Wednesday, March 25, 2026
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क्या राम मंदिर ने बीजेपी को जनता के दिलों तक पहुंचा दिया है?

वर्तमान में राम मंदिर ने जनता के दिलों में बीजेपी को एक नया स्थान दे दिया है! 2024 लोकसभा चुनाव में पताका फहराने के लिए सभी राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे पर काम कर रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन 22 जनवरी को होने जा रहे हैं। इसको भव्य और दिव्य बनाने के लिये हर स्तर पर तैयारियां जोरों पर चल रही है। इस प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ट्रस्ट की ओर से सभी लोगों को इन्विटेशन भी भेजा रहा है। इन सबके बीच 30 दिसंबर को अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन होने जा रहा है। दोनों ही कार्यक्रमों में पीएम नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहने वाले हैं। उधर लोकसभा चुनाव से पहले प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या पर हो रहे निर्माण कार्यों का 2024 के नतीजों पर क्या असर पड़ेगा। राम मंदिर से सहारे बीजेपी ने फर्श से लेकर अर्श तक का सफर तय किया है। पहले बीजेपी के 2 सांसद थे लेकिन अब आधे से ज्यादा राज्यों और केंद्र में बीजेपी की सरकार है। इसमें मंदिर मुद्दा का बड़ा योगदान है। राम मंदिर के जरिये बीजेपी देश के 80% मतदाताओं को टच किया है। इसलिए निश्चित रूप से राम मंदिर निर्माण का 2024 लोकसभा चुनाव में फर्क पड़ेगा। बीजेपी की प्लानिंग बड़ी मजबूत और सटीक होती है। बीजेपी गांव-गांव, शहर-शहर हर जगह राम मंदिर निर्माण का प्रचार करेगी। देश की एक-एक जनता तक सीधे पहुंचकर बताएगी की राम मंदिर निर्माण को लेकर जो कहा था, वो हमने किया है। इसलिए राम मंदिर निर्माण का लाभ बीजेपी को निश्चित रूप से मिलेगा। वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि BJP हमेशा से धर्म की राजनीति करती आई है, मजहब के नाम पर फायदा उठाना बीजेपी का पुराना तरीका है। हिंदू-मुस्लिम, अजान, भजन, कीर्तन जैसे मुद्दों पर ही बीजेपी वोट मांगती है। सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हो रहा है।

इसलिए प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से बीजेपी का कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा है जैसे बीजेपी ने ही राम मंदिर को बनवाया है। बीजेपी इसका पूरा क्रेडिट लेना चाहती है। सपा प्रवक्ता ने कहा कि बीजेपी चाहे जितना लाभ लेने का प्रयास करें लेकिन जनता पूछ रही है कि 2014 में रोजगार देने, किसानों की आय दोगुनी करने और महंगाई कम करने का वादा किया था उन वादों का क्या हुआ। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने कहा कि जनता के हर मुद्दे पर मोदी सरकार विफल हो चुकी है। नौजवान को रोजगार नहीं मिल रहा, किसानों को उनकी फसल के दाम नहीं मिल रहे, आम आदमी महंगाई से परेशान है। यह सभी मुद्दे आगामी चुनाव में मोदी सरकार पर भारी पड़ने वाले हैं। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि जनता को छलने वाले जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए राम मंदिर का सहारा ले रहे हैं। लेकिन इस देश का नौजवान, किसान, आम आदमी 2024 चुनाव में अपने विकास के मूल मुद्दों पर मोदी सरकार से सवाल करते हुए वोट करने जा रहा है।

उधर बीजेपी का कहना है कि राम मंदिर निर्माण राजनीति का विषय नहीं है। यह एक स्वप्न के साकार होने जैसा है। 500 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा के बाद प्रभु रामलला अपने भव्य मंदिर में विराज रहे हैं। यह बहुत ही प्रसन्नता का विषय है। अगर इससे भी कोई राजनीतिक लाभ की बात करता है तो इस राजनीतिक लाभ को लेने के लिए कांग्रेस और सपा को भी पूरी स्वतंत्रता थी। लेकिन इन्हें हमेशा मजहबी तुष्टिकरण दिखाई देता था, 20 फ़ीसदी वोट दिखाई देता था। यह हिंदुओं के भीतर विभाजन करते थे तो आज इनको पीड़ा क्यों हो रही है। बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि बीजेपी का जो पहले स्टैंड था, आज भी उसी स्टैंड के साथ खड़े हैं।

बीजेपी सत्ता में वापसी करेगी या नहीं और सत्ता में आती है तो सीटें बढ़ेंगी या नहीं यह अभी कह पाना मुश्किल है। ऐसा इस लिए क्योंकि बीजेपी 30-35 % वोटर के साथ सरकार बनाती है बाकी 65% अन्य दलों में बंट जाता है। अगर इंडिया गठबंधन बन जाता है तो ये बीजेपी के लिए चिंता का विषय होगा। विपक्ष के बिखराव का लाभ बीजेपी हमेशा से उठाती रही है। इसबार भी उठाने की संभावना है। लेकिन आज की तारीख में बीजेपी को कोई चुनौती नहीं है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि विपक्ष के पास पीएम मोदी जैसा चेहरा नहीं है जिसकी पूरे देश में मांग हो।

यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम और भारत में क्या हुआ समझौता?

आज हम आपको बताएंगे कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम और भारत में क्या समझौता हुआ! भारत सरकार, असम सरकार और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम उल्फा के बीच दिल्ली में एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र के सबसे बड़े विद्रोही समूहों में से एक उल्फा के एक गुट की लंबी लड़ाई अब खत्म हो गई है। हालांकि, पारेष बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा स्वतंत्र गुट अभी भी बातचीत के खिलाफ है। दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र सरकार उल्फा की सभी जायज मांगों को समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी और उल्फा संगठन को भंग कर दिया जाएगा। असम के सबसे पुराने विद्रोही समूह के साथ हुए इस शांति समझौते का मकसद अवैध घुसपैठ, मूल निवासियों के लिए जमीन का अधिकार और असम के विकास के लिए एक वित्तीय पैकेज जैसे मुद्दों को सुलझाना है। उल्फा और भारत सरकार में समझौते के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि लंबे समय तक असम और पूरे उत्तर-पूर्व ने हिंसा झेली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में ही उग्रवाद, हिंसा और विवाद मुक्त उत्तर-पूर्व भारत की कल्पना लेकर गृह मंत्रालय चलता रहा है। भारत सरकार, असम सरकार और ULFA के बीच जो समझौता हुआ है, इससे असम के सभी हथियारी गुटों की बात को यहीं समाप्त करने में हमें सफलता मिल गई है। ये असम और उत्तर-पूर्वी राज्यों की शांति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अमित शाह ने आगे कहा कि हम उल्फा के नेतृत्व को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि शांति प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए उन्होंने केंद्र पर जो भरोसा जताया है, उसका सम्मान किया जाएगा।

अमित शाह के साथ शांति समझौते के लिए मौजूद असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने भी अपनी बात रखी। सरमा ने कहा कि आज असम के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल और गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में असम की शांति प्रक्रिया निरंतर जारी है। इस पूरे मामले में बहुत कम समय लगेगा। मेरे हिसाब से इसके कार्यान्वयन में 1 साल से अधिक समय नहीं लगेगा। खुद गृह मंत्री भी 2-2 महीनें में मॉनिटर करते हैं कि जिस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं उस पर काम हो रहा है या नहीं।

उल्फा या यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में सक्रिय एक प्रमुख आतंकवादी और उग्रवादी संगठन है। इसका गठन 1979 में परेश बरुआ, अरबिंद राजखोवा और अनूप चेतिया जैसे युवा नेताओं ने किया था। उल्फा का उद्देश्य असम को एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य बनाना है। शुरुआत में, उल्फा को गरीबों और लाचारों की मदद करने वाले एक समूह के रूप में देखा जाता था। लेकिन जल्द ही उनके तरीके बदल गए और वे भारतीय सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई करने लगे। ULFA को आतंकवादी संगठन घोषित करने का मुख्य कारण था चाय बागानों के एक मालिक सुरेंद्र पॉल की हत्या, वह लॉर्ड स्वराज पॉल के भाई थे। इसके बाद उल्फा ने दूसरे चाय बागान मालिकों को डरा-धमकाकर पैसे ऐंठने शुरू कर दिए। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सरकार पर दबाव डाला, जिसके चलते ULFA के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई। भारत सरकार ने उल्फा को एक आतंकवादी संगठन घोषित किया था।

सबसे पहले, हिंसा में बड़ी कमी आएगी। उल्फा ने असम में कई सालों तक हिंसा फैलाई है, जिससे कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और संपत्ति का भी नुकसान हुआ है। इस समझौते के बाद, उल्फा अपने हथियार डाल देगा और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को पूरा करने का प्रयास करेगा। दूसरा, विकास में तेजी आएगी। उल्फा के विद्रोह के कारण असम का विकास बाधित हुआ है। समझौते के बाद, असम सरकार को विकास के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। सरकार अवैध घुसपैठ, मूल निवासियों के लिए जमीन का अधिकार और असम के आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगी।

तीसरा, लोगों में शांति और स्थिरता की भावना बढ़ेगी। उल्फा के विद्रोह के कारण असम में लोगों में भय और अशांति का माहौल था। समझौते के बाद, लोगों को उम्मीद होगी कि असम में शांति और स्थिरता आएगी। चौथा इस समझौते के बाद से असम में लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों का ध्यान रखा जाएगा। यही नहीं स्वदेशी लोगों को सांस्कृतिक सुरक्षा और भूमि अधिकार भी मिल पाएगा।

न्याय यात्रा में आने वाले 14 राज्यों में क्या जीत पाएगी कांग्रेस?

आज हम आपको बताएंगे कि न्याय यात्रा में आने वाले 14 राज्यों में क्या कांग्रेस जीत पाएगी या नहीं! राहुल गांधी एक बार फिर पदयात्रा करने वाले हैं। भारत जोड़ो यात्रा पार्ट-2 को भारत न्याय यात्रा का नाम दिया गया है। 14 जनवरी से 20 मार्च के बीच राहुल गांधी मणिपुर से मुंबई के बीच लोकसभा चुनाव 2024 के लिए माहौल बनाएंगे। इस यात्रा में उनके साथ प्रियंका गांधी के शामिल होने की संभावना है। 6,200 किलोमीटर की यात्रा में कांग्रेस नेता 14 राज्यों के 85 जिलों से गुजरेंगे। 14 राज्यों में से 10 में अभी बीजेपी की सरकार है यानी राहुल सीधे तौर से नरेंद्र मोदी को चुनौती देंगे। अभी कांग्रेस की सरकार देश के सिर्फ तीन राज्यों कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में है। राहुल गांधी की भारत न्याय यात्रा उस समय शुरू होगी, जब अयोध्या के श्रीराम मंदिर में रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह होगा। 22 जनवरी को जब नरेंद्र मोदी अयोध्या में यजमान बनकर पूजा करेंगे, तब राहुल गांधी नॉर्थ-ईस्ट में पदयात्रा कर रहे होंगे। राहुल गांधी की भारत न्याय यात्रा मणिपुर से शुरू होगी। वह मेघालय, नगालैंड, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात तक पहुंचेंगे। इन 14 राज्यों में करीब 355 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से कांग्रेस के पास सिर्फ 14 सीटें हैं। बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में 236 सीटें जीती थीं। बाकी बची हुई सीटें बीजेडी, जेडी यू, टीएमसी और शिवसेना के खाते में गई थी। बीजेपी के लिए पूर्ण बहुमत का रास्ता इन्हीं राज्यों से बना था। 25 सीट वाले राजस्थान और 26 सीटों वाले गुजरात में कांग्रेस का खाता नहीं खुला था। मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड में पार्टी को सिर्फ एक-एक सीट ही मिली थी। 14 राज्यों में न्याय यात्रा के जरिये राहुल गांधी के पास चुनावी लाभ पाने के लिए बहुत कुछ है, जबकि खोने के लिए कांग्रेस के पास कुछ नहीं है।

राहुल गांधी की न्याय यात्रा इंडिया के सहयोगी दलों के शासित राज्यों पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार से गुजरेगी। अभी इन राज्यों में कांग्रेस के पास कुल चार सीटें हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी की टक्कर बीजेपी से मानी जाती है। पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 22 तृणमूल कांग्रेस के पास है। कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों पर 2019 के चुनाव में सफलता मिली थी। बंगाल में सीपीएम भी इंडिया गठबंधन की पार्टनर है। बिहार की 40 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीती थी। बिहार में इंडिया के तीन पार्टनर वामपंथी दल, जेडी यू और आरजेडी भी है। झारखंड में झामुमो, आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग होना है। राहुल गांधी की यात्रा के बावजूद ऐसी स्थिति मजबूत नहीं कर पाएंगे, जिससे उनके सहयोगी दल मनमाफिक सीटें दे दें। ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में है, जहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी के साथ सीटों का समझौता होना है। महाराष्ट्र में शिवसेना यूटीबी के अभी सात, एनसीपी के चार और कांग्रेस का एक लोकसभा सांसद है। यहां उद्धव गुट ने 23 लोकसभा सीटों पर दावा ठोक दिया है। इन राज्यों में सीट शेयरिंग को लेकर घमासान तय है। राहुल गांधी की पदयात्रा का असर सीट शेयरिंग पर पड़ेगा, इसकी उम्मीद कम है।

अभी तक हुए कई ओपिनियन पोल में बीजेपी को तीसरी बार पूर्ण बहुमत की उम्मीद जताई गई है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद हुए सी वोटर के ओपिनियन पोल में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन को 295 से 335 सीट मिलने की संभावना जताई गई है। इंडिया गठबंधन को 165 से 205 सीट मिलने का अनुमान जताया गया है। पोल के मुताबिक सबसे कड़ा मुकाबला बिहार में हो सकता है, जहां इंडिया गठबंधन को 21 से 23 मिलने की संभावना है। बिहार में चार दलों के बीच सीट शेयरिंग का पेंच फंसा है। कांग्रेस 8 सीटों पर दावा कर रही है, जबकि दूसरे पार्टनरों ने चार सीट देने की पेशकश की गई है। बंगाल में भी टीएमसी का पलड़ा भारी है। महाराष्ट्र में भी इंडिया गठबंधन और एनडीए में कांटे का मुकाबला होगा। मगर लोकसभा में बीजेपी को हराने के लिए उत्तर प्रदेश की 80, मध्यप्रदेश की 29, छत्तीसगढ़ की 11, राजस्थान की 25 और गुजरात की 26 सीटों पर कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन करना होगा। 22 जनवरी को राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा होने वाली है। विहिप और अन्य संगठनों ने इस आयोजन को गांव-गांव तक पहुंचाने की प्लानिंग है। माना जा रहा है कि राम मंदिर का असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखेगा। राहुल गांधी की न्याय यात्रा राम मंदिर से उपजे माहौल में कारगर साबित होगी, इसकी गारंटी नहीं है।

क्या भारत जोड़ो यात्रा से अलग होगी भारत न्याय यात्रा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत न्याय यात्रा, भारत जोड़ो यात्रा से अलग होगी या नहीं! कांग्रेस ने जमीनी पकड़ मजबूत करने के लिए अपनी भारत यात्रा के चरण 2 का जो बुधवार को ऐलान किया, वह भारत जोड़ो यात्रा का अगला चरण होने के बावजूद कई मायनों में उससे अलग है। यह अंतर यात्रा के स्वरूप से लेकर उसकी थीम तक में है। जहां पहले चरण में भारत को जोड़ने की बात कही गई थी, वहीं दूसरे चरण में न्याय की बात कही गई है। अगर दोनों में अंतर की बात करें तो यह फर्क उल्लेखनीय हैं। पहली यात्रा दक्षिण से उत्तर की ओर निकाली गई थी, जो कन्याकुमारी से शुरू होकर कश्मीर में खत्म हुई थी। राहुल गांधी की यह यात्रा पूरी तरह से पैदल यात्रा थी, जिसमें वह लगभग रोज 25 किलोमीटर की दूरी तय करते थे। लगभग साढ़े चार महीने की यात्रा में कांग्रेस नेतृत्व ने तकरीबन 3600 किलोमीटर की दूरी तय की। यह यात्रा 12 राज्यों से होकर गुजरी। दूसरी ओर न्याय यात्रा पूरब के मणिपुर से शुरू होकर पश्चिम में मुंबई में खत्म होगी। यह यात्रा हाइब्रिड मोड में ज्यादातर बसों व कुछ हिस्सों में पैदल पूरी होगी। 6600 किमी की यात्रा दो महीने में पूरी होगी, जो 14 राज्यों व 85 जिलों से होकर गुजरेगी। कांग्रेस का कहना था कि भारत जोड़ो यात्रा का मुख्य मकसद देश में बढ़ रही नफरत, डर और कट्टरता के खिलाफ लड़ाई थी। कांग्रेस ने इसे समाज को तोड़ने व बांटने वाले कारक करार देते हुए देश को जोड़ने की बात कही थी। कांग्रेस का दावा है कि न्याय यात्रा के जरिए कांग्रेस देश में सामाजिक, आर्थिक व सामाजिक न्याय के हक की आवाज बुलंद करेगी। इसमें देश के लोगों के लिए आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक न्याय पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

दरअसल कांग्रेस को लगता है कि मोदी सरकार के दौर में देश में आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक स्तर पर लोगों के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वहीं दूसरी ओर न्याय यात्रा का नाम देकर कांग्रेस कहीं न कहीं 2019 चुनावों के अपने मूल नारे न्याय योजना को रेखांकित करना चाहती है, जिसमें उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में हर गरीब परिवार हर साल 72 हजार रुपये देने का वादा किया था। हालांकि पार्टी को पिछली बार करारी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस को लगता है कि कांग्रेस अपनी उस योजना को जमीन पर ठीक तरह से उतार नहीं पाई।

भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस ने दो आम चुनावों के बीच में कुछ राज्यों के असेंबली चुनावों के मद्देनजर की थी, जबकि यह यात्रा आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर की जा रही है। भारत जोड़ो यात्रा का चुनावी असर कांग्रेस के लिए मिला जुला रहा। जहां वह उसके बाद हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक व तेलंगाना में अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही तो वहीं राजस्थान व छत्तीसगढ़ जैसे दो मजबूत प्रदेशों से उसकी सत्ता जाती रही। बता दें कि कांग्रेस नागपुर से लोकसभा चुनाव के प्रचार की शंखनाद करने जा रही है। पार्टी के स्थापना दिवस पर ‘हैं तैयार हम’ रैली से चुनाव प्रचार की शुरुआत की जाएगी। इसके साथ ही पार्टी ने भारत जोड़ो यात्रा का दूसरे चरण की भी घोषणा कर दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भारत न्याय यात्रा की शुरुआत करेंगे। यह यात्रा पूर्व से पश्चिम भारत के बीच होगी। भारत न्याय यात्रा की शुरुआत 14 जनवरी से होगी। यह यात्रा 20 मार्च को मुंबई में खत्म होगी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल की तरफ से यह जानकारी दी गई।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद अब राहुल गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ‘भारत न्याय यात्रा’ निकालने वाली है। मणिपुर से मुंबई तक करीब 6200 किलोमीटर की यह लंबी यात्रा 14 जनवरी से लेकर 20 मार्च तक निकाली जाएगी। जो कि 14 राज्यों से होकर निकलेगी। इसमें मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के 85 जिले शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने 3 मुद्दे उठाए थे- आर्थिक विषमता, सामाजिक ध्रुवीकरण औऱ राजनीतिक तानशाही। लेकिन भारत न्याय यात्रा का मुद्दा आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय और राजनीतिक न्याय है।

पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि 21 दिसंबर को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने राय दी कि राहुल गांधी जी को पूर्व से पश्चिम तक यात्रा शुरू करनी चाहिए। सीडब्ल्यूसी की राय के बाद राहुल गांधी भी इस इच्छा पूरी करने के लिए सहमत हो गए हैं। इसके बाद ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 14 जनवरी से 20 मार्च तक मणिपुर से मुंबई तक ‘भारत न्याय यात्रा’ आयोजित करने का निर्णय लिया है। केसी वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 14 जनवरी को इंफाल में इस यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे। उन्होंने कहा कि यह यात्रा पूर्व-पश्चिम की है, दक्षिण-उत्तर की यात्रा हम पहले ही कर चुके हैं। मणिपुर के बिना हम यात्रा कैसे कर सकते हैं? हमें मणिपुर के लोगों के दर्द पर मरहम लगाने का प्रयास करना होगा।

आखिर कैसी चल रही है भारत न्याय यात्रा की तैयारी?

आज हम आपको भारत न्याय यात्रा की तैयारी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! कांग्रेस की ओर से आगामी 14 जनवरी से शुरू की जा रही भारत यात्रा मूल रूप से संविधान बचाने के लिए होगी, यह कहना था कांग्रेस के एक अहम पदाधिकारी का। पूरी यात्रा में कांग्रेस का जोर संविधान बचाने पर होगा। कांग्रेस के एक अहम सूत्र का कहना था कि हाल ही में पता चला है कि बीजेपी 2024 के बाद देश में संविधान में बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है। पार्टी की एक अहम मीटिंग में पीएम मोदी ने ऐसे संकेत भी दिए हैं। बीजेपी की इस मंशा के बाद यह जरूरी हो जाता है कि प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस संविधान और उसके मूल्यों को बचाने की कोशिश करे। कांग्रेस का मानना है कि संविधान की प्रस्तावना जिन चार स्तंभों न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर टिकी है, न्याय उसका पहला अंग है। इसलिए इस यात्रा को न्याय यात्रा नाम दिया गया है। कांग्रेस ने संकेत दिया कि यात्रा में कांग्रेस प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाएगी। इसमें कांग्रेस सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक न्याय पर जोर देगी। यात्रा को लेकर आगामी 4 जनवरी को एक अहम मीटिंग बुलाई गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में होने वाली इस मीटिंग में सभी राज्यों खासकर यात्रा से जुड़े 14 राज्यों के प्रभारी, प्रदेशाध्यक्ष व विधायक दल के नेताओं की मीटिंग होनी है, जिसमें यात्रा के रूट को अंतिम रूप दिया जाएगा। पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना था कि जिन जिन राज्यों से होकर यात्रा गुजरेगी, वहां-वहां मौजूद घटक दल के साथियों के इससे जुड़ने की उम्मीद है। कांग्रेस की ओर से इसे लेकर घटक दलों से संपर्क भी किया जाएगा। वहीं कांग्रेस इस यात्रा के लिए सिविल सोसाइटी से भी बात कर रही है।न्याय उसका पहला अंग है। इसलिए इस यात्रा को न्याय यात्रा नाम दिया गया है। कांग्रेस ने संकेत दिया कि यात्रा में कांग्रेस प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाएगी।अहम सूत्र के मुताबिक, आगामी 8 जनवरी के रूट की जानकारी साझा करने के साथ ही लोगो व टैगलाइन भी जारी की जाएगी। जबकि 12 जनवरी को यात्रा का थीम सॉन्ग लॉन्च होगा, जो हिंदी व अंग्रेजी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में भी होगा।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि न्याय यात्रा के दौरान रोज एक बड़ी सभा होगी और हर दिन लगभग पांच से सात किमी पैदल यात्रा चलेगी। सभा और पैदल यात्रा शहरों व कस्बों में होगी। राहुल गांधी की अगुवाई में होनी वाली इस यात्रा में भारत जोड़ो यात्रा की तरह रोज राहुल गांधी समाज के अलग-अलग तबके से संवाद करेंगे। यह संवाद ज्यादा बस में होगा, जिसकी अवधि आधे घंटे से एक घंटा कुछ भी हो सकती है। 2024 के बाद देश में संविधान में बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है। पार्टी की एक अहम मीटिंग में पीएम मोदी ने ऐसे संकेत भी दिए हैं। बीजेपी की इस मंशा के बाद यह जरूरी हो जाता है कि प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस संविधान और उसके मूल्यों को बचाने की कोशिश करे।इस यात्रा के दौरान कांग्रेस को लोगों जो फीडबैक मिलेगा, उसका इस्तेमाल कांग्रेस आगामी चुनाव के पार्टी के मेनिफेस्टो के बनाने में किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर इस यात्रा में इंडिया गठबंधन के घटक दल भी उसी तरह शामिल होंगे, जैसे भारत जोड़ो यात्रा के दौरान हुए थे।

पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना था कि जिन जिन राज्यों से होकर यात्रा गुजरेगी, वहां-वहां मौजूद घटक दल के साथियों के इससे जुड़ने की उम्मीद है। कांग्रेस की ओर से इसे लेकर घटक दलों से संपर्क भी किया जाएगा। वहीं कांग्रेस इस यात्रा के लिए सिविल सोसाइटी से भी बात कर रही है।न्याय उसका पहला अंग है। इसलिए इस यात्रा को न्याय यात्रा नाम दिया गया है। कांग्रेस ने संकेत दिया कि यात्रा में कांग्रेस प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाएगी। इसमें कांग्रेस सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक न्याय पर जोर देगी। यात्रा को लेकर आगामी 4 जनवरी को एक अहम मीटिंग बुलाई गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में होने वाली इस मीटिंग में सभी राज्यों खासकर यात्रा से जुड़े 14 राज्यों के प्रभारी, प्रदेशाध्यक्ष व विधायक दल के नेताओं की मीटिंग होनी है, चूंकि इस बार यात्रा बस से होगी, इसलिए इस बार यात्रा में ब्रेक की संभावना कम है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान हर छह से सात दिन बाद यात्रा एक दिन का रेस्ट करती थी। बताया जाता है कि यात्रा हाइटेक बसों के जरिए होगी। वहीं रहने के लिए कंटेनर का इस्तेमाल किया जाएगा।

क्या सैम पित्रोदा के बयान पर कांग्रेस ने किया है किनारा?

हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने सैम पित्रोदा के बयान पर किनारा कर लिया है! अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले देश में सियासी दलों के बीच ‘महाभारत’ छिड़ी हुई है। ऐसा माना जा रहा है लोकसभा चुनाव से पहले प्रभु राम की घर वापसी कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के लिए बड़ी टेंशन बन गया है। दरअसल पहले लोकसभा चुनावों तक कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल बीजेपी को ‘राम मंदिर बनाएंगे, पर तारीख नहीं बताएंगे’ का तंज मारा था। विपक्षी पार्टी राम मंदिर को बीजेपी का चुनावी एजेंडा बताते थे। लेकिन अब 2024 से पहले तस्वीर एकदम बदल गई है। बीजेपी की केंद्र सरकार ने मंदिर बनाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि देश का हिंदू वोटर आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को आशीर्वाद के तौर पर खुलकर वोट दे सकता है। उधर कांग्रेस की टेंशन बढ़ गई है, क्योंकि कांग्रेस के पास हिंदू वोटर्स को रिझाने का कोई बड़ा हथियार नहीं बचा है। इस बीच इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा की राम मंदिर को लेकर गई टिप्पणी से कांग्रेस बुरी तरह घिर गई है। दरअसल पित्रोदा ने तो राम मंदिर को असली मुद्दा मानने से ही मना कर दिया है। हालांकि पित्रोदा ने यह भी कहा कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और उनका मानना है कि धर्म एक व्यक्तिगत मामला है जिसे राजनीति के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए। लेकिन बीजेपी ने इस बयान को लेकर कांग्रेस पर हमला बोलना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए पूरे मामले से किनारा करते हुए कहा है कि यह पार्टी का आधिकारिक बयान नहीं है, यह उनका व्यक्तिगत बयान है।’ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि एएनआई के साथ एक इंटरव्यू में व्यक्त किए गए पित्रोदा के विचार उनके अपने थे और इसका पार्टी से कोई लेना देना नहीं है।’

न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में सैम पित्रोदा ने पीएम नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा था, ‘वह सिर्फ एक पार्टी के नहीं बल्कि सभी लोगों के प्रधानमंत्री हैं, यह संदेश भारत के लोग उनसे चाहते हैं। वह रोजगार, महंगाई, विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ अन्य चुनौतियों के बारे में बात करें। यह जनता को तय करना है कि असली मुद्दे क्या हैं? क्या राम मंदिर असली मुद्दा है? या फिर बेरोजगारी असली मुद्दा है, क्या राम मंदिर असली मुद्दा है या फिर महंगाई असली मुद्दा है।’ उन्होंने कहा था, ‘मैं देख रहा हूं कि लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है, मुझे संकेत मिल रहे हैं कि हम गलत दिशा में हैं और पूरा देश भगवान राम पर निर्भर हो गया है।’ हालांकि पित्रोदा ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कांग्रेस हमेशा ही बीजेपी के निशाने पर रही है। बीजेपी का आरोप रहा है कि राम मंदिर निर्माण में कांग्रेस बाधा पहुंचाने की कोशिश करती रही है। बीजेपी कांग्रेस को हमेशा से हिंदू विरोधी पार्टी साबित करने की कोशिश करती है। ऐसे में अगर कांग्रेस सैम पित्रोदा के बयान का समर्थन करती है तो कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भारी नुकसान हो सकता है। कांग्रेस राम मंदिर के मसले पर असमंजस की स्थिति में हैं। राजनीति जानकारों का कहना है कि अगर सोनिया गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे प्राण प्रतिष्ठा समारोह में हिस्सा लेते हैं तो ये राजनीतिक रूप से बीजेपी के हमलों का काउंटर होगा। अयोध्या में कांग्रेस के बड़े नेताओं की मौजूदगी हिंदू वोटर्स के लिए बड़ा संदेश होगा। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा घटक दल है। अगर कांग्रेस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होता है तो इससे इंडिया गठबंधन के अन्य सहयोगी नाराज हो सकते हैं, क्योंकि वृंदा करात समेत I.N.D.I.A गठबंधन में शामिल कुछ राजनीतिक दलों के प्रमुख राम मंदिर कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं।

अयोध्या राम मंदिर का उद्घाटन कार्यक्रम 22 जनवरी को होना है, जिसके लिए देश के बड़े नेताओं को निमंत्रण दिया गया हैं। 22 जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी को न्योता भेजा गया हैं। लेकिन कयासबाजी का दौर लगातार जारी है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हो रहे राम मंदिर के उद्घाटन में क्या सोनिया गाधी जायेंगी या नहीं? इस बात पर अभी तक पार्टी फैसला नही कर पाई है, कांग्रेस की तरफ से एक आधिरारिक बयान जारी किया गया हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, ‘कांग्रेस अधयक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को 22 जनवरी 2024 को अयोध्या के राम मंदिर के समारोह में शामिल होने का निमंत्रण मिला है वक्त आने पर फैसला किया जाएगा और सूचित किया जाएगा।’

राम मंदिर पर सैम पित्रोदा के बयान के बाद बीजेपी कांग्रेस पर हमलावर है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, ‘प्राण प्रतिष्ठा समारोह से कांग्रेस में नुकसान, निराशा और भय की भावना पैदा हुई है। पित्रोदा की टिप्पणी से भगवान राम और हिंदुओं के प्रति पार्टी की एलर्जी का पता चलता है।’ वहीं, सुशील मोदी ने कहा, ‘उन्होंने ईवीएम और राम मंदिर पर भी सवाल उठाए, हो सकता है कि उन्हें भगवान में विश्वास न हो, भगवान राम और हमारे रीति-रिवाज बेरोजगारी जितने ही महत्वपूर्ण हैं। सैम पित्रोदा जैसे लोगों को हमारी संस्कृति के बारे में कोई जानकारी नहीं है।’

क्या जातिगत जनगणना के जरिए जीत पाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस अब जातिगत जनगणना के जरिए जीतने का प्रयास कर रही है! विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A की मीटिंग में सीट शेयरिंग और दूसरे मुद्दों को 31 दिसंबर तक पूरा कर लेने पर जोर दिए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर इन दिनों मंथन का दौर जारी है। कांग्रेस की ओर से बनाई गई मुकुल वासनिक की अध्यक्षता में गठबंधन समिति शुक्रवार व शनिवार को पूरे दिन अलग-अलग राज्यों के पदाधिकारियों से संपर्क व विचार विमर्श करती दिखी। सूत्रों के मुताबिक पांच सदस्यीय गठबंधन समिति एक-एक कर सभी राज्यों के प्रभारियों, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता से मिल कर उनके राज्य में गठबंधन व तालमेल की संभावनाओं पर विचार कर रही है। इसमें समिति हर राज्य के प्रदेश इकाई का गठबंधन को लेकर मूड समझने की कोशिश करेगी मसलन किस राज्य में पार्टी गठबंधन चाहती है या नहीं, अगर चाहती है तो लोकसभा की कितनी सीटों पर तालमेल चाहती है, भले ही कांग्रेस में सीट बंटवारे को लेकर राज्यों से फीडबैक व राय लेने कवायद चल रही हो, लेकिन इस बारे में आखिरी फैसला कांग्रेस आलाकमान ही करेगी। इस मुद्दे पर कांग्रेस की सोच को सामने रखते हुए एक अहम पदाधिकारी का कहना था कि इंडिया गठबंधन को लेकर विभिन्न क्षेत्रीय दलों से हमारा तालमेल लोकसभा चुनावों के नजरिए से होगा।किन सीटों पर पार्टी मजबूत है, किन सीटों पर पिछले चुनाव में नंबर दो थी, हर सीट पर चुनावी समीकरण क्या हैं वगैरह। कांग्रेस के एक अहम सूत्र का कहना था कि पार्टी की गठबंधन समिति हर राज्य से मिले फीडबैक के आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष को एक रिपोर्ट सौंपेगी, उसके बाद कांग्रेस पार्टी उस फीडबैक के आधार पर इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे पर बात करेगी। समिति अगले दो से तीन दिनों में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को दे देगी। आगामी 4 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष चुनावों को लेकर सभी प्रदेश के नेताओं से मुलाकात करेंगे। जिसमें प्रदेश के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता मौजूद रहेंगे। कांग्रेस की ओर से इंडिया गठबंधन में कौन बात करेगा, फिलहाल यह तय नहीं है।

यह काम पार्टी की गठबंधन समिति करेगी या उसमें से कुछ सदस्य या फिर कोई अलग समिति बनेगी, अभी तय नहीं है। गौरतलब है कि भले ही कांग्रेस में सीट बंटवारे को लेकर राज्यों से फीडबैक व राय लेने कवायद चल रही हो, लेकिन इस बारे में आखिरी फैसला कांग्रेस आलाकमान ही करेगी। इस मुद्दे पर कांग्रेस की सोच को सामने रखते हुए एक अहम पदाधिकारी का कहना था कि इंडिया गठबंधन को लेकर विभिन्न क्षेत्रीय दलों से हमारा तालमेल लोकसभा चुनावों के नजरिए से होगा।

राज्यों और केंद्रीय नजरिए में फर्क के मुद्दे पर उक्त नेता का कहना था कि इसे लेकर कई बार राज्यों का अपना अलग राय या नजरिया हो सकता है, लेकिन तालमेल में राज्यों की बजाय राष्ट्रीय फैक्टर अहम रहेगा, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय गठबंधन है। उल्लेखनीय है कि 4 जनवरी को ही कांग्रेस की मेनिफेस्टो कमेटी की मीटिंग भी होनी है, जिसके अध्यक्ष पी चिदंबरम हैं। सूत्रों के मुताबिक, झारखंड, बिहार व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तालमेल को लेकर पहले ही बातचीत हो रही है। इसमें समिति हर राज्य के प्रदेश इकाई का गठबंधन को लेकर मूड समझने की कोशिश करेगी मसलन किस राज्य में पार्टी गठबंधन चाहती है या नहीं, अगर चाहती है तो लोकसभा की कितनी सीटों पर तालमेल चाहती है, किन सीटों पर पार्टी मजबूत है, समिति अगले दो से तीन दिनों में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को दे देगी। आगामी 4 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष चुनावों को लेकर सभी प्रदेश के नेताओं से मुलाकात करेंगे। जिसमें प्रदेश के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता मौजूद रहेंगे। कांग्रेस की ओर से इंडिया गठबंधन में कौन बात करेगा, फिलहाल यह तय नहीं है।किन सीटों पर पिछले चुनाव में नंबर दो थी, हर सीट पर चुनावी समीकरण क्या हैं वगैरह। कांग्रेस के एक अहम सूत्र का कहना था कि पार्टी की गठबंधन समिति हर राज्य से मिले फीडबैक के आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष को एक रिपोर्ट सौंपेगी, उसके बाद कांग्रेस पार्टी उस फीडबैक के आधार पर इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे पर बात करेगी।महाराष्ट्र के एक अहम नेता का कहना था कि लोकसभा चुनावों को लेकर हमारा जोर सीटों से ज्यादा जीत की संभावनाओं पर निर्भर करेगा। तालमेल विशुद्ध रूप से मेरिट पर होगा, कहां कौन जीत सकता है, क्योंकि हमारा मकसद बीजेपी को हराना है।

क्या राम मंदिर से जीत पाएगी बीजेपी?

बीजेपी अब लोकसभा चुनाव में राम मंदिर से ही जीत पाएगी! अयोध्या राम मंदिर में 22 जनवरी को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल अभी तक इसी उधेड़बुन में फंसे है कि राम मंदिर के उद्घाटन में जाना है या नहीं। देश की पूरी राजनीति राम मंदिर के आसपास आकर ठहर सी गई है। राम मंदिर को लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों को डर सता रहा है कि राम मंदिर बीजेपी को बड़ा चुनावी फायदा ना दे दे। वहीं बीजेपी भी राम मंदिर के जरिए हिंदू वोटर्स पर फोकस करने की रणनीति बना सकती है। राम मंदिर पर सियासत के बीच आज पीएम मोदी का अयोध्या दौरा भी काफी अहम है। दरअसल पीएम मोदी का यह दौरा अयोध्यावासियों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीएम मोदी के इस दौरे से भी बीजेपी लोकसभा चुनावों में फायदा मिल सकता है, क्योंकि पीएम मोदी 15,700 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। श्रीराम की नगरी से देश के विभिन्न शहरों के लिए भी सौगातों का पिटारा खुलेगा। पीएम मोदी देश के अलग अलग स्टेशनों से संचालित होने वाली छह वंदे भारत और दो अमृत भारत ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इससे पहले पीएम मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। प्रशासन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन राष्ट्र को समर्पित करेंगे।

पीएम मोदी श्री माता वैष्णो देवी कटरा-नई दिल्ली, अमृतसर-नई दिल्ली, कोयम्बटूर-बेंगलुरु, मंगलूरु-मडगांव, जालना-मुंबई एवं अयोध्या-आनंद विहार टर्मिनल के बीच छह वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों के साथ ही अयोध्या-दरभंगा और मालदा टाउन-बेंगलुरु के बीच दो अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे। इसके अलावा पीएम मोदी महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करेंगे। राम की नगरी अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। अयोध्या एयरपोर्ट की शुरुआत होते ही यूपी में एयरपोर्ट्स की संख्या 9 से बढ़कर 10 पहुंच जाएगी। वहीं यूपी को रफ्तार देने के लिए अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी के अयोध्या का दौरे से पहले शहर को ‘दिव्य रूप’ देने के लिए फूलों से सजाया जा रहा है। पुनर्विकसित मार्ग ‘राम पथ’ के मध्य में स्थापित बिजली के खंभों के चारों ओर नारंगी और पीले रंग के गेंदे के फूलों की माला लपेटी जा रही हैं। इन खंभों के शीर्ष पर बने डिजाइन धार्मिक प्रतीकों को दर्शाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई श्रमिक राम कथा पार्क में फूलों से कलात्मक आकार बना रहे हैं। सजावट के लिए भगवान राम, उनके धनुष एवं तीर, भगवान हनुमान, धार्मिक तिलक आदि की छवियों से प्रेरणा ली गई है। अयोध्या में फूलों से कई सजावटी डिजाइन बनाए गए हैं, जिनमें धनुष और तीर पकड़े हुए भगवान राम की पुष्प छवि भी शामिल है। इन सजावटी संरचनाओं का उपयोग राम पथ, धर्म पथ, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन सहित अन्य स्थानों पर सजावट के लिए किया जाएगा। सैकड़ों कर्मचारी सजावट के काम में जुटे हैं और लगभग 300 क्विंटल फूल कोलकाता, दिल्ली, गाजीपुर और अन्य स्थानों से लाए गए हैं।

आज पीएम मोदी अयोध्या पहुंच रहे है। वह एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन तक करीब 8 किलोमीटर लंबा रोड शो निकालेंगे। रोड शो के दौरान 51 जगहों पर पीएम नरेंद्र मोदी का स्वागत होगा। अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है।इसमें 12 जगहों पर संत-महंत उनका स्वागत करेंगे। 21 संस्कृत विद्यालयों के 500 वैदिक छात्र वेद मंत्र और शंख ध्वनि से स्वागत करेंगे। इन रोड शो वाले मार्गों को फूलों से सजाया गया है। इसमें थाईलैंड, मलेशिया, कोलकाता, बेंगलुरु, देहरादून, उत्तराखंड और दिल्ली से फूल और आगरा के पत्ते मंगाए गए हैं।

क्या हाफिज सईद को भारत के हवाले करेगा पाकिस्तान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाकिस्तान हाफिज सईद को भारत के हवाले करेगा या नहीं! भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान से लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद को वापस भारत लाने की मांग की है। आतंकी सरगना 2008 के मुंबई धमाकों के मास्टरमाइंड होने सहित कश्मीर में फिदायीन हमला करवाने और कथित मनी लॉन्ड्रिंग सहित कई मामलों का गुनहगार है। भारत पड़ोसी देश से उसे अपने यहां बुलवाकर मुकदमा चलाना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान ठहरा पाकिस्तान। सब पता होने के बाद भी वह ऐसे पेश आता है जैसे उसे कुछ पता ही न हो। पता हो तो भी वह भारत को हाफिज सईद को सौंपने से पीछे ही हटता रहा है। विदेश मंत्रालय की ओर से एक बार फिर पड़ोसी मुल्क से हाफिज सईद को सौंपने का अनुरोध किया गया है। पाकिस्तान की ओर से इस अनुरोध पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन वहां की एक पत्रकार का एक ट्वीट साफ बताता है कि पाकिस्तान अभी हाफिज सईद को सौंपने के मूड में नहीं है। लेकिन हो न हो भारत ने आंतकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सरगना को मांगकर सीमा पार टेंशन दे दी है। पाकिस्तान भी जानता है कि उसके लिए भारत के अनुरोध को यूं नकार देना आसान नहीं होगा। पाकिस्तान के पास भारत का हाफिज सईद वाला अनुरोध पहुंच गया है लेकिन, वहां के विदेश मंत्रालय ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। हालांकि वहां के पत्रकार एजाज सैयद के ट्वीट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाक अभी हाफिज सईद को सौंपने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तानी पत्रकार ने बताया कि तकनीकी तौर पर हाफिज सईद के प्रत्यर्पण से वहां की शहबाज शरीफ की सरकार ने इनकार कर दिया है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच ने बताया है कि भारत से पाकिस्तान को एक अनुरोध मिला है। लेकिन ध्यान देना जरूरी है कि पाकिस्तान और भारत के बीच कोई द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि मौजूद नहीं है। हालांकि पाकिस्तान ने जिस आसानी से इससे इनकार किया है, पड़ोसी मुल्क के लिए इतना आसान नहीं है। वजह है भारत की विश्व पटल पर बढ़ती ताकत जिसका लोहा शक्तिशाली देश अमेरिका भी मानता है।

पाकिस्तान से भारत की इस मांग पर जवाब देते नहीं बन रहा है। दबी छुपी में पत्रकार तो विदेश मंत्रालय का प्रवक्ता का बयान आया है पर इसपर आधिकारिक कुछ नहीं है। हाफिज सईद पर पाकिस्तान क्या करेगा इसकी निम्नलिखित संभावनाएं हैं, पाकिस्तान हाफिज सईद को जेल में ही रखेगा। यह पाकिस्तान की सबसे अधिक संभावना वाली कार्रवाई है। पाकिस्तान हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने से इनकार करेगा और उसे अपने कानूनी तंत्र के तहत ही न्याय दिलाएगा।

पाकिस्तान हाफिज सईद को रिहा कर देगा। यह एक कम संभावना वाली कार्रवाई है, लेकिन इसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। पाकिस्तान में हाफिज सईद के समर्थकों की एक बड़ी ताकत है। अगर पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करती है, तो इससे पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। पाकिस्तान हाफिज सईद के खिलाफ मुकदमों में रियायतें दे सकता है। यह भी एक संभावना है। पाकिस्तान हाफिज सईद को भारत को प्रत्यर्पित करने से बचने के लिए उसके खिलाफ मुकदमे में रियायतें दे सकता है। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान हाफिज सईद को जेल से बाहर रहने की अनुमति दे सकता है या उसे कम सजा दे सकता है।

पाकिस्तान हाफिज सईद को भारत को कई कारणों से नहीं सौंपता है। इनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं…. पाकिस्तान में हाफिज सईद के समर्थकों की एक बड़ी ताकत है। अगर पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करती है, तो इससे पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। पाकिस्तान को आतंकवाद का खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान सरकार का मानना है कि हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने से पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा मिल सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान का मानना है कि हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने से भारत-पाकिस्तान संबंध और खराब हो सकते हैं। पाकिस्तान सरकार का तर्क है कि उसके पास हाफिज सईद के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और उसे पाकिस्तान में ही न्याय मिलना चाहिए। पाकिस्तान ने हाफिज सईद पर आतंकी वित्तपोषण के दो मामलों में 33 साल की जेल की सजा सुनाई है। हालांकि, वह जेल से बाहर भी कई बार देखा गया है।

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सा कि आप जानते हैं, इस व्यक्ति पर भारत में कई मामले दर्ज हैं। वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवादी घोषित भी है। इस संबंध में, हमने पाकिस्तान सरकार को एक खास मामले में मुकदमे का सामना करने के लिए उसे भारत लाने के लिए एक अनुरोध भेजा है, साथ ही उसके समर्थन में आवश्यक दस्तावेज भी दिए हैं। यह आखिरी संदेश कुछ हफ्ते पहले पाकिस्तान को भेजा गया था।

जब कांग्रेस ने लोकसभा में रच दिया था इतिहास!

आज कहानी ऐसे इतिहास की जब कांग्रेस ने लोकसभा में इतिहास रच दिया! 31 अक्टूबर 1984 की वो तारीख। देश के इतिहास में काले दिन के समान थी। रामगढ़ में पहली सभा को संबोधित करने के बाद, राजीव गांधी कंठी पहुंचे, जहां उन्होंने दिन की दूसरी सभा को संबोधित करना शुरू ही किया था। तभी सुबह 9.30 बजे पुलिस वायरलेस पर एक संदेश मिला, इंदिरा गांधी पर हमला, तुरंत दिल्ली लौट जाओ… विमान के उड़ने के तुरंत बाद, राजीव कॉकपिट में चले गए। इसके बाद भारी मन से बार निकले और कहा- वह नहीं रहीं। सुनते ही चारों और सन्नाटा छा गया। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अब इस दुनिया में नहीं रहीं। बेटे राजीव के लिए यह क्षण और भी भावुक और विकट था। कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने भाई संजय को विमान क्रैश में खोया था। और यहीं से राजीव गांधी के पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनने की इबारत लिखी जा चुकी थी। 24, 27 और 28 दिसंबर 1984 को तीन चरणों में हुए चुनावों ने तस्वीर ही बदल दी। 29 दिसंबर यानी आज ही के दिन जब नतीजे आए तो कांग्रेस ने रिकॉर्ड अंतर से जीत दर्ज की। 514 लोकसभा सीटों में देश की सबसे पुरानी पार्टी को 404 वोट मिले थे। इंदिरा गांधी की मौत के बाद से राजीव जैसे टूट से गए थे। उनके लिए कोई पद, कोई कुर्सी मायने नहीं रख रही थी। बेटा जिसने अपने भाई को खोया, गम से उबर भी नहीं पाया और माता इंदिरा का देहांत हो गया। ऐसे मुश्किल वक्त में कोई उनसे कोई कैसे कहे कि आप पीएम की कुर्सी संभाल लो। इंदिरा गांधी की मौत से कांग्रेस के प्रति लोगों की सहानुभूति ही थी कि 29 दिसंबर 1984 को कांग्रेस को बंपर जीत नसीब हुई थी। पर राजीव से प्रधानमंत्री पद संभालने के लिए कहेगा कौन? पूर्व राष्ट्रपति और वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब द टर्बुलेंट ईयर्स: 1980-96 में बताया कि हमने चर्चा शुरू की कि आगे क्या किया जाए। मैंने प्रधानमंत्री नेहरू और बाद में शास्त्री के कार्यकाल के दौरान उनके निधन के समय के उदाहरणों का हवाला दिया क्रमशः 27 मई 1964 और 11 जनवरी 1966। दोनों ही मामलों में, वरिष्ठतम मंत्री गुलजारी लाल नंदा के साथ अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में एक अंतरिम सरकार बनाई गई थी। चर्चा के अंत में, यह तय किया गया कि हम राजीव गांधी से अनुरोध करेंगे कि वे इस असाधारण परिस्थिति से उबरने के लिए पूर्ण प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालें।

उसी दिन शाम को उपराष्ट्रपति आर वेंकटरामन ने दूरदर्शन पर देश को संबोधित करते हुए एक साथ दो घोषणाएँ कीं – इंदिरा जी का निधन हो गया है और राजीव के नेतृत्व में नई सरकार बन गई है। इसके तुरंत बाद, नवंबर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चुनावों की घोषणा की। लोकसभा की 514 सीटों के लिए मतदान 24, 27 और 28 दिसंबर 1984 को होना था। असम और पंजाब में आतंकवादियों के चलते गड़बड़ी के कारण वहां चुनाव नहीं कराए गए। इन दोनों राज्यों का चुनाव बाद में 1985 में हुआ।

देशवासियों ने 24,27 और 28 दिसंबर को हुए मतदान में लोगों ने इंदिरा के नाम और उनके कामों को याद करते हुए वोट दिया। कांग्रेस ने 514 सीटों में से 404 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। विशेषज्ञों ने यह माना कि कांग्रेस की ऐसी बड़ी जीत इंदिरा जी के असामयिक और दुखद निधन के बाद राजीव के लिए बनी सहानुभूति लहर के कारण हुई। उत्तर भारत में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए, कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 85 में से 83 सीटें, बिहार में 54 में से 48 सीटें, हरियाणा में सभी 10 और राजस्थान में 25 सीटें जीतीं थीं। दक्षिण में, पार्टी ने कर्नाटक में 28 में से 24 सीटें, केरल में 20 में से 13 सीटें, तमिलनाडु में 39 में से 25 सीटें जीतीं। अन्य राज्यों में जहां सबसे ज्यादा लोकसभा क्षेत्र हैं, कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में 42 में से 30, गुजरात में 26 में से 24, मध्य प्रदेश में 40 और महाराष्ट्र में 48 में से 43 सीटें जीतीं।

प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में बताया कि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना दबदबा बनाए रखा, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 42 में से 18 सीटें जीतीं, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने 3 सीटें जीतीं थीं। देश भर में कांग्रेस के पक्ष में लहर के बावजूद, पार्टी राज्य से 16 सीटें ही जीत पाई। 1977 में सरकार में अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में असफल रहने के बाद जनता गठबंधन के 1979 में टूटने के बाद गठबंधन में टूट फूट हो गई। आपातकाल के बाद जनता पार्टी में विलीन हुआ जनसंघ 1980 में फिर से एकत्रित हुआ और भारतीय जनता पार्टी बनाई। नवगठित पार्टी 1984 में लड़े अपने पहले चुनाव में कोई खास निशान नहीं छोड़ पाई और उसने 224 सीटों में से केवल 2 सीटें जीतीं, जिस पर उसने चुनाव लड़ा था और उसके 108 उम्मीदवारों को उनकी जमानत भी जब्त कर ली गई थी।