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जानिए एएमयू स्पेशल स्टेट्स पर सुनवाई के दौरान क्या हो रहा है?

आज हम आपको एएमयू स्पेशल स्टेट्स पर सुनवाई के दौरान हुई घटनाओं के बारे में जानकारी देने वाले हैं! अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्पेशल स्टेट्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ताबड़तोड़ दलीलें दे रहे हैं। बुधवार को शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सिब्बल ने तर्क दिया कि देश में शिक्षा के मामले में मुसलमानों की हालत अनुसूचित जातियों SC से भी नीचे है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है। हालांकि, सिब्बल के तर्क देने के दौरान सरकार की तरफ से दलील दे रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी पलटवार किया। वैसे जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म किए जाने के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान अक्सर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के दौरान नोकझोंक होती रहती थी। बुधवार को भी दोनों के बीच दलील रूपी आरोप-प्रत्यारोप जमकर चले। जब भी ये दोनों वकील आमने-सामने होते हैं, उनकी भिड़ंत रोचक होती है। मामला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्पेशल स्टेट्स को लेकर चल रही सुनवाई का था। सिब्बल ने दलील दी कि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार में तो सिर्फ कुछ आरक्षण की बात है और अब उन्हें भी छीन लिया जाएगा! अगर हमारे प्रशासन में अनुचित दखल दिया गया तो निश्चित रूप से अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। मैं ये बताना चाहता हूं कि शिक्षा के मामले में मुसलमान अनुसूचित जातियों से भी नीचे हैं। ये तथ्य हैं। हमें पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है और खुद को सशक्त बनाने का एकमात्र तरीका शिक्षा का माध्यम है और अधिकांश लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में अल्पसंख्यक बहुत कम हैं और केवल बहुसंख्यक हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें सशक्त नहीं बनाया गया है।

यूपीए सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे सिब्बल ने सबसे पहले सरकार के रुख पर सवाल उठाया। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2006 के फैसले का समर्थन करने पर सरकार की आलोचना की, जिसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अधिनियम के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था। उन्होंने कहा कि केंद्र संसद द्वारा पारित कानून का समर्थन करने के लिए बाध्य है, और मोदी सरकार का रुख ‘चिंताजनक’ है। सिब्बल 1981 में एएमयू अधिनियम में हुए संशोधन को फिर से लागू करने की दलील दे रहे थे। इस नियम में यह स्पष्ट किया गया था कि एएमयू, जो मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल एमएओ कॉलेज का नया रूप है, भारत के मुसलमानों द्वारा स्थापित एक विश्वविद्यालय है। इससे पहले, इसी प्रावधान में लिखा था ‘विश्वविद्यालय से अर्थ है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’। यहां 1981 में अधिनियम की धारा 5 में एक और बिंदु जोड़ा गया था, जिससे विश्वविद्यालय को भारत में मुसलमानों की शिक्षा और संस्कृति को आगे बढ़ाने की अनुमति मिली थी। हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था, क्योंकि यह 1967 में सुप्रीम कोर्ट के अजीज बाशा मामले के फैसले के खिलाफ जाता था, जिसमें एएमयू को एक गैर-अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया गया था। हाईकोर्ट ने पीजी कोर्स में मुसलमानों के लिए 50% आरक्षण को भी रद्द कर दिया था।

सिब्बल ने कहा, ‘मान लीजिए कि 1981 का अधिनियम गलत है, फिर भी यह संसद द्वारा पारित कानून है। ठीक है, फिलहाल यह अमान्य है। लेकिन क्या कोई सरकार कभी संसद के कानून के विपरीत अदालत में दलील दे सकती है, भले ही वह अमान्य हो? कार्यपालिका संसद के कानून के खिलाफ नहीं जा सकती, भले ही अदालत ने उसे रद्द कर दिया हो। सिब्बल ने कहा कि हर रोज हाईकोर्ट द्वारा कानून रद्द किए जाते हैं। यह पहली बार है जब सरकार ने हाईकोर्ट में समर्थन करने के बाद कहा है कि वह 1981 के अधिनियम के खिलाफ है। वे कहते हैं कि वे अपना मन बदल सकते हैं। हां, वे बदल सकते हैं लेकिन केवल तभी जब यह किसी कार्यकारी निर्णय से संबंधित हो, न कि तब जब कानून संसद द्वारा पारित किया गया हो। यह एक गंभीर मुद्दा है।

सिब्बल की दलील के एक खामियों को उजागर करते हुए सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि अगर सरकार को हर संसदीय कानून का समर्थन करना ही है, तो क्या उसे इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लागू किए गए आपातकाल के कुख्यात 39वें संविधान संशोधन का भी समर्थन करना पड़ेगा? उस संशोधन ने तो मूलभूत अधिकारों को ही रोक दिया था। उन्होंने ये जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का काम सिर्फ सही तरीके से कानून पेश करना है, न कि हर परिस्थिति में उसका बचाव करना। मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट ने 1981 के अधिनियम को सही ठहराया है और सरकार हमेशा हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करती है। मेहता ने तर्क देकर सिब्बल की दलील की धार को कुंद किया।

दरअसल, सिब्बल ने अपनी दलील में इस बात पर जोर दिया कि सरकार को अदालत द्वारा किसी कानून को रद्द कर दिए जाने के बाद भी उसका समर्थन करना चाहिए। उनके मुताबिक, ऐसा न करना संसद की गरिमा को कम करता है और कानून के राज को कमजोर करता है।

क्या इस साल दीपिका पादुकोण बॉलीवुड पर चलायेंगी सिक्का?

इस साल दीपिका पादुकोण बॉलीवुड पर अपना सिक्का चला सकती है! पिछले साल अपनी दोनों सुपरहिट फिल्मों ‘जवान’ और ‘पठान’ के चलते शाहरुख खान को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारे का खिताब मिला। इस दौरान उनकी फिल्मों ने अकेले दम पर बॉक्स ऑफिस पर दुनियाभर में 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की। हालांकि नए साल में शाहरुख खान की कोई फिल्म रिलीज के लिए शेड्यूल नहीं है। लेकिन ‘जवान’ और ‘पठान’ दोनों ही फिल्मों में किंग खान के साथ चर्चा बटोरने वाली एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण बीते साल के धमाकेदार प्रदर्शन के बाद अब नए साल में भी फुल फॉर्म में नजर आने वाली हैं। उनकी इस साल तीन बड़ी फिल्में ‘फाइटर’, ‘सिंघम’ और ‘कल्कि 2898 एडी’ रिलीज के लिए तैयार हैं। पिछले दिनों अपना 38वां जन्मदिन मनाने वाली दीपिका पादुकोण इस पूरे साल बॉलीवुड से लेकर साउथ सिनेमा तक में छाई रहने वाली हैं। जी हां, यह दीपिका का जबरदस्त क्रेज ही है कि उन्हें हिंदी से लेकर साउथ सिनेमा वाले तक पूछ रहे हैं। इस महीने दीपिका ऋतिक रोशन के अपोजिट भारत की पहली एरियल एक्शन फिल्म बताई जा रही ‘फाइटर’ में भारतीय एयरफोर्स के एक लड़ाकू पायलट के रोल में नजर आएंगी।

वहीं, इंडिपेंडेंस डे पर वो रोहित शेट्टी के कॉप यूनिवर्स का हिस्सा बनेंगी। जी हां, दीपिका सुपरहिट सिंघम फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म ‘सिंघम अगेन’ में अजय देवगन के साथ देश के दुश्मनों से लोहा लेती नजर आएंगी। इसके अलावा दीपिका जल्द ही सुपरस्टार प्रभास के साथ पैन इंडिया फिल्म ‘कल्कि 2898 AD’ में भी नजर आएंगी। पहले यह फिल्म इस साल 12 जनवरी को रिलीज होने वाली थी, लेकिन अब इसकी रिलीज डेट आगे बढ़ा दी गई है। दरअसल, फिल्म में वीएफएक्स का काम बड़े लेवल पर है। इसलिए उसमें वक्त लग रहा है। अपनी तरह की इस अनोखी फिल्म में दीपिका और प्रभास के अलावा अमिताभ बच्चन भी एक खास रोल में नजर आएंगे। इस फिल्म को भारत की हॉलीवुड को टक्कर माना जा रहा है।

दीपिका ने न सिर्फ बॉलीवुड बल्कि विन डीजल की ‘XXX : रिटर्न ऑफ जेंडर केज’ जैसी हॉलीवुड फिल्म में भी अपना दम दिखाया है। खबर है कि अगले साल वह चर्चित हॉलीवुड फिल्म ‘द इंटर्न’ के भारतीय रीमेक में भी नजर आएंगी। पहले इस फिल्म में दीपिका के साथ ऋषि कपूर के काम करने की चर्चा थी। लेकिन अब उनके निधन के बाद अमिताभ बच्चन दीपिका के साथ फिल्म ‘द इंटर्न’ के भारतीय रीमेक में नजर आएंगे। इसके अलावा ‘बाहुबली’ व ‘आरआरआर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बना चुके डायरेक्टर एस एस राजामौली के साथ भी दीपिका के काम करने की चर्चा है। दरअसल, राजामौली ने पिछली बार भगवान राम के किरदार से प्रेरित अपनी फिल्म ‘आरआरआर’ में आलिया भट्ट को मौका दिया था। खबर है कि उनकी अगली फिल्म भगवान हनुमान के किरदार से प्रेरित होगी। इस फिल्म में लीड रोल में तेलुगू सुपरस्टार महेश बाबू के काम करने की चर्चा है। वहीं, दीपिका की ऑल इंडिया अपील को देखते हुए वह भी इस फिल्म का हिस्सा हो सकती हैं। इन दोनों फिल्मों के अलावा दीपिका फिल्म ‘टाइगर वर्सेज पठान’ में एक महत्वपूर्ण रोल में नजर आएंगी। वहीं वह ‘ब्रह्मास्त्र भाग 2’ में अमृता के रोल में दिखेंगी। उनकी एक झलक फैंस फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में भी देख चुके हैं।

बीते साल जबरदस्त सफलता से पहले दीपिका ने सालों तक इंतजार किया है। जी हां, इससे पहले उनकी साल 2018 में आई फिल्म ‘पद्मावत’ ब्लॉकबस्टर रही थी। उसके बाद उन्होंने इसी साल फिल्म ‘जीरो’ में कैमियो किया, जो फ्लॉप रही। 2019 में दीपिका की कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई। जबकि 2020 में आई दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। वहीं 2021 में आई उनकी फिल्म ’83’ को भी दर्शकों से कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। साल 2022 में सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई दीपिका की फिल्म ‘गहराइयां’ जरूर दर्शकों के एक वर्ग के बीच चर्चा में रही। वहीं ‘ब्रह्मास्त्र’ में उन्हें बतौर अमृता अपनी एक झलक के चलते चर्चा मिली। वहीं अपने पति रणवीर सिंह की अगली फिल्म ‘सर्कस’ में भी दीपिका ने एक आइटम नंबर किया। बता दें कि इन फिल्मों के अलावा दीपिका फिल्म ‘टाइगर वर्सेज पठान’ में एक महत्वपूर्ण रोल में नजर आएंगी। वहीं वह ‘ब्रह्मास्त्र भाग 2’ में अमृता के रोल में दिखेंगी। उनकी एक झलक फैंस फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में भी देख चुके हैं। लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। इस तरह से देखा जाए, तो फिल्म ‘पठान’ से जहां किंग खान का चार साल बाद वनवास खत्म हुआ। वहीं दीपिका को भी काफी अरसे बाद सफलता मिली और उनका यह सफर इस साल और आने वाले सालों में भी जारी रहने वाला है।

आखिर कौन है आईएस आतंकी शाहनवाज आलम?

आज हम आपको आईएस आतंकी शाहनवाज आलम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त आईएसआईएस से जुड़े गिरोह की जांच से खुलासा हुआ है कि मालदीव की एक रहस्यमयी महिला ने गिरफ्तार आतंकवादी मोहम्मद शाहनवाज का ब्रेन वॉश किया था। सूत्रों का कहना है कि वह महिला शाहनवाज की हैंडलर थी और उसने शाहनवाज को इराक-सीरिया सीमा के पास मौजूद कुख्यात आईएसआईएस शरणार्थी शिविर अल-हवल कैंप को दान देने के लिए भी उकसाया था। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल की जांच से पता चला है कि शाहनवाज ने गूगल पे के जरिए केरल में एक शिक्षक के माध्यम से 1.4 लाख रुपये का दान दिया था। यह रकम कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन माल-ए-गनीमत थी। सूत्रों ने बताया कि खुफिया एजेंसियां मालदीवी महिला के बारे में और जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही हैं। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, माइनिंग इंजीनियर से आईएस आतंकवादी बने शाहनवाज टेलीग्राम चैनल ‘केज्ड पर्ल’ पर इस महिला के संपर्क में आया था। यह महिला चैनल की एडमिन थी और दावा करती थी कि वह शिविर में रहने वाली महिलाओं के लिए आर्थिक मदद जुटाने का अभियान चला रही है। शुरुआती बातचीत शिविर के लिए दान के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसके बाद महिला ने बताया कि वह 2015 में सीरिया भाग गई थी। पुलिस की जांच रिपोर्ट में लिखा है, ‘उसने शाहनवाज को अपने भाई का व्हॉट्सएप कॉन्टैक्ट मालदीव मोबाइल नंबर दिया। शक है कि यह शिविर, जो इस्लामिक स्टेट के लिए आतंकवादियों की आपूर्ति का स्रोत बन गया है, संभवतः भारत से और भी भर्ती कर रहा है। शिविर के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण करना असंभव है और आईएसआईएस अपनी वफादार महिला सैनिकों की मदद से एक अच्छे जीवन का झांसा या धमकियां देकर नए लड़ाकों की भर्ती कर रहा है।शाहनवाज ने उससे संपर्क किया और अल-हवल कैंप में पैसे भेजने के तरीकों के बारे में पूछा, जिसके बाद उसे केरल में एक शिक्षक का संपर्क दिया गया।’

पुलिस का कहना है कि शाहनवाज ने गूगल पे का इस्तेमाल करके शिक्षक को पैसे भेजे और दो हफ्ते बाद मालदीवी महिला ने बताया कि पैसे मिल गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक महीने बाद उसने केरल के कॉन्टैक्ट के जरिए उसी महिला को फिर 40 हजार रुपये भेजे। शाहनवाज ने पैसे भेजने के लिए अपनी पत्नी बसंती पटेल के खाते का इस्तेमाल किया। पुलिस दस्तावेज में लिखा है, ‘ट्रांसफर के बाद शाहनवाज का टेलीग्राम के जरिए ही आईएस से जुड़े लोगों कासिम खुरासानी कश्मीरी, हुजैफा और काशिफ अफगानी से राब्ता करवाया गया। कुछ समय बाद हुजैफा और कासिम खुरासानी की आईडी बैन हो गई, लेकिन वह काशिफ के संपर्क में रहा और भारत में आईएस के विस्तार पर चर्चा करता रहा।’ शाहनवाज के अल-हवल कैंप से संपर्क ने सुरक्षा एजेंसियों को हिलाकर रख दिया है। उन्हें शक है कि यह शिविर, जो इस्लामिक स्टेट के लिए आतंकवादियों की आपूर्ति का स्रोत बन गया है, संभवतः भारत से और भी भर्ती कर रहा है। शिविर के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण करना असंभव है और आईएसआईएस अपनी वफादार महिला सैनिकों की मदद से एक अच्छे जीवन का झांसा या धमकियां देकर नए लड़ाकों की भर्ती कर रहा है।

इराक से आई खबरों के मुताबिक, अमेरिकी सरकार इस बात से परेशान है कि किस तेजी से यह शिविर इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के रिश्तेदारों को शामिल करने और आतंकवादी समूह के प्रति वफादार व्यक्तियों को तैयार करने का अड्डा बन गया है। विशेष सेल के निगरानी आधारित ऑपरेशन और उत्तर भारत में 200 से अधिक जगहों पर छापेमारी के सिलसिले में शाहनवाज की गिरफ्तारी सितंबर में हुई थी।बातचीत शिविर के लिए दान के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसके बाद महिला ने बताया कि वह 2015 में सीरिया भाग गई थी। पुलिस की जांच रिपोर्ट में लिखा है, ‘उसने शाहनवाज को अपने भाई का व्हॉट्सएप कॉन्टैक्ट मालदीव मोबाइल नंबर दिया। शाहनवाज ने उससे संपर्क किया और अल-हवल कैंप में पैसे भेजने के तरीकों के बारे में पूछा, आईएसआईएस अपनी वफादार महिला सैनिकों की मदद से एक अच्छे जीवन का झांसा या धमकियां देकर नए लड़ाकों की भर्ती कर रहा है।जिसके बाद उसे केरल में एक शिक्षक का संपर्क दिया गया।’ उसे दो साथियों, अरशद वारसी और मोहम्मद रिजवान अशरफ के साथ पकड़ा गया था। ये दोनों भी इंजीनियर हैं। ये तीनों पूरे देश में बम विस्फोट करने के अंतिम चरण में थे और दिल्ली, मुंबई, गुजरात, अयोध्या समेत कई स्थानों की रैकी कर चुके थे।

क्या केरल और आंध्र प्रदेश में खुल पाएगा बीजेपी का खाता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी का खाता केरल और आंध्र प्रदेश में भी खुल पाएगा या नहीं! कर्नाटक और तेलंगाना में पिछले वर्ष के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की बड़ी जीत और भाजपा की हिंदी हार्टलैंड के राज्यों में एकतरफा जीत से लोकसभा चुनावों से पहले तथाकथित ‘उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन’ की चर्चा हो रही है। क्या यह धारणा वास्तविक है या यह सिर्फ हताश लोगों का गढ़ा हुआ फलसफा है? अगर भाजपा का विरोध नहीं भी मानें तो दक्षिणी राज्यों के विधानसभा चुनावों में विविध रुझान ‘विभाजन’ से कहीं अधिक चुनावी असमानता की झांकी पेश करता है। ऐसे समय में जब भाजपा और उसकी हिंदुत्व की राजनीति ने अन्य जगहों पर नई सीमाएं पार की हैं तब दक्षिण की सियासी सोच काफी मायने रखती है। अब सवाल यह है कि क्या भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में दक्षिण के पॉलिटिकल पासवर्ड को डिकोड कर सकती है या क्या विंध्याचल के परे की भूमि भगवा अभियानों के रथ को रोकती रहेंगी? दक्षिण में 130 लोकसभा सीटें – तमिलनाडु 39, कर्नाटक 28, आंध्र प्रदेश 25, तेलंगाना 17, केरल 20 और पुडुचेरी 1 आने वाले चुनावों में राजनीतिक हस्तियों को लुभाएंगी और उन्हें भड़काएंगी भी। पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने दक्षिण से 28 लोकसभा सीटें जीती थीं- केरल 15, तमिलनाडु 8, तेलंगाना 3, कर्नाटक 1 और पुडुचेरी 1 – जबकि भाजपा ने 29 सीटें जीती थीं – कर्नाटक 25 और तेलंगाना 4।दक्षिण का इतिहास कांग्रेस को अंगीकार करने का रहा है। यह परंपरा मोटे तौर पर कांग्रेस के बुरे दौर में भी कायम रहा, जब उत्तर और अन्य हिस्सों ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरकारों का विरोध किया। यहां तक कि जब 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस अपनी सबसे निचले स्तर पर आ गई, तब भी दक्षिण ने उसकी लाज बचाई। 2004 में एनडीए से दिल्ली की सत्ता छीनने और 2009 में इसे बरकार रखने के कांग्रेसी अभियानों को भी दक्षिण से भरपूर समर्थन मिला था। लेकिन कांग्रेस अब दक्षिण को लेकर निश्चिंत नहीं रह सकती क्योंकि अब उसे कई नए और पेचीदा क्षेत्रीय दलों और भाजपा की उभरती चुनौतियों से पार पाना है। हालांकि, कर्नाटक और तेलंगाना की जीत ने पार्टी को बहुत जरूरी सुकून और उम्मीद दी है।

भाजपा को दक्षिण भारत के अधिकांश क्षेत्रों की सियासी फिजां में अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक हिंदुत्व का घोल छिड़क पाना मुश्किल रहा है। बड़ी बात है कि दक्षिण में आरएसएस का विस्तृत नेटवर्क होने के बावजूद यह स्थिति है। लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जमीनी स्तर के काम, वाजपेयी सरकारों के आकर्षण और मोदी लहर के दो चुनावी दौरे के बावजूद अधिकांश दक्षिण ने भाजपा का विरोध किया है, जिससे पता चलता है कि पार्टी के लिए दक्षिण के किले की फतह कितना कठिन टास्क है। लेकिन हाल के वर्षों में देश के बाकी हिस्सों में भगवा लहर के बीच भाजपा ने कर्नाटक को दक्षिण का अपना ठिकाना बनाने में सफलता हासिल कर ली है और तेलंगाना को अपने नए बढ़ते क्षेत्र के रूप में उभारा है। प्रधानमंत्री मोदी 2024 के लोकसभा चुनावों में दक्षिण की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे या नहीं, यह दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में दबी-छिपी चर्चा का विषय है।

पिछले कई दशकों में दक्षिण में कई क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ है, जिससे चुनावी चर्चा और जटिलता बढ़ गई है। तमिलनाडु तो 57 साल पहले कांग्रेस के शासन को समाप्त करने के बाद से ही द्रविड़ पार्टियों के प्रभाव में है। आंध्र प्रदेश के विभाजन ने भी राज्य कांग्रेस के पतन की गति तेज कर दी और तेलंगाना में बीआरएस जबकि आंध्र प्रदेश में वाईएसआरसीपी ने राजनीतिक जमीन हथिया ली। केरल में कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व वाली एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ ने राजनीति को द्विध्रुवी बनाए रखा है, जहां भाजपा अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक में जनता पार्टी की धारा पारंपरिक रूप से कांग्रेस को चुनौती देती थी। वहां जनता दल की पार्टियों के लगातार टूटने और जेडीएस के घटते प्रभाव से राज्य में अब कांग्रेस बनाम भाजपा का ही चुनावी खेल प्रभावी हो गया है।

कर्नाटक में भाजपा की सीटें 2019 के लोकसभा चुनावों में 28 में से 25 तक पहुंच गईं तब कांग्रेस अपने सबसे निचले स्तर 1 सीट पर फिसल गई थी। अब सभी की निगाहें कांग्रेस पर हैं कि कैसे पार्टी हालिया विधानसभा चुनाव जीत 135 सीटें और 42.88% वोट का इस्तेमाल लोकसभा चुनावों में अपनी सीटें बढ़ाने के लिए कर सकती है। दूसरी तरफ नजर इस बात पर भी है कि भाजपा का विधानसभा प्रदर्शन 66 सीटें और 36% वोट लोकसभा के लिहाज से क्या मायने रखते हैं। कर्नाटक की चुनावी राजनीति अब इसलिए भी ज्यादा दिलचस्प हो गई है क्योंकि विधानसभा चुनाव में हार 19 सीटें और 13.29% वोट के बाद जेडीएस ने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया है। इस गठबंधन के बाद कर्नाटक में पारंपरिक त्रिकोणीय प्रतियोगिता अब सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच द्विध्रुवीय हो गई।

ऐसा माना जाता है कि चार कारक वोटिंग रिजल्ट को प्रभावित कर सकते हैं। पहला, क्या कांग्रेस विधानसभा चुनावों की अपनी सद्भावना बनाए रखेगी? दूसरा, क्या यदियुरप्पा खेमे को कर्नाटक प्रदेश का नेतृत्व वापस देकर भाजपा आलकमान की तरफ से किया गया सुधार का प्रयास पार्टी को एकजुट करेगा या आगे विभाजन ही होगा? तीसरा, क्या भाजपा-जेडीएस गठबंधन प्रभावशाली लिंगायत-वोक्कालिगा वर्गों को एकजुट करेगा या क्या उनके अंतर्निहित हितों का टकराव इसकी पहुंच को सीमित करेगा? और चौथा, क्या ‘मोदी फैक्टर’ भाजपा को विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद फिर से खड़ा कर सकता है?

कांग्रेस तेलंगाना में रणनीतिक लाभ और आत्मविश्वास के साथ लोकसभा चुनावों में प्रवेश कर रही है। पार्टी विधानसभा जीत (119 में से 64 सीटें और 39.4% वोट) से आगे बढ़ने की उम्मीद में है। दिलचस्प बात यह है कि क्या बीआरएस अपनी हार से उबर सकेगी और सत्ता के बिना अस्तित्व बचा सकेगा? सवाल है कि बीआरएस की जमीन कहीं कांग्रेस और भाजपा तो नहीं हड़प लेगी, जैसा कि कर्नाटक में जेडीएस के साथ हो रहा है। हालांकि भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों में 17 में से चार सीटें जीतकर तेलंगाना में अपने लिए बड़ी संभावना पैदा की जो हालिया विधानसभा चुनावों में दूर तीसरे स्थान पर रहकर, लेकिन अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 8 सीटें और 13.9% वोट से मजबूत हुई है।

आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव दो क्षेत्रीय दलों वाईएसआरसीपी और टीडीपी के बीच ही रहने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि, कांग्रेस को पड़ोसी तेलंगाना और कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन और वाईएस शर्मिला के शामिल होने से कुछ गति मिलने की उम्मीद है। लेकिन, आंध्र प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य अभी तक दो क्षेत्रीय दलों के लिए अधिक अनुकूल है। हालांकि, इस बात को लेकर कुछ रुचि है कि क्या राज्य कांग्रेस नए दुश्मन वाईएसआरसीपी के खिलाफ पुराने प्रतिद्वंद्वी टीडीपी के साथ गठबंधन करने की कोशिश करेगी या वह आंध्र की चुनावी लड़ाई अकेले लड़ेगी। भाजपा तो कभी टीडीपी तो कभी वाईएसआरसीपी के साथ मुकाबला होता रहा है। अब परिस्थित यह है कि उसे लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन के लिए इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों में किसी एक का चुनाव कर सकती है। अगर चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हुआ तो चुनाव बाद भी इसकी गुंजाइश रह सकती है।सबसे दक्षिणी सिरा केरल, कांग्रेस को सबसे अच्छी उम्मीद देता है। पिछली बार 20 में से 15 लोकसभा सीटें जीतने के बाद इसे उम्मीद है कि 2024 में वो वामपंथियों के आगे अपनी कमजोरी को सबसे निचले स्तर पर ला पाएगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि 44% से अधिक मुस्लिम-ईसाई वर्गों से पुरजोर समर्थन मिलेगा जो पार्टी के परंपरागत समर्थक हैं। हालांकि, मुस्लिम-इसाई मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ को बड़ा झटका देने के लिए वामदल के एलडीएफ का समर्थन किया था।

केरल प्रदेश कांग्रेस इसी वजह से अपने आलाकमान से अयोध्या राम मंदिर उद्घाटन समारोह में शामिल नहीं होने का आग्रह कर रही है। यूडीएफ को उम्मीद है कि पिनाराई विजयन सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुए विवाद उसे फायदा पहुंचाएंगे। हालांकि, एलडीएफ मुसलमान मतदाताओं को अपने साथ रखने की भरपूर कोशिश कर रहा है। इस लोकसभा चुनाव में यह भी स्पष्ट होगा कि क्या भाजपा के हिंदू-ईसाई वर्गों को आकर्षित करने के प्रयास उसे केरल में कुछ लोकसभा सीटें दिला पाएंगे।

उत्तरी केरल का वायनाड लोकसभा क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर विशेष रुचि रखता है क्योंकि इसने राहुल गांधी को तब आश्रय दिया था जब उनकी अमेठी सीट भाजपा ने जीत ली थी। क्या गांधी फिर से इस सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ेंगे या वो दक्षिण की किसी अन्य सीट से अपनी जमानत सुनिश्चित करेंगे। क्या राहुल गांधी यूपी की अमेठी सीट पर वापस आएंगे ताकि वो विपक्ष और भाजपा दोनों को दिखा सकें कि उन्हें अपने ही ‘डरो मत’ के नारे पर कितना विश्वास है? क्या राहुल गांधी भाजपा के साथ लड़ाई में दूसरों का नेतृत्व करने की हिम्मत दिखाएंगे?

क्या बीजेपी के नजदीक जा सकती है मायावती?

मायावती अब बीजेपी के नजदीक भी जा सकती है! लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर एक ओर राजनीतिक पार्टियां अपनी तैयारियों को धार देने में जुट गई है। साथ ही दूसरी ओर अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए किसी गठबंधन में शामिल होने का निर्णय ले रहे हैं। इसी क्रम में सबकी निगाहें बसपा सुप्रीमो मायावती पर टिकी हैं। हालांकि मायावती पहले ही आगामी चुनाव में एकला चलो का रास्ता अपना चुकी है। लेकिन NDA और I.N.D.I.A एलाइंस के सहयोगी दल के नेता मायावती को अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। उधर, मायावती ने समाजवादी पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए I.N.D.I.A गठबंधन के साथ ना जाने की मंशा बना ली है। इसी बीच अखिलेश यादव से नाराज मायावती ने बीजेपी सरकार से एक मांग कर दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि योगी सरकार ने अगर अपनी दरियादिली बहनजी पर दिखाई तो यूपी में बीजेपी गठबंधन को क्लीनस्वीप करने से कोई नहीं रोक पाएगा। अब गेंद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के पाले में है। दरअसल इस वक्त देश में दो गठबंधन तैयार हैं। एक NDA जिसमें बीजेपी के साथ सुभासपा, अपना दल एस, निषाद पार्टी समेत अन्य पार्टी शामिल है। वहीं दूसरे I.N.D.I.A एलायंस में कांग्रेस, सपा, RLD, अपना दल कमेरावादी समेत अन्य दल साथ है। इस सबके बीच कुछ पार्टियां ऐसी भी है जो अकेले दम पर ताल ठोक रही हैं। जैसे बहुजन समाज पार्टी। इसी के चलते जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, बसपा केंद्र बिंदु में आ गई है।

बसपा को साथ में लाने के लिए कांग्रेस नेता अजय कुमार लल्लू ने मायावती से हाथ जोड़कर अपील भी की है। कांग्रेस की ओर से की जा रही जोर आजमाइश के बाद से चर्चा है कि बसपा इंडिया गठबंधन के साथ आ सकती है। वहीं मायावती के इंडिया गठबंधन के साथ आने के सवाल पर सपा मुखिया अखिलेश यादव ने उल्टा मायावती को आड़े हाथों लेते हुए उन्हीं की विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिया है। वहीं मायावती ने अखिलेश यादव को अपने गिरेबां में झांकने तक की नसीहत दे डाली है। मायावती ने सपा को दलित विरोधी बताते हुए 2 जून 1995 की गेस्ट हाउस कांड की घटना को याद किया और कहा कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा दलित विरोधी फैसले किए हैं। मायावती ने अखिलेश पर निशाना साधते हुए कहा कि बसपा के यूपी कार्यालय के पास इसलिए ऊंचा पुल बनाया ताकि अराजक तत्त्वों के जरिए बसपा के दफ्तर और कर्मचारियों को हानि पहुंचा सके।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी सरकार से कोई सुरक्षित जगह प्रदेश कार्यालय मुहैया कराने की मांग की है। मायावती ने कहा कि बसपा के पार्टी दफ्तर पर कभी भी अनहोनी हो सकती है। वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती के बयान पर यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अब मायावती के समर्थन में आ गए हैं। उन्होंने कहा कि हमने तो पहले ही कहा था कि सपा गुंडों और माफियाओं की पार्टी है, इस पार्टी से बचकर रहें। इसके साथ ही केशव ने कहा कि मायावती यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री रहीं हैं और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। प्रदेश में बीजेपी की सरकार है, बहनजी समेत प्रदेश के हर नागरिक की सुरक्षा के प्रति सरकार संकल्पित हैं।

वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती की योगी सरकार से की गई मांग के बाद यूपी की राजनीति गरमा गई है। राजनीतिक गलियारों में बीएसपी के बीजेपी के साथ आने की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। इसको लेकर वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह का कहना है कि अभी यह कहना मुश्किल होगा कि अगर मायावती की मांग मान ली जाती है तो वह बीजेपी के साथ खड़ी दिखाई देंगी। लेकिन इतना जरूर है कि अगर उनकी ये मांग मानी जाती है और अगर नहीं भी मानी जाती है तो भी बीजेपी के प्रति उनका सॉफ्ट कॉर्नर है। वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि बीजेपी बिना बीएसपी के समर्थन के ही 70 सीटें मौजूदा स्थिति में जीत सकती है। अगर बसपा साथ आ जाए तो बीजेपी को 75 प्लस सीट जीतने से कोई नहीं रोक सकता है।

राजनीति में संभावनाओं को लेकर वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह ने कहा, गेस्ट हाउस कांड के बाद यह माना जा रहा था कि सपा और बसपा में कभी एक नहीं हो पाएगी। ऐसा लंबे समय तक देखने को भी मिला। पिछले 2019 लोकसभा चुनाव में बसपा और सपा एक साथ आ गए। साथ में प्रचार करके एक साथ चुनाव भी लड़ा। लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद मायावती ने कहा कि सपा के साथ जाना हमारे लिए घातक साबित हुआ है, जिसका हमें नुकसान भी उठाना पड़ा है। यह बातें कहकर मायावती ने सपा से खुद को अलग कर लिया। अब मायावती के सपा को लेकर दिए गए मौजूदा बयान पर वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि मायावती ने कल जो बयान दिया है उसे बिल्कुल साफ हो गया है कि माया को सपा से ज्यादा बीजेपी पसंद है।

मायावती भाजपा गठबंधन के साथ जाएं या ना जाएं, यहां तक की अगर मायावती अकेले दम पर भी चुनाव लड़ती हैं तो उस स्थिति में भी बीजेपी को ही फायदा मिलेगा। क्योंकि प्रदेश में मतों का जितना बंटवारा होगा, उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा। सुरेश बहादुर ने कहा कि बीजेपी की पूरी कोशिश रहेगी कि सपा और बसपा में कभी एकता ना होने पाए। उन्होंने कहा कि यूपी में चुनाव हमेशा जाति-धर्म के आधार पर हुआ है। इस बार भी इसी आधार पर चुनाव हो सकता है। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से जब जाति समीकरण बिगड़ेंगे तो धार्मिक समीकरण अच्छे बनेंगे, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।

वर्तमान में माँ क्यों बनती जा रही है कातिल?

वर्तमान में माँ कातिल बनती जा रही है! मां की ममता बेजोड़ होती है। वात्सल्य अनमोल होता है। बच्चे पर आंच आ जाए तो मां रौद्र रूप धर लेती है। बिना अंजाम का परवाह किए मौत तक से लड़ भिड़ जाती है। लेकिन जब ममता और वात्सल्य पर ईगो भारी पड़ जाए तो ये चेतने का वक्त है। जब सिर्फ अहं की तुष्टि के लिए कोई मां अपने ही कलेजे के टुकड़े को मार डाले तो ये चेतने का वक्त है। शास्त्रों में कहा गया है ‘कुपुत्रो जायेत क्विचिदपि कुमाता न भवति’ यानी पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है लेकिन कभी मां कुमाता नहीं हो सकती। लेकिन 39 साल की सूचना सेठ ने तो अपने 4 साल के अबोध बेटे को ही बेरहमी से मार डाला। वजह सिर्फ यह कि वह नहीं चाहती थी कि उसका पति उसके बच्चे से मिले। पति-पत्नी के बीच तलाक का केस चल रहा था और दोनों के बीच बेटे की कस्टडी के लिए कानूनी लड़ाई चल रही थी। रोंगटे खड़े कर देने वाले इस कांड में हर मां, हर बाप, हर कामकाजी शख्स के लिए सबक छिपे हैं।सूचना सेठ बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप ‘माइंडफुल एआई लैब’ की सीईओ है। 2010 में उसकी वेंकट रमन से शादी हुई। 2019 में दोनों को एक बेटा हुआ। लेकिन इसके बाद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आने लगी। 2020 में दोनों अलग हो गए और उनके तलाक की प्रक्रिया आखिरी चरण में थी। तलाक के मामलों में सबसे पेचीदा होता है बच्चों के कस्टडी का मामला। कोर्ट ने वेंकट रमन को हर रविवार को अपने बेटे से मिलने की इजाजत दे दी थी। सूचना सेठ नहीं चाहती थी कि वह हर रविवार अपने बेटे को पति के पास ले जाए। उसने इसे अपने ईगो से जोड़ लिया और उसे तुष्ट करने के चक्कर में वह मां से कसाई बन गई।

सूचना सेठ ने पुलिस को बताया कि वह गोवा सिर्फ इसलिए आई ताकि उसे रविवार को अपने बेटे को उसके पिता के पास न ले जाना पड़े। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बच्चे की मौत की वजह दम घुटना है। पुलिस आशंका जता रही है कि सेठ ने तकिये से अपने 4 साल के बच्चे का दम घोंट दी। वह यह कह रही है कि उसकी मंशा बेटे को जान से मारने की नहीं थी लेकिन अचानक वह मर गया। लेकिन अगर ऐसा ही था तब वह किसी शातिर क्रिमिनल की तरह बच्चे के शव को बैग में डालकर कार से बड़े ही बेफिक्र अंदाज में जाते हुए क्यों पकड़ी गई? पूछताछ में उसने ये भी बताया कि बेटे की हत्या के बाद वह अपनी भी जान देना चाहती थी। सोमवार को वह गोवा के कैंडोलिम में अपने होटल से बाहर निकली। बेंगलुरु जाने के लिए होटल स्टाफ से वह टैक्सी लाने को कही। उसे बताया गया कि टैक्सी से सस्ती तो फ्लाइट पड़ेगी, लेकिन वह टैक्सी पर अड़ी रही। टैक्सी आई और वह बेंगलुरु के लिए निकल गई। तबतक होटल स्टाफ या वहां मौजूद किसी भी शख्स को कुछ भी असामान्य नहीं लगा। लेकिन जब एक होटल स्टाफ कमरे में सफाई करने गया तो खून के धब्बे देखकर चौंक गया। आनन-फानन में होटल स्टाफ ने सूचना सेठ के चेक आउट के समय का सीसीटीवी फुटेज खंगाला। तब सबका ध्यान गया कि महिला तो अकेले बाहर निकली, उसका बेटा साथ नहीं दिख रहा था। तत्काल पुलिस को सूचना दी गई। गोवा पुलिस ने टैक्सी ड्राइवर से बात की और आखिरकार कर्नाटक के चित्रदुर्ग में सूचना सेठ को गिरफ्तार कर लिया गया।

ममता की कातिल मां की ये रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी में हर मां-बाप और हर प्रफेशनल के लिए सबक छिपे हुए हैं। भारत में हाल के वर्षों में तलाक के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह तो ये है कि अब महिलाएं आर्थिक तौर पर भी स्वतंत्र होने लगी हैं। आर्थिक और सामाजिक तौर पर पति पर निर्भर महिला पर अगर किसी तरह के अत्याचार होते थे तब भी उसे सह लेती थी और तलाक से बचती थी। लेकिन महिलाओं के स्वावलंबी बनने से भी तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। तलाक की अन्य वजहों में बेवफाई, भरोसे की कमी, शक, पार्टनर के साथ अंतरंग पलों के लिए समय का न निकल पाना आदि शामिल हैं। चिंता तब होती है जब पति और पत्नी छोटी-मोटी बातों पर उलझ जाते हैं। सूचना सेठ केस ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ने से व्यक्ति अपने परिवार को उतना समय नहीं दे पाता जितना देना चाहिए। पति-पत्नी अगर दोनों कामकाजी हैं तो चुनौती और भी ज्यादा है। करियर बनाने और करियर में शिखर छूने की भूख से परिवार पीछे छूट रहा। रिश्ते पीछे छूट रहे। सूचना सेठ के पास क्या नहीं था? उसके लिंक्डइन प्रोफाइल पर नजर डालिए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ी-लिखी। एआई स्टार्टअप की सीईओ। 2021 में एआई एथिक्स लिस्ट में शामिल 100 प्रतिभाशाली महिलाओं में से एक। लेकिन करियर बनाने की अंधी दौड़ में परिवार ही पीछे छूट गया। पति-पत्नी के पास सबकुछ था लेकिन अगर कुछ नहीं था तो वह था एक दूसरे के लिए वक्त। धीरे-धीरे उनमें दूरियां बढ़ने लगीं जो अलगाव का सबब बन गईं। करियर, दौलत, शोहरत की भूख में परिवार पीछे छूट रहा है। पहले तो जॉइंट फैमिली हुआ करती थी। फैमिली शॉक ऑब्जर्वर का काम करती है। बड़ा से बड़ा तनाव परिवार के भावनात्मक सपोर्ट से छूमंतर हो जाया करता था। परिवार में अगर कोई मानसिक तौर पर परेशान भी है तो वह टूटता नहीं था क्योंकि उसे परिवार से हर तरह का समर्थन हासिल होता था। अब न्यूक्लियर फैमिली का जमाना है। लेकिन करियर बनाने, चमकाने की अंधी दौड़ में अब उस न्यूक्लियर फैमिली तक के लिए वक्त नहीं मिल रहा। ये चिंता की बात है।

जब राम मंदिर के लिए पहली बार हुआ सांप्रदायिक हंगामा!

आज हम आपको उस सांप्रदायिक हंगामा के बारे में बताने जा रहे हैं जो पहली बार राम मंदिर के लिए हुआ था! अयोध्या, जिसने 500 सालों में कई राजाओं और उसके शासन को देखा। मस्जिद का निर्माण देखा। मंदिर को बिखड़ते देखा। वर्ष 1528 में जब मुग़ल सम्राट बाबर के सेनापति मीरबाकी तासकंदी ने मस्जिद बनवाई तो हिंदुओं की भावना आहत हुई। विभिन्न वर्गों में बंटा कमजोर हिंदू वर्ग अपनी आवाज बुलंद कर पाने में सक्षम नहीं था। बड़ी संख्या में लोग अपने आराध्य के नाम पर कट गए, लेकिन प्रभु रामलला के मंदिर को बचा पाने में कामयाब नहीं हो पाए। गोस्वामी तुलसीदास ने भी अपनी पुस्तक तुलसी दोहा शतक में इस घटना का जिक्र किया है। बाद के दिनों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के मामले में तूल पकड़ना शुरू किया। मुगल शासन समाप्त हो चुका था। अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तान में पैर पसार चुकी थी। इसी दौरान हिंदुओं की भावना भी जोर पकड़ना शुरू किया। हिंदू वर्ग बार- बार मस्जिद वाले स्थान पर भगवान श्रीराम की जन्मभूमि होने का दावा कर रहा था। कई बार इस मामले को स्थानीय शासन और हिंदू वर्ग आमने-सामने आए। हिंदू अपने आराध्य के जन्मस्थल पर पूजा की अनुमति मांग रहे थे। मैं मूक बैठी इन तमाम घटनाओं की साक्षी बनती रही। प्रभु रामलला की मंदिर को नष्ट किए तीन शताब्दियों से अधिक का दौर गुजर चुका था। यह काल 1850 के आसपास का था। अयोध्या अवध रियासत का हिस्सा थी। नवाब वाजिद अली शाह यहां पर शासन कर रहे थे। इसी दौरान निर्मोही पंथ के लोगों ने मंदिर तोड़कर बाबर के मस्जिद बनाए जाने के मामले को उठाना शुरू किया। निर्मोही पंथ वापस अपने मंदिर को पाने की लड़ाई लड़ रहा था। मुगल बादशाह के खिलाफ उन्होंने गंभीर आरोप लगाकर हिंदू समाज को एकजुट करना शुरू किया। हिंदू समाज के निर्मोही पंथ के साधुओं के दावों पर मुस्लिम समाज की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाने लगी। हिंदू वर्ग के मंदिर के दावों पर मुस्लिम समाज ने मस्जिद के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न होने देने का दावा करता रहा। देखते ही देखते राम जन्मभूमि का मुद्दा मंदिर- मस्जिद का मुद्दा बन गया। दो संप्रदायों के बीच विवाद की जड़ में यह समा गया।

मंदिर- मस्जिद के मुद्दे को लेकर दो संप्रदायों की भवना टकराने लगी। नवाब वाजिद अली शाह तक मामला पहुंचा, लेकिन उनके स्तर पर विवाद का कोई समाधान नहीं निकाला जा सका। मंदिर विध्वंस का 325वां वर्ष आते- आते हिंदू वर्ग काफी आक्रोशित हो चुका था। वह हर हाल में अपने मंदिर को वापस पाना चाहता था। मंदिर- मस्जिद के मसले दोनों समुदाय दो पाटों में बंट चुके था। निर्मोही पंथ हर हाल में मस्जिद तोड़कर श्रीराम जन्मभूमि पर हर हाल में मंदिर के निर्माण करा देना चाहता था। वहीं, मुस्लिम समुदाय वहां पर राम जन्मभूमि नहीं होने का दावा करता रहा। ऐसे में प्रभु राम की नगरी अयोध्या में पहली बार दो समुदायों के बीच जंग जैसी स्थिति बनी। मेरी धरती पर पहली बार राम के नाम पर संग्राम छिड़ा।

दोनों समुदायों के लोग आपस में भिड़ गए। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। नवाब वाजिद अली शाह की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1855 में 12 हजार हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद को घेर लिया था। मुस्लिम समाज के लोग बाबरी को बचाने गए। खूनी संघर्ष हुआ। इसमें 70 मुसलमान मारे गए थे। अंग्रेजी शासन ने इस सांप्रदायिक दंगे की आड़ में अवध पर अपना प्रभाव जमा लिया। सांप्रदायिक दंगे को दमन के जरिए शांत कराया गया। अयोध्या राम जन्मभूमि को लेकर 1853 के पहले दंगे की शुरुआत के बाद पांच सालों तक अयोध्या सुलगती रही। साधुओं का एक बड़ा वर्ग इस आंदोलन का नेतृत्व करता रहा। लेकिन, नवाब की फौज और अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता के आगे उनकी नहीं चली। लेकिन, निर्मोही पंथ किसी भी स्थिति में राम जन्मभूमि पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं था। उनका आंदोलन लगातार जारी रहा। आखिरकार, अंग्रेजी सरकार ने मंदिर- मस्जिद विवाद पर वर्ष 1859 में बड़ा निर्णय लिया। मेरे प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर पहली बार तार के बार लगवा दिए गए। जन्मभूमि को दो हिस्सों में बांट दिया गया।

मस्जिद के भीतर का हिस्सा मुस्लिमों को दिया गया। वहीं, बाहरी हिस्से में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया गया। हालांकि, हिंदू साधु लगातार बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि होने का दावा करते रहे। मैं इसकी गवाह हूं। लेकिन, मेरी गवाही उस मंच पर नहीं हो सकती थी। मैं चुपचाप बस देखती रही। 1853 से 1859 के बीच 1857 का दौर भी आया। पहली बार अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका गया था। गोलियों में गौवंश और सुअर की चर्बी के इस्तेमाल के मसले पर सिपाहियों ने बंदूकों के इस्तेमाल से इनकार किया। इस पर विवाद गहरा गया। हालांकि, अंग्रेजी सरकार ने पहले सिपाही विद्रोह को कुचला। इसके बाद सांप्रदायिक विवाद की जड़ बनते मंदिर- मस्जिद मुद्दे को बंटवारे के जरिए सुलझाने की कोशिश की। लेकिन, हिंदुओं को यह कहां मंजूर था। वे तो अपने आराध्य की जगह को वापस पाने को किसी भी स्थिति में जाने को तैयार दिख रहे थे। देश में आजादी की लड़ाई शुरू हो गई थी।

मुगलकालीन गुलामी के प्रतीक बाबरी मस्जिद से भी आजादी के नारे बुलंद होने लगे। 20वीं सदी की शुरुआत हो चुकी थी। हिंदुओं को आधार बनाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग का गठन हो चुका था। अंग्रेज बांटो और राज करो की नीति के तहत दोनों समुदायों की खाई को गहरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। विवादित मुद्दों को हवा देकर आजादी की लड़ाई की राह को भी भटकाने की कोशिश हो रही थी। लेकिन, आस्था के मसले पर कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं था। 1934 आते- आते एक बार फिर हिंदुओं का आक्रोश चरम पर था।

1934 में हिंदुओं की भीड़ बाबरी मस्जिद तक पहुंची। विवादित ढांचे को घेर लिया गया। इस बार अंग्रेजी हुकूमत का कोई जोर नहीं चला। हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबद तोड़ दिए। इसके बाद हिंदुओं को बल का प्रयोग करते हुए खदेड़ा गया। हालांकि, बाद में फैजाबाद डीएम ने बाबरी के तीनों गुंबदों का पुननिर्माण कराया। इस घटना ने हिंदुओं को एक प्रकार से जोड़ा। मंदिर- मस्जिद का आंदोलन घर- घर तक पहुंचा। हालांकि, इसके बाद आजादी की जंग ने धर्म के इस मुद्दे को कुछ वर्षों के लिए शांत कर दिया।

आखिर दहकते विमान से यात्रियों को कैसे निकाल पाया जापान?

आज हम आपको बताएंगे कि जापान ने दहकते विमान से यात्रियों को कैसे निकाला! भले ही जापानी गलती करें, लेकिन वक्त पर वो कुछ ऐसा सही कर देते हैं कि अक्सर विजेता बनकर ही उभरते हैं। पिछले हफ्ते हनैडा हवाई अड्डे पर जहाज दुर्घटनाग्रस्त को ही ले लीजिए। वहां कोस्ट गार्ड का एक हवाई जहाज गलत समय पर गलत जगह खड़ा था। इसी तरह 2011 में आए सुनामी के बाद फुकुशिमा न्युक्लीयर मेल्टडाउन भी इसलिए और भयानक हो गया क्योंकि गलत डिजाइन की वजह से इमरजेंसी डीजल जनरेटर और पावर पैनल निचली जगहों पर रखे थे। यानी गड़बड़ी होने की पूरी आशंका। लेकिन इन आपदाओं के दौरान जापानियों ने ऐसा व्यवहार किया जिसकी पूरी दुनिया ने दाद दी। जलते हुए विमान से 379 यात्रियों को 20 मिनट से भी कम समय में कैसे निकाला गया? जब जापान में भूकंप और बाढ़ आती है तो वहां कभी लूटपाट नहीं होती। जापानियों के ऐसे व्यहवार इंसानी प्रवृत्तियों को उलट हैं क्योंकि आमतौर पर आपदाओं में लोग हताश हो जाते हैं। उस दुर्भाग्यपूर्ण हवाई जहाज में यात्रियों ने शांत होकर अनुभवी चालक दल के निर्देशों का पालन किया और सुरक्षित बाहर निकल आए। जापानियों के इतने अनुशासित और व्यवस्थित होने के कई कारण हैं। एक मुख्य कारण है वह श्रद्धा जो हर काम के प्रति रखते हैं। इसका असर जापान की इमीग्रेशन पॉलिसी पर भी देखा जा सकता है। पश्चिमी देशों के विपरीत, जहां अनपढ़ मजदूरों को काम करने के लिए आने दिया जाता है, जापान ने अपने ही लोगों पर निर्भरता रखी है। यहां किसी भी काम को छोटा नहीं समझा जाता। इसलिए, आबादी के हिसाब से अमेरिका की तुलना में जापान में विदेशी कामगारों की संख्या 12 गुना कम है।

शायद 19वीं सदी के मध्य में हुए मीजी रेस्टोरेशन के दौरान विदेशियों पर जो शक किया गया था, उसके निशान आज भी जापान की इमीग्रेशन पॉलिसीज में दिखते हैं। यहां विदेशी मजदूरों को तो स्वीकार किया जाता है, लेकिन वरीयता कुशल कर्मचारियों को दी जाती है। आखिरकार, बाकी काम उनके अपने लोग कर सकते हैं। इसलिए, इस देश में उच्च प्रशिक्षित विदेशी कर्मचारियों की संख्या मुश्किल से 4 लाख है। जापान में भी अकुशल विदेशी कामगार हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में उन्हें केवल अस्थायी दर्जा दिया जाता है। वो एक छोटे अल्पसंख्यक हैं और मुख्य रूप से खेती में काम करते हैं जहां कुल संख्या लगभग 15.2 लाख है जो घट रही है। यह जापान की इमीग्रेशन पॉलिसी का कमजोर पहलू है क्योंकि ये प्रवासी हमेशा अनिश्चितता में रहते हैं। दूसरी तरफ, जापान के शिंकांसेन या बुलेट ट्रेनों की मशहूर सफाई टीम को देखें। विकसित देशों में ये कर्मचारी आमतौर पर गरीब देशों के प्रवासी होते। वो अपने हाव-भाव से ही पिछड़ेपन का आभास देते जिनके साथ आप चाय पीना भी नहीं चाहेंगे।लेकिन शिंकांसेन की ‘सेवन मिनट्स मिरेकल’ क्लीनिंग सर्विस के लिए यह सच नहीं है। पहला, वे सभी जापानी हैं। दूसरा, उन्हें अपने काम पर गर्व है। तीसरा, उनके काम में एक निश्चित डिग्री की स्किल और ट्रेनिंग चाहिए। आखिर में, वे खुद को निम्न वर्ग नहीं मानते। वे प्रवासी नहीं हैं, बल्कि जापानी कार्य नैतिकता और संस्कृति के गौरवशाली वाहक हैं।

अपनी वर्दी और कार्यकुशलता से लबरेज जिस सम्मान के साथ सफाई रेजिमेंट काम के लिए तैयार होती है, उससे दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है। वे अपने काम को डिब्बों की सफाई से कहीं ज्यादा बड़ा मानते हैं। यह उनके लिए ‘शिंकांसेन थिएटर का शो टाइम’ होता है। उन्हें ऊपर से बताया गया है कि उनके बिना यह प्रसिद्ध ट्रेन ‘एक इंच भी नहीं हिल सकती’। उनका सम्मान ‘एंजेल रिपोर्टिंग’ से और बढ़ जाता है जहां कर्मचारी एक-दूसरे के मूल्यांकन भेजते हैं, लेकिन उन्हें केवल प्रशंसा करने योग्य चीजों पर ही टिप्पणी करने के लिए कहा जाता है। इससे कर्मचारियों के बीच आपसी सहयोग और भावना बढ़ती है। उनके वरिष्ठ भी इस जानकारी का इस्तेमाल भविष्य की योजनाओं के लिए करते हैं। जापान में मेहनत को बहुत महत्व दिया जाता है और हर पेशे के लोगों को सम्मान मिलता है, चाहे उनका स्तर कोई भी हो। ब्लू कॉलर जॉब्स को सम्मानजनक मानने की वजह से जापानी रोजमर्रा की जिंदगी में ही निर्देशों और नियमों का पालन करने की आदत डाल लेते हैं। इसलिए, हादसे के समय वे वक्त बर्बाद नहीं करते और फौरन नियमों का पालन करते हैं। यही वजह है कि जापानी भूकंप से गिरी चीजों को स्वेच्छा से ठीक जगह रख देते हैं। दोहा में जापानी फुटबॉल फैन्स खेल के बाद अपने स्टैंड खुद साफ करते हैं। जापानी स्कूलों में बच्चे आपको नियमित रूप से कक्षाओं और शौचालयों को साफ करते हुए दिखाई देंगे। जापान में किसी वेटर को टिप देने की कोशिश करें, फिर वो आपको ऐसी हिकारत से देखेंगे कि तुरंत हेकड़ी ढीली पड़ जाएगी।

जापान में ईमानदारी से किया गया काम आदर्श माना जाता है, इसलिए यहां किसी को लूटने पर किसी और देश के मुकाबले ज्यादा नाराजगी होती है। यहां तक कि याकूजा के सदस्य, जो जापान के कुख्यात अपराध सिंडिकेट में हैं और वेश्यावृत्ति और ड्रग्स से पैसा कमाते हैं, चोरों को बहुत सख्ती से सजा देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब भी जापान में कोई आपदा आती है तो अंडरवर्ल्ड भी मदद के लिए आगे आता है।

यह सोचना लाजिमी है कि कन्फ्यूशियसवाद का इससे कुछ लेना-देना है क्योंकि यह मजबूत संस्थागत नियमों के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि और पूर्णता को बढ़ावा देता है। शायद इसका एक व्यापक प्रभाव है, लेकिन इसका कतई मतलब नहीं कि कन्फूशियस की प्रेरणाओं से ही जापानी इतने अनुशासित और नैतिक हैं। आखिरकार, चीन भी कन्फ्यूशियसवादी है। वहां तो तानाशाही को बढ़ावा मिला है तो फिर इसे जापान में मेहनतकश संस्कृति की प्रेरक शक्ति कैसे मानी जा सकती है? जापान एक अलग दुनिया है, लेकिन सौभाग्य से, हमें वहां पहुंचने के लिए अंतरिक्ष यान की जरूरत नहीं है।

उत्तर प्रदेश में सिपाही भर्ती पर क्यों हो रहा है हंगामा?

हाल ही में उत्तर प्रदेश में सिपाही भर्ती पर हंगामा हुआ है! उत्‍तर प्रदेश में पूरे पांच साल के इंतजार के बाद 60,244 सिपाहियों की भर्ती निकली है। इससे पहले 2018 में यूपी पुलिस में भर्ती हुई थी। इतने सालों से पुलिस भर्ती का इंतजार कर रहे युवाओं में खुशी की लहर है पर सोशल मीडिया पर विवाद भी शुरू हो गया है। अभ्‍यर्थी योगी सरकार से मांग कर रहे हैं कि आयु सीमा में छूट दी जाए। इस भर्ती के लिए 18 से 22 साल तक की आयु सीमा निर्धारित की गई है। पिछले पांच सालों से भर्ती की तैयारी कर रहे अनेक अभ्‍यर्थी इस उम्र सीमा को पार कर गए हैं। ऐसे में वह लगातार सोशल मीडिया पर अपना विरोध जता रहे हैं। इन अभ्‍यर्थियों को केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान, समाजवादी पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अखिलेश यादव और राष्‍ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी का भी साथ मिला है। इन नेताओं ने मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को पत्र लिखकर उम्र सीमा बढ़ाने की मांग की है। इस बीच, आयु सीमा में छूट का मामला हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। गौरतलब है कि 23 दिसंबर को उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने भर्ती का नोटिफिकेशन जारी कर दिया था। इसमें अनारक्षित के लिए 24,102 पद, ईडब्ल्यूएस के लिए 6,024 पद, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 16,264 पद, अनुसूचित जाति के लिए 12,650 पद, अनुसूचित जनजाति के लिए 1,204 पद आरक्षित हैं। नोटिफिकेशन में महिलाओं के लिए आरक्षण भी निर्धारित कर दिया गया है। संपूर्ण पदों में से 20 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। आवेदन प्रक्रिया 27 दिसंबर से शुरू हो जाएगी, जो 16 जनवरी 2024 तक जारी रहेगी। वहीं, शुल्क समायोजन एवं आवेदन में संशोधन की अंतिम तिथि 18 जनवरी है।

आयु सीमा की छूट का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। सर्वेश पांडेय और अन्‍य 28 अभ्‍यर्थियों ने आयु सीमा में छूट के लिए अर्जी दाखिल की है। याचिका पर शीतकालीन अवकाश के बाद सुनवाई होगी। याचिका में कहा गया है कि यूपी पुलिस में 2018 के बाद अब जाकर भर्ती आई है। जबकि यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में वर्ष 2017 में हलफनामा दिया था कि वह 2017 से 2020 तक हर साल 30 हजार पुलिस भर्ती अगस्‍त महीने में निकालेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस भर्ती में आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। अधिकतम आयु के तौर पर उम्मीदवार ने 22 वर्ष की आयु प्राप्त न की हो, यानी अभ्यर्थी का जन्म 2 जुलाई 1998 से पहले एवं 1 जुलाई, 2005 के बाद नहीं होना चाहिए। आरक्षित श्रेणी से आने वाले उम्मीदवारों को ऊपरी आयु में छूट प्रदान की जाएगी। बस इसी उम्र सीमा को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। अखिलेश यादव ने मांग की है कि अभ्‍यर्थियों को कम से कम 3 से 4 साल छूट मिलनी चाहिए। अखिलेश ने ट्वीट किया- ‘बेरोज़गार युवाओं और विपक्ष के दबाव से आख़िरकार यूपी में कई सालों के बाद पुलिस भर्ती निकली है। इस बीच कई युवा भर्ती का इंतज़ार करते-करते नौकरी पाने की उम्र पार कर गये। इसीलिए भाजपा सरकार इस भर्ती में अभ्यर्थियों को कम-से-कम 3-4 साल की छूट दे।’

इसी तरह जयंत चौधरी ने सीएम योगी को लिखे पत्र में कहा है- ‘मैं उम्मीद करता हूं कि आप इसका संज्ञान लेकर प्रदेश के युवाओं की मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करके मौजूदा भर्ती में आयु सीमा की छूट प्रदान करेंगे।’ आरएलडी मुखिया ने पत्र के जरिए बताया कि यूपी पुलिस भर्ती को लेकर जारी विज्ञापन में आयु सीमा में कोई छूट नहीं दी गई है। इसमें सामान्य वर्ग के लिए आयु सीमा 18 से 22 साल है। जयंत चौधरी ने पत्र में लिखा है कि यूपी में पिछली पुलिस भर्ती 16 नवंबर 2018 को हुई थी। इस तरह इन 5 सालों के दौरान पुलिस में कोई भर्ती न होने के चलते प्रदेश के लाखों युवा इस आयु सीमा से बाहर जा चुके हैं। इस तथ्य को देखते हुए इस अंतराल में भर्ती से वंचित प्रदेश के लाखों युवाओं की मौजूदा भर्ती में आयु सीमा में छूट की मांग एक दम औचित्यपूर्ण एवं न्यायसंगत है।

आपको बता दें कि सोशल मीडिया के अलावा अभ्‍यर्थियों ने केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान से भी उम्र सीमा में छूट दिलाने की गुहार लगाई है। एक दिन पहले सोमवार कोहरे के बीच दर्जनों गांव के सैंकड़ो युवा मुजफ्फनगर में केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ संजीव बालियान के आवास पर पहुंचे। इन लोगों ने आयु सीमा में छूट दिलाए जाने की मांग की। डॉ संजीव बालियान ने युवाओं को आश्‍वासन देते हुए योगी को चिट्ठी लिखी है। आवेदन पत्र के साथ ही उम्मीदवारों को 400 रुपये का आवेदन शुल्क जमा करना होगा। भर्ती के लिए सामान्य, ओबीसी और अनुसूचित जाति से आने वाले पुरुष उम्मीदवारों की न्यूनतम लम्बाई 168 सेमी और महिलाओं की न्यूनतम लंबाई 152 सेमी होनी चाहिए। जबकि, अनुसूचित जनजाति श्रेणी से आने वाले पुरुष उम्मीदवारों की न्यूनतम लंबाई 160 सेमी एवं महिला उम्मीदवारों की न्यूनतम लंबाई 147 सेमी होना अनिवार्य है। भर्ती में चयनित होने के लिए उम्मीदवारों को पहले लिखित परीक्षा में शामिल होना होगा। लिखित परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन एवं फिजिकल स्टैंडर्ड टेस्ट के लिए बुलाया जाएगा। आमंत्रित किया जाएगा। अभ्‍यर्थियों को 10वीं एवं 12वीं कक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।

उत्तर प्रदेश में किन-किन जिलों के होंगे नाम परिवर्तित?

अब उत्तर प्रदेश में कई जिलों के नाम परिवर्तित होने वाले हैं! उत्‍तर प्रदेश में एक बार फिर जिलों का नाम बदलने को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। अब गाजियाबाद का नाम गजनगर या फिर हरनंदी नगर करने की मांग हो रही है। गाजियाबाद के कई हिंदू संगठनों की मांग के बाद नगर निगम की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। बीजेपी के एक पार्षद ने बैठक में इसको लेकर प्रस्‍ताव पेश किया जिस पर अन्‍य पार्षदों में भी सहमति नजर आई। 2018 में योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया। इसके बाद फैजाबाद का नाम अयोध्‍या कर दिया गया। इसके बाद से यूपी के कई जिलों के नाम बदलने की मांग चल रही है। आइए जानते हैं किन जिलों का नाम बदलने की मांग चल रही है। हरनंदीपुरम या दूधेश्वरनाथ नगर किए जाने का प्रस्ताव रखा गया। संजय सिंह ने गजप्रस्थ नाम के पीछे महाभारतकालीन हस्तिनापुर राजधानी का जिक्र किया, जब यह वन्य क्षेत्र हुआ करता था और हाथी मुख्य जानवर था। इसके अलावा यहां बहने वाली हिंडन नदी के आधार पर हरनंदी नगर नाम और दूधेश्वर नाथ मंदिर की वजह से नाम रखे जाने का प्रस्ताव रखा गया।गौरतलब है कि यूपी में जिलों का नाम बदलने की शुरुआत बसपा शासनकाल में हुआ था। तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री मायावती ने अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराजनगर, हाथरस को महामायानगर, कानपुर देहात को रमाबाई नगर और कासगंज को कांशीराम नगर बना दिया था। इसके बाद सपा सरकार आई तो मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती की तरफ से बदले गए जिलों के नाम वापस कर दिए थे।गाजियाबाद का नाम बदलकर गजप्रस्थ, हरनंदीपुरम या दूधेश्वरनाथ नगर किए जाने का प्रस्ताव रखा गया। संजय सिंह ने गजप्रस्थ नाम के पीछे महाभारतकालीन हस्तिनापुर राजधानी का जिक्र किया, जब यह वन्य क्षेत्र हुआ करता था और हाथी मुख्य जानवर था। 2017 में योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने पर फिर से जिलों के नाम बदलने की शुरुआत हो गई। 2017 में सबसे पहले मुगलसराय तहसील का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय किया गया। योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने पर फिर से जिलों के नाम बदलने की शुरुआत हो गई। 2017 में सबसे पहले मुगलसराय तहसील का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय किया गया। इससे पहले प्रतापगढ़ से भाजपा सांसद संगमलाल गुप्‍ता भी लखनऊ का नाम बदलने की मांग कर चुके हैं। सीएम को लिखे पत्र में उन्‍होंने यूपी की राजधानी का नाम लक्ष्‍मणपुर किए जाने की मांग की है।केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद 2018 में मुगलसराय रेलवे स्‍टेशन का नाम भी पंडित दीनदयान के नाम पर हो गया।

गाजियाबाद जिले के नाम बदलने की मांग 2018 से की जा रही है। दो साल पहले 2022 में बीजेपी पार्षद संजय सिंह ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस संबंध में मेमोरेंडम सौंपा था। इस दौरान गाजियाबाद का नाम बदलकर गजप्रस्थ, हरनंदीपुरम या दूधेश्वरनाथ नगर किए जाने का प्रस्ताव रखा गया। संजय सिंह ने गजप्रस्थ नाम के पीछे महाभारतकालीन हस्तिनापुर राजधानी का जिक्र किया, जब यह वन्य क्षेत्र हुआ करता था और हाथी मुख्य जानवर था। इसके अलावा यहां बहने वाली हिंडन नदी के आधार पर हरनंदी नगर नाम और दूधेश्वर नाथ मंदिर की वजह से नाम रखे जाने का प्रस्ताव रखा गया।

गाजियाबाद के अलावा कुछ समय पहले ही सुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर ने भी गाजीपुर और बहराइच का नाम बदले जाने की मांग कर दी है। उन्‍होंने इसको लेकर सीएम योगी को चिट्ठी भी लिखी है। इसमें उन्‍होंने कहा है कि गाजीपुर के पौराणिक इतिहास में महर्षि विश्‍वामित्र और बहराइच के इतिहास में महाराजा सुहेलदेव राजभर की बड़ी भूमिका रही है। इसलिए गाजीपुर का नाम विश्‍वामित्र नगर और बहराइच का नाम महाराजा सुहेलदेव नगर किया जाए। बता दें कि मायावती ने अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराजनगर, हाथरस को महामायानगर, कानपुर देहात को रमाबाई नगर और कासगंज को कांशीराम नगर बना दिया था। इसके बाद सपा सरकार आई तो मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती की तरफ से बदले गए जिलों के नाम वापस कर दिए थे। 2017 में योगी आदित्‍यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने पर फिर से जिलों के नाम बदलने की शुरुआत हो गई। 2017 में सबसे पहले मुगलसराय तहसील का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय किया गया। इससे पहले प्रतापगढ़ से भाजपा सांसद संगमलाल गुप्‍ता भी लखनऊ का नाम बदलने की मांग कर चुके हैं। सीएम को लिखे पत्र में उन्‍होंने यूपी की राजधानी का नाम लक्ष्‍मणपुर किए जाने की मांग की है।