Friday, March 6, 2026
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आखिर क्या है सोमनाथ मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की कहानी?

आज हम आपको सोमनाथ मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की कहानी सुनाने जा रहे हैं! कांग्रेस ने अयोध्‍या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्‍ठा कार्यक्रम में नहीं जाने का फैसला किया है। राम मंदिर ट्रस्‍ट की ओर से पार्टी को कार्यक्रम में शामिल होने का न्‍योता मिला था। कांग्रेस ने इसे बीजेपी और आरएसएस का इवेंट बताकर अस्‍वीकार किया है। न्योते को ठुकराए जाने के बाद सियासत गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने इसका कनेक्‍शन 73 साल पहले सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन से जोड़ दिया है। इसे लेकर बीजेपी और कांग्रेस में वार-पलटवार शुरू हो गया है। बीजेपी ने कांग्रेस पर राम विरोधी होने का आरोप लगाया है। सात दशक पहले की याद दिलाते हुए उसने पूरे मामले में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी लपेट लिया है। तब नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल होने से रोका था। दोनों के बीच इसे लेकर खुलकर मतभेद सामने आ गए थे। क्‍या था वो किस्‍सा? आइए, यहां जानते हैं। बात सात दशक पहले की है। माहौल कमोबेश अभी जैसा बन गया था। तारीख थी 11 मई 1951। गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन था। यह 12 ज्‍योतिर्लिंगों में से एक है। आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है।

11 मई 1951 को भारत के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ही मंदिर में ज्‍योतिर्लिंग को स्‍थापित किया था। कार्यक्रम में राजेंद्र प्रसाद के शामिल होने पर नेहरू ने आपत्ति जताई थी। नेहरू ने इसमें शामिल होने से साफ मना कर दिया था। नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को चिट्ठी लिखकर नाखुशी जाहिर की थी। साथ ही उनसे यह भी कहा था कि वह भी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करें। सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम से करीब तीन महीने पहले नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को चिट्ठी लिखी थी। यह चिट्ठी 13 मार्च 1951 को लिखी गई थी। उन्‍होंने लिखा था- अगर आपको लगता है कि निमंत्रण अस्‍वीकार करना आपके लिए सही नहीं होगा तो मैं दबाव नहीं डालूंगा। नेहरू ने लिखा था कि प्रसाद की सोमनाथ मंदिर यात्रा राजनीतिक महत्‍व ले रही है। यह सरकारी कार्यक्रम नहीं है। लिहाजा, उन्‍हें इसमें नहीं जाना चाहिए।

दरअसल, नेहरू नहीं चाहते थे कि राष्‍ट्रपति पद पर रहते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद किसी धार्मिक कार्यक्रम का हिस्‍सा बनें। बता दें कि आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है।तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्‍ताव रखा था। बता दें कि नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। इसी के चलते नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को रोकने की कोशिश की। यह और बात है कि प्रसाद ने नेहरू की एक नहीं सुनी और सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए।

नेहरू की चिट्ठी के जवाब में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी पत्र लिखा था। प्रसाद ने लिखा था- मैं अपने धर्म को बहुत मानता हूं और इससे खुद को अलग नहीं कर सकता। फिर न केवल वह उद्घाटन में शामिल हुए। अलबत्‍ता कार्यक्रम के अनुसार, शिवलिंग की स्‍थापना भी की। तारीख थी 11 मई 1951। गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन था। यह 12 ज्‍योतिर्लिंगों में से एक है। आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है।तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्‍ताव रखा था। बता दें कि नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। इसी के चलते नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को रोकने की कोशिश की। यह और बात है कि प्रसाद ने नेहरू की एक नहीं सुनी और सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए। इसे लेकर उन्‍होंने महात्‍मा गांधी को पत्र लिखा था। गांधी ने इस प्रस्‍ताव की सराहना की थी। लेकिन, शर्त रखी थी कि इसमें सरकारी धन खर्च नहीं होना चाहिए। पटेल ने इस शर्त का अक्षरश: पालन किया था।

क्या हूती बन चुके है भारत के लिए नई चुनौती?

हूती अब भारत के लिए नई चुनौती बन चुके हैं! लाल सागर के जहाजों पर लगातार हमले होने के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मजबूरन एक प्रस्ताव पारित करना पड़ा। इस प्रस्ताव में इन व्यवधानों को रोकने की मांग की गई है।जब तक उन्हें बलपूर्वक रोका नहीं जाता। हूती निकट भविष्य में लाल सागर के जहाजों को बाधित करते रहने की क्षमता रखते हैं। उनके पास हथियार, दक्षता और इच्छाशक्ति है। वे जो मिसाइल और ड्रोन जहाजों पर दाग रहे हैं, वे अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा उन्हें मार गिराने के लिए आवश्यक हथियारों की तुलना में बहुत सस्ते हैं। हूती अगर सटीक और सीधा निशाना नहीं लगा पाएं तो भी वो जहाजों की आवाजाही रोक तो सकते ही हैं। सबसे बढ़कर वो लाल सागर में हुड़दंग करते रहने की मंशा रखते हैं। वो अपने हमलों से खुद पर और फिलिस्तीनियों पर विश्व का ध्यान आकर्षित करने में जुटे हैं। हूती बिना बाहरी मदद के इतना बड़ा काम नहीं कर सकते। उन्हें ईरान से हथियार, प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी मिलती है। यमनी गृह युद्ध के दौरान ईरान का प्रभाव काफी बढ़ गया है, जो सितंबर 2014 में राजधानी सना पर हूतियों के कब्जे के बाद से ही जारी है। ईरान हूतियों को प्रतिरोध की आवाज के रूप में पेश करता है, लेकिन हूती सीधे तौर पर ईरान की ओर से काम नहीं कर रहे हैं। लाल सागर में हमले करने के उनके अपने भी कारण हैं। यहां तक कि अगर ईरान अगर हूतियों से समर्थन वापस ले ले तो भी आंशका है कि वे अपने हथियार खत्म होने तक तांडव करते रहेंगे।

लाल सागर के पास अपनी जियोपॉलिटिकल लोकेशन के कारण वैश्विक व्यापार को बाधित करने में हूती ज्यादा सक्षम हैं। इजरायल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिहाज से वो हिज्बुल्ला जैसे इस्लामी आतंकी समूहों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। इसके अलावा, हिज्बुल्ला को इजरायल से जमीनी लड़ाई लड़नी पड़ती है जिससे उसके अपने नागरिकों पर भी खतरा रहता है। हूती विद्रोही समुद्री क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाते हैं, इजरायल या किसी और देश पर हमला नहीं कर रहे। इस कारण जवाब में कोई नागरिक आबादी संघर्ष के असर में नहीं आती है और इजरायल पर दबाव बनाने की मंशा भी सध जाती है। लाल सागर में हमले से हूतियों के कई हित सधते हैं- घरेलू, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय। घरेलू स्तर पर हूती खुद को फिलिस्तीन के रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं। इस कारण उन्हें लड़ाकों की भर्ती करने में सुविधा होने लगी है। क्षेत्रीय तौर पर, इससे सऊदी अरब के साथ चल रही बातचीत में उनका प्रभाव बढ़ जाता है, जो यमन युद्ध से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह अपने और फिलिस्तीन के समर्थन में अधिकतम प्रॉपगैंडा फैला पा रहा है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दुनिया गाजा में इजरायली एक्शन प्रभावों को महसूस करे। हूतियों के आक्रमण से इजरायल, अमेरिका और उसके सहयोगियों के सैन्य अभियान में भी खलल पड़ती है क्योंकि उन्हें रेड सी में भी अपने सैनिक भेजने पड़ते हैं।

अमेरिका के पास कुछ ही विकल्प बचे हैं। इसने क्षेत्र में अपनी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेना को मजबूत किया है। हूतियों की फंडिंग पर अंकुश लगाया है और चेतावनी जारी की है। इनमें से कोई भी उपाय अभी तक हूती हमलों पर लगाम लगाने में सफल नहीं हुआ है, उदाहरण के लिए, हूतियों ने इस सप्ताह ड्रोन और मिसाइलों का सबसे बड़ा हमला किया। हूतियों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन ओमान उनके साथ मध्यस्थता करने में मददगार हो सकता है। यदि ओमान इस प्रयास में विफल रहता है तो अमेरिका और उसके सहयोगी सैन्य कार्रवाई को मजबूर हो सकते हैं।

यदि सभी पक्ष एक-दूसरे की खींची सीमा के भीतर काम करते हैं, तो लाल सागर में चल रही जैसा को तैसा की कार्रवाई पर काबू पाया जा सकता है। अमेरिका ने तब साफ कर दिया कि उसकी बर्दाश्त की क्षमता कितनी है जब 31 दिसंबर को एक कंटेनर जहाज पर हूतियों के चढ़ने के प्रयास के बाद उसने तीन हूती नौकाओं को डुबो दिया। हालांकि हूतियों ने अपने हमले जारी रखे हैं, लेकिन तब से उन्होंने किसी और जहाज का अपहरण नहीं किया है। भारत जैसे देश जिनके चालक दल या जहाजों को हूतियों ने निशाना बनाया है, स्वाभाविक रूप से बदले की एकतरफा कार्रवाई करने से बचना चाहते हैं। उनके पास कोई अच्छे विकल्प नहीं हैं। वे कोई कदम नहीं उठाने को सही साबित करने के लिए हूतियों के किसी हमले से अपना संबंध होने की बात खारिज कर सकते हैं, लेकिन खुद को कमजोर दिखने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। भविष्य में वो हूतियों के टार्गेट न बनें, इसके लिए वो तटस्थ दिखने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन अन्य राजनयिक प्रभाव का जोखिम उठा नहीं सकते। अगर हूतियों ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा तो फिर भारत, अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेना में शामिल हो सकता है।

क्या वर्ल्ड बैंक लिस्ट में भारत है अब भी पीछे?

वर्ल्ड बैंक लिस्ट में भारत अब भी पीछे ही है! भारत दुनिया के उन देशों में है जो कम मध्यम आय समूह में आते हैं। वर्ल्ड बैंक की जून 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चार आय वर्ग में से ऊपर से तीसरे और नीचे से दूसरे स्थान पर है। विश्व बैंक दुनिया के देशों को चार आय समूहों में रखता है- कम आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय और उच्च आय। क्या आप जानना चाहेंगे हमारे पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार किस आय समूह में आते हैं? खैर, ये जान लीजिए कि मालदीव इनकम ग्रुप के मामले में हमसे ऊपर है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 1980 के दशक के अंत से आय वर्गीकरण के लिहाज से देशों की स्थिति में काफी बदलाव आया है। 1987 में रिपोर्ट करने वाले 30% देशों को कम आय वाले समूह में रखा गया था जबकि 2022 में केवल 12% इस श्रेणी में आए। यह गिरावट दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है, उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में कम आय वाले देशों का अनुपात 2022 में 74% से गिरकर 46% हो गया है। वहीं, पूर्वी एशिया प्रशांत में 26% से घटकर 3% और दक्षिण एशिया 100% से घटकर 13% हो गया है क्योंकि अर्थव्यवस्थाएं इस अवधि के दौरान उच्च श्रेणियों में चली गई हैं।

कोविड-19 महामारी से उबरने के साथ 2022 में आय समूह बदलने वाले देशों में लगभग सभी हाई लेवल इनकम ग्रुप में चले गए। प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के पैमाने पर लगभग 80% देशों ने 2022 में महामारी पूर्व की अवधि 2019 की तुलना में सुधार दिखाया। बीते वर्ष गुयाना और अमेरिकी समोआ दोनों उच्च-मध्यम से उच्च आय वर्ग में जा रहे हैं। गुयाना के प्रति व्यक्ति जीएनआई में बड़ी वृद्धि तेल और गैस उत्पादन की बढ़ती मात्रा के कारण है, जो 2022 में दोगुनी से अधिक हो गई है। 2021 में अल साल्वाडोर, इंडोनेशिया और वेस्ट बैंक एवं गाजा का जीएनआई ऊपरी मध्य आय सीमा के बहुत करीब था, इसलिए 2022 में मामूली जीडीपी ग्रोथ इन अर्थव्यवस्थाओं को इस श्रेणी में लाने के लिए पर्याप्त थी। साल्वाडोर की अर्थव्यवस्था में 2.6% रीयल जीडीपी वृद्धि देखी गई, जबकि इंडोनेशिया ने महामारी के बाद अपनी मजबूत सुधार जारी रखा और वास्तविक जीडीपी में 5.3% की वृद्धि हुई। 2021 में महामारी के बाद की मजबूत वृद्धि 7.9% के बाद 2022 में 3.9% की वृद्धि के दम पर वेस्ट बैंक और गाजा हाई मिडल इनकम ग्रुप में आ गया। पिछले वर्ष 2023 में गिनी और जाम्बिया निम्न आय से निम्न मध्यम आय वर्ग में चले गए। पिछले वर्ष जॉर्डन एकमात्र ऐसा देश रहा, जो आय समूह वाले वर्गीकरण में नीचे खिसक गया। ध्यान रहे कि ये वर्गीकरण हर साल 1 जुलाई को पिछले कैलेंडर वर्ष के प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय जीएनआई के आधार पर अपडेट किए जाते हैं। जीएनआई को अमेरिकी डॉलर में दर्शाया जाता है। वर्ल्ड बैंक का आय वर्गीकरण का उद्देश्य किसी देश के विकास के स्तर को दर्शाना है।

बता दे कि विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2023-24 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी की वृद्धि दर के अनुमान को 6.3 प्रतिशत पर बरकरार रखा है और कहा है कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल की पृष्ठभूमि में देश ने अपने प्रदर्शन में लचीलापन दिखाना जारी रखा है। विश्व बैंक ने अप्रैल की अपनी रिपोर्ट में 2023-24 के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान को पहले के 6.6 प्रतिशत से घटाकर 6.3 प्रतिशत कर दिया था। विश्व बैंक की मंगलवार को जारी ताजा भारत विकास अद्यतन आईडीयू के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान की प्रमुख छमाही रिपोर्ट में कहा गया है कि महत्वपूर्ण वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत 2022-23 में 7.2 प्रतिशत की दर से सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा।विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “भारत की वृद्धि दर जी-20 देशों में दूसरी सबसे अधिक और उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के औसत से लगभग दोगुनी है। यह लचीलापन मजबूत घरेलू मांग, मजबूत सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निवेश और मजबूत वित्तीय क्षेत्र से प्रेरित था।जुलाई को पिछले कैलेंडर वर्ष के प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय जीएनआई के आधार पर अपडेट किए जाते हैं। जीएनआई को अमेरिकी डॉलर में दर्शाया जाता है। वर्ल्ड बैंक का आय वर्गीकरण का उद्देश्य किसी देश के विकास के स्तर को दर्शाना है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश का बैंक ऋण 15.8 प्रतिशत बढ़ा जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में इसमें 13.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। भारत के सेवा क्षेत्र की गतिविधि 7.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ मजबूत रहने की उम्मीद है और निवेश वृद्धि भी 8.9 प्रतिशत पर मजबूत रहने का अनुमान है।

बेटे की कातिल माँ ने किए कई बड़े खुलासे!

हाल ही में बेटे की कातिल माँ ने कई बड़े खुलासे कर दिए हैं! गोवा में अपने 4 साल के बेटे की हत्या करने वाली ‘कातिल मां’ सूचना सेठ अपने पति से इतनी नफरत करने लगी थी कि उसके दिल में अपने मासूम बेटे के लिए भी ममता नहीं उमड़ी। जैसे-जैसे दिन गुजर रहा है वैसे-वैसे इस हत्यारिन मां की करतूत सामने आ रही है। पति से बदले की आग में जल रही सूचना ने अपने मासूम बेटे को केवल इसलिए मार दिया क्योंकि वह उसे उसके पिता से नहीं मिलने देना चाह रही थी। मारने से पहले इस कुमाता ने अपने बच्चे को लोरी भी सुनाई थी। गोवा मर्डर केस में आज हमको आपके ऐसे राज बताएंगे जो चौंकाने वाले हैं। गोवा पुलिस को गुरुवार को सूचना सेठ की हस्तलिखित चिट्ठी मिली है। ये चिट्ठी सूचना के गोवा के किराए वाले घर से मिली है। इस चिट्ठी में सूचना ने लिखा था, ‘मैं कोर्ट के उस आदेश को बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूं जिसमें मेरे पति को बेटे से मिलने की इजाजत है।’ पुलिस ने इस चिट्ठी को सील कर उसे FSL भेज दिया है। ताकि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट इसकी जांच कर सके। सूचना ने चिट्ठी में लिखा है कि कोर्ट और मेरा पति मेरे बेटे की कस्टडी मुझसे छीनना चाहते हैं। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं। सूचना ने लिखा है कि मेरा पूर्व पति हिंसक है। वो मेरे बेटे को गलत चीजें सिखाता था। मैं अपने बेटे की कस्टडी एक दिन के लिए भी उसे नहीं दे सकती हूं।

सूचना ने पुलिस की पूछताछ में बताया कि उसने मारने से पहले अपने बेटे को लोरी सुनाई थी। ताकि वह सो जाए और फिर उसका वो गला घोंट सके। पुलिस सूत्रों ने बताया कि सूचना अपने बेटे को मारने से पहले अपने डॉक्टर से संपर्क में थी। पुलिस ने बताया कि वो सूचना की कॉल डिटेल को खंगाल रही है ताकि ये पता चल पाए कि हत्या के बाद उसने किसे कॉल किया था।

पुलिस को सूचना के कमरे से कफ सिरफ की बोतल मिली। सूचना ने पूछताछ में बताया कि उसने अपने बेटे को बेसुध करने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। सूत्रों ने बताया सूचना अपने बेटे को हर रविवार को उसके पिता वेंकट रमन से मिलने देने के आदेश से नाराज थी। इसके अलावा कोर्ट में दाखिल तलाक याचिका से ये पता चलता है कि सूचना ने रमन से हर महीने 2.5 लाख गुजारा भत्ता मांगा था। सूचना ने वेंकट की महीने की कमाई 9 लाख रुपये बताते हुए ये मांग की थी।

गोवा में जिस अपार्टमेंट में सूचना रुकी थी वहां से पुलिस को चाकू, तौलिया और तकिया मिला है। ये तीन सबूत पुलिस को इस हत्या मामले का खुलासा करने में मदद करेंगे। सूचना इस अपार्टमेंट में 6 जनवरी को आई थी और 8 जनवरी तक रुकी थी। उसने अपने बेटे की हत्या कर उसका शव बैग में रखकर कर्नाटक के लिए निकल गई थी। पुलिस ने बताया कि सूचना पूछताछ में सहयोग कर रही है। लेकिन उसके चेहरे पर अपने बेटे की हत्या या इसमें उसकी भूमिका को लेकर कोई पछतावा नहीं दिख रहा है। जांच के दौरान पूछताछ में सूचना ने पुलिस को बताया कि उनसे 6 जनवरी को अपने पति वेंकट रमन को मैसेज भेजा था। सूचना ने वेंकट को कहा था कि वह अपने बेटे से अगले दिन मिल सकता है। लेकिन जब वेंकट वहां पहुंचा तो कोई भी घर में नहीं था।

सूचना और वेंकट के तलाक के कागजात से पता चलता है कि सूचना ने अपने पति के खिलाफ अगस्त 2022 में घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करवाया था। सूचना सेठ ने आरोप लगाया था कि वेंकट उसे और उसके बेटे को मारता है। हालांकि, वेंकट ने कोर्ट में इस आरोप से इनकार कर चुके हैं। पहले कोर्ट ने वेंकट उसके पत्नी के घर जाने से रोक दिया था। रविवार को उसके पिता वेंकट रमन से मिलने देने के आदेश से नाराज थी। इसके अलावा कोर्ट में दाखिल तलाक याचिका से ये पता चलता है कि सूचना ने रमन से हर महीने 2.5 लाख गुजारा भत्ता मांगा था। सूचना ने वेंकट की महीने की कमाई 9 लाख रुपये बताते हुए ये मांग की थी।यही नहीं, कोर्ट ने उन्हें पत्नी सूचना और बच्चे से भी बात करने से मना कर दिया था। हालांकि, बाद में अदालत ने वेंकट को हर रविवार को अपने बेटे से मिलने की इजाजत दे दी थी। इसी से सूचना काफी नाराज थी।

जब उच्चतम न्यायालय में पहली बार आया राम मंदिर का केस!

एक ऐसा समय जब उच्चतम न्यायालय में पहली बार राम मंदिर का कैसे आया था! मुगल आक्रांता बाबर की सेना ने तो एक बार मेरी छाती को छलनी कर मेरे प्रभु रामलला के मंदिर को तहस- नहस किया। लेकिन, अगले 500 सालों तक सत्ता और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की लड़ाई में बार- बार मेरी छाती पर घाव लगे। मेरे प्रभु के अस्तित्व पर ही सवाल उठाया गया। जिस राम का प्रवाह भारतीय संस्कृति की रग- रग में रक्त सा संचारित होता है, उस राम को कभी काल्पनिक तक करार दिया गया। मेरे प्रभु की जन्मस्थली को लेकर विवाद हुआ है। मैं देखती रही। सहती रही। चुपचाप खामोश। मुझे उम्मीद थी, समय का पहिया जरूर घूमेगा। वक्त कभी एक- सा तो नहीं रहता। मैं अयोध्या हूं और मैं आपको अपने भगवान राम के अस्तित्व की लड़ाई की कहानी सुनाती हूं। मंदिर- मस्जिद को लेकर जब अयोध्या की धरती लाल हुई तो भगवान को कानूनी मदद पहुंचाने का प्रयास शुरू हुआ। भगवान राम के नाम पर रामलला विराजमान खुद कोर्ट पहुंचे। केस दायर किया। अपनी जन्मभूमि की जमीन पर हक हासिल करने की कानूनी लड़ाई। लेकिन, क्या आपको पता है कि राम के नाम पर कानूनी लड़ाई कब शुरू हुई थी। स्वतंत्र भारत में 1950 में। लेकिन, इससे 65 साल पहले 1885 में फैजाबाद कोर्ट में एक और केस दायर हुआ था।  मेरे प्रभु श्री राम के नाम पर 1853 में पहली बार अयोध्या की धरती लाल हुई। राम जन्मभूमि को गिराने पहुंचे हिंदुओं और मुस्लिम समुदाय की हिंसक झड़प हुई। इस प्रकार की झड़प अगले पांच साल चलती रही। 1859 में ब्रिटिश सरकार ने विवाद का हल निकालने की कोशिश की। राम जन्मभूमि विवाद को शांत करने के लिए मस्जिद के सामने एक दीवार बना दी गई। परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी गई। हिंदू पक्ष इस बंटवारे से सहमत नहीं था। हिंदू साधु बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे राम की जन्मस्थली बताकर उस पर अपने अधिकार का दावा करते रहे। 1885 में हिंदू साधु महंत रघुवर दास ने इस विवाद का कानूनी हल निकालने की कोशिश शुरू की। वे फैजाबाद कोर्ट पहुंचे। बाबरी मस्जिद पर हिंदुओं के अधिकार का दावा किया।

1528 में मुगल सिपहसालार मीरबाकी के मस्जिद बनाने के 330 साल बाद 1858 में मामला लड़ाई कानूनी हो गई। पहली बार बाबरी परिसर में हवन और पूजन करने के लिए प्राथमिकी दर्ज की गई। अवध के थानेदार शीतल दुबे को दर्ज एफआईआर का जांच अधिकारी बनाया गया। अयोध्या रिविजिटेड किताब में इस घटना का जिक्र किया गया है। किताब में जिक्र किया गया है कि 1 दिसंबर 1858 को थानेदार शीतल दुबे ने अपनी रिपोर्ट दी। इसमें लिखा गया कि विवादित परिसर में चबूतरा बना हुआ है। यह पहला कानूनी दस्तावेज है, जिसमें बाबारी परिसर के भीतर प्रभु रामलला के प्रतीक होने के प्रमाण मिलते हैं। अंग्रेजी सरकार ने इस रिपोर्ट के आधार पर विवादित भाग को दो भागों में बांट दिया। विवादित भूमि के आंतरिक परिसर में मुस्लिमों और बाहरी परिसर में हिंदुओं को इबादत का अधिकार दिया गया।

बाबरी परिसर को दो भाग में बांटने के 27 साल बाद 1885 में राम जन्मभूमि की लड़ाई कोर्ट पहुंच गई। निर्मोही अखाड़े के मंहत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा दायर किया। महंत दास ने बाबरी ढांचे के बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने की मांग की। इस पर छत डालने की अर्जी दी गई। जज इस मामले में फैसला सुनाया कि वहां हिंदुओं को पूजा- अर्चना का अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि डीएम के फैसले के खिलाफ मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

कोर्ट के फैसले से निराश हिंदू पक्ष सड़क पर इंसाफ पाने की कोशिश में जुटा। आजादी की लड़ाई के बीच 1934 में मेरे दर पर एक बार फिर घमासान हुआ। करीब 40 हजार हिंदू जुटे। मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाने की नीयत से यह भीड़ आई थी। मस्जिद पर हमला हुआ। तीनों गुंबद तोड़ दिए गए। अंग्रेजी सरकार को जैसे ही इस हमले की जानकारी मिली। फैजाबाद प्रशासन की मदद से भीड़ को हटाया गया। इसके बाद तोड़े गए गुंबद की मरम्मत फैजाबाद डीएम ने करवा दिया। इसके बाद 1949 में रामलला बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे प्रगट हो गए। इस बार फैजाबाद डीएम के असहयोग के कारण रामलला को मस्जिद से बाहर निकाला जाना संभव नहीं हुआ। हालांकि, डीएम के सुझाव पर केंद्र की जवाहरलाल नेहरू और यूपी की गोविंद वल्लभ पंत सरकार ने रामलला को सींखचों में कैद कर दिया।

रामलला अपने जन्मस्थान तक तो पहुंच चुके थे, लेकिन बेड़ियों में कैद थे। सामान्य भक्त की पहुंच से दूर। मेरे प्रभु के दर्शन करने वाले वाले भक्तों को यह अखड़ने लगा। देश में संविधान लागू हुआ तो सभी धर्म के लोगों को अपने- अपने आराध्य की अराधना का अधिकार दिया गया। हिंदू पक्ष अपने भगवान की पूजा का अधिकार चाहता था। उनके दर्शन करना चाहता था। केंद्र और यूपी सरकार किसी प्रकार का विवाद नहीं होने देना चाहती थी। ऐसे में आजाद देश में पहली बार मेरे राम एक बार फिर कोर्ट पहुंचे। रामलला विराजमान की ओर से 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज, फैजाबाद कोर्ट में अपील दायर की। याचिका में भगवान राम की पूजा की इजाजत मांगी गई। करीब 11 माह बाद 5 दिसंबर 1950 को महंत रामचंद्र दास ने मस्जिद में हिंदुओं की ओर से पूजा जारी रखने की याचिका दायर की। इसी दौरान पहली बार बाबरी मस्जिद को ढांचा कहकर संबोधित किया गया। 3 मार्च 1951 को गोपाल विशारद केस में कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को पूजा- अर्चना में बाधा न डालने की हिदायत दी। इसी प्रकार का आदेश महंत दास की याचिका पर भी दिया गया।

धर्मो रक्षति रक्षित: यानी जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, सूत्र वाक्य के साथ एक संगठन अस्तित्व में आया। इसका नाम रखा गया विश्व हिंदू परिषद। हिंदुत्व की विचारधारा के साथ इस संगठन ने अपना विस्तार शुरू किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुसांगिक इकाई के तौर पर इसकी पहचान बनी। बाद में विश्व हिंदू परिषद ने अपनी पहचान अलग संगठन के तौर पर बनाई। वर्ष 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई। इसके संस्थापकों में स्वामी चिन्मयानंद, एसएस आपटे, मास्टर तारा सिंह शामिल थे। 21 मई 1964 में मुंबई के संदीपनी साधनाशाला में वीएचपी का पहला सम्मेलन हुआ।

आरएसएस सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने यह बैठक बुलाई थी। सम्मेलन में हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध के प्रतिनिधियों की मौजूदगी थी। गोलवलकर ने इस सम्मेलन में सभी मतों के लोगों को एकजुट होने की बात ही। हिंदू को सभी धर्मों से ऊपर करार दिया। इसक हिंदुस्तानियों के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द से जोड़ा। वर्ष 1966 में प्रयाग के कुंभ मेले में विश्व सम्मेलन के साथ इसका स्वरूप सामने आया। इस गैर राजनीतिक संगठन का मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज को मजबूत करना था। राम मंदिर का मुद्दा जब गरमाने लगा तो वीएचपी ने इसे टेकओवर किया। इसके बाद से यह संगठन आज तक राम मंदिर से जुड़ा हुआ है।

क्या लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की तैयारी हो चुकी है तेज?

वर्तमान में लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की तैयारी तेज हो चुकी है! आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने तैयारियां तेज कर दी हैं। जमीन पर पकड़ मजबूत बनाने और जमीन पर चुनावी स्थितियां, संभावनाएं व राजनीतिक समीकरण को जानने-समझने के लिए पिछले दिनों कांग्रेस ने देश की सभी लोकसभा सीटों के लिए जो कॉडिनेटर्स बनाए थे, उनके साथ गुरुवार को कांग्रेस ऑफिस में शीर्ष नेतृत्व ने एक बैठक की। कॉडिनेटर्स की नियुक्ति के बाद यह पहली बैठक थीं। गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे व संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल ने इस बैठक की अगुवाई की। पहली बैठक में तेलंगाना, कर्नाटक, पुडुचेरी, लक्षद्वीप, तमिलनाडु, ओडिशा के समन्वयक मौजूद थे। खरगे व वेणुगोपाल के अलावा इन राज्यों के प्रभारी भी मौजूद थे। इनमें रणदीप सुरजेवाला, दीपा दास मुंशी, अजय कुमार जैसे लोग शामिल थे। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में आगामी लोकसभा चुनाव और भारत न्याय यात्रा को लेकर दिए गए तमाम तरह के निर्देश दिए। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा इन सभी से भी से अपने अपने इलाके में जुटने के लिए कहा गया। ये तमाम कॉर्डिनेटर्स केंद्रीय नेतृत्व और जिला इकाई के बीच समन्वय के तौर पर काम करेंगे। इन लोगों को बताया गया कि इस दौरान वॉर रूम कैसे काम करेगा, कैसे समन्वय करना है। उल्लेखनीय है कि यह तमाम समन्वय हर सीट पर इस तरह से काम करेंगे कि उस सीट पर पार्टी की स्थिति, संभावनाएं क्या हैं? अगर उस सीट पर पार्टी का प्रत्याशी है तो उसके लिए माहौल बनाना या फिर अगर गठबंधन का उम्मीदवार है तो उस दल के साथ कॉर्डिनेशन करना भी इन्हीं की जिम्मेदारी रहेगी। इनका काम चुनाव की शुरुआत से लेकर चुनाव प्रचार व वोटिंग तक रहेगा। उल्लेखनीय है कि ये लोग पार्टी के अलावा गठबंधन को भी फीडबैक देंगे।

वहीं दूसरी ओर इन समन्वयकों से कहा गया कि यह अपने अपने इलाकों में राहुल गांधी नीत भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना सुनिश्चित करें। यात्रा के उद्देश्य, सोच व संदेश तक जमीन तक लोगों के बीच ले जाएं। शुक्रवार को सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस की गठबंधन के घटक दलों के साथ भी मीटिंग होनी है। इनमें एसपी व आम आदमी पार्टी के साथ बैठक होनी है। यूपी को लेकर कांग्रेस की गठबंधन समिति की एसपी नेताओं के साथ मुलाकात होनी है। वहीं आप के साथ दिल्ली, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों पर चर्चा होनी है।

बता दे कि कांग्रेस में गुरुवार को अहम बैठकें होंगी। इसमें राहुल गांधी की अगुआई में निकलने वाली भारत न्याय यात्रा के रूट के बारे में संबंधित राज्यों के नेताओं से चर्चा होगी। आगामी आम चुनावों को लेकर राज्यों के साथ मंथन किया जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ बैठकों को दौर कांग्रेस ऑफिस में सुबह 11 बजे से शुरू होगा। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे, संगठन महासचिव के. सी. वेणुगोपाल, राज्यों के प्रभारी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधायक दल के नेता भाग लेंगे। कांग्रेस की मैनिफेस्टो कमिटी की बैठक भी होगी, जिसके अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम हैं। गुरुवार को यात्रा से जुड़े 14 राज्यों के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेताओं की बैठक में यात्रा के रूट को अंतिम रूप दिया जाएगा। पार्टी के एक अहम सूत्र के मुताबिक, 8 जनवरी के रूट की जानकारी साझा करने के साथ ही लोगो और टैगलाइन भी जारी की जाएगी। 12 जनवरी को यात्रा का थीम सॉन्ग लॉन्च होगा, जो हिंदी और अंग्रेजी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में भी होगा। बैठक में तय किया जाएगा कि यात्रा किस राज्य में कितने जिलों या शहरों से गुजरेगी। कहां-कहां रैली या सभाएं होंगी, किस जगह पर पैदल मार्च होगा। यह यात्रा लगभग 55 दिन की होगी, जिसमें रोज लगभग 120 किमी की दूरी तय की जाएगी। लगभग रोज एक बड़ी सभा होगी और हर दिन लगभग पांच से सात किमी पैदल यात्रा चलेगी।

दूसरी अहम मीटिंग आगामी चुनाव को लेकर होनी है। इसमें प्रमुख चर्चा अलग-अलग राज्यों में गठबंधन के घटक दलों के साथ सीट शेयरिंग को लेकर चर्चा होनी है। कांग्रेस आलाकमान द्वारा बनाई गई गठबंधन समिति ने पिछले दिनों विभिन्न राज्यों के प्रदेश नेतृत्व के साथ राज्यवार तालमेल और सीटों के बंटवारे को लेकर एक दौर की चर्चा कर हर राज्य में तालमेल की गुंजाइश और प्रदेश इकाई उसके बारे में क्या सोच रही है, इसे लेकर एक फीडबैक आधारित अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंपी। कांग्रेस पर इंडिया गठबंधन के घटक दलों की ओर से तालमेल का काम जल्द से जल्द निपटा लिए जाने का दबाव बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि गुरुवार की मीटिंग में सीटों के तालमेल के अलावा, राज्यों में पार्टी की चुनाव की तैयारियों जैसी चीजों पर फोकस रहेगा। सूत्रों के मुताबिक, गठबंधन समिति ने विभिन्न इकाइयों के साथ मंथन कर राज्यवार अपनी रिपोर्ट पेश की है। बताया जाता है कि इस कवायद के बाद कांग्रेस नेतृत्व सीट बंटवारे पर सहयोगी दलों से बात करेगा। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने तय किया है कि 2019 के चुनाव में देश में दूसरे नंबर पर रहने वाली सीटों पर किसी के साथ तालमेल नहीं होगा। यहां पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। गठबंधन को लेकर यूपी, पंजाब, दिल्ली, वेस्ट बंगाल जैसे राज्यों में तस्वीर साफ नहीं हो पाई है।

यूपी में कांग्रेस अपने लिए 21 सीटें मांग रही है। यहां कांग्रेस एसपी, आरएलडी जैसे दलों के साथ गठबंधन चाह रही है। बताया जाता है कि एसपी कांग्रेस को दस सीटें देने के लिए तैयार है। चर्चा यह भी है कि 15 सीटों पर बात बन सकती है। कांग्रेस के एक अहम सूत्र के मुताबिक, कांग्रेस अमेठी, रायबरेली, बरेली, फूलपुर, सहारनपुर, झांसी, कुशीनगर, बहराइच, महाराजगंज, फर्रुखाबाद, बाराबंकी, शाहजहांपुर जैसी सीटें प्रमुख हैं। इन सीटों के पीछे कांग्रेस की सोच साल 2009 में जीती हुई सीटें हैं। बंगाल में टीएमसी के तेवर को देखते हुए तालमेल को लेकर चुनौती बनी हुई है। बताया जाता है कि कांग्रेस अपने लिए झारखंड में सात सीटें, महाराष्ट्र 18, बंगाल में चार, दिल्ली में तीन, केरल में 16, तमिलनाडु में 12 से 14 सीटें चाह रही है।

जब राम मंदिर का न्योता ठुकराने पर कांग्रेस में पड़ी रार!

वर्तमान में कांग्रेस में रार पड़ चुकी है क्योंकि कांग्रेस आलाकमान ने राम मंदिर का न्यौता ठुकरा दिया है! कांग्रेस ने 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में जाने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद कांग्रेस के दिग्गज नेता काफी निराश है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के इस फैसले से कांग्रेस के अंदर टकराव की स्थिति पैदा होती दिख रही है, जो आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर ठीक नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम का कहना है कि इससे करोड़ों कांग्रेसियों का दिल टूटा है। आचार्य कृष्णम ने कहा, ‘राम मंदिर और भगवान राम सबके हैं। राम मंदिर को बीजेपी का मानना दुर्भाग्यपूर्ण है। राम मंदिर को आरएसएस, हिंदू परिषद, बजरंग दल का मान लेना दुर्भाग्यपूर्ण है। मुझे पूरा भरोसा है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी पार्टी नहीं है।’ कृष्णम ने कहा, ‘कांग्रेस राम विरोधी नहीं है। ये कुछ लोग हैं, जिन्होंने इस तरह का फैसला कराने में भूमिका अदा की है। ये बड़ा गंभीर विषय है। आज मेरा दिल टूट गया है। और इस फैसले से करोड़ों कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का दिल टूटा है उन कार्यकर्ताओं का, उन नेताओं का जिनकी आस्था भगवान राम में है।’ उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस वो पार्टी है, जो महात्मा गांधी के रास्ते पर चलती है। कांग्रेस के ही नेता राजीव गांधी ने ही मंदिर के ताले खुलवाने का काम किया। भगवान श्रीराम के मंदिर के निमंत्रण को स्वीकार ना करना दुखद है, यह पीड़ादायक है, यह कष्टदायक है।’

गुजरात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया ने भी अयोध्या नहीं जाने के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने पार्टी को ऐसे फैसले नहीं लेने की सलाह दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, ‘भगवान श्री राम आराध्य देव हैं। यह देशवासियों की आस्था और विश्वास का विषय है। कांग्रेस को ऐसे राजनीतिक निर्णय से दूर रहना चाहिए था।’ साथ ही उन्होंने कांग्रेस नेता जयराम रमेश के बयान की एक कॉपी भी साझा की है।

राम मंदिर उद्घाटन के न्योता को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने अस्वीकार कर दिया है। कांग्रेस ने बुधवार को कहा कि पार्टी की संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे और अधीर रंजन चौधरी 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर अभिषेक समारोह में शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने एक बयान में कहा, ‘भगवान राम हमारे देश में लाखों लोगों द्वारा पूजे जाते हैं और धर्म एक व्यक्तिगत मामला है, लेकिन आरएसएस/भाजपा ने लंबे समय से अयोध्या में मंदिर का एक राजनीतिक प्रोजेक्ट बनाया है। भाजपा और आरएसएस के नेताओं द्वारा ‘अधूरे मंदिर’ का उद्घाटन स्पष्ट रूप से ‘चुनावी लाभ के लिए’ आगे लाया गया है।’ उन्होंने कहा, ‘2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करते हुए और भगवान राम का सम्मान करने वाले लाखों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी ने स्पष्ट रूप से आरएसएस/भाजपा कार्यक्रम के निमंत्रण को सम्मानपूर्वक अस्वीकार कर दिया है।’

भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने के लिए कांग्रेस के तीन शीर्ष नेताओं को भेजे गए निमंत्रण को अस्वीकार करने के विपक्षी पार्टी के फैसले की गुरुवार को आलोचना की और दावा किया कि इससे भारत की संस्कृति और हिंदू धर्म के प्रति पार्टी का स्वाभाविक विरोध उजागर हो गया है। जिन्होंने इस तरह का फैसला कराने में भूमिका अदा की है। ये बड़ा गंभीर विषय है। आज मेरा दिल टूट गया है। और इस फैसले से करोड़ों कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का दिल टूटा है उन कार्यकर्ताओं का, उन नेताओं का जिनकी आस्था भगवान राम में है।’ उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस वो पार्टी है, जो महात्मा गांधी के रास्ते पर चलती है।भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति अपनी ‘ईर्ष्या, द्वेष और हीन भावना’ के कारण कांग्रेस देश का विरोध करने की हद तक चली गई है और अब भगवान का विरोध कर रही है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर भारतीय परंपराओं और संस्कृति के उच्चतम मूल्यों का प्रतीक है लेकिन कांग्रेस और समान मानसिकता वाले अन्य विपक्षी दलों के लिए कट्टरपंथी राजनीति अधिक महत्वपूर्ण है। त्रिवेदी ने कहा कि मंदिर और बाबरी मस्जिद से जुड़े भूमि विवाद मामले में मुस्लिम वादी इकबाल अंसारी को भी न्योता दिया गया था जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है, लेकिन यह कांग्रेस है जिसने समारोह का बहिष्कार करने का फैसला किया है। उन्होंने दावा किया कि देश के लिए ऐतिहासिक क्षणों में बाधा उत्पन्न करना मुख्य विपक्षी दल की प्रवृत्ति रही है।

क्या चीन भारत सीमा पर बढ़ गया है तनाव?

हाल ही में चीन भारत सीमा पर तनाव बढ़ गया है! भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल मनोज पांडे का कहना है कि सीमा पर हालात स्थिर, लेकिन संवेदनशील है। चीन का नाम लिए बिना उन्होंने पूर्वी लद्दाख विवाद पर कहा कि उत्तरी सीमा पर हालात सामान्‍य होने के साथ ही संवेदनशील भी है। सेना प्रमुख का कहना है कि यहां किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सैन्यकर्मी तैनात हैं और सैनिकों की यह संख्या बनाई रखी जाएगी। पूर्वी लद्दाख पर सेना प्रमुख जनरल पांडे ने कहा कि हमारी परिचालन तैयारियां उच्च स्तर पर बनी हुई हैं। पूर्वी लद्दाख में एलएसी मुद्दों का समाधान खोजने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत जारी है। गुरुवार को दिल्ली में उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 में देश की सीमाओं पर हिंसा के मामले कम हुए हैं। सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे जम्मू एंड कश्मीर को लेकर कहा कि हम एलओसी पर घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर के भीतरी इलाकों में भी हिंसा में कुल मिलाकर गिरावट आई है। सेना अध्यक्ष का कहना है कि भारतीय सेना ने राष्ट्रहित के लिए बड़े व अहम निर्णय लिए हैं। सेना में समय की मांग के अनुरूप आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वाॅरफेयर को अधिक सामंजस्यपूर्ण और मजबूत बनाया गया है। मणिपुर की स्थिति पर सेनाध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने कहा कि संयुक्त प्रयास से बहुत हद तक मणिपुर में शांति स्थापित हुई है। उन्होंने सेना के लिए कहा कि हमें सभी स्पेक्ट्रम में कार्य करने में सक्षम बनना होगा। जनरल मनोज पांडे ने बताया की सेना में नई टेक्नोलॉजी को शामिल किया जा रहा है। सेना अध्यक्ष ने कहा कि बेहतर संचार सिस्टम, ड्रोन व सर्विलेंस सभी को शामिल किया गया है। उन्‍होंने कहा क‍ि भारत अर्थव्यवस्था के मामले में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। भारतीय सेना देश की विभिन्न एजेंसियों और राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करती रहेगी।

सेना प्रमुख ने बताया कि परिवर्तनकारी मानव संसाधन पहल, एक परियोजना है, जो न केवल हर साल सेवानिवृत्त होने वाले 62,000 से अधिक भारतीय सेना के सैनिकों के लिए उत्पादक और उपयोगी रोजगार के लिए मंच तैयार करेगी, बल्कि हमारे दिग्गजों के कौशल और रोजगार को भी सशक्त बनाएगी। सेना प्रमुख ने बताया कि भारतीय सेना की साइबरस्पेस क्षमता को बढ़ाया जा रहा है। भारतीय सेना के जवानों को प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने और संस्थागत, प्रक्रियात्मक और तकनीकी उपायों के माध्यम से साइबर डोमेन का प्रभावी ढंग से दोहन करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि ‘प्रोजेक्ट संभव’ चलते-फिरते त्वरित कनेक्टिविटी के साथ सुरक्षित संचार प्रदान करने के लिए एक एंड-टू-एंड सुरक्षित, नेटवर्क अज्ञेयवादी मोबाइल पारिस्थितिकी तंत्र है। यह अत्याधुनिक समकालीन 5जी तकनीक पर काम करते हुए, यह भारत की रक्षा क्षमता में एक महत्वपूर्ण छलांग का प्रतिनिधित्व करता है। सेना प्रमुख ने बताया है कि अलग-अलग रैंक में 120 महिला अधिकारी सेना में कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर भूमिका निभा रही हैं।

बता दे कि सेना प्रमुख जनरल मनोज पाण्डे ने गुरुवार को कहा कि पूर्वी लद्दाख में LAC के पास हालात स्थिर लेकिन संवेदनशील हैं। भारत और चीन टकराव के बचे मुद्दों को हल करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत कर रहे हैं। क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़ी किसी भी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय सेना के पास पर्याप्त सैनिक हैं। सेना प्रमुख ने कहा कि भारत और चीन के बीच चल रहे मौजूदा गतिरोध को लेकर सैनिकों की तैनाती पर भी स्थिति साफ कर दी। एलएसी पर हमें जितनी जरूरत होगी, हम लोग उतनी फोर्स को वहां तैनात रखेंगे। ईस्टर्न लद्दाख में एलएसी पर भारत-चीन के बीच गतिरोध को साढ़े तीन साल से ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन अब तक दोनों तरफ से बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती जारी है। एलएसी पर दोनों तरफ से 50-50 हजार से ज्यादा सैनिक तैनात हैं। सैनिकों की तैनाती कब कम होगी या इसे परमानेंट मान लिया जाए, इस सवाल पर आर्मी चीफ ने कहा, हमारी कोशिश है कि बातचीत से हल निकले और जब तक 2020 मध्य की स्थिति पर नहीं लौट जाते, तब तक बातचीत चलती रहे। जब यह हो जाएगा, फिर दूसरे मुद्दों को देखा जाएगा। तब तक एलएसी पर जितनी भी फोर्स की जरूरत होगी, उतनी तैनाती हम जारी रखेंगे।

जम्मू कश्मीर के हालात पर जनरल पाण्डे ने कहा कि घुसपैठ की कोशिशें हुई हैं। इसके बावजूद नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान के साथ संघर्ष विराम कायम है। हम नियंत्रण रेखा के पास घुसपैठ की कोशिशें नाकाम कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर में हिंसा की घटनाओं में कमी आई है, लेकिन राजौरी-पुंछ में घटनाएं बढ़ी हैं। ये वह क्षेत्र है जहां पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने में सक्रिय है। आतंकवादी संगठनों को पाकिस्तान का सहयोग मिलने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सीमा पार आतंक फल-फूल रहा है।

जब राम मंदिर के लिए कारसेवकों ने दी आहुतियां!

ऐसा समय जब राम मंदिर के लिए कारसेवकों ने आहुतियां दे दी! देवरिया के महेश मणि 2 नवंबर 1990 की तारीख कभी नहीं भूल पाएंगे। विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के आह्वान पर महेश कई रामभक्तों के साथ कारसेवा करने अयोध्या गए थे। जहां शांति पूर्वक रामधुन गा रहे निहत्थे कारसेवकों पर तत्कालीन मुलायम सिंह की सरकार ने अंधाधुंध गोलियां चलवाई थी। पुलिस की गोली से सैकड़ों कार सेवकों की मौत हो गई थी। रामभक्तों के खून से अयोध्या की सड़के लाल हो गई थी। महेश को भी गोली लगी थी। 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से कारसेवक जहां खुश है, वहीं उन्हें निमंत्रण पत्र न मिलने का मलाल भी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर सदियों से आंदोलन होता आया है। देवरिया के राम भक्तों ने भी उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और गोलियां भी खाईं। 1990 में कार सेवा करने अयोध्या गए यहां के काफी संख्या में रामभक्त गंभीर रूप से घायल हुए थे। महेश मणि और चंद्रशेखर को गोलियां भी लगी थी। महेश मणि ने बताया कि विश्व हिंदू परिषद अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल जी ने 30 नवंबर 1990 को अयोध्या में करने का ऐलान किया था। उनके आह्वान पर देश भर के राम भक्त अयोध्या पहुंचे थे। देवरिया जिले से 165 रामभक्तों का जत्था अयोध्या जाने के लिए 24 नवंबर को पैदल ही लिए रवाना हुआ।

इस दौरान प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और वह विरोध में थे। सरकार के निर्देश पर राम भक्तों को रोकने के लिए सड़क से लेकर खेतों, और पगडंडियों पर भी पुलिस का पहरा लगा था। महेश ने बताया कि हम सभी लोग यहां से रात को निकले। रास्ते में पुलिस ने कई कार सेवकों को पड़कर जेल में डाल दिया। पुलिस को चकमा देने के लिए हम लोग किसान और व्यापारी के भेष में छोटे-छोटे टुकड़ों में यात्रा करने लगे। जहां लोग थक जाते, वहीं किसी गांव में विश्राम करते थे। गांव के लोग भी कर सेवकों की खूब सेवा करते थे।

रास्ते में पुलिस से छुपते छुपाते नदी नालों को पार करते हुए हम लोग बस्ती पहुंचे। वहां पंजाब, आंध्र प्रदेश समेत विभिन्न प्रदेशों के कार सेवकों से मुलाकात हुई। 6 दिन की पैदल यात्रा के बाद 30 अक्टूबर को हम लोग अयोध्या पहुंचे। सुबह 9 बजे के लगभग वहां कारसेवकों की अपार भीड़ जुट गई। अशोक सिंघल के नेतृत्व में हम लोग जय श्री राम का नारा लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। अयोध्या के हनुमान तिराहे के पास पुलिसवालों से सामना हो गया। पुलिस की लाठी से अशोक सिंघल का सिर फट गया और उनको गंभीर चोटें आई। पुलिसवालों ने निहत्थे कर सेवकों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। इससे कारसेवकों में भगदड़ मच गई और सभी लोग इधर-उधर छुप गए। महेश ने बताया कि अशोक सिंघल के घायल होने के बाद उमा भारती ने कार सेवकों का हौसला बढ़ाते हुए 2 नवंबर 1990 को अयोध्या पहुंचने का ऐलान किया। 2 नवंबर को हम सभी उमा भारती के नेतृत्व में कार सेवा के लिए आगे बढ़ने लगे। रास्ते में हनुमान गढ़ी पर पुलिस ने कार सेवकों को रोकने के लिए पहले लाठी चार्ज किया। इसके बाद गोलियां चलानी शुरू कर दी। कटरा पुल, कनक भवन समेत सभी चौराहों पर पुलिसवाले कारसेवकों को घेर कर गोली चलाने लगे। देवरिया के चंद्रशेखर को पैर में गोली लगी और वह घायल हो गए।

महेश ने बताया कि पुलिस की गोली से घायल होकर गिरे कार्यकर्ताओं को हम कार सेवक ही कंधे पर लाद कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचते थे। महेश के मुताबिक लगभग 100 कार्यकर्ताओं ने उनके सामने पुलिस की गोली से घायल होकर दम तोड़ा था। कोठारी बंधुओं की भी मौत हुई। अयोध्या की सड़के कर सेवकों के खून से लाल हो गई थी। एक घायल कार सेवक को उठाते वक्त पुलिस की गोली महेश के जबड़े में भी लगी। महेश घायल होकर बेहोश हो गए और होश आया तो अपने आप को अयोध्या के श्रीराम अस्पताल में पाया। पूरा अस्पताल पुलिस की गोली से घायल राम भक्तों से भरा पड़ा था।

महेश की स्थित गंभीर होने पर उन्हें अयोध्या से फैजाबाद जिला अस्पताल लाया गया। जहां ऑपरेशन हुआ और स्वस्थ होने के बाद वह घर लौटे। महेश ने बताया कि प्रशासन ने हमें भी मृत मान लिया था और मृतकों की सूची में हमारा भी नाम था। महेश मणि ने बताया 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हम सभी की जीत है। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी जी को विशेष बधाई। मगर इस बात का मलाल भी है कि सरकार उन रामभक्तों को भूल गई, जिन्होंने कार सेवा के दौरान अपने को बलिदान कर दिया। हमें भी निमंत्रण मिलना चाहिए था।

क्या उत्तर प्रदेश से बीजेपी टिकट में उम्र भी है महत्वपूर्ण तत्व?

उत्तर प्रदेश से बीजेपी टिकट में अब उम्र भी महत्वपूर्ण तत्व निभा रहा है! लोकसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी के थिंकटैंक सीटों के हिसाब से ‘उचित’ प्रत्याशियों की खोज में लग गए हैं। हर संभावित प्रत्याशी का बूथ तक का फीडबैक लिया जा रहा है। पार्टी में कई स्तर पर सर्वे रिपोर्ट पर भी माथापच्ची हो रही है। इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा उम्रदराज नेताओं की दावेदारी काे लेकर है। वैसे तो भाजपा 75 प्लस के नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजती रही है। लेकिन इस बार 70 की उम्रसीमा की चर्चा तेज है। खबरें आ रही हैं कि इस उम्र सीमा को पार करने वाले नेताओं को टिकट मिलने में विचार किया जाएगा। बता उम्र की चली है तो आपको बता दें यूपी में 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके चार नेता हैं, इनमें अक्षयबर लाल गौड़, हेमा मालिनी, संतोष गंगवार, सत्यदेव पचौरी का नाम प्रमुख है। वहीं तो 8 ऐसे नेता भी हैं, जिनकी उम्र 67 से 69 वर्ष है। इनमें फैजाबाद से सांसद लल्लू सिंह, मेनका गांधी, बृजभूषण शरण सिंह, साक्षी महाराज आदि के नाम प्रमुख हैं। इस लिस्ट में राजनाथ सिंह का भी नाम है। वह 72 वर्ष के हैं। वैसे पार्टी सूत्रों के अनुसार टिकट देने में उम्र एक फैक्टर जरूर है लेकिन साथ ही नेताओं का प्रदर्शन और अनुभव भी बड़े फैक्टर हैं। राजनाथ सिंह मोदी सरकार में सबसे कद्दावर मंत्रियों में शुमार रहे हैं। वह अटल बिहारी वाजपेयी की लखनऊ सीट से लगातार सांसद हैं।

फैजाबाद लोकसभा सीट की बात करें तो इस बार के लोकसभा चुनाव में अयोध्या क्षेत्र की ये सीट सबसे ज्यादा हॉट मानी जा रही है। यहां से सांसद लल्लू सिंह हैं, जो 69 वर्ष के हो चुके हैं। इस सीट पर पार्टी के दूसरे दिग्गज नेताओं की भी नजर है। उम्र की बात करें तो मेनका गांधी भी 67 वर्ष की हो चुकी हैं। लेकिन उनका रिकॉर्ड ऐसा रहा है कि पीलीभीत से लेकर सुल्तानपुर तक वह पार्टी को जीत परोसती रही हैं। हालांकि उनके बेटे वरुण गांधी को लेकर जरूर संशय के बादल घिरे नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से वरुण केंद्र और प्रदेश की अपनी ही सरकार के खिलाफ काफी मुख रहे हैं। वहीं बृजभूषण शरण सिंह भी वैसे तो 67 की उम्र के हैं। लेकिन पिछले दिनों पहलवानों से विवाद के चलते काफी चर्चा में रहे। इस विवाद के चलते बृजभूषण की दावेदारी पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है। पर कैसरगंज सहित आसपास की सीटों पर बृजभूषण की अच्छी पकड़ मानी जाती है। वह राम मंदिर आंदोलन में भी चर्चा में रहे थे। लिहाजा उनका ये पहलू सशक्त है। उन्नाव से फायरब्रांड नेता साक्षी महाराज का नाम भी इस बार काफी चर्चाओं में है। दरअसल उन्नाव बीजेपी की मजबूत सीट मानी जाती है, यहां से पार्टी के दूसरे कद्दावर नेता भी जोरआजमाइश में लगे हैं। अब देखना ये होगा कि पार्टी किसके हक में फैसला लेती है।

वहीं आपको बता दें कि सहारनपुर। यहां से हाल ही में बसपा ने अपने सिटिंग सांसद हाजी फजलुर्रमान का टिकट काट दिया है। पार्टी ने यहां से 2017 विधानसभा चुनाव में देवबंद से बसपा प्रत्याशी माजिद अली को लोकसभा प्रभारी घोषित किया गया है। खास बात ये है कि इस सीट पर पहले दावेदारी इमरान मसूद की मानी जा रही थी लेकिन बसपा उन्हें निष्कासित कर चुकी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार फजलुर्रहमान पर जो कार्रवाई हुई, उसमें उनकी सपा प्रमुख अखिलेश यादव से बढ़ती नजदीकी काे कारण माना गया। यहां से आकाश आनंद को उतारकर पार्टी अपनी रणनीति पर आगे बढ़ सकती है। लेकिन बसपा के सामने समाजवादी पार्टी की भी तगड़ी चुनौती रहेगी। मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर 6 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। इनके अलावा 3 लाख एससी, डेढ़ लाख गुर्जर और साढ़े 3 लाख के करीब सवर्ण जातियां हैं। पिछले कुछ चुनावों पर गौर करें तो यूपी में समाजवादी पार्टी को कई जगह एकमुश्त मुस्लिम वोट मिलते दिख रहे हैं। ये सीट बसपा ने 2019 में जरूर जीती थी लेकिन उस समय सपा और बसपा का गठबंधन था। दूसरी तरफ भाजपा भी इस सीट पर कमजोर नहीं मानी जाती। फजलुर्रहमान करीब 20 हजार वोट से ही भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा को हरा पाए थे।

तीसरी सीट अंबेडकरनगर है। पहले ये अकबरपुर नाम से जानी जाती थी। मायावती ने तीन बार इस सीट से चुनाव जीता। उन्होंने 1998, 1999 और 2004 में अकबरपुर से जीत दर्ज की और दिल्ली पहुंची। बाद में 2009 में भी यहां से बसपा ही जीती। लेकिन 2014 के बाद से बसपा यहां लगातार हार रही है। पूर्वांचल की ये सीट मायावती के दिल के करीब मानी जाती है। चुनावी राजनीति से दूरी बना चुकीं मायावती ने अंबेडकरनगर में एक रैली के दौरान कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो वह अंबेडकरनगर से ही चुनाव लड़ेंगीं। दिल्ली का रास्ता तो यहीं से जाता है। बता दें 1995 में मायावती ने ही फैजाबाद से अलग कर अंबेडकर नगर जिले की स्थापना की थी। अंबेडकरनगर में 25 फीसदी आबादी अनुसूचित की मानी जाती है। यहां 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। एक तरफ तो आकाश आनंद के चुनाव लड़ने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी तरफ बसपा के सामने अपने ही सांसदों को बचाए रखने की चुनौती है। मायावती ने साफ ऐलान कर दिया है कि बसपा किसी गठबंधन में शामिल नहीं है। पिछले कुछ चुनावों को देखें तो उत्तर प्रदेश में बसपा की हालत काफी खराब है। 2019 लोकसभा चुनावों में भले ही उसने 10 सीटें जीती थीं लेकिन इस में भी सपा से गठजोड़ काे ज्यादा श्रेय मिला। क्योंकि 2014 में बसपा अकेले लड़ी और एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इसी तरह 2022 के विधानसभा चुनावों में भी अकेले लड़ने वाली बसपा के हाथ सिर्फ एक सीट ही लगी थी।

जाहिर है पार्टी की स्थिति को लेकर संशय के बादल गहराए हैं और कई नेता विरोधी पार्टियों के संपर्क में हैं। इनमें अमरोहा के सांसद दानिश अली भी कांग्रेस के ज्यादा करीब दिख रहे हैं। उन्हें इसी महीने 9 दिसंबर को मायावती निलंबित भी कर चुकी हैं। फजलुर्रहमान का टिकट काटा जा चुका है। अगर आकाश आनंद के लिए बिजनौर सीट का चयन होता है तो मलूक नागर को कहां एडजस्ट किया जाएगा? ये भी बड़ा सवाल है। इसी तरह अंबेडकरनगर के सांसद रितेश पांडे अपने पिता के सपा में चले जाने के कारण दुविधा में हैं। सवाल ये है कि क्या पार्टी उन्हें दोबारा टिकट देगी? इसी तरह लालगंज से सांसद संगीता आजाद और जाैनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव पर भी संशय के बादल गहराए हुए हैं।