आज हम आपको महात्मा गांधी के ऐसे आंदोलन के बारे में बताएंगे जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से भगा दिया है! राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने पूरे देश में अलग छाप छोड़ दी, जो शुरुआत से ही अग्रणी रहे, जिनके आंदोलन ने देश में एक नई ऊर्जा दी और अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया… आज हम आपको गांधी जी के कुछ ऐसे ही आंदोलन के बारे में जानकारी देने वाले हैं! आपको बता दें कि इस स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी को 77 साल पूरे हो गए हैं। बता दें कि गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत की। मुंबई में हुई रैली में गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर जमकर कहर ढाया। गांधी समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। देश की आजादी में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना योगदान दिया है। तिलक से नेहरू तक, लक्ष्मी बाई से भगत सिंह तक, सभी ने आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी के आंदलनों को कौन भूल सकता है।
गांधी आंदोलनों को आज भी याद किया जाता है। सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनूठे प्रयोग उन्हें दुनिया का सबसे अनूठा व्यक्ति साबित करते हैं। हम आपको गांधी के कुछ आंदोलनों के बारे में बताएंगे जिन्होंने अंग्रेजों को हिन्दुस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। सबसे पहला चंपारण सत्याग्रह… यह सत्याग्रह भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन था जो बिहार के चंपारण जिले से महात्मा गांधी की अगुवाई में 1917 को शुरू हुआ था। इस आंदोलन के माध्यम से गांधी ने लोगों में जन्मे विरोध को सत्याग्रह के माध्यम से लागू करने का पहला प्रयास किया जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आम जनता के अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित था।
इसके बाद शुरू हुआ असहयोग आंदोलन…बता दे कि अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला हत्याकांड के बाद देश में गुस्सा था। अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। अंग्रोजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ स्वराज की मांग उठनी शुरू हुई। एक अगस्त, 1920 को महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की घोषणा की गई। छात्रों ने स्कूल-कॉलेज जाना बंद कर दिया। मजदूर हड़ताल पर चले गए। अदालतों में वकील आना बंद हो गए। शहरों से लेकर गांव देहात में आंदोलन का असर दिखाई देने लगा। अब बात नमक सत्याग्रह की… जानकारी के लिए बता दे कि असहयोग आंदोलन के करीब आठ साल बाद महात्मा गांधी ने एक और आंदोलन किया। इस आंदोलन से अंग्रेज सरकार हिल गई। महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक 24 दिन का पैदल मार्च निकाला। इस मार्च को दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह और दांडी सत्याग्रह के रूप में इतिहास में जगह मिली। इसके बाद शुरू हुआ हरिजन आंदोलन, जिसे छुआछूत विरोधी आंदोलन भी कहा जाता है…
बता दें कि महात्मा गांधी जी ने 8 मई 1933 से छुआछूत विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी। इस दौरान महात्मा गांधी ने आत्म-शुद्धि के लिए 21 दिन का उपवास किया। इस उपवास के साथ एक साल लंबे अभियान की शुरुआत हुई। उपवास के दौरान गांधी जी ने कहा था- या तो छुआछूत को जड़ से समाप्त करो या मुझे अपने बीच से हटा दो। इससे पहले 1932 में गांधी जी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की थी। दलित समुदाय के लिए हरिजन नाम भी महात्मा गांधी ने दिया था। गांधी जी ने ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्र का भी प्रकाशन किया था। अब अंत में बात भारत छोड़ो आंदोलन की… बता दें कि 9 अगस्त, 1942 को गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत की। मुंबई में हुई रैली में गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर जमकर कहर ढाया। गांधी समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए।
इस आंदोलन ने दूसरे विश्व युद्ध में उलझी ब्रिटिश सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी। अंग्रेजों को आंदोलन खत्म करने में एक साल से ज्यादा का समय लग गया। यह भारत की आजादी में सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन था। इसलिए बता दे कि देश की आजादी में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना योगदान दिया है। तिलक से नेहरू तक, लक्ष्मी बाई से भगत सिंह तक, सभी ने आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी के आंदलनों को कौन भूल सकता है। तो यह थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कुछ ऐसे आंदोलन, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया!