था। दरअसल, 1 फरवरी 1986 की शाम 4:40 बजे अदालत का फैसला आया। शाम 5:20 बजे विवादित परिसर का ताला खुल चुका था। दरअसल, अदालत का आदेश जारी होते ही सभी पक्ष बाबरी परिसर पहुंच गया। वहां ताला खोलने की कोशिश शुरू हुई। ताला इतना पुराना था कि खुलना संभव नहीं था। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में ताले को तोड़ दिया गया। इसके बाद से आंगन के अंदर प्रवेश कर पूजा की स्थिति बन गई। विश्व हिंदू परिषद की रथयात्रा भी अयोध्या की सीमा में 1 फरवरी को पहुंच रही थी। ताला खुलवाने को यह रथ यात्रा निकली थी। मकसद पूरा होते ही इस रथ यात्रा को विजय रथ यात्रा का नाम दे दिया गया। तमाम रिपोर्ट्स दावा करती है कि कोर्ट के फैसले के अनुपालन के बाद अयोध्या में कोई हलचल नहीं हुई थी। सबकुछ सामान्य था।

सीनियर पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में इस घटना का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वीर बहादुर सिंह से मेरी इस मुद्दे पर उनकी लंबी चर्चा हुई थी। पूर्व सीएम के मुताबिक राजीव गांधी के परामर्श से अरुण नेहरू पूरे मामले का संचालन कर रहे थे। सीएम वीर बहादुर सिंह से कहा गया था कि कोर्ट में सरकार कोई हलफनामा न दे। फैजाबाद के डीएम और एसपी को कोर्ट में हाजिर होकर कहने का आदेश था कि अगर ताला खुला तो प्रशासन को कोई ऐतराज नहीं होगा। हालांकि, कोर्ट के आदेश के एक सप्ताह के भीतर हाशिम अंसारी ने कोर्ट में ताला खुलवाने के आदेश को चुनौती दी। कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया।

मेरे लिए कोर्ट का यह आदेश खुशियां लाने वाला था। मेरे प्रभु रामलला ताला तोड़कर बाहर निकल आए थे। भक्त अब उनकी पूजा करने का कानूनी अधिकार हासिल कर चुके थे। हालांकि, राजीव गांधी सरकार और यूपी की वीर बहादुर सिंह की सरकार ने जिस तेजी से आदेश का पालन कराया, यह चौंकाने वाला था। इसके पीछे के कारणों पर आज भी बहस होती है। एक वर्ग का दावा है कि विश्व हिंदू परिषद के हिंदुत्व एजेंडे को काटने के लिए यह कदम उठाया गया। 1949 में अयोध्या डीएम के सुझाव पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और यूपी की गोविंद बल्लभ पंत सरकार ने जिस बाबरी मस्जिद में फेंसिंग करने और श्रद्धालुओं को रामलला के निकट न जाने के लिए पर्याप्त उपाय किए थे।

राजीव गांधी सरकार ने इस मामले में बड़ा निर्णय लिया। राजीव सरकार ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर प्रभु रामलला की पूजा को लेकर काम शुरू कर दिया गया। दरअसल, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को सबसे बड़ी जीत मिली। पार्टी 404 सीटों पर लोकसभा चुनाव 1984 के चुनाव में जीती थी। बावजूद इसके कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ रहा था। हालांकि, वर्ष 1986 की इस घटना को राजनीतिक रूप से राजीव गांधी की सबसे बड़ी भूल के रूप में देखा जामा है। इस निर्णय के बाद देश में कांग्रेस के जनाधार में लगातार गिरावट आई। पार्टी कभी भी इस निर्णय के बाद पूर्ण बहुमत हासिल करने में अब तक सफल नहीं हो पाई। कांग्रेस के एजेंडे में शुरुआती दिनों में राम समाहित थे। महात्मा गांधी का भगवान राम से गहरा जुड़ाव था। महात्मा गांधी हमेशा कहा करते थे कि भगवान राम के नाम से मुझे ताकत मिलती है। यह मुझे संकट के क्षणों से राह दिखाती है। नई ऊर्जा से भर देती है। एक सच्चे रामभक्त की तरह उन्होंने पूरे जीवन राम के नाम का जाप किया। महात्मा गांधी ने अपने जीवन में भी प्रभु श्रीराम के जीवन की सरलता, सादगी और आत्म समर्पण के भावों को अपनाया। राजीव गांधी ने हिंदू वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए राम के नाम का इस्तेमाल किया। भगवान राम और रामायण के देश पर प्रभाव का ज्ञान था। यही कारण था कि 1985 में उनके कहने पर दूरदर्शन पर रामानंद सागर के रामायण के प्रसारण की योजना तैयार की गई। वर्ष 1987 से 1988 के बीच इस धारावाहिक का प्रसारण दूरदर्शन पर किया गया।

राजीव गांधी ने वर्ष 1989 में राम मंदिर को लेकर बड़ा निर्णय लिया। यूपी के पूर्व सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाकर उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवा दिए थे। इसके बाद हिंदुओं को प्रभु रामलला के दर्शन का मौका मिला। शाहबानो केस में घिरे राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे। हिंदू वर्ग में उनके खिलाफ माहौल बन रहा था। इसके अलावा कई घोटालों के आरोप भी राजीव सरकार पर लगने लगे थे। ऐसे में राजीव गांधी ने लोकसभा चुनाव 1989 के भाषणों में अक्सर देश में रामराज लाने का वादा किया। 1989 प्रयाग कुंभ के बाद विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण पर आंदोलन को तेज किया। परिषद की ओर से 9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। इस पर काफी विवाद और खींचतान मची।

रामराज लाने का चुनावी वादा करने वाले राजीव सरकार के सामने कोई ऑप्शन नहीं था। वह हिंदुओं को नाराज नहीं करना चाहते थे। राजीव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद को मंदिर के शिलान्यास की इजाजत दे दी। तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को उन्होंने शिलान्यास कार्यक्रम में भेजा। विश्व हिंदू परिषद की ओर से बिहार के रहने वाले कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास कराया गया। राम मंदिर आंदोलन का यह एक अहम पड़ाव था। कई राजनीतिक विश्लेषक दाव करते हैं कि राजीव पर भगवान राम का असर था। भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि अगर 1989 में राजीव सरकार बनती तो निश्चित तौर पर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती।

क्या अब भारत का इसरो प्राप्त करने वाला है नई मंजिलें?

भारत का इसरो अब नई मंजिलें प्राप्त करने वाला है! भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने गुरुवार को यहां कहा कि भारत अपनी मौजूदा क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए 2028 तक पहला भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना चाहेगा। वह 10वें ‘वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट’ के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के संदर्भ में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। एस सोमनाथ ने कहा, ‘हम अपनी मौजूदा प्रक्षेपण क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए 2028 तक पहला भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना चाहेंगे। और हम इसे प्रयोगशाला में तब्दील करना चाहेंगे जहां आप आएं और प्रयोग करें।’ इसरो प्रमुख ने कहा इसकी स्थापना के बाद इसरो ऐसी कंपनियों और संस्थाओं का पता लगाएगा जो भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का उपयोग कर सकेंगे और इसके माध्यम से आर्थिक गतिविधियां कर सकेंगे। सोमनाथ ने कहा कि उनका मानना है कि यह संभव है। सोमनाथ ने कहा कि चंद्रमा पर मानव के पहुंचने का भी आर्थिक प्रभाव होगा क्योंकि भविष्य में केवल पृथ्वी के इर्दगिर्द ही रणनीतिक गतिविधियां नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि उद्योगों को पृथ्वी पर अनेक कार्यों के लिए अगले 5 से 10 साल में सैकड़ों अंतरिक्षयान बनाने होंगे। यही नहीं आपको बता दें कि नए साल पर भारतीय स्पेस एजेंसी ने देशवासियों को बड़ा सरप्राइज दिया। सोमवार को साल के पहले ही दिन इसरो ने एक्स-रे पोलरिमीटर (XPoSat) सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इस सैटेलाइट के लॉन्च करने के बाद भारत अमेरिका के बाद एक इकलौता ऐसा देश बन गया, जिसने ब्लैक होल की स्टडी करने के लिए डेडीकेटेड सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा है। ये सैटेलाइट ब्रह्मांड को बेहतर तरीके समझने में मदद करेगा। सोमवार सुबह 9.10 बजे भारत का सबसे भरोसेमंद माने वाले PSLV रॉकेट अपनी पीठ पर इस सैटेलाइट को बांधकर अंतरिक्ष की ऊंचाई में उड़ गया। इस रॉकेट की ये 60वीं उड़ान थी। PSLV रॉकेट ने XPoSat सैटेलाइट को पृथ्वी की 650 किलोमीटर की ऑर्बिट में स्थापित किया। अपनी तय ऑर्बिट में पहुंचने के बाद PSLV-C58 का अंतिम चरण एक कक्षीय प्रायोगिक मॉड्यूल POEM में बदल गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की तारीफ करते हुए कहा, ‘हमारे वैज्ञानिकों की बदौलत 2024 की शानदार शुरुआत! यह लॉन्चिंग अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक शानदार खबर है और इस क्षेत्र में भारत की शक्ति को बढ़ाएगा। भारत को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए इसरो के हमारे वैज्ञानिकों और पूरे अंतरिक्ष बिरादरी को शुभकामनाएं।’इसका इस्तेमाल अगले महीने 10 पेलोड की टेस्टिंग के लिए किया जाएगा।

इसरो ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सैटेलाइट को लॉन्च किया। लॉन्चिंग के करीब 22 मिनट बाद PSLV रॉकेट ने XPoSat सैटेलाइट को ऑर्बिट में स्थापित किया। सैटेलाइट लॉन्चिंग की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी हुई। लॉन्चिंग के दौरान इंजनों को निकाला नहीं गया ताकि सैटेलाइट को 6 डिग्री के झुकाव के साथ सटीक रूप से तैनात किया जा सके। XPoSat सैटेलाइट का प्राथमिक उद्देश्य ब्लैक होल, न्यूट्रॉन सितारों और सुपरनोवा जैसे खगोलिय पिंडों द्वारा उत्सर्जित एक्स-रे की स्टडी करना है। इसमें दो पेलोड हैं: पहला रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा डेवलेप पोलिक्स एक्स-रे में पोलारिमीटर इंस्ट्रूमेंट और दूसरा यूआरएससी के अंतरिक्ष खगोल विज्ञान समूह द्वारा विकसित एक्सस्पेक्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोस्कोपी और टाइमिंग।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की तारीफ करते हुए कहा, ‘हमारे वैज्ञानिकों की बदौलत 2024 की शानदार शुरुआत! यह लॉन्चिंग अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक शानदार खबर है और इस क्षेत्र में भारत की शक्ति को बढ़ाएगा। भारत को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए इसरो के हमारे वैज्ञानिकों और पूरे अंतरिक्ष बिरादरी को शुभकामनाएं।’

इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने अपनी सैटेलाइट लॉन्चिंग को ‘नए साल का तोहफा’ बताया। उन्होंने XPoSat सैटेलाइट की क्षमताओं और इसरो के वैज्ञानिक उद्देश्यों को आगो बढ़ाने में इसके महत्व पर जोर दिया। एस सोमनाथ ने एस्ट्रोसैट और आदित्य-एल1 जैसे अन्य अंतरिक्ष मिशनों के साथ XPoSat के महत्व को बताया। रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक बयान के अनुसार, XPoSat दुनिया में केवल दूसरा एक्स-रे पोलारिमेट्री मिशन है, जो 2021 में लॉन्च किए गए नासा के इमेजिंग एक्स-रे पोलारिमेट्री एक्सप्लोरर के बाद है। पीएस4 कक्षीय मॉड्यूल में कुल 10 पेलोड हैं, जिसमें एक ईंधन सेल पावर सिस्टम और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र द्वारा विकसित सिलिकॉन-आधारित उच्च ऊर्जा सेल शामिल है। इसरो प्रमुख ने 2024 को गगनयान मिशन की तैयारी का साल बताया और कहा कि इस साल में इसरो 12-14 मिशन लॉन्च करेगा। रिपोर्ट्स के मुताबित इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने घोषणा की कि भारत का पहला सौर मिशन आदित्य एल-1, 6 जनवरी को अपनी मंजिल यानी सूर्य के L1 पॉइंट पर पहुंच जाएगा।

प्राण प्रतिष्ठा से पहले किस तपश्चार्य का पालन करेंगे पीएम मोदी?

आज हम आपको बताएंगे कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले पीएम मोदी किस तपश्चार्य का पालन करने वाले हैं! राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में अब केवल कुछ दिन ही बचे हैं। अयोध्या में इसके लिए पूरी तैयारी चल रही है। पीएम नरेंद्र मोदी ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले 11 दिन का विशेष अनुष्ठान भी शुरू कर दिया है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी है। पीएम मोदी इसके लिए तमाम पूजा प्रक्रिया करेंगे। पीएम मोदी के इस 11 दिवसीय अनुष्ठान को लेकर अब कयासबाजी का भी शुरू हो गई है। पीएम मोदी ने अपने अनुष्ठान की शुरुआत पंचवटी के नासिक से कर रहे हैं। माना जा रहा है कि पीएम मोदी इस अनुष्ठान के बाकी बचे 10 और दिन भगवान राम के समय से जुड़ी जगहों पर जा सकते हैं। हालांकि, अभी ये पूरी तरह से अटकलें और इसपर आधिकारिक पुष्टि नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि जिस तरीके से पीएम मोदी ने रामयण काल से जुड़ी जगहों से शुरुआत की है तो हो सकता है कि वह अन्य जगहों पर भी जाएं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के लिए पीएम मोदी ने पूजा के लिए अनुशासन व्यवस्था शुरू कर दी है। पीएम आज से 11 दिन का विशेष अनुष्ठान शुरू कर रहे हैं। पीएम मोदी ने ट्वीट कर रहा कि अब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में केवल 11 दिन ही बचे हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु ने मुझे प्राण प्रतिष्ठा के दौरान सभी भारतवासियों का प्रतिनिधित्व करने का निमित्त बनाया है। उन्होंने कहा कि इसके लिए वह आज से 11 दिन का विशेष अनुष्ठान शुरू कर रहे हैं।

पीएम मोदी ने पंचवटी से अपने अनुष्ठान की शुरुआत कर दी है। पौराणिक मान्यता है कि अपने वनवास के दौरान भगवान राम पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ यहां कुछ वक्त गुजारा था। पंचवटी का नाम पंच और वती से बना है। पंच का अर्थ पांच से होता है जबकि वती का अर्थ बरगद के पेड़ से है। यहीं पर सीता की गुफा भी स्थित है। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा विशेष मुहूर्त में होगी। ये 84 सेकेंड का मुहूर्त है। राम मंदिर में ये शुभ समय 22 जनवरी 2024 को 12 बजकर 29 मिनट 8 सेकेंड से लेकर 12 बजकर 30 मिनट 32 सेकेंड तक रहेगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम का जन्म अभिजीत मुहूर्त, मृगशीर्ष नक्षत्र, अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के संगम पर हुआ था। 22 जनवरी को ये सारे शुभ समय एक साथ होंगे। इसीलिए रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का ये समय सबसे आदर्श बन जाता है।

प्राण प्रतिष्ठा के दिन पीएम मोदी सबसे पहले रामलला की प्रतिमा का नेत्र आवरण खोलेंगे। इसी समय भगवान राम की प्रतिमा को पवित्र जल से स्नान कराया जाएगा। इसके बाद भगवान राम को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया जाएगा। फिर पीएम मोदी सिंहासन पर अचल मूर्ति स्थापित करेंगे। मूर्ति की स्थापना के बाद पीएम नरेंद्र मोदी एक विशाल सभा को भी संबोधित करेंगे। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताया मंदिर के सामने केंद्रीय शिखर और दो पार्श्व शिखरों तथा खुले मंच पर कुर्सियां लगाई जाएंगी। उन्होंने बताया कि कुल 6 हजार कुर्सियां लगाई जाएंगी।

यही नहीं, रामलला का पुरानी मूर्ति की पूजा होगी। रामलला की पुरानी मूर्ति को पहले रखा जाएगा और इसे राम उत्सव कहा जाएगा। 16 जनवरी के एक दो दिन बाद दोनों मूर्तियां नए राम मंदिर में रख दी जाएंगी। राम मंदिर के गर्भगृह में 5 वर्षीय रामलला की मूर्ति रखी जाएगी। मंदिर समिति ने 5 साल के भगवान राम की मूर्ति का चयन किया है। ये मूर्ति काले पत्थरों की होगी। मिश्रा ने कहा कि रामायण में रामलला के लिए श्याम रंग का जिक्र है इसलिए काले पत्थर की मूर्ति का चयन किया गया है। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम 16 जनवरी से 22 जनवरी तक चलेगा। 7 जनवरी को श्रीविग्रह का परिसर भ्रमण कराया जाएगा। इसके बाद गर्भगृह का शुद्धिकरण होगा। 18 जनवरी से अधिवास प्रारंभ होगा। जिसमें सुबह और शाम जलाधिवास, सुगंध और गंधाधिवास भी होगा। 19 जनवरी से फल अधिवास और फिर धान्य अधिवास होगा।विशाल सभा को भी संबोधित करेंगे। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताया मंदिर के सामने केंद्रीय शिखर और दो पार्श्व शिखरों तथा खुले मंच पर कुर्सियां लगाई जाएंगी। उन्होंने बताया कि कुल 6 हजार कुर्सियां लगाई जाएंगी। 20 जनवरी को पुष्प और रत्न एवं शाम को धृत अधिवास होगा। 21 जनवरी को सुबह में शर्करा, मिष्ठान और मधु अधिवास फिर औषधि एवं शैय्या अधिवास होगा। 22 जनवरी को रामलला की आंखों से पट्टी हटाई जाएगी फिर उन्हें दर्पण दिखाया जाएगा।

जानिए कौन है चार शंकराचार्य जिन्होंने किया मोदी सरकार का विरोध?

आज हम आपको चार शंकराचार्य के बारे में बताएंगे जिन्होंने मोदी सरकार का विरोध किया है!अयोध्या में 22 जनवरी को राम मंदिर ‘प्राण प्रतिष्ठा’ अभिषेक समारोह होना है। खास बात है कि इस समारोह से चार शंकराचार्य शामिल नहीं होंगे। हालांकि, इन चार शंकराचार्य में से दो लोगों ने अब इस आयोजन को अपना समर्थन देने की बात कही है। इससे पहले एक वीडियो संदेश में जोशीमठ के ज्योर्तिपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा था कि चारों शंकराचार्यों में से कोई भी अयोध्या में समारोह में शामिल नहीं होगा क्योंकि यह मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने से पहले किया जा रहा है। इस संबंध में विश्व हिंदू परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने गुरुवार को कहा कि प्राण प्रतिष्ठा का स्वागत करने वाले द्वारका और श्रृंगेरी शंकराचार्यों के बयान पहले से ही सार्वजनिक हैं। उन्होंने कहा कि पुरी शंकराचार्य भी इस समारोह के पक्ष में हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वारनंद ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय को लेकर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का वीडियो शेयर हो रहा है। इसमें कहा गया है कि चारों शंकराचार्य वहां पर नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये लोग किसी राग या द्वेष के कारण नहीं जा रहे ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्यों का यह दायित्व है कि वे शास्त्रविधि का पालन करें और करवाएं। वहां पर शास्त्र विधि की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि सबसे पहली उपेक्षा यह है कि मंदिर अभी पूरा बना नहीं है और प्रतिष्ठा की जा रही है। कोई ऐसी परिस्थिति नहीं है कि अपने को अचानक कर देना पड़े। ये हमको कहना ही पड़ेगा पूछे जाने पर कि यह ठीक नहीं है।

गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद स्वामी महाराज का कहना है कि मेरा हृदय ऐसा नहीं कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का निमंत्रण मिले तो मैं फूल जाऊं। वहीं, निमंत्रण नहीं मिलने पर कुपित हो जाऊं। उन्होंने कहा कि राम जी शास्त्रों के हिसाब से प्रतिष्ठित हों, ये आवश्यक है। उनका कहना है कि अभी प्रतिष्ठा शास्त्रों के हिसाब से नहीं हो रही है, इसलिए मेरा उसमें जाना उचित नहीं है। स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि आमंत्रण आया है। इसमें कहा गया है कि एक व्यक्ति के साथ आ सकते हैं। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि कौन मूर्ति का स्पर्श करे कौन ना करे, इसका ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि पुराणों में लिखा है कि देवता मूर्ति तब प्रतिष्ठित होते हैं, जब विधिवत हों। अगर ये ढंग से ना किया जाए तो देवी देवता क्रोधित हो जाते हैं। शंकराचार्य ने कहा कि ये खिलवाड़ नहीं है। ढंग से किया जाए तभी देवता का तेज सबके लिए अच्छा रहता है वरना विस्फोटक हो जाता है। उनका कहना था कि मोदी जी लोकार्पण करेंगे, मूर्ति का स्पर्श करेंगे और मैं वहां ताली बजा के जय-जय करूंगा क्या? मुझे अपने पद की गरिमा का ध्यान है। ऐसे में मैं वहां गया तो मोदी अधिक से अधिक नमस्कार कर देंगे। अयोध्या से मुझे परहेज नहीं है। इस अवसर पर जाना उचित नहीं है।

श्रृंगेरी मठ की ओर से बयान जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि शंकराचार्य भारतीतीर्थ की तस्वीर के साथ एक संदेश शेयर किया जा रहा है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि श्रृंगेरी शंकराचार्य प्राण प्रतिष्ठा का विरोध कर रहे हैं। हालांकि, ऐसा कोई संदेश शंकराचार्य की ओर से नहीं दिया गया है। ये गलत प्रचार किया जा रहा है। श्रृंगेरी शंकराचार्य की इस संबंध में एक अपील भी की गई है। इसमें कहा गया है कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हों। हालांकि शंकराचार्य स्वयं अयोध्या में कार्यक्रम में शामिल होंगे या नहीं, इस बारे अभी साफ तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है।

राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर शारदापीठ के शंकराचार्य की ओर से भी सोशल मीडिया पर बयान शेयर किया गया है। इसमें कहा गया है कि शंकराचार्य सदानंद महाराज की ओर से कोई बयान नहीं दिया गया है। राम मंदिर के लिए हमारे गुरुदेव ने कई कोशिशें की थीं, 500 साल बाद ये विवाद खत्म हुआ है। बयान में कहा गया है कि हम चाहते हैं कि राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह वेद, शास्त्र, धर्म की मर्यादा के पालन के साथ हों। हालांकि, बयान में यह नहीं बताया गया है कि द्वारका मठ के शंकराचार्य खुद प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होंगे या नहीं?