Wednesday, March 25, 2026
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क्या अब मुस्लिम धर्म में होगी दो या तीन शादियाँ?

ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या अब मुस्लिम धर्म में दो या तीन शादियाँ होंगी या नहीं! मुस्लिम पुरुष को बहुविवाह का अधिकार है लेकिन उसे प्रत्येक पत्नी को समान तरह से रखना होगा। हाई कोर्ट ने कहा है कि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष को बहु विवाह की इजाजत है और उसे एक समान तरह से पत्नियों को ट्रीट करना होगा और अगर वह ऐसा करने में विफल रहता है तो यह क्रुएल्टी के दायरे में आएगा। पति की ड्यूटी है कि वह अपनी पत्नी का सही तरह से देखभाल करे। इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने उक्त व्यवस्था देते हुए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल रखा है जिसमें फैमिली कोर्ट ने क्रुएल्टी के ग्राउंड पर पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति और उसके परिवार वालों ने शुरुआत में पहली पत्नी के साथ प्रताड़ना की थी और बाद में मुस्लिम पुरुष ने दूसरी शादी कर ली थी और फिर उसके साथ वह रहने लगा था। हाई कोर्ट ने कहा कि पुरुष ने अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी को एक तरह से ट्रीट रख रखाव नहीं किया, जबकि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष के लिए यह बाध्यता है कि वह पत्नियों को एक तरह से रखे। इस्लामिक कानून के तहत मुस्लिम पुरुष बहु विवाह कर सकता है लेकिन पत्नियों को एक तरह से रखना होगा। हाई कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी का जो बयान था उसमें कहा गया कि उसके पति ने उसके साथ प्रताड़ना की थी और यह भी कहा कि जब वह प्रेगनेंट थी उस दौरान पति और उसके परिजनों ने उसके साथ गलत व्यवहार किया और उसके साथ क्रुएल्टी की और ऐसा खाना खिलाया गया जिससे उसे एलर्जी थी।

उसकी प्रेगनेंसी के दौरान सही तरह से साड़ी न पहने जाने के कारण सास ने ताने मारे। जब एक बार उसका गर्भपात हुआ तो उसकी ननद ने इसे कहा कि वह बच्चा जन्म देने के काबिल नहीं है। तमाम प्रताड़ना से तंग आकर उसने पति का घर छोड़ दिया था। उसके पति ने उसके बाद दूसरी शादी कर ली और दूसरी पत्नी के साथ रह रहा है। वहीं पति ने तमाम आरोपों को निराधार बताया। तमाम परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी ने यह तथ्य साफ किया है कि पति ने उसके साथ समान व्यवहार नहीं किया जैसा कि दूसरी पत्नी के साथ कर रहा है।

पति ने पहली पत्नी का सही तरह से देखभाल नहीं किया। पहली पत्नी ने क्रुएल्टी ग्राउंड पर तलाक की मांग की और कहा कि उसके साथ दूसरी पत्नी की तरह उसके पति ने व्यवहार नहीं किया और एक तरह से देखभाल नहीं की। फैमिली कोर्ट ने पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की। इसके बाद मामला हाई कोर्ट में आया था। हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि पति अपने वैवाहिक दायित्व के निर्वहन में विफल रहा है। पति की ड्यूटी है कि वह अपनी पत्नी का सही तरह से देखभाल करे। अगर पत्नी किसी कारण से नाराज होकर अलग भी होती है तो वह प्रयास करे कि वह उसे वापस लाए। इस मामले में ऐसा कोई प्रयास नहीं हुआ और असलियत यह है कि पति ने पहली पत्नी की सही तरह से देखभाल नहीं की और दूसरी शादी कर ली। ऐसे में पहली पत्नी के साथ पति ने क्रुएल्टी की है और इसी कारण पहली पत्नी अपने मायके चली गई। बता दें कि हाई कोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल रखा है जिसमें क्रूरता के ग्राउंड पर पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की गई थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति और उसके परिवार वालों ने शुरुआत में पहली पत्नी को प्रताड़ित किया। गर्भावस्था में भी उसके साथ सही व्यवहार नहीं हुआ। इससे तंग आकर पहली पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया। बाद में मुस्लिम पुरुष ने फिर शादी कर ली और दूसरी पत्नी के साथ वह रहने लगा था। हाई कोर्ट ने कहा कि पुरुष ने अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी को एक तरह से ट्रीट नहीं किया, जबकि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष के लिए यह बाध्यता है कि वह पत्नियों को एक तरह से रखे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि क्रूरता के मामलों में अदालत को वैवाहिक संबंध बहाल करने का आदेश पारित करने से पहले अन्य परिस्थितियों पर भी गौर करना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने एक व्यक्ति की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें अलग रह रही पत्नी के कहने पर पारिवारिक अदालत द्वारा अपनी शादी को तोड़ने को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद की खंडपीठ ने हेमसिंह उर्फ टिंचू द्वारा दायर पहली अपील को खारिज करते हुए कहा कि एक बार क्रूरता साबित होने पर तलाक मांगा जा सकता है। हालांकि, उसके बाद पार्टियां अपना आचरण कैसा रखेंगी, यह एक प्रासंगिक तथ्य हो सकता है।

पाकिस्तान और भारत के लिए क्या बोले जूलियो रिबेरो?

हाल ही में जूलियो रिबेरो ने पाकिस्तान और भारत के लिए एक बयान दे दिया है! भारत में भी एक वर्ग वर्ष 2014 से ही भेड़िया आने की रट लगा रहा है। कोई दावा कर रहा है कि भेड़िया आ चुका है, कोई कहता है अभी आया भले ही नहीं हो लेकिन आएगा जरूर। जूलियो रिबेरो भी इसी भविष्यवक्ता श्रेणी के रुदाली हैं। मुंबई पुलिस कमिश्नर रह चुके हैं। उनका दावा है कि भारत एक दिन पाकिस्तान बन जाएगा, अंतर रहेगा तो बस इतना कि पाकिस्तान इस्लामी आतंकवाद का गढ़ है जबकि भारत में हिंदू कट्टरपंथ का जोर होगा। उन्होंने भविष्य के भारत को नाम भी दे दिया है- भगवामय पाकिस्तान। अब रिबेरो को कौन समझाए कि वैचारिक संघर्ष में हार-जीत लगी रहती है, लेकिन पछाड़ खाने के बाद इस स्तर की हताशा ठीक नहीं कि बुद्धि घुटनों में आ जाए। रिबेरो को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क्रिया-कलापों और उनकी सरकार की नीतियों से गहरा विरोध है। बहुत क्षुब्ध जान पड़ते हैं बीते दिनों के कमिश्नर साहब। वो कहते हैं, ‘पाकिस्तान में हिंदू और ईसाई दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर खौफ में जी रहे हैं। ऐसा यहां भारत में भी हो सकता है। मुझे यही डर है। भारत भगवामय पाकिस्तान हो जाएगा।’ वो प्रधानमंत्री मोदी की दिल्ली में ईसाई समुदाय के साथ हुई बातचीत का हवाला देकर कहते हैं कि ये सब तो केरल के ईसाइयों के बहलाने का तिकड़म है। रिबेरो कहते हैं, ‘वो पीएम मोदी केरल के बड़े ईसाई समुदाय को लुभाने में जुटे हैं। एक बिशप तो उनका शिकार हो गया। मुझे लगता है कि चूंकि एक बिशप फंदे में आ गया तो दूसरे भी आ सकते हैं। देखते हैं वो पीएम मोदी क्या करना चाहते हैं। हमारे दोस्त भी समझने लगे हैं कि ये सभी चीजें सिर्फ वोट के लिए हैं।’

यहां तक के बयान से तो साफ झलकता है कि रिबेरो साहब भविष्य को अच्छी तरह पढ़ चुके हैं। उन्हें पीएम मोदी की मंशा और भारत के भविष्य का अच्छे से पता चल चुका है, लेकिन आगे के बयान में वो खुद ही संदेह जताने लगते हैं। वो कहते हैं, ‘उम्मीद की जा रही है कि क्रिसमस मेसेज संभवतः पीएम मोदी का दिल बदलने का संकेत है। अगर ऐसा है तो यह अच्छी चीज होगी। लेकिन मुझे इसमें संदेह है क्योंकि इरादा तो एक भगवामय पाकिस्तान बनाने का ही है।’ रिबेरो जी लगे हाथ यह भी बता देते कि पीएम मोदी को क्या करना चाहिए जिससे कि उन्हें विश्वास हो कि उनका इरादा सिर्फ ईसाई समुदाय में पार्टी की पैठ बढ़ाने भर नहीं है? वैसे तो पीएम के लिए ऐसी क्या मजबूरी होगी कि वो रिबेरो साहब को संतुष्ट करने की सोचें भी? अगर पीएम उन्हें तवज्जो दे दें तब तो पता नहीं देश में रातोंरात कितने रिबेरो उग जाएंगे। फिर भी सवाल है कि आखिर रिबेरो साहब को कैसे यकीन हो कि भारत, भगवामय पाकिस्तान बनने के रास्ते पर नहीं है और पीएम मोदी अल्पसंख्यक समुदाय से सिर्फ उनका वोट पाने के लिए राब्ता नहीं करते? कांग्रेस पार्टी और करीब-करीब सभी क्षेत्रीय दल खुद को अल्पसंख्यकों का हितैषी होने का ही दावा करते हैं। एक भी पार्टी तो नहीं जो खुद को अल्पसंख्यकों का रहनुमा नहीं बताती। एक बीजेपी ही तो हिंदु-हितों का संरक्षक होने के प्रतीकात्मक संकेत देने की हिम्मत कर पाती है। तो रिबेरो साहब को यह बताना चाहिए कि मुसलमानों और ईसाइयों का वोट लेने वाली कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें किस तरक्की के सिंहासन पर बिठाया है? जब दशकों से गैर-बीजेपी दल अल्पसंख्यकों के वोट बैंक लपकने के तिकड़म करते रहे और बदले में ‘दोयम दर्जे’ की जिंदगी दी तो रिबेरो साहब को बुरा क्यों नहीं लग रहा? अब पीएम मोदी ने ईसाइयों से बात की तो इसमें भी उनकी मंशा पर सवाल है।

दरअसल, रिबेरो अब तक समझ ही नहीं पाए या समझकर भी खुद को या फिर दुनिया को धोखे में रखना चाहते हैं कि मोदी सरकार का तो एक महत्वपूर्ण एजेंडा ही है- तुष्टीकरण का विरोध। यह कहती है- सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास लेकिन तुष्टीकरण किसी का नहीं। आईपीएस रहे रिबेरो यह नहीं समझते हों, ऐसा लगता तो नहीं। वैसे कई बार बहुत बड़ा समझा जाने वाला व्यक्ति वक्त आने पर सच में बहुत बौना साबित होता है तो रिबेरो की समझ को लेकर कुछ दावा नहीं किया जा सकता है। संभव है कि वो आईपीएस तो बन गए, लेकिन कुछ मायनों में उन्होंने अपने विवेक का विस्तार नहीं होने दिया हो। संभव है कि छोटी सोच के साथ जीने में ही उन्हें मजा आ रहा हो। खैर, उनकी सोच उन्हें मुबारक लेकिन कोई बौना पहाड़ की ऊंचाई पर उंगली उठाने लगे तो उसकी अक्ल ठिकाने लगाना हर जिम्मेदार व्यक्ति का दायित्व होता है।

आज भी दर्जनों वीडियोज सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं जिनमें मुसलमान हिंदुओं और यहां तक कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धमकियां दे रहे हैं। यहां तक कि कई छोटे-छोटे मुसलमान बच्चे भी हिंदुओं को खुलेआम काफिर कहते हैं और उनसे नफरत का बेहिचक इजहार करते हैं। नूपुर शर्मा कांड में कम से कम आठ हिंदुओं की गर्दनें काट ली जाती हैं। यहां एक बड़ा मुस्लिम नेता कहता है कि 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा लो फिर देखो हिंदुओं का क्या होता है। फिर आम हिंदू क्या, मुसलमानों का जत्था पुलिस को नहीं बख्शता, वो निडर होकर पत्थरबाजी करता है। अगर यह मुसलमानों की दोयम दर्जे की जिंदगी का प्रतीक है तो रिबेरो की समझ पर तरस खाने के सिवा कोई और कर भी क्या सकता है।

रिबेरो एक भी उदाहरण तो दें कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय ने अपवाद के तौर पर भी ऐसा कुछ किया है जो भारत का अल्पसंख्यक हर दिन कर रहा है। पाकिस्तान में हिंदुओं और ईसाइयों ने कितने मुसलमानों की गर्दनें उतारीं, कितनी मुस्लिम बच्चियों को टुकड़े-टुकड़े करके सूटकेस में भर दिए? पूरे उत्तर पूर्वी भारत को ईसाई बना दिया गया है। आज पंजाब में हिंदुओं का धर्मांतरण करवाकर ईसाई बनाने का अभियान जोरों पर है, फिर भी यहां इसाइयों पर दोयम दर्जे के नागरिक होने का खतरा है। रिबेरो साहब! ये भारत है, भगवामय भारत जिसमें आप ऐसे बेसिर-पैर की बातें करके हिंदुओं के खिलाफ एजेंडा चला सकते हैं।

आपको भी पता है कि भारत के भगवामय पाकिस्तान होने जैसी कोई आशंका नहीं है, वरना सत्ताधारी दल आपके बयानों का जवाब नहीं दे रहा होता, सीधे पाकिस्तानी स्टाइल में इलाज कर देता। इसलिए रिबेरो साहब और आप जैसों को सलाह है- भेड़िया-भेड़िया की फालतू रट छोड़िए वरना गलती से भी भेड़िया आ गया तो आगे की कहानी मालूम ही है। हां, आप अपने एजेंडे को हवा देते रहकर भी बेफिक्री की जिंदगी बिता सकते हैं क्योंकि कोई सच्चा देशभक्त भगवामय भारत को तो दिल में बसाएगा लेकिन इस पर पाकिस्तान की थोड़ी सी छाप भी पड़ने नहीं देगा।

जब हवस पूरी करने के लिए पिता ही बन गया जल्लाद?

हाल ही में एक ऐसी खबर आई जिसमें हवस पूरी करने के लिए एक पिता ही जल्लाद बन गया! उसकी बहुत ही प्यारी इकलौती बेटी थी। बड़े नाजों से उसे पाल रहा था। दुनिया की हर खुशी अपनी बेटी को देना चाहता था। लेकिन करोड़ों के कर्ज में डूबा वह कारोबारी हैवान बन गया। कर्ज न चुकाना पड़े, इसके लिए उसने खतरनाक प्लान बनाया। घर छोड़ने का प्लान। प्लान ये कि नई जगह पर नई पहचान के साथ नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत। लेकिन 10 साल की बेटी का क्या होगा? पत्नी तो किसी तरह गुजारा कर लेगी लेकिन बेटी। फिर क्या था। जिन हाथों से कभी बेटी को गोद में उठाकर खिलाया था, उन्हीं हाथों से उस हैवान ने अपने जिगर के टुकड़े का ही गला घोंट दिया। उसके बेजान पड़े शरीर को नदी में फेंक आया। शातिराना अंदाज में अपने गुनाह के हर निशां को मिटाने की कोशिश की। अगर उस बेटी की आत्मा बात करती होती तो उस हैवान से जरूर पूछती- पापा मेरा कसूर क्या था? अब उस हैवान को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। वैगा हत्याकांड की ये पूरी कहानी दिल को झकझोर कर रख देने वाली है। 21 मार्च 2021 का दिन। 10 साल की वैगा को उसका पिता सानू मोहन अलपुज्जा में अपने रिश्तेदार के यहां से अपने साथ लेकर निकलता है। वह पत्नी को रिश्तेदार के यहां ही छोड़ देता है कि वह अपने एक अंकल के यहां जा रहा। वैगा के साथ वह किसी अंकल के यहां जाने के बजाय कोच्चि के कंगरापादी स्थित अपने फ्लैट पहुंचता है। कुछ देर बाद वह अपार्टमेंट से बाहर जाता दिखता है। उसके बाद से ही दोनों लापता हो जाते हैं। उनका कोई सुराग नहीं मिलता। रिश्तेदार उसी दिन दोनों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। अगले दिन यानी 22 मार्च को कोच्ची के मुट्टार नदी में वैगा की तैरती हुई लाश मिलती है। सानू मोहन गायब था। पुलिस जांच में जुटती है। शक की सूई सानू की ओर घूमती है जो लापता था। पता चला कि वह केरल से भाग चुका है। वह सबसे पहले कोयंबटूर पहुंचा। वहां से कर्नाटक भाग गया। पुलिस करीब एक महीने तक उसकी तलाश करती रही। आखिरकार 18 अप्रैल 2021 को उसे कर्नाटक के करवार में गिरफ्तार कर किया गया।

पूछताछ में उसने अपनी बेटी की हत्या की जो कहानी बताई वह रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। 21 मार्च को वैगा जब सानू मोहन के साथ निकली तो उसे क्या पता था कि उसके पिता के दिमाग में क्या चल रहा है। उसे क्या पता था कि हैवान पिता उसकी जान लेने की प्लानिंग बना रहा है। रास्ते में उसने बेटी को कोकाकोला पीने के लिए दिया लेकिन उसमें वह शराब मिला रखा था। फ्लैट पहुंचते-पहुंचते वैगा नशे के आगोश में चली गई। वहां पहुंचते ही सानू ने वैगा का गला घोंट डाला। हत्या के बाद उसने बेटी के बेजान शरीर को चादर में लपेटा और रात के अंधेरे में उसे ठिकाने लगाने के लिए अपनी कार से निकल गया। उसने अपने और बेटी के फोन को भी नष्ट कर दिया। रात करीब साढ़े 10 बजे के करीब उसने वैगा की लाश को मुट्टार नदी में फेंक दिया।

पुलिस के मुताबिक, सानू ने वैगा की हत्या के बाद फरार होने और नए सिरे से जिंदगी जीने का प्लान बनाया था ताकि वह कर्ज चुकाने से बच जाए। जांचकर्ताओं को भटकाने के लिए उसने खुदकुशी की कोशिश का नाटक तक किया। उसने पुलिस को बताया कि वैगा को मारने के बाद उसने खुद भी जान देने की कोशिश की लेकिन पुलिस जांच में साफ हुआ कि वह झूठी कहानी बना रहा है।

इस सनसनीखेज हत्याकांड ने पूरे केरल को हिला दिया था। पुलिस ने 9 जुलाई 2021 को सानू के खिलाफ कोर्ट में 236 पन्नों की चार्जशीट पेश की। उस पर बेटी का अपहरण करने, हत्या करने, सबूत मिटाने, नशीला पदार्थ देने जैसे आरोप तय किए गए। एर्नाकुलम के स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने बुधवार को इस मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने सानू के खिलाफ लगे सभी आरोपों को सच पाया। अभियोजन पक्ष ने हैवान पिता को फांसी की सजा देने की मांग की लेकिन कोर्ट ने हत्या के जुर्म में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा बाकी के आरोपों में उसे अलग-अलग कुल 28 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई जिनमें सबसे लंबी सजा 10 साल की है। जज के सोमन ने अपने आदेश में कहा है कि दोषी पहले 28 साल कैद की सजा भुगतेगा और उसके बाद उम्रकैद की सजा होगी। यानी पहले वह उम्रकैद से इतर सबसे लंबी 10 साल की सजा काटेगा और उसके बाद उम्रकैद की सजा शुरू होगी। कोर्ट ने सानू पर 1,70,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। उसने अदालत से इस आधार पर सजा में नरमी की भीख भी मांगी कि उसकी 70 साल की बूढ़ी मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं है लेकिन अदालत ने उसकी ये दलील खारिज कर दी।

सानू की अपने क्षेत्र में एक बड़े कारोबारी की पहचान थी लेकिन वह कर्ज पर कर्ज लेता रहा। करोड़ों रुपये का कर्ज चुकाने से बचने के लिए उसने ऐसा खतरनाक प्लान बनाया कि अपने ही हाथों से फूल सी बेटी को मार डाला। अब उस हैवान पिता की बाकी जिंदगी जेल में बीतने वाली है। अगर पिता ही हैवान बन जाए तो कोई वैगा भला कैसे कहेगी- अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ। खैर कोर्ट के फैसले से वैगा की आत्मा को शांति जरूर मिली होगी।

क्या 2024 में भी भारत की अर्थव्यवस्था में आएगा उछाल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था में 2024 में भी उछाल आएगा या नहीं! 2023 में दुनिया ने कई उतार-चढ़ाव देखे। व्यापार में तनाव, बढ़ती ब्याज दरें और राजनीतिक झगड़ों के बावजूद कोई बड़ा आर्थिक हादसा नहीं हुआ और दुनिया ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। एसएंडपी ग्लोबल को उम्मीद है कि 2022 के 3.4% की तुलना में 2023 में दुनिया का कुल सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी 3.3% बढ़ेगा। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका मंदी से बच गया और 2023 में 2.5% की अच्छी वृद्धि होने का अनुमान है। दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की जीडीपी में सुधार हुआ क्योंकि कोविड प्रतिबंध हटा दिए गए और सरकार ने बाजार की मजबूती की दिशा में कई बड़े कदम उठाए। 2023 की विकास गाथा भारत के नाम रही है, जिसकी जीडीपी अनुमान से अधिक दर से बढ़ी है। आरबीआई ने इस वित्तीय वर्ष 2023-24 में 7% के जीडीपी ग्रोथ का अनुमान लगाया है। भारत की अर्थव्यवस्था के विकास को वैश्विक विकास से कुछ तेजी मिली, लेकिन सरकार समर्थित इन्वेस्टमेंट साइकल, रियल एस्टेट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पुनरुद्धार ने भी बढ़ोतरी में योगदान दिया। लेकिन 2023 के अंत में माहौल फिर से अनिश्चित हो गया है। हमारा अनुमान है कि 2024 में वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ेगी, लेकिन उसके बाद फिर गति पकड़ेगी। इस वित्तीय वर्ष के दूसरे भाग में भारत की वृद्धि पहली छमाही के 7.6% के बाद धीमी होकर 6.3% हो जाएगी। फिर अगले वित्त वर्ष 2024-25 में इसके 6.4% पर होने की उम्मीद है। उच्च ब्याज दरें, फिस्कल कंसॉलिडेशन और धीमी वैश्विक वृद्धि हमारी आर्थिक विकास की रफ्तार धीमा करेंगे।

वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से अमेरिका, धीमी पड़ेगी क्योंकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चरम प्रभाव 2024 की पहली छमाही में महसूस किया जाएगा। यह निर्यात मांग के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका अब भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और हमारे साथ उसका ट्रेड सरप्लस है। उभरती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अपेक्षाकृत लचीले रहने का अनुमान है, लेकिन इन अर्थव्यवस्थाओं में हमारे निर्यात का हिस्सा घट गया है। राहत की बात है कि अधिकांश बहुपक्षीय पूर्वानुमान धीमी वृद्धि के बावजूद 2024 में गुड्स ट्रेड में तेजी का संकेत दे रहे हैं।

दुनियाभर में ब्याज दरें और महंगाई भले ही अपने शीर्ष पर पहुंच गई हों, फिर भी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में जल्दी कटौती करने में सावधानी बरतेंगे क्योंकि महंगाई अब भी उनके लक्ष्यों से ऊपर है। भारत सरकार ने महामारी के बाद बुनियादी ढांचे के निर्माण में तेज वृद्धि के लिए सरकारी खर्च में काफी बढ़ोतरी की और राज्यों को उनके निवेश प्रयासों को बढ़ाने के लिए ब्याज मुक्त कर्ज भी दिया। अगले वित्त वर्ष में सरकार वित्तीय सुदृढ़ीकरण के लिए सरकारी खर्च कम करेगी तब निवेश की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को अपने कंधों पर उठानी होगी। इसके लिए अधिकारियों को निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए निवेश के माहौल को और बेहतर बनाने की कोशिशों में तेजी लाने की जरूरत है। कंपनियों की मजबूत स्थिति, मैन्युफैक्चरिंग में बढ़ता कैपिसिटी यूटिलाजेशन और प्रॉडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव्स योजना पीएलआई स्कीम प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में तेजी लाते हैं।

एल निनो का खतरा 2024 तक बढ़ने की आशंका के साथ मौसम खाद्य उत्पादन और महंगाई पर एक प्रमुख प्रभाव बना रहेगा। कृषि में दूसरी तिमाही में केवल 1.2% की वृद्धि हुई और पूरे वित्त वर्ष में भी वृद्धि कम रहने की आशंका है क्योंकि खरीफ फसल उत्पादन गिरने का अनुमान है और रबी फसल जलाशयों में कम पानी के दुष्प्रभाव का सामना कर सकता है। इस साल नवंबर तक वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक औसत से 1.5°C अधिक हो गया है, इसलिए 2023 इतिहास में सबसे गर्म वर्ष बनने वाला है। इसलिए जलवायु अनुकूलन और शमन के उपाय आने वाले समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। लगातार बढ़ती खाद्य कीमतें अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों में फैल सकती हैं और महंगाई को और बढ़ा सकती हैं। इसलिए फ्यूल और कोर इन्फ्लेशन के कम स्तर पर रहने के बावजूद आरबीआई महंगाई को नियंत्रण में रखने का दावा नहीं करेगा। ब्याज दरों में कटौती अगले साल अप्रैल-जून की तिमाही में ही हो सकती है।

अब तक जियो-पॉलिटिकल घटनाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर नहीं किया है, लेकिन हाल ही में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से इसका टेस्ट होगा क्योंकि व्यापार लागत बढ़ने लगी है और कच्चे तेल पर दबाव पड़ सकता है। 2024 में अमेरिका और भारत सहित रिकॉर्ड 40 देशों में आम चुनाव होने वाले हैं। इससे अनिश्चितताओं में एक राजनीतिक पहलू जुड़ जाता है, खासकर इसलिए क्योंकि इनमें से कई देश बड़ी आबादी वाले और आर्थिक रूप से प्रभावशाली हैं। वैश्विक कर्ज अब जीडीपी का लगभग 3.5 गुना है। उच्च ब्याज दरें और धीमी विकास, वित्तीय दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ाते हैं।कुल मिलाकर 2024 के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर आम राय कम मुद्रास्फीति और सकारात्मक जीडीपी ग्रोथ सॉफ्ट लैंडिंग की ओर इशारा करता है। लेकिन इतनी अनिश्चितताओं के बीच यह भी कोई पक्का भविष्य नहीं है। देशों और व्यापारों को सावधानी बरतनी चाहिए और आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत फिलहाल स्वस्थ कंपनी, बैंक बैलेंस शीट और विदेशी मुद्रा भंडार के कारण अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।

क्या लोन देने वाले ऐप से हो रहा है क्राइम?

वर्तमान में लोन देने वाले ऐप से क्राइम होता जा रहा है! सोशल मीडिया फिर से निशाने पर है, और यह सही भी है। भारत सरकार ने उन्हें धोखाधड़ी वाले डिजिटल लोन ऐप्स डीएलए के विज्ञापन दिखाने को लेकर चेतावनी दी है। लेकिन इन विज्ञापनों को दिखाने में भले ही सोशल मीडिया लापरवाह हो, असली अपराध तो ऑनलाइन लोन देने वालों की हैवानियत है। ये तेजी से बढ़ते प्लैटफॉर्म का फायदा उठाकर छोटे खुदरा कर्ज का जाल बिछा रहे हैं। इस साल संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में डिजिटल लोन 2012 से 2023 के बीच सालाना 39.5% बढ़कर 350 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस वृद्धि का एक हिस्सा डिजिटल लोन ऐप्स डीएलए के कारण हुआ है। डीएलए के कारोबार का सही आकलन करना मुश्किल है क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा अवैध है। आरबीआई ने जनवरी और फरवरी 2021 में दो महीने तक डिजिटल लोन ऐप्स का अध्ययन किया। उसने पाया कि 81 ऐप स्टोर पर 1,100 लोन ऐप उपलब्ध थे। इनमें से 600 अवैध थे। कंज्यूमर सर्वे और पुलिस जांच अवैध लोन ऐप की दुनिया की दो मेन फीचर्स की ओर इशारा करते हैं। अवैध लोन ऐप ग्राहकों को उसी कारण से आकर्षित करते हैं जिस कारण से इन्फॉर्मल फाइनैंसिंग हमेशा करता है- आसानी। जरूरतमंद लोगों को आसानी से लोन मिल जाता है। ब्याज दरें बैंकों की तुलना में कहीं अधिक होती हैं, लेकिन उसके बाद जो होता है वह डिजिटल वर्ल्ड के लिए बहुत खतरनाक है।

ऐप फोन पर डाउनलोड किए जाते हैं। धोखाधड़ी करने वाले लोन ऐप अवैध रूप से लोन लेने वालों के फोन डेटा को कॉपी करते हैं। फिर उस डेटा का इस्तेमाल कर्जदारों को परेशान करने के लिए किया जाता है जब वे रीपेमेंट में देरी करते हैं। पुलिस जांच दिखाती है कि यह धोखाधड़ी कैसे होती है। उत्पीड़न का तो एक तरीका है लोन लेने वाले का फोटो बिगाड़कर उसे उसके कॉन्टैक्ट लिस्ट के लोगों को भेजना। इससे कई बार आत्महत्या तक हो चुकी है। आरबीआई का दायरा बैंकों, एनबीएफसी जैसे वित्तीय मध्यस्थों तक सीमित है। ये सब भी हमेशा निर्दोष नहीं होते हैं। 2022-23 में इनके खिलाफ 1,062 शिकायतें दर्ज हुई थीं, लेकिन अवैध लोन ऐप का मामला तो अलग ही स्तर का है। कुछ मामलों में जांच से पता चला है कि ऐप का मालिकाना हक हॉन्गकॉन्ग से संचालित चीनी कंपनियों के पास है। लोन ऐप के अपराध में मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल भी है। इस कारण उनसे निपटने के लिए कई एजेंसियों को साथ काम करने की जरूरत पड़ती है।

अप्रैल 2021 से जुलाई 2022 के बीच 2,500 से अधिक ऐप्स को प्ले स्टोर से हटा दिया गया। यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसे सार्वजनिक जागरूकता अभियानों, तेज पुलिसिया जांच और अपराधियों के खिलाफ त्वरित मुकदमे के जरिए साथ दिया जाना चाहिए। लेकिन भविष्य में ऐसी समस्या पैदा ही नहीं हो, इसके लिए जरूरी है कि वैध तरीकों से लोन लेने की प्रक्रिया आसान हो जाए। जब रेग्युलेटेड कंपनियां लोगों को लोन नहीं देती हैं तो अपराध को फलने-फूलने का मौका मिल जाता है। यहि नहीं आपको बता दें कि जासूस भी क्राइम सीन पर आकर फिंगरप्रिंट्स के निशान लेते हैं। ये एक अनोखा बायोलॉजिकल निशान होते हैं, जो अपराध को अपराधी से जोड़ता है। दिल्ली पुलिस इस अनोखी तकनीक पर पर आजकल जबरदस्त भरोसा कर रही है। इससे केवल अपराध का ही खुलासा नहीं होता है बल्कि अपराधियों को भी पकड़ा जा रहा है। पिछले साल कई सालों से अटके केसों का भी खुलासा हुआ। हाल में ही जारी 2022 पर ‘फिंगरप्रिंट्स इन इंडिया’ के डेटा में नेशनल फिंगरप्रिंट्स पहचान व्यवस्था की जानकारी मिलती है। दिल्ली में 3 लाख 74 हजार 061 लोगों का डेटाबेस है। पिछले साल तक फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो ने सजा पाए 1 लाख 19 हजार 611 लोगों के प्रिंट्स लिए थे। रिपोर्ट में ये बताया गया है कि इसके जरिए कई स्लिप ब्यूरों के पास मौजूद प्रिंट्स के जरिए संदिग्ध का आपराधिक इतिहास की जानकारी दिल्ली फिंगरप्रिंट्स ब्यूरों को मिले। डेटा से पता जलता है कि 2,269 फिंगरप्रिंट्स सजायाफ्ता लोगों के थे। इन लोगों में 1,095 लोगों के प्रिंट्स पिछले साल ही लिए गए थे। इसके अलावा हत्या का प्रयास मामले में भी बड़े पैमाने पर प्रिंट्स जुटाए गए हैं।

फिंगरप्रिंट्स विशेषज्ञ करीब 17,564 क्राइम सीन पर सबूत तलाशने में गए करीब और 2022 में करीब 1,530 केसों में 5,478 चांस प्रिंट्स लिए थे। चांस प्रिंट में पैर, हथेली, अंगुली, पैर का अंगूठा, जूते, घटनास्थल पर पड़े चप्पल या अन्य वस्तुओं पर पड़े निशान लिए जाते हैं। 2021 की तुलना में 2022 में प्रिंट्स लेने की संख्या 50 फीसदी ज्यादा रहे। इसके अलावा ब्यूरो ने 137 विदेशियों के फिंगरप्रिंट्स लिए। दिल्ली फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो ने 2022 में 45 केसों में 1,191 प्रिंट्स लिए। 14 मामलों में ब्यूरो एक्सपर्ट गवाह के तौर पर कोर्ट में उपस्थित हुआ था।

फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की स्थापना 1987 में हुई थी। ये क्राइम ब्रांच के विशेष आयुक्त के नेतृत्व में काम करता है। एक एसीपी रैंक के अधिकारी इसके इंचार्ज होते हैं। इस वक्त दिल्ली ब्यूरों के पास 9 डिस्ट्रिक्ट मोबाइल टीम है जो क्राइम सीन पर जांच के लिए जाते हैं। विशेष पुलिस आयुक्त रवींद्र यादव ने बताया कि फिंगरप्रिंट्स विश्लेषण तकनीक से आरोपियों की पहचान की सिस्टम को और मजबूती मिली है। चांस प्रिंट्स के जरिए कई केसों का खुलासा हुआ और लंबे अरसे से अटके केस भी साल्व हुए हैं।

क्या कतर में मिली सफलता के लिए बीजेपी को 2024 में मिलेगी सफलता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कतर में मिली सफलता के लिए बीजेपी को 2024 में सफलता मिलेगी या नहीं! महंगाई, बेरोजगारी, संसद सुरक्षा चूक समेत कई मामलों को लेकर पीएम मोदी और बीजेपी को घेरने की रणनीति में व्यस्त I.N.D.I.A. गठबंधन के सामने आज फिर एक और नई चुनौती आ गई है। यह चुनौती है पीएम मोदी की बढ़ती लोकप्रियता जिसका असर ना केवल देश में बल्कि विदेशों में भी दिखाई दे रहा है। दरअसल कतर में पूर्व भारतीय नौसैनिकों की मौत की सजा पर रोक लग गई है। इसे भारतीय कूटनीति और पीएम मोदी की बहुत बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दिसंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कतर के शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी से मुलाकात की थी और यह बड़ा फैसला उसी मुलाकात का असर है। यह बड़ा फैसला ऐसे में वक्त में आया है, जब देश में कुछ ही महीनों बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कतर पर भारत की कूटनीतिक जीत को बीजेपी पीएम मोदी की बड़ी कामाबाबी के तौर पर भुनाएगी। आगामी लोकसभा चुनावों की रैलियों में बीजेपी इस मुद्दे को देश की जनता के सामने लेकर जाएगी। बीजेपी इस मुद्दे पर चुनावी फायदा लेने की कोशिश करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कतर के शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी से दुबई में सीओपी28 शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने काफी देर तक बातचीत भी की थी। मुलाकात के एक दिन बाद दो दिसंबर को पीएम मोदी ने ट्वीट कर बताया था, ‘कल दुबई में COP28 शिखर सम्मेलन के मौके पर कतर के अमीर महामहिम शेख तमीम बिन हमदद अल थानी से मिलने का अवसर मिला। द्विपक्षीय साझेदारी की संभावना और कतर में भारतीय समुदाय की भलाई पर हमारी अच्छी बातचीत हुई।’ कतर की ओर से इस मुलाकात को लेकर कोई खास जानकारी नहीं दी गई।

पीएम मोदी ने हाल ही में कहा था कि ‘जब सभी से उम्मीद खत्म हो जाती है, तब ‘मोदी की गारंटी’ शुरू होती है।’ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मोदी की गारंटी का फॉर्मूला बीजेपी के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है। कतर में 8 पूर्व नौसैनिकों की मौत की सजा पर रोक इसका बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी की गारंटी का जिक्र करते हुए कतर मामला जनता के सामने जरूर उठाएगी। पीएम मोदी कई जनसभाओं में बोल चुके हैं कि देश या देश से बाहर भारत के नागरिकों की सुरक्षा सरकार के लिए पहली प्राथमिकता है। रूस और यूक्रेन युद्द के दौरान भी कई भारतीयों को सुरक्षित भारत लाया था। वहीं हाल ही में इजरायल और हमास युद्ध के दौरान भी भारतीयों की युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित घर वापसी हुई थी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दुनिया में पीएम मोदी की बढ़ती लोकप्रियता का फायदा बीजेपी लोकसभा चुनाव में मिलना तय है।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कतर में इंडियन नेवी के 8 पूर्व कर्मचारियों को मौत की सजा सुनाए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए सरकार पर हमला बोला था। तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा था कि उन्होंने पिछले साल संसद में भी इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री ने न तो पूर्व नौसैनिकों के परिजनों की बात को गंभीरता से ली और न ही एक्स-सर्विसमेन की बातों को। यहां तक कि संसद सदस्य की बातों को भी गंभीरता से नहीं लिया गया जो त्रासद है। कांग्रेस सांसद ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस मुद्दे को कतर सरकार के साथ सर्वोच्च स्तर पर उठाना चाहिए और पूर्व नेवी अफसरों को घर लाना चाहिए।

उधर हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरा था। उन्होंने पीएम मोदी पर भी तंज कसा था कि वह इस बात की ‘शेखी बघारते’ रहते हैं कि इस्लामी देश उनसे कितना प्यार करते हैं। ओवैसी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया था, ‘अगस्त में मैंने कतर में फंसे पूर्व नौसेना अधिकारियों का मुद्दा उठाया था। आज उन्हें मौत की सजा सुनाई गई है। नरेंद्र मोदी शेखी बघार चुके हैं कि इस्लामी देश उनसे कितना प्यार करते हैं। उन्हें हमारे पूर्व नौसेना अधिकारियों को वापस लाना होगा।’ लेकिन कतर पर पीएम मोदी को बड़ी कामयाबी मिल गई है, जिससे विपक्षी दलों को करारा जवाब मिला है। कतर की एक अदालत ने अक्टूबर में 7 सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारियों और एक नाविक को मौत की सजा सुनाई। ये लोग अल दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज के कर्मचारी थे, जो एक निजी कंपनी थी जो कतर के सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों को प्रशिक्षण और अन्य सेवाएं प्रदान करती थी। उन्हें पिछले साल अगस्त से अज्ञात आरोपों के चलते गिरफ्तार किया गया था। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि उन पर कथिक रूप से जासूसी के आरोप लगाए गए हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

भारत और कतर के बीच दो दिसंबर 2014 को एक संधि हुई थी। इस संधि के तहत भारत और कतर दोनों देश एक-दूसरे की जेलों में बंद नागरिकों को अपनी बाकी बची सजा काटने के लिए उनके देश भेज सकेंगे। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि पूर्व भारतीय नौसैनिकों के मामले में भी ऐसा देखने को मिल सकता है। वह अपनी शेष सजा भारत की ही जेल में काट सकते हैं।

ओवरसीज मिशन में भारत को कैसे मिली सफलता?

आज हम आपको बताएंगे कि ओवरसीज मिशन में भारत को सफलता कैसे मिली! आज यानी 28 दिसंबर का दिन भारतीयों के लिए राहत और बड़ी जीत लेकर आया। कतर में 2022 से फंसे पूर्व भारतीय नौसैनिकों की फांसी की सजा पर रोक लगा दी गई है। कतर की अपील कोर्ट ने 8 पूर्व नौसैनिकों को बड़ी राहत दी है। हालांकि अभी भी ये लोग जेल में ही रहेंगे। इसी साल अक्टूबर में उन्हें फांसी देने का फैसला किया गया था। लेकिन भारत की ओर से इन दो महीनों नवंबर और दिसंबर में जबरदस्त कूटनीति देखने को मिली। पीएम मोदी की कतर के शासक से मुलाकात ने गेंद अपने पाले में कर ली। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की इस मुलाकात ने कतर को भी नरमी बरतने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन मोदी के राज में यह कोई पहला मौका नहीं है। इससे पहले यूक्रेन में भारतीयों की वापसी के लिए भारत ने ऑपरेशन गंगा चलाया था। सभी भारतीयों को सफलतापूर्वक लाने वतन वापसी कराने पर सबने दाद दी थी। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यमन में भारतीयों की वापसी के लिए सऊदी अरब, यूएई ने हवाई हमले रोक दिए थे और भारतीय नौसेना को सहायता दी थी। जी20 में घोषणापत्र पर आम सहमति और बिना रूस का नाम लिए, किसी बड़ी जीत से कम नहीं थी। आज हम आपको मोदी सरकार के कार्यकाल में ओवरसीज ओवरसीज मिशन में किस तरह से सफलता मिली उसकी कहानी बयां करेंगे। 8 पूर्व भारतीय नौसैनिकों पर अज्ञात आरोपों के चलते कतर ने उन्हें अपने यहां कैद कर रखा था। अक्टूबर 2022 से कैद ये भारतीय नौसैनिक उम्मीद की किरण देख रहे थे। फिर इस साल अचानक उनकी सजा को फांसी में बदल दिया गया। इसपर भारत ने हैरानी जताई और सभी तरह के कानूनी विकल्पों रपर गौर किया। दाहरा ग्लोबल टेक्नॉलजी ऐंड कंसल्टेंसी सर्विसेज के लिए काम करने वाले ये 8 भारतीय नौसेना अफसरों को शायद ही मालूम था कि उनके साथ क्या होने वाला है। यहीं पर भारत की कूटनीति काम आई। कतर पर दबाव बनाने के लिए खुद पीएम मोदी ने शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी से मुलाकात की। उसके बाद से कतर के तेवर नरम हुए और आज नतीजा सबके सामने है। कतर ने पीएम मोदी और शेख तमीम बिन हमद अल थानी की मुलाकात के तुरंत बाद भारत को पूर्व नौसैनिकों से मिलने के लिए दूसरी बार कांसुलर एक्सेस दी थी। तभी लग गया था कि कतर इस मामले को लेकर अब नरम रुख दिखा रहा है। बता दें कि पीएम मोदी और कतर के अमीर के बीच दुबई में इस साल हुए कॉप28 सम्मेलन के दौरान हुई थी।

इसी साल सितंबर में भारत ने देश की राजधानी दिल्ली में सफलतापूर्वक जी20 आयोजित किया था। अमेरिका, इटली, जापान, ब्राजील,रूस सहित कई देशों के राष्ट्रध्यक्ष एक मंच पर साथ थे। लेकिन घोषणापत्र पर सहमति नहीं बन पा रही थी। वजह था रूस। यूक्रेन क खिलाफ युद्ध के बाद से कई देश इसके खिलाफ थे। आम सहमति नहीं बन पा रही थी। लेकिन भारत ने शाम तक कुछ ऐसा कूटनीतिक पासा फेंका कि सभी इस घोषणापत्र पर एक सुर अलापने लगे। भारत ने रूस का नाम लिए बिना दिल्ली के घोषणापत्र पर बाकी देशों की आम सहमति पा ली थी। फ्रांस और यूरोपीय देशों ने भारत के इस प्रयास की दिल खोलकर तारीफ की थी। पीएम मोदी ने शिखर सम्मेलन के दिन घोषणा की और यह भारत की बड़ी जीत साबित हुई।

साल 2022 में शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध के वक्त भारत के रूख की भी बात हुई। लेकिन यहां भी भारत ने अपनी कूटनीति का परिचय दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख तटस्थता और शांति की वकालत करने का रहा है। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस की निंदा वाले प्रस्तावों से भी खुद को अलग रखा था। भारत ने युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त करने की अपील कीऔर दोनों पक्षों के बीच बातचीत से समाधान निकालने का आह्वान किया। विदेश मंत्री जयशंकर और पीएम मोदी ने बिना किसी के दबाव में आए बगैर हमेशा एक अलग रणनाति अपनाई। विदेशी मंचों और रूस-यूक्रेन के राष्ट्रपतियों व्लादिमीर पुतिन और वोलेदिमीर जेलेंस्की से आधिकारिक बातचीत में भी दोनों को साथ आकर बातचीत करने और युद्ध रोकने की बात दोहराई गई थी। भारत के इस रुख ने उसपर पश्चिमी देशों का दबाव भी नहीं बनने दिया। भारत के इस रुख के पीछे कई कारण हैं।

भारत के इस रुख की आलोचना भी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत को रूस की निंदा करनी चाहिए और यूक्रेन का समर्थन करना चाहिए। हालांकि, भारत का मानना है कि उसका तटस्थ रुख ही युद्ध को समाप्त करने के लिए सबसे अच्छा तरीका है। भारत के रुख को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि युद्ध के बाद भारत रूस के साथ अपने संबंधों को कैसे आगे बढ़ाएगा। हालांकि, यह संभावना है कि भारत रूस के साथ अपने रक्षा संबंधों को बनाए रखेगा। साथ ही, भारत यूक्रेन के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत करने का प्रयास करेगा। ऑपरेशन रक्षक भारत सरकार द्वारा यमन में फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए चलाया गया एक सैन्य अभियान था। यह अभियान 2015 में यमन में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद शुरू हुआ था। ऑपरेशन रक्षक के तहत, भारतीय वायु सेना ने यमन के विभिन्न शहरों से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए सैकड़ों उड़ानें भरी। इन उड़ानों में भारतीय नागरिकों के अलावा, कई अन्य देशों के नागरिक भी शामिल थे। ऑपरेशन रक्षक की सफलता से भारत सरकार की वैश्विक छवि को मजबूती मिली। इस अभियान में भारत सरकार ने अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। ऑपरेशन रक्षक के तहत निकाले गए भारतीय नागरिकों की संख्या 4,500 से अधिक थी। इन नागरिकों को भारतीय वायु सेना के विमानों से भारत के विभिन्न शहरों में लाया गया। ऑपरेशन रक्षक के तहत निकाले गए भारतीय नागरिकों में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल थे। इन नागरिकों को यमन में गृहयुद्ध के कारण भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। ऑपरेशन रक्षक की सफलता के लिए भारतीय वायु सेना के जवानों ने कड़ी मेहनत की थी। इन जवानों ने यमन में खतरनाक परिस्थितियों में भी भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने में सफलता हासिल की।

ऑपरेशन संजीवनी भारत सरकार द्वारा श्रीलंका में आर्थिक संकट के कारण फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए चलाया गया एक मानवीय अभियान था। यह अभियान 2022 में श्रीलंका में आर्थिक संकट शुरू होने के बाद शुरू हुआ था। ऑपरेशन संजीवनी के तहत, भारतीय वायु सेना ने श्रीलंका के विभिन्न शहरों से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए सैकड़ों उड़ानें भरी। इन उड़ानों में भारतीय नागरिकों के अलावा, कई अन्य देशों के नागरिक भी शामिल थे। ऑपरेशन संजीवनी की सफलता से भारत सरकार की वैश्विक छवि को मजबूती मिली। इस अभियान में भारत सरकार ने अपने नागरिकों की मदद करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। ऑपरेशन संजीवनी के तहत निकाले गए भारतीय नागरिकों की संख्या 2,000 से अधिक थी। इन नागरिकों को भारतीय वायु सेना के विमानों से भारत के विभिन्न शहरों में लाया गया।

मोदी सरकार में भारत की एक और जीत खाड़ी देशों में मिली कही जा सकती है। मोदी इन देशों में जहां भी गए वहां उन्हें वहां के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। सबसे पहले पीएम मोदी को पापुआ न्यू गिनी के गवर्नर-जनरल सर बॉब डाडे ने अपने देश के सर्वोच्च सम्मान ग्रैंड कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ लोगोहू से सम्मानित किया था। इसी दिन फिजी के पीएम सित्विनी राबुका ने PM मोदी को ‘कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ फिजी’ से सम्मानित किया था। इसके अलावा पलाऊ गणराज्य के राष्ट्रपति सुरंगेल एस व्हिप्स जूनियर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च सम्मान ‘एबाक्ल अवॉर्ड’ से सम्मानित किया था। मोदी को भारत के दोस्त रूस ने ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू से सम्मानित किया था। इसके पहले साल 2021 में भी पीएम को भूटान ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रक ग्यालपो’से पीएम मोदी को नवाजा था।

इसके 2 साल पहले बहरीन ने PM मोदी को ‘द किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां’ से सम्मानित किया था। अगस्त 2019 में ही संयुक्त अरब अमीरात ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहाँ के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। यह यूएई का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। फरवरी 2018 में फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने पीएम मोदी को ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। जून 2016 में तब के अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘अमीर अमानुल्लाह खान पुरस्कार’ से सम्मानित किया था। वहीं, अप्रैल 2016 में ही सऊदी अरब की यात्रा पर पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तब सऊदी अरब के किंग सलमान बिन अब्दुलअजीज ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘किंग अब्दुलअजीज सैश’ से सम्मानित किया था।

क्या नीतीश कुमार की जगह तेजस्वी यादव बन सकते हैं मुख्यमंत्री?

आने वाले समय में नीतीश कुमार की जगह अब तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बन सकते हैं! बिहार की सियासत में बेमौसम गरमाहट छाई हुई है। वैसे तो लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर अभी से ही देश भर में चहल-पहल बढ़ने लगी है। देश की जब भी चर्चा होती है तो उसका कनेक्शन बिहार से स्वतः जुड़ ही जाता है। बिहार की धरती प्रयोगधर्मी रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अब तक बड़े परिवर्तन का आगाज बिहार से होता रहा है। लंबे समय तक बिहार में शासन कर लालू यादव ने सामाजिक न्याय का कॉन्सेप्ट विकसित किया तो उसी की देखादेखी बसपा प्रमुख मायावती ने उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग का नुस्खा बनाया। लालू बिहार में जंगल राज के लिए ‘मशहूर’ रहे तो नीतीश कुमार ‘सुशासन’ की वजह से पहचाने गए। दोनों धुर विरोधी फिलवक्त एक साथ हैं। पता नहीं, राजनीतिक शब्दावली में इस घालमेल को अब कौन-सा नाम दिया जाएगा। बिहार की सियासत की गरमाहट के केंद्र में अभी नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू है। बीजेपी के साथ रह कर लगातार जेडीयू पल्लवित-पुष्पित होती रही। जेडीयू को पहली बार सदमा वर्ष 2020 में तब लगा, जब विधानसभा के चुनाव हुए। उसके साल भर पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने भाजपा के साथ अपने संबंधों का भरपूर सियासी लाभ उठाया था। लोकसभा में जेडीयू ने बीजेपी के बराबर सीटों पर चुनाव लड़ कर 16 पर कामयाबी हासिल की थी। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में पता नहीं कौन-सी ऐसी हवा चली कि नीतीश की पार्टी जेडीयू सबसे खराब स्थिति में पहुंच गई। उसे भाजपा से तकरीबन आधी महज 43 सीटों पर कामयाबी मिली, जबकि भाजपा के बराबर सीटों पर जेडीयू ने भी चुनाव लड़ा था।

नीतीश कुमार ने 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को मिली सफलता के बाद ये मुगालता पाल लिया था कि उनकी वजह से ही बीजेपी बिहार में पनप रही है। सच तो ये है कि बीजेपी ने बिहार को गैर दलीय व्यक्ति नीतीश कुमार के भरोसे ही छोड़ रखा था। उनका यही मुगालता आगे चल कर उनकी परेशानी का सबब बना। बीजेपी ने पीएम के लिए जब गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया तो नीतीश ऐसे बिदके, जैसे लाल कपड़ा देख कोई सांड भड़क जाता है। उन्होंने न सिर्फ इस फैसले पर अपनी आपत्ति जताई, बल्कि बीजेपी से झटके में कट्टी भी कर ली। वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव जेडीयू ने अकेले लड़ा और अपनी असलियत भी पार्टी ने जान ली। नीतीश के चेहरे पर अकेले लड़े गए चुनाव में जेडीयू के खाते में सिर्फ दो सीटें आईं।

अब तक नीतीश को अपनी हैसियत का पता चल चुका था। उन्हें एहसास हो गया कि अकेले जेडीयू के भरोसे बिहार की सत्ता पर काबिज होना मुश्किल है। तब उन्होंने आरजेडी प्रमुख लालू यादव से यारी गांठ ली। इसका सुखद परिणाम भी सामने आया। वर्ष 2015 में हुए विधानसभा चुनाव आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस ने मिल कर लड़ा। सीटें आरजेडी से जेडीयू को कम मिलीं, लेकिन सीएम की कुर्सी की गारंटी नीतीश पहले ही आरजेडी से ले चुके थे। यानी नीतीश ने बीजेपी की तरह महागठबंधन को भी आजमा कर देख लिया। दो खेमों- एनडीए और महागठबंधन में रह कर नीतीश ने दोनों को जांचा-परखा। उन्हें मूल चिंता कुर्सी की थी। कुर्सी सलामत रही। बाद में उन्हें लगा कि इससे बढ़िया तो एनडीए ही है। एनडीए में रहते उन्हें आरजेडी के साथ रहने जैसा दबाव कभी महसूस नहीं हुआ था। इसलिए आधा कार्यकाल पूरा करने से पहले ही उन्होंने आरजेडी को झटका दे दिया और दोबारा बीजेपी के खेमे में आ गए। बीजेपी के साथ आने का मतलब था कि पूरे कार्यकाल के लिए उनकी कुर्सी की सलामती। इसमें वे कामयाब रहे।

नीतीश की छवि उनकी पलटी मार राजनीति के कारण खराब हो गई। राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले नीतीश को इसका एहसास तक नहीं हुआ। वे बीजेपी के साथ 2020 के विधानसभा चुनाव में उतरे जरूर, लेकिन उनकी हरकतों से खार खाई जनता ने उन्हें सबक सिखा दिया। महज 43 विधायकों के साथ बीजेपी के रहमोकरम पर वे बिहार के फिर सीएम बन गए। हालांकि उन्होंने चुनावी नतीजों के बाद सीएम की अपनी दावेदारी वापस ले ली थी, लेकिन भाजपा ने उन्हें समझा-मना कर इसके लिए तैयार कर लिया। चूंकि, बीजेपी के विधायक जेडीयू से लगभग दोगुने थे, इसलिए उसकी मोनोपोली स्वाभाविक थी। बार-बार बीजेपी के नेता नीतीश को उनकी औकात का एहसास भी करा रहे थे। उन्हें भाजपा नेताओं के इस आचरण से भय था कि किसी दिन उनकी कुर्सी न चली जाए। इस बीच भाजपा नेताओं के इस बयान ने आग में घी का काम किया कि क्षेत्रीय दलों के दिन लद गए। नीतीश को अपने बाकी कार्यकाल पर खतरा दिखने लगा तो उन्होंने महागठबंधन से सांठगांठ कर मौजूदा कार्यकाल पूरा करने का बंदोबस्त कर लिया।

नीतीश ने आरजेडी को या ये कहें कि लालू यादव फैमिली को तुरंत लॉलीपॉप दिखा दिया कि 2025 का विधानसभा चुनाव उनके ही ‘घराने’ के तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। यानी कार्यकाल पूरा करने का बंदोबस्त नीतीश ने बड़ी चालाकी से कर लिया। नीतीश को लगा कि उन्होंने आरजेडी को बड़ी होशियारी से गच्चा दे दिया। मगर, हकीकत ये नहीं है। आरजेडी नेताओं को अच्छी तरह पता है कि अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश साथ रहें या न रहें, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। तब तक लालू परिवार के बेरोजगार चल रहे दो बेटों को मंत्रिमंडल में सम्मानजनक पद तो मिल जाएगा। इसीलिए, आरजेडी नीतीश की चालाकी समझने के बावजूद नासमझ बना रही।

नीतीश कुमार से पिंड छुड़ाने के लिए आरजेडी ने ऐसी चाल चली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। नीतीश को विपक्षी गठबंधन का पीएम फेस बनाने का झुनझुना थमा दिया। नीतीश ने खूब कूद-फांद की। विपक्षी दलों को एकजुट किया। फल काटने का वक्त आया तो कांग्रेस ने कमान झटक ली। इतना ही नहीं, नीतीश के सपने को चकनानचूर करने के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल को मोहरा बना दिया गया। ममता ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम पीएम पद के लिए प्रस्तावित किया तो अरविंद केजरीवाल ने समर्थन कर दिया। यानी राष्ट्रीय राजनीति में जाने के नीतीश के दरवाजे बंद हो गए। नीतीश को बिदकाने के लिए आरजेडी ने पहले अपने हुड़दंगी ब्रिगेड को सक्रिय किया, जो अभियानी अंदाज में नीतीश कुमार और उनके शासन-प्रशासन के खिलाफ देसज अंदाज में आवाज बुलंद करता रहा। नीतीश पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ।

अब आरजेडी ने नीतीश को हटाने के लिए लोकसभा चुनाव तक इंतजार करने का मन बनाया है। इसके पहले नीतीश के खिलाफ कोई भड़काऊ कदम उठा कर आरजेडी विपक्षी इंडिया अलायंस का खेल बिगाड़ने की तोहमत मोल लेना नहीं चाहती है। चुनाव बीतते ही नीतीश पर आरजेडी दबाव बढ़ाएगी। अगर उन्होंने खुद सीएम की कुर्सी नहीं छोड़ी तो उन्हें आरजेडी जबरन बेदखल कर देगी। लोकसभा चुनाव के परिणाम अगर एनडीए के पक्ष में आए, जैसा कि सर्वेक्षणों से पता चल रहा है और केंद्र में मोदी की सरकार बन गई तो जेडीयू के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो जाएगा। लंबे समय तक बीजेपी के साथ रहने के कारण जेडीयू के ज्यादातर नेताओं का झुकाव अब भी उसकी ओर अधिक है। जेडीयू को लोकसभा में कम सीटें आईं तो उसके नेता बिखर जाएंगे। कुछ आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में चले जाएंगे तो कुछ एनडीए खेमे में।

क्या लव करने के बाद भी होगा मर्डर?

अब लव करने के बाद भी मर्डर हो सकता है! लव, सेक्स चेंज और शादी का सपना, बात सिर्फ यहीं तक नहीं इसके आगे मर्डर। चेन्नई में मर्डर की एक ऐसी कहानी जिसको सुनकर सब हैरान हैं। एक युवक अपनी दोस्त पर पेट्रोल डालकर उसे जिंदा जला दिया। पुलिस को पता चला कि उसने लड़की से शादी के लिए कुछ दिन पहले ही सेक्स चेंज कराया था। बाद में जब लड़की ने इनकार कर दिया तो उसके बर्थडे वाले दिन ही उसका मर्डर कर दिया। यह कोई पहला मामला नहीं इसी साल की बात है जब यूपी में सेक्स चेंज , तंत्र मंत्र और मर्डर की कहानी सामने आई थी। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब पुलिस को एक कंकाल मिला। कुछ समय पहले ही हरियाणा में एक लड़के ने सेक्स चेंज कराने और शादी करने के लिए पूरे परिवार का ही मर्डर कर दिया। सेक्स चेंज की ऐसी सनक जो इन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा देती है। ऐसी घटनाओं पर लोगों का कहना है कि सेक्स चेंज से तन तो बदल जाता है पर मन का क्या। प्यार में धोखा मिलने की कई कहानियां हैं लेकिन चेन्नई में मामला कुछ अलग ही है। प्यार में धोखा मिलने के बाद प्रेमिका को सरप्राइज देने के लिए बुलाया लेकिन कुछ ऐसा कर दिया जिसके बाद वह सीधे जेल पहुंच गया। आरोपी मृत की सहेली थी और उसने अपनी दोस्त से शादी करने के लिए सेक्स चेंज कराकर लड़का बन गया था। मुरुगेश्वरी और नंदिनी दोनों मदुरै के एक गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थीं और दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। मुरुगेश्वरी ने शादी के लिए अपना सेक्स चेंज करा लिया। सेक्स चेंज के बाद उसने अपना नाम वेट्रिमरन रख लिया। वेट्रिमरन ने एक दिन नंदिनी के सामने प्यार का इजहार किया और संबंध बनाने की कोशिश की। नंदिनी ने उसे मना किया और उससे दूरी बना ली। हालांकि दोनों संपर्क में थे। पिछले शनिवार को वेट्रिमरन ने नंदिनी को साथ घूमने के लिए मना लिया। इसके आगे की कहानी काफी हैरान करने वाली है। वेट्रिमरन उसे कपड़े दिलवाए, एक अनाथ आश्रम ले गया, दान करवाया और फिर घर के लिए निकल गए। रास्ते में एक सुनसान जगह पर वेट्रिमरन ने गाड़ी रोकी और नंदिनी को फोटो के लिए पोज देने को कहा। जब वह ऐसा करने लगी तब उसे जंजीरों से बांध दिया। वेट्रिमरन ने नंदिनी की गर्दन, हाथ और पैर को काटा और फिर आग लगाकर वहां से भाग गया। वेट्रिमरन पकड़ा गया लेकिन नंदिनी की जान न बच सकी।

घटना इसी साल की है। दो लड़कियां जो एक दूसरे से प्यार और शादी भी करना चाहती थीं। उनमें से एक सोचती है कि सेक्स चेंज कराकर लड़का बन जाएगी और फिर दोनों की शादी हो जाएगी लेकिन यह रास्ता कहीं और ही जाता था। यूपी के शाहजहांपुर की यह घटना है। पूनम अपनी सहेली प्रीति से प्यार करती थी और उससे शादी करना चाहती थी। प्रीति लगातार घर आ रहे शादी के रिश्तों को नकार रही थी और उसके घरवाले इससे परेशान थे। एक दिन प्रीति की मां को इसकी वजह पता चली। यहां उसने पूनम को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया। पूनम को रास्ते से हटाने के लिए एक तांत्रिक से डेढ़ लाख में सौदा तय कर लिया। कुछ पैसे भी एडवांस दे दिए। तांत्रिक ने पूनम और प्रीति दोनों को मिलने के लिए पास के जंगल में बुलाया। पूनम से कहा कि तंत्र मंत्र की शक्ति से वो उसे लड़का बना देगा फिर दोनों शादी कर सकते हैं। दोनों को अपने झांसे में ले लिया। पूनम को अकेले में मिलने के लिए बुलाया और उसकी हत्या कर दी। उसके गुम होने की पुलिस को सूचना दी गई। दो महीने की जांच के बात पुलिस को एक कंकाल मिला और जांच में पता चला कि वो कंकाल पूनम का है। जब मामले का खुलासा हुआ तो सभी के होश उड़ गए।

कुछ समय पहले का मामला है जब हरियाणा के रोहतक में एक लड़के ने अपना सेक्स चेंज कराने के चक्कर में पूरे परिवार का ही मर्डर कर दिया। रोहतक पुलिस को जब सच्चाई का पता चला तो उसे भी इस घटना पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। आरोपी लड़का अभिषेक अपने पुरुष प्रेमी के साथ रहने के लिए अपना सेक्स चेंज करवाना चाह रहा था। इंटरनेट पर वह इसके लिए जानकारी जुटा रहा था और ऐसे क्लीनिक की तलाश में था। वह दोस्त से शादी रचाकर विदेश भागना चाहता था। उसकी इस प्लानिंग की जानकारी घरवालों को लग गई वह इसके विरोध में थे। वह परिवार से 5 लाख की डिमांड कर रहा था लेकिन पिता ने इससे इनकार कर दिया। इसके बाद उसने माता-पिता, बहन और नानी की मौत की खौफनाक साजिश रच डाली। उसने एक दिन इन सभी को गोली मार दी और सभी के गहने उतार लिए जिससे लगे कि यह लूट के चलते हत्या हुई है। मौके से भागकर वह खुद होटल जा पहुंचा। हालांकि पुलिस के हाथ एक सीसीटीवी फुटेज लग गया जिसके बाद पूरी झूठी कहानी का खुलासा हुआ।

क्या राम मंदिर स्थापना में जाएगा पूरा विपक्ष?

राम मंदिर स्थापना में पूरा विपक्ष जा सकता है! अगले साल 22 जनवरी की तारीख ऐतिहासिक होगी। इस पर पूरे देश की नजर है। इस दिन अयोध्या के राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन है। इसके लिए अतिथियों को न्‍योता भेजा जा रहा है। इनमें विपक्ष के कई नेता भी शामिल हैं। विपक्ष के नेताओं को न्‍योता भेजकर बीजेपी ने उन्‍हें पूरी तरह उलझा दिया है। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा है कि वे करें तो क्या करें। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले बीजेपी राम मंदिर का पूरा श्रेय अपने खाते में लेगी। व‍िपक्ष को इस बात का डर है। उसे पता है क‍ि बीजेपी समारोह को इतना बड़ा और भव्‍य बनाएगी क‍ि दुनिया देखेगी। विपक्ष के सामने दुविधा यह है कि वह आयोजन में जाने से मना करेगा तो फंसेगा, वहां जाएगा तो भी। लोकसभा चुनाव में तय है कि बीजेपी राम मंदिर का श्रेय लेगी। इसका श्रेय लेने से उसे कैसे रोका जाए, इस पर भी विपक्षी दलों में मंथन हो चुका है। बीजेपी ने राम मंदिर मुद्दे पर विपक्ष को पूरी तरह धर्मसंकट में डाल दिया है। विपक्ष के जिन नेताओं को निमंत्रण मिला है, उनमें पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, अधीर रंजन चौधरी, सीताराम येचुरी सहित कई नाम शामिल हैं। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई मंत्रियों और 4000 संतों के शामिल होने की उम्मीद है। वाम दलों को छोड़कर कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर अब तक व‍िपक्ष की ज्‍यादातर पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं। लेफ्ट पार्टी ने कहा है कि उसका मानना है कि धर्म व्यक्तिगत मामला है। वाम दल के पोलित ब्यूरो ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है कि बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक धार्मिक समारोह को राज्य प्रायोजित कार्यक्रम में बदल दिया है। इसमें सीधे प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारी शामिल हो रहे हैं।

हालांकि, कांग्रेस को इस निमंत्रण ने पूरी तरह उलझाकर रख दिया है। वह अब तक साफ नहीं कर पाई है कि उसके नेता कार्यक्रम में हिस्‍सा लेंगे या नहीं। कांग्रेस के जिन नेताओं को श्री राम जन्‍मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्‍ट से न्‍योता गया है, उनमें सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी के नाम हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी निमंत्रण दिया गया है। दिक्‍कत यह है कि अगर सोनिया, खरगे और अधीर कार्यक्रम में नहीं जाते हैं तो फट बीजेपी को मौका मिल जाएगा। उसे कांग्रेस को ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने में जरा देर नहीं लगेगी। जाते हैं तो मुसलमानों की नाराजगी मोल लेनी पड़ सकती है। कांग्रेस के नेता कार्यक्रम में गए और सपा-बसपा ने इससे दूरी बनाई तो मुस्लिम वोटरों का समीकरण बिगड़ सकता है। दरअसल, उस स्थिति में मुसलमान मतदाता सपा और बसपा का रुख कर सकते हैं। कांग्रेस ऐसा बिल्‍कुल नहीं चाहेगी।

इसकी भी वजह है। हाल के कुछ वर्षों में कांग्रेस मुसलमानों का भरोसा जीतते हुए दिखी है। तेलंगाना में कांग्रेस की फतह इसकी बानगी है। वहां बीआरएस से पल्‍ला छुड़ाकर मुसलमानों ने कांग्रेस का हाथ थामा। सबसे ज्‍यादा संसदीय सीटों वाले यूपी का उदाहरण लें तो यहां सपा की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम मतदाता के साथ उसका खड़ा होना है। बसपा और कांग्रेस को भी उनका वोट मिलता है। बीजेपी को चुनौती देने वाली पार्टी की तरफ मुस्लिम वोट एकतरफा पड़ता है। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कांग्रेस बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौती पेश करती है। ऐसे में कांग्रेस मुस्लिम वोटरों को नाराज नहीं करना चाहेगी।

हिंदुओं पर बीजेपी की आक्रामकता के कारण पिछले कुल सालों में राजनीति में बड़ा फर्क आया है। उसने एक तरह से दूसरी पार्टियों को मजबूर किया है कि वे हिंदुओं के मुद्दों को दरकिनार नहीं कर सकती हैं। प्राण प्रतिष्‍ठा कार्यक्रम के निमंत्रण को ठुकराना इसलिए मुश्किल है। I.N.D.I.A अलायंस की ज्‍यादातर पार्टियों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के बूते राष्‍ट्रीय पटल पर पहचान बनाई है। इनमें से कई ने या तो राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया या फिर इससे दूरी बनाकर रखी। 1990 में लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में ही बिहार में रथ यात्रा को घुसते ही रोक दिया गया था। इस यात्रा का नेतृत्‍व कर रहे लालकृष्‍ण आडवाणी गिरफ्तार हो गए थे। उसी साल यूपी में तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। राम मंदिर आंदोलन से लेकर राम मंदिर बनने तक का सफर लोगों ने आंखों से देखा है। इससे कई पीढ़‍ियां जुड़ी रही हैं। ऐसे में तथ्‍यों को छुपाया या तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता है। यहां बीजेपी के पास बड़ा ‘एडवांटेज’है। राम मंदिर के लिए उसका संघर्ष इतिहास के पन्‍नों में दर्ज है। उसी का वह फायदा उठा रही है।