Friday, March 6, 2026
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क्या सियासत के कठिन दौर से गुजर रहे हैं नीतीश कुमार?

वर्तमान में नीतीश कुमार सियासत के कठिन दौर से गुजर रहे हैं! बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। कभी बीजेपी तो कभी आरजेडी की गोद में बैठक कर मुख्यमंत्री के पालने में बेखटके झूलते रहने वाले नीतीश कुमार के सामने विकट स्थिति पैदा हो गई है। इंडी अलायंस में उनकी छीछालेदर जितनी हो रही है, वैसे दिन तो एनडीए के साथ वर्षों गुजारने पर भी उन्हें देखने को नहीं मिले थे। पश्चाताप भी अब उन्हें वह रुतबा नहीं लौटा सकता, जैसा उन्हें एनडीए में हासिल था। नरेंद्र मोदी को पीएम बनने के पहले और बाद में भी चुनौती देकर वे एनडीए में उतना अपमानित नहीं हुए, जितना इंडी अलायंस बना कर उन्हें जलील होना पड़ रहा है। पूर्व सीएम जीतन राम मांझी छह माह पहले तक नीतीश के ही साथ रहे। नीतीश कुमार ने ही उन्हें सीएम बनाया था। उन्होंने इसका जिक्र भी अपने अंदाज में विधानसभा में किया था। उनके उस अंदाज की चौतरफा आलोचना भी हुई थी। मांझी कहते हैं कि नीतीश कुमार रंग बदलते रहते हैं। आगे भी वे रंग बदलें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मांझी कहते हैं कि नीतीश कुमार की नीयत ही ऐसी रही है कि वे समय-समय पर अपना रंग बदलते रहते हैं। अभी जैसी परिस्थिति उनके सामने है, मैं ऐसा समझता हूं कि आज उनकी न आरजेडी में कोई पैठ रह गई है और न एनडीए में वापसी का नैतिक साहस ही बचा है। उन्हें खुद नहीं समझ आ रहा कि वे क्या करें। ऐसे में वे कोई भी कदम उठा सकते हैं।

नीतीश कुमार की पहचान उनकी ईमानदारी, उनके गवर्नेंस और कामकाज के तरीके से एक गंभीर राजनीतिज्ञ के रूप में रही है। उन्हें गठबंधन चलाने का भी व्यापक अनुभव है। इसलिए 2005 से अब तक उनकी सियासत गठबंधन की ही रही है। दूसरे नेताओं की तरह उन पर परिवारवाद या वंशवाद का ठप्पा भी नहीं लगा है। गठबंधन की राजनीति में वह पारंगत हैं। इसके बावजूद उनका अपनी रणनीति के हिसाब से इधर-उधर आते-जाते रहना, अब उनके लिए खतरनाक साबित हो रहा है। कभी एनडी तो कभी महागठबंधन की उनकी आवाजाही अब उनके ही गले की हड्डी बन गई है। एनडीए में रहते बीजेपी के नेता भी उनसे मिलते थे। सुशील कुमार मोदी तो शुरू से ही रिश्ता टूटने तक उनके डेप्युटी सीएम रहे। इंडी अलायंस में आने के बाद उन्हें जरूर इस बात का एहसास हो रहा होगा कि आरजेडी या कांग्रेस के नेता उन्हें घास भी नहीं डालते। जीतन राम मांझी की जुबानी यह भी सुनने को आया है कि दिल्ली में अपने डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव से उन्होंने मिलने की कोशिश की, पर उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया।

नीतीश के सामने दूसरा बड़ा संकट यह है कि एनडीए में उनकी वापसी का दरवाजा बीजेपी ने बंद कर दिया है। हालांकि बीजेपी को नीतीश कुमार जैसे सहयोगी की सख्त जरूरत है। बीजेपी अभी तमाशा देखने के मूड में है। नीतीश बीजेपी से सौदेबाजी करते रहे। सीएम की कुर्सी पर दावेदारी उस वक्त भी नहीं छोड़ी, जब उन्हें बीजेपी से कम सीटें विधानसभा में मिलीं। बीजेपी की नीतियों की आलोचना करने का कोई मौका नीतीश ने नहीं छोड़ा। इसके बावजूद बुरे दिन में बीजेपी ने ही उनका साथ दिया। वह चाहे 2005 हो या 2017, नीतीश ने उन्हें संकट से उबारने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बावजूद उन्होंने 2022 में बीजेपी का साथ छोड़ दिया और उसी के खिलाफ विपक्षी दलों की गिरोहबंदी शुरू कर दी।

यह भी सच है कि नीतीश के सामने सरेंडर करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। वे अब आरजेडी के आगे हथियार डाल दें या बीजेपी के सामने सरेंडर करें। बीजेपी उन्हें अपना सकती है, लेकिन अपनी शर्तों पर। शर्तें उनके लिए टेढ़ी हो सकती हैं। मसलम सीएम पद का मोह त्यागें। वर्ष 2019 की तरह सीटों पर बारगेनिंग का तो सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए बीजेपी इस बात का इंतजार करेगी कि उन्हें इंडी अलायंस में कितनी सीटें मिलती हैं। नीतीश के सामने एक और संकट है। वह है अपनी पार्टी को टूट से बचाए रखना। इंडी अलायंस में सीटें कम मिलीं तो जेडीयू में टूट का खतरा है। जेडीयू के कई सांसद नीतीश को यह बता चुके हैं कि एनडीए में उनकी जीत जितनी आसान थी, इंडी अलायंस में उतनी ही मुश्किल होगी। आरजेडी की ओर से विधायकों को तोड़ने का खतरा अलग मंडरा रहा है। कुल मिला कर नीतीश की हालत किंकर्तव्य विमूढ़ जैसी हो गई है। वे समझ नहीं पा रहे कि उनका अगला कदम क्या हो।

जब पहली बार प्रकटे थे राम लाल कैसी थी अयोध्या?

आज हम आपको बताएंगे की पहली बार जब रामलाल प्रकटे थे तो कैसी थी अयोध्या! 22 दिसंबर की वह रात भी अच्छी तरह याद है। 23 दिसंबर की वह सुबह भी। मेरे प्रभु रामलला की जन्मभूमि पर 22 दिसंबर 1949 को जो कुछ हुआ, उसने एक ही रात में राम मंदिर आंदोलन की सूरत बदल कर रख दी। इससे 15 साल पहले 1934 में अयोध्या में जुटे राम भक्तों ने दूसरी बार बाबरी मस्जिद तक पहुंचाने का साहस दिखाया था। पहली बार 1853 में बाबरी मस्जिद तक राम भक्त पहुंचे थे। पहली बार आंशिक नुकसान पहुंचाया गया था। इसके बाद अगले 2 साल तक दंगे भड़कते रहे। अवध के शासक नवाब वाजिद अली शाह की रिपोर्ट कहती है कि 1855 के दंगों में 70 मुसलमानों की मौत हुई थी। 1934 में मस्जिद के तीनों गुंबदों को हिंदुओं ने ढहा दिया। तनाव भड़का। बाद में फैजाबाद डीएम ने इसका पुनर्निर्माण कराया। आजाद देश में पहली बार मेरी धरती पर वह हुआ, जिसका अंदेशा किसी को नहीं था। हिंदू पक्ष जिस विवादित बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद को प्रभु रामलला का जन्म स्थान बताता रहा था, वहां पर भगवान राम के बाल स्वरूप का प्रगटीकरण हो गया। 22 दिसंबर की ठंडी में आधी रात की इस घटना ने सुबह तक तूल पकड़ लिया था। मेरी की गलियों में जुटे लोग ‘भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी’ भजन गाने लगे। देखते ही देखते राम जन्मभूमि परिसर हिंदुओं से पट गया। इसके बाद आजाद देश की पहली सत्ता उसे वाकये से निपट पाने में सक्षम नहीं हो पाई। 15 साल पहले जिस मस्जिद के गुंबद को तोड़ा गया था और वहां फैजाबाद डीएम ने पुनर्निर्माण कराया। उसी मस्जिद में प्रगट हुए प्रभु रामलला को बाहर निकालने की हिम्मत फैजाबाद के तत्कालीन डीएम ने नहीं दिखाई। केंद्र की जवाहरलाल नेहरू सरकार से लेकर यूपी की गोविंद बल्लभ पंत सरकार तक फैजाबाद डीएम से कार्रवाई की बात करती रही, लेकिन उन्होंने आदेश मानने से साफ इनकार कर दिया। डीएम की ओर से कहा गया कि इस समय कोई भी एक्शन अयोध्या, प्रदेश और देश के सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक सकता है। इसके बाद शुरू हुआ विवाद का एक लंबा दौर, जो अगले करीब 60 सालों तक आजाद देश की दशा और दिशा तय करता रहा।

15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के बाद से धार्मिक तौर पर लोगों में जागरूकता बढ़ने लगी। सोमनाथ का मामला गरमाया हुआ था। लौहपुरुष सरदार पटेल ने इसके पुनर्निर्माण की योजना को हरी झंडी दे दी। इसके बाद हिंदूओं ने मेरे प्रभु रामलला के धाम को मुक्त कराने की मांग शुरू कर दी। देश में संविधान की रचना चल रही थी। पाकिस्तान ने खुद को मुस्लिम देश के रूप में स्थापित कर लिया था। वहीं, भारत को धर्म निरपेक्ष देश के रूप में विकसित किए जाने की बात संविधान में रखे जाने पर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान हिंदुओं की महत्वाकांक्षा ने हिलोर मारना शुरू कर दिया। प्रभु रामलला को उनके धाम में स्थापित करने की चर्चा शुरू हो गई। 1859 में अंग्रेजी सरकार के बंटवारे के तहत प्रभु रामलला को बाबरी मस्जिद के बाहर बनाए गए चबूतरे पर स्थापित किया था। मेरे प्रभु की वहीं पूजा हो रही थी। वहीं, बाबरी मस्जिद मुसलमानों को दी गई थी। देश को धर्म के आधार पर आजादी मिली तो हिंदू पक्ष ने प्रभु रामलला के जन्मस्थान पर दावा शुरू कर दिया। हालांकि, आजाद भारत की सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। फिर, ऐसा कुछ हुआ, जिसने देश में हलचल पैदा कर दी।

22- 23 दिसंबर 1949 की रात थी। अचानक अयोध्या में खबर फैली कि बाबरी मस्जिद के गर्भगृह में रामलला प्रगट हो गए हैं। देखते ही देखते यह खबर आग की तरह फैल गई। चारों तरफ से ‘भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी, हर्षित महतारी मुनि मनहारी अद्भुत रूप विचारी’ का पाठ करते लोग राम जन्मभूमि की तरफ बढ़ने लगे। ऐसा नहीं था कि मेरे यहां पर पहली बार भय प्रगट कृपाला का पाठ हो रहा था। मेरे यहां तो 500 सालों से यह भजन पढ़ा जाता रहा है। 23 दिसबर 1949 को इस भजन के मायने ही बदल गए थे। भोर होते-होतेजंगल में आग की तरह भगवान राम प्रगट होने की बात फैल गई थी। बस यही चर्चा हो रही थी कि रघुकुल कुलभूषण भगवान श्रीराम बाल रूप में जन्मभूमि मंदिर के गर्भगृह में पधार चुके थे। बाबरी मस्जिद के प्रांगण हिंदू श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से पट चुकी थी। प्रभु श्रीराम के बालरूप के दर्शन के लिए वहां पर भारी भीड़ जमा थी। भगवान का दर्शन कर हर कोई विभोर हो रहा था।

1934 की घटना के बाद से राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद परिसर का रोज निरीक्षण होने लगा था। रूटीन जांच के लिए अयोध्या थाने के एसएचओ यहां रोज आते थे। 23 दिसंबर 1949 की सुबह 7 बजे तत्कालीन एसएचओ रामदेव दुबे जब रूटीन चेकिंग के लिए पहुंचे तो वहां की स्थिति देखकर दंग रह गए। करीब 500 लोग बाबरी परिसर में जमा थे। उन्होंने तत्काल मामले की सूचना सीनियर अधिकारियों को दी। सीनियर अधिकारी स्थिति को समझ पाते, तब तक दोपहर हो चुकी थी। बाबरी परिसर करीब 5000 लोगों से पट चुका था। अयोध्या के आसपास के गांवों से भी लोग दौड़ते- भागते राम जन्मभूमि मंदिर पहुंच रहे थे। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी इस भीड़ को देखकर दंग थी। प्रभु रामलला किसी आम मंदिर तो प्रगट हुए नहीं थे। बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे वे प्रगट हुए थे। बाबरी को लेकर लोगों में धारणा थी कि राम मंदिर को तोड़कर इसे बनाया गया था। रख-रखाव के अभाव में बाबरी जर्जर हो रही थी। शुक्रवार को जुमे की नमाज के लिए खुलती थी। बाकी दिनों में तो एक-दो लोग ही इधर आते थे। लेकिन, वह दिन अलग थी।

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की किताब ‘अयोध्याः 6 दिसंबर 1992’ में 23 दिसंबर 1949 की घटना का पूरा जिक्र है। उन्होंने अयोध्या थाने में दर्ज की गई उस एफआईआर का विवरण भी दिया है, जिसे 23 दिसंबर 1949 की सुबह दर्ज किया था। एसएचओ रामदेव दुबे ने आईपीसी की धारा 147, 448 और 295 के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। इसमें लिखा गया कि रात में 50- 60 लोग ताला तोड़कर और दीवार फांदकर मस्जिद में घुसे। वहां उन्होंने श्री रामचंद्रजी की मूर्ति की स्थापना की। उन्होंने दीवार पर अंदर और बाहर गेरुए और पीले रंग से ‘सीताराम’ आदि भी लिखा। उस समय ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल ने उन्हें ऐसा करने से मना किया, लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी। वहां तैनात पीएसी को भी बुलाया गया, लेकिन उस समय तक वे मंदिर में प्रवेश कर चुके थे।

फैजाबाद डीएम की अपनी अलग चिंता थी। वे बल प्रयोग के जरिए एक बड़े विवाद को खड़ा नहीं करना चाहते थे। चीफ सेक्रेटरी को भेजे गए पत्र में डीएम ने साफ किया रामलला की मूर्ति को हटाने के बाद बड़े पैमाने पर विवाद भड़क सकता है। जिला प्रशासन के अधिकारियों और पुलिस वालों की जान की गारंटी भी नहीं दी जा सकती है। डीएम ने सरकार को बताया कि अयोध्या में ऐसा पुजारी मिलना असंभव है, जो विधिपूर्वक रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से हटाने के लिए तैयार हो जाए। कोई भी इस प्रकार का कृत्य करके अपने इहलोक के साथ- साथ परलोक को भी बिगाड़ना नहीं चाहेगा। इस प्रकार का कार्य करने वाले पुजारी का मोक्ष संकट में पड़ जाएगा। कोई भी पुजारी ऐसा करने को तैयार नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश की गोविंद वल्लभ पंत सरकार डीएम केकेके नायर के तर्कों से सहमत नहीं थी। सरकार की ओर से दोबारा आदेश दिया गया कि पुरानी स्थिति को हर हाल में बहाल किया जाए। चार दिन बाद 27 दिसंबर 1949 को डीएम नायर ने अपना जवाब भेजा। डीएम नायर ने सरकार के आदेश पर अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी। इसके साथ-साथ विवाद से निपटने के लिए सरकार को एक रास्ता भी सुझाया। डीएम नायर ने पंत सरकार को सलाह दी कि विस्फोटक हालात को काबू में करने के लिए इस मसले को कोर्ट पर छोड़ सकते हैं।

डीएम ने सुझाव में कहा कि कोर्ट का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीदार गेट लगाया जा सकता है। वहां से श्रद्धालुओं को रामलला के दर्शन की सुविधा होगी। लेकिन, अंदर प्रवेश नहीं मिलेगा। रामलला की नियमित पूजा और भोग लगाने के लिए नियुक्त पुजारियों की संख्या तीन से घटाकर एक करने का सुझाव दिया गया। विवादित ढांचे के आसपास सुरक्षा का घेरा सख्त करने की बात कही गई। इससे उत्पातियों को वहां आने से रोका जा सकता था। केंद्र की नेहरू और यूपी की पंत सरकार ने डीएम नायर का इस्तीफा अस्वीकृत कर दिया। डीएम के सुझावों पर अमल किया गया। इस तरह रामलला की मूर्ति बाबरी मस्जिद के गर्भगृह में रह गई। रामलला ताले में बंद हो गए। इसके साथ ही उस विवाद के बीजारोपण हो गया, जिसने आगे चलकर देश की राजनीतिक और धार्मिक दिशा बदलकर रख दी।

आखिर कौन है राम मंदिर की आवाज दीदी मां ऋतंभरा?

आज हम आपको राम मंदिर की आवाज दीदी मां ऋतंभरा के बारे में जानकारी देने वाले हैं! सूरज अपनी गरिमा छोड़ सकता है। चंद्रमा अपनी शीतलता का परित्याग कर सकता है। सागर अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर सकता है, पर रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को विश्व की कोई ताकत रोक नहीं सकती।’ यह एक साध्वी का संकल्प है, एक रामभक्त का ओज और मां भारती की आराधना में लीन एक तपस्विनी की हुंकार। अयोध्या में कारसेवकों पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने गोलियां चलवाई थीं। पुलिस की बंदूकों ने जिन कारसेवकों का असमय प्राण हर लिए उनके संकल्प एक-एक हिंदू के रग-रग में संचारित होते रहें, इसके लिए वो साध्वी आज दहाड़ रही थीं। एक-एक शब्द मानो युद्ध का निनाद था, हरेक भाव-भंगिमा मानो युग परिवर्तन का आह्वान और सामने रामभक्तों का जनसैलाब। वह स्थान देश की राजधानी दिल्ली का इंडिया गेट था जहां श्रीराम कारसेवा समिति, हिंदू परिषद और राम जन्मभूमि न्यास के बुलावे पर दुनिया के कोने-कोने से रामभक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा था।  पंजाब के लुधियाना स्थित दोराहा में जन्मीं निशा ने महज 16 वर्ष की उम्र में भगवा चोला पहन लिया था। हरिद्वार के गुरु परमानंद गिरी ने नए उन्हें साध्वी जीवन का नया नाम दिया- ऋतंभरा। आज भी साध्वी ऋतंभरा की वाणी में ऐसा ओज है कि वो सुनने वालों में एक गजब सी कशिश पैदा कर देती है। तब ऋतंभरा युवावस्था में थीं। वो बोलतीं तो ऐसा लगता मानो युद्धभूमि में तलवारों की टंकार गूंज रही हो। उनके एक-एक शब्द संकल्पों की सिद्धि को प्रेरित करता और रामभक्तों में नए जज्बे का संचार कर देता। वो बेबाक थीं, कोई डर नहीं, कोई संशय नहीं। इसलिए दिल की बात बेझिझक उनकी जुबां पर आ जाती। दिल्ली की ही उस रैली में साध्वी ऋतंभरा ने मुलायम सिंह यादव को कातिल, हिजड़ा जैसे शब्दों से नवाजा तो राम मंदिर का विरोध करने वालों को कुत्ता तक कहा।

उन्होंने एक रामभक्त से अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए कहती हैं, ‘मैंने उससे कहा, तुम एक हिजड़े को मारने के लिए गोली बर्बाद करोगे?’ दरअसल, कारसेवकों की हत्या से दुखी उस रामभक्त ने पास में बंदूक रखने की इच्छा साध्वी ऋतंभरा के सामने जताई थी जिसपर साध्वी ने उसे समझाते हुए कहा कि राम के विरोधी नेताओं पर गोलियां चलाने की जरूरत नहीं है, उन्हें कुर्सी से हटा दो। वो मंच से कहती हैं, ‘ये राम द्रोही नेताओं के प्राण इनकी कुर्सी में रहते हैं, इनकी कुर्सी छीन लो, ये अपने आप कुत्ते की मौत मर जाएंगे। इनको मारने के लिए किसी बम-बारूद, गोली की जरूरत नहीं है।’ इसी बेबाकी से साध्वी ऋतंभरा मंच से आवाज देतीं तो रामभक्तों का संकल्प और गहरा हो जाता। उनकी कविताएं देशप्रेमियों के दिलों को बखूबी सिंचित करतीं। साध्वी ऋतंभरा कहा करतीं, ‘हो हिंदू हो या मुसलमान, जिसको इस देश से प्यार नहीं; तो फिर उसको इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं’!

दरअसल, 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन छेड़ा तो इससे देशभर के साधु-संत जुड़ने लगे। एक ओजस्वी वक्ता के रूप में साध्वी ऋतंभरा राम मंदिर आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन गईं। इससे पहले साध्वी ऋतंभरा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस की महिला संगठन राष्ट्रीय सेविका समिति से भी जुड़ी थीं। लेकिन वीएचपी के कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने हिंदू जागृति अभियान का कमान संभाल लिया। 1990 में जब अयोध्या आंदोलन ने जोर पकड़ लिया तो साध्वी ऋतंभरा घर-घर जाने लगीं। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया तो वो अयोध्या में ही थीं। इसीलिए लिब्राहन आयोग ने बाबरी विध्वंस के लिए जिन 68 आरोपियों की सूची बनाई, उसमें साध्वी ऋतंभरा का भी नाम था। आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा कि साध्वी ऋतंभरा ने तीखे भाषणों के जरिये मस्जिद विध्वंस का माहौल बनाया था।

अयोध्या में राम जन्मभूमि से बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के तीन साल ही हुए थे कि मध्य प्रदेश में साध्वी ऋतंभरा को गिरफ्तार कर लिया गया। तब एमपी में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे दिग्विजय सिंह। साध्वी ऋतंभरा इंदौर की एक जनसभा में ईसाई मिशनरियों की तरफ से हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवाए जाने पर अपनी चिंता जाहिर की। तब सीएम दिग्विजय सिंह के आदेश पर मध्य प्रदेश की पुलिस ने साध्वी ऋतंभरा को भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। हाई कोर्ट से जमानत के बाद साध्वी ऋतंभरा 11 दिन बाद जेल से निकल पाईं। उसके बाद वो धीरे-धीरे थोड़ा गुप्त रहने लगीं। बाद में साध्वी ऋतंभरा ने उत्तर प्रदेश के वृंदावन में वात्सल्य ग्राम की स्थापना की। उन्होंने मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर और हिमाचल प्रदेश के सोलन में भी वात्सल्य ग्राम बने। बाद में इसकी शाखाओं का विस्तार होता रहा। वात्सल्य ग्राम के बच्चे उन्हें दीदी मां कहकर पुकारते हैं। दीदी मां को पुस्तकें पढ़ने का शौका है। उन्हीं दीदी मां के वृंदावन स्थित वात्सल्य ग्राम में देश का पहला बालिका सैनिक स्कूल भी खुला है। साध्वी ऋतंभरा के प्रवचन आज भी लोगों को आह्लादित करते हैं। उनके प्रवचनों को पसंद करने वालों की संख्या करोड़ों में हैं। साध्वी ऋतंभरा रामकथा करती हैं और श्रीमद भागवत कथा भी। वो आज भी बेधड़क, बेहिचक अपने मान की बात करती हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो मीडिया ने साध्वी ऋतंभरा का विचार जानना चाहा। एक टीवी इंटरव्यू में साध्वी ऋतंभरा ने बिना लाग-लपेट कह डाला, ‘राम रहेंगे टाट में, भक्त रहेंगे ठाठ से? ऐसा नहीं होना चाहिए। नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंदिर नहीं बनेगा तो फिर कब बनेगा?’

ये वही साध्वी ऋतंभरा थीं जिन्होंने महज छह वर्ष पहले 14 अप्रैल, 2008 को नरेंद्र मोदी को राष्ट्रनायक बताया था। उन्होंने अहमदाबाद के टैगोर हॉल में साध्वी ऋतंभरा ने कहा था, ‘मैं आज गुजरात के लोकनायक की पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में नहीं आई हूं, मैं राष्ट्रनायक के रूप में नरेंद्र भाई मोदी को देखती हूं।’ वह अवसर था गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की लिखी पुस्तक ‘ज्योतिपुंज’ को लोकार्पण का। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के स्वयंसेवकों पर लिखी गई पुस्तक के लोकार्पण समारोह में साध्वी ऋतंभरा ने भविष्य के नरेंद्र मोदी का दीदार किया था, वो सच था। नरेंद्र मोदी आज करोड़ों लोगों के लिए राष्ट्रनायक ही तो हैं। 5 अगस्त, 2019 को राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए अयोध्या पहुंचे उस राष्ट्रनायक नरेंद्र मोदी रामलला को दंडवत प्रणाम किया तो साध्वी ऋतंभरा गदगद हो गईं। आज वो हर इंटरव्यू में उस दृश्य का बखान करती हैं और कहती हैं- यह एकजुट हिंदुओं का दृढ़संकल्प का परिणाम है। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम का पहला निमंत्रण पत्र साध्वी ऋतंभरा को ही मिला।

क्या श्रीलंका के रास्ते पर है मालदीव? होगा कंगाल!

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मालदीव अब श्रीलंका के रास्ते पर है और क्या वह कंगाल हो सकता है! मालदीव इन दिनों काफी चर्चा में है। पिछले दिनों भारत को आंखे दिखा रहा मालदीव खुद चीन के कर्ज के जाल में फंसा हुआ है। भारत के खिलाफ बयानबाजी करने वाले मालदीव के मंत्री शायद इस बात को भूल चुके हैं कि उनकी हालत भी श्रीलंका की तरह हो सकती है। मालदीव भी श्रीलंका की तरह चीन के कर्ज में डूबा हुआ है। विश्व बैंक ने भी इसे लेकर चिंता जताई है। मालदीव के कुल कर्ज में अकेले चीन की मौजूदा हिस्सेदारी 37 फीसदी है। माना जा रहा है कि चीन FTA कर्ज की हिस्सेदारी और बढ़ा सकता है, जिसके बाद मालदीव श्रीलंका जैसे संकट में फंस जाएगा। जानकारी के अनुसार, मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू चीन यात्रा पर हैं। उन्होंने बीजिंग के साथ मुक्त व्यापार समझौते को फिर से शुरू करने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन यह कदम मालदीव को कर्ज के जाल में धकेल सकता है। मालदीव पहले से ही बड़े कर्ज में डूबा हुआ है इसके बाद एक और वह भारत से विवाद कर रहा है, तो दूसरी और कर्ज का बोझ बढ़ाने में लगा हुआ है। कोरोना काल में भारत ने मालदीव की खूब मदद की थी, इसके बाद भी महामारी ने वहां की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। विश्व बैंक ने अपनी अक्टूबर की रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि अगर मालदीव चीन के और करीब जाता है, तो यह देश के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है क्योंकि उस पर पहले से ही बीजिंग का 1.37 बिलियन डॉलर बकाया है। सऊदी अरब और भारत से भी आगे चीन, मालदीव का सबसे बड़ा द्विपक्षीय कर्जदाता है।

मालदीव के पुरानी इबू सोलिह सरकार और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन एफटीए को खत्म करने का विचार कर रहे थे। सोलिह सरकार का मानना था कि समझौते पर पहले हस्ताक्षर नहीं किए जाने चाहिए थे। उन्होंने कहा था कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है। इस सौदे में चीन से बिना किसी टैक्स के सामान आयात करने की अनुमति दी गई। मालदीव के निर्यात का एक बड़ा हिस्सा मछली पालन है, लेकिन पिछली मालदीव सरकार ने आरोप लगाया कि मछुआरों को एफटीए से कोई फायदा नहीं हो रहा है।

इस बीच, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बुधवार को बीजिंग में अपने मालदीव समकक्ष के साथ बातचीत की, जिसके बाद दोनों देशों ने पर्यटन सहयोग सहित 20 प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर किए और अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक व्यापक रणनीतिक और सहकारी साझेदारी तक बढ़ाया। उन्होंने आपदा प्रबंधन, ब्लू इकॉनमी, डिजिटल अर्थव्यवस्था में निवेश को मजबूत करने और बेल्ट एंड रोड पहल पर समझौतों पर हस्ताक्षर किए। चीन भी मालदीव की आर्थिक मदद करेगा, हालांकि अभी तक राशि का खुलासा नहीं किया गया है। मंगलवार को फुजियान प्रांत में मालदीव बिजनेस फोरम को अपने संबोधन में, मुइजू ने चीन से अपने देश में अधिक पर्यटकों को भेजने के प्रयासों को तेज करने की अपील की। उन्होंने कहा, ‘कोविड से पहले चीन पर्यटन के लिए हमारा नंबर एक बाजार था, मेरी अपील है कि हम चीन को यह स्थिति फिर से हासिल करने के लिए प्रयास तेज करें।’

बता दें कि भारत और मालदीव के रिश्तों में खटास के बीच राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू चीन की राजकीय यात्रा के लिए रवाना हुए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आमंत्रण पर मुइज्जू की यह यात्रा हो रही है। मुइज्जू की यह यात्रा बेहद खास है। क्योंकि उन्होंने भारत को छोड़कर चीन को चुना है। दरअसल 2008 में बहुदलीय लोकतंत्र की शुरुआत के बाद यह पहली बार है जब मालदीव का कोई राष्ट्रपति पद संभालने के बाद पहली यात्रा भारत में नहीं कर रहा। मुइज्जू चीन समर्थक और भारत विरोधी नेता माने जाते हैं। लेकिन इस यात्रा से उन्हें क्या मिलेगा? एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत के साथ चल रहे तनाव को चीन भुनाने की कोशिश करेगा। मुइज्जू के मंत्रियों की ओर से भारत विरोधी बयान दिए गए हैं, जिसके बाद मालदीव जाने वाले भारतीय टूरिस्ट की संख्या में बड़ी गिरावट हो सकती है। भारतीयों की कम होती संख्या को चीन अपने नागरिकों से भरने की डील भी कर सकता है। यह संभव भी है क्योंकि 2023 में अचानक चीनी टूरिस्ट की संख्या मालदीव में बढ़ी है। 2022 में मालदीव में संख्या के लिहाज से चीन 27वें नंबर पर था, जो 2023 में अचानक तीसरे नंबर पर पहुंच गया है।

इसके अलावा चीन भारी-भरकम निवेश भी मालदीव में कर सकता है। हालांकि जैसा चीन बाकी देशों के साथ करता आया है, वह किसी भी तरह का कर्ज या निवेश अपनी शर्तों पर करेगा। एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि जिस तरह श्रीलंका और पाकिस्तान चीन के कर्ज के नीचे दब गए उसी तरह मालदीव के साथ भी होगा। इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि भारत विरोधी मुइज्जू के कार्यकाल के अंत में मालदीव कर्ज में डूब जाए। हालांकि इस बात की भी चिंता जताई जा रही है कि अगर मालदीव कर्ज में डूबता है तो उसे बचाने के लिए भारत को ही आगे आना पड़ेगा।

मुइज्जू पहले भी कहते रहे हैं कि उनकी सरकार आने के बाद चीन से बेहतर संबंध होंगे। उन्होंने अपना पूरा चुनाव भारत विरोध के साथ लड़ा है। मुइज्जू की इस यात्रा के दौरान चीन और मालदीव के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। मुइज्जू की यात्रा से पहली चीन के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘चीन और मालदीव की पुरानी दोस्ती है। राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद से पिछले 52 वर्षों में दोनों देशों ने एक-दूसरे साथ सम्मान का व्यवहार किया है और एक दूसरे का समर्थन किया है।’

जानिए एएमयू स्पेशल स्टेट्स पर सुनवाई के दौरान क्या हो रहा है?

आज हम आपको एएमयू स्पेशल स्टेट्स पर सुनवाई के दौरान हुई घटनाओं के बारे में जानकारी देने वाले हैं! अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्पेशल स्टेट्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ताबड़तोड़ दलीलें दे रहे हैं। बुधवार को शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सिब्बल ने तर्क दिया कि देश में शिक्षा के मामले में मुसलमानों की हालत अनुसूचित जातियों SC से भी नीचे है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है। हालांकि, सिब्बल के तर्क देने के दौरान सरकार की तरफ से दलील दे रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी पलटवार किया। वैसे जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म किए जाने के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान अक्सर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के दौरान नोकझोंक होती रहती थी। बुधवार को भी दोनों के बीच दलील रूपी आरोप-प्रत्यारोप जमकर चले। जब भी ये दोनों वकील आमने-सामने होते हैं, उनकी भिड़ंत रोचक होती है। मामला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्पेशल स्टेट्स को लेकर चल रही सुनवाई का था। सिब्बल ने दलील दी कि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार में तो सिर्फ कुछ आरक्षण की बात है और अब उन्हें भी छीन लिया जाएगा! अगर हमारे प्रशासन में अनुचित दखल दिया गया तो निश्चित रूप से अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। मैं ये बताना चाहता हूं कि शिक्षा के मामले में मुसलमान अनुसूचित जातियों से भी नीचे हैं। ये तथ्य हैं। हमें पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है और खुद को सशक्त बनाने का एकमात्र तरीका शिक्षा का माध्यम है और अधिकांश लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में अल्पसंख्यक बहुत कम हैं और केवल बहुसंख्यक हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें सशक्त नहीं बनाया गया है।

यूपीए सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे सिब्बल ने सबसे पहले सरकार के रुख पर सवाल उठाया। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2006 के फैसले का समर्थन करने पर सरकार की आलोचना की, जिसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अधिनियम के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था। उन्होंने कहा कि केंद्र संसद द्वारा पारित कानून का समर्थन करने के लिए बाध्य है, और मोदी सरकार का रुख ‘चिंताजनक’ है। सिब्बल 1981 में एएमयू अधिनियम में हुए संशोधन को फिर से लागू करने की दलील दे रहे थे। इस नियम में यह स्पष्ट किया गया था कि एएमयू, जो मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल एमएओ कॉलेज का नया रूप है, भारत के मुसलमानों द्वारा स्थापित एक विश्वविद्यालय है। इससे पहले, इसी प्रावधान में लिखा था ‘विश्वविद्यालय से अर्थ है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’। यहां 1981 में अधिनियम की धारा 5 में एक और बिंदु जोड़ा गया था, जिससे विश्वविद्यालय को भारत में मुसलमानों की शिक्षा और संस्कृति को आगे बढ़ाने की अनुमति मिली थी। हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था, क्योंकि यह 1967 में सुप्रीम कोर्ट के अजीज बाशा मामले के फैसले के खिलाफ जाता था, जिसमें एएमयू को एक गैर-अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया गया था। हाईकोर्ट ने पीजी कोर्स में मुसलमानों के लिए 50% आरक्षण को भी रद्द कर दिया था।

सिब्बल ने कहा, ‘मान लीजिए कि 1981 का अधिनियम गलत है, फिर भी यह संसद द्वारा पारित कानून है। ठीक है, फिलहाल यह अमान्य है। लेकिन क्या कोई सरकार कभी संसद के कानून के विपरीत अदालत में दलील दे सकती है, भले ही वह अमान्य हो? कार्यपालिका संसद के कानून के खिलाफ नहीं जा सकती, भले ही अदालत ने उसे रद्द कर दिया हो। सिब्बल ने कहा कि हर रोज हाईकोर्ट द्वारा कानून रद्द किए जाते हैं। यह पहली बार है जब सरकार ने हाईकोर्ट में समर्थन करने के बाद कहा है कि वह 1981 के अधिनियम के खिलाफ है। वे कहते हैं कि वे अपना मन बदल सकते हैं। हां, वे बदल सकते हैं लेकिन केवल तभी जब यह किसी कार्यकारी निर्णय से संबंधित हो, न कि तब जब कानून संसद द्वारा पारित किया गया हो। यह एक गंभीर मुद्दा है।

सिब्बल की दलील के एक खामियों को उजागर करते हुए सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि अगर सरकार को हर संसदीय कानून का समर्थन करना ही है, तो क्या उसे इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लागू किए गए आपातकाल के कुख्यात 39वें संविधान संशोधन का भी समर्थन करना पड़ेगा? उस संशोधन ने तो मूलभूत अधिकारों को ही रोक दिया था। उन्होंने ये जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का काम सिर्फ सही तरीके से कानून पेश करना है, न कि हर परिस्थिति में उसका बचाव करना। मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट ने 1981 के अधिनियम को सही ठहराया है और सरकार हमेशा हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करती है। मेहता ने तर्क देकर सिब्बल की दलील की धार को कुंद किया।

दरअसल, सिब्बल ने अपनी दलील में इस बात पर जोर दिया कि सरकार को अदालत द्वारा किसी कानून को रद्द कर दिए जाने के बाद भी उसका समर्थन करना चाहिए। उनके मुताबिक, ऐसा न करना संसद की गरिमा को कम करता है और कानून के राज को कमजोर करता है।

क्या इस साल दीपिका पादुकोण बॉलीवुड पर चलायेंगी सिक्का?

इस साल दीपिका पादुकोण बॉलीवुड पर अपना सिक्का चला सकती है! पिछले साल अपनी दोनों सुपरहिट फिल्मों ‘जवान’ और ‘पठान’ के चलते शाहरुख खान को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारे का खिताब मिला। इस दौरान उनकी फिल्मों ने अकेले दम पर बॉक्स ऑफिस पर दुनियाभर में 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की। हालांकि नए साल में शाहरुख खान की कोई फिल्म रिलीज के लिए शेड्यूल नहीं है। लेकिन ‘जवान’ और ‘पठान’ दोनों ही फिल्मों में किंग खान के साथ चर्चा बटोरने वाली एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण बीते साल के धमाकेदार प्रदर्शन के बाद अब नए साल में भी फुल फॉर्म में नजर आने वाली हैं। उनकी इस साल तीन बड़ी फिल्में ‘फाइटर’, ‘सिंघम’ और ‘कल्कि 2898 एडी’ रिलीज के लिए तैयार हैं। पिछले दिनों अपना 38वां जन्मदिन मनाने वाली दीपिका पादुकोण इस पूरे साल बॉलीवुड से लेकर साउथ सिनेमा तक में छाई रहने वाली हैं। जी हां, यह दीपिका का जबरदस्त क्रेज ही है कि उन्हें हिंदी से लेकर साउथ सिनेमा वाले तक पूछ रहे हैं। इस महीने दीपिका ऋतिक रोशन के अपोजिट भारत की पहली एरियल एक्शन फिल्म बताई जा रही ‘फाइटर’ में भारतीय एयरफोर्स के एक लड़ाकू पायलट के रोल में नजर आएंगी।

वहीं, इंडिपेंडेंस डे पर वो रोहित शेट्टी के कॉप यूनिवर्स का हिस्सा बनेंगी। जी हां, दीपिका सुपरहिट सिंघम फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म ‘सिंघम अगेन’ में अजय देवगन के साथ देश के दुश्मनों से लोहा लेती नजर आएंगी। इसके अलावा दीपिका जल्द ही सुपरस्टार प्रभास के साथ पैन इंडिया फिल्म ‘कल्कि 2898 AD’ में भी नजर आएंगी। पहले यह फिल्म इस साल 12 जनवरी को रिलीज होने वाली थी, लेकिन अब इसकी रिलीज डेट आगे बढ़ा दी गई है। दरअसल, फिल्म में वीएफएक्स का काम बड़े लेवल पर है। इसलिए उसमें वक्त लग रहा है। अपनी तरह की इस अनोखी फिल्म में दीपिका और प्रभास के अलावा अमिताभ बच्चन भी एक खास रोल में नजर आएंगे। इस फिल्म को भारत की हॉलीवुड को टक्कर माना जा रहा है।

दीपिका ने न सिर्फ बॉलीवुड बल्कि विन डीजल की ‘XXX : रिटर्न ऑफ जेंडर केज’ जैसी हॉलीवुड फिल्म में भी अपना दम दिखाया है। खबर है कि अगले साल वह चर्चित हॉलीवुड फिल्म ‘द इंटर्न’ के भारतीय रीमेक में भी नजर आएंगी। पहले इस फिल्म में दीपिका के साथ ऋषि कपूर के काम करने की चर्चा थी। लेकिन अब उनके निधन के बाद अमिताभ बच्चन दीपिका के साथ फिल्म ‘द इंटर्न’ के भारतीय रीमेक में नजर आएंगे। इसके अलावा ‘बाहुबली’ व ‘आरआरआर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बना चुके डायरेक्टर एस एस राजामौली के साथ भी दीपिका के काम करने की चर्चा है। दरअसल, राजामौली ने पिछली बार भगवान राम के किरदार से प्रेरित अपनी फिल्म ‘आरआरआर’ में आलिया भट्ट को मौका दिया था। खबर है कि उनकी अगली फिल्म भगवान हनुमान के किरदार से प्रेरित होगी। इस फिल्म में लीड रोल में तेलुगू सुपरस्टार महेश बाबू के काम करने की चर्चा है। वहीं, दीपिका की ऑल इंडिया अपील को देखते हुए वह भी इस फिल्म का हिस्सा हो सकती हैं। इन दोनों फिल्मों के अलावा दीपिका फिल्म ‘टाइगर वर्सेज पठान’ में एक महत्वपूर्ण रोल में नजर आएंगी। वहीं वह ‘ब्रह्मास्त्र भाग 2’ में अमृता के रोल में दिखेंगी। उनकी एक झलक फैंस फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में भी देख चुके हैं।

बीते साल जबरदस्त सफलता से पहले दीपिका ने सालों तक इंतजार किया है। जी हां, इससे पहले उनकी साल 2018 में आई फिल्म ‘पद्मावत’ ब्लॉकबस्टर रही थी। उसके बाद उन्होंने इसी साल फिल्म ‘जीरो’ में कैमियो किया, जो फ्लॉप रही। 2019 में दीपिका की कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई। जबकि 2020 में आई दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। वहीं 2021 में आई उनकी फिल्म ’83’ को भी दर्शकों से कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। साल 2022 में सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई दीपिका की फिल्म ‘गहराइयां’ जरूर दर्शकों के एक वर्ग के बीच चर्चा में रही। वहीं ‘ब्रह्मास्त्र’ में उन्हें बतौर अमृता अपनी एक झलक के चलते चर्चा मिली। वहीं अपने पति रणवीर सिंह की अगली फिल्म ‘सर्कस’ में भी दीपिका ने एक आइटम नंबर किया। बता दें कि इन फिल्मों के अलावा दीपिका फिल्म ‘टाइगर वर्सेज पठान’ में एक महत्वपूर्ण रोल में नजर आएंगी। वहीं वह ‘ब्रह्मास्त्र भाग 2’ में अमृता के रोल में दिखेंगी। उनकी एक झलक फैंस फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में भी देख चुके हैं। लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। इस तरह से देखा जाए, तो फिल्म ‘पठान’ से जहां किंग खान का चार साल बाद वनवास खत्म हुआ। वहीं दीपिका को भी काफी अरसे बाद सफलता मिली और उनका यह सफर इस साल और आने वाले सालों में भी जारी रहने वाला है।

आखिर कौन है आईएस आतंकी शाहनवाज आलम?

आज हम आपको आईएस आतंकी शाहनवाज आलम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त आईएसआईएस से जुड़े गिरोह की जांच से खुलासा हुआ है कि मालदीव की एक रहस्यमयी महिला ने गिरफ्तार आतंकवादी मोहम्मद शाहनवाज का ब्रेन वॉश किया था। सूत्रों का कहना है कि वह महिला शाहनवाज की हैंडलर थी और उसने शाहनवाज को इराक-सीरिया सीमा के पास मौजूद कुख्यात आईएसआईएस शरणार्थी शिविर अल-हवल कैंप को दान देने के लिए भी उकसाया था। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल की जांच से पता चला है कि शाहनवाज ने गूगल पे के जरिए केरल में एक शिक्षक के माध्यम से 1.4 लाख रुपये का दान दिया था। यह रकम कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन माल-ए-गनीमत थी। सूत्रों ने बताया कि खुफिया एजेंसियां मालदीवी महिला के बारे में और जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही हैं। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, माइनिंग इंजीनियर से आईएस आतंकवादी बने शाहनवाज टेलीग्राम चैनल ‘केज्ड पर्ल’ पर इस महिला के संपर्क में आया था। यह महिला चैनल की एडमिन थी और दावा करती थी कि वह शिविर में रहने वाली महिलाओं के लिए आर्थिक मदद जुटाने का अभियान चला रही है। शुरुआती बातचीत शिविर के लिए दान के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसके बाद महिला ने बताया कि वह 2015 में सीरिया भाग गई थी। पुलिस की जांच रिपोर्ट में लिखा है, ‘उसने शाहनवाज को अपने भाई का व्हॉट्सएप कॉन्टैक्ट मालदीव मोबाइल नंबर दिया। शक है कि यह शिविर, जो इस्लामिक स्टेट के लिए आतंकवादियों की आपूर्ति का स्रोत बन गया है, संभवतः भारत से और भी भर्ती कर रहा है। शिविर के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण करना असंभव है और आईएसआईएस अपनी वफादार महिला सैनिकों की मदद से एक अच्छे जीवन का झांसा या धमकियां देकर नए लड़ाकों की भर्ती कर रहा है।शाहनवाज ने उससे संपर्क किया और अल-हवल कैंप में पैसे भेजने के तरीकों के बारे में पूछा, जिसके बाद उसे केरल में एक शिक्षक का संपर्क दिया गया।’

पुलिस का कहना है कि शाहनवाज ने गूगल पे का इस्तेमाल करके शिक्षक को पैसे भेजे और दो हफ्ते बाद मालदीवी महिला ने बताया कि पैसे मिल गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक महीने बाद उसने केरल के कॉन्टैक्ट के जरिए उसी महिला को फिर 40 हजार रुपये भेजे। शाहनवाज ने पैसे भेजने के लिए अपनी पत्नी बसंती पटेल के खाते का इस्तेमाल किया। पुलिस दस्तावेज में लिखा है, ‘ट्रांसफर के बाद शाहनवाज का टेलीग्राम के जरिए ही आईएस से जुड़े लोगों कासिम खुरासानी कश्मीरी, हुजैफा और काशिफ अफगानी से राब्ता करवाया गया। कुछ समय बाद हुजैफा और कासिम खुरासानी की आईडी बैन हो गई, लेकिन वह काशिफ के संपर्क में रहा और भारत में आईएस के विस्तार पर चर्चा करता रहा।’ शाहनवाज के अल-हवल कैंप से संपर्क ने सुरक्षा एजेंसियों को हिलाकर रख दिया है। उन्हें शक है कि यह शिविर, जो इस्लामिक स्टेट के लिए आतंकवादियों की आपूर्ति का स्रोत बन गया है, संभवतः भारत से और भी भर्ती कर रहा है। शिविर के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण करना असंभव है और आईएसआईएस अपनी वफादार महिला सैनिकों की मदद से एक अच्छे जीवन का झांसा या धमकियां देकर नए लड़ाकों की भर्ती कर रहा है।

इराक से आई खबरों के मुताबिक, अमेरिकी सरकार इस बात से परेशान है कि किस तेजी से यह शिविर इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के रिश्तेदारों को शामिल करने और आतंकवादी समूह के प्रति वफादार व्यक्तियों को तैयार करने का अड्डा बन गया है। विशेष सेल के निगरानी आधारित ऑपरेशन और उत्तर भारत में 200 से अधिक जगहों पर छापेमारी के सिलसिले में शाहनवाज की गिरफ्तारी सितंबर में हुई थी।बातचीत शिविर के लिए दान के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसके बाद महिला ने बताया कि वह 2015 में सीरिया भाग गई थी। पुलिस की जांच रिपोर्ट में लिखा है, ‘उसने शाहनवाज को अपने भाई का व्हॉट्सएप कॉन्टैक्ट मालदीव मोबाइल नंबर दिया। शाहनवाज ने उससे संपर्क किया और अल-हवल कैंप में पैसे भेजने के तरीकों के बारे में पूछा, आईएसआईएस अपनी वफादार महिला सैनिकों की मदद से एक अच्छे जीवन का झांसा या धमकियां देकर नए लड़ाकों की भर्ती कर रहा है।जिसके बाद उसे केरल में एक शिक्षक का संपर्क दिया गया।’ उसे दो साथियों, अरशद वारसी और मोहम्मद रिजवान अशरफ के साथ पकड़ा गया था। ये दोनों भी इंजीनियर हैं। ये तीनों पूरे देश में बम विस्फोट करने के अंतिम चरण में थे और दिल्ली, मुंबई, गुजरात, अयोध्या समेत कई स्थानों की रैकी कर चुके थे।

क्या केरल और आंध्र प्रदेश में खुल पाएगा बीजेपी का खाता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी का खाता केरल और आंध्र प्रदेश में भी खुल पाएगा या नहीं! कर्नाटक और तेलंगाना में पिछले वर्ष के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की बड़ी जीत और भाजपा की हिंदी हार्टलैंड के राज्यों में एकतरफा जीत से लोकसभा चुनावों से पहले तथाकथित ‘उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन’ की चर्चा हो रही है। क्या यह धारणा वास्तविक है या यह सिर्फ हताश लोगों का गढ़ा हुआ फलसफा है? अगर भाजपा का विरोध नहीं भी मानें तो दक्षिणी राज्यों के विधानसभा चुनावों में विविध रुझान ‘विभाजन’ से कहीं अधिक चुनावी असमानता की झांकी पेश करता है। ऐसे समय में जब भाजपा और उसकी हिंदुत्व की राजनीति ने अन्य जगहों पर नई सीमाएं पार की हैं तब दक्षिण की सियासी सोच काफी मायने रखती है। अब सवाल यह है कि क्या भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में दक्षिण के पॉलिटिकल पासवर्ड को डिकोड कर सकती है या क्या विंध्याचल के परे की भूमि भगवा अभियानों के रथ को रोकती रहेंगी? दक्षिण में 130 लोकसभा सीटें – तमिलनाडु 39, कर्नाटक 28, आंध्र प्रदेश 25, तेलंगाना 17, केरल 20 और पुडुचेरी 1 आने वाले चुनावों में राजनीतिक हस्तियों को लुभाएंगी और उन्हें भड़काएंगी भी। पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने दक्षिण से 28 लोकसभा सीटें जीती थीं- केरल 15, तमिलनाडु 8, तेलंगाना 3, कर्नाटक 1 और पुडुचेरी 1 – जबकि भाजपा ने 29 सीटें जीती थीं – कर्नाटक 25 और तेलंगाना 4।दक्षिण का इतिहास कांग्रेस को अंगीकार करने का रहा है। यह परंपरा मोटे तौर पर कांग्रेस के बुरे दौर में भी कायम रहा, जब उत्तर और अन्य हिस्सों ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरकारों का विरोध किया। यहां तक कि जब 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस अपनी सबसे निचले स्तर पर आ गई, तब भी दक्षिण ने उसकी लाज बचाई। 2004 में एनडीए से दिल्ली की सत्ता छीनने और 2009 में इसे बरकार रखने के कांग्रेसी अभियानों को भी दक्षिण से भरपूर समर्थन मिला था। लेकिन कांग्रेस अब दक्षिण को लेकर निश्चिंत नहीं रह सकती क्योंकि अब उसे कई नए और पेचीदा क्षेत्रीय दलों और भाजपा की उभरती चुनौतियों से पार पाना है। हालांकि, कर्नाटक और तेलंगाना की जीत ने पार्टी को बहुत जरूरी सुकून और उम्मीद दी है।

भाजपा को दक्षिण भारत के अधिकांश क्षेत्रों की सियासी फिजां में अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक हिंदुत्व का घोल छिड़क पाना मुश्किल रहा है। बड़ी बात है कि दक्षिण में आरएसएस का विस्तृत नेटवर्क होने के बावजूद यह स्थिति है। लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जमीनी स्तर के काम, वाजपेयी सरकारों के आकर्षण और मोदी लहर के दो चुनावी दौरे के बावजूद अधिकांश दक्षिण ने भाजपा का विरोध किया है, जिससे पता चलता है कि पार्टी के लिए दक्षिण के किले की फतह कितना कठिन टास्क है। लेकिन हाल के वर्षों में देश के बाकी हिस्सों में भगवा लहर के बीच भाजपा ने कर्नाटक को दक्षिण का अपना ठिकाना बनाने में सफलता हासिल कर ली है और तेलंगाना को अपने नए बढ़ते क्षेत्र के रूप में उभारा है। प्रधानमंत्री मोदी 2024 के लोकसभा चुनावों में दक्षिण की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे या नहीं, यह दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में दबी-छिपी चर्चा का विषय है।

पिछले कई दशकों में दक्षिण में कई क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ है, जिससे चुनावी चर्चा और जटिलता बढ़ गई है। तमिलनाडु तो 57 साल पहले कांग्रेस के शासन को समाप्त करने के बाद से ही द्रविड़ पार्टियों के प्रभाव में है। आंध्र प्रदेश के विभाजन ने भी राज्य कांग्रेस के पतन की गति तेज कर दी और तेलंगाना में बीआरएस जबकि आंध्र प्रदेश में वाईएसआरसीपी ने राजनीतिक जमीन हथिया ली। केरल में कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व वाली एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ ने राजनीति को द्विध्रुवी बनाए रखा है, जहां भाजपा अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक में जनता पार्टी की धारा पारंपरिक रूप से कांग्रेस को चुनौती देती थी। वहां जनता दल की पार्टियों के लगातार टूटने और जेडीएस के घटते प्रभाव से राज्य में अब कांग्रेस बनाम भाजपा का ही चुनावी खेल प्रभावी हो गया है।

कर्नाटक में भाजपा की सीटें 2019 के लोकसभा चुनावों में 28 में से 25 तक पहुंच गईं तब कांग्रेस अपने सबसे निचले स्तर 1 सीट पर फिसल गई थी। अब सभी की निगाहें कांग्रेस पर हैं कि कैसे पार्टी हालिया विधानसभा चुनाव जीत 135 सीटें और 42.88% वोट का इस्तेमाल लोकसभा चुनावों में अपनी सीटें बढ़ाने के लिए कर सकती है। दूसरी तरफ नजर इस बात पर भी है कि भाजपा का विधानसभा प्रदर्शन 66 सीटें और 36% वोट लोकसभा के लिहाज से क्या मायने रखते हैं। कर्नाटक की चुनावी राजनीति अब इसलिए भी ज्यादा दिलचस्प हो गई है क्योंकि विधानसभा चुनाव में हार 19 सीटें और 13.29% वोट के बाद जेडीएस ने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया है। इस गठबंधन के बाद कर्नाटक में पारंपरिक त्रिकोणीय प्रतियोगिता अब सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच द्विध्रुवीय हो गई।

ऐसा माना जाता है कि चार कारक वोटिंग रिजल्ट को प्रभावित कर सकते हैं। पहला, क्या कांग्रेस विधानसभा चुनावों की अपनी सद्भावना बनाए रखेगी? दूसरा, क्या यदियुरप्पा खेमे को कर्नाटक प्रदेश का नेतृत्व वापस देकर भाजपा आलकमान की तरफ से किया गया सुधार का प्रयास पार्टी को एकजुट करेगा या आगे विभाजन ही होगा? तीसरा, क्या भाजपा-जेडीएस गठबंधन प्रभावशाली लिंगायत-वोक्कालिगा वर्गों को एकजुट करेगा या क्या उनके अंतर्निहित हितों का टकराव इसकी पहुंच को सीमित करेगा? और चौथा, क्या ‘मोदी फैक्टर’ भाजपा को विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद फिर से खड़ा कर सकता है?

कांग्रेस तेलंगाना में रणनीतिक लाभ और आत्मविश्वास के साथ लोकसभा चुनावों में प्रवेश कर रही है। पार्टी विधानसभा जीत (119 में से 64 सीटें और 39.4% वोट) से आगे बढ़ने की उम्मीद में है। दिलचस्प बात यह है कि क्या बीआरएस अपनी हार से उबर सकेगी और सत्ता के बिना अस्तित्व बचा सकेगा? सवाल है कि बीआरएस की जमीन कहीं कांग्रेस और भाजपा तो नहीं हड़प लेगी, जैसा कि कर्नाटक में जेडीएस के साथ हो रहा है। हालांकि भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों में 17 में से चार सीटें जीतकर तेलंगाना में अपने लिए बड़ी संभावना पैदा की जो हालिया विधानसभा चुनावों में दूर तीसरे स्थान पर रहकर, लेकिन अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 8 सीटें और 13.9% वोट से मजबूत हुई है।

आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव दो क्षेत्रीय दलों वाईएसआरसीपी और टीडीपी के बीच ही रहने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि, कांग्रेस को पड़ोसी तेलंगाना और कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन और वाईएस शर्मिला के शामिल होने से कुछ गति मिलने की उम्मीद है। लेकिन, आंध्र प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य अभी तक दो क्षेत्रीय दलों के लिए अधिक अनुकूल है। हालांकि, इस बात को लेकर कुछ रुचि है कि क्या राज्य कांग्रेस नए दुश्मन वाईएसआरसीपी के खिलाफ पुराने प्रतिद्वंद्वी टीडीपी के साथ गठबंधन करने की कोशिश करेगी या वह आंध्र की चुनावी लड़ाई अकेले लड़ेगी। भाजपा तो कभी टीडीपी तो कभी वाईएसआरसीपी के साथ मुकाबला होता रहा है। अब परिस्थित यह है कि उसे लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन के लिए इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों में किसी एक का चुनाव कर सकती है। अगर चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हुआ तो चुनाव बाद भी इसकी गुंजाइश रह सकती है।सबसे दक्षिणी सिरा केरल, कांग्रेस को सबसे अच्छी उम्मीद देता है। पिछली बार 20 में से 15 लोकसभा सीटें जीतने के बाद इसे उम्मीद है कि 2024 में वो वामपंथियों के आगे अपनी कमजोरी को सबसे निचले स्तर पर ला पाएगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि 44% से अधिक मुस्लिम-ईसाई वर्गों से पुरजोर समर्थन मिलेगा जो पार्टी के परंपरागत समर्थक हैं। हालांकि, मुस्लिम-इसाई मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ को बड़ा झटका देने के लिए वामदल के एलडीएफ का समर्थन किया था।

केरल प्रदेश कांग्रेस इसी वजह से अपने आलाकमान से अयोध्या राम मंदिर उद्घाटन समारोह में शामिल नहीं होने का आग्रह कर रही है। यूडीएफ को उम्मीद है कि पिनाराई विजयन सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुए विवाद उसे फायदा पहुंचाएंगे। हालांकि, एलडीएफ मुसलमान मतदाताओं को अपने साथ रखने की भरपूर कोशिश कर रहा है। इस लोकसभा चुनाव में यह भी स्पष्ट होगा कि क्या भाजपा के हिंदू-ईसाई वर्गों को आकर्षित करने के प्रयास उसे केरल में कुछ लोकसभा सीटें दिला पाएंगे।

उत्तरी केरल का वायनाड लोकसभा क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर विशेष रुचि रखता है क्योंकि इसने राहुल गांधी को तब आश्रय दिया था जब उनकी अमेठी सीट भाजपा ने जीत ली थी। क्या गांधी फिर से इस सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ेंगे या वो दक्षिण की किसी अन्य सीट से अपनी जमानत सुनिश्चित करेंगे। क्या राहुल गांधी यूपी की अमेठी सीट पर वापस आएंगे ताकि वो विपक्ष और भाजपा दोनों को दिखा सकें कि उन्हें अपने ही ‘डरो मत’ के नारे पर कितना विश्वास है? क्या राहुल गांधी भाजपा के साथ लड़ाई में दूसरों का नेतृत्व करने की हिम्मत दिखाएंगे?

क्या बीजेपी के नजदीक जा सकती है मायावती?

मायावती अब बीजेपी के नजदीक भी जा सकती है! लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर एक ओर राजनीतिक पार्टियां अपनी तैयारियों को धार देने में जुट गई है। साथ ही दूसरी ओर अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए किसी गठबंधन में शामिल होने का निर्णय ले रहे हैं। इसी क्रम में सबकी निगाहें बसपा सुप्रीमो मायावती पर टिकी हैं। हालांकि मायावती पहले ही आगामी चुनाव में एकला चलो का रास्ता अपना चुकी है। लेकिन NDA और I.N.D.I.A एलाइंस के सहयोगी दल के नेता मायावती को अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। उधर, मायावती ने समाजवादी पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए I.N.D.I.A गठबंधन के साथ ना जाने की मंशा बना ली है। इसी बीच अखिलेश यादव से नाराज मायावती ने बीजेपी सरकार से एक मांग कर दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि योगी सरकार ने अगर अपनी दरियादिली बहनजी पर दिखाई तो यूपी में बीजेपी गठबंधन को क्लीनस्वीप करने से कोई नहीं रोक पाएगा। अब गेंद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के पाले में है। दरअसल इस वक्त देश में दो गठबंधन तैयार हैं। एक NDA जिसमें बीजेपी के साथ सुभासपा, अपना दल एस, निषाद पार्टी समेत अन्य पार्टी शामिल है। वहीं दूसरे I.N.D.I.A एलायंस में कांग्रेस, सपा, RLD, अपना दल कमेरावादी समेत अन्य दल साथ है। इस सबके बीच कुछ पार्टियां ऐसी भी है जो अकेले दम पर ताल ठोक रही हैं। जैसे बहुजन समाज पार्टी। इसी के चलते जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, बसपा केंद्र बिंदु में आ गई है।

बसपा को साथ में लाने के लिए कांग्रेस नेता अजय कुमार लल्लू ने मायावती से हाथ जोड़कर अपील भी की है। कांग्रेस की ओर से की जा रही जोर आजमाइश के बाद से चर्चा है कि बसपा इंडिया गठबंधन के साथ आ सकती है। वहीं मायावती के इंडिया गठबंधन के साथ आने के सवाल पर सपा मुखिया अखिलेश यादव ने उल्टा मायावती को आड़े हाथों लेते हुए उन्हीं की विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिया है। वहीं मायावती ने अखिलेश यादव को अपने गिरेबां में झांकने तक की नसीहत दे डाली है। मायावती ने सपा को दलित विरोधी बताते हुए 2 जून 1995 की गेस्ट हाउस कांड की घटना को याद किया और कहा कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा दलित विरोधी फैसले किए हैं। मायावती ने अखिलेश पर निशाना साधते हुए कहा कि बसपा के यूपी कार्यालय के पास इसलिए ऊंचा पुल बनाया ताकि अराजक तत्त्वों के जरिए बसपा के दफ्तर और कर्मचारियों को हानि पहुंचा सके।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी सरकार से कोई सुरक्षित जगह प्रदेश कार्यालय मुहैया कराने की मांग की है। मायावती ने कहा कि बसपा के पार्टी दफ्तर पर कभी भी अनहोनी हो सकती है। वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती के बयान पर यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अब मायावती के समर्थन में आ गए हैं। उन्होंने कहा कि हमने तो पहले ही कहा था कि सपा गुंडों और माफियाओं की पार्टी है, इस पार्टी से बचकर रहें। इसके साथ ही केशव ने कहा कि मायावती यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री रहीं हैं और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। प्रदेश में बीजेपी की सरकार है, बहनजी समेत प्रदेश के हर नागरिक की सुरक्षा के प्रति सरकार संकल्पित हैं।

वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती की योगी सरकार से की गई मांग के बाद यूपी की राजनीति गरमा गई है। राजनीतिक गलियारों में बीएसपी के बीजेपी के साथ आने की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। इसको लेकर वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह का कहना है कि अभी यह कहना मुश्किल होगा कि अगर मायावती की मांग मान ली जाती है तो वह बीजेपी के साथ खड़ी दिखाई देंगी। लेकिन इतना जरूर है कि अगर उनकी ये मांग मानी जाती है और अगर नहीं भी मानी जाती है तो भी बीजेपी के प्रति उनका सॉफ्ट कॉर्नर है। वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि बीजेपी बिना बीएसपी के समर्थन के ही 70 सीटें मौजूदा स्थिति में जीत सकती है। अगर बसपा साथ आ जाए तो बीजेपी को 75 प्लस सीट जीतने से कोई नहीं रोक सकता है।

राजनीति में संभावनाओं को लेकर वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह ने कहा, गेस्ट हाउस कांड के बाद यह माना जा रहा था कि सपा और बसपा में कभी एक नहीं हो पाएगी। ऐसा लंबे समय तक देखने को भी मिला। पिछले 2019 लोकसभा चुनाव में बसपा और सपा एक साथ आ गए। साथ में प्रचार करके एक साथ चुनाव भी लड़ा। लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद मायावती ने कहा कि सपा के साथ जाना हमारे लिए घातक साबित हुआ है, जिसका हमें नुकसान भी उठाना पड़ा है। यह बातें कहकर मायावती ने सपा से खुद को अलग कर लिया। अब मायावती के सपा को लेकर दिए गए मौजूदा बयान पर वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि मायावती ने कल जो बयान दिया है उसे बिल्कुल साफ हो गया है कि माया को सपा से ज्यादा बीजेपी पसंद है।

मायावती भाजपा गठबंधन के साथ जाएं या ना जाएं, यहां तक की अगर मायावती अकेले दम पर भी चुनाव लड़ती हैं तो उस स्थिति में भी बीजेपी को ही फायदा मिलेगा। क्योंकि प्रदेश में मतों का जितना बंटवारा होगा, उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा। सुरेश बहादुर ने कहा कि बीजेपी की पूरी कोशिश रहेगी कि सपा और बसपा में कभी एकता ना होने पाए। उन्होंने कहा कि यूपी में चुनाव हमेशा जाति-धर्म के आधार पर हुआ है। इस बार भी इसी आधार पर चुनाव हो सकता है। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से जब जाति समीकरण बिगड़ेंगे तो धार्मिक समीकरण अच्छे बनेंगे, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।

वर्तमान में माँ क्यों बनती जा रही है कातिल?

वर्तमान में माँ कातिल बनती जा रही है! मां की ममता बेजोड़ होती है। वात्सल्य अनमोल होता है। बच्चे पर आंच आ जाए तो मां रौद्र रूप धर लेती है। बिना अंजाम का परवाह किए मौत तक से लड़ भिड़ जाती है। लेकिन जब ममता और वात्सल्य पर ईगो भारी पड़ जाए तो ये चेतने का वक्त है। जब सिर्फ अहं की तुष्टि के लिए कोई मां अपने ही कलेजे के टुकड़े को मार डाले तो ये चेतने का वक्त है। शास्त्रों में कहा गया है ‘कुपुत्रो जायेत क्विचिदपि कुमाता न भवति’ यानी पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है लेकिन कभी मां कुमाता नहीं हो सकती। लेकिन 39 साल की सूचना सेठ ने तो अपने 4 साल के अबोध बेटे को ही बेरहमी से मार डाला। वजह सिर्फ यह कि वह नहीं चाहती थी कि उसका पति उसके बच्चे से मिले। पति-पत्नी के बीच तलाक का केस चल रहा था और दोनों के बीच बेटे की कस्टडी के लिए कानूनी लड़ाई चल रही थी। रोंगटे खड़े कर देने वाले इस कांड में हर मां, हर बाप, हर कामकाजी शख्स के लिए सबक छिपे हैं।सूचना सेठ बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप ‘माइंडफुल एआई लैब’ की सीईओ है। 2010 में उसकी वेंकट रमन से शादी हुई। 2019 में दोनों को एक बेटा हुआ। लेकिन इसके बाद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आने लगी। 2020 में दोनों अलग हो गए और उनके तलाक की प्रक्रिया आखिरी चरण में थी। तलाक के मामलों में सबसे पेचीदा होता है बच्चों के कस्टडी का मामला। कोर्ट ने वेंकट रमन को हर रविवार को अपने बेटे से मिलने की इजाजत दे दी थी। सूचना सेठ नहीं चाहती थी कि वह हर रविवार अपने बेटे को पति के पास ले जाए। उसने इसे अपने ईगो से जोड़ लिया और उसे तुष्ट करने के चक्कर में वह मां से कसाई बन गई।

सूचना सेठ ने पुलिस को बताया कि वह गोवा सिर्फ इसलिए आई ताकि उसे रविवार को अपने बेटे को उसके पिता के पास न ले जाना पड़े। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बच्चे की मौत की वजह दम घुटना है। पुलिस आशंका जता रही है कि सेठ ने तकिये से अपने 4 साल के बच्चे का दम घोंट दी। वह यह कह रही है कि उसकी मंशा बेटे को जान से मारने की नहीं थी लेकिन अचानक वह मर गया। लेकिन अगर ऐसा ही था तब वह किसी शातिर क्रिमिनल की तरह बच्चे के शव को बैग में डालकर कार से बड़े ही बेफिक्र अंदाज में जाते हुए क्यों पकड़ी गई? पूछताछ में उसने ये भी बताया कि बेटे की हत्या के बाद वह अपनी भी जान देना चाहती थी। सोमवार को वह गोवा के कैंडोलिम में अपने होटल से बाहर निकली। बेंगलुरु जाने के लिए होटल स्टाफ से वह टैक्सी लाने को कही। उसे बताया गया कि टैक्सी से सस्ती तो फ्लाइट पड़ेगी, लेकिन वह टैक्सी पर अड़ी रही। टैक्सी आई और वह बेंगलुरु के लिए निकल गई। तबतक होटल स्टाफ या वहां मौजूद किसी भी शख्स को कुछ भी असामान्य नहीं लगा। लेकिन जब एक होटल स्टाफ कमरे में सफाई करने गया तो खून के धब्बे देखकर चौंक गया। आनन-फानन में होटल स्टाफ ने सूचना सेठ के चेक आउट के समय का सीसीटीवी फुटेज खंगाला। तब सबका ध्यान गया कि महिला तो अकेले बाहर निकली, उसका बेटा साथ नहीं दिख रहा था। तत्काल पुलिस को सूचना दी गई। गोवा पुलिस ने टैक्सी ड्राइवर से बात की और आखिरकार कर्नाटक के चित्रदुर्ग में सूचना सेठ को गिरफ्तार कर लिया गया।

ममता की कातिल मां की ये रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी में हर मां-बाप और हर प्रफेशनल के लिए सबक छिपे हुए हैं। भारत में हाल के वर्षों में तलाक के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह तो ये है कि अब महिलाएं आर्थिक तौर पर भी स्वतंत्र होने लगी हैं। आर्थिक और सामाजिक तौर पर पति पर निर्भर महिला पर अगर किसी तरह के अत्याचार होते थे तब भी उसे सह लेती थी और तलाक से बचती थी। लेकिन महिलाओं के स्वावलंबी बनने से भी तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। तलाक की अन्य वजहों में बेवफाई, भरोसे की कमी, शक, पार्टनर के साथ अंतरंग पलों के लिए समय का न निकल पाना आदि शामिल हैं। चिंता तब होती है जब पति और पत्नी छोटी-मोटी बातों पर उलझ जाते हैं। सूचना सेठ केस ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ने से व्यक्ति अपने परिवार को उतना समय नहीं दे पाता जितना देना चाहिए। पति-पत्नी अगर दोनों कामकाजी हैं तो चुनौती और भी ज्यादा है। करियर बनाने और करियर में शिखर छूने की भूख से परिवार पीछे छूट रहा। रिश्ते पीछे छूट रहे। सूचना सेठ के पास क्या नहीं था? उसके लिंक्डइन प्रोफाइल पर नजर डालिए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ी-लिखी। एआई स्टार्टअप की सीईओ। 2021 में एआई एथिक्स लिस्ट में शामिल 100 प्रतिभाशाली महिलाओं में से एक। लेकिन करियर बनाने की अंधी दौड़ में परिवार ही पीछे छूट गया। पति-पत्नी के पास सबकुछ था लेकिन अगर कुछ नहीं था तो वह था एक दूसरे के लिए वक्त। धीरे-धीरे उनमें दूरियां बढ़ने लगीं जो अलगाव का सबब बन गईं। करियर, दौलत, शोहरत की भूख में परिवार पीछे छूट रहा है। पहले तो जॉइंट फैमिली हुआ करती थी। फैमिली शॉक ऑब्जर्वर का काम करती है। बड़ा से बड़ा तनाव परिवार के भावनात्मक सपोर्ट से छूमंतर हो जाया करता था। परिवार में अगर कोई मानसिक तौर पर परेशान भी है तो वह टूटता नहीं था क्योंकि उसे परिवार से हर तरह का समर्थन हासिल होता था। अब न्यूक्लियर फैमिली का जमाना है। लेकिन करियर बनाने, चमकाने की अंधी दौड़ में अब उस न्यूक्लियर फैमिली तक के लिए वक्त नहीं मिल रहा। ये चिंता की बात है।