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क्या मल्लिकार्जुन खड़गे बन सकते हैं कांग्रेस पीएम के फेस?

अब मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस पीएम के फेस बन सकते हैं! आजादी के बाद लंबे समय चले एक दलीय शासन के दौर के बाद देश में गठबंधन वाली सरकारों का दौर शुरू हुआ। केंद्र के स्तर पर इसकी शुरुआत 1977 में जनता पार्टी से हुई, जिसमें समाजवादी दलों के साथ तत्कालीन जनसंघ ने भी कदम मिलाया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में कई दलों ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने के लिए जनता पार्टी बनाई थी। पहली बार इस सम्मिलित प्रयास का नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस हवा में उड़ गई। नवगठित जनता पार्टी ने 543 लोकसभा सीटों में अकेले 345 सीटें जीती। कांग्रेस को 189 सीटों से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस को पिछले के मुकाबले 217 सीटों का नुकसान हुआ। कांग्रेस के लंबे दौर तक चले शासन के बाद उसके सामने ये सबसे बड़ी चुनौती थी। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव को आधार बना कर ही इस बार गैर भाजपा 28 विपक्षी दलों ने इंडी अलायंस बनाया है। हालांकि, 1977 में विभिन्न नामधारी समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और जनसंघ बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी ने अपनी पहचान गंवा कर विलय किया और इस तरह जनता पार्टी का उदय हुआ था। इस बार 28 दल तो साथ आ गए हैं, सबका मकसद भी एक है, जैसा 1977 में था। मगर, कोई अपनी पहचान छोड़ने को तैयार नहीं है। सच कहें तो सबको अपनी पहचान दमदार तरीके से उजागर करने की जिद ज्यादा है। सत्ताधारी दल या गठबंधन को चुनौती देने के लिए मोर्चे या गठबंधन बनते रहे हैं। कभी यूपीए बना तो अब एनडीए अस्तित्व में है। भाजपा ने एनडीए बनाया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार दूसरा कार्यकाल पूरा करने के मुहाने पर पहुंची है। एनडीए सरकार को सत्ता से बेदखल करना इन 28 दलों के नए मोर्चे या गठबंधन- इंडी अलायंस का मकसद है। लेकिन सीट बंटवारे से पहले ही जैसी स्थिति नजर आ रही है, उससे तो यही लगता है कि चुनाव आते-आते इंडी अलायंस टूट-बिखर न जाए।

दरअसल, इंडी अलायंस में जितने दल शामिल हैं, उनकी मंशा तो एक है, मगर इससे अधिक उन्हें अपना अस्तित्व बचाए-बनाए रखने की मजबूरी है। विपक्षी गठबंधन में हर नेता की अपनी महत्वाकांक्षा भी है। गिनाने को कई ऐसे चेहरे मिल-दिख जाएंगे, जिनके मन में पीएम बनने का सपना आता रहा है या अब भी आ रहा होगा। हालांकि, इंडी अलायंस में शामिल और लोकसभा में संख्या बल के हिसाब से तीसरी बड़ी पार्टी तृणमूल कांग्रेस टीएमसी की नेता और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने पीएम के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित कर ऐसे लोगों के मंसूबे पर पानी फेर दिया, जो पीएम पद की महत्वाकांक्षा पाले हुए थे। इनमें ममता बनर्जी खुद भी शामिल रही हैं। अखिलेश यादव, शरद पवार, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों के मन में पीएम बनने की अकुलाहट रही है।

ममता बनर्जी सबसे पहले 2021 में तीसरी बार बंगाल विधानसभा में परचम लहराने के बाद पीएम मोदी को चुनौती देने के लिए बेचैन हो उठी थीं। दरअसल, विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी, अमित शाह समेत भाजपा की पूरी टीम ने बंगाल फतह की उम्मीद में जितनी मेहनत की, उस पर ममता की टीएमसी ने पानी फेर दिया था। लोगों को भी एक बार लगने लगा कि मोदी को विपक्ष का कोई नेता चुनौती दे सकता है तो वो ममता बनर्जी ही हैं। ममता ने अति उत्साह में सबसे पहले विपक्षी दलों को एकजुट करने की पहल की। टीएमसी की राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए कई राज्यों में टीएमसी ने संगठन का ढांचा भी खड़ा किया। इस काम में उन्होंने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की आई-पैक टीम की मदद ली। आई-पैक के लोग राज्यों में घूम-घूम कर वैसे दगे कारतूसों की पहचान-खोज करते रहे, जिनका कभी नाम रहा है। ममता चाहती थीं कि कांग्रेस रहित विपक्ष की गोलबंदी हो। इसके लिए उन्होंने शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे नेताओं से मुलाकात भी की थी। लेकिन शिवसेना (तब अविभाजित) के नेता उद्धव ठाकरे और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने ये कह कर ममता के उत्साह पर पानी फेर दिया कि कांग्रेस को छोड़ कर विपक्षी एकता की बात बेमानी है। उसके बाद तेलंगाना के तत्कालीन सीएम केसी राव के मन में पीएम बनने की महत्वाकांक्षा हिलोरे मारने लगी। उन्होंने शुरुआती कोशिश की। वे पटना आकर महागठबंधन के नए साथी बने नीतीश कुमार से मिले भी। जब उन्हें कहीं से रिस्पॉन्स नहीं मिला तो वे चुप बैठ गए। पीएम बनने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी टीआरएस को राष्ट्रीय लुक देने के लिए बीआरएस भी बना दिया। खैर, अब वे अलग-थलग पड़ गए हैं!

इंडी अलायंस का जन्म जून 2023 को पटना में हुई बैठक में हुआ था। अब तक गठबंधन की चार बैठकें हो चुकी हैं। चौथी बैठक खत्म होते ही इसमें बिखराव के संकेत भी मिलने लगे हैं। नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश में ये पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे पीएम पद के दावेदार नहीं हैं। ये उनकी भलमनसाहत थी, लेकिन उन्हें यकीन तो पक्का रहा होगा कि अलायंस का संयोजक उन्हें बना कर उनके मान-सम्मान की रक्षा तो विपक्षी दल करेंगे ही। नीतीश चूंकि बिहार में कांग्रेस, आरजेडी और वाम दलों के गठबंधन की सरकार चला रहे हैं, इसलिए उन्हें पक्का भरोसा था कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इन दलों का साथ मिलेगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो नीतीश के नाराज होने की खबरें भी आने लगी। अब तो नाराजगी का आलम ये है कि नीतीश चुनाव के पहले ही अलग राह चुन लें तो आश्चर्य की बात नहीं।

इंडी अलायंस में झंझावात की तो ये सिर्फ शुरुआत है। काम जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, मुश्किलें भी सामने आएंगी। गठबंधन में शामिल सभी दल कांग्रेस को बड़ी पार्टी होने के कारण बड़ा दिल दिखाने की नसीहत देते रहे हैं। सैद्धांतिक तौर पर ममता का प्रस्ताव कांग्रेस ने मान भी लिया है। ममता ने कहा था कि सीट बंटवारे का काम राज्य स्तर पर हो और उन्हीं पार्टियों को इसकी जिम्मेवारी दी जाए, जो अपने-अपने राज्यों में प्रभावी हैं। ममता की बात मान ली जाए तो क्या ऐसे दल कांग्रेस को तरजीह देंगे? ये लाख टके का सवाल है। ममता खुद ही कह चुकी हैं कि बंगाल में बीजेपी से सीधा मुकाबला टीएमसी का है। ये भी सूचना है कि कांग्रेस को वे दो-तीन सीटें ही बंगाल में देना चाहती है। यूपी में अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस में इसी बात पर तनातनी है। बिहार भी उलझा हुआ है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी को अकेले 23 सीटें चाहिए। ऐसे में सीट बंटवारा इंडी अलायंस में बिखराव का दूसरा खतरा नजर आ रहा है।

क्या 2024 में कांग्रेस के लिए है करो या मरो की लड़ाई?

2024 में कांग्रेस के लिए करो या मरो की लड़ाई साबित होने वाली है! मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावी हार के झटके झेलने के बाद, कांग्रेस 2024 के लिए कमर कस रही है। इस बार 18वां लोक सभा चुनाव होने जा रहा है। कांग्रेस के लिए ‘कठिन है डगर पनघट की वाला हाल’ है। सीट शेयरिंग पर बात बन नहीं रही है, टीएमसी, AAP और महाराष्ट्र में उद्धव गुट की शिवसेना अलग टेंशन दे रही है। एक और जहां पीएम मोदी पंडित जवाहरलाल नेहरू के तीन बार के प्रधानमंत्री रिकॉर्ड की बराबरी करेंगे तो वहीं नए साल के शुरुआती 4 महीनों के अंदर होने वाला लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए 138 साल के सफर में सबसे कठिन होने वाला है। 2024 में कांग्रेस, अपनी इस गिरावट को रोकने की उम्मीद के साथ, कई चुनौतियों का सामना करेगी, जिनमें सबसे बड़ी चुनौती है बीजेपी विरोधी इंडिया ब्लॉक के घटकों के साथ सीट-बंटवारे का सौदा तय करना, जिसका अभी तक कोई चुनावी प्रभाव नहीं पड़ा है। कांग्रेस पार्टी आने वाले 2024 के चुनाव के लिए कमर कस रही है। ये साल पार्टी के लिए बेहद अहम है, क्योंकि चार दशक पहले 1984 में इसने लोकसभा में रिकॉर्ड 414 सीटें जीती थीं। लेकिन आज सिर्फ 48 सीटों के साथ पार्टी पिछले 10 सालों से लगातार कमजोर होती चली गई। हिंदी दिल वाले राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए चुनाव हार की वजह से कांग्रेस आगामी गठबंधन वार्ताओं में कमजोर स्थिति में होगी। इन हार से पार्टी का गणित गड़बड़ा गया है, जोकि हिमाचल प्रदेश (2022) और कर्नाटक (2023) में मिली जीत के जोश को कायम रखने की उम्मीद कर रही थी। ये हार 2024 के चुनावों से ठीक पहले पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला पस्त करने वाली भी रही है, क्योंकि हिंदी भाषी राज्यों का नतीजे तय करने में बड़ा रोल होता है। 2019 में, बीजेपी ने हिंदी बेल्ट में 141 सीटें जीती थीं, जो कुल लड़ी गई सीटों का 71% है।

2024 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद अहम हैं, ये जीत-हार का सवाल नहीं बल्कि पार्टी के लिए करो-मरो का सवाल है। सत्ता का फाइनल पार्टी के लिए आखिरी मौका जैसा है। अभी कांग्रेस सिर्फ तीन राज्यों – हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना में ही खुद की सरकार चला पा रही है। हिमाचल के चार लोकसभा सीटों के अलावा उत्तर भारत में पार्टी की स्थिति कमजोर है। हालांकि, दक्षिण भारत में वो थोड़ा जोर पकड़ती दिख रही है। हिंदी पट्टी में लगभग सफाया होने के बाद कांग्रेस को वोटरों को लुभाने के नए हथकंडे अपनाने होंगे। बीजेपी ‘मोदी की गारंटी’ और ‘चार जाति – महिलाएं, युवा, गरीब और किसान’ का नारा लगा रही है, जबकि कांग्रेस फ्री स्कीम और जातिगत जनगणना का दांव खेल रही है।

जातिगत जनगणना, राहत पैकेजों और अडानी के खिलाफ मुहिम का ज्यादा फायदा न देखकर कांग्रेस वापस राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दूसरे चरण की तरफ मुड़ गई है। ये यात्रा जनता से जुड़ने की एक और कोशिश है। इस बार का नाम ‘भारत न्याय यात्रा’ रखा गया है और ये बस और पैदल, दोनों तरीकों से चलेगी। 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू होकर ये 14 राज्यों से होते हुए महाराष्ट्र तक पहुंचेगी। कुल 6,200 किलोमीटर का ये सफर 85 जिलों को छूएगा। मालिकार्जुन खरगे मणिपुर से इस यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे और ये नगालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरेगी। 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है। चुनाव अप्रैल-मई में हो सकते हैं और संभव है यात्रा के आखिरी चरण का समय उसी से मिल जाए।

कांग्रेस के अध्यक्ष खरगे ने हाल ही में कहा कि अगर सब एक हो जाएं तो प्रधानमंत्री मोदी कुछ नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा, ‘जितना आप हमें कुचलने की कोशिश करेंगे, उतना ही हम मजबूत होंगे। हम देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट होकर लड़ रहे हैं।’ इस बात को जोरदार तरीके से पेश करते हुए कांग्रेस ने अपनी स्थापना दिवस पर नागपुर में “हैं तैयार हम” नाम की एक बड़ी रैली का आयोजन किया था। पार्टी पिछले कई दिनों से लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए राज्य के नेताओं के साथ लगातार सलाह-मशविरा भी कर रही है और कोई कसर नहीं छोड़ रही है। हालांकि अपनी किस्मत बदलने के लिए पार्टी उत्साहित है, कांग्रेस आने वाली चुनौतियों से भी पूरी तरह वाकिफ है। भारत विरोधी दलों के गठबंधन में छोटे दल कांग्रेस को ये समझने का सुझाव दे रहे हैं कि उन्हें पहले की सोच छोड़कर गठबंधन के लिए थोड़ा ज्यादा त्याग करना पड़ेगा। समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कांग्रेस के रवैये पर खुलकर बोल रहे हैं। उनके मुताबिक कांग्रेस का घमंड मध्य प्रदेश में उनके साथ सीट बंटवारे में अड़चन बन रहा है। इस बीच, टीएमसी और आप ने कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे को गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में प्रस्तावित करके विपक्षियों को दुविधा में डाल दिया है। यह जानते हुए कि सबसे पुरानी पार्टी सामूहिक नेतृत्व के पक्ष में है और राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में पीछे छोड़ रही है।

नेतृत्व के मुद्दों के साथ, एक सामान्य न्यूनतम एजेंडा और सीट बंटवारे को अभी तक हल नहीं किया गया है, I.N.D.I.A. गुट वर्तमान में बिखरा हुआ दिखता है, जबकि भाजपा ने का मकसद क्लियर है। यही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने विपक्षी गठबंधन से भी नेताओं को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए आमंत्रित किया है। इसे लेकर भी विपक्षी दलों में डाउट है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी इसके लिए न्योता भेजा गया है। हालांकि इसपर आधिकारिक रूप से कांग्रेस ने कोई जवाब नहीं दिया है। भाजपा ने 2024 के चुनाव के लिए मोदी को एकमात्र चेहरा बना दिया है और विपक्ष को ये चुनौती दी है कि वो अपना पीएम उम्मीदवार बताएं, ताकि चुनाव “मोदी बनाम कौन” बनकर रहे। दूसरी तरफ कांग्रेस कहती है कि वो “हम, मैं नहीं” के नारे के साथ चुनावों में जाएगी और एक सामूहिक नेतृत्व को पेश करेगी। ये देखना दिलचस्प होगा कि बिना नेता वाला विपक्षी गठबंधन मोदी के रथ को रोक पाएगा या नहीं। इस बीच, कांग्रेस 2024 के चुनावों के लिए एक सकारात्मक वैकल्पिक एजेंडा बनाने और भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने की कोशिश करेगी।

क्या नए साल के मौके पर नए सिरों पर बीजेपी सजायेगी ताज?

नए साल की मौके पर बीजेपी नए सिरों पर ताज सजा सकती है! 2023 का साल बीत गया। पिछला वर्ष किसके लिए कैसा रहा, इसका आकलन हो रहा है तो नए वर्ष में किसके लिए क्या संभावनाएं और चुनौतियां हैं, यह अनुमान लगाने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। देश की राजनीति में छाई भारतीय जनता पार्टी बीजेपी के लिहाज से देखें तो 2023 का वर्ष उतार से ज्यादा चढ़ाव वाला रहा है। पार्टी अब 2024 में कई मोर्चों पर नए इतिहास रचने की तैयारी में है। इसके लिए उसे कुछ बदलाव लाने हैं तो कई जगहों पर निरंतरता का दामन थामे रहना है। हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मुख्यमंत्री चुने गए हैं और उनके नामों से ये संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनावों में पार्टी का एक ‘नया अवतार’ दिखेगा। पार्टी नेताओं का कहना है, ‘देखना होगा कि किसे लोकसभा का टिकट नहीं मिलता है और क्या किसी मुख्यमंत्री को चुनाव लड़ने के लिए कहा जाता है। कई सांसद अपना टिकट खो सकते हैं, कुछ मंत्री भी हटाए जा सकते हैं और चुनाव लड़ने वाले मुख्यमंत्रियों पर नई भूमिका में खरे उतरने की तलवार लटकी रहेगी।’ इनका मकसद केंद्र की सत्ता में लगातार तीसरा कार्यकाल सुनिश्चित करके नेहरू वाली कांग्रेस पार्टी के रिकॉर्ड की बराबरी करने के का है।

हाल की विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भाजपा को केंद्र में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का भरोसा है। एक पार्टी सूत्र के मुताबिक, अगर बीजेपी जीतती है तो नए मंत्रिमंडल पर गौर करना होगा। कुछ पुराने चेहरों को हटाया जा सकता है और नए लोगों को मंत्रालय दिए जा सकते हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी संगठन में भी बदलाव हो सकते हैं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल जून 2024 तक बढ़ा दिया गया है। कुछ लोगों का कहना है कि संगठन के अनुभवी नेता धर्मेंद्र प्रधान या भूपेंद्र यादव, नड्डा की जगह ले सकते हैं। हालांकि, एक नेता ने कहा कि किसी को भी यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता। भाजपा सूत्र ने कहा, ‘कुछ नहीं कहा जा सकता। एमपी और राजस्थान के मुख्यमंत्री चुनाव देखिए। जिन नामों की चर्चा हो रही थी, उनमें से कोई नहीं चुना गया। आज की बीजेपी में किसी अप्रत्याशित नाम को नकारा नहीं जा सकता।’

भाजपा को लोकसभा चुनाव के बाद तीन राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारी करनी होगी। 2024 में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में चुनाव होने हैं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भी सितंबर तक चुनाव कराए जाने हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि विधानसभा वाले राज्यों में भी कुछ चौंकाने वाले फैसले हो सकते हैं। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी सामूहिक नेतृत्व का रास्ता अपनाती है या नहीं। किसान आंदोलन के बाद हरियाणा को जीतना आसान नहीं हो सकता है। जाटों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया था और कांग्रेस के पास जाट नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं। 21 दिसंबर को भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष पद के लिए बीजेपी सांसद बृज भूषण शरण सिंह के सहयोगी के चुने जाने के बाद सरकार विरोध को कम करने के लिए तेजी से हरकत में आई और तीन दिन बाद कुश्ती संघ को निलंबित कर दिया। ज्यादातर कुश्ती खिलाड़ी जो बृज भूषण पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं, हरियाणा से हैं और बीजेपी के इस कदम को राज्य और खासकर जाट समुदाय को दिए जा रहे संकेत के रूप में लिया गया है कि वह उनके साथ खड़ी है। पार्टी ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के कथित अपमान को लेकर विपक्ष पर भी हमला किया है। धनखड़ भी जाट समुदाय से हैं।

महाराष्ट्र में यह देखना होगा कि क्या देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा क्योंकि एनडीए का विस्तार हुआ है और सत्ता के और भी दावेदार हैं। एक भाजपा नेता ने कहा कि नेतृत्व की दावेदारियां बढ़ रही हैं और पार्टी संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है, जो फडणवीस के पक्ष में नहीं हो सकता है। एक ब्राह्मण होने के नाते फडणवीस अल्पसंख्यक जाति से आते हैं और राजस्थान में भजनलाल शर्मा के रूप में पहले ही एक ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाया जा चुका है। भाजपा झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है। भाजपा के झारखंड प्रदेश प्रमुख बाबूलाल मरांडी का ग्राफ हाल के महीनों में बढ़ता हुआ दिख रहा था, लेकिन एक आदिवासी विष्णु देव साई को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बना देने के बाद आदिवासी सीएम कोटा पर गहन विचार हो सकता है। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों को संदेह है कि अगर पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा जेएमएम को हरा देती है तो बाबूलाल मरांडी ही झारखंड के मुख्यमंत्री होंगे, इसकी गारंटी अब नहीं दी जा सकती है।

दिल्ली में 2025 के शुरू में चुनाव होंगे। यहां पार्टी अगले सालभर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी आप पर कथित भ्रष्टाचार पर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर कायम रह सकती है, ताकि वह राष्ट्रीय राजधानी में मतदाताओं के बीच आप की छवि बिगाड़ सके। आप गरीबों को सब्सिडी के आधार पर विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने में सफल रही है, हालांकि संसदीय चुनावों में पूरा माहौल बदल जाता है। भाजपा चाहेगी कि मतदाताओं का ध्यान सस्ते बिजली-पानी के मुद्दे से हटाकर केजरीवाल सरकार के भ्रष्टाचार की तरफ आकर्षित किया जाए।

एक भाजपा नेता ने कहा, ‘कोई इस बात को लेकर सटीक जानकारी नहीं दे सकता कि 2024 में भाजपा किस तरह के चेहरों में बदलाव देखेगी, लेकिन बड़े पैमाने पर नेतृत्व परिवर्तन होने की उम्मीद है। जिस तरह 2019 में कुछ चेहरे गुमनामी में चले गए और नए चेहरे सामने आए, 2024 में शायद इससे भी बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।’

जानिए एक खतरनाक कातिल दोस्त की कहानी!

आज हम आपको एक खतरनाक कातिल दोस्त की कहानी सुनाने जा रहे हैं! दोस्त से दगाबाजी और शातिराना प्लानिंग की कहानी चेन्नई के दक्षिण में बसे चेंगलपेट के अल्लानूर गांव से शुरू हुई। गांव की आबादी ज्यादा नहीं है, इसलिए घर भी एक-दूसरे से दूर बने हैं। ऐसी ही एक झोपड़ी में फिजिकल ट्रेनर सुरेश आर. भी रहता था। 38 साल का सुरेश आर. कुछ दिन पहले ही चेन्नई से गांव अल्लानूर लौटा था। 16 सितंबर 2023 को उसकी झोपड़ी में आग लग गई। पुलिस ने जली हुई झोपड़ी से एक पुरुष के जली हुई बॉडी बरामद की। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की। पुलिस ने भी इस आग लगने की घटना मानकर फाइल बंद कर दी। ओराथी पुलिस स्टेशन के अफसरों ने मान लिया था कि झोपड़ी में लगी आग में अपनी मां से अलग रहने वाले सुरेश की मौत हो चुकी है। करीब तीन महीने बाद दिसंबर में इस कहानी में नया मोड़ आया। तमिलनाडु में एन्नोर थाने की पुलिस 39 साल के दिल्ली बाबू की गुमशुदगी की जांच रही थी। दिल्ली बाबू सुरेश की कथित मौत से एक सप्ताह पहले संदिग्ध हालात में गायब हो गया था। 23 सितंबर को एन्नौर थाने में परिजनों ने दिल्ली बाबू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद भी जब दिल्ली बाबू का अता-पता नहीं चला तो उसके परिजन शिकायत लेकर पुलिस कमिश्नरेट पहुंचे और कोर्ट में वाद भी दायर कर दिया। इसके बाद एन्नौर पुलिस ने तफ्तीश शुरू की। पुलिस दिल्ली बाबू के बड़े भाई पलानी से पूछताछ की। पलानी ने पुलिस को बताया कि उसके भाई की दोस्ती अल्लानूर में रहने वाले सुरेश आर. से थी। गायब होने से पहले वह अक्सर सुरेश के साथ घूमता था। चेंगलपेट में अचारपक्कम पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर आर शिवकुमार ने बताया कि पलानी के बयान के बाद जांच सुरेश की ओर मुड़ी, जिसकी कथित तौर से झोपड़ी में आग लगने मौत हो गई थी। पुलिस को सबसे बड़ा क्लू उस समय हाथ लगा, जब दिल्ली बाबू के मोबाइल फोन की लास्ट लोकेशन सुरेश की झोपड़ी के पासअल्लानूर गांव में मिली।

इसके बाद से पुलिस सुरेश आर और दिल्ली बाबू के रिश्तों को खंगालने लगी। कई लोगों से पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान यह सामने आया कि झोपड़ी वाले हादसे के दौरान सुरेश को तीन लोगों के साथ दिखा था। उनमें एक की पहचान हरिकृष्णन के तौर पर हुई। अब पुलिस हरिकृष्ण के पीछे पड़ी। पुलिस की टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर पहुंची। वेल्लोर में हरिकृष्ण के पिता ने बताया कि वह कई हफ्तों से नहीं घर आया है। पुलिस ने उनसे हरिकृष्ण का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया और फिर उसे ट्रेस करती रही। इंस्पेक्टर शिवकुमार ने बताया कि फोन नंबर को ट्रेस करते हुए पुलिस टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर के पास अराकोणम के एक घर में पहुंची। वहां जब पुलिस ने हरिकृष्णन को दबोचने के लिए दरवाजा खुलवाया तो हैरान रह गई। वहां सुरेश आर. भी जिंदा मिला, जिसकी कथित मौत झोपड़ी वाले हादसे में हो चुकी थी। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।

अब बारी दोनों से पूछताछ की थी। जब पुलिस ने सुरेश आर. का मुंह खुलवाया तो दिल्ली बाबू की गुमशुदगी से भी पर्दा उठ गया। झोपड़ी में जलकर मरने वाला दिल्ली बाबू ही था, जिसे सुरेश अपनी लंबी प्लानिंग के बाद अपने साथ ले गया था। सुरेश ने अपने दो दोस्तों हरिकृष्णन और कीर्ती राजन के साथ उसकी हत्या की थी। कीर्ती राजन वेल्लोर में टैक्सी चलाता था। सुरेश ने पुलिस को बताया कि उसने एक करोड़ का जीवन बीमा कराया था। अपने लाइफ इंश्योरेंस के प्रीमियम के तौर पर पिछले दो साल में 50 हजार रुपये जमा किए थे। वह इंश्योरेंस कंपनी से मोटी रकम हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने अपनी मौत की स्क्रिप्ट लिखी। इंश्योरेंस कंपनी की तसल्ली के एक लाश की जरूरत थी। इसके लिए उसने पहले लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले संस्थाओं से बातचीत की, मगर काम नहीं बना। इस बीच उसकी मुलाकात अपने पुराने दोस्त दिल्ली बाबू से हुई। बाबू दस साल पहले अपने परिवार के साथ सुरेश के मकान में बतौर किरायेदार रहता था।

सुरेश को वह शख्स मिल गया, जिसकी हत्या के बाद पुलिस और इंश्योरेंस कंपनी को गुमराह किया जा सकता था। सुरेश ने प्लानिंग के तहत फिर से बाबू से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया। दोनों एक दशक बाद फिर एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। फिर उसने हत्या की साजिश रची। अपनी प्लानिंग में उसने हरिकृष्णन और टैक्सी ड्राइवर कीर्ती राजन को शामिल किया। 9 सितंबर को तीनों ने मिलकर हत्या की स्क्रिप्ट लिखी। प्लानिंग के तहत 15 सितंबर 2023 की शाम को तीनों पार्टी करने के नाम पर दिल्ली बाबू को धोखे से अपनी झोपड़ी में लाए। वहां उन्होंने बाबू को जमकर शराब पिलाई। जब बाबू नशे में मदहोश हो गया तो तीनों ने मिलकर जेनरेटर के तार से उसका गला घोंट दिया। बाबू की मौत के बाद सुरेश ने अपनी झोपड़ी में पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी और तीनों वहां से चलते बने। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की तो उन्हें लगा कि प्लान सक्सेस हो गया है। मगर नियति को कुछ और मंजूर था। पुलिस ने टैक्सी ड्राइवर राजन, हरिकृष्णन और सुरेश आर को गिरफ्तार कर लिया है।

क्या राम मंदिर से पीएम मोदी की बदलेगी सियासी फिजा?

अब राम मंदिर से पीएम मोदी की सियासी फिजा भी बदल सकती है! अयोध्या राम मंदिर में 22 जनवरी को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल अभी तक इसी उधेड़बुन में फंसे है कि राम मंदिर के उद्घाटन में जाना है या नहीं। देश की पूरी राजनीति राम मंदिर के आसपास आकर ठहर सी गई है। राम मंदिर को लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों को डर सता रहा है कि राम मंदिर बीजेपी को बड़ा चुनावी फायदा ना दे दे। वहीं बीजेपी भी राम मंदिर के जरिए हिंदू वोटर्स पर फोकस करने की रणनीति बना सकती है। राम मंदिर पर सियासत के बीच आज पीएम मोदी का अयोध्या दौरा भी काफी अहम है। दरअसल पीएम मोदी का यह दौरा अयोध्यावासियों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीएम मोदी के इस दौरे से भी बीजेपी लोकसभा चुनावों में फायदा मिल सकता है, क्योंकि पीएम मोदी 15,700 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। श्रीराम की नगरी से देश के विभिन्न शहरों के लिए भी सौगातों का पिटारा खुलेगा। पीएम मोदी देश के अलग अलग स्टेशनों से संचालित होने वाली छह वंदे भारत और दो अमृत भारत ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इससे पहले पीएम मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। प्रशासन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन राष्ट्र को समर्पित करेंगे। पीएम मोदी श्री माता वैष्णो देवी कटरा-नई दिल्ली, अमृतसर-नई दिल्ली, कोयम्बटूर-बेंगलुरु, मंगलूरु-मडगांव, जालना-मुंबई एवं अयोध्या-आनंद विहार टर्मिनल के बीच छह वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों के साथ ही अयोध्या-दरभंगा और मालदा टाउन-बेंगलुरु के बीच दो अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे। इसके अलावा पीएम मोदी महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करेंगे।

राम की नगरी अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। अयोध्या एयरपोर्ट की शुरुआत होते ही यूपी में एयरपोर्ट्स की संख्या 9 से बढ़कर 10 पहुंच जाएगी। वहीं यूपी को रफ्तार देने के लिए अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी के अयोध्या का दौरे से पहले शहर को ‘दिव्य रूप’ देने के लिए फूलों से सजाया जा रहा है। पुनर्विकसित मार्ग ‘राम पथ’ के मध्य में स्थापित बिजली के खंभों के चारों ओर नारंगी और पीले रंग के गेंदे के फूलों की माला लपेटी जा रही हैं। इन खंभों के शीर्ष पर बने डिजाइन धार्मिक प्रतीकों को दर्शाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई श्रमिक राम कथा पार्क में फूलों से कलात्मक आकार बना रहे हैं। सजावट के लिए भगवान राम, उनके धनुष एवं तीर, भगवान हनुमान, धार्मिक तिलक आदि की छवियों से प्रेरणा ली गई है। अयोध्या में फूलों से कई सजावटी डिजाइन बनाए गए हैं, जिनमें धनुष और तीर पकड़े हुए भगवान राम की पुष्प छवि भी शामिल है। इन सजावटी संरचनाओं का उपयोग राम पथ, धर्म पथ, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन सहित अन्य स्थानों पर सजावट के लिए किया जाएगा। सैकड़ों कर्मचारी सजावट के काम में जुटे हैं और लगभग 300 क्विंटल फूल कोलकाता, दिल्ली, गाजीपुर और अन्य स्थानों से लाए गए हैं।

आज पीएम मोदी अयोध्या पहुंच रहे है। वह एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन तक करीब 8 किलोमीटर लंबा रोड शो निकालेंगे। रोड शो के दौरान 51 जगहों पर पीएम नरेंद्र मोदी का स्वागत होगा। इसमें 12 जगहों पर संत-महंत उनका स्वागत करेंगे।एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है। 21 संस्कृत विद्यालयों के 500 वैदिक छात्र वेद मंत्र और शंख ध्वनि से स्वागत करेंगे। इन रोड शो वाले मार्गों को फूलों से सजाया गया है। इसमें थाईलैंड, मलेशिया, कोलकाता, बेंगलुरु, देहरादून, उत्तराखंड और दिल्ली से फूल और आगरा के पत्ते मंगाए गए हैं।

क्या मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा या नहीं! मैरिटल रेप के मामले में अलग-अलग हाई कोर्ट का अलग-अलग फैसला आया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुनवाई होने वाली है। ऐसे में पिक्चर सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई के बाद ही साफ हो जाएगी। गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते कहा कि बलात्कार तो बलात्कार है और भले ही किसी महिला के पति ने उसके साथ किया हो। भारत में महिलाओं के खिलाफ जो सेक्सुअल अपराध होता है, उस पर मौन तोड़ने की जरूरत है। वहीं इस महीने की शुरुआत में ही एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मैरिटल रेप में बड़ा फैसला देते हुए कहा कि पत्नी की उम्र अगर 18 साल से ज्यादा हो तो IPC के तहत वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना जा सकता है। मैरिटल रेप मामले में अलग-अलग हाई कोर्ट का फैसला भी अलग-अलग है। वैसे मैरिटल रेप का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है और इस पर सुनवाई होनी है जिसके बाद ही इस मामले में पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी। IPC की धारा-375 या फिर भारतीय न्याय संहिता की धारा-63 में रेप को परिभाषित किया गया है। कानून कहता है कि अगर कोई शख्स किसी भी महिला के साथ उनकी मर्जी के खिलाफ संबंध बनाता है तो वह रेप होगा। साथ ही बालिग पत्नी के साथ जबरन संबंध रेप का अपवाद होगा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अक्टूबर में एक मामले में फैसला दिया था कि पति के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाने का केस नहीं चल सकता है, क्योंकि रेप के मामले में पति को अपवाद में रखा गया है और रेप कानून की नई परिभाषा ज्यादा व्यापक है और अप्राकृतिक संबंध भी रेप के दायरे में है। ऐसे में पति के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक संबंध का केस नहीं चलेगा क्योंकि मैरिटल रेप अपराध नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की उम्र अगर 18 साल से ज्यादा हो तो IPC तहत पति के खिलाफ मैरिटल रेप का केस नहीं बनेगा। आरोपी को अप्राकृतिक अपराध के मामले में बरी करते हुए यह टिप्पणी की गई। कोर्ट ने कहा कि धारा-377 के तहत जो अपराध है वह रेप की परिभाषा में शामिल है और मैरिटल रेप के मामले में पति को अपवाद में रखा गया है। गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि रेप तो रेप होता है, भले ही रेप करने वाला पति ही क्यों न हो। अदालत ने कहा कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की वास्तविक घटनाएं संभवतया आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। महिलाओं को ऐसे वातावरण में रहना पड़ता है जहां वह हिंसा को झेलती हैं। केरल हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की मर्जी के खिलाफ जाकर अगर पति संबंध बनाता है यानी मैरिटल रेप करता है तो यह तलाक का मजबूत आधार होगा। कोर्ट ने कहा कि यह मानसिक और शारीरिक क्रूरता के दायरे में है और यह तलाक का आधार है।

दिल्ली हाई कोर्ट में मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने के लिए अर्जी दाखिल की गई थी। वहीं, केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाई कोर्ट को बताया था चूंकि इस मामले का सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए केंद्र परामर्श प्रक्रिया के बाद ही अपना पक्ष रखेगा। दिल्ली हाई कोर्ट ने 11 मई को इस मामले में जो फैसला दिया वह बंटा हुआ था। दो जजों की बेंच में एक जज ने इसे अपराध की श्रेणी में लाने की बात कही तो दूसरे ने इसके विपरीत आशय जाहिर किया। जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है।

बता दे कि बार एंड बेच की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस दिव्येश जोशी ने अपने 8 दिसंबर को आदेश में अमेरिकी राज्यों, तीन ऑस्ट्रेलियाई राज्यों, न्यूजीलैंड, कनाडा, इज़राइल, फ्रांस, स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे, सोवियत संघ, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया का जिक्र करते हुए कि करीब 50 देशों में मैरिटल रेप अपराध है। कई देश इसे अपराध घोषित करने की जा रहे हैं। जस्टिस दिव्येश जोशी ने टिप्पणी की कि ‘लड़के ही लड़के रहेंगे’ के सामाजिक रवैये को बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो पीछा करने और छेड़छाड़ के अपराधों को सामान्य बनाता है। जोशी ने कहा कि भारीय दंड संहिता काफी तरह तक यूके से प्रेरित है। उसने भी पति को रेप से छूट देने को हटा दिया है।

जस्टिस दिव्येश जोशी ने आदेश में कहा गया है कि अगर कोई पुरुष किसी महिला का यौन उत्पीड़न करता है या उसे टेप करता है, तो आईपीसी की धारा 376 के तहत सजा दी जा सकती है। जस्टिस ने काफी मामलों में ऐसा देखा गया है कि एक पति जब दूसरे व्यक्ति की तरफ इस तरह का कृत्य करता है तो उसे छूट दे दी जाती है। मेरी अपनी राय है कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बलात्कार बलात्कार है, चाहे वह किसी भी पुरुष द्वारा किया गसा हो। चाहे पति हो और महिला पत्नी हो। जोशी ने कहा कि इस बारे में सामाजिक रवैया बदले की जरूरत है।

जस्टिस दिव्येश जाेशी ने ये कड़ी टिप्पणियों राजकोट के उस मामले कीं जिसमें एक महिला ने अपने पति-सास और ससुर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें कहा था कि उन्हें न सिर्फ नग्न वीडियो रिकॉर्ड किए बल्कि उन्हें अश्लील साइट पर अपलोड किया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीड़िता की तरफ दलील दी गई कि पति ये सब हरकतें अपने माता-पिता की शह पर कर रहा था। पीड़ित की ओर से कहा गया है कि इस सब के पीछे का मकसद पैसा कमाना और अपने होटल को बेचने से बचना था क्योंकि वे आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। ऐसा उन्होंने अधिक रुपये कमाने के लिए किया। कोर्ट ने इस मामले में तमाम आरोपियों की जमानत खारिज कर दी।

नागपुर रैली में बीजेपी के लिए क्या बोले राहुल गांधी?

हाल ही में राहुल गांधी ने नागपुर रैली में बीजेपी के लिए एक बयान दिया है! कांग्रेस के 139वें स्थापना दिवस पर आयोजित ‘हैं तैयार हम’ रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने बीजेपी पर बड़ा हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि देश में दो विचारधाराओं की लड़ाई की चल रही है। राहुल गांधी ने कहा कि यह लड़ाई नागपुर से शुरू हुई थी। इसलिए हम यहां आए हैं। राहुल गांधी ने बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि केंद्र की सत्ता में आने पर कांग्रेस पार्टी देश में जाति जनगणना कराएगी। राहुल गांधी ने कहा कि देखने में कह सकते हैं कि लड़ाई राजनैतिक है सत्ता के लिए है, लेकिन सही में यह लड़ाई दो विचारधाराओं की है। राहुल गांधी ने कांग्रेस से बीजेपी में गए नेता जो सांसद है से बातचीत की बातचीत का हवाला देकर निशाना साधा। राहुल गांधी ने कहा कि कहा उन्होंने मुझसे छुपकर और डरकर मुलाकात की और कहा कि मैं बीजेपी का सांसद हूं लेकिन मेरा दिल कांग्रेस में है। राहुल गांधी ने कहा कि उस सांसद ने बताया कि बीजेपी में गुलामी चलती है। ऊपर से जो आर्डर आता है उसे करना पड़ता है। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस में सभी सुनी जाती है। नीचे से आवाज आती है, लेकिन बीजेपी में ऐसा नहीं है। राहुल गांधी ने कहा वे सभी की बात सुनते हैं। कई बार असहमति भी व्यक्त करते हैं। राहुल गांधी ने कहा आजादी से पहले राजाओं और अंग्रेजों का शासन था। गन सलूट दिए जाते थे। वे जो चीज अच्छी लगती थी उसे ले लेते थे। राहुल गांधी ने कहा कि लोगों के अधिकारों की रक्षा अंबेडकर और गांधी जी ने की। संविधान बनाया। राहुल गांधी ने आज आरएसएस के लोग झंडे के सामने खड़े हो जाते हैं और सैल्यूट मारते हैं। सालों तक उन्होंने ऐसा नहीं किया है। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई के बाद लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित किया था। संविधान के जरिए बराबर अधिकार दिया। एक वोट का बराबर अधिकार दिया।

राहुल गांधी ने कांग्रेस की कार्यकाल में हुए कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि आज चार दशक में सर्वाधिक बेरोजगारी है। उन्होंने पूछा कि आप बताइए कि मोदी सरकार ने कितने लोगों के रोजगार दिया। उन्होंने बेरोजगारी के चलते आज कई-कई घंटे तक युवा सिर्फ मोबाइल देखते हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 1 लाख 50 हजार युवाओं को हिंदुस्तान की सेना और एयरफोर्स एक्सेप्ट कर लिया था। फिजिकल परीक्षा पास कर ली थी। मोदी सरकार ने अग्निवीर योजना लागू की और 1.50 युवाओं को उन्होंने आर्मी में नहीं आने दिया। राहुल गांधी इनमें से कुछ युवा मिले। वो रो रहे थे। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इससे देश का फायदा नहीं होने वाला है। राहुल गांधी ने एक बार फिर कहा कि केंद्र सरकर कुछ चुने हुए लोगों को देश का धन दे रही है।

राहुल गांधी नागपुर की रैली में एक बार फिर भागीदारी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा सरकार से लेकर देश की शीर्ष 100 से 200 कंपनियों में ओबीसी, दलित और आदिवासियों की उपस्थिति नगण्य है। राहुल गांधी ने कहा कि मैं जब जाति जनगणना की मांग उठाई तो पीएम मोदी ने अपना भाषण बदल दिया। वे अब कहते हैं कि सिर्फ एक जाति है गरीब। राहुल गांधी ने कहा कि दिल्ली में जैसे ही सरकार आएगी हम जाति जनगणना कराएंगे। इसे करके दिखा देंगे। राहुल गांधी ने कहा कि मैं फिर से कहता हूं कि यह विचारधारा की लड़ाई है। राहुल गांधी ने कहा कि हमें दो हिंदुस्तान नहीं चाहिए। हमें एक ही हिंदुस्तान चाहिए। एक हिन्दुस्तान सपने का है। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। हिंदुस्तान के युवाओं को रोजगार की जरूरत है। राहुल गांधी ने कहा कि यह काम सिर्फ I.N.D.I.A अलायंस कर सकता है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नागपुर की धरती नमन किया है। उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर और महात्मा गांधी को याद किया। इसके बाद उन्होंने कहा कि आरएसएस का जन्म भी नागपुर से हुआ। उन्होंने कहा कि अंबेडकर और गांधी की भूमि है। खरगे ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस ने पिछले 10 सालों में तंग करके रख दिया है। खरगे ने कहा देश का संविधान भी खत्म हो जाएगा। खरगे ने कहा जिस देश में वोटिंग का अधिकार नहीं था। वह अधिकार संविधान से मिला। खरगे ने बाकी लोग अपनी संपत्ति को बचाने और बढ़ाने में लगे हैं। खरगे ने कहा कि जब हम अंग्रेजों से नहीं डरे तो बीजेपी और आरएसएस से क्या डरेंगे? उन्होंने कहा कि हम पीएम मोदी से नहीं डरेंगे। खरगे ने पूछा कि क्या देश के आजादी 2014 में मिली है? खरगे के कहा देश को आजादी मिलने के बाद गद्दी पर बैठे हैं। खरगे ने रैली में कुछ देर मराठी में संबाेधन दिया।

क्या नए साल में कोरोंना का करना पड़ सकता है सामना?

नए साल के मौके में कोरोंना का सामना करना पड़ सकता है! कोरोना वायरस के नये ओमिक्रॉन सब-वैरिएंट जेएन1 के मामले भारत समेत विश्व स्तर पर बढ़ रहे हैं। इसलिए कई लोगों के बीच 2024 की शुरुआत में संभावित कोविड लहर का डर है जो एक बार फिर जिंदगी को पटरी से उतार सकता है। भारत में शनिवार को कोविड-19 के 743 नये मामले दर्ज किए गए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इसी के साथ देश में कुल एक्टिव मरीजों की संख्या बढ़कर 3,997 हो गई। भारत में अब तक जेएन1 के कुल 178 मामले सामने आए हैं। जिसमें केरल में सबसे अधिक 83 मामले दर्ज किए गए हैं। इसी के साथ जनवरी 2020 से अब तक भारत में कोरोना वायरस के मामलों की कुल संख्या 4,50,12,484 हो गई है। जबकि बीते 24 घंटे में 7 लोगों की मौत के बाद कुल मरने वालों संख्या 5,33,358 हो गई है। विश्व स्तर पर अमेरिका, कुछ यूरोपीय देश, सिंगापुर और चीन से जेएन1 के मामले सामने आए हैं। डब्ल्यूएचओ में कोविड-19 तकनीकी प्रमुख मारिया वैन केरखोव ने शनिवार को कहा, ”सीमित संख्या में रिपोर्ट करने वाले देशों से, पिछले महीने में कोविड-19 अस्पताल में भर्ती होने और आईसीयू में मरीजों के प्रवेश में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने आगे कहा कि सीएआरएस-सीओवी-2, इन्फ्लूएंजा और अन्य श्वसन रोगी लगातार बढ़ रहे हैं। खुद को संक्रमण से बचाने के उपाय करने चाहिए। मारिया वैन केरखोव ने कहा कि जेएन1 की पहचान में बढ़ोतरी जारी है। लेकिन जो बात मायने रखती है वह यह है कि कोविड-19 के मामले सभी देशों में बढ़ रहे हैं।

उन्होंने अपने एक्स अकाउंट से पोस्ट किया कि आप खुद को संक्रमण और गंभीर बीमारी से बचा सकते हैं। जोखिम के आधार पर हर 6-12 महीनों में मास्क, वेंटिलेट, टेस्ट, इलाज, वैक्सीन की डोज को बढ़ावा दें। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद आईसीएमआर की पूर्व महानिदेशक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन के अनुसार, जेएन1 कोविड-19 वैरिएंट अन्य वैरिएंट की तुलना में अधिक संक्रामक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ ने जेएन1 को इसके तेजी से बढ़ते प्रसार को देखते हुए एक अलग रूप में बांटा है। लेकिन कहा है कि यह कम वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है। मुंबई में संक्रामक रोग यूनिसन मेडिकेयर एंड रिसर्च सेंटर के सलाहकार डॉ. ईश्वर गिलाडा के अनुसार, जब तक जेएन1 ‘चिंता का विषय’ नहीं बन जाता। तब तक इससे आम आदमी को परेशान नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत ने कई शक्तिशाली देशों की तुलना में कोविड-19 महामारी का बेहतर प्रबंधन किया है। भारत में कोविड-19 के खिलाफ सबसे ज्यादा वैक्सीनेशन किया गया है। जिसमें 75 प्रतिशत आबादी को पूरी तरह से वैक्सीन की डोज दी है और 35 प्रतिशत आबादी को बूस्टर तीसरी डोज मिली है। ओमिक्रॉन वैरिएंट द्वारा मुख्य रूप से बीए.2 सब-वैरिएंट के साथ संचालित तीसरी लहर ने अधिकांश आबादी को कम से कम रुग्णता और मृत्यु दर से संक्रमित किया। उन्होंने आगे कहा कि वास्तव में बीए.2, बीए.4 और बीए.5 के साथ-साथ बीए.2.86 पिरोला जैसे बीए.2 के वंश के संक्रमण से भारत के लिए एक रक्षक था। अब हम पहले से कहीं अधिक बेहतर तैयार हैं। इतना ही नहीं, भारत अफ्रीका और अन्य जगहों पर 50 से अधिक देशों को तैयारियों, दवाओं और टीकों से सहायता प्रदान करता है। हालांकि, जेएन1 अगस्त 2023 में लक्ज़मबर्ग में पहचाना गया। यह वर्तमान में 40 से अधिक देशों में मौजूद है और इससे अधिक संख्या में लोग संक्रमित नहीं हुए हैं और न ही मरीजों की मौत हुई है।

जेएन1 की मौजूदगी से ऑक्सीजन, बेड, आईसीयू बेड या वेंटिलेटर की मांग नहीं बढ़ी है। विशेषज्ञ वरिष्ठ नागरिकों और गंभीर मरीजों वाले लोगों के साथ-साथ भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने वाले लोगों से मास्क पहनने का अनुरोध करते हैं।सीएआरएस-सीओवी-2, इन्फ्लूएंजा और अन्य श्वसन रोगी लगातार बढ़ रहे हैं। खुद को संक्रमण से बचाने के उपाय करने चाहिए। मारिया वैन केरखोव ने कहा कि जेएन1 की पहचान में बढ़ोतरी जारी है। लेकिन जो बात मायने रखती है वह यह है कि कोविड-19 के मामले सभी देशों में बढ़ रहे हैं। प्राइमस सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विकास चोपड़ा ने बताया कि कुछ मरीजों को गंभीर परिणामों और कोविड से मृत्यु दर में वृद्धि का खतरा बढ़ जाता है। उच्च मृत्यु जोखिम से जुड़े सामान्य मरीजों में हृदय संबंधी रोग जैसे- हाई ब्लडप्रेशर, कोरोनरी धमनी रोग, पुरानी श्वसन स्थितियां जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज सीओपीडी, मधुमेह, मोटापा और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली शामिल हैं।

क्या ममता बनर्जी विपक्ष के INDIA को दिखाएगी ठेंगा?

ममता बनर्जी विपक्ष के INDIA को ठेंगा दिखा सकती है! लोकसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को तगड़ा झटका दिया है। ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि 2024 में टीएमसी बंगाल में किसी पार्टी से चुनावी समझौता नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन पूरे देश में भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ेगा, मगर बंगाल में टीएमसी अकेले बीजेपी के खिलाफ लड़ेगी। वह कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के साथ समझौता नहीं करेगी। ममता बनर्जी के इस तेवर से इंडिया ब्लॉक में घमासान होना तय है। दूसरी ओर, शिवसेना उद्धव गुट ने महाराष्ट्र में सीट बंटवारे को लेकर पहली चाल दी है। पार्टी के नेता संजय राउत ने कांग्रेस को बता दिया है कि वह महाराष्ट्र की 23 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसा ही पेच पंजाब और दिल्ली में फंस रहा है, जहां आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग के लिए राजी नहीं है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सपा के साथ किए गए व्यवहार को बदला चुकाने को तैयार बैठे हैं। जब राहुल गांधी नागपुर में कांग्रेस की रैली को संबोधित कर रहे थे, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी उत्तर 24 परगना जिले के चकला में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद रैली में बोल रही थीं। रैसीट शेयरिंग पर चर्चा भी अधर में लटक गई। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस ने गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों का मूड भांपते हुए एकला चलो रे का रास्ता अपना लिया। राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन से अलग महाराष्ट्र के नागपुर से अपने प्रचार अभियान की शुरुआत कर दी, जहां एनसीपी और शिवसेना गठबंधन की पार्टनर है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सपा के साथ किए गए व्यवहार को बदला चुकाने को तैयार बैठे हैं।ली में ममता बनर्जी ने साफ तौर से ऐलान किया कि बीजेपी के खिलाफ इंडिया ब्लॉक पूरे देश में चुनाव लड़ेगा, मगर पश्चिम बंगाल में टीएमसी कांग्रेस या लेफ्ट पार्टियों से समझौता नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी अकेले बीजेपी का मुकाबला करेगी। इस रैली में ममता बनर्जी ने कांग्रेस और सीपीआई M पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप भी मढ़ दिया। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन में आने के बाद भी कांग्रेस और सीपीआई M के नेता बंगाल में टीएमसी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। अपने भाषण में ममता बनर्जी ने बीजेपी पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सीएए के तहत अगर एक समुदाय को नागरिकता मिल रही है तो दूसरे समुदाय को भी हक मिलना चाहिए। बता दें कि अमित शाह ने कोलकाता में घोषणा की थी कि सीएए देश का कानून है और बीजेपी इसे लागू करेगी।

पिछले दिनों दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक में नीतीश कुमार के भारत वाले बयान और अंग्रेजी को लेकर नाराजगी की खासी चर्चा हुई। चौथी मीटिंग में सभी दलों के बीच सीट शेयरिंग पर चर्चा भी अधर में लटक गई। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस ने गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों का मूड भांपते हुए एकला चलो रे का रास्ता अपना लिया। राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन से अलग महाराष्ट्र के नागपुर से अपने प्रचार अभियान की शुरुआत कर दी, जहां एनसीपी और शिवसेना गठबंधन की पार्टनर है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सपा के साथ किए गए व्यवहार को बदला चुकाने को तैयार बैठे हैं।

जब राहुल गांधी नागपुर में कांग्रेस की रैली को संबोधित कर रहे थे, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी उत्तर 24 परगना जिले के चकला में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद रैली में बोल रही थीं। रैली में ममता बनर्जी ने साफ तौर से ऐलान किया कि बीजेपी के खिलाफ इंडिया ब्लॉक पूरे देश में चुनाव लड़ेगा, मगर पश्चिम बंगाल में टीएमसी कांग्रेस या लेफ्ट पार्टियों से समझौता नहीं करेगी।नागपुर में कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री कैंडिडेट घोषित कर दिया। इस रैली में ममता बनर्जी ने कांग्रेस और सीपीआई M पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप भी मढ़ दिया। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन में आने के बाद भी कांग्रेस और सीपीआई M के नेता बंगाल में टीएमसी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। अपने भाषण में ममता बनर्जी ने बीजेपी पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया।इसके बाद शिवसेना सांसद संजय राउत ने खुले तौर पर महाराष्ट्र की 23 लोकसभा सीटों पर दावा ठोंक दिया। महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं। यहां कांग्रेस, शिवसेना यूटीबी और एनसीपी शरद गुट के बीच सीटों का समझौता होना है। एनसीपी के महाराष्ट्र में चार सांसद हैं।

क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन में पड़ सकती है दरार?

विपक्ष के INDIA गठबंधन में अब दरार पड़ सकती है! तीन महीने बाद एक बार फिर दिल्ली के अशोका होटल में I.N.D.I.A. गठबंधन के नेताओं का जमावड़ा लगा है। 28 दलों के नेता सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर चर्चा करेंगे। तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस बैकफुट पर नजर आ रही है। बैठक से पहले इंडिया के पार्टनर जेडी यू ने नेतृत्व का सवाल उठाया है तो शिवसेना ने अपने अखबार सामना में विधानसभा चुनाव में अन्य दलों को सीट नहीं देने के लिए कांग्रेस की आलोचना की है। आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को सीट देने के मूड में नहीं हैं। ममता बनर्जी ने भी कांग्रेस को याद दिला दिया है कि सीटों के बंटवारे पर चर्चा करते समय बंगाल में अपनी हैसियत को नहीं भूलें। कांग्रेस की मुसीबत यह है कि देश के जिन राज्यों में वह अकेले दम पर चुनावी दम दिखा सकती है, वहां उसने सहयोगियों को भाव नहीं दिया है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में उसने किसी पार्टी के साथ समझौता नहीं किया। अब इंडिया की बैठक कांग्रेस को सहयोगियों के किले में अपने लिए लोकसभा सीटों के लिए मोलतोल करना है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ 52 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने पंजाब में 8, तमिलनाडु में 8 और केरल में 15 सीटें जीती थीं। तेलंगाना और असम में पार्टी को 3-3 सीटें मिली थीं। इसके बाद वह अन्य राज्यों में एक या दो सीट जीतने में ही सफल रही। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और आंध्रप्रदेश में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सिर्फ एक-एक सीट ही मिली थी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दो सीटें मिली थी, जिसके बार में इंडिया की बैठक से पहले ममता बनर्जी ने चर्चा की। फिर सीटों के बंटवारे के लिए फार्मूला क्या होगा? सबसे बड़ा सवाल है कि मोदी लहर में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के क्षत्रप कांग्रेस को कितनी सीट देंगे। कांग्रेस 370 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि सहयोगियों को 173 सीटों पर समर्थन देगी। 373 सीटों के दावे को मान लें तो कांग्रेस कर्नाटक, असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में सीट बांटने के मूड में नहीं है। पार्टी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ना चाहती है।

पंजाब में लोकसभा की 13 और दिल्ली में 7 सीटें हैं। 2019 में कांग्रेस को 8 और आम आदमी पार्टी को दो सीटें मिली थीं। बीजेपी और अकाली दल के खाते में 2-2 सीटें आईं थीं। मगर विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दोनों राज्यों में कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया। 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 सीटों में से 62 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। आम आदमी पार्टी को 54.3 फीसदी और कांग्रेस को महज 9.7 फीसदी वोट मिले थे। 2022 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भारी जीत दर्ज की। 117 सदस्यों वाली विधानसभा में आप के 92 विधायक हैं। उसका वोट प्रतिशत 42.01 है। दूसरी ओर करारी हार के बाद कांग्रेस पंजाब में 18 सीटों पर सिमट गई। उसे 22.98 प्रतिशत वोट ही मिले थे। वोट शेयर के आधार पर इन दोनों राज्यों में आम आदमी का पलड़ा भारी है। इंडिया गठबंधन की बैठक में यह तय करना है कि अरविंद केजरीवाल दोनों राज्यों की कुल 20 में से कुल कितनी सीट कांग्रेस को देंगे। इस बार आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है। अगर सहमति नहीं बनी तो इन राज्यों में इंडिया को झटका लग सकता है।

विपक्षी गठबंधन इंडिया में पहली बार कलह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में सीट शेयरिंग नहीं करने के लिए कांग्रेस पर हमला बोला था। उत्तरप्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। बीजेपी को रोकने के लिए अखिलेश यादव ने सीट शेयरिंग में नरमी बरतने के संकेत दिए हैं, मगर यूपी में कांग्रेस की हालत पतली है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ सोनिया गांधी की सीट रायबरेली ही जीत सकी थी। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 2.33 ही रहा। इसके उलट समाजवादी पार्टी ने लोकसभा में पांच और विधानसभा में 111 सीटें जीती हैं। राज्य में 32.06 प्रतिशत वोट सपा के खाते में आई थीं। कांग्रेस 2009 के फार्मूले के आधार पर 21 लोकसभा सीट की मांग कर रही है।

बिहार में सीटों को लेकर भी बड़ा पेंच फंसा है। राज्य की कुल 40 लोकसभा सीटों में से 16 जेडी-यू के खाते में है। बाकी बची 24 सीटों में 17 पर राष्ट्रीय जनता दल की दावेदारी है। बिहार के महागठबंधन में सीपीआई भी है। उसने भी 6 सीटों की डिमांड की है। कांग्रेस के पास अभी राज्य से सिर्फ एक लोकसभा सांसद है। सूत्र बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस की किस्मत लालू यादव के हाथ में है। नीतीश कुमार की जेडी यू और लालू यादव की आरजेडी 16-16 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। बाकी बची 8 सीटों में से पांच कांग्रेस को मिल सकती है। लालू यादव और नीतीश कुमार इस फार्मूले के साथ दिल्ली पहुंचे हैं, जिसमें कांग्रेस नेताओं से इस पर चर्चा की जाएगी। हालांकि इससे पहले जेडी यू संयोजक के मुद्दे को साफ करना चाहती है।

बड़े राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन की अग्निपरीक्षा होगी। पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 22 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस पूरी तरह बंगाल से साफ हो गई। उसे सिर्फ 2.19 प्रतिशत वोट मिले थे। टीएमसी ने 215 सीटों के साथ 48 फीसदी वोट हासिल किए थे। हालांकि ममता बनर्जी ने संकेत दिए हैं कि वह सीट बंटवारे में उदारता बरतेंगी, मगर उन्होंने साफ किया है कि कांग्रेस पिछले चुनाव में सिर्फ दो सीटें ही जीत सकी है। दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस के लिए खास समस्या नहीं है। कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना में उसके पास कोई गठबंधन पार्टनर नहीं है। तमिलनाडु और केरल में सीट शेयरिंग का फार्मूला पहले से ही तय है। हिंदी भाषी राज्यों में सीट बंटवारे में उसे यह साफ करना होगा कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा में वह इंडिया के सहयोगी दलों को कितनी सीटें ऑफर करती हैं। अगर बात नहीं बनी तो यूपी और दिल्ली में गठबंधन का टूटना तय है।