Friday, March 6, 2026
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जब मुरली मनोहर जोशी के भाषण ने कारसेवकों को दी एक नई आग!

एक ऐसा समय जब मुरली मनोहर जोशी के भाषण ने कारसेवकों को एक नई आग दे दी! अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का सपना सैकड़ों सालों से करोड़ों राम भक्तों ने देखा। इस सपने को साकार करने के लिए कई लोगों ने जीवन की आहुति दे दी तो कई लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर करने के संकल्प के साथ अथक प्रयास किए। 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने नए सिरे से अयोध्या आंदोलन का बिगुल फूंका तो उसमें जीवन के हर क्षेत्र से जुड़े रामभक्त शामिल हो गए। वक्त के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसकी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कई कद्दावर नेता आंदोलन का चेहरा बन गए। लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथ यात्रा ने तो राम मंदिर आंदोलन में गजब की ऊर्जा भर दी। आडवाणी के बाद दूसरे बड़े भाजपाई नेता मुरली मनोहर जोशी ने भी अयोध्या आंदोलन को परिणति तक पहुंचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मुरली मनोहर जोशी अचानक लाल कृष्ण आडवाणी के साथ सुर्खियों में तब आ गए जब राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उन्हें आमंत्रण पत्र तो मिला, लेकिन साथ ही यह भी अनुरोध किया गया कि वो अयोध्या नहीं आएं। पत्र में दोनों की ज्यादा उम्र के कारण स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया गया। इस पर देशभर से कड़ी प्रतिक्रिया हुई तो राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास ने अपनी गलती सुधारी। आडवाणी और जोशी को उनके घर जाकर आमंत्रण पत्र दिया गया। हमने सीरीज के पहले लेख में लाल कृष्ण आडवाणी के योगदान की चर्चा की थी। आज बात करते हैं मुरली मनोहर जोशी की।

आडवाणी की तरह जोशी भी राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिसा लेते रहे। बीजेपी की वेबसाइट पर मुरली मनोहर जोशी के परिचय का एक अंश कहता है, ‘डॉ. जोशी ने अयोध्या के आन्दोलन में काफी अहम भूमिका निभाई थी। राम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के लिए उन्हें 8 दिसंबर 1992 को गिरफ्तार कर लिया गया और माता टीला पर लालकृष्ण आडवाणी और अशोक सिंघल के साथ अयोध्या मामले में गिरफ्तार किया गया। उनके जीवन में सबसे ज्यादा महत्व इलाहाबाद का है। उन्होंने चार दशक से भी ज्यादा समय वहां दिया है। वह इलाहाबाद लोकसभा सीट से लगातार तीन बार जीते।’ जोशी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा के पोषक रहे। इस कारण उन्होंने कश्मीरी आतंकियों की चुनौती स्वीकार करते हुए लाल चौक पर तिरंगा भी फहराया था। बीजेपी की वेबसाइट कहती है, ‘भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जोशी ने 1992 में गणतंत्र दिवस के दिन ऐतिहासिक एकता यात्रा कन्याकुमारी से श्रीनगर तक लक्षित की थी जिसका उद्देश्य लाल चौक पर झंडा फहराना था। इस घटना ने अयोध्या की घटना के साथ मिलकर देश के भविष्य पर एक गहरी छाप छोड़ी।’ राम मंदिर आंदोलन हो या लाल चौक पर तिरंगा फहराने की दिलेरी, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सभी कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे। मुरली मनोहर जोशी भी इन्हीं कार्यक्रमों के जरिए नरेंद्र मोदी की क्षमता को पहचाना और आडवाणी की तरह वो भी मोदी पर दांव खेलने लगे।

कारसेवकों ने अयोध्या में जब बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया तब बीजेपी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ही थे। उन्होंने बीजेपी के लिए राम मंदिर आंदोलन के निहितार्थों को अच्छी तरह समझते हुए पूरी प्लानिंग की और उन्हें जमीन पर उतारा। आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर के संपादक शेषाद्रि चारी ने अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि जोशी का आंदोलन में गहरा संबंध था। उन्होंने अखबार को बताया, ‘एक उपसमूह था जिसमें भानु प्रताप शुक्ला, दत्तोपंत ठेंगड़ी, अशोक सिंघल और गिरिलाल जैन शामिल थे जो आंदोलन की गहन योजना बनाते थे। मैं वहां एक तरह का रिकॉर्ड कीपर हुआ करता था। हम ठेंगड़ी के घर पर बहुत बार मिलते थे। मैं ऑर्गनाइजर का संपादक था। मैं नोट्स लेता था और पेपर तैयार करता था। उपसमूह सूचनाओं जमा करके लोगों से मिलता था। जोशी इस उपसमूह के साथ बहुत करीब से काम करते थे।’

चारी ने आगे कहा, ‘विहिप ने 30 अक्टूबर 1992 को घोषणा की कि वह मस्जिद के बगल की जमीन पर मंदिर निर्माण शुरू करेगा जो विवादित स्थल के आसपास निर्माण की अनुमति न देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ गया था। नरसिंह राव ने आडवाणी के साथ नियमित बैठकें शुरू कीं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कुछ भी अप्रिय न हो। आडवाणी और कल्याण सिंह दोनों ने वादा किया कि मस्जिद को कुछ नहीं होगा। बार-बार आश्वासन के बाद अदालत ने 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में कारसेवकों को पूजा करने की अनुमति दी।’ उस दिन यानी 6 दिसंबर, 1992 को कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद की गुंबदों को गिरा दिया। उस वक्त की एक तस्वीर बहुत चर्चित है। इस तस्वीर में उमा भारती उत्साह में मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर चढ़ी दिख रही हैं। राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता भी उस वक्त मौके पर मौजूद थे। अखबार ने उनके हवाले से लिखा, ‘उस दिन की एक तस्वीर से एक गलत धारणा बनाई गई है जिसमें जोशी दिख रहे हैं। इसमें उमा भारती पीछे से उनके कंधे पर लटकी हुई हैं और विध्वंस का आनंद ले रही हैं। वह तस्वीर सुबह ली गई थी जब सब कुछ शांत था ना कि जब विध्वंस हुआ था।’

बाबरी विध्वंस के आरोपियों की सूची में मुरली मनोहर जोशी को भी शामिल किया गया। विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व भी किया और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री बने रहे। इंडियन एक्सप्रेस ने बाबरी विध्वंस मामले के आरोपपत्र के हवाले से लिखा, ‘जांच के अनुसार मुरली मनोहर जोशी ने 1 दिसंबर, 1992 को मथुरा में अयोध्या जाते समय कहा था कि कोई ताकत राम मंदिर निर्माण को रोक नहीं सकती और वह मंच से कारसेवकों को प्रोत्साहित कर रहे थे। 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस के लिए और भड़काऊ नारे लगा रहे थे।’ हालांकि, 2020 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट का फैसला आया तो यह बात निराधार साबित हुई। कोर्ट ने कहा कि आडवाणी हों या जोशी, सभी बड़े नेता उग्र भीड़ से अपील कर रहे थे कि वह कुछ भी गैर-कानूनी काम नहीं करे ताकि निर्धारित कार्यक्रम को शांतिपूर्ण संपन्न हो सके।

क्या समुद्री जहाज पर हुए हमले से सख्त हो गया है भारत?

भारत अब समुद्री जहाज पर हुए हमले से सख्त हो गया है! गाजा में इजरायल-हमास युद्ध की आंच भारत तक महसूस की जाने लगी है। लाल सागर में हूती आतंकी जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले कर रहे हैं। भारतीय चालक दल वाले कुछ जहाज भी उनका निशाना बने हैं। लाल सागर और अरब सागर में भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर ड्रोन हमलों को भारत ने काफी गंभीरता से लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो दो टूक कह दिया है कि जिन्होंने भी इन हमलों को अंजाम दिया है, उन्हें पाताल से भी ढूंढ निकाला जाएगा। उन्हें सबक सिखाया जाएगा। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात की है। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की शांति, सुरक्षा और स्थिरता पर बात की। दोनों ने बातचीत में समुद्री सुरक्षा और जहाजों के मुक्त आवागमन की आजादी पर खास जोर दिया। पिछले हफ्ते पीएम मोदी और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच भी बात हुई थी। जहाजों पर हमले के मद्देनजर भारत ने समुद्र में पहरा भी बढ़ा दिया है। इस महीने भारतीय चालक दल वाले दो जहाजों पर ड्रोन हमले हुए हैं। गैबन का झंडा लगे जहाज पर दक्षिण लाल सागर में ड्रोन से हमला किया गया था। यह जहाज भारत की ओर आ रहा था। एमवी साई बाबा नाम के इस जहाज पर चालक दल के 25 सदस्य थे और सभी भारतीय थे। 19 दिसंबर को गुजरात तट के पास अरब सागर में ‘चेम प्लूटो’ नाम के जहाज पर इसी तरह ड्रोन अटैक हुआ था। यह जहाज सऊदी अरब से चला था। इन हमलों पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि हमलावरों को पाताल से भी खोज निकाला जाएगा। व्यापारिक जहाजों पर ड्रोन अटैक के बाद भारत ने समंदर में निगरानी और सुरक्षा बढ़ा दी है। समुद्री डाकुओं या आतंकियों के हमलों को काउंटर करने के लिए इंडियन नेवी ने 4 गाइडेड मिसाइल विध्वंसक तैनात किए हैं। इनमें आईएनएस मोर्मुगाओ, आईएनएस कोच्चि और आईएनएस कोलकाता शामिल हैं। इसके अलावा P-81 एयरक्राफ्ट, सी गार्डियंस, हेलिकॉप्टर और कोस्ट गार्ड के जहाजों की संयुक्त तैनाती की गई है ताकि किसी भी खतरे से समय रहते निपटा जा सके।

7 अक्टूबर को बर्बर आतंकी हमले के बाद इजरायल ने गाजा में हमास आतंकियों के खिलाफ आर-पार की जंग छेड़ रखी है। इस वजह से लाल सागर में हूती आतंकियों की गतिविधियां भी बढ़ गई हैं। यमन में मौजूद ईरान समर्थित हूती आतंकियों ने लाल सागर से गुजर रहे जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले कर रहे हैं। उनकी मांग है कि गाजा में इजरायल तत्काल युद्ध रोके नहीं तो वे लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाते रहेंगे। अब तक हूती आतंकियों ने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए जहाजों पर तकरीबन 100 हमले किए हैं। इसमें 10 जहाज प्रभावित हुए हैं। आतंकियों के हमलों से ईस्ट-वेस्ट ट्रेड खासकर तेल का व्यापार प्रभावित हुआ है। बीपी, मोलर-मैयर्स्क और हैपाग-लॉयड जैसी कुछ बड़ी कंपनियां तो अनिश्चितकाल के लिए लाल सागर से होकर अपने ऑइल टैंकर के शिपमेंट को बंद कर दिया है। इससे शिपमेंट में काफी समय लग रहा है।

लाल सागर की भौगोलिक स्थिति उसे व्यापारिक और रणनीतिक तौर पर काफी अहम बनाती है। ये मिस्र, सऊदी अरब, यमन, सूडान, इरीट्रिया और जिबूती से लगता है। उत्तर में स्वेज नहर के जरिए यह भूमध्य सागर से जुड़ा हुआ है। स्वेज नहर दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग में से एक है। लाल सागर एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के देशों के बीच में स्थित है। यह मिडल ईस्ट को फार ईस्ट से तो अलग करता ही है, यूरोप और एशिया को भी अलग करता है। इसकी भूराजनीतिक स्थिति इस लिहाज से काफी अहम है कि ये अफ्रीका की पूर्वी तटीय सीमा और अरब प्रायद्वीप की पश्चिमी तटीय सीमा को निर्धारित करता है। लाल सागर बाब अल मंडेब जलडमरूमध्य और अदन की खाड़ी के जरिए दक्षिण में यह हिंद महासागर से जुड़ा हुआ है। कई अरब देशों के लिए पेट्रोलियम व्यापार का यही मुख्य रूट है। कुछ अरब देशों के कुल निर्यात का 90 से 100 प्रतिशत तक इसी रूट से होता है। जॉर्डन, जिबूती और सूडान के लिए तो समुद्री परिवहन का यही एक मात्र जरिया है। ये सबकुछ लाल सागर को भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण बनाता है। लाल सागर के जरिए यूरोप से भारत तक शिपमेंट में आम तौर पर 24 दिन लगते हैं। लेकिन अगर शिपमेंट केप ऑफ गुड होप के जरिए हो तो इसमें 38 दिन तक लग जाते हैं। यही वजह है कि जहाजों पर हमले को भारत ने काफी गंभीरता से लिया है और समुद्री सुरक्षा को अभेद्य बनाने की तैयारी कर रहा है।

क्या भारत के लिए 2024 होगा चुनौती पूर्ण?

आने वाला साल 2024 भारत के लिए चुनौती पूर्ण हो सकता है! भारत को 2024 का साल उम्मीद से देखना चाहिए या डर से? सच कहूं तो दोनों भाव होने चाहिए, लेकिन थोड़ा ज्यादा उम्मीद वाला। बीते साल की परेशानियां भले ही अभी खत्म न हों, पर उम्मीद की किरण जरूर जानी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या बीजेपी 2024 में फिर से बहुमत ला पाएगी? मोदी के तो बतौर पीएम दोबारा आने की संभावना ज्यादा है, लेकिन चुनौतियां 2023 से भी ज्यादा होंगी। शायद मोदी को लोगों और विपक्ष की थोड़ी बात भी माननी पड़े। हमारे आर्थिक और राजनीतिक हालात पर ज्यादातर असर अंदरूनी ही होगा, लेकिन बाहरी घटनाएं भी उन पर प्रभाव डालती हैं। एक राहत की बात यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध शायद खत्म होने की तरफ बढ़ रहा है, क्योंकि यूक्रेन को मदद देने वाले देश अब थकने लगे हैं। दूसरी तरफ, इजरायल-हमास के बीच हो रहा युद्ध दुनिया भर के लिए आर्थिक और राजनीतिक तौर पर नुकसानदायक हो सकता है। अगर दोनों ही युद्धों का अंत समझौते पर हो, तो 2024 का साल 2023 से काफी बेहतर होगा।

कुछ विदेशी घटनाएँ हमें चिंतित करती हैं, जिनमें हमारे पड़ोसी देशों बांग्लादेश और पाकिस्तान के चुनाव भी शामिल हैं। बांग्लादेश में 7 जनवरी और पाकिस्तान में 8 फरवरी को चुनाव होने वाले हैं। पाकिस्तान में चाहे कोई भी जीते, हमारे लिए बहुत कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन अगर बांग्लादेश में शेख हसीना की हार होती है, तो हमारे लिए चीजें थोड़ी मुश्किल हो सकती हैं, क्योंकि नई सरकार चीन के ज्यादा करीब हो सकती है। इस साल के अंत में अंग्रेजी बोलने वाले देशों में दो बड़े चुनाव होने वाले हैं, जिनका भारत की वैश्विक स्थिति पर भी असर पड़ेगा। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना किसी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार से बेहतर हो सकता है, लेकिन हम तो हर तरह के राष्ट्रपतियों के साथ रहना सीख चुके हैं। ब्रिटेन में अगर लेबर पार्टी जीतती है, तो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की संभावना खतरे में पड़ सकती है या उसमें देरी हो सकती है, लेकिन सच कहें तो यह एग्रीमेंट हमारे लिए कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं लाएगा।

2024 में उम्मीदों का पिटारा खुलने वाला है, और सबसे पहले राम मंदिर का उद्घाटन होगा। यह 22 जनवरी को होगा या कहें इसकी प्राण प्रतिष्ठा रखी जाएगी। ये सिर्फ धार्मिक और राजनीतिक रूप से ही बड़ा नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए भी बहुत ज़रूरी है। यूपी भारत के गरीब राज्यों में से एक माना जाता है, लेकिन वहां 2017 से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राजनीतिक स्थिरता लौटी है, जिससे आर्थिक विकास के भी संकेत मिले हैं। लेकिन राम मंदिर के उद्घाटन के बाद ये विकास दोगुना होने वाला है। दिल्ली से सटे हुए पश्चिमी यूपी में नोएडा अब स्टार्ट-अप हब बन चुका है, ठीक वैसे ही जैसे हरियाणा गुरुग्राम की वजह से तरक्की कर गया। राम मंदिर से पूरब के यूपी को भी फायदा होगा, जहां अभी कम विकास हुआ है। धार्मिक पर्यटन और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से ये इलाका भी आगे बढ़ेगा। अगर काशी और मथुरा जैसे धार्मिक स्थलों को भी उसी तरह विकसित किया जाए, तो यूपी तेजी से तरक्की करेगा। यूपी के साथ, पूरे भारत का विकास होगा। 2024 की आशा यही है कि यूपी उड़ान भरने को तैयार है!

2023-24 में भारत की अर्थव्यवस्था 7% तक बढ़ने की उम्मीद है, और 2024-25 भी उतना ही शानदार रह सकता है, अगर अमेरिका और यूरोप भारी मंदी में न फंसें। भारत के अंदरूनी हालात अच्छे हैं, खासकर चुनावी सालों में राज्यों का खर्च बढ़ने से। 2024 में लोकसभा चुनाव के अलावा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। 2024 में खेल जगत में सबसे ज्यादा धूम मचेगी क्रिकेट की T20 विश्व कप की! ये जून में अमेरिका और वेस्ट इंडीज में होगा। उम्मीद है इस बार हमारी टीम 2023 के वनडे विश्व कप जैसा निराश नहीं करेगी। इससे पहले, मार्च-मई में भारत में महिला आईपीएल और पुरुष आईपीएल का भी रोमांच देखने को मिलेगा। व्यापार जगत भी इन लीगों से खूब कमाई की उम्मीद कर रहा है। 2009 में लोकसभा चुनावों के कारण आईपीएल को दक्षिण अफ्रीका स्थानांतरित करना पड़ा था। देखना होगा कि क्या ऐसा 2024 में भी होगा?

सालों से टली हुई जनगणना 2024 में होनी ही चाहिए, ये न सिर्फ चुनाव क्षेत्रों के सीमांकन के लिए जरूरी है, बल्कि संसद में पास हो चुके 33% महिला आरक्षण बिल को लागू करने के लिए भी जरूरी है। अगर इस साल जनगणना शुरू हुई, तो नतीजे 2025 तक ही मिलेंगे, जिससे 2029 तक लोकसभा सीटें बढ़ाने का काम थोड़ा मुश्किल हो जाएगा। 2024 में अच्छी बारिश की उम्मीद के साथ-साथ, ‘गगनयान’ प्रोजेक्ट भी पूरे साल सुर्खियों में रहेगा। इस साल कई टेस्ट लॉन्च होंगे, और अगर सबकुछ ठीक रहा, तो ये भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की तैयारियों को गति देंगे। कुल मिलाकर, 2024 एक ऐसा साल हो सकता है जिसमें भारत कई क्षेत्रों में ऊंचाइयां छू सकता है, बस ज़रूरत है चीजों के सही दिशा में चलने की!

क्या भारत न्याय यात्रा बनेगी कांग्रेस की ढाल?

भारत न्याय यात्रा कांग्रेस की ढाल बन सकती है! भारत जोड़ो यात्रा के बाद अब राहुल गांधी नए साल में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारत न्याय यात्रा पर निकलेंगे। कांग्रेस की 14 जनवरी से भारत न्याय यात्रा में मणिपुर से मुंबई तक छह हजार किमी से अधिक दूरी तय होगी। राहुल गांधी यात्रा 2.0 में अधिक दूरी कम समय में तय करेंगे। 6200 किलोमीटर की यात्रा कई ऐसे राज्यों से होकर गुजरेगी जहां लोकसभा की अधिक सीटें हैं। जिन राज्यों से भारत न्याय यात्रा गुजरेगी वहां से लोकसभा की 355 सीटें आती हैं। लोकसभा चुनाव से पहले इस यात्रा का कांग्रेस के नजरिए से काफी महत्व होगा। हालांकि इस भारत न्याय यात्रा पर इंडिया गठबंधन के साथियों की भी नजर रहेगी। विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A में सीटों का बंटवारा अभी हुआ नहीं है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द हो जाएगा। राहुल गांधी इस बार जिन राज्यों से होकर गुजरेंगे उनमें से अधिकांश राज्य ऐसे हैं जहां इंडिया गठबंधन के भीतर सीटों के तालमेल को लेकर सवाल हैं। इसमें बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र प्रमुख रूप से शामिल है। यात्रा के पहले या बीच इंडिया गठबंधन में सीटों की बात तय होती या नहीं दोनों ही सूरत में यह देखने वाली बात होगी कि विपक्ष के दूसरे साथी इस यात्रा को कैसे देखते हैं। कांग्रेस ने राहुल गांधी की अगुवाई में 14 जनवरी से 20 मार्च तक भारत न्याय यात्रा आयोजित करने की बुधवार को घोषणा की। यह यात्रा मणिपुर से शुरू होकर मुंबई तक जाएगी और इस दौरान 14 राज्यों और 85 जिलों में छह हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की जाएगी। भारत जोड़ो यात्रा के बाद पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में भारत न्याय यात्रा निकालेगी। भारत न्याय यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरेगी और 6,200 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। भारत न्याय यात्रा ज्यादातर बस से होगी लेकिन कहीं-कहीं पदयात्रा भी होगी। यात्रा मणिपुर से शुरू करने के कारण के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस की ओर से कहा गया कि वह देश का महत्वपूर्ण हिस्सा है, साथ ही पार्टी उस पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है।

भारत न्याय यात्रा 14 राज्यों से होकर गुजरेगी और यहां लोकसभा की कुल 355 सीटें आती हैं। ये वो राज्य हैं जहां कांग्रेस का पिछले दो चुनावों में प्रदर्शन बेहद ही खराब रहा।  लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारत न्याय यात्रा पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों से होकर गुजरेगी। ये वो राज्य हैं जहां बड़ी संख्या में लोकसभा सीटें हैं। इसके अलावा, जब पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के साथ सीट बंटवारे की बात आती है तो कांग्रेस को सबसे अधिक चुनौतियों का सामना यहीं करना पड़ सकता है। यात्रा के दौरान इंडिया गठबंधन के सहयोगी अपने-अपने राज्यों में राहुल गांधी का किस तरह समर्थन करते हैं यह देखना होगा। यह वक्त 2024 के चुनाव से ठीक पहले का होगा और इंडिया गठबंधन के दूसरे दल भी इसी दौरान विभिन्न स्थानों पर रैलियों की योजना बना रहे हैं।

यात्रा की अगुवाई राहुल गांधी करेंगे और कांग्रेस की ओर से पूरे यात्रा के केंद्र में वही रहेंगे। पोस्टर- बैनर से लेकर यात्रा के केंद्र में वह रहेंगे। ऐसे में यह भी काफी दिलचस्प है क्योंकि हाल ही में दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को 2024 में इंडिया गठबंधन की ओर से पीएम उम्मीदवार बनाए जाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि खरगे ने इस बात पर जोर दिया था कि गठबंधन को एक पीएम चेहरा पेश करने की जरूरत नहीं है। फिलहाल जरूरी काम चुनाव जीतना है। राहुल गांधी का नाम फिलहाल गठबंधन के किसी साथी की ओर से आगे नहीं रखा जा रहा है। यात्रा मणिपुर से शुरू करने के कारण के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस की ओर से कहा गया कि वह देश का महत्वपूर्ण हिस्सा है, साथ ही पार्टी उस पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है।साथ ही खरगे का नाम आगे कर कुछ दलों ने अपनी मंशा भी जाहिर कर दी है। ऐसे में इस यात्रा के बीच ही कई सवालों के जवाब भी मिलेंगे। साथ ही यह भी तय हो जाएगा कि 2024 से ठीक पहले विपक्ष की दिशा क्या होगी।

क्या भारत आ रहे जहाजों को बनाया जा रहा है निशाना?

वर्तमान में भारत आ रहे जहाजों को निशाना बनाया जा रहा है! लाल सागर में यमन के हूतियों ने हाल में भारत आ रहे व्‍यापारिक जहाजों को निशाना बनाया। इन हमलों ने फिर से एक बात उजागर की। इसने दिखाया कि ग्‍लोबल ट्रेड के लिए समुद्री सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। समुद्री शक्ति और सुपरपावर का दर्जा पाने वाले देश के बीच हमेशा एक रिश्‍ता रहा है। जैसे-जैसे भारत की भू-राजनीतिक प्रोफाइल बढ़ती है, उसे समुद्री शक्ति में ज्‍यादा से ज्‍यादा संसाधनों का निवेश करने की जरूरत होगी। यह उसकी बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करने और उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है। ऐसा क्‍यों है? आइए, यहां इसे समझने की कोशिश करते हैं। 21वीं सदी में इंडो-पैसिफिक दो कारणों से प्रमुख भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभरा है। पहला, क्षेत्र की आर्थिक और जनसांख्यिकीय शक्ति। दूसरा, एक गैर-लोकतांत्रिक और आक्रामक चीन का उदय। भारत इस क्षेत्र का प्रमुख घटक है। वह हिंद महासागर की बड़ी समुद्री शक्ति है। इस क्षेत्र का दूसरा किरदार अमेरिका है। यह संयोग है कि इंडो-पैसिफिक निर्माण के अस्तित्व में आने से भारत प्रमुख आर्थिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उभरा है। इसमें जनसांख्यिकीय लाभ है। यह भारत को अपनी समुद्री शक्ति को और विकसित करने का एक ऐतिहासिक अवसर देता है।

हालांकि, भारत की व्यापक राष्ट्रीय शक्ति में समुद्री शक्ति एक कमजोर कड़ी बनी हुई है। वॉल्‍यूम के लिहाज से भारत का 95 फीसदी ट्रेड और मूल्‍य के हिसाब से 68 फीसदी समुद्री मार्गों से होता है। भारत के EXIM ट्रेड में भारतीय जहाजों की हिस्सेदारी 1987-88 में 40.7 फीसदी से घटकर 2018-19 में लगभग 7.8 फीसदी रह गई है। दुनिया के 50 सबसे व्यस्त बंदरगाहों में सिर्फ दो भारतीय बंदरगाह शामिल हैं। भारत के व्यापारिक जहाजरानी बेड़े में 2021 में 1,491 जहाज शामिल थे। डेड वेट टन भार कुल ग्‍लोबल टन वेट का 1.3% की क्षमता के मामले में भारत दुनिया में 19वें स्थान पर था। ग्‍लोबल शिपबिल्डिंग में भारत की हिस्‍सेदारी सिर्फ 0.12 फीसदी है। इस तरह 2021 में भारत में निर्मित वैश्विक जहाजों की संख्या में वह 15वें स्थान पर था। वैश्विक जहाज मरम्मत और रखरखाव का बाजार 2028 तक 40 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन, सस्ते और कुशल कार्यबल के फायदे होने के बावजूद इस क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी 1 फीसदी से भी कम है।

समुद्री शक्ति के तमाम मेट्रिक्स में भारत कई देशों से पीछे है। इनमें समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान, पानी के भीतर खोज और खनन के मामले शामिल हैं। समुद्री सैन्य शक्ति के संदर्भ में बेशक भारत के पास सक्षम नौसेना है। लेकिन, प्रतिकूल समुद्री शक्तियों के साथ समुद्री सैन्य असंतुलन को रोकना महत्वपूर्ण है। लिहाजा पर्याप्त और तकनीकी रूप से प्रासंगिक समुद्री बलों को बनाए रखने के लिए जहाज और पनडुब्बी निर्माण कार्यक्रम जरूरी है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है। आरबीआई के एक लेख में कहा गया है कि इसे हासिल करने के लिए भारत की अर्थव्यवस्था को सालाना 7.6 फीसदी या उससे ज्‍यादा की निरंतर रफ्तार से बढ़ना होगा। समुद्री क्षेत्र आज भारत की जीडीपी में लगभग 5 फीसदी का योगदान देता है। भारत सरकार ने समुद्री क्षेत्र में वैश्विक और घरेलू निवेश को आकर्षित करने के लिए कई पहलों की शुरुआत की है। इनमें नेशनल मैरीटाइम डेवलपमेंट प्रोग्राम, सागरमाला कार्यक्रम, मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 की घोषणा शामिल है। लेकिन, भारत के समुद्री क्षेत्र को भारत की जीडीपी में अपना योगदान दोगुना कर लगभग 10 फीसदी करने के लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

हमें अपने जहाज निर्माण क्षेत्र और शिपिंग बेड़े पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इन दोनों क्षेत्रों में पर्याप्त राष्ट्रीय क्षमता के बिना भारत दूसरे दर्जे की समुद्री शक्ति बना रहेगा। भारत के राष्ट्रीय शिपिंग बेड़े में गिरावट से भारत के आर्थिक, वाणिज्यिक और रणनीतिक लाभ कम हो गए हैं। भारतीय कार्गो के परिवहन के लिए विदेशी वाहकों पर निर्भरता बढ़ गई है। इनके कारण ही महत्वपूर्ण सप्‍लाई चेन बन पाती है। इस मोर्चे पर हमें ज्‍यादा करने की जरूरत है। भारत समुद्री अस्थिरता के दो चापों के बीच स्थिरता के गढ़ के रूप में बैठा है। पश्चिमी चाप जो स्वेज नहर से अदन की खाड़ी तक पश्चिम एशिया, पूर्वोत्तर अफ्रीका और हॉर्न ऑफ अफ्रीका और अरब की अशांत भूमि से होकर गुजरता है। इसके उत्तर में होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से समान रूप से अशांत समुद्री मार्ग है। भारत का ज्‍यादातर तेल और प्राकृतिक गैस आयात इसी क्षेत्र से होता है। हमारे पूर्व में मलक्का जलडमरूमध्य और अशांत दक्षिण चीन सागर है। यहां से होकर भारत का आधे से अधिक समुद्री व्यापार गुजरता है। लाल सागर में व्यापारिक जहाजों पर ताजा हमले भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए खतरे की बानगी है।

भारत को सभी पहलुओं को शामिल करते हुए नेशनल मैरीटाइम पॉलिसी के जरिये अपनी व्यापक समुद्री शक्ति के विकास के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। मजबूत आर्थिक विकास, अनुकूल जनसांख्यिकी, लोकतांत्रिक राजनीति, सॉफ्ट पावर और इंडो-पैसिफिक निर्माण के रूप में अनुकूल समुद्री वातावरण के साथ भारत के पास अपनी प्राचीन महाशक्ति का दर्जा हासिल करने का ऐतिहासिक अवसर है। इस लक्ष्य को हासिल करने में समुद्री शक्ति प्रमुख भूमिका निभाएगी।