Friday, March 6, 2026
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क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन में पड़ सकती है दरार?

विपक्ष के INDIA गठबंधन में अब दरार पड़ सकती है! तीन महीने बाद एक बार फिर दिल्ली के अशोका होटल में I.N.D.I.A. गठबंधन के नेताओं का जमावड़ा लगा है। 28 दलों के नेता सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर चर्चा करेंगे। तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस बैकफुट पर नजर आ रही है। बैठक से पहले इंडिया के पार्टनर जेडी यू ने नेतृत्व का सवाल उठाया है तो शिवसेना ने अपने अखबार सामना में विधानसभा चुनाव में अन्य दलों को सीट नहीं देने के लिए कांग्रेस की आलोचना की है। आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को सीट देने के मूड में नहीं हैं। ममता बनर्जी ने भी कांग्रेस को याद दिला दिया है कि सीटों के बंटवारे पर चर्चा करते समय बंगाल में अपनी हैसियत को नहीं भूलें। कांग्रेस की मुसीबत यह है कि देश के जिन राज्यों में वह अकेले दम पर चुनावी दम दिखा सकती है, वहां उसने सहयोगियों को भाव नहीं दिया है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में उसने किसी पार्टी के साथ समझौता नहीं किया। अब इंडिया की बैठक कांग्रेस को सहयोगियों के किले में अपने लिए लोकसभा सीटों के लिए मोलतोल करना है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ 52 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने पंजाब में 8, तमिलनाडु में 8 और केरल में 15 सीटें जीती थीं। तेलंगाना और असम में पार्टी को 3-3 सीटें मिली थीं। इसके बाद वह अन्य राज्यों में एक या दो सीट जीतने में ही सफल रही। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और आंध्रप्रदेश में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सिर्फ एक-एक सीट ही मिली थी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दो सीटें मिली थी, जिसके बार में इंडिया की बैठक से पहले ममता बनर्जी ने चर्चा की। फिर सीटों के बंटवारे के लिए फार्मूला क्या होगा? सबसे बड़ा सवाल है कि मोदी लहर में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के क्षत्रप कांग्रेस को कितनी सीट देंगे। कांग्रेस 370 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि सहयोगियों को 173 सीटों पर समर्थन देगी। 373 सीटों के दावे को मान लें तो कांग्रेस कर्नाटक, असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में सीट बांटने के मूड में नहीं है। पार्टी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ना चाहती है।

पंजाब में लोकसभा की 13 और दिल्ली में 7 सीटें हैं। 2019 में कांग्रेस को 8 और आम आदमी पार्टी को दो सीटें मिली थीं। बीजेपी और अकाली दल के खाते में 2-2 सीटें आईं थीं। मगर विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दोनों राज्यों में कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया। 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 सीटों में से 62 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। आम आदमी पार्टी को 54.3 फीसदी और कांग्रेस को महज 9.7 फीसदी वोट मिले थे। 2022 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भारी जीत दर्ज की। 117 सदस्यों वाली विधानसभा में आप के 92 विधायक हैं। उसका वोट प्रतिशत 42.01 है। दूसरी ओर करारी हार के बाद कांग्रेस पंजाब में 18 सीटों पर सिमट गई। उसे 22.98 प्रतिशत वोट ही मिले थे। वोट शेयर के आधार पर इन दोनों राज्यों में आम आदमी का पलड़ा भारी है। इंडिया गठबंधन की बैठक में यह तय करना है कि अरविंद केजरीवाल दोनों राज्यों की कुल 20 में से कुल कितनी सीट कांग्रेस को देंगे। इस बार आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है। अगर सहमति नहीं बनी तो इन राज्यों में इंडिया को झटका लग सकता है।

विपक्षी गठबंधन इंडिया में पहली बार कलह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में सीट शेयरिंग नहीं करने के लिए कांग्रेस पर हमला बोला था। उत्तरप्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। बीजेपी को रोकने के लिए अखिलेश यादव ने सीट शेयरिंग में नरमी बरतने के संकेत दिए हैं, मगर यूपी में कांग्रेस की हालत पतली है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ सोनिया गांधी की सीट रायबरेली ही जीत सकी थी। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 2.33 ही रहा। इसके उलट समाजवादी पार्टी ने लोकसभा में पांच और विधानसभा में 111 सीटें जीती हैं। राज्य में 32.06 प्रतिशत वोट सपा के खाते में आई थीं। कांग्रेस 2009 के फार्मूले के आधार पर 21 लोकसभा सीट की मांग कर रही है।

बिहार में सीटों को लेकर भी बड़ा पेंच फंसा है। राज्य की कुल 40 लोकसभा सीटों में से 16 जेडी-यू के खाते में है। बाकी बची 24 सीटों में 17 पर राष्ट्रीय जनता दल की दावेदारी है। बिहार के महागठबंधन में सीपीआई भी है। उसने भी 6 सीटों की डिमांड की है। कांग्रेस के पास अभी राज्य से सिर्फ एक लोकसभा सांसद है। सूत्र बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस की किस्मत लालू यादव के हाथ में है। नीतीश कुमार की जेडी यू और लालू यादव की आरजेडी 16-16 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। बाकी बची 8 सीटों में से पांच कांग्रेस को मिल सकती है। लालू यादव और नीतीश कुमार इस फार्मूले के साथ दिल्ली पहुंचे हैं, जिसमें कांग्रेस नेताओं से इस पर चर्चा की जाएगी। हालांकि इससे पहले जेडी यू संयोजक के मुद्दे को साफ करना चाहती है।

बड़े राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन की अग्निपरीक्षा होगी। पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 22 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस पूरी तरह बंगाल से साफ हो गई। उसे सिर्फ 2.19 प्रतिशत वोट मिले थे। टीएमसी ने 215 सीटों के साथ 48 फीसदी वोट हासिल किए थे। हालांकि ममता बनर्जी ने संकेत दिए हैं कि वह सीट बंटवारे में उदारता बरतेंगी, मगर उन्होंने साफ किया है कि कांग्रेस पिछले चुनाव में सिर्फ दो सीटें ही जीत सकी है। दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस के लिए खास समस्या नहीं है। कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना में उसके पास कोई गठबंधन पार्टनर नहीं है। तमिलनाडु और केरल में सीट शेयरिंग का फार्मूला पहले से ही तय है। हिंदी भाषी राज्यों में सीट बंटवारे में उसे यह साफ करना होगा कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा में वह इंडिया के सहयोगी दलों को कितनी सीटें ऑफर करती हैं। अगर बात नहीं बनी तो यूपी और दिल्ली में गठबंधन का टूटना तय है।

क्या लोकसभा चुनाव का विपक्ष में फंसा है पेंच?

आने वाले लोकसभा चुनाव का विपक्ष में पेंच फंस चुका है! 2024 लोकसभा चुनाव में अब बस कुछ ही महीने शेष हैं। मोदी सरकार से मुकाबले के लिए विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. भी पूरा जोर लगा रहा है। सभी विपक्षी दल 4 बार मीटिंग कर चुके हैं। लेकिन अभी सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं बन पा रही है। दिल्ली के अशोका होटल में दिग्गज नेताओं की बैठक तो हुई लेकिन सीट शेयरिंग पर बात आकर फंस रही है। सीट शेयरिंग का मसला कांग्रेस के लिए ज्यादा मुश्किल लग रहा है। तीन राज्य ऐसे हैं जहां एक में कांग्रेस गठबंधन में है तो वहीं बाकी दो राज्यों में वह विपक्ष में है लेकिन मोदी सरकार को हराने के लिए एक मंच पर आई है। ये तीन राज्य हैं पंजाब, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल। पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने एलान किया है कि वो अकेले चुनाव लड़ेगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी तृणमूल कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने का इरादा जताया है। और महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) ने 23 सीटों की मांग की है, जिससे सीटों का बंटवारा और पेचीदा हो गया है। आइए, देखते हैं कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में इंडिया ब्लॉक के साथी दल कांग्रेस की सीट बंटवारे की योजना को कैसे रोक रहे हैं। ममता बनर्जी ने आज ऐलान कर दिया कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस अकेले लड़ेगी। उन्होंने देश भर में ‘इंडिया ब्लॉक’ गठबंधन का हिस्सा बने रहने की बात ज़रूर कही है, मगर बंगाल में सीट का बंटवारा या कांग्रेस या वामपंथी मोर्चा से गठबंधन नहीं होगा। ममता ने ये साफ कर दिया कि बंगाल में सिर्फ तृणमूल ही भाजपा को हरा सकती है। बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस अकेले लड़ी थी और सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी, जबकि तृणमूल ने 22 सीटें जीती थीं। उस समय भी कई कांग्रेस नेताओं ने माकपा के साथ मिलकर लड़ने की मांग की थी, मगर पार्टी ने अकेले लड़ने का फैसला किया था। इस बार ममता का अकेले लड़ने का ऐलान बंगाल की राजनीति को नया दिशा दे सकता है।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने विपक्ष से 23 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग की है लेकिन कांग्रेस को ये मंजूर नहीं है। महाराष्ट्र में कांग्रेस, शरद पवार का एनसीपी गुट और उद्धव गुट वाली शिवसेना गठबंधन में है। शिवसेना यूबीटी ने लोकसभा सीटों का एक बड़ा हिस्सा मांगा है। पार्टी ने 23 सीटों की मांग की, लेकिन कांग्रेस ने इस मांग को खारिज कर दिया। वरिष्ठ महाराष्ट्र कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने मांग को अत्यधिक करार देते हुए कहा कि पार्टियों के बीच समझौता होना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘जबकि हर पार्टी ज्यादा सीटें चाहती है, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए शिवसेना की 23 सीटों की मांग अत्यधिक थी।’ ध्यान देने वाली बात यह है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और एनसीपी साथ लड़े थे। 48 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 1 सीट जीत पाई थी जबकि एनसीपी ने 4 सीटें जीती थीं। शिवसेना और बीजेपी ने भी 2019 का चुनाव साथ लड़ा था। बीजेपी ने 23 सीटें जीतीं और शिवसेना ने 18 सीटें जीत के रूप में मिली थीं।

पंजाब कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी आलाकमान को साफ बता दिया है कि वो 2024 के लोकसभा चुनावों में अकेले लड़ना चाहते हैं। 26 दिसंबर को हुई एक अहम बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं और पंजाब के दिग्गजों के बीच यही राय सामने आई। बैठक में सीटों के बंटवारे पर मंथन हुआ, जिसमें कांग्रेस के 30 से ज्यादा नेता मौजूद थे। बैठक के बाद विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि आलाकमान ने उन्हें सुन लिया है और पार्टी के हितों का ख्याल रखा जाएगा! 

उधर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 17 दिसंबर को पंजाब के बठिंडा में एक रैली की थी। केजरीवाल ने लोगों से पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को वोट देने की अपील की थी, जिससे ये संकेत मिले कि भारत गठबंधन में सहयोगी कांग्रेस के साथ सीट-बंटवारा होने की उम्मीद कम है। और सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी, जबकि तृणमूल ने 22 सीटें जीती थीं। उस समय भी कई कांग्रेस नेताओं ने माकपा के साथ मिलकर लड़ने की मांग की थी, मगर पार्टी ने अकेले लड़ने का फैसला किया था। इस बार ममता का अकेले लड़ने का ऐलान बंगाल की राजनीति को नया दिशा दे सकता है।तो अब देखना ये है कि कांग्रेस पंजाब में क्या रणनीति बनाती है और आम आदमी पार्टी अकेले लड़कर क्या कमाल दिखाती है। बता दें कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी का किसी से गठबंधन नहीं है। वह सिर्फ इंडी गठबंधन का हिस्सा है।

क्या 2024 में रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल कर पाएगी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी 2024 में रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल कर पाएगी या नहीं! अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में बड़ा सवाल यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी वापस आएंगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह धमाकेदार वापसी करेंगे। बीजेपी लोकसभा की 272 से अधिक जीतेगी या उससे कम। 272 से कम सीट आने की स्थिति में उसे अगले पांच वर्षों तक केंद्र में शासन करने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता हो सकती है। चुनाव परिणाम से ही यह तय होगा कि क्या बीजेपी 1991 के बाद नरसिम्हा राव की तरह शासन कर पाएंगी या 2014-24 की तर्ज पर मोदी की तरह। इंडिया गठबंधन का मानना है कि यदि वह 400-450 सीटों पर बीजेपी के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ें तो तस्वीर बदल सकती है। इंडिया गठबंधन में कांग्रेस और अलग-अलग क्षेत्रीय सहयोगी साथ आए हैं। विपक्षी गठबंधन का मानना है कि वन टू वन की लड़ाई में उनके पास मोदी को पद से हटाने का मौका है। वे वही करने की उम्मीद कर रही है जो उन्होंने 2004 में किया था। उस समय हर कोई सोचता था कि वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी फिर सत्ता में आएगी लेकिन वह हार गई। हालांकि, मोदी वाजपेयी नहीं हैं, और 2024, 2004 नहीं है। 2004 के विपरीत, अब बीजेपी, सबसे अच्छी स्थिति में है। तब बीजेपी 180 सीटों जीतने वाली पार्टी थी। उसे हमेशा सहयोगियों की आवश्यकता होती थी। अब मोदी की बीजेपी बहुत मजबूत है। उसने हिंदीभाषी राज्यों में अपनी जड़े बहुत गहरी जमा ली हैं। पार्टी न केवल संगठनात्मक रूप से बढ़ी है, बल्कि गरीब-समर्थक योजनाओं, विशेषकर महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं की गहरी पैठ के कारण लोकप्रियता के मामले में भी बढ़ी है। यह बीजेपी को निचले स्तर पर 220-240 से अधिक सीटों वाली राष्ट्रीय पार्टी बनाता है, न कि 180 सीटों वाली। यह याद रखने योग्य है कि 2019 में, अधिकांश प्रमुख राज्यों सहित 16 राज्यों ने बीजेपी को 50% से अधिक लोकप्रिय वोट दिए थे। कुछ ने इसे 60% से भी अधिक वोट दिया था। इसमें गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश भी शामिल हैं। 50% से अधिक वाले लोगों में यूपी, दिल्ली, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सहयोगियों के साथ अंतिम दो राज्य थे। इसके अलावा झारखंड, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे मध्यम आकार के राज्य और त्रिपुरा, गोवा और अरुणाचल जैसे छोटे राज्य भी शामिल थे।

2019 और 2024 के बीच जो बदलाव आया है वह यह है कि कम से कम दो प्रमुख राज्य, महाराष्ट्र और बिहार, युद्ध के मैदान बन गए हैं। यहां सहयोगियों के साथ भी बीजेपी की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर है। इसके अलावा, तीन अन्य राज्यों, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तेलंगाना में, भाजपा पहले की तुलना में थोड़ी कमजोर दिख रही है। हालांकि कर्नाटक में बीजेपी अभी भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। अगर हम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार श्रेणियों में विभाजित करते हैं। वो कैटेगरी जिसमें बीजेपी को 75 से 100 प्रतिशत सीट मिल सकती है। वे कैटेगरी जहां उन्हें 50% से अधिक हिस्सेदारी मिल सकती है। इसके अलावा वे हैं जहां वो 20-25% सीट जीत सकती है। इसके अलावा वे प्रदेश जहां बीजेपी को कुछ भी नहीं मिल सकता है या बस एक या दो सीट जरूर मिल सकती है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड बीजेपी के लिए अधिक सीटें देने वाले राज्य रहे हैं। 2019 में बीजेपी ने इन राज्यों की कुल 239 में से 214 सीटें जीती थीं। बीजेपी यहां इस बार भी 200-207 के आसपास जीत सकती है। अगली श्रेणी के राज्यों, महाराष्ट्र, बिहार और असम हैं। यहां बीजेपी ने 102 सीटों में से 89 सीटें जीती थीं। इस बार यह संख्या 59 या उससे नीचे तक गिर सकती है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और गोवा के लिए कम सीट वाले राज्य हैं। यहां बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 2019 में 88 में से 34 सीटें जीतीं। इस बार यह संख्या गिरकर 32-28 हो सकती है।

विपक्ष के पास एक नेता, मोदी-विरोधी बयानबाजी से परे एक स्पष्ट आख्यान और अपने आंतरिक हितों के टकराव को दूर करने के लिए एक गेमप्लान की कमी है। किसी को आश्चर्य होता है कि द्रमुक को समय-समय पर हिंदी भाषियों या सनातन धर्म को क्यों चुनना पड़ता है, यह अच्छी तरह से जानते हुए कि इससे उसके सहयोगियों को मदद नहीं मिलती है। हाल ही में भारत की बैठक में नीतीश कुमार को हिंदी बोलने को मुद्दा क्यों बनाना चाहिए, जबकि तमिलनाडु में यह अच्छा नहीं हो रहा है। चुनाव जीतने के बाद आम आदमी पार्टी या वामपंथी या तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस के समान स्तर पर बने देखना भी मुश्किल है। इससे पता चलता है कि ज्यादातर सट्टेबाज मोदी के नेतृत्व में भाजपा की वापसी के अलावा किसी नतीजे की उम्मीद क्यों नहीं कर रहे हैं। लेकिन हाल ही में भाजपा और विपक्ष के बीच तीव्र कटुता को देखते हुए सुरक्षा उल्लंघन और विपक्षी सांसदों के निलंबन पर संसद में हंगामे पर विचार करें, और साथ ही मई 2024 के बाद की चुनौतियां जो जनगणना, महिला आरक्षण को लागू करने के मामले में सामने हैं। निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद, मोदी को खुद को एक अधिक सर्वसम्मत नेता के रूप में फिर से स्थापित करना होगा। 2019-24 में भी, मोदी का बहुमत कृषि सुधार नहीं कर सका या नागरिकता संशोधन अधिनियम लागू नहीं कर सका। हालांकि अनुच्छेद 370 को सफलतापूर्वक हटा दिया गया।

जानिए असम के उल्फा के इतिहास के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको असम के उल्फा के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं! असम का जिक्र हो और उल्फा का नाम ना लिया जाए ऐसा संभव नहीं है। यूनाइटेट लिब्रेरशन फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फा ऐसा शब्द है जो पूर्वोत्तर हिंसा का पर्याय बना रहा है। इस अलगवादी संगठन का अपना ही काला इतिहास है। इसका गठन अप्रैल 1979 में बांग्लादेश तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए बिना दस्तावेज वाले अप्रवासियों के खिलाफ आंदोलन के बाद हुआ था। फरवरी 2011 में यह दो समूहों में विभाजित हो गया। अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व वाले गुट ने हिंसा छोड़ दी। इसके साथ ही वे सरकार के साथ बिना शर्त बातचीत के लिए सहमत हो गए। दूसरे पुनर्ब्रांडेड उल्फा-स्वतंत्र गुट का नेतृत्व करने वाले परेश बरुआ बातचीत के खिलाफ हैं। 1990 में उल्फा ने चाय कंपनी के मालिक सुरेंद्र पॉल की हत्या कर दी। सुरेंद्र पाल, ब्रिटेन स्थित लॉर्ड स्वराज पॉल के भाई थे। तिनसुकिया जिले में उनकी हत्या एक कुख्यात मील का पत्थर थी। इसके कारण केंद्र ने उल्फा को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। केंद्र की तत्कालीन सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। उस समय उल्फा के खिलाफ सेना का ऑपरेशन बजरंग शुरू किया गया था। 1 जुलाई 1991 को उल्फा ने राज्य के विभिन्न हिस्सों से तत्कालीन यूएसएसआर के एक इंजीनियर सहित 14 लोगों का अपहरण कर लिया था। यह सेना के ऑपरेशन राइनो की शुरुआत का ट्रिगर था। अपहृत रूसी इंजीनियर सर्गेई ग्रेटचेंको का शव कभी नहीं मिला।

छह साल बाद, सामाजिक कार्यकर्ता संजय घोष का माजुली से अपहरण कर लिया गया और मान लिया गया कि उनकी हत्या कर दी गई। उसका शव भी नहीं मिला। उल्फा के सशस्त्र विद्रोह का सबसे चौंकाने वाला क्षण 2004 के स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान धेमाजी परेड मैदान में एक आईईडी विस्फोट में 13 स्कूली बच्चों की हत्या थी। वार्ता समर्थक गुट की तरफ से 2011 में बातचीत शुरू करने की इच्छा व्यक्त करने के बाद, संगठन ने इन हत्याओं के लिए माफी मांगी। जून, 1979: सदस्यों ने संगठन के नाम, प्रतीक, ध्वज और संविधान पर चर्चा करने के लिए मोरन में बैठक की। 1980: कांग्रेस के राजनीतिज्ञों, राज्य के बाहर के व्यापारिक घरानों, चाय बागानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, विशेषकर तेल और गैस क्षेत्र को निशाना बनाकर अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की। 1985-1990: प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व वाली असम गण परिषद अगप सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान असम में अशांति की स्थिति पैदा हो गई और उल्फा ने रूसी इंजीनियर सर्गेई को अगवा किये जाने सहित जबरन वसूली और हत्याओं की कई घटनाओं को अंजाम दिया।

28 नवंबर, 1990: उल्फा के खिलाफ सेना द्वारा ऑपरेशन ‘बजरंग’ शुरू किया गया। इस अभियान का नेतृत्व जीओसी 4 कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने किया, जो बाद में असम के राज्यपाल बने। 29 नवंबर, 1990: महंत के नेतृत्व वाली अगप सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया। नवंबर 1990: असम को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया और सशस्त्र बल विशेष शक्तियां कानून लागू किया गया। उल्फा को अलगाववादी और गैर-कानूनी संगठन घोषित किया गया।

31 जनवरी, 1991: ऑपरेशन ‘बजरंग’ बंद किया गया। जनवरी, 1991: तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने राज्यसभा को सूचित किया कि यदि उल्फा राजनीतिक वार्ता की इच्छा व्यक्त करता है तो केंद्र सरकार आवश्यक कदम उठाएगी।

उल्फा ने जवाब दिया कि जब तक सैन्य अभियान और राष्ट्रपति शासन जारी रहेगा, कोई बातचीत संभव नहीं है और असम की ‘संप्रभुता’ की उनकी मांग पर कोई समझौता नहीं होगा। जून, 1991: हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभाली। सितंबर, 1991: उल्फा के खिलाफ ऑपरेशन ‘राइनो’ शुरू किया गया। मार्च 1992: उल्फा दो गुटों में विभाजित हो गया और एक वर्ग ने आत्मसमर्पण कर दिया और खुद को आत्मसमर्पित उल्फा सल्फा के रूप में संगठित किया। 1996: अगप सत्ता में लौटी और प्रफुल्ल कुमार महंत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। जनवरी 1997: उल्फा के खिलाफ समन्वित रणनीति और संचालन के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सेना, राज्य पुलिस और अर्धसैन्य बलों से युक्त एकीकृत कमान का गठन किया गया। 1997-2000: कथित तौर पर सल्फा द्वारा उल्फा उग्रवादियों के परिवार के सदस्यों की हत्याएं की गई। 2001: तरूण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। दिसंबर 2003: पड़ोसी देश में उल्फा और अन्य पूर्वोत्तर उग्रवादियों के शिविरों को बंद करने के लिए रॉयल भूटान सेना द्वारा ‘ऑपरेशन ऑल क्लियर’ शुरू किया गया। 2004: उल्फा सरकार से बातचीत के लिए राजी हुआ। सितंबर 2005: उल्फा ने 11-सदस्यीय ‘पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप’ पीसीजी का गठन किया। प्रख्यात ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखिका इंदिरा मामोनी रायसोम गोस्वामी के नेतृत्व में केंद्र के साथ तीन दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई प्रगति नहीं हो पाई। जून, 2008: उल्फा की 28वीं बटालियन के नेताओं ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की। दिसंबर, 2009: अरबिंद राजखोवा सहित उल्फा के शीर्ष नेताओं को बांग्लादेश में गिरफ्तार किया गया, भारत निर्वासित किया गया और गुवाहाटी की जेल में बंद कर दिया गया। दिसंबर 2010: जेल में बंद उल्फा नेता ने सरकार से बातचीत का आग्रह करने के लिए ‘सिटीजन फोरम’ बनाया, जिसमें बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों और पेशेवरों को शामिल किया गया। 2011: राजखोवा और जेल में बंद अन्य नेता रिहा। उल्फा दो गुटों में विभाजित हो गया: राजखोवा के नेतृत्व वाला उल्फा समर्थक वार्ता और परेश बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा स्वतंत्र। उल्फा ने सरकार को 12-सूत्रीय मांगपत्र सौंपा।

आखिर विपक्ष के INDIA का पीएम चेहरा कैसे होगा निश्चित?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि विपक्ष के INDIA का पीएम चेहरा कैसे निश्चित होगा! राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एनसीपी के प्रमुख शरद पवार का कहना है कि विपक्ष को 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बहुत जोर देकर यह बात कही है। बड़ी बात है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को गठबंधन के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का प्रस्ताव रख चुके हैं। दिल्ली में 19 दिसंबर को विपक्षी गठबंधन की बैठक के दौरान दोनों मुख्यमंत्रियों ने यह प्रस्ताव रखा। लेकिन गठबंधन के किसी अन्य सहयोगी तो छोड़ दीजिए, खुद कांग्रेस ने ही खरगे के नाम का समर्थन नहीं किया। दरअसल, चुनावों में चेहरे का बड़ा प्रभाव होता है। ताकतवर चेहरे की तरफ मतदाता आसानी से आकर्षित हो जाता है। यही कारण है कि बीजेपी कई बार विधानसभा चुनावों में भी अपने मुख्यमंत्रियों की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर देती है। अभी हाल ही में संपन्न हुए पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनावों की बात करें तो बीजेपी ने यह फॉर्मुला अपनाया। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार का लंबा शासन रहा था। चौहान ही चुनावों के वक्त भी एमपी के सीएम थे, बावजूद इसके बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी विपक्ष में थी। राजस्थान में वसुंधरा राजे तो छत्तीसगढ़ में रमन सिंह बीजेपी के मुख्यमंत्री रह चुके थे, वो भी लंबे समय तक। लेकिन इन दोनों प्रदेशों में भी बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा। तेलंगाना और मिजोरम में भी बीजेपी की तरफ से कोई सीएम कैंडिडेट नहीं घोषित किया गया। हालांकि, इन दोनों प्रदेशों में बीजेपी का बहुत बड़ा स्टेक नहीं था। लेकिन एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की चाल कामयाब रही। पार्टी ने न केवल एमपी की सत्ता अपने पास बरकरार रखी बल्कि राजस्थान और काफी हैरतअंगेज तरीके से छत्तीसगढ़ की सत्ता भी कांग्रेस से छीन ली।

अब राजनीतिक विश्लेषणकर्ताओं और खुद कांग्रेस ने भी माना कि कम से कम मध्य प्रदेश में कमलनाथ का चेहरा बतौर सीएम आगे करना एक चूक थी। राजस्थान के पिछले विधानसभा चुनाव में तो नारे लगे थे- मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ आम जनता में कुछ इस हद तक नाराजगी थी। बावजूद इसके बीजेपी ने उन्हें सीएम कैंडिडेट बनाया और पार्टी हार गई। इस बार छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को कांग्रेस का मजबूत चेहरा माना जा रहा था, लेकिन जमीनी हालात कुछ और थे। फिर नतीजों ने सच्चाई सबके सामने ला दी। चूंकि बीजेपी ने इस बार रणनीति ही बना ली थी कि किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करना है तो उसने राजस्थान में भी चुनावों से पहले वसुंधरा की जगह कोई नया नाम सामने नहीं लाया। इस तरह पीएम मोदी ने बीजेपी की चुनावी नैया तीनों प्रदेशों में पार कर दी।

शरद पवार विपक्षी दलों के गठबंधन में वरिष्ठतम नेताओं की कतार से हैं। उन्होंने पुणे में बोलते हुए इतिहास का हवाला दिया। पवार ने कहा, ‘मोर्चा इंडिया बिना प्रधानमंत्री के चुनाव में जा सकता है। 1977 में ऐसा ही हुआ था जब मोरारजी देसाई चुनाव से पहले कहीं नहीं थे और विपक्ष बिना प्रधानमंत्री चेहरा चुनाव लड़ा था। आम चुनाव के बाद एक नया दल बनाया गया और वह प्रधानमंत्री बने।’ उन्होंने कहा कि लोग विपक्ष के पास प्रधानमंत्री उम्मीदवार हो या न हो, अपना चुनाव करेंगे, खासकर अगर उन्होंने बदलाव का फैसला कर लिया है। जेडीयू सांसद केसी त्यागी ने इस विषय पर एक लेख भी लिखा है। बहरहाल, पवार की इस बात में बहुत हद तक दम है। अगर जनता किसी सरकार से ऊब जाती है तो वह उसका तख्ता पलट कर ही देती है, जैसा कि पिछली बार वसुंधरा के खिलाफ ऐलान करके बीजेपी को सत्ता से हटाया था। 2014 में केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ भी कुछ ऐसा ही माहौल बना था जब जन-जन में मनमोहन सिंह के नेृत्व वाले शासन को उखाड़ फेंकने की भावना गहरा गई थी। तो सवाल है कि क्या मौजूदा मोदी सरकार के खिलाफ भी ऐसा ही माहौल है?

इस सवाल का जवाब भी शरद पवार के बयान में ढूंढा जा सकता है। वो जिस तरह कह रहे हैं कि जनता ने अगर बदलाव का फैसला किया तो चुनाव में वह अपना निर्णय सुना ही देगी। इस बयान में पवार का विश्वास कहीं से नहीं झलक रहा कि जनता ने बदलाव का मन बना लिया है। यही वजह है कि वो इंडिया गठबंधन की तरफ से कोई चेहरा नहीं देना चाहते। मुश्किल यह भी है कि विपक्ष के पास मोदी के टक्कर का कोई चेहरा है भी नहीं। दूसरी मुश्किल यह है कि विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार भी हैं। राजनीति के मंझे खिलाड़ी पवार ने इन दोनों परेशानियों के मद्देनजर ही सुझाव दिया कि विपक्षी गठबंधन को पीएम का कोई चेहरा नहीं देना चाहिए। इससे गठबंधन में संभावित फूट को रोका जा सकेगा तो मतदाताओं को भी इस उलझन में रखा जा सकेगा कि चुनावों में जीत के बाद विपक्ष पीएम का शायद कोई असरदार चेहरा ढूंढ ले।

इसमें कोई शक नहीं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों या प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ही ले लीजिए, ये सभी मन ही मन में खुद को पीएम मैटिरियल ही मानते हैं। नीतीश कुमार के लिए तो उनकी पार्टी जेडीयू के कई नेता समय-समय पर बैटिंग करते ही रहते हैं। हालांकि, ममता और केजरीवाल की तरफ से कांग्रेस अध्यक्ष खरगे का नाम आगे किए जाने को लेकर पूछे गए सवाल पर नीतीश ने मीडिया के सामने अपनी उम्मीदवारी को नकार दिया। वो पहले भी ऐसा करते आए हैं, लेकिन हकीकत तो सबको पता है। जीवन का 83वां वसंत देख चुके शरद पवार राजनीति की भाषा समझने में जबर्दस्त माहिर हैं। वो जानते हैं कि खरगे हों या नीतीश या फिर ममता-केजरीवा, किसी में इतना दम नहीं कि वो मोदी के खिलाफ विपक्ष के लिए वोट जुटा लें। विपक्ष के एक बड़े चेहरे राहुल गांधी की तो ऐसी हालत है कि कांग्रेस उनका नाम आगे करने से भी कतराती है क्योंकि उसे डर है कि ऐसा करते ही कई दल गठबंधन से तौबा कर सकते हैं।

क्या प्रियंका की जगह प्रभावी बन पाएंगे अविनाश पांडे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अविनाश पांडे प्रियंका की जगह प्रभावी बन पाएंगे या नहीं! उत्तर प्रदेश कांग्रेस कुछ वर्षों के अंतराल में बड़े बदलावाें के दौर से गुजरती रही है। इसी क्रम में ताजा बदलाव प्रियंका गांधी की जगह अविनाश पांडेय को यूपी प्रभारी बनाए जाने से शुरू हुआ है। इससे पहले पार्टी ने अपने पुराने अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान सौंपी थी। माना जा रहा है कि बदलाव का ये सिलसिला अभी और आगे बढ़ेगा और संगठन में इसका असर देखने को मिलेगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि यूपी में कांग्रेस को क्या इससे कुछ फर्क पड़ेगा? जो काम प्रियंका गांधी न कर सकीं, अविनाश पांडेय कर पाएंगे? याद कीजिए 2018 आते-आते प्रियंका गांधी तेजी से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने लगी थीं। इससे पहले तक वह रायबरेली और अमेठी में ही सक्रिय रहती थीं। 2019 की शुरुआत में पार्टी नेतृत्व ने प्रियंका गांधी और ज्याेतिरादित्य सिंधिया को यूपी प्रभार सौंप दिया। ज्योतिरादित्य यूपी में न के बराबर ही आए और बाद में वह भाजपा में चले गए। इसके बाद प्रियंका गांधी को ही पूरे यूपी का प्रभारी बना दिया गया। प्रियंका लखनऊ में कैंप करने लगीं। उन्होंने सोनभद्र के उम्भा कांड के पीड़ितों के लिए धरना प्रदर्शन किया। लखीमपुर खीरी कांड के विरोध में प्रदर्शन, नजरबंदी झेली।प्रियंका गांधी ने आंदोलन के आक्रामक रुख से पार्टी में जान फूंकने की कोशिश की। वह योगी सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर मोर्चा लेती रहीं। यूपी में अजय कुमार लल्लू का प्रदेश अध्यक्ष पर चयन को भी प्रियंका की ही पसंद माना गया। लखनऊ में आए दिन कांग्रेस के धरना प्रदर्शन की खबरें आने लगीं।

इसके बाद प्रियंका गांधी ने 2022 विधानसभा चुनाव में ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ कांग्रेस प्रत्याशियों को मैदान में उतारा। महिलाओं के मुद्दे पर प्रियंका ने बड़ी लकीर खींचते हुए 155 टिकट महिलाओं को दिए। ये बड़ी छलांग थी क्योंकि पिछले 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 12 महिलाओं को टिकट दिया था। लेकिन प्रियंका का ये प्रयोग पूरी तरह फेल साबित हुआ और पार्टी से सिर्फ आराधना मिश्रा मोना ही अकेली महिला विधायक जीतीं। वह लगातार जीतती रही हैं। 2017 में अराधना मिश्रा के साथ अदिति सिंह ने भी कांग्रेस से जीत दर्ज की थी लेकिन अब अदिति भाजपाई हो चुकी हैं।

बहरहाल, यूपी में कुल 2 सीटों पर जीत के निराशाजनक प्रदर्शन का असर ये हुआ कि गांधी परिवार पर यूपी की सियासत को लेकर निराशा साफ दिखने लगी। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में इसकी साफ झलक मिली, जब दक्षिण से उत्तर तक पैदल यात्रा कर रहे राहुल गांधी यूपी के कुछ बॉर्डर जिलों से ही गुजरे। हाल ही में कांग्रेस की बैठक में यूपी के नेताओं से राहुल गांधी ने ये तक कह दिया कि यूपी के नेताओं में उत्साह की कमी है। यहां तीन ऐसे नेता नहीं हैं, जो मुख्यमंत्री बनना चाहते हों और उसके लिए कुछ भी करने का माद्दा रखते हों। फिर इस बैठक के बाद पार्टी हाईकमान की तरफ से ताजा फरमान आया और प्रियंका गांधी की जगह अविनाश पांडेय को यूपी प्रभारी बना दिया गया।

अपनी नियुक्ति के बाद अविनाश पांडे ने एक्स पर लिखा कि मुझ पर दिखाए गए विश्वास के लिए असीम कृतज्ञता के साथ कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, हमारे नेता राहुल गांधी जी, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल जी और उस विश्वास का सम्मान करने के दृढ़ संकल्प के साथ, मैं विनम्रतापूर्वक उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव के रूप में नियुक्ति स्वीकार करता हूं। नागपुर के रहने वाले अविनाश पांडे पेशे से वकील हैं। उन्होंने पार्टी की छात्रा शाखा से अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत की। 2008 में वह राज्यसभा चुनाव लड़े लेकिन एक वोट से हार गए। इसके बाद 2010 में उन्हें महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद चुनाव गया। अविनाश पांडे को राहुल गांधी कैंप का माना जाता है। अविनाश पांडे तीन साल पहले 2020 में राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रही कुर्सी की जंग के दौरान चर्चा में आए थे। दरअसल उस साल जुलाई में सचिन पायलट और उनके समर्थकों ने बगावत कर दी थी। बाद में प्रियंका गांधी ने दखल दी और दोनों में सुलह हुई, जिसके बाद मामला शांत हुआ। इसके बावजूद गहलोत सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करना पड़ा।

इस पूरे मामले में आखिरकार तत्कालीन राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडेय पर गाज गिरी थी। उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने 16 अगस्त 2020 में प्रदेश प्रभारी पद से हटा दिया गया। दरअसल अविनाश पांडे पर पायलट कैंप की तरफ से आरोप लगा था कि वह गहलोत गुट का समर्थन कर रहे हैं। पायलट गुट का कहना था कि अगर अविनाश पांडे उनकी बात कांग्रेस आलाकमान तक पहुंचा देते तो बगावत की नौबत नहीं आती। फिर जनवरी, 2022 में आखिरकार उनकी वापसी हुई और वह झारखंड के प्रभारी महासचिव नियुक्त किए गए।

वैसे उत्तर प्रदेश से अविनाश पांडे अनभिज्ञ नहीं हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मधुसूदन मिस्त्री जब यूपी प्रभारी हुआ करते थे तो उनके साथ वह सह प्रभारी थे। जाहिर है उत्तर प्रदेश की सियासत से वह अच्छी तरह वाकिफ हैं। लेकिन उनके सामने एक ऐसे संगठन को दोबारा खड़ा करने की चुनौती है, जो तमाम प्रयोगों, ओवरहालिंग के बाद भी प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर ही है। कई जगह स्थिति ये है कि पार्टी को प्रत्याशी तक नहीं मिल पाते। जमीनी स्तर पर संगठन कार्यकर्ताओं के मामले में कई जगह क्षेत्रीय दलों से भी पीछे है। अब लोकसभा चुनाव 2024 करीब है, ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ इंडिया गठबंधन का तालमेल भी उनके सामने बड़ी चुनौती होगा। यही नहीं राम मंदिर के माहौल में भाजपा की विकासवादी हिंदुत्व रणनीति की काट भी तलाशनी होगी। वैसे राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें यूपी से तीन नेता ऐसा नहीं मिलते, जिनका सीएम बनने का सपना हो और वह कुछ भी करने का माद्दा रखते हों। जाहिर है अविनाश पर ऐसे नेताओं को ढूंढ़ने का बड़ा दारोमदार है।

भारतीय न्याय सिस्टम के बारे में क्या बोले जस्टिस संजय किशन कौल?

हाल ही में जस्टिस संजय किशन कौल ने भारतीय न्याय सिस्टम पर एक बयान दिया है! जस्टिस संजय किशन कौल ने रिटायर होने के बाद संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों के चयन के लिए कॉलेजियम सिस्टम को सबसे अच्छा तरीका नहीं बताया। हालांकि, उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कॉलेजियम का हिस्सा रहते हुए कई नामों को आगे बढ़ाया था। शायद यही वजह है कि रिटायरमेंट के बाद व्यक्त उनके विचार पर किसी को हैरानी नहीं हुई। न्यायपालिका के सूत्रों का कहना है कि उनके मोहभंग का कारण शायद जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में एक वकील की नियुक्ति, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक जज को सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन और दिल्ली हाईकोर्ट के सबसे सीनियर जज की जगह सुप्रीम कोर्ट के जज या किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में नियुक्ति नहीं कर पाना हो सकता है। इन प्रस्तावों को कॉलेजियम के अन्य सभी सदस्यों के विरोध का सामना करना पड़ा था। विवाद से बचने के लिए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) 6 नवंबर के बाद से रणनीतिक रूप से कॉलेजियम की बैठकें आयोजित करने से बचते रहे। 6 नवंबर को सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति के लिए तीन नामों की सिफारिश की थी। जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस कौल भी कॉलेजियम मेंबर के रूप में तीनों नामों का चयन करने में शामिल थे।

जस्टिस एनवी रमण के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में आने वाले जस्टिस कौल को उम्मीदवारों के चयन के बारे में मजबूत राय रखने वाला व्यक्ति माना जाता था। वह चाहते थे कि जिन उम्मीदवारों का नाम वो सुझाते हैं और उनके नामों की सिफारिश करने के लिए जोर देते हैं, उन्हें ही नियुक्त किया जाए, भले ही कॉलेजियम के अन्य सदस्यों को आपत्ति हो। इस तरह के उम्मीदवारों को प्रशासनिक पक्ष पर जज के रूप में आगे बढ़ाने में सफल होने के बाद उन्होंने न्यायिक पक्ष पर कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से केंद्र सरकार को उन्हें जल्द से जल्द हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्त करने के लिए प्रेरित, बल्कि यह कहना उचित होगा कि मजबूर करते थे। वो रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले तक कई हाईकोर्ट जजों के ट्रांसफर प्रपोजल्स को भी आगे बढ़ाने में सफलता प्राप्त की थी।

जस्टिस कौल हाई कोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के नामों पर सहमति के लिए सीजेआई के नेतृत्व वाले कॉलेजियम और सरकार के बीच ‘गुप्त’ या ‘पिछले दरवाजे’ से बातचीत के खिलाफ थे। इस कारण कई मामलों में शासन के दो अंगों के बीच खींचतान हुई। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके बजाय कॉलेजियम की सिफारिशों के खिलाफ सरकार की तरफ से उठाई गई आपत्तियों पर दोनों के बीच पारदर्शी बातचीत होनी चाहिए। पारदर्शी संवाद’ के रास्ते से विशेष सिफारिशों के खिलाफ सरकार के आरोपों और आपत्तियों की प्रकृति उजागर हो सकती है। लेकिन जजों के रूप में नियुक्ति के लिए विचार किए जा रहे व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और गरिमा की रक्षा के लिए इस रास्ते से जानबूझकर तौबा कर लिया गया है। किसी व्यक्ति के खिलाफ सरकार की असत्यापित आपत्तियों को सार्वजनिक करना, चाहे वह वकील हो या न्यायिक अधिकारी, उनकी पेशेवर गतिविधि को खतरे में डाल सकता है, भले ही उन्हें अनुशंसित पद के लिए नियुक्त नहीं किया गया हो।

ऐसे उदाहरण हैं जहां सरकार ने कुछ मुद्दों को रेखांकित करते हुए कॉलेजियम को पुनर्विचार के लिए नाम वापस भेजे हैं। ऐसे अवसरों पर सीजेआई ने संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से पूछताछ करने के लिए कहा है। दूसरी जांच के निष्कर्षों ने सीजेआई को सरकार के साथ मामले को नए सिरे से उठाने में मदद की और ज्यादातर मामलों में सीजेआई नियुक्ति कराने में सफल रहे। सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने कहा कि अगर इन बातचीत को गोपनीय नहीं रखा जाता तो वे कई हाई कोर्ट जजों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते, जिनकी नियुक्तियों पर शुरू में सरकार ने आपत्ति जताई थी।

साथ ही, सीजेआई के नेतृत्व वाला कॉलेजियम कार्यपालिका की अप्रमाणित और आधारहीन आपत्तियों को स्वीकार नहीं करने पर अडिग रहा है और सरकार की तरफ से इन्हें वापस किए जाने के बाद भी उन्हीं नामों को दृढ़ता से दोहराया है। कॉलेजियम के सदस्यों ने सर्वसम्मति से कहा कि संवैधानिक अदालतों के जजों के चयन के लिए कॉलेजियम सिस्टम सबसे उपयुक्त है या नहीं, यह संसद को तय करना है और अगर इसे चुनौती दी जाती है तो सुप्रीम कोर्ट को कानून की वैधता का परीक्षण करना है। सुप्रीम कोर्ट के सूत्र भी अचानक न्यायिक नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम सिस्टम को लेकर गलत धारणा फैलाने की कोशिश से उलझन में दिख रहे थे।

क्या सत्ता पक्ष की काट ढूंढ पाएगी विपक्ष?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विपक्ष सत्ता पक्ष की काट ढूंढ पाएगी या नहीं! लोकसभा चुनाव के लिए अभी से माहौल बन चुका है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. सीट शेयरिंग का पेच सुलझाना तो दूर अभी उस पर चर्चा तक नहीं शुरू कर पाया है। दूसरी तरफ, बीजेपी ने ‘फिर आएगा मोदी’ का हुंकार भर दिया है। पार्टी ने 2024 लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन सॉन्ग लॉन्च किया है जिसमें मोदी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा है। उससे पहले ही देशभर में राममंदिर को लेकर एक अलग ही जोश का माहौल है और बीजेपी उसे भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में लगातार तीसरी बार आने के लक्ष्य से उतरेंगे। लक्ष्य बड़ा है क्योंकि अबतक ये करिश्मा सिर्फ पंडित जवाहर लाल नेहरू ही कर पाए हैं। बीजेपी ने ‘फिर आएगा मोदी’ कैंपेन सॉन्ग के जरिए अभी से 2024 के लोकसभा चुनाव का अजेंडा सेट कर दिया है। पार्टी का पूरा फोकस प्रो-इन्कंबेंसी फैक्टर पर है। हसरत अपनी उपलब्धियों की बदौलत केंद्र की सत्ता में हैट्रिक लगाने की है। वीडियो सॉन्ग में बीजेपी ने मोदी सरकार की 2014 से अबतक की उपलब्धियों का बखान किया है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर बने माहौल को बीजेपी जमकर भुना रही है। 30 दिसंबर को पीएम मोदी अयोध्या में महर्षि बाल्मीकि इंटरनैशल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करने वाले हैं। 22 जनवरी को रामलला की मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रधानमंत्री मुख्य यजमान होंगे। इस मौके पर वह भाषण भी देंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बन रहे राम मंदिर का सेहरा भी बीजेपी के ही सिर बैठ रहा है। समारोह के लिए मिले न्योता को ठुकराकर विपक्ष उसका ही काम आसान कर रहा है। हालांकि, सोनिया गांधी ने न्योता स्वीकार कर लिया है। राम मंदिर के अलावा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल कॉरिडोर निर्माण जैसे कदमों से पार्टी अपने हिंदुत्व अजेंडे को और धार दे रही है।

प्रो-इन्कंबेंसी फैक्टर पर बीजेपी को यूं ही भरोसा नहीं है। मोदी सरकार की उपलब्धियों की झोली भी भरी पड़ी है। पीएम मोदी की अगुआई में सरकार ने कुछ ऐसे काम किए हैं जिनके बारे में कल्पना करना तक मुश्किल था। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करना वैसी ही उपलब्धि है। एक बार में तीन तलाक बोलकर किसी महिला से एकतरफा शादी खत्म करने की कुप्रथा तलाक-ए-बिद्दत को खत्म करना, डिजिटल पेमेंट क्रांति भी वैसी ही उपलब्धि है। बीजेपी ने अपने कैंपेन सॉन्ग में इन सभी उपलब्धियों का जिक्र किया है। बात चाहे अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बुलंद होते भारत की बुलंद तस्वीर की हो या वैश्विक मंचों पर देश की बढ़ती धाक की, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर शानदार ट्रैक रिकॉर्ड हो या आतंकवाद के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक जैसे साहसिक कदम, पार्टी ने इन सबको मोदी सरकार की उपलब्धि के तौर पर शोकेस किया है।

10 मिनट के वीडियो में पार्टी ने पिछले 10 साल में जिन वादों को पूरा किया गया है, उनको जिक्र किया है जिसमें राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 का खात्मा, तीन तलाक पर बैन, सड़कों के जाल, नए-नए एयरपोर्ट के निर्माण, रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्चर समेत बुनियादी विकास की परियोजनाएं शामिल हैं। इनके अलावा उज्जवला योजना, हर घर नल से जल, जनधन योजना, किसान सम्मान निधि, मुफ्त राशन योजना, पीएम आवास योजना, 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज से जुड़ी आयुष्मान भारत जैसी जनकल्याण की योजनाओं से बीजेपी को इस बार भी उम्मीद है। कोरोना महामारी से निपटने के लिए देसी वैक्सीन, देश के आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरने, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से बढ़ते कदम, आतंकवाद के खिलाफ निर्याण जंग, चंद्रयान जैसी वैज्ञानिक उपलब्धियों और जी-20 के सफल आयोजन को भी बीजेपी 2024 में भुनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। कैंपेन सॉन्ग में बीजेपी ने पीएम मोदी को 140 करोड़ भारतीयों की आशाओं के प्रतीक के तौर पर पेश किया है।

हाल ही में हिंदी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को मिली जबरदस्त जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह है। पार्टी के रणनीतिकारों को 2024 लोकसभा चुनाव में और भी बड़े अंतर से जीत हासिल करने का भरोसा जगा है। इन चुनावों में बीजेपी बिना किसी सीएम फेस के उतरी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा। तीनों राज्यों में बीजेपी ने नए चेहरों को सरकार की कमान देकर चौंकाया है। लोकसभा चुनाव में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने आप में एक बड़े फैक्टर होंगे और बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी फैक्टर निर्णायक साबित होगा। हाल में दिल्ली में हुए बीजेपी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक में पार्टी ने 50 प्रतिशत वोट शेयर का लक्ष्य रखा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 37.4 प्रतिशत वोट मिले थे।

पीएम मोदी की हैटट्रिक को रोकने के लिए विपक्ष एकजुटता के मंत्र पर भरोसा कर रहा है। बीजेपी के खिलाफ ज्यादातर सीटों पर विपक्ष की तरफ से साझा उम्मीदवार उतारने की रणनीति के तहत 28 दलों ने I.N.D.I.A. नाम से गठबंधन भी बना लिया है लेकिन वह जमीन पर अभी छाप छोड़ने में नाकाम रहा है। जुलाई में ही गठबंधन की बुनियाद पड़ गई लेकिन 5 महीने बाद अबतक गठबंधन की एक भी साझा रैली नहीं हो सकी है। सबसे बड़ा पेच विपक्ष की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार और सीट शेयरिंग को लेकर है। सीट शेयरिंग पर तो अभी चर्चा तक नहीं शुरू हो पाई है। पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, दिल्ली जैसे राज्यों में सीट शेयरिंग बहुत ही पेचीदा है। महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है। विपक्षी नेताओं के खिलाफ एजेंसियों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा भी विपक्ष उठा रहा है। इसके अलावा जातिगत जनगणना की मांग को भी विपक्षी दल धार दे रहे हैं। हालांकि, हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों से दिखता है कि विपक्ष का कास्ट सेंसस दांव फेल रहा है।

आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे मायावती के भतीजे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि मायावती के भतीजे आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे! लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बहुजन समाज पार्टी नई रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी में उत्तराधिकार पर फैसला हो चुका है और अब मायावती के बाद आकाश आनंद नए सर्वेसर्वा बन चुके हैं। नई रणनीति के तहत फैसला किया गया है कि पार्टी के जो प्रमुख चेहरे हैं, वह सभी लोकसभा चुनाव में मैदान में उतरें। इसी क्रम में आकाश आनंद के लिए भी सेफ सीट की तलाश की जा रही है। मोटे तौर पर तीन सीटों पर चर्चाएं शुरू हुई हैं। एक अम्बेडकरनगर की सीट है, जहां से मायावती जीतती रही हैं। वहीं इसके अलावा सहारनपुर और बिजनौर लोकसभा सीट को लेकर भी चर्चाएं हैं। आकाश आनंद के लिए तीन सीटों पर सबसे ज्यादा चर्चाएं हैं। पहली बिजनौर सीट है। यहां दलित, मुस्लिम वोटबैंक निर्णायक भूमिका निभाता र हा है ऐसे में बसपा के लिए ये गठजोड़ पार्टी की राहें आसान कर सकता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के गठबंधन हुआ था और इस सीट पर बसपा के मलूक नागर ने जीत दर्ज की थी। ये बसपा ही नहीं यूपी के सबसे अमीर सांसद माने जाते हैं। हालांकि मलूक नागर ने 2014 में भी इस सीट से चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली थी। इस सीट की खास बात ये है कि 34 साल पहले 1989 में मायावती ने यहीं से लोकसभा चुनाव में पहली जीत का स्वाद चखा था। उत्तराधिकारी के तौर पर आकाश आनंद के लिए ये सीट इसी लिए ज्यादा मुफीद मानी जा रही है।

बिजनौर लोकसभा सीट पर मुस्लिम वोटर ही यहां के प्रत्याशी का भविष्य तय करते आए है। इस सीट पर मुस्लिम मतदाता 45 प्रतिशत हैं। एससी वोटर करीब 22 फीसदी हैं। इस सीट पर पांच बार कांग्रेस तो तीन बार भाजपा ने जीत दर्ज की। इसी तरह बसपा के साथ रालोद भी यहां से दो बार जीती। सपा यहां से एक बार जीत पाई है। वैसे बसपा के लिए इस बार राहें इतनी आसान भी नहीं रहने वाली क्योंकि समाजवादी पार्टी भी यहां अपनी रणनीति पर काम कर रही है। 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा ने बिजनौर लोकसभा क्षेत्र में आने वाली पांच में से चार विधानसभा सीटें अपने नाम की थीं।

दूसरी सीट है सहारनपुर। यहां से हाल ही में बसपा ने अपने सिटिंग सांसद हाजी फजलुर्रमान का टिकट काट दिया है। पार्टी ने यहां से 2017 विधानसभा चुनाव में देवबंद से बसपा प्रत्याशी माजिद अली को लोकसभा प्रभारी घोषित किया गया है। खास बात ये है कि इस सीट पर पहले दावेदारी इमरान मसूद की मानी जा रही थी लेकिन बसपा उन्हें निष्कासित कर चुकी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार फजलुर्रहमान पर जो कार्रवाई हुई, उसमें उनकी सपा प्रमुख अखिलेश यादव से बढ़ती नजदीकी काे कारण माना गया। यहां से आकाश आनंद को उतारकर पार्टी अपनी रणनीति पर आगे बढ़ सकती है। लेकिन बसपा के सामने समाजवादी पार्टी की भी तगड़ी चुनौती रहेगी।

मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर 6 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। इनके अलावा 3 लाख एससी, डेढ़ लाख गुर्जर और साढ़े 3 लाख के करीब सवर्ण जातियां हैं। पिछले कुछ चुनावों पर गौर करें तो यूपी में समाजवादी पार्टी को कई जगह एकमुश्त मुस्लिम वोट मिलते दिख रहे हैं। ये सीट बसपा ने 2019 में जरूर जीती थी लेकिन उस समय सपा और बसपा का गठबंधन था। दूसरी तरफ भाजपा भी इस सीट पर कमजोर नहीं मानी जाती। फजलुर्रहमान करीब 20 हजार वोट से ही भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा को हरा पाए थे। तीसरी सीट अंबेडकरनगर है। पहले ये अकबरपुर नाम से जानी जाती थी। मायावती ने तीन बार इस सीट से चुनाव जीता। उन्होंने 1998, 1999 और 2004 में अकबरपुर से जीत दर्ज की और दिल्ली पहुंची। बाद में 2009 में भी यहां से बसपा ही जीती। लेकिन 2014 के बाद से बसपा यहां लगातार हार रही है। पूर्वांचल की ये सीट मायावती के दिल के करीब मानी जाती है। चुनावी राजनीति से दूरी बना चुकीं मायावती ने अंबेडकरनगर में एक रैली के दौरान कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो वह अंबेडकरनगर से ही चुनाव लड़ेंगीं। दिल्ली का रास्ता तो यहीं से जाता है। बता दें 1995 में मायावती ने ही फैजाबाद से अलग कर अंबेडकर नगर जिले की स्थापना की थी। अंबेडकरनगर में 25 फीसदी आबादी अनुसूचित की मानी जाती है। यहां 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।

यहां पांडे परिवार का भी अपना रसूख है। 2019 के लोकसभा चुनाव में रितेश पांडे बसपा से जीते थे। उनके पिता राकेश पांडे भी यहां से एक बार सांसद रह चुके हैं। लेकिन 2022 में वह बसपा छोड़ सपा में चले गए और इस समय राकेश पांडे जलालपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। पिता ने पार्टी छोड़ी तो खामियाजा बेटे को भुगतना पड़ा था और रितेश पांडे को बसपा के संसदीय दल नेता के पद से हाथा धोना पड़ा। उधर सपा भी यहां कमजोर नहीं है। कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे लालजी वर्मा और राम अचल राजभर आज अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में शुमार हैं। बेंगलुरू में इंडिया गठबंधन की बैठक में भी दोनों नेता दिखाई दिए थे।

एक तरफ तो आकाश आनंद के चुनाव लड़ने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी तरफ बसपा के सामने अपने ही सांसदों को बचाए रखने की चुनौती है। मायावती ने साफ ऐलान कर दिया है कि बसपा किसी गठबंधन में शामिल नहीं है। पिछले कुछ चुनावों को देखें तो उत्तर प्रदेश में बसपा की हालत काफी खराब है। 2019 लोकसभा चुनावों में भले ही उसने 10 सीटें जीती थीं लेकिन इस में भी सपा से गठजोड़ काे ज्यादा श्रेय मिला। क्योंकि 2014 में बसपा अकेले लड़ी और एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इसी तरह 2022 के विधानसभा चुनावों में भी अकेले लड़ने वाली बसपा के हाथ सिर्फ एक सीट ही लगी थी।

जाहिर है पार्टी की स्थिति को लेकर संशय के बादल गहराए हैं और कई नेता विरोधी पार्टियों के संपर्क में हैं। इनमें अमरोहा के सांसद दानिश अली भी कांग्रेस के ज्यादा करीब दिख रहे हैं। उन्हें इसी महीने 9 दिसंबर को मायावती निलंबित भी कर चुकी हैं। फजलुर्रहमान का टिकट काटा जा चुका है। अगर आकाश आनंद के लिए बिजनौर सीट का चयन होता है तो मलूक नागर को कहां एडजस्ट किया जाएगा? ये भी बड़ा सवाल है। इसी तरह अंबेडकरनगर के सांसद रितेश पांडे अपने पिता के सपा में चले जाने के कारण दुविधा में हैं। सवाल ये है कि क्या पार्टी उन्हें दोबारा टिकट देगी? इसी तरह लालगंज से सांसद संगीता आजाद और जाैनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव पर भी संशय के बादल गहराए हुए हैं।

क्या अब अयोध्या का लगातार हो रहा है विकास?

अब अयोध्या का लगातार विकास होता जा रहा है!उत्तर प्रदेश के राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा इन दिनों परवान पर है। 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्य यमजमान बनेंगे। इस दिन प्रभु रामलला को उनके मंदिर में विराजमान किया जाएगा। इसकी तैयारी जोड़ों पर है। हालांकि, इससे पहले अयोध्या में एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। इसे 22 जनवरी के रिहर्सल के तौर पर देखा जा रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या पहुंच रहे हैं। वह विकास योजनाओं की सौगात देंगे। अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट और वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी के हाथों से होगा। वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेनों को पीएम मोदी इस कार्यक्रम से हरी झंडी दिखाएंगे। इस कार्यक्रम से पहले दोनों नवनिर्मित स्थलों के नाम सामने आए हैं। अयोध्या एयरपोर्ट का नाम महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं, अयोध्या स्टेशन को अब अयोध्या धाम स्टेशन के नाम से जाना जाएगा। अयोध्या एयरपोर्ट के नाम को लेकर राजनीति की चर्चा होने लगी है। उत्तर प्रदेश के राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा इन दिनों परवान पर है। 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्य यमजमान बनेंगे। इस दिन प्रभु रामलला को उनके मंदिर में विराजमान किया जाएगा। इसकी तैयारी जोड़ों पर है। हालांकि, इससे पहले अयोध्या में एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। इसे 22 जनवरी के रिहर्सल के तौर पर देखा जा रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या पहुंच रहे हैं। वह विकास योजनाओं की सौगात देंगे। अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट और वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी के हाथों से होगा। वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेनों को पीएम मोदी इस कार्यक्रम से हरी झंडी दिखाएंगे। इस कार्यक्रम से पहले दोनों नवनिर्मित स्थलों के नाम सामने आए हैं। अयोध्या एयरपोर्ट का नाम महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं, अयोध्या स्टेशन को अब अयोध्या धाम स्टेशन के नाम से जाना जाएगा। अयोध्या एयरपोर्ट के नाम को लेकर राजनीति की चर्चा होने लगी है।

एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वाल्मीकि समाज की जनसंख्या करीब 2 करोड़ 19 लाख बताई जाती है। इसके अलावा देश के तमाम राज्यों में यह वर्ग बड़ी तादाद में रहता है। सनातन धर्म को मानने वाला दलित समाज का यह वर्ग राजनीतिक रूप से अन्य नेताओं पर निर्भर रहा है। मतलब राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ग की राजनीतिक आकांक्षाएं दबी रही हैं। यूपी में दलित समाज की राजनीति करने वाली मायावती हों या फिर बिहार में रामविलास पासवान, यह वर्ग इनसे जुड़ा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पिछले दिनों राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अपमान के मामले में अलग ही बयान दिया था। दरअसल, उप राष्ट्रपति के बयान को जाट समाज और ओबीसी तबके के अपमान से जोड़ा गया। इस पर खरगे ने कहा कि मैं दलित समाज से आता हूं, इसलिए भाजपा मुझे सदन में बोलने नहीं दे रही है।

मल्लिकार्जुन खरगे के बयान से साफ हुआ कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में उनके दलित समाज के होने को मुद्दा बना सकती है। पिछले दिनों I.N.D.I.A. की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष को लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व देने की चर्चा हुई। इस मसले के बाद अब अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नामकरण का मुद्दा सामने आया है। यह एक बड़े वर्ग को साधने और कांग्रेस के संभावित दलित पॉलिटिक्स के जवाब के रूप में देखी जा रही है। लोकसभा चुनाव से पहले महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के जरिए इस वर्ग की चर्चा शुरू हो गई है। पीएम नरेंद्र मोदी इस वर्ग को साधते दिख रहे हैं। पहली बार वाल्मीकि समाज को अलग रूप में पहचान देने की कोशिश की जा रही है। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। इससे दलित समाज का एक बड़ा वर्ग भारतीय जनता पार्टी से अपना जुड़ाव महसूस कर सकेगा। वहीं, दलित को सनातन विरोधी साबित करने की ओर में जुटे स्वामी प्रसाद मौर्य से लेकर चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं को भी इसे करारा जवाब दिया जा सकेगा।

दलित समाज के अंग के रूप में वाल्मीकि वर्ग की पहचान है। इस समाज का मुख्य कार्य साफ- सफाई होता है। इस जाति वर्ग में नायक, बेडार, बेडा, बोया, भंगी, महादेव कोली, मेहतर, नाइक आदि के रूप में इनकी पहचान है। देश के अलग- अलग राज्यों में इस जातिवर्ग को अलग- अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण भारत में वाल्मीकि समाज को क्षत्रिय और योद्धा जाति के रूप में पहचाना जाता है। महर्षि वाल्मीकि से यह वर्ग खुद को जोड़ता रहा है।

महर्षि वाल्मीकि नाम को चर्चा में लाकर भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है। पहले अयोध्या एयरपोर्ट को श्रीराम इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम से संबोधित किया जा रहा था। अब इसके नाम में बदलाव को अब चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। साफ है कि एयरपोर्ट के नाम पर राजनीति गरमाएगी। हालांकि, कोई इसका विरोध नहीं करेगा। विपक्षी दलों की ओर से इस मामले में भाजपा पर राजनीति करने का आरोप लगाए जाने को लेकर विशेष लगातार हमले किए जा रहे हैं। विरोघ की राजनीति विपक्षी दलों पर भारी पड़ सकती है। वहीं, इस पर बहस से भी भाजपा को ही फायदा होता दिख रहा है। यूपी में मिशन 80 और देश में तीसरी बार मोदी सरकार की मुहिम में यह सहायक हो सकता है।