Friday, March 6, 2026
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जब राम मंदिर के लिए पहली बार हुआ सांप्रदायिक हंगामा!

आज हम आपको उस सांप्रदायिक हंगामा के बारे में बताने जा रहे हैं जो पहली बार राम मंदिर के लिए हुआ था! अयोध्या, जिसने 500 सालों में कई राजाओं और उसके शासन को देखा। मस्जिद का निर्माण देखा। मंदिर को बिखड़ते देखा। वर्ष 1528 में जब मुग़ल सम्राट बाबर के सेनापति मीरबाकी तासकंदी ने मस्जिद बनवाई तो हिंदुओं की भावना आहत हुई। विभिन्न वर्गों में बंटा कमजोर हिंदू वर्ग अपनी आवाज बुलंद कर पाने में सक्षम नहीं था। बड़ी संख्या में लोग अपने आराध्य के नाम पर कट गए, लेकिन प्रभु रामलला के मंदिर को बचा पाने में कामयाब नहीं हो पाए। गोस्वामी तुलसीदास ने भी अपनी पुस्तक तुलसी दोहा शतक में इस घटना का जिक्र किया है। बाद के दिनों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के मामले में तूल पकड़ना शुरू किया। मुगल शासन समाप्त हो चुका था। अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तान में पैर पसार चुकी थी। इसी दौरान हिंदुओं की भावना भी जोर पकड़ना शुरू किया। हिंदू वर्ग बार- बार मस्जिद वाले स्थान पर भगवान श्रीराम की जन्मभूमि होने का दावा कर रहा था। कई बार इस मामले को स्थानीय शासन और हिंदू वर्ग आमने-सामने आए। हिंदू अपने आराध्य के जन्मस्थल पर पूजा की अनुमति मांग रहे थे। मैं मूक बैठी इन तमाम घटनाओं की साक्षी बनती रही। प्रभु रामलला की मंदिर को नष्ट किए तीन शताब्दियों से अधिक का दौर गुजर चुका था। यह काल 1850 के आसपास का था। अयोध्या अवध रियासत का हिस्सा थी। नवाब वाजिद अली शाह यहां पर शासन कर रहे थे। इसी दौरान निर्मोही पंथ के लोगों ने मंदिर तोड़कर बाबर के मस्जिद बनाए जाने के मामले को उठाना शुरू किया। निर्मोही पंथ वापस अपने मंदिर को पाने की लड़ाई लड़ रहा था। मुगल बादशाह के खिलाफ उन्होंने गंभीर आरोप लगाकर हिंदू समाज को एकजुट करना शुरू किया। हिंदू समाज के निर्मोही पंथ के साधुओं के दावों पर मुस्लिम समाज की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाने लगी। हिंदू वर्ग के मंदिर के दावों पर मुस्लिम समाज ने मस्जिद के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न होने देने का दावा करता रहा। देखते ही देखते राम जन्मभूमि का मुद्दा मंदिर- मस्जिद का मुद्दा बन गया। दो संप्रदायों के बीच विवाद की जड़ में यह समा गया।

मंदिर- मस्जिद के मुद्दे को लेकर दो संप्रदायों की भवना टकराने लगी। नवाब वाजिद अली शाह तक मामला पहुंचा, लेकिन उनके स्तर पर विवाद का कोई समाधान नहीं निकाला जा सका। मंदिर विध्वंस का 325वां वर्ष आते- आते हिंदू वर्ग काफी आक्रोशित हो चुका था। वह हर हाल में अपने मंदिर को वापस पाना चाहता था। मंदिर- मस्जिद के मसले दोनों समुदाय दो पाटों में बंट चुके था। निर्मोही पंथ हर हाल में मस्जिद तोड़कर श्रीराम जन्मभूमि पर हर हाल में मंदिर के निर्माण करा देना चाहता था। वहीं, मुस्लिम समुदाय वहां पर राम जन्मभूमि नहीं होने का दावा करता रहा। ऐसे में प्रभु राम की नगरी अयोध्या में पहली बार दो समुदायों के बीच जंग जैसी स्थिति बनी। मेरी धरती पर पहली बार राम के नाम पर संग्राम छिड़ा।

दोनों समुदायों के लोग आपस में भिड़ गए। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। नवाब वाजिद अली शाह की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1855 में 12 हजार हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद को घेर लिया था। मुस्लिम समाज के लोग बाबरी को बचाने गए। खूनी संघर्ष हुआ। इसमें 70 मुसलमान मारे गए थे। अंग्रेजी शासन ने इस सांप्रदायिक दंगे की आड़ में अवध पर अपना प्रभाव जमा लिया। सांप्रदायिक दंगे को दमन के जरिए शांत कराया गया। अयोध्या राम जन्मभूमि को लेकर 1853 के पहले दंगे की शुरुआत के बाद पांच सालों तक अयोध्या सुलगती रही। साधुओं का एक बड़ा वर्ग इस आंदोलन का नेतृत्व करता रहा। लेकिन, नवाब की फौज और अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता के आगे उनकी नहीं चली। लेकिन, निर्मोही पंथ किसी भी स्थिति में राम जन्मभूमि पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं था। उनका आंदोलन लगातार जारी रहा। आखिरकार, अंग्रेजी सरकार ने मंदिर- मस्जिद विवाद पर वर्ष 1859 में बड़ा निर्णय लिया। मेरे प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर पहली बार तार के बार लगवा दिए गए। जन्मभूमि को दो हिस्सों में बांट दिया गया।

मस्जिद के भीतर का हिस्सा मुस्लिमों को दिया गया। वहीं, बाहरी हिस्से में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया गया। हालांकि, हिंदू साधु लगातार बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि होने का दावा करते रहे। मैं इसकी गवाह हूं। लेकिन, मेरी गवाही उस मंच पर नहीं हो सकती थी। मैं चुपचाप बस देखती रही। 1853 से 1859 के बीच 1857 का दौर भी आया। पहली बार अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका गया था। गोलियों में गौवंश और सुअर की चर्बी के इस्तेमाल के मसले पर सिपाहियों ने बंदूकों के इस्तेमाल से इनकार किया। इस पर विवाद गहरा गया। हालांकि, अंग्रेजी सरकार ने पहले सिपाही विद्रोह को कुचला। इसके बाद सांप्रदायिक विवाद की जड़ बनते मंदिर- मस्जिद मुद्दे को बंटवारे के जरिए सुलझाने की कोशिश की। लेकिन, हिंदुओं को यह कहां मंजूर था। वे तो अपने आराध्य की जगह को वापस पाने को किसी भी स्थिति में जाने को तैयार दिख रहे थे। देश में आजादी की लड़ाई शुरू हो गई थी।

मुगलकालीन गुलामी के प्रतीक बाबरी मस्जिद से भी आजादी के नारे बुलंद होने लगे। 20वीं सदी की शुरुआत हो चुकी थी। हिंदुओं को आधार बनाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग का गठन हो चुका था। अंग्रेज बांटो और राज करो की नीति के तहत दोनों समुदायों की खाई को गहरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। विवादित मुद्दों को हवा देकर आजादी की लड़ाई की राह को भी भटकाने की कोशिश हो रही थी। लेकिन, आस्था के मसले पर कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं था। 1934 आते- आते एक बार फिर हिंदुओं का आक्रोश चरम पर था।

1934 में हिंदुओं की भीड़ बाबरी मस्जिद तक पहुंची। विवादित ढांचे को घेर लिया गया। इस बार अंग्रेजी हुकूमत का कोई जोर नहीं चला। हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबद तोड़ दिए। इसके बाद हिंदुओं को बल का प्रयोग करते हुए खदेड़ा गया। हालांकि, बाद में फैजाबाद डीएम ने बाबरी के तीनों गुंबदों का पुननिर्माण कराया। इस घटना ने हिंदुओं को एक प्रकार से जोड़ा। मंदिर- मस्जिद का आंदोलन घर- घर तक पहुंचा। हालांकि, इसके बाद आजादी की जंग ने धर्म के इस मुद्दे को कुछ वर्षों के लिए शांत कर दिया।

आखिर दहकते विमान से यात्रियों को कैसे निकाल पाया जापान?

आज हम आपको बताएंगे कि जापान ने दहकते विमान से यात्रियों को कैसे निकाला! भले ही जापानी गलती करें, लेकिन वक्त पर वो कुछ ऐसा सही कर देते हैं कि अक्सर विजेता बनकर ही उभरते हैं। पिछले हफ्ते हनैडा हवाई अड्डे पर जहाज दुर्घटनाग्रस्त को ही ले लीजिए। वहां कोस्ट गार्ड का एक हवाई जहाज गलत समय पर गलत जगह खड़ा था। इसी तरह 2011 में आए सुनामी के बाद फुकुशिमा न्युक्लीयर मेल्टडाउन भी इसलिए और भयानक हो गया क्योंकि गलत डिजाइन की वजह से इमरजेंसी डीजल जनरेटर और पावर पैनल निचली जगहों पर रखे थे। यानी गड़बड़ी होने की पूरी आशंका। लेकिन इन आपदाओं के दौरान जापानियों ने ऐसा व्यवहार किया जिसकी पूरी दुनिया ने दाद दी। जलते हुए विमान से 379 यात्रियों को 20 मिनट से भी कम समय में कैसे निकाला गया? जब जापान में भूकंप और बाढ़ आती है तो वहां कभी लूटपाट नहीं होती। जापानियों के ऐसे व्यहवार इंसानी प्रवृत्तियों को उलट हैं क्योंकि आमतौर पर आपदाओं में लोग हताश हो जाते हैं। उस दुर्भाग्यपूर्ण हवाई जहाज में यात्रियों ने शांत होकर अनुभवी चालक दल के निर्देशों का पालन किया और सुरक्षित बाहर निकल आए। जापानियों के इतने अनुशासित और व्यवस्थित होने के कई कारण हैं। एक मुख्य कारण है वह श्रद्धा जो हर काम के प्रति रखते हैं। इसका असर जापान की इमीग्रेशन पॉलिसी पर भी देखा जा सकता है। पश्चिमी देशों के विपरीत, जहां अनपढ़ मजदूरों को काम करने के लिए आने दिया जाता है, जापान ने अपने ही लोगों पर निर्भरता रखी है। यहां किसी भी काम को छोटा नहीं समझा जाता। इसलिए, आबादी के हिसाब से अमेरिका की तुलना में जापान में विदेशी कामगारों की संख्या 12 गुना कम है।

शायद 19वीं सदी के मध्य में हुए मीजी रेस्टोरेशन के दौरान विदेशियों पर जो शक किया गया था, उसके निशान आज भी जापान की इमीग्रेशन पॉलिसीज में दिखते हैं। यहां विदेशी मजदूरों को तो स्वीकार किया जाता है, लेकिन वरीयता कुशल कर्मचारियों को दी जाती है। आखिरकार, बाकी काम उनके अपने लोग कर सकते हैं। इसलिए, इस देश में उच्च प्रशिक्षित विदेशी कर्मचारियों की संख्या मुश्किल से 4 लाख है। जापान में भी अकुशल विदेशी कामगार हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में उन्हें केवल अस्थायी दर्जा दिया जाता है। वो एक छोटे अल्पसंख्यक हैं और मुख्य रूप से खेती में काम करते हैं जहां कुल संख्या लगभग 15.2 लाख है जो घट रही है। यह जापान की इमीग्रेशन पॉलिसी का कमजोर पहलू है क्योंकि ये प्रवासी हमेशा अनिश्चितता में रहते हैं। दूसरी तरफ, जापान के शिंकांसेन या बुलेट ट्रेनों की मशहूर सफाई टीम को देखें। विकसित देशों में ये कर्मचारी आमतौर पर गरीब देशों के प्रवासी होते। वो अपने हाव-भाव से ही पिछड़ेपन का आभास देते जिनके साथ आप चाय पीना भी नहीं चाहेंगे।लेकिन शिंकांसेन की ‘सेवन मिनट्स मिरेकल’ क्लीनिंग सर्विस के लिए यह सच नहीं है। पहला, वे सभी जापानी हैं। दूसरा, उन्हें अपने काम पर गर्व है। तीसरा, उनके काम में एक निश्चित डिग्री की स्किल और ट्रेनिंग चाहिए। आखिर में, वे खुद को निम्न वर्ग नहीं मानते। वे प्रवासी नहीं हैं, बल्कि जापानी कार्य नैतिकता और संस्कृति के गौरवशाली वाहक हैं।

अपनी वर्दी और कार्यकुशलता से लबरेज जिस सम्मान के साथ सफाई रेजिमेंट काम के लिए तैयार होती है, उससे दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है। वे अपने काम को डिब्बों की सफाई से कहीं ज्यादा बड़ा मानते हैं। यह उनके लिए ‘शिंकांसेन थिएटर का शो टाइम’ होता है। उन्हें ऊपर से बताया गया है कि उनके बिना यह प्रसिद्ध ट्रेन ‘एक इंच भी नहीं हिल सकती’। उनका सम्मान ‘एंजेल रिपोर्टिंग’ से और बढ़ जाता है जहां कर्मचारी एक-दूसरे के मूल्यांकन भेजते हैं, लेकिन उन्हें केवल प्रशंसा करने योग्य चीजों पर ही टिप्पणी करने के लिए कहा जाता है। इससे कर्मचारियों के बीच आपसी सहयोग और भावना बढ़ती है। उनके वरिष्ठ भी इस जानकारी का इस्तेमाल भविष्य की योजनाओं के लिए करते हैं। जापान में मेहनत को बहुत महत्व दिया जाता है और हर पेशे के लोगों को सम्मान मिलता है, चाहे उनका स्तर कोई भी हो। ब्लू कॉलर जॉब्स को सम्मानजनक मानने की वजह से जापानी रोजमर्रा की जिंदगी में ही निर्देशों और नियमों का पालन करने की आदत डाल लेते हैं। इसलिए, हादसे के समय वे वक्त बर्बाद नहीं करते और फौरन नियमों का पालन करते हैं। यही वजह है कि जापानी भूकंप से गिरी चीजों को स्वेच्छा से ठीक जगह रख देते हैं। दोहा में जापानी फुटबॉल फैन्स खेल के बाद अपने स्टैंड खुद साफ करते हैं। जापानी स्कूलों में बच्चे आपको नियमित रूप से कक्षाओं और शौचालयों को साफ करते हुए दिखाई देंगे। जापान में किसी वेटर को टिप देने की कोशिश करें, फिर वो आपको ऐसी हिकारत से देखेंगे कि तुरंत हेकड़ी ढीली पड़ जाएगी।

जापान में ईमानदारी से किया गया काम आदर्श माना जाता है, इसलिए यहां किसी को लूटने पर किसी और देश के मुकाबले ज्यादा नाराजगी होती है। यहां तक कि याकूजा के सदस्य, जो जापान के कुख्यात अपराध सिंडिकेट में हैं और वेश्यावृत्ति और ड्रग्स से पैसा कमाते हैं, चोरों को बहुत सख्ती से सजा देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब भी जापान में कोई आपदा आती है तो अंडरवर्ल्ड भी मदद के लिए आगे आता है।

यह सोचना लाजिमी है कि कन्फ्यूशियसवाद का इससे कुछ लेना-देना है क्योंकि यह मजबूत संस्थागत नियमों के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि और पूर्णता को बढ़ावा देता है। शायद इसका एक व्यापक प्रभाव है, लेकिन इसका कतई मतलब नहीं कि कन्फूशियस की प्रेरणाओं से ही जापानी इतने अनुशासित और नैतिक हैं। आखिरकार, चीन भी कन्फ्यूशियसवादी है। वहां तो तानाशाही को बढ़ावा मिला है तो फिर इसे जापान में मेहनतकश संस्कृति की प्रेरक शक्ति कैसे मानी जा सकती है? जापान एक अलग दुनिया है, लेकिन सौभाग्य से, हमें वहां पहुंचने के लिए अंतरिक्ष यान की जरूरत नहीं है।

उत्तर प्रदेश में सिपाही भर्ती पर क्यों हो रहा है हंगामा?

हाल ही में उत्तर प्रदेश में सिपाही भर्ती पर हंगामा हुआ है! उत्‍तर प्रदेश में पूरे पांच साल के इंतजार के बाद 60,244 सिपाहियों की भर्ती निकली है। इससे पहले 2018 में यूपी पुलिस में भर्ती हुई थी। इतने सालों से पुलिस भर्ती का इंतजार कर रहे युवाओं में खुशी की लहर है पर सोशल मीडिया पर विवाद भी शुरू हो गया है। अभ्‍यर्थी योगी सरकार से मांग कर रहे हैं कि आयु सीमा में छूट दी जाए। इस भर्ती के लिए 18 से 22 साल तक की आयु सीमा निर्धारित की गई है। पिछले पांच सालों से भर्ती की तैयारी कर रहे अनेक अभ्‍यर्थी इस उम्र सीमा को पार कर गए हैं। ऐसे में वह लगातार सोशल मीडिया पर अपना विरोध जता रहे हैं। इन अभ्‍यर्थियों को केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान, समाजवादी पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अखिलेश यादव और राष्‍ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी का भी साथ मिला है। इन नेताओं ने मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को पत्र लिखकर उम्र सीमा बढ़ाने की मांग की है। इस बीच, आयु सीमा में छूट का मामला हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। गौरतलब है कि 23 दिसंबर को उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने भर्ती का नोटिफिकेशन जारी कर दिया था। इसमें अनारक्षित के लिए 24,102 पद, ईडब्ल्यूएस के लिए 6,024 पद, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 16,264 पद, अनुसूचित जाति के लिए 12,650 पद, अनुसूचित जनजाति के लिए 1,204 पद आरक्षित हैं। नोटिफिकेशन में महिलाओं के लिए आरक्षण भी निर्धारित कर दिया गया है। संपूर्ण पदों में से 20 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। आवेदन प्रक्रिया 27 दिसंबर से शुरू हो जाएगी, जो 16 जनवरी 2024 तक जारी रहेगी। वहीं, शुल्क समायोजन एवं आवेदन में संशोधन की अंतिम तिथि 18 जनवरी है।

आयु सीमा की छूट का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। सर्वेश पांडेय और अन्‍य 28 अभ्‍यर्थियों ने आयु सीमा में छूट के लिए अर्जी दाखिल की है। याचिका पर शीतकालीन अवकाश के बाद सुनवाई होगी। याचिका में कहा गया है कि यूपी पुलिस में 2018 के बाद अब जाकर भर्ती आई है। जबकि यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में वर्ष 2017 में हलफनामा दिया था कि वह 2017 से 2020 तक हर साल 30 हजार पुलिस भर्ती अगस्‍त महीने में निकालेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस भर्ती में आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। अधिकतम आयु के तौर पर उम्मीदवार ने 22 वर्ष की आयु प्राप्त न की हो, यानी अभ्यर्थी का जन्म 2 जुलाई 1998 से पहले एवं 1 जुलाई, 2005 के बाद नहीं होना चाहिए। आरक्षित श्रेणी से आने वाले उम्मीदवारों को ऊपरी आयु में छूट प्रदान की जाएगी। बस इसी उम्र सीमा को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। अखिलेश यादव ने मांग की है कि अभ्‍यर्थियों को कम से कम 3 से 4 साल छूट मिलनी चाहिए। अखिलेश ने ट्वीट किया- ‘बेरोज़गार युवाओं और विपक्ष के दबाव से आख़िरकार यूपी में कई सालों के बाद पुलिस भर्ती निकली है। इस बीच कई युवा भर्ती का इंतज़ार करते-करते नौकरी पाने की उम्र पार कर गये। इसीलिए भाजपा सरकार इस भर्ती में अभ्यर्थियों को कम-से-कम 3-4 साल की छूट दे।’

इसी तरह जयंत चौधरी ने सीएम योगी को लिखे पत्र में कहा है- ‘मैं उम्मीद करता हूं कि आप इसका संज्ञान लेकर प्रदेश के युवाओं की मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करके मौजूदा भर्ती में आयु सीमा की छूट प्रदान करेंगे।’ आरएलडी मुखिया ने पत्र के जरिए बताया कि यूपी पुलिस भर्ती को लेकर जारी विज्ञापन में आयु सीमा में कोई छूट नहीं दी गई है। इसमें सामान्य वर्ग के लिए आयु सीमा 18 से 22 साल है। जयंत चौधरी ने पत्र में लिखा है कि यूपी में पिछली पुलिस भर्ती 16 नवंबर 2018 को हुई थी। इस तरह इन 5 सालों के दौरान पुलिस में कोई भर्ती न होने के चलते प्रदेश के लाखों युवा इस आयु सीमा से बाहर जा चुके हैं। इस तथ्य को देखते हुए इस अंतराल में भर्ती से वंचित प्रदेश के लाखों युवाओं की मौजूदा भर्ती में आयु सीमा में छूट की मांग एक दम औचित्यपूर्ण एवं न्यायसंगत है।

आपको बता दें कि सोशल मीडिया के अलावा अभ्‍यर्थियों ने केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान से भी उम्र सीमा में छूट दिलाने की गुहार लगाई है। एक दिन पहले सोमवार कोहरे के बीच दर्जनों गांव के सैंकड़ो युवा मुजफ्फनगर में केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ संजीव बालियान के आवास पर पहुंचे। इन लोगों ने आयु सीमा में छूट दिलाए जाने की मांग की। डॉ संजीव बालियान ने युवाओं को आश्‍वासन देते हुए योगी को चिट्ठी लिखी है। आवेदन पत्र के साथ ही उम्मीदवारों को 400 रुपये का आवेदन शुल्क जमा करना होगा। भर्ती के लिए सामान्य, ओबीसी और अनुसूचित जाति से आने वाले पुरुष उम्मीदवारों की न्यूनतम लम्बाई 168 सेमी और महिलाओं की न्यूनतम लंबाई 152 सेमी होनी चाहिए। जबकि, अनुसूचित जनजाति श्रेणी से आने वाले पुरुष उम्मीदवारों की न्यूनतम लंबाई 160 सेमी एवं महिला उम्मीदवारों की न्यूनतम लंबाई 147 सेमी होना अनिवार्य है। भर्ती में चयनित होने के लिए उम्मीदवारों को पहले लिखित परीक्षा में शामिल होना होगा। लिखित परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन एवं फिजिकल स्टैंडर्ड टेस्ट के लिए बुलाया जाएगा। आमंत्रित किया जाएगा। अभ्‍यर्थियों को 10वीं एवं 12वीं कक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।

उत्तर प्रदेश में किन-किन जिलों के होंगे नाम परिवर्तित?

अब उत्तर प्रदेश में कई जिलों के नाम परिवर्तित होने वाले हैं! उत्‍तर प्रदेश में एक बार फिर जिलों का नाम बदलने को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। अब गाजियाबाद का नाम गजनगर या फिर हरनंदी नगर करने की मांग हो रही है। गाजियाबाद के कई हिंदू संगठनों की मांग के बाद नगर निगम की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। बीजेपी के एक पार्षद ने बैठक में इसको लेकर प्रस्‍ताव पेश किया जिस पर अन्‍य पार्षदों में भी सहमति नजर आई। 2018 में योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया। इसके बाद फैजाबाद का नाम अयोध्‍या कर दिया गया। इसके बाद से यूपी के कई जिलों के नाम बदलने की मांग चल रही है। आइए जानते हैं किन जिलों का नाम बदलने की मांग चल रही है। हरनंदीपुरम या दूधेश्वरनाथ नगर किए जाने का प्रस्ताव रखा गया। संजय सिंह ने गजप्रस्थ नाम के पीछे महाभारतकालीन हस्तिनापुर राजधानी का जिक्र किया, जब यह वन्य क्षेत्र हुआ करता था और हाथी मुख्य जानवर था। इसके अलावा यहां बहने वाली हिंडन नदी के आधार पर हरनंदी नगर नाम और दूधेश्वर नाथ मंदिर की वजह से नाम रखे जाने का प्रस्ताव रखा गया।गौरतलब है कि यूपी में जिलों का नाम बदलने की शुरुआत बसपा शासनकाल में हुआ था। तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री मायावती ने अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराजनगर, हाथरस को महामायानगर, कानपुर देहात को रमाबाई नगर और कासगंज को कांशीराम नगर बना दिया था। इसके बाद सपा सरकार आई तो मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती की तरफ से बदले गए जिलों के नाम वापस कर दिए थे।गाजियाबाद का नाम बदलकर गजप्रस्थ, हरनंदीपुरम या दूधेश्वरनाथ नगर किए जाने का प्रस्ताव रखा गया। संजय सिंह ने गजप्रस्थ नाम के पीछे महाभारतकालीन हस्तिनापुर राजधानी का जिक्र किया, जब यह वन्य क्षेत्र हुआ करता था और हाथी मुख्य जानवर था। 2017 में योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने पर फिर से जिलों के नाम बदलने की शुरुआत हो गई। 2017 में सबसे पहले मुगलसराय तहसील का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय किया गया। योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने पर फिर से जिलों के नाम बदलने की शुरुआत हो गई। 2017 में सबसे पहले मुगलसराय तहसील का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय किया गया। इससे पहले प्रतापगढ़ से भाजपा सांसद संगमलाल गुप्‍ता भी लखनऊ का नाम बदलने की मांग कर चुके हैं। सीएम को लिखे पत्र में उन्‍होंने यूपी की राजधानी का नाम लक्ष्‍मणपुर किए जाने की मांग की है।केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद 2018 में मुगलसराय रेलवे स्‍टेशन का नाम भी पंडित दीनदयान के नाम पर हो गया।

गाजियाबाद जिले के नाम बदलने की मांग 2018 से की जा रही है। दो साल पहले 2022 में बीजेपी पार्षद संजय सिंह ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस संबंध में मेमोरेंडम सौंपा था। इस दौरान गाजियाबाद का नाम बदलकर गजप्रस्थ, हरनंदीपुरम या दूधेश्वरनाथ नगर किए जाने का प्रस्ताव रखा गया। संजय सिंह ने गजप्रस्थ नाम के पीछे महाभारतकालीन हस्तिनापुर राजधानी का जिक्र किया, जब यह वन्य क्षेत्र हुआ करता था और हाथी मुख्य जानवर था। इसके अलावा यहां बहने वाली हिंडन नदी के आधार पर हरनंदी नगर नाम और दूधेश्वर नाथ मंदिर की वजह से नाम रखे जाने का प्रस्ताव रखा गया।

गाजियाबाद के अलावा कुछ समय पहले ही सुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर ने भी गाजीपुर और बहराइच का नाम बदले जाने की मांग कर दी है। उन्‍होंने इसको लेकर सीएम योगी को चिट्ठी भी लिखी है। इसमें उन्‍होंने कहा है कि गाजीपुर के पौराणिक इतिहास में महर्षि विश्‍वामित्र और बहराइच के इतिहास में महाराजा सुहेलदेव राजभर की बड़ी भूमिका रही है। इसलिए गाजीपुर का नाम विश्‍वामित्र नगर और बहराइच का नाम महाराजा सुहेलदेव नगर किया जाए। बता दें कि मायावती ने अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराजनगर, हाथरस को महामायानगर, कानपुर देहात को रमाबाई नगर और कासगंज को कांशीराम नगर बना दिया था। इसके बाद सपा सरकार आई तो मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती की तरफ से बदले गए जिलों के नाम वापस कर दिए थे। 2017 में योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने पर फिर से जिलों के नाम बदलने की शुरुआत हो गई। 2017 में सबसे पहले मुगलसराय तहसील का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय किया गया। इससे पहले प्रतापगढ़ से भाजपा सांसद संगमलाल गुप्‍ता भी लखनऊ का नाम बदलने की मांग कर चुके हैं। सीएम को लिखे पत्र में उन्‍होंने यूपी की राजधानी का नाम लक्ष्‍मणपुर किए जाने की मांग की है।

अपने कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार ने क्या-क्या किया?

आज हम आपको बताएंगे कि अपने कार्यकाल में मोदी सरकार ने क्या-क्या किया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि देश की नई पीढ़ी को रोजमर्रा की छोटी-छोटी जरूरतों की चिंता नहीं होनी चाहिए ताकि वो देश की प्रगति में अपना भरपूर योगदान कर सकें। ‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ के लाभार्थियों से बात करते हुए पीएम ने कहा, ‘मेरी सरकार चाहती है कि मौजूदा और भविष्य की पीढ़ियों को वैसी जिंदगी नहीं जीनी पड़े जो उनकी पुरानी पीढ़ियों ने जी है। हम देश की बड़ी आबादी को रोजमर्रा की छोट-छोटी जरूरतों के संघर्ष से उबारना चाहते हैं।’ भारतीय जनता पार्टी भाजपा के नेतृत्व में एनडीए सरकार लगातार दूसरा कार्यकाल पूरा करने वाली है। इन 10 वर्षों में मोदी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों पर गौर करें तो प्रधानमंत्री की इस भावना की अच्छे से झलक मिल जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने गरीबों को मकान, शौचालय, नल से जल और बिजली तक की व्यवस्था के लिए अलग-अलग योजनाएं लागू की हैं। इतना ही नहीं, गरीब परिवारों की भूख की चिंता करते हुए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना भी चला रही है जिसका 83 करोड़ लोगों को फायदा मिल रहा है। हम यहां एक-एक कर सभी योजनाओं के बारे में बात करेंगे। यहां केंद्र सरकार की वेबसाइटों पर उपलब्ध आंकड़ों के जरिए देखेंगे कि मोदी सरकार ने इन गरीब कल्याण योजनाओं को लागू करने में किस हद तक सफलता पाई है।

सबसे पहले बात गरीबों को घर देने वाली पीएम आवास योजना की। 2014 में नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार बनी तो अगले वर्ष ही पीएम आवास योजना का आगाज हो गया। इस योजना का मकसद देशभर में गरीबों को पक्का मकान मुहैया कराना है। योजना को दो भागों में बांटा गया है- गांवों के लिए पीएमएवाई(जी) और शहरों के लिए पीएमएवाई(यू)। योजना के तहत जो लोग फ्लैट खरीदते हैं, उन्हें होम लोन के ब्याज पर सब्सिडी मिलती है जबकि जो खुद से घर बनवाते हैं, उन्हें नकद सहायता दी जाती है। नियम के मुताबिक, अधिकतम 20 साल के लिए 6 से 12 लाख रुपये तक होम लोन पर सरकार ब्याज में सब्सिडी देती है जो 2.30 से 2.67 लाख रुपये तक की हो सकती है। अगर आप खुद से घर बनाते हैं तो मैदानी क्षेत्रों में 70 हजार से 1.20 लाख रुपये और पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्र में 75 हजार से 1.30 लाख रुपये तक सहायता सरकार की तरफ से मिलती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की जयंती पर 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी। इसका लक्ष्य अगले पांच वर्षों में यानी 2 अक्टूबर, 2019 तक पूरे देश के हरेक मकान में शौचालय की सुविधा मुहैया कराना था। इन पांच वर्षों में 10 करोड़ शौचालय बनाने की योजना थी। सरकार ने तय वक्त में यह लक्ष्य हासिल करने का दावा किया है। सरकार ने कहा कि 2014 तक सिर्फ 39% घरों में ही शौचालय की सुविधा थी। बहरहाल, अब सरकार ओडीएफ प्लस का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके तहत गांवों में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था की जा रही है। सरकार का दावा है कि 28 दिसंबर, 2023 तक 5,12,958 (85% से ज्यादा) गांव को ओडीएफ प्लस हो चुके हैं। यानी देश के 85% गांवों में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था हो चुकी है। ओडीएफ प्लस गांव का दर्जा उसे दिया जाता है जो खुले में शौच से मुक्त तो हो ही गया है, वहां ठोस या गीले कचरे के निपटान की व्यवस्था भी हो। सरकार गोबरधन योजना के तहत गोबर से खाद और बिजली बनाने का प्लांट भी गांवों में तैयार कर रही है। सरकार का दावा है कि अब तक देशभर के 307 जिलों में 848 जैवगोबर/सीबीजी प्लांट लगाए जा चुके हैं।

गरीबों को मकान और शौचालय के साथ-साथ नल से जल पहुंचाने का भी इंतजाम किया जा रहा है। सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, नल जल योजना के तहत लाखों गांवों में करोड़ों घरों तक स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था की जा चुकी है और यह योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। योजना का लक्ष्य 2024 के आखिर तक देश के सभी गांवों में नल से जल पहुंचाना है। इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए पिछले वर्ष 2023 में हर सेकंड नल जल का एक कनेक्शन दिया गया।

अब गैस चूल्हा अमीरी की पहचान नहीं रह गया है। मोदी सरकार ने करोड़ों गरीबों को गैस कनेक्शन दे दिया। उज्ज्वला योजना के तहत गरीब परिवारों को मुफ्त में गैस कनेक्शन दिया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो अब तक प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के अंतर्गत 10 करोड़, 4 लाख, 49 हजार, 766 गैस कनेक्शन दिए जा चुके हैं। सरकार का दावा है कि 1 अप्रैल, 2014 तक देशभर में सिर्फ 14.52 करोड़ गैस कनेक्शन थे जो 1 अप्रैल, 2023 में बढ़कर 31.40 करोड़ हो गए। इनमें 9.59 करोड़ गैस कनेक्शन उज्जवला योजना के तहत मुफ्त में दिए गए। 2016 में उज्जवला योजना शुरू हुई थी तब गरीबी रेखा से नीचे के गरीब परिवार की 5 करोड़ महिला सदस्यों को मुफ्त में एलपीजी कनेक्शन देने का लक्ष्य था। 1 मई, 2016 को पीएम मोदी ने उत्तर प्रदेश के बलिया से उज्जवला योजना लॉन्च की थी।

अप्रैल 2018 में उज्ज्वला योजना का विस्तार एससी-एसटी, ईबीसी, पीएमएवाई, एएवाई, चाय बागान, वनवासी, द्वीप समूह की महिला लाभार्थियों तक कर दिया गया। इसके साथ ही योजना का लक्ष्य 5 करोड़ से बढ़ाकर 8 करोड़ मुफ्त कनेक्शन कर दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अगस्त, 2021 को उत्तर प्रदेश के महोबा से उज्ज्वला योजना के दूसरे चरण की शुरुआत की थी। उज्जवला योजना का विस्तारित लक्ष्य भी निर्धारित समय सीमा से सात महीने पहले अगस्त 2019 में ही पूरा कर लिया गया। फिर उज्ज्वला 2.0 के तहत कनेक्शन की लक्ष्य संख्या दिसंबर 2022 में ही हासिल हो गई। इसके साथ ही, योजना के तहत कुल कनेक्शन 9.6 करोड़ हो गए। फिर 75 लाख अतिरिक्त कनेक्शन जारी करने की मंजूरी मिली तो उज्जवला योजना के तहत लक्ष्य बढ़कर कुल 10.35 करोड़ कनेक्शन देना हो गया है। योजना के तहत पहली बार भरा हुआ गैस सिलिंडर, चूल्हा, पाइप आदि मुफ्त में दिए जाते हैं।

केंद्री की मोदी सरकार राज्यों से मिले आंकड़ों के आधार पर घोषणा कर देती है कि उसकी योजनाओं ने कितना लक्ष्य हासिल किया है। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और होती है। मसलन, लेखक के गांव में ही ऐसे परिवार हैं जिनके घरों में शौचालय की सुविधा आज भी नहीं है। वहीं, कई ऐसे गरीब परिवार हैं जो प्रधानमंत्री आवास योजना के सच्चे हकदार हैं, लेकिन उन्हें आज तक योजना का लाभ नहीं मिला। कई ऐसे भी परिवार हैं जिन्हें मुफ्त अनाज योजना का लाभ नहीं मिलता जबकि योजना की सही दरकार वैसे परिवारों को ही है। हालांकि, यह भी सच है कि इसमें सरकारों का दोष कम, स्थानीय प्रशासन का बहुत ज्यादा है। भ्रष्टाचार की वजह से अयोग्य लोग गरीबों की हकमारी कर लेते हैं जबकि पात्र लोग सरकारी सहायता से वंचित रह जाते हैं। इस लेखक ने खुद प्रखंड विकास पदाधिकारी बीडीओ को अपने गांव लेकर पात्र लोगों से मिलवाया और उनकी बदहाली की दिखाई, लेकिन इस प्रयास का कोई नतीजा नहीं निकला। शासन-प्रशासन के निचले स्तर पर भरपूर भ्रष्टाचार के कारण आज भी लाखों पात्र परिवार और लोग सरकार की योजनाओं से वंचित हैं। केंद्र सरकार अगर इस तरफ थोड़ा और ध्यान दे तो बच गए इक्का-दुक्का वंचित परिवारों को भी उसकी योजनाओं का लाभ मिल सकता है।

जानिए उमा भारती का राम जन्मभूमि वाला किस्सा!

आज हम आपको उमा भारती का राम जन्मभूमि वाला किस्सा बताने जा रहे हैं! अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि कारसेवा के लिए 1990 में लोगों में गजब का उत्साह दिखा था। लोग लाठी गोली की परवाह न करते हुए किसी भी कीमत पर अयोध्या जाने के लिए बेताब थे। वहीं इन कारसेवकों को रोकने के लिए पुलिस लगातार गिरफ्तारी कर रही थी। बांदा और चित्रकूट की सीमा से प्रवेश करने वाले कार सेवकों को बांदा की खुली जेल में रखा जा रहा था। इन्हीं कार सेवकों में शामिल थीं, फायर ब्रांड हिंदू वादी नेता साध्वी उमा भारती। उमा भारती को पुलिस ने चित्रकूट में गिरफ्तार किया और बांदा की अस्थाई जेल पीडब्ल्यूडी डाक बंगले में रखा था। जहां से रातों-रात उमा भारती इसी शहर के बजरंग दल कार्यकर्ता राजकुमार शिवहरे की मदद से फरार होकर अयोध्या पहुंच गईं थीं। सांध्वी उमा भारती को जेल से भगाने में बजरंग दल के जिस नगर अध्यक्ष का योगदान था, उसी ने अपनी जुबानी पूरा किस्सा सुनाया। पूर्व विधायक राजकुमार शिवहरे जो उस समय बजरंग दल के नगर अध्यक्ष थे। उन्होंने बताया कि 30 अक्टूबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में कार सेवा के लिए गए कारसेवकों पर गोली चलवा दी थी। इसमें सैकड़ों कार्यकर्ता मारे गए थे। इधर, लोगों में अयोध्या जाकर कार सेवा करने का जोश बढ़ रहा था। अलग-अलग जगहों में अलग-अलग रास्तों से लोग अयोध्या पहुंच रहे थे। जिन्हें सरकार के आदेश पर गिरफ्तार किया जा रहा था।

गिरफ्तार करके कारसेवकों को अस्थाई जिलों में रखा जा रहा था। इसी दौरान सांध्वी उमा भारती और भाजपा की वरिष्ठ नेत्री विजयाराजे सिंधिया को चित्रकूट में गिरफ्तार करके बांदा के पीडब्ल्यूडी डाक बंगले में रखा गया था। इसे अस्थाई जेल का रूप दिया गया था। इनके साथ ही कई हजार कारसेवक गिरफ्तार करके राजकीय इंटर कॉलेज और अन्य स्थानों पर रखे गए थे। उमा भारती 31 अक्टूबर को सवेरे यहां के प्रसिद्ध महेश्वरी देवी मंदिर पहुंचीं और मंदिर के पास मौजूद कालका नाई को बुलाया और अपने बाल मुंडवाने की बात कही। नाई ने मंदिर परिसर में उनके बाल काट दिए। सिर मुंडवाने के बाद उन्होंने नाई से पूछा कि तुम्हारे बांदा में कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मुझे अपनी कार से अयोध्या तक पहुंचा सके। इस पर नाई ने राजकुमार शिवहरे का नाम सुझाया और बताया कि उसके पास नई कार भी है। उमा ने उन्हें मंदिर परिसर में बुलाया। राजकुमार शिवहरे बताते हैं कि उस समय मैं अपने 10-12 साथियों के साथ मुलायम सिंह यादव का पुतला बनवा रहा था, ताकि गोली कांड के विरोध में उनका पुतला दहन किया जा सके। उधर, पुलिस मेरी तलाश कर रही थी। जैसे ही हम लोगों ने पुतला दहन किया। वैसे ही मेरे पास संदेशा आया कि उमाजी ने तुम्हें महेश्वरी देवी मंदिर में बुलाया है।

राजकुमार शिवहरे ने बातया कि मैं फौरन मंदिर पहुंचा, जहां मौजूद सुश्री उमा भारती ने मुझसे तमाम सवाल पूछे। कहा कि क्या तुम सुरक्षित मुझे अयोध्या तक पहुंचा सकते हो? राजकुमार ने बताया कि उस समय मुझमें उमंग और उत्साह था। मैंने तुरंत हामी भर दी और मारुति वैन अपने घर से मंगवाई, जिसमें ड्राइवर नवल था। तब उनके साथ जाने से पहले मैंने कहा कि मुझे पुलिस ढूंढ रही है और मैं बाहर निकला तो मुझे गिरफ्तार कर लेगी। इस पर उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ रहो, तुम्हें कोई पकड़ेगा नहीं। मैंने वैसा ही किया, उनके साथ मारुति वैन में बैठकर केन नदी पहुंचा। केन नदी के नाव घाट में उन्होंने स्नान किया और कपड़े बदलकर डाक बंगले वापस आए। डाक बंगले में ही यहां से भागने की योजना तैयार की गई।

उन्होंने बताया कि शाम 5 बजे तक पूरी रणनीति तैयार हो जाने के बाद योजना को अंतिम रूप दिया गया। वैन की पिछली सीट पर कंबल से ढककर निकाला रात को लगभग 12 बजे डाक बंगले से भागने की योजना के तहत मैं ड्राइवर को लेकर डाक बंगला पहुंचा। बाहर पुलिस लगी हुई थी। पुलिस को बताया कि हम उमा जी को खाना देने आए है। इसके बाद डाक बंगले के पीछे की तरफ गाड़ी लगा दी गई और बाथरूम से बाहर की ओर खुलने वाले दरवाजे से उमा जी को मारुति वैन में लाया गया और पिछली सीट पर लेटाकर उन्हें कंबल से ढक दिया गया था। रात को 12 बजे उन्हें लेकर हम लोग डाक बंगले से बाहर निकले और जजी चौराहे में वहां पहले से मौजूद उनके भाई स्वामी प्रसाद सिंह और विधायक सुरेंद्र प्रताप सिंह को गाड़ी में बैठाया। इसके बाद हम लोग आसानी से बांदा की सीमा से फरार हो गए।

राजकुमार ने बताया कि इस घटना के बाद प्रशासन का गुस्सा मेरे परिवार पर टूट पड़ा। तब उनके पिताजी रामसेवक शिवहरे आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उन्हें गिरफ्तार करके चित्रकूट में रखा गया और भाइयों को भी गिरफ्तार किया गया। घर की कुर्की की गई। राजकुमार के खिलाफ संगीन मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ। इस घटना के बाद बजरंग दल कार्यकर्ता राजकुमार शिवहरे को खासी लोकप्रियता मिली। 1993 में जब विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब उमा भारती ने बांदा सदर सीट से राजकुमार शिवहरे को टिकट देने की सिफारिश की थी। इसके आधार पर उन्हें भाजपा का टिकट मिल गया। उन्होंने उस समय 45,301 मत हासिल कर बसपा के दिग्गज नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को हराकर भाजपा का कमल खिलाया था।

क्या पाकिस्तान का भी हो सकता था लक्षद्वीप? जानिए किस्सा!

एक ऐसा समय जब लक्षद्वीप पाकिस्तान का भी  हो सकता था! भारत का सबसे छोटा द्वीप समूह लक्षद्वीप इस समय सबके जुबान पर है। हर कोई इसे अपना अगला टूरिस्ट डेस्टिनेशन बना चुका होगा या लिस्ट में डाल रहा होगा। गूगल, सोशल मीडिया सहित हर ओर बस इसी की चर्चा है। चर्चा के पीछे है पीएम मोदी की लक्षद्वीप दौरे के दौरान खिंचाई गई वो तस्वीरें जिसने समुद्र पार मालदीव में खलबली मचा दी। वहां के अपने लोगों से ज्यादा मालदीव सरकार के मंत्री मोदी की इन तस्वीरों को देख खफा हो गए। खीज इतनी बढ़ गई कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू सरकार के तीन मंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफा अनाप-शनाप बोलने लहे। आनन-फानन में तीनों मंत्रियों को सस्पेंड कर दिया गया लेकिन दोनों देशों के बीच टेंशन बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर #BoycottMaldives चलाया जा रहा है। सलमान खान, जॉन अब्राहम, अक्षय कुमार समेत तमाम बॉलीवुड स्टार्स लक्षद्वीप को प्रमोट कर रहे हैं। यह तो हो गई अब तक की अपडेट लेकिन, क्या आपको पता है कि जूनागढ़, हैदराबाद की तरह लक्षद्वीप भी पाकिस्तान का होने वाला था। सबसे छोटे द्वीप पर पड़ोसी मुल्क की नजर थी? जी हां, 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान इस खूबसूरत द्वीप समूह पर कब्जा करना चाहता था। तभी एक गुजराती सरदार पटेल और दो तमिल नायकों ने कुछ ऐसा किया कि लक्षद्वीप पाक के हाथ से फिसल गया। 1947 यानी देश की आजादी के साथ विभाजन जैसी त्रासदी भी हमारे हिस्से आई थी। जिन्ना के अलग मुल्क पाकिस्तान की जिद ने लाखों लोगों की जिंदगियां छीन ली थी, करोड़ो लोग बेघर या कहें एक देश से दूसरे देश पहुंच गए। उस बीच रियासतों का भी बंटवारा होना था। जिन्ना के दो मुल्क सिद्धांत के अनुसार, हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर, त्रावणकोर जैसे राज्य पाकिस्तान के हिस्से में आने थे। हालांकि लौह पुरुष पूर्व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कुशन नेतृत्व ने ये होने न दिया। लेकिन, इसी बीच, कोच्चि से 496 किलोमीटर दूर बसा एक और मुस्लिम बहुमत वाला इलाका था, जो बंटवारे से अछूता रह गया। वह था लक्षद्वीप, जहां 93% आबादी मुस्लिम थी। जिन्ना को जब पता चला तो उनकी नजर इसपर पड़ी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान इस खूबसूरत द्वीप समूह पर कब्जा करना चाहता था। मगर सरदार वल्लभभाई पटेल और दो अन्य तमिल नायकों की तत्परता की वजह से लक्षद्वीप भारत का ही हिस्सा बना रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 के अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी बताया था कि कैसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने न सिर्फ हैदराबाद और जूनागढ़ जैसे रियासतों को एकजुट किया, बल्कि लक्षद्वीप को भी पाकिस्तान का होने से बचाया।

1947 के विभाजन के तुरंत बाद, हमारे पड़ोसी ने लक्षद्वीप पर नजर गड़ा रखी थी। हरे रंग के झंडे वाला एक जहाज वहां भेजा गया था। जब सरदार पटेल को इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने कड़ा रुख अपनाने में कोई समय नहीं गंवाया। उन्होंने मुदलियार बंधुओं, अर्कोट रामास्वामी मुदलियार और अर्कोट लक्ष्मण स्वामी मुदालियार से आग्रह किया कि वे तुरंत त्रावणकोर के लोगों के साथ लक्षद्वीप के लिए एक मिशन का नेतृत्व करें और वहां तिरंगा फहराएं। रामास्वामी मुदलियार मैसूर के 24वें और अंतिम दीवान थे जबकि उनके भाई लक्ष्मण स्वामी मुदलियार एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे जो लगभग 20 वर्षों तक मद्रास विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। दोनों का जन्म कुरनूल में एक तमिल भाषी परिवार में हुआ था। सरदार पटेल के आदेश के बाद, लक्षद्वीप में तुरंत तिरंगा फहराया गया और जिसे पीएम मोदी ने पड़ोसी के नापाक सपने के रूप में बताया। दोनों तमिल नायकों और एक गुजराती दिमाग ने पाकिस्तान के चंगुल से लक्षद्वीप को बचाया था।

प्रधानमंत्री ने मन की बात के 2019 दिवाली संस्करण में देस को बताया था कि इस घटना के बाद, सरदार पटेल ने मुदलियार भाइयों से लक्षद्वीप के विकास के लिए व्यक्तिगत रूप से सभी सहायता सुनिश्चित करने के लिए कहा। आज लक्षद्वीप भारत की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यह एक आकर्षक पर्यटन स्थल भी है। मुझे उम्मीद है कि आपको सुरम्य द्वीपों और इसके प्राचीन समुद्र तटों की यात्रा करने का अवसर मिलेगा।

लक्षद्वीप जल्द ही मालदीव्स जैसा ही हॉट डेस्टिनेशन बनने को तैयार है! सरकार को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश आएगा। और क्या जानते हैं, आजकल लक्षद्वीप तो Google पर भारत से सर्च होने वाली सबसे टॉप जगह है। लक्षद्वीप को पर्यटन का ध्रुव तारे बनाने के लिए बॉलीवुड के दिग्गजों – अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम से लेकर सचिन तेंदुलकर, पी.वी. सिंधु और सुरेश रैना जैसे खिलाड़ियों ने हाथ मिलाया है। सबने मिलकर भारतीयों से आह्वान किया कि वे विदेशी द्वीपों की बजाय लक्षद्वीप घूमने आएं और खूबसूरत भारत का लुत्फ उठाएं।

जब रचा गया अपनी ही मौत का खेल!

हाल ही में एक ऐसी घटना हुई जिसमें अपनी ही मौत का खेल रच दिया गया! दोस्त से दगाबाजी और शातिराना प्लानिंग की कहानी चेन्नई के दक्षिण में बसे चेंगलपेट के अल्लानूर गांव से शुरू हुई। गांव की आबादी ज्यादा नहीं है, इसलिए घर भी एक-दूसरे से दूर बने हैं। ऐसी ही एक झोपड़ी में फिजिकल ट्रेनर सुरेश आर. भी रहता था। 38 साल का सुरेश आर. कुछ दिन पहले ही चेन्नई से गांव अल्लानूर लौटा था। 16 सितंबर 2023 को उसकी झोपड़ी में आग लग गई। पुलिस ने जली हुई झोपड़ी से एक पुरुष के जली हुई बॉडी बरामद की। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की। पुलिस ने भी इस आग लगने की घटना मानकर फाइल बंद कर दी। ओराथी पुलिस स्टेशन के अफसरों ने मान लिया था कि झोपड़ी में लगी आग में अपनी मां से अलग रहने वाले सुरेश की मौत हो चुकी है। करीब तीन महीने बाद दिसंबर में इस कहानी में नया मोड़ आया। तमिलनाडु में एन्नोर थाने की पुलिस 39 साल के दिल्ली बाबू की गुमशुदगी की जांच रही थी। दिल्ली बाबू सुरेश की कथित मौत से एक सप्ताह पहले संदिग्ध हालात में गायब हो गया था। 23 सितंबर को एन्नौर थाने में परिजनों ने दिल्ली बाबू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद भी जब दिल्ली बाबू का अता-पता नहीं चला तो उसके परिजन शिकायत लेकर पुलिस कमिश्नरेट पहुंचे और कोर्ट में वाद भी दायर कर दिया। इसके बाद एन्नौर पुलिस ने तफ्तीश शुरू की। पुलिस दिल्ली बाबू के बड़े भाई पलानी से पूछताछ की। पलानी ने पुलिस को बताया कि उसके भाई की दोस्ती अल्लानूर में रहने वाले सुरेश आर. से थी। गायब होने से पहले वह अक्सर सुरेश के साथ घूमता था। चेंगलपेट में अचारपक्कम पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर आर शिवकुमार ने बताया कि पलानी के बयान के बाद जांच सुरेश की ओर मुड़ी, जिसकी कथित तौर से झोपड़ी में आग लगने मौत हो गई थी। पुलिस को सबसे बड़ा क्लू उस समय हाथ लगा, जब दिल्ली बाबू के मोबाइल फोन की लास्ट लोकेशन सुरेश की झोपड़ी के पासअल्लानूर गांव में मिली।

इसके बाद से पुलिस सुरेश आर और दिल्ली बाबू के रिश्तों को खंगालने लगी। कई लोगों से पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान यह सामने आया कि झोपड़ी वाले हादसे के दौरान सुरेश को तीन लोगों के साथ दिखा था। उनमें एक की पहचान हरिकृष्णन के तौर पर हुई। अब पुलिस हरिकृष्ण के पीछे पड़ी। पुलिस की टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर पहुंची। वेल्लोर में हरिकृष्ण के पिता ने बताया कि वह कई हफ्तों से नहीं घर आया है। पुलिस ने उनसे हरिकृष्ण का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया और फिर उसे ट्रेस करती रही। इंस्पेक्टर शिवकुमार ने बताया कि फोन नंबर को ट्रेस करते हुए पुलिस टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर के पास अराकोणम के एक घर में पहुंची। वहां जब पुलिस ने हरिकृष्णन को दबोचने के लिए दरवाजा खुलवाया तो हैरान रह गई। वहां सुरेश आर. भी जिंदा मिला, जिसकी कथित मौत झोपड़ी वाले हादसे में हो चुकी थी। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।

अब बारी दोनों से पूछताछ की थी। जब पुलिस ने सुरेश आर. का मुंह खुलवाया तो दिल्ली बाबू की गुमशुदगी से भी पर्दा उठ गया। झोपड़ी में जलकर मरने वाला दिल्ली बाबू ही था, जिसे सुरेश अपनी लंबी प्लानिंग के बाद अपने साथ ले गया था। सुरेश ने अपने दो दोस्तों हरिकृष्णन और कीर्ती राजन के साथ उसकी हत्या की थी। कीर्ती राजन वेल्लोर में टैक्सी चलाता था। सुरेश ने पुलिस को बताया कि उसने एक करोड़ का जीवन बीमा कराया था। अपने लाइफ इंश्योरेंस के प्रीमियम के तौर पर पिछले दो साल में 50 हजार रुपये जमा किए थे। वह इंश्योरेंस कंपनी से मोटी रकम हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने अपनी मौत की स्क्रिप्ट लिखी। इंश्योरेंस कंपनी की तसल्ली के एक लाश की जरूरत थी। इसके लिए उसने पहले लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले संस्थाओं से बातचीत की, मगर काम नहीं बना। इस बीच उसकी मुलाकात अपने पुराने दोस्त दिल्ली बाबू से हुई। बाबू दस साल पहले अपने परिवार के साथ सुरेश के मकान में बतौर किरायेदार रहता था।

सुरेश को वह शख्स मिल गया, जिसकी हत्या के बाद पुलिस और इंश्योरेंस कंपनी को गुमराह किया जा सकता था। सुरेश ने प्लानिंग के तहत फिर से बाबू से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया। दोनों एक दशक बाद फिर एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। फिर उसने हत्या की साजिश रची। अपनी प्लानिंग में उसने हरिकृष्णन और टैक्सी ड्राइवर कीर्ती राजन को शामिल किया। 9 सितंबर को तीनों ने मिलकर हत्या की स्क्रिप्ट लिखी। प्लानिंग के तहत 15 सितंबर 2023 की शाम को तीनों पार्टी करने के नाम पर दिल्ली बाबू को धोखे से अपनी झोपड़ी में लाए। वहां उन्होंने बाबू को जमकर शराब पिलाई। जब बाबू नशे में मदहोश हो गया तो तीनों ने मिलकर जेनरेटर के तार से उसका गला घोंट दिया। बाबू की मौत के बाद सुरेश ने अपनी झोपड़ी में पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी और तीनों वहां से चलते बने। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की तो उन्हें लगा कि प्लान सक्सेस हो गया है। मगर नियति को कुछ और मंजूर था। पुलिस ने टैक्सी ड्राइवर राजन, हरिकृष्णन और सुरेश आर को गिरफ्तार कर लिया है।

जब एक सीईओ माँ ने अपने ही बच्चे को उतार दिया मौत के घाट!

हाल ही में एक सीईओ माँ ने अपने ही बच्चे को मौत के घाट उतार दिया है! बंद कमरे में गोवा की यह वारदात रिश्‍तों को शर्मसार कर देने वाली है। एक मासूम की हत्‍या। हत्‍यारा भी कोई और नहीं। 9 महीने उसे कोख में रखकर जन्‍म देने वाली उसकी अपनी मां। इस हत्‍यारी मां का प्रोफाइल भी हल्‍का-फुल्‍का नहीं। एक कंपनी की सीईओ और हार्वर्ड रिसर्च फेलो जिसका नाम AI एथिक्‍स में 100 बेहतरीन महिलाओं में रह चुका है। ममता पर वार करने वाली इस हैवान का नाम है सूचना सेठ। अपने 4 साल के बच्‍चे का कत्‍ल करने के बाद शायद यह कभी पुलिस के हाथ नहीं लगती। लेकिन, होटल स्‍टाफ की होशियारी और गोवा पुलिस की तत्‍परता ने सूचना सेठ का पूरा खेल बिगाड़ दिया। मासूम बेटे के खून ने ही इस हत्‍या का सुराग दिया। यह खून ही बोला- ‘मां कातिल है’! सूचना सेठ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उस पर अपने चार साल के मासूम बेटे की हत्‍या का आरोप है। आरोपी महिला बेंगलुरु की एआई स्‍टार्टअप कंपनी में सीईओ है। होटल के कमरे में बेटे की बेरहमी से हत्‍या करने के बाद आरोपी महिला ने उसका शव बैग में भर लिया था। यह उसे लेकर बेंगलुरु जा रही थी। हालांकि, उसकी करतूत का जल्‍द ही राजफाश हो गया। इस खुलासे में होटल स्‍टाफ की जितनी तारीफ की जाए कम है। उतना ही शानदार काम किया गोवा पुलिस ने। इन्‍होंने बड़ी होशियारी से महिला के लिए जाल बिछाया। उसे फरार होने से पहले ही दबोच लिया। सूचना सेठ कैसे पुलिस के हाथ में आई, पूरा मामला बेहद दिलचस्‍प है। हालांकि, इस हत्‍या की बहुत सी परतों का खुलना अभी बाकी है। इसमें से एक यह भी सवाल बना हुआ है कि सूचना सेठ को ऐसा क्यों लगा कि उसे अपने बच्चे की हत्‍या करनी होगी। अब तक जो पता चला है वह हैरान करने वाला है। बच्चे की हत्या गोवा के होटल के कमरे में हुई। उसके शव को एक बैग में भर दिया गया था। वह बैग उस कैब में मिला जिसे उसकी मां ने बेंगलुरु ले जाने के लिए किराये पर बुक कराया था।

39 साल की सूचना सेठ ने 6 जनवरी को अपने बेटे के साथ उत्तरी गोवा के कैंडोलिम में एक सर्विस अपार्टमेंट में चेक-इन किया। दो दिन बाद वह अकेली एक बड़े बैग के साथ बाहर निकली। उसे बेंगलुरु जाना था। होटल स्टाफ ने सुझाव दिया कि टैक्‍सी के बजाय बेंगलुरु के लिए गोवा से फ्लाइट सस्‍ती रहेगी। टैक्‍सी ज्यादा महंगी पड़ेगी। वक्‍त भी ज्‍यादा लगेगा। सड़क से 600 किमी की दूरी तय करने में 12 घंटे से ज्‍यादा लगने थे। जबकि फ्लाइट से 90 मिनट से भी कम का समय लगता। हालांकि, सूचना सेठ ने जोर दिया कि उसे टैक्‍सी से ही जाना है। इसके बाद उसने होटल से चेक-आउट किया। अपना लगेज टैक्‍सी में रखा। इस टैक्‍सी को होटल स्टाफ ने अरेंज करके दिया था। सूचना सेठ के रूम से चेक-आउट कर जाने के बाद होटल स्टाफ रूम की सफाई के लिए गया तो वहां पर लाल रंग के धब्‍बे देखे। स्‍टाफ को यह खून लगा। तुरंत होटल के लोगों ने पुलिस को सूचना दी। बिना किसी देरी के पुलिस की एक टीम होटल जा पहुंची।

पुलिस को भी पहली नजर में ये खून के धब्‍बे ही लगे। इसके बाद पुलिस तुरंत हरकत में आ गई। उसने फौरन ड्राइवर के जरिये महिला से संपर्क किया। यह ड्राइवर ही महिला को बेंगलुरु लेकर जा रहा था। जब महिला से बच्‍चे के बारे में पूछा गया तो बताया कि उसने किसी दोस्‍त के घर पर रहने के लिए उसे छोड़ा है। पुलिस का शक धीरे-धीरे पक्‍का हो रहा था। इस पर उसने दोस्‍त के घर का पता बताने के लिए कहा। महिला ने हिचकिचाते हुए दोस्‍त के घर का पता बताया। पुलिस ने इस एड्रेस का पता लगाया तो यह फेक निकला। पुलिस को अब यकीन हो चला था कि दाल में काला है। पुलिस ने ड्राइवर से बात की। सूचना सेठ को उनके बीच होने वाली बातचीत की भनक न लगे इसके लिए पुलिस ने ड्राइवर से कोंकणी में बात की। गोवा पुलिस ने ड्राइवर से कैब को चित्रदुर्ग में नजदीकी पुलिस स्‍टेशन की तरफ गाड़ी का रुख करने को कहा। चित्रदुर्ग बेंगलुरु से करीब 200 किमी दूर है। ड्राइवर ने ठीक वैसा ही किया जैसा कहा गया था। चित्रदुर्ग में पुलिस ने सूचना सेठ को हिरासत में ले लिया। वह जिस बैग के साथ सफर कर रही थी बेटे का शव उसी में मिला।

सूचना सेठ मूल रूप से बंगाल की रहने वाली है। पति वेंकट रमन इंडोनेशिया में रहते हैं। दोनों के रिश्‍ते अच्‍छे नहीं हैं। पति-पत्‍नी तलाक के लिए लड़ रहे हैं। तलाक अपने अंतिम चरण में है। सूचना सेठ इस बात से बेहद नाखुश थी। बताया जा रहा है कि पिता से बच्‍चा न मिल सके इसलिए मां ने बेटे का कत्ल कर दिया। बच्‍चे की हत्‍या के वक्‍त पिता इंडोनेशिया में ही थे। दोनों की 2010 में शादी हुई थी। आरोपी महिला ने 2019 में अपने बेटे को जन्म दिया था। हालांकि, पति के साथ हुए विवाद के बाद 2020 में अदालत ने फैसला सुनाया था कि बच्चे का पिता उससे हर रविवार को मुलाकात कर सकता है। इस बात से सूचना बिल्कुल भी खुश नहीं थी। सूचना सेठ Mindful AI Lab नाम की स्टार्ट-अप कंपनी की संस्थापक और सीईओ है। वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के बर्कमैन क्लेन सेंटर में 2017-18 में फेलो थी। यह एक थिंक-टैंक है जो साइबरस्पेस के विकास, डायनेमिक्‍स, मानदंडों और मानकों का अध्ययन करता है। यहां सूचना सेठ ने उद्योग में नैतिक मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संचालन पर काम किया।

जब 1986 में राम मंदिर का खुलवाया गया था ताला?

1986 में पहली बार राम मंदिर का ताला खुलवाया गया था! राम मंदिर के उद्घाटन की तारीख 22 जनवरी तय है। इस उद्घाटन से पहले कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी बीजेपी में जुबानी जंग चल रही है। कर्नाटक में मंत्री और कांग्रेस नेता ने कहा कि बीजेपी राम मंदिर का श्रेय ले रही है कि जबकि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाने के लिए कदम उठाए थे। लेकिन राम मंदिर के लिए आंदोलन से लेकर रथ यात्रा की शुरुआत में बीजेपी ने बढ़त बनाई थी। कहा जाता है कि, 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने के बाद से राजीव विपक्ष के निशाने पर थे। लोग कांग्रेस सरकार से थोड़े बिदके हुए थे। ऐसे में विरोधियों की आवाज दबाने के लिए राजीव ने 1986 में उस समय के यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाकर अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाने की पहल की थी। 1985 में, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शाह बानो मामले में मुस्लिम धर्मगुरुओं के सामने झुकने का निर्णय लिया था। राजीव ने शीर्ष अदालत के फैसले को पलटते हुए संसद से कानून पास करवा दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि शाह बानो को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने का हक है। राजीव ने शरिया कानून के अनुरूप गुजारा भत्ता व्यवस्था को खत्म करने वाला एक कानून बनाया था। राजीव के इस फैसले का देश में विरोधियों ने काफी निशाना बनाया था।

शाहबानो प्रकरण से विपक्षियों के निशाने पर आए राजीव ने इसके अगले ही साल हिंदुओं को लुभाने का दांव चला। 1985 में ही राजीव गांधी के कहने पर दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण का प्रसारण शुरू हुआ था। इसके बाद शाह बानो प्रकरण के बाद राजीव ने हिंदुओं को भी कुछ देने की मंशा से कुछ महीने बाद ही राजीव ने राम मंदिर का ताला खुलवा दिया था। राजीव ने इसके लिए उस समय के यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाया और राम जन्मभूमि के ताले खुलवाए। राजीव के फैसले से पहले राम मंदिर में पुजारी को साल में केवल एक बार पूजा करने का अधिकार था। 1949 में यहां भगवान राम की मूर्ति स्थापित की गई थी।

हालांकि, राजीव के इस फैसले के बाद भी अयोध्या के समीकरण में कोई खास बदलाव नहीं आया था। बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी और विश्व हिंदू परिषद पहले के तरह अपने मिशन में लगे रहे थे। दूसरी तरफ राजीव के 1986 के फैसले के बाद कई लोगों ने इसे अलग-अलग तरीके से व्याख्या की। हिंदू और मुस्लिम दोनों इस जगह पर अपना दावा कर रहे थे। राजीव के फैसले के बाद लोगों ने इसे हिंदुओं के दावे को पुख्ता बताया। 1989 में चुनावी भाषणों के दौरान राजीव गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि इसपर आम राय बनान की कोशिश जारी है और अयोध्या में ही राम मंदिर बनेगा। सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया था कि अगर 1989 में अगर राजीव गांधी पीएम बन गए होते तो राम मंदिर के लिए प्रयास और तेज हो गए होते। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि 1 फरवरी 1986 को राम जन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाना सही फैसला नहीं था। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि यह सही नहीं था। मुखर्जी ने अपनी किताब The Turbulent Years: 1980-96 में इस बात का जिक्र किया है।

राजीव गांधी ने ही 1989 में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दी थी। तब देश के तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को भी शिलान्यास में भाग लेने के लिए भेजा गया था। इसके बाद राम मंदिर के लिए पहली ईंट लगाई गई थी। 1991 में राजीव गांधी की लिट्टे के आतंकियों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को उतनी तवज्जो नहीं दी। हालांकि, कांग्रेस पीएम पी वी नरसिम्हा राव के समय में ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी। इसके कुछ समय बाद 1993 में राव सरकार ने विवादित जमीन के अधिग्रहण के लिए एक अध्यादेश लाई थी। इस अध्यादेश को 7 जनवरी 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने मंजूरी दी ती। फिर इसे उस समय के गृह मंत्री एसबी चव्हाण ने लोकसभा में मंजूरी के लिए रखा था। इसके पास होने के बाद इसे अयोध्या एक्ट के नाम से जाना गया था। इस कानून के तहत केंद्र सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन के साथ चारो तरफ 60.70 एकड़ जमीन को अपने कब्जे में ले लिया था। उस समय सरकार की योजना वहां राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं को बनाने की थी।