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क्या मिशन 2024 के लिए पीएम मोदी ने रखी है नीव?

मिशन 2024 के लिए पीएम मोदी ने नीव रख दी है! राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के तीन दिन बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा चुनाव अभियान का आगाज कर दिया है। सड़क, रेल, तेल सहित करोड़ों की योजनाओं की सौगात देते हुए प्रधानमंत्री ने यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को याद करते हुए भाषण की शुरुआत की। उन्होंने कल्याण सिंह के राम मंदिर आंदोलन में दिए गए योगदान को याद किया और कहा कि आज राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद आज वो जहां हैं अयोध्या धाम को देखकर आनंदित हो रहे होंगे। उन्होंने बुलंदशहर की जनता से कहा कि अयोध्या में मैंने कहा था कि प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम संपन्न हुआ अब राष्ट्र प्रतिष्ठा का काम करना है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण यूपी के तेज विकास के बिना संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश को ताकतवर बनाना है। मैं तोा यूपी का सांसद हूं और मेरी ये विशेष जिम्मेदारी है। बुलंदशहर में प्रधानमंत्री की रैली के कई सियासी मायने भी तलाशे जा रहे हैं। इसमें राम का नाम, पौष पूर्णिमा और लकी शहर का सबसे ज्यादा जिक्र हो रहा है। आज पौष पूर्णिमा पर देश भर में लोग आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। हिंदू मान्यता में इस दिन का काफी महत्व है। आज से ही स्नान पर्व की शुरुआत भी होती है जो शिवरात्रि तक चलते हैं। जाहिर है राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद से ये दिन और भी खास हो गया है। इसी माहौल में प्रधानमंत्री ने पश्चिम उत्तर प्रदेश से भाजपा के चुनाव अभियान की शुरुआत की।

दूसरा पहलू ये है कि ये वही जिला है, जहां से 10 साल पहले 2014 में नरेंद्र मोदी ने चुनाव अभियान की शुरुआत की थी और पश्चिम उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर कमल खिला था। पहली बार देश ने मोदी लहर का एहसास किया था और भारतीय जनता पार्टी देश की सत्ता पर काबिज हुई थी। लेकिन 2019 में प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार अभियान के आगाज के लिए सहारनपुर जिला चुना। सरकार तो उस साल भी बन गई लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा को कई सीटों का नुकसान हो गया। इसमें भी खास बात ये थी कि पश्चिम उत्तर प्रदेश, जिस भारतीय जनता पार्टी हमेशा से अपना सबसे मजबूत किला मानती रही है, वहां की 7 सीटों पर पार्टी को हार का सामना पड़ गया।

2014 के चुनाव पर नजर डालें तो भाजपा ने पूरे प्रदेश में 73 सीटें जीती थीं। लेकिन 2019 के चुनाव में भाजपा को सपा-बसपा गठबंधन ने नुकसान पहुंचाया और कुल 16 सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा। बसपा ने 10 और सपा ने 5 व कांग्रेस ने एक सीट अपने नाम की। इनमें 7 सीटें पश्चिम उत्तर प्रदेश की थीं। उपचुनाव में भाजपा ने रामपुर की सीट जरूर सपा से छीन ली लेकिन अभी भी सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, नगीना, संभल ऐसी सीटें हैं, जहां जीत हासिल करना भाजपा के लिए चुनौती है। राजनीतिक जानकारों में चर्चा है कि सहारनपुर की बजाए पीएम मोदी का फिर से बुलंदशहर की तरफ रुख करना कहीं न कहीं ‘टोटके’ से जोड़ा जा रहा है। 22 जनवरी को जब पीएम नरेंद्र मोदी अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा कर रहे थे, तब विपक्ष के अधिकतर नेता खामोश थे। इंडिया गठबंधन के तीन नेता इस धार्मिक उत्सव के मौके पर एक्टिव दिखे। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ सुंदरकांड का पाठ किया। ममता बनर्जी कोलकाता में सभी धर्मगुरुओं के साथ सद्भाव यात्रा निकाली। उद्धव ठाकरे नासिक के उस राम मंदिर में गए, जहां पीएम मोदी अपने 11 दिवसीय व्रत के शुरुआत में पहुंचे थे। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी असम में न्याय यात्रा पर थे। शंकरदेव मंदिर में एंट्री नहीं मिलने पर वह हैबोरगांव में धरने पर बैठे रहे। अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, लालू यादव और शरद पवार जैसे दिग्गजों ने क्या किया, इसकी डिटेल मीडिया में नहीं आई। एक्सपर्ट मानते हैं कि राम मंदिर जैसे आयोजनों से दूरी बनाकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने चुनाव से पहले बड़ी चूक कर दी है, जिसकी भरपाई करना मुश्किल है। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा, टीडीपी प्रमुख एन. चंद्राबाबू नायडू और जनसेना के नेता पवन कल्याण समेत आए फिल्मी सितारे, क्रिकेटर समेत तमाम सेलिब्रेटी मौजूद रहे। अनिल अंबानी, मुकेश अंबानी, अमिताभ बच्चन, रजनीकांत समेत सभी फिल्म स्टार घंटों राम मंदिर प्रांगण में बैठे रहे, जबकि ये सारे अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त माने जाते हैं। आम दिनों में इनकी झलक के लिए लोग तरस जाते हैं। मीडिया से बातचीत में इन सेलिब्रेटिज इसे सौभाग्य का अवसर माना। ऐसे में विपक्षी दलों की नेताओं की गैरमौजूदगी पर भी खूब चर्चा हुई। लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी राम मंदिर का क्रेडिट लेगी तो विपक्ष की गैरहाजिरी को मुद्दा बनाएगी, यह भी तय है।

जानिए आमेर के किले का अद्भुत इतिहास!

आज हम आपको आमेर के किले का अद्भुत इतिहास बताने जा रहे हैं! आजादी से पहले राजस्थान में 19 रियासतें और 3 ठिकाने हुआ करते थे, जिन्हें मिलाकर राजपुताना राजस्थान का गठन किया गया। अलग अलग रियासतों में अलग अलग राजा हुआ करते थे। इन्हीं में से थे आमेर रियासत के राजा भारमल। राजा भारमल पहले ऐसे हिन्दू शासक थे, जिन्होंने अपनी बेटी का विवाह एक मुगल शासक के साथ कर दिया। इससे पहले किसी हिन्दू राजा ने मुस्लिम शासक के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए थे। अपने राज्य को बचाने के लिए भारमल ने मुगल शासक अकबर की अधीनता स्वीकार की और अपनी बेटी की शादी अकबर के साथ करा दी। राजा भारमल या बिहारीमल 1547 में आमेर के शासक बने थे। पहले यहां के राजा रतन सिंह हुआ करते थे जो कि भारमल के भतीजे थे। भतीजे को गद्दी से हटाने के लिए भारमल ने एक चाल चली। भारमल ने अपने दूसरे भतीजे यानी रतन सिंह के भाई आसकरण से कहा कि रतन सिंह विलासी प्रवृत्ति का है। इसे हटाकर उसे शासक बनना चाहिए। चाचा भारमल की बात मानते हुए आसकरण ने अपने भाई रतन सिंह की हत्या कर दी और स्वयं आमेर का राजा बन गया। कुछ समय बाद भारमल ने आसकरण को हत्यारा बताते हुए उसे गद्दी से हटाया और खुद आमेर का राजा बन गए थे।

एक भतीजे की हत्या करवा कर और दूसरे को हत्यारा बताकर गद्दी हासिल करने वाले राजा भारमल के सामने राज्य को बचाने के लिए कई बार संकट झेलने पड़े थे। गद्दी से हटाए गए आसकरण ने शेरशाह सूरी के बेटे सलीम शाह से मदद मांगी तो सलीम शाह ने अपने सलाहकार हाजी पठान को सेना देकर आमेर पर चढ़ाई करने भेजा। अपने राज्य को बचाने के लिए राजा भारमल ने हाजी पठान को काफी सारा धन देकर राजी कर लिया और आसकरण को भी नरवर मध्य प्रदेश क्षेत्र का बड़ा हिस्सा लेकर मना लिया। ऐसे में आमेर का युद्ध टल गया और भारमल का राज बच गया।

चूंकि कई सालों पहले आमेर रियासत राजा पृथ्वी सिंह के पास हुआ करती थी। पृथ्वी सिंह के पौत्र सूजा भी आमेर की गद्दी को वापस हासिल करना चाहता था। सूजा मेवात के गवर्नर मिर्जा सरफुद्दीन के पास पहुंच गया जो कि अकबर की ओर नियुक्त किया हुआ गवर्नर था। सूजा ने सफरुद्दीन से मदद मांगी तो मिर्जा सफरुद्दीन मदद के लिए तैयार हो गया और आमेर की तरफ चढ़ाई शुरू कर दी। इस युद्ध को टालने के लिए आमेर के राजा भारमल ने सफरुद्दीन को काफी धन और अपने तीन व्यक्तियों को सफरुद्दीन के पास गिरवी रखने की पेशकश की। सफरुद्दीन मान गया तो भारमल ने अपने बेटे जगन्नाथ, आसकरण के पुत्र राज सिंह और जोबनेर के ठाकुर जगमाल के पुत्र खगाल को गिरवी रख दिया। नारनौल के शासक मजनू खां की गद्दी छीनने के लिए 1556 में सलीम शाह के सलाहकार हाजी खां ने युद्ध की तैयारी कर ली। जब हाजी खां की सेना ने नारनौल की तरफ चढ़ाई शुरू की तो आमेर के राजा भारमल ने मध्यस्थता की। चूंकि आमेर की चढ़ाई करने के दौरान भारमल ने हाजी खां को अपार धन दौलत देकर राजी कर लिया था। ऐसे में उनके आपस में अच्छे संबंध बन गए थे। हाजी खां और मजनू खां के बीच संधि कराने पर भारमल के संबंध मजनू खां से भी अच्छे बन गए थे। उसी मजनू खां के जरिए आमेर के राजा भारमल की पहली मुलाकात अकबर से हुई थी।

जैसा कि पहले बताया गया था कि बादशाह अकबर के गवर्नर सफरुद्दीन के मार्फत सूजा आमेर की गद्दी हासिल करना चाहता था। सूजा अगर सफरुद्दीन के जरिए सीधे अकबर से मिल लेता तो अकबर की मदद मिलते ही भारमल को गद्दी छोड़नी पड़ती। अपना राज बचाने के लिए भारमल सीधे अकबर से मिलना चाह रहे थे। ऐसे में सूजा से पहले ही भारमल मजनू खां के मार्फत बादशाह अकबर से मिल लिए। बादशाह अकबर जब अजमेर शरीफ जा रहे थे तब रास्ते में वे कुछ दिन के लिए सांगानेर रुके थे। तब आमेर के राजा भारमल ने 20 जनवरी 1562 को सांगानेर जाकर अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने पर आमेर के राजा भारमल को अपनी पुत्री हरखू बाई का विवाह अकबर के साथ कराना पड़ा। अजमेर शरीफ से वापस लौटते समय 6 फरवरी 1562 को सांभर में भारमल ने अपनी पुत्री हरखू बाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। यह पहला अवसर था जब किसी राजपूत राजा की पुत्री का विवाह मुगल शासक के साथ हुआ। अकबर से विवाह के बाद हरखू बाई को मरियम उज जमानी के नाम से जाना जाने लगा। कई इतिहासकारों ने राजा भारमल के इस फैसले की निंदा की लेकिन कुछ इतिहासकारों और लेखकों ने राजा भारमल की तारीफ भी की। डॉ. त्रिपाठी और गोपीनाथ शर्मा जैसे इतिहासकारों ने राजा भारमल के इस फैसले को उचित और दूरदर्शिता भरा कदम बताया था। अकबर और मरियम उज जमानी के पुत्र सलीम ही बाद में जहांगीर के नाम से मुगल बादशाह बने थे।

क्या वी डी सावरकर को मिल पाएगा भारत रत्न सम्मान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वी डी सावरकर को भारत रत्न सम्मान मिल पाएगा या नहीं! मोदी सरकार ने समाजवाद और सामाजिक न्याय के पुरोधा कहे जाने वाले कर्पूरी ठाकुर को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से विभूषित करने का ऐलान किया है। बिहार के मुख्यमंत्री रहे ठाकुर के सम्मान के जरिए बीजेपी ने अत्यंत पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश की है। लगातार दो बार पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में बीजेपी की सरकार के पीछे ओबीसी वोटरों में पार्टी की मजबूत पकड़ एक बड़ी वजह है। कर्पूरी ठाकुर वाले दांव से पार्टी ने उस पकड़ को और भी मजबूत करने की कोशिश की है। लेकिन बीजेपी अपने आइकन विनायक दामोदर सावरकर को ‘भारत रत्न’ कब देगी? शिवसेना उद्धव बाल ठाकरे ने तो बीजेपी को घेरते हुए सवाल भी दाग दिया है कि सावरकर के लिए भारत रत्न क्यों नहीं? पार्टी नेता संजय राउत ने कहा कि 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद अबतक 11 लोगों को भारत रत्न दिया जा चुका है लेकिन सावरकर को इस लिस्ट में जगह नहीं मिली। आखिर वह बीजेपी की वेटिंग लिस्ट में क्यों हैं, आइए समझते हैं। वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान वीडी सावरकर को ‘भारत रत्न’ मिलते-मिलते रह गया था। वाजपेयी सरकार ने सावरकर को सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजने की सिफारिश कर दी थी लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने इसे ठुकरा दिया। इस तरह सावरकर को भारत रत्न मिलते-मिलते रह गया। हालांकि, तब अटल सरकार गठबंधन सरकार थी लेकिन अभी तो नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी की प्रचंड बहुमत की सरकार है।

2014 में मोदी सरकार बनने के अगले ही साल 2015 में अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न से नवाजा गया। उसके बाद 2019 में तीन हस्तियों नानाजी देशमुख, भूपेन हजारिका और प्रणब मुखर्जी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिए जाने का ऐलान हुआ। अब समाजवादी दिग्गज कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान हुआ है। वीडी सावरकर कभी आरएसएस के सदस्य नहीं रहे लेकिन संघ में उनका बहुत सम्मान है। संघ और बीजेपी के लिए वह महान क्रांतिकारी और विचारक हैं जो बेहिचक हिंदुत्व की बात करते थे। सावरकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के पोस्टर बॉय हैं। बीजेपी ने 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए जारी किए गए अपने मैनिफेस्टो ‘संकल्प पत्र’ में उनको को भारत रत्न देने का वादा किया था। उनके अलावा सावित्रीबाई फुले को भी देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजने का वादा किया था। यही वजह है कि जैसे ही इस बार भारत रत्न के लिए कर्पूरी ठाकुर के नाम का ऐलान हुआ, शिवसेना यूबीटी ने बीजेपी को सावरकर के बहाने घेर लिया।

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनायक दामोदर सावरकर की शख्सियत ऐसी है कि उन्हें दक्षिणपंथी महानायक मानते हैं तो कांग्रेस और वामपंथी उनके नाम से चिढ़ते हैं। 1910 में नासिक के कलेक्टर जैकसन की हत्या के आरोप में उन्हें लंदन में गिरफ्तार किया गया था। 1911 में उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में डाल दिया गया। इस जेल में सजा को काला पानी की सजा कहते थे। काला पानी के दौरान कैदियों को ऐसी अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं, जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएं। कोल्हू में बैल की जगह कैदियों का इस्तेमाल, महीनों तक बेड़ियों में जकड़े रखना, अंग्रेज अफसरों की बग्घियों को खिंचवाना, कोड़ों से पिटाई और कुनैन पीने के लिए मजबूर किए जाने जैसी अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। जेल की कोठरियां बदबूदार थीं जिसमें सांस लेना अपने आप में सजा हो। शौचालय जाने के लिए समय तय था। कैदियों को रिश्तेदारों से मिलने की अनुमति नहीं थी। सावरकर 1921 तक सेल्युलर जेल में इस तरह की यातनाएं सहते रहे। इस दौरान उन्होंने 6 बार ब्रिटिश सरकार के पास दया याचिका भेजी। उनके आलोचक तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत को दया याचिका भेजने और माफीनामा की वजह से उन पर सवाल उठाते हैं। राहुल गांधी अक्सर सावरकर का मजाक उड़ाते रहते हैं। पिछले साल सावरकर पर राहुल गांधी की टिप्पणी के खिलाफ बीजेपी और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना ने पूरे महाराष्ट्र में ‘सावरकर गौरव यात्रा’ निकाली थी। दिलचस्प बात ये है कि राहुल गांधी की ही दादी इंदिरा गांधी ने 1970 में प्रधानमंत्री रहते सावरकर के सम्मान में उन पर डाक टिकट जारी किया था। इतना ही नहीं, 1980 में इंदिरा ने सावरकर ट्रस्ट को खत लिखकर उन्हें भारत का सपूत बताया था।

बीजेपी ने भले ही महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा चुनाव में सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने का वादा किया था, लेकिन ये हिंदुत्व विचारक अब भी उसकी वेटिंग लिस्ट में ही है। आखिर इसकी वजह क्या है? सावरकर बीजेपी के लिए हिंदुत्व का आइकॉन और कट्टर राष्ट्रवाद का चेहरा हैं। उन्हें ‘भारत रत्न’ देने से बीजेपी हिंदुत्ववादी वोट बैंक को और भी प्रभावी ढंग से साध पाती लेकिन अभी तो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के जरिए हिंदुत्व वैसे ही सधा हुआ है। संभवतः इसीलिए बीजेपी ने सावरकर को वेटिंग लिस्ट में रखना ही मुनासिब समझा। दूसरी तरफ, कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ के जरिए पार्टी ने ओबीसी और ईबीसी वोटरों को साधने का दांव चला है। लोकसभा चुनाव वाले वर्ष में भी बीजेपी ने अगर सावरकर को भारत रत्न देने का ऐलान नहीं किया तो इसकी एक और बड़ी वजह उसका केंद्र की सत्ता में हैटट्रिक लगाने का पक्का भरोसा भी है। बीजेपी को कहीं न कहीं लगता है कि 2024 में फिर उसकी सरकार आने वाली है, इसलिए सावरकर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने से जुड़े तीर को अपने तरकश में बचाकर रखना चाहती है।

पीएम मोदी ने 50 लाख वोटरों पर कैसे साधा निशाना?

आज हम आपको बताएंगे कि पीएम मोदी ने 50 लाख वोटरों पर निशाना कैसे साधा है! लोकसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए भारतीय जनता पार्टी बीजेपी पहली बार या फर्स्ट टाइम के वोटर्स से लेकर लाभार्थियों पर ध्यान लगा रही है। पार्टी का मानना है कि पहली बार के मतदाता पीएम नरेंद्र मोदी के जोरदार समर्थक होते हैं और इसका फायदा पार्टी को 2024 को लोकसभा चुनाव में भी मिलने की उम्मीद है। दूसरी तरफ पार्टी केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और इसके लाभार्थियों पर भी खास फोकस करेगी। राम मंदिर में बाल राम की प्राण प्रतिष्ठा के बाद पीएम मोदी इस मिशन पर ऐक्टिव भी हो चुके हैं। नेशनल वोटर्स डे के अवसर पर आज पीएम ने देशभर के पहली बार के वोटर्स बात भी की। दरअसल, बीजेपी मिशन हैट्रिक के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रही है। पीएम मोदी अपने भाषणों में गरीब, किसान, महिलाओं और युवाओं पर जोर देने की बात करते रहे हैं। अब पार्टी इन युवाओं के पास पहुंचने के प्लान पर काम भी शुरू कर चुकी है। पार्टी ‘फिर एकबार मोदी सरकार’ के नारे के साथ युवाओं को साध रही है। पीएम मोदी ने आज पहली बार के इन वोटर्स से बात करके पार्टी की तैयारी का भी इशारा कर दिया।

कुछ महीने में लोकसभा का चुनाव का ऐलान हो जाएगा। बीजेपी ने पहली बार वोट डालने जा रहे 18-19 साल के वोटर्स को साधने की रणनीति में जुट गई है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु में राज्यों में नए वोटरों की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ी है। सभी दलों को ये पता है कि नए वोटर सत्ता की चाबी थमा भी सकते हैं और वापस ले भी सकते हैं। ऐसे में बीजेपी इन वोटरों को साधने के लिए एक्टिव हो गई है। महाराष्ट्र में कुल 9.12 करोड़ वोटर हैं। इस बार राज्य में 10.18 लाख नए वोटर पहली बार वोट डालेंगे। वहीं, लोकसभा चुनाव के लिए छपे वोटर लिस्ट में कुल 2.88 लाख नए वोटर जुड़े हैं। बिहार में कुल 7.6 करोड़ वोटर में इस बार 18-19 साल वाले वोटर की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है। राज्य में इस उम्र वाले करीब सवा 9 लाख बढ़े हैं। आंध्र प्रदेश में नए वोटर की तादाद 5.25 लाख बढ़ी है। राज्य में कुल 4.08 करोड़ नए वोटर हैं। वहीं कर्नाटक के नए वोटर्स लिस्ट में 18-19 साल के वोटरों की संख्या 10 लाख 34 हजार 018 बढ़ी है। राज्य में कुल 5.37 करोड़ वोटर हैं। तमिलनाडु में कुल 6.18 करोड़ वोटर हैं। राज्य में नए वोटर की तादाद 5.26 लाख बढ़ी है। दिल्ली में भी 1.47 लाख नए वोटर बढ़े हैं।

इस बार के चुनाव में 50 लाख नए वोटर बड़ा बदलाव कर सकती है। तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव में भी पहली बार के वोटरों का समर्थन बीजेपी को मिला था। पार्टी युवाओं पर फोकस करके अपना वोट बैंक बढ़ाने के जुगाड़ में है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपीको 37.36 फीसदी वोट शेयर मिले थे पार्टी इसबार इस वोट शेयर को 50 फीसदी करन चाहती है। इसके लिए युवाओं का साथ जरूरी है। बीजेपी इसके अलावा केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों पर नजर बनाए हुए है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के पीछे लाभार्थियों का बड़ा योगदान रहा था। जन धन योजना, टॉयलेट स्कीम, उज्ज्वला योजना, पीएम आवास योजना और जल जीवन मिशन मोदी सरकार की सफल योजनाएं हैं। चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी इन योजनाओं का जमकर जिक्र करते हैं। लाभार्थी पार्टी का बड़ा वोट बैंक बन चुके हैं। पार्टी अब इसमें और बढ़ोतरी कर रही है।

पीएम मोदी ने यूपी के बुलंदशहर से गांव तक पहुंच बढ़ाने के लिए एक नए अभियान की शुरुआत की है। सभी दलों को ये पता है कि नए वोटर सत्ता की चाबी थमा भी सकते हैं और वापस ले भी सकते हैं। ऐसे में बीजेपी इन वोटरों को साधने के लिए एक्टिव हो गई है। महाराष्ट्र में कुल 9.12 करोड़ वोटर हैं। इस बार राज्य में 10.18 लाख नए वोटर पहली बार वोट डालेंगे। वहीं, लोकसभा चुनाव के लिए छपे वोटर लिस्ट में कुल 2.88 लाख नए वोटर जुड़े हैं। बिहार में कुल 7.6 करोड़ वोटर में इस बार 18-19 साल वाले वोटर की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है।’गांव चलो अभियान’ से पार्टी को उम्मीद है कि इसके जरिए ग्रामीण वोटरों को भगवा जल से और ज्यादा जोड़ा जा सकेगा। पार्टी 2024 के चुनाव में अपना वोट का प्रतिशत बढ़ाने के लिए गांव चलो अभियान पर खास जोर दे रही है। पार्टी सूत्रों ने बताया कि इस अभियान से पार्टी के पक्ष में गांव वाले वोटर भी गोलबंद होंगे।

आखिर कितना विकसित हुआ है भारत?

ये सवाल उठना लाजमी है कि भारत आखिर कितना बदला है और विकसित हुआ है! हम दुनियाभर से हथियार खरीदते हैं तो दर्जनों देशों को अपने यहां बने रक्षा उत्पाद बेचते भी हैं। बड़ी बात है कि हमारे डिफेंस प्रॉडक्ट्स के ग्राहक इजरायल, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इटली जैसे बड़े-बड़े देश भी हैं। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 85 से ज्यादा देशों को रक्षा निर्यात कर रहा है। दूसरी तरफ, रक्षा आयात में तेजी से गिरावट आ रही है और हम अपनी सेना की जरूरतों के साजो-सामान खुद ही बनाने में जुट गए हैं। इससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ का अपना सपना पूरा करने की दिशा में प्रगति हो रही है तो ‘मेक इन इंडिया’ को भी बल मिल रहा है। इस प्रयास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कई कदम उठाए हैं, वो चाहे नीतियों को लेकर हों या फिर कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने की। अभी भारत ने रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 91 देशों में अपने डिफेंस अताशे रखा है। वहीं, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र की भारतीय कंपनियां कई देशों में काम कर रही हैं। मोदी सरकार के 10 साल के कार्यकाल में किस क्षेत्र में क्या उपलब्धियां हासिल हुईं, इस सीरीज में आज हम रक्षा क्षेत्र में निर्यात को लेकर गहन विश्लेषण कर रहे हैं। मोदी सरकार में रक्षा खरीद, उत्पादन और अनुसंधान एवं विकास की प्रक्रिया को आसान और सुगम बनाने के लिए कई नीतिगत सुधार किए गए हैं। सरकार ने इनोवेटर्स, स्टार्टअप, एमएसएमई और अनुसंधान क्षेत्र को शामिल करके रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों में इनोवेशन और टेक्नॉलजी डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सेलेंस iDEX लॉन्च किया। दूसरी तरफ, कोविड-19 रिकवरी पैकेज के हिस्से के रूप में घोषित आत्मनिर्भर भारत स्कीम के तहत घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए गए। सरकार ने रक्षा निर्यात बढ़ाने के लिए एक स्ट्रक्चर्ड रोडमैप मुहैया करने के लिए एक व्यापक रक्षा निर्यात रणनीति तैयार की है। यह रणनीति निर्यात प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने, विदेशी रक्षा बाजारों के साथ जुड़ाव बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर स्वदेशी रक्षा उत्पादों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। रक्षा निर्यात को सुविधाजनक बनाने और बढ़ावा देने के लिए रक्षा निर्यात संवर्धन एजेंसी डीईपीए की स्थापना की गई है। साथ ही, निर्यात लाइसेंसिंग प्रक्रिया का सरलीकरण, लाइसेंस की लंबी वैधता और घटकों और उप-प्रणालियों के निर्यात पर कम प्रतिबंध। इसके साथ ही दुनिया के 91 देशों में भारत के डिफेंस अताशे हैं जो संबंधित देश को भारत से रक्षा उपकरणों के आयात की प्रक्रिया में मदद करते हैं।

भारत के रक्षा बजट में पिछले कुछ वर्षों में क्रमिक वृद्धि देखी गई है, जिससे सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण और देश की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने में मदद मिल रही है। भारत अभी एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है, जिसका 2023 में कुल रक्षा बजट 5.94 लाख करोड़ रुपये है। रक्षा बजट में पूंजीगत व्यय उपकरणों की खरीद और आधुनिकीकरण और राजस्व व्यय वेतन, रखरखाव आदि के लिए आवंटन शामिल हैं। सरकार ने पूंजीगत खरीद बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विशेष रूप से घरेलू उद्योगों के लिए आवंटित किया, जिसका उद्देश्य विदेशी निर्भरता को कम करना और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। रक्षा खरीद प्रक्रिया में संशोधन, विशेष रूप से डीपीपी 2016 की शुरुआत और उसके बाद डीएपी 2020 में परिवर्तन, रक्षा खरीद प्रक्रिया को आधुनिक बनाने, आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने और भारत को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के सरकार के रणनीतिक इरादे को दर्शाता है। इसका असर भी हो रहा है। विदेशों से रक्षा उत्पादों की खरीद वित्त वर्ष 2018-19 में 46% के मुकाबले दिसंबर 2022 में घटकर 36.7% रह गई।

पीएम मोदी की अध्यक्षता में 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आकाश मिसाइल सिस्टम के निर्यात को मंजूरी दे दी और तेजी से निर्यात अनुमोदन के लिए एक हाई पावर कमिटी भी बनाई। इसी तरह, पिछले चार-पांच वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाकर निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। इनमें हथियारों के आयात पर चरणबद्ध प्रतिबंध लगाना, स्थानीय रूप से निर्मित सैन्य हार्डवेयर खरीदने के लिए एक अलग बजट बनाना, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को 49% से बढ़ाकर 74% करना और व्यापार करने में आसानी बढ़ाना शामिल है। उन्‍होंने कहा कि सरकार ने देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर ध्‍यान केन्द्रित किया है और पहली बार उत्पादन एक लाख करोड़ के रिकॉर्ड आंकड़े को पार कर गया है। रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत 2024-25 तक डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में ₹1,75,000 करोड़ का कारोबार हासिल करने का लक्ष्य रख रहा है। 31 दिसंबर, 2023 को तेजपुर विश्वविद्यालय के 21 वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा क्षेत्र में आत्‍मनिर्भरता प्राप्‍त करने के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा उठाए गए विभिन्‍न कदमों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि पहली बार हथियारों के आयात को बैन किया गया है। उन्होंने कहा कि हमने पांच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची जारी की, जिसके अंतर्गत 509 ऐसे रक्षा उपकरणों की पहचान की गई है, जिनका निर्माण अब देश में ही किया जाएगा। इसके अतिरिक्‍त, हमने रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की 4 सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची भी जारी की है, जिसमें 4,666 वस्तुओं की पहचान की गई है जो अब भारत में ही निर्मित होंगी।

मोदी सरकार में भारतीय रक्षा उपकरणों के निर्माण के क्षेत्र में उपलब्धियों का आकलन इस बात से भी किया जा सकता है कि भारत बड़े रक्षा आयातक से निर्यातक के रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट पिछले वर्षों की तुलना में रक्षा निर्यात के आंकड़ों में कई गुना वृद्धि का संकेत देती है। व्यक्तिगत सुरक्षा वस्तुओं से लेकर सॉफिस्टिकेटेड वेपन सिस्टम्स तक के उत्पाद एक्सपोर्ट पोर्टफोलियो का हिस्सा हैं। भारतीय रक्षा उत्पादों को दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और यहां तक ​​कि यूरोप और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी बाजार मिल गया है। इससे देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में दुनियाभर के दशों के बढ़ते विश्वास और भारत के विदेशी संबंधों की रणनीतिक गहराई का पता चलता है। भारत से निर्यात किए जाने वाले प्रमुख रक्षा उत्पादों में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, ऑफशोर पेट्रोल वेसल्स, एएलएच हेलीकॉप्टर, एसयू एवियोनिक्स, भारती रेडियो, तटीय निगरानी प्रणाली, कवच एमओडी II लॉन्चर और एफसीएस, रडार के लिए स्पेयर पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और हल्के इंजीनियरिंग मैकेनिकल पार्ट्स शामिल हैं!

क्या नीतीश कुमार फिर से बदलेंगे पाला?

ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या नीतीश कुमार फिर से पाला बदलेंगे या नहीं! पीएम मोदी ने आज यूपी के बुलंदशहर से लोकसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है। बीजेपी पूरी ताकत के साथ चुनावी रण में उतरने को तैयार हैं। लेकिन बीजेपी को घेरने में जुटे विपक्षी दलों के गठबंधन की हालत पतली होती दिख रही है। दरअसल राहुल गांधी चुनाव से पहले ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के जरिए देशवाासियों को एकजुट करने निकले हैं, उधर विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन टूट की कगार पर खड़ा होता दिख रहा है। एक के बाद एक इंडिया गठबंधन के लिए बुरी खबर आ रही है। पहले ममता ने एकला चलो का ऐलान किया तो केजरीवाल ने भी दूरी बना ली। भगवंत मान ने अकेले ही पंजाब में लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया। बीजेपी से कांग्रेस में गए कर्नाटक के पूर्व सीएम शेट्टार भी वापस आज बीजेपी में लौट आए और अब नीतीश के वापस एनडीए में लौटने की अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर नीतीश कुमार ने एनडीए में वापसी कर ली तो इंडिया गठबंधन का वजूद संकट में आ जाएगा और इंडिया गठबंधन चुनाव से पहले पूरी तरह टूट जाएगा। अयोध्या में राम मंदिर उद्घाटन के बाद बीजेपी लोकसभा चुनाव को लेकर और ज्यादा ऐक्टिव नजर आ रही है। पीएम मोदी ने खुद चुनाव प्रचार की कमान संभाल ली है। यूपी के बुलंदशहर से आज पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है। किसी भी वक्त चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर सकता है। उधर बीजेपी और पीएम मोदी को लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर देने का दावा करने वाला इंडिया गठबंधन चुनाव से पहले ही टूट की कगार पर खड़ा हो गया है। ममता बनर्जी और भगवंत मान के बाद अब नीतीश कुमार के पाला बदलने की अटकलें भी तेज हो गई हैं। सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार बिहार सीएम के पद से इस्तीफा देकर एनडीए का दामन थाम सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को इस बात का डर सता रहा है कि अगर ममता बनर्जी के बाद नीतीश कुमार ने साथ छोड़ दिया तो इंडिया गठबंधन की अबतक की चुनावी तैयारियों में पानी फिर जाएगा और कांग्रेस को लोकसभा चुनाव को लेकर फिर से नई प्लानिंग करनी होगी। कम वक्त में नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।

बिहार में सत्ता परिवर्तन को लेकर चर्चा जोरों पर है। नीतीश कुमार के बिहार सीएम का पद छोड़ने की अटकलें तेज हैं। बिहार की सियासत से बेरुखी से पहले नीतीश की इंडिया गठबंधन से नाराजगी की अटकलें भी काफी तेज थीं। वह गठबंधन की मीटिंग को आधे में छोड़कर लौट गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों ने एक इंडिया गठबंधन तैयार किया है। हाल ही में इसमें शामिल सभी 28 राजनीतिक दलों की दिल्ली में बैठक हुई थी। इस बैठक में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उछला। इसके बाद विपक्षी दलों के बीच रार ठन गई है। जनता दल यूनाइटेड के एक वरिष्ठ नेता ने खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाए जाने पर नाराजगी व्यक्त की थी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इंडिया गठबंधन में खुद का कद घटता देख नीतीश कुमार बेहद नाराज हैं। अब वह अपने पुराने सहयोगी एनडीए की ओर जाने का मन बना सकते हैं।

लोकसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को बड़ा झटका दिया है। ममता ने कहा है कि वह बंगाल में अकेली चुनाव लड़ेंगी। ममता बनर्जी के ऐलान के बाद I.N.D.I.A. गठबंधन टूटता नजर आ रहा है। कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी ने पहले कांग्रेस को दो सीटें देने को कहा था लेकिन अब ममता ने साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस को एक भी सीट नहीं देंगी। पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटे हैं और ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर एकला चलो के साथ आगे बढ़ गई हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी के गढ़ बीरभूम जिले में ममता बनर्जी ने एक बंद कमरे में संगठनात्मक बैठक की। इस दौरान ममता बनर्जी ने पार्टी नेताओं से अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को कहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें हमेशा कहा है कि हम बंगाल में अकेले ही बीजेपी को हराने का दम रखते हैं। उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा बंगाल के इतने पास है और उन्हें नहीं बुलाया गया।

दक्षिए भारत से भी इंडिया गठबंधन के लिए बुरी खबर सामने आई है। कर्नाटक के बड़े लिंगायत नेता जगदीश शेट्टार ने भी कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है। दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपने नाराज नेताओं की घर वापसी करा रही है। गुरुवार को कर्नाटक के नेता जगदीश शेट्टार पूर्व सीएम वाई. एस. येदियुरप्पा के साथ दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय पहुंचे। वह आज फिर से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। सात महीने पहले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान जगदीश शेट्टार कांग्रेस में शामिल हो गए थे। तब शेट्टार टिकट कटने से नाराज थे। विधानसभा चुनाव में वह हुबली धारवाड़ सीट पर कांग्रेस के कैंडिडेट बने मगर करीब 34 हजार वोटों से हार गए। जगदीश शेट्टार कर्नाटक के लिंगायत नेताओं में शुमार हैं और हुबली धारवाड़ इलाके में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।

बीते साल मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार के बाद समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के दिग्गज नेता कमल नाथ को आड़े हाथों लिया था। सपा प्रवक्ता मनोज सिंह काका ने कहा था कि कमल नाथ के अमर्यादित बयानों की वजह से कांग्रेस विधानसभा का चुनाव हार गई। उन्होंने कहा था कि विधानसभा चुनाव के दौरान कमल नाथ का अहंकार सिर चढ़कर बोल रहा था। दरअसल मध्य प्रदेश चुनाव में अखिलेश यादव के कांग्रेस से सीट मांगने पर कमल नाथ भड़क गए थे। अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन के सहयोगी होने के नाते प्रस्ताव रखा था, जिसे कमल नाथ ने ठुकरा दिया था और अखिलेश यादव के प्रति अपमानजनक टिप्पणी की थी। उसी दिन से सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि अखिलेश की गठबंधन में कोई पूछ नहीं है। सपा के कुछ सहयोगियों ने भी अखिलेश को गठबंधन से हटने की सलाह दी है।

नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा ने बिहार में प्रवेश किया.

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सरकार बदलने के बाद न्याय यात्रा ने बिहार में प्रवेश किया, राहुल के मुंह में फिर ‘प्यार की दुकान’ सोमवार को जब राहुल की बस किशनगंज में दाखिल हुई तो वहां सरकार बदल चुकी है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘महागठबंधन’ से अलग होकर रविवार को भाजपा नीत राजग में शामिल हो गए। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ सोमवार सुबह बिहार में प्रवेश कर गई. जब राहुल ने 14 जनवरी को मणिपुर से अपनी यात्रा शुरू की, तो बिहार में ‘महागठबंधन’ सरकार सत्ता में थी, जिसमें उनकी पार्टी कांग्रेस भी शामिल थी। लेकिन सोमवार को जब उनकी बस किशनगंज में दाखिल हुई तो वहां की सरकार बदल चुकी थी. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘महागठबंधन’ से अलग होकर रविवार को भाजपा नीत राजग में शामिल हो गए। इसके बाद बीजेपी ने जेडीयू की मदद से उस राज्य में सरकार बनाई. हालाँकि, उस गठबंधन सरकार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। 14 जनवरी को मणिपुर में राहुल की यात्रा शुरू होने के बाद वह असम से होते हुए पिछले गुरुवार को बंगाल में दाखिल हुए. हालांकि इसके बाद राहुल दो दिन की छुट्टी लेकर दिल्ली चले गए। शनिवार को जब उन्होंने उत्तरी बंगाल के जलपाईगुड़ी से अपनी यात्रा फिर से शुरू की, तब भी बिहार की राजनीति में ‘महागठबंधन’ गठबंधन सत्ता में था। लेकिन 24 घंटे के अंदर सबकुछ बदल गया. भले ही मुख्यमंत्री एक ही हों, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर जेडीयू, बीजेपी और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माझीं की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) का गठबंधन है. यात्रा सोमवार सुबह उत्तरी दिनाजपुर के सोनापुर से शुरू हुई और 11 बजे बिहार के किशनगंज पहुंची. यह मुस्लिम बहुल इलाका है. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से किशनगंज लोकसभा क्षेत्र पर कांग्रेस का कब्जा है. भारत जोरो न्याय यात्रा कल पूर्णिया और परसों कटिहार से होकर गुजरेगी. दोनों जिले जदयू के गढ़ के रूप में जाने जाते थे। जब यात्रा शुरू हुई तो ये इलाके कांग्रेस के ‘पक्ष में’ थे. लेकिन अब समीकरण बदल गया है. 31 जनवरी को राहुल की यात्रा बिहार से फिर बंगाल में प्रवेश करेगी. यह मालदा के सुजापुर से होते हुए आगे बढ़ेगी. उसके बाद झारखंड में प्रवेश करेंगे. 14 जनवरी को मणिपुर में राहुल की यात्रा शुरू होने के बाद वह असम से होते हुए पिछले गुरुवार को बंगाल में दाखिल हुए. हालांकि इसके बाद राहुल दो दिन की छुट्टी लेकर दिल्ली चले गए। शनिवार को जब उन्होंने उत्तरी बंगाल के जलपाईगुड़ी से अपनी यात्रा फिर से शुरू की, तब भी बिहार की राजनीति में ‘महागठबंधन’ गठबंधन सत्ता में था। लेकिन 24 घंटे के अंदर सबकुछ बदल गया. भले ही मुख्यमंत्री एक ही हों, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर जेडीयू, बीजेपी और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माझीं की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) का गठबंधन है.

यात्रा सोमवार सुबह उत्तरी दिनाजपुर के सोनापुर से शुरू हुई और 11 बजे बिहार के किशनगंज पहुंची. यह मुस्लिम बहुल इलाका है. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से किशनगंज लोकसभा क्षेत्र पर कांग्रेस का कब्जा है. भारत जोरो न्याय यात्रा कल पूर्णिया और परसों कटिहार से होकर गुजरेगी. दोनों जिले जदयू के गढ़ के रूप में जाने जाते थे। जब यात्रा शुरू हुई तो ये इलाके कांग्रेस के ‘पक्ष में’ थे. लेकिन अब समीकरण बदल गया है. 31 जनवरी को राहुल की यात्रा बिहार से फिर बंगाल में प्रवेश करेगी. यह मालदा के सुजापुर से होते हुए आगे बढ़ेगी. उसके बाद झारखंड में प्रवेश करेंगे. बेनजीर द्वारा कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के बारे में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करने पर विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी दबाव में हैं। राहुल कांग्रेस की ‘न्याय यात्रा’ में मौजूद हैं. यात्रा सोमवार को बंगाल से बिहार के लिए रवाना हुई. राज्य में वापस आ रहा हूं. इस दौरान सुभेंदु ने खुलेआम कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. इसके बाद कांग्रेस ने राज्य भर के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में शुवेंदु के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का फैसला किया। कांग्रेस का दावा है कि पार्टी नेता और गांधी परिवार के सदस्य के बारे में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल ‘अपमानजनक’ है. सत्तारूढ़ तृणमूल ने भी घटना की निंदा की. सुबवेंदु पर तृणमूल ने ऐसे शब्दों के इस्तेमाल को ‘असंस्कृत’ करार देते हुए हमला बोला है.

सोमवार को शुभेंदु राहुल की न्याययात्रा को लेकर नंदीग्राम में बैठे. मीडिया की ओर से राहुल की यात्रा के बारे में सवाल सुनकर शुवेंदु नाराज हो गए. इसके बाद उन्होंने कहा, ”राहुल गांधी, राहुल गांधी पिछले चार दिनों से सवाल पूछ रहे हैं. कौन हैं हरिदास पाल? ए…” इसके बाद शुवेंदु ने कहा, ”सुबह चूल्हे पर कोयला रखकर चाय बनाई जाती है. चूल्हे पर कोयला चढ़ते मैंने न तो देखा, न सुना। जिसकी समझ, उसे क्यों गिनते हो? पश्चिम बंगाल में अप्रासंगिक पार्टी. इस पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं है.” बंगाली राजनीति में कड़वे बोलों का कोई अंत नहीं है. हालांकि, शुवेंदु ने सोमवार को जिस शब्द का इस्तेमाल किया, उसे बंगाली भाषा में ‘अश्लील’ माना जाता है।

राहुल की यात्रा को लेकर कांग्रेस की शुरू से ही सत्तारूढ़ तृणमूल से तनातनी रही है. राहुल के सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने और खाने को लेकर भी विवाद है. हालाँकि, राहुल के बारे में अपने भाषण में सुवेंदु पर हमला करने के लिए शब्दों का इस्तेमाल करने में तृणमूल आक्रामक है। राहुल के साथ खड़े होने से बेहतर है कि तृणमूल पर निशाना साधा जाए।’

सिद्धार्थ आनंद द्वारा निर्देशित बॉलीवुड फिल्म फाइटर की समीक्षा.

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पिछले साल के मध्य में, ऋतिक रोशन ने इंस्टाग्राम पर अपनी एक तस्वीर साझा की थी, जिसे टॉम क्रूज़ की ‘टॉप गन’ के लिए गलत समझा जा सकता है। उस वक्त रितिक सिद्धार्थ आनंद की ‘फाइटर’ की शूटिंग कर रहे थे। एक्शन-ड्रामा में बॉलीवुड परफेक्ट है। लेकिन पूरी हवाई कार्रवाई बाकी थी. ‘फाइटर’ सिद्धार्थ का ‘देसी टॉप सॉन्ग’ है। लेकिन तस्वीर देखकर पिछला भ्रम दूर हो जाएगा. शैलीबद्ध एक्शन के बिना, टॉम क्रूज़ फ़िल्म का कोई स्पर्श नहीं है। यह फिल्म राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत है. पुलवामा घटना, बालाकोट एयरस्ट्राइक और दो देशों की वायुसेना के बीच हवाई लड़ाई, कैप्टन अभिनंदन की पाकिस्तान में कैद, भारतीय वायुसेना का पाकिस्तानी सीमा के अंदर जैश कैंप पर हमला… ‘फाइटर’ कई वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। सिद्धार्थ ने कहा कि उनकी फिल्म वास्तविकता और कल्पना का मिश्रण है। अत: अतिशयोक्ति आश्चर्य की बात नहीं है। उन्होंने इसे अच्छे से किया. यदि रितिक रोशन पायलट की सीट पर हैं, तो छोटी-छोटी बातों की परवाह कौन करता है! सभी की निगाहें शमश पठानिया उर्फ ​​पैटी (ऋतिक रोशन) पर हैं। एंट्री सीन से लेकर क्लाइमेक्स तक का एक्शन…मल्टीप्लेक्स दर्शक भी दे रहे हैं सीटी!

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और आतंकी संगठन जैश का मुकाबला करने के लिए विशेष टीमों का गठन किया। इसका नेतृत्व राकेश जय सिंह उर्फ ​​रॉकी (अनिल कपूर) कर रहे हैं। टीम में स्क्वाड्रन लीडर पैटी, मीनल राठौड़ या मिनी (दीपिका पादुकोण), सरताज गिल (करण सिंह ग्रोवर), बशीर खान (अक्षय ओबेरॉय) और जना पंचेक शामिल हैं। पैटी और रॉकी के बीच की कठिनाई को फिल्म की शुरुआत से ही समझा जा सकता है। रिहर्सल के दौरान, रॉकी ने पैटी को कोई भी ‘फैंसी स्टंट’ न करने की चेतावनी दी। चेतावनी के पीछे पैटी का काला अतीत है। कहानी में कुछ भी नया नहीं है. मूल भारत-पाक संघर्ष कश्मीर पर केंद्रित था। जैश आतंकवादी अज़हर अख्तर (ऋषभ साहने) फिल्म का खलनायक है। मजबूत ठुड्डी, लाल आंखें और पीछे की ओर पतले बालों वाला यह खलनायक पाक सेना के शीर्ष पर रहकर सारे फैसले लेता है। क्या नायक का मुकाबला ऐसे खलनायक से होगा? इसलिए निर्देशक ने समय रहते नायक को आसमान से गिराकर खलनायक के साथ लड़ाई के एक्शन सीन की व्यवस्था की है।

इन सबके अलावा कुछ सबप्लॉट, साइड कैरेक्टर और रितिक-दीपिका का प्यार भी है। ‘फाइटर’ के लिए रितिक ने खुद को अलग तरह से विकसित किया है। वर्दी में रहो, क्या है, उससे दूर देखो! वहीं लाइट मेकअप के साथ दीपिका काफी सॉफ्ट लग रही हैं। हालांकि, ऋतिक-दीपिका का लंबे समय से चल रहा प्यार आखिरकार ठंडा पड़ गया। हिंदी सिनेमा के दो ‘हॉट’ कलाकार अपने रोमांस से दर्शकों को दीवाना नहीं बना सके. दीपिका का किरदार महत्वपूर्ण है भले ही उन्हें रितिक जैसी रेंज न मिले। गणतंत्र दिवस परेड में सबसे आगे चल रही भारतीय सेना की लड़कियों ने सबका ध्यान खींचा। ऐसे में मीनल के किरदार को एक अलग दर्जा मिलना चाहिए. अनिल कपूर, करण सिंह ग्रोवर अपने रोल में परफेक्ट हैं।

‘वॉर’, ‘पठान’ के डायरेक्टर सिद्धार्थ ग्लैमरस विजुअल क्रिएट करने में माहिर हैं। हवाई युद्ध खंड देखने लायक हैं। ‘फाइटर’ के दृश्यों के पीछे ‘ड्यून’ या जेम्स बॉन्ड फिल्म की वीएफएक्स कंपनी है। छायांकन और पृष्ठभूमि संगीत ने उस दृश्य को और निखारा। ‘फाइटर’ सिद्धार्थ का ‘देसी टॉप सॉन्ग’ है। लेकिन तस्वीर देखकर पिछला भ्रम दूर हो जाएगा. शैलीबद्ध एक्शन के बिना, टॉम क्रूज़ फ़िल्म का कोई स्पर्श नहीं है। यह फिल्म राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत है. पुलवामा घटना, बालाकोट एयरस्ट्राइक और दो देशों की वायुसेना के बीच हवाई लड़ाई, कैप्टन अभिनंदन की पाकिस्तान में कैद, भारतीय वायुसेना का पाकिस्तानी सीमा के अंदर जैश कैंप पर हमला… ‘फाइटर’ कई वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। सिद्धार्थ ने कहा कि उनकी फिल्म वास्तविकता और कल्पना का मिश्रण है। अत: अतिशयोक्ति आश्चर्य की बात नहीं है। उन्होंने इसे अच्छे से किया. यदि रितिक रोशन पायलट की सीट पर हैं, तो छोटी-छोटी बातों की परवाह कौन करता है! सभी की निगाहें शमश पठानिया उर्फ ​​पैटी (ऋतिक रोशन) पर हैं। एंट्री सीन से लेकर क्लाइमेक्स तक का एक्शन…मल्टीप्लेक्स दर्शक भी दे रहे हैं सीटी!

लेकिन सिर्फ शानदार दृश्य ही नहीं, सिद्धार्थ की फिल्म में एक दृष्टिकोण भी है। लोकसभा चुनाव वाले साल में गणतंत्र दिवस पर रिलीज होने वाली फिल्म में दिल छू लेने वाले संवाद होंगे – “अगर हम बत्तमीजी पे उतर आए तो तुम्हारा हर महल्ला आईओपी बॉन जाएगा, भारत-अधिकृत-पाकिस्तान” या “उन्हें दिखाना पड़ेगा के, बाप” कौन है।” स्पीलबर्ग निर्मित ‘मास्टर ऑफ द एयर’ सीरीज में हर संवाद में हाथ से ताली बजाने का अभ्यास किया जा रहा है। यह भी वास्तविकता पर आधारित एक एरियल एक्शन ड्रामा है। लेकिन मनोरंजन के लिए आंख में उंगली डालकर राष्ट्रवाद को वहां नहीं धकेला गया है. लेकिन ये बॉलीवुड है. मनोरंजन के जनक!

बिग बॉस 17 के विजेता मुनव्वर फारुकी ने फिक्स्ड विनर कॉन्ट्रोवर्सी कहे जाने पर प्रतिक्रिया दी.

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‘बिग बॉस’ के घर में मुनव्वर पर लगा धोखाधड़ी का आरोप, विनर की ओर से आया जवाब- ‘बिग बॉस’ सब चौपट! मुनव्वर की जीत तय है. डोंगरी के बेटे ने आखिरकार ट्रॉफी के साथ विरोधियों को जवाब दिया। ‘बिग बॉस 17’ का करीब साढ़े तीन महीने का दौरा रविवार को खत्म हो गया। दिमाग और दिमाग के इस खेल में 17 प्रतियोगियों में से मुनव्वर फारूकी विजयी हुए। टॉप चार में उनके साथ मन्नारा चोपड़ा, अभिषेक कुमार और अंकिता लोखंडे थे। दर्शकों ने शुरुआत से ही अंकिता और मुनव्वर को टॉप दो से आगे रखा. लेकिन टेलीविजन का मशहूर चेहरा अंकिता को चौथे नंबर पर जाना पड़ा। मुनव्वर ने शुरू से ही कहा कि ट्रॉफी ‘डोंगरी’ आ रही है. इस नेट इन्फ्लुएंसर ने यह दिखाया। लेकिन जब मुनवर ने पुरस्कार जीता, तो दर्शकों का एक वर्ग खुशी से झूम उठा। वे शिकायत करते हैं, “बिग बॉस” सब ग़लत है! मुनव्वर की जीत तय है. आख़िरकार उन्होंने विरोधियों को ट्रॉफी देकर जवाब दिया. मुनव्वर ने लगातार दो रियलिटी शो जीते। इससे पहले कंगना रनौत की ‘लॉक अप’ ने बाजी मारी थी. उसके बाद मुनव्वर ने सलमान का ‘बिग बॉस’ जीता। वह शुरू से ही ‘बिग बॉस’ के घर के पसंदीदा प्रतियोगी हैं। 1 जनवरी 2021 को उन्हें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में मध्य प्रदेश पुलिस को गिरफ्तार करना पड़ा. इसके बाद शो के बीच उनकी लव लाइफ और शादी से जुड़े कई सच सामने आए। उसको लेकर भी कम आलोचना नहीं हुई. आख़िरकार उनके हाथ में ट्रॉफी देखकर उनके विरोधियों ने उन पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया। मुनव्वर ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी और कहा, ‘अगर सब कुछ पहले से तय होता तो मुझे शो में इतना कुछ नहीं सहना पड़ता। मैं उनसे अनुरोध करता हूं कि मुझ पर धोखाधड़ी का आरोप लगाने से पहले पूरा सीजन दोबारा देखें।” आम दर्शकों से लेकर बीटाउन स्टार तक, मुनव्वर ने कई लोगों को अपनी तरफ कर लिया है। उनके शब्दों में, “हां, मेरे पास बहुत बड़ा प्रशंसक आधार है। लेकिन ऐसे शोज़ के प्रशंसक खोने का डर भी रहता है. जो लोग मेरे बारे में परोक्ष टिप्पणियां कर रहे हैं, मैं उनकी राय नहीं बदल सकता. ‘बिग बॉस’ जीतने के बाद अपना मन नहीं बदलना चाहता।” पति के जाने के बाद से अंकिता लोखंडे परेशान हैं। हो सकता है विक्की बाहर जाकर पार्टी में मजा करे. जिसका उसे डर था वही सच हुआ। अंकिता के पति को ‘बिग बॉस’ की पूर्व महिला प्रतियोगियों के साथ पार्टी करते देखा गया था। इतना ही नहीं, उस पार्टी में एक लोकप्रिय नेट इन्फ्लुएंसर पुरबा राणा भी मौजूद थीं। सफेद दीवार के एक कोने में विक्की को पुरबा के साथ लिपटते हुए देखा गया। उनकी अंतरंग तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गई हैं। इस बार तस्वीर अंकिता के हाथ लग गई. पहली नजर में अवाक रह गई एक्ट्रेस. आपने अपने पति के साथ क्या निर्णय लिया? कुछ घंटे प्रतीक्षा करें. रविवार शाम को बिग बॉस का फिनाले। अंकिता टॉप चार में हैं. लेकिन अंकिता के पति को घर से निकाल दिया गया है. इस बार विक्की कंडाकारखाना के नए एपिसोड में डायरेक्टर रोहित शेट्टी ने अंकिता को पेश किया. अन्य महिला प्रतियोगियों के प्रति विक्की के व्यवहार को लेकर ‘बिग बॉस’ के घर में विक्की और अंकिता के बीच कई झगड़े हुए। जैसे ही विक्की ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर निकला, अंकिता ने उसे पार्टी न करने की चेतावनी दी। हालांकि, ‘बिग बॉस’ के घर के मास्टरमाइंड ‘विक्की भैया’ अपनी पत्नी की बात सुने बिना पार्टी में मस्ती कर रहे हैं। उस पार्टी में आयशा खान, ईशा मालविया, सना रईस खान, पुरबा राणा और अन्य लोग मौजूद थे। संयोग से, पार्टी में कोई अन्य पुरुष नहीं देखा गया। हालांकि, तस्वीरों से साफ है कि विक्की अपने दोस्तों की कंपनी एन्जॉय कर रही हैं। इस बार रोहित ने अंकिता के सामने वह तस्वीर दिखाते हुए कहा, मैं अपने काम की कसम खाता हूं, रोटी-रोटी की कसम खाता हूं। घर से निकलते ही विक्की ने पार्टी करना शुरू कर दिया. पिछले दो दिनों से पार्टी चल रही है. यह आपके घर में चल रहा है।” तस्वीर देखकर अंकिता अवाक रह गईं और बोलीं, ”वह जो कर रहा है उससे सच में मुझे उसे थप्पड़ मारने का मन कर रहा है।” उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया है. लेकिन क्या ‘बिग बॉस’ के घर से निकलने के बाद इनका रिश्ता कोई नया मोड़ लेगा!

क्या अब के के पाठक की मुश्किलें हट गई है?

वर्तमान में के के पाठक की सारी मुश्किलें हट गई है! शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक के कड़े फैसलों से शिक्षकों में हड़कंप तो था ही, पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर की भी उनकी बेपटरी जगजाहिर थी। दोनों के बीच बेपटरी की शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी, जब सीएम नीतीश कुमार ने अपने तत्कालीन शिक्षा मंत्री के बजाय शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को काम करने की खुली छूट दे दी थी। उनकी सहूलियत के लिए नीतीश ने चंद्रशेखर का विभाग भी बदल दिया। जैसे संकेत मिल रहे हैं, नए शिक्षा मंत्री आलोक मेहता महकमे के अपर मुख्य सचिव के काम में बाधा नहीं डालेंगे। नीतीश की सख्त हिदायत है कि केके पाठक के काम में कोई दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। नीतीश कुमार से लोजपा आर के अध्यक्ष चिराग पासवान और पूर्व सीएम जीतन राम मांझी का भले ही छत्तीस का आंकड़ा रहा हो, पर केके पाठक के प्रति दोनों के मन में आदर-सम्मान का भाव रहा है। जीतन राम मांझी तो उनकी तारीफ करते हुए यहां तक कह गए कि उन्हें बिहार का मुख्य सचिव बना देना चाहिए। इससे बिहार का भला होगा। चिराग पासवान ने कहा कि जिस तरह पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर अपने बयानों से जातिवाद को बढ़ा दे रहे थे, वैसे में उन्हें हटाया जाना सरकार का उचित कदम है। इसको इस रूप में भी समझा जा सकता है कि केके पाठक ने नीतीश की छवि को इतना सुधार दिया है कि विरोधी भी अब नीतीश के फैसले की तारीफ करने लगे हैं।

इसे महज संयोग कहें या नीतीश कुमार की कोई चाल मानें कि केके पाठक जब छुट्टी पर गए तो उनके इस्तीफे का चौतरफा शोर हुआ। जिस दिन वे छुट्टी से लौटे, उसके अगले ही दिन नीतीश ने चंद्रशेखर को शिक्षा मंत्री के पद से हटा दिया और आलोक मेहता को नई जिम्मेवारी दे दी गई। आलोक मेहता इसके पहले भूमि सुधार और राजस्व महकमे के मंत्री थे। आलोक मेहता ने नीतीश द्वारा नई जिम्मेवारी देने के बाद जिस अंदाज में उनका धन्यवाद किया, उससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि वे इससे खुश हैं और केके पाठक के काम में शायद ही दखलंदाजी की हिमाकत करें। हालांकि राजनीतिक गलियारे में चर्चा यही रही है कि चंद्रशेखर के विवादित बयानों और अपने एसीएस केके पाठक से उनकी बेपटरी से नीतीश बेहद खफा थे। नाराजगी के कारण ही केके पाठक ने छुट्टी पर जाने का फैसला किया। कहा तो यह भी जा रहा है कि पाठक छुट्टी से लौट कर शिक्षा विभाग छोड़ना चाहते थे। इसकी वजह अपने विभागीय मंत्री से उनकी बेपटरी ही कारण थी। नीतीश को यह नागवार लगा और उन्होंने अपनी नाराजगी आरजेडी के शीर्ष नेतृत्व से जाहिर कर दी। नीतीश इतने नाराज थे कि अगले ही दिन आरजेडी नेता और बिहार के डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव अपने पिता और पार्टी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के साथ नीतीश के दरबार में पहुंच गए। तकरीबन घंटे भर तीनों नेताओं ने राय-मशविरा किया। आखिरकार चंद्रशेखर का विभाग बदलने पर बेमन से ही सही, आरजेडी ने सहमति दे दी। चूंकि यह विभाग आरजेडी कोटे का था, इसलिए किसी और को मंत्री बनाने के बजाय भूमि-राजस्व मंत्री आलोक मेहता को शिक्षा विभाग की जिम्मेवारी देने की सलाह आरजेडी के शीर्षस्थ नेताओं ने दी।

यह भी सच है कि केके पाठक के शिक्षा विभाग का एसीएस बनाए जाने के बाद बिहार की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आने लगी। स्कूलों में समय से शिक्षक आने-जाने लगे तो छात्रों की उपस्थिति भी बढ़ी। कोचिंग संचालकों पर नकेल कस कर पाठक ने उनकी भी कमर तोड़नी शुरू कर दी। जीतन राम मांझी तो उनकी तारीफ करते हुए यहां तक कह गए कि उन्हें बिहार का मुख्य सचिव बना देना चाहिए। इससे बिहार का भला होगा। चिराग पासवान ने कहा कि जिस तरह पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर अपने बयानों से जातिवाद को बढ़ा दे रहे थे, वैसे में उन्हें हटाया जाना सरकार का उचित कदम है। इसको इस रूप में भी समझा जा सकता है कि केके पाठक ने नीतीश की छवि को इतना सुधार दिया है कि विरोधी भी अब नीतीश के फैसले की तारीफ करने लगे हैं।लोग भी यह मानते हैं कि कोचिंग के लोभ में बच्चे स्कूलों में नामांकन तो लेते थे, लेकिन वहां न जाकर वे कोचिंग क्लासेज में चले जाते थे। इतना ही नहीं, सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी कोचिंग क्लास चलाने लगे थे। पाठक ने उन्हें भी स्कूल आने के लिए मजबूर कर दिया।