बिहार की राजनीति नए नए आयाम और नए नए दरवाजे खोलती जा रही है! बिहार की चकरघिन्नी पॉलिटिक्स से पत्रकारों का माथा खराब हो गया है। कब कहां कौन किससे सट जाए, कहना मुश्किल हो रहा है। आइडियोलॉजी और संबंधों की दुहाई देनेवाले राजनेता शतरंज की चाल रहे हैं। कोने-कोने पर अपने मोहरे फिट करने की जुगत में हैं। सबकी नजर 2024 लोकसभा और 2025 बिहार विधानसभा पर है। उसी के हिसाब के गोटियां सेट की जा रही है। कुर्सी की खींचतान में जनता तो कहीं है ही नहीं। सत्ता की रूख भांपने का दावा करनेवाले नामचीन पत्रकारों का सिर ठिकाने लग गया है। माथे पर ठंडा तेल लगाकर आंख बंद करते ही, चैन चुराने वाली एक और ब्रेकिंग आ जा रही है। बेचारे किसी तरह मैनेज कर पा रहे हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 10 अगस्त 2022 को आठवीं बार शपथ लेने का रेकॉर्ड बनाया। 9 अगस्त से पहले किसी को नहीं पता था कि वो एक बार फिर पलटी मारनेवाले हैं। मगर उन्होंने ऐसा किया। 2020 के विधानसभा चुनाव में सत्ता बचाने के लिए लालू परिवार के बारे में कितना कुछ नहीं बोले थे। मगर नौ अगस्त को इस्तीफा देने के बाद सीधे 10 सर्कुलर रोड यानी राबड़ी आवास पहुंचे गए, सत्ता के लिए समर्थन मांगने। ये बातें सिर्फ नीतीश कुमार पर ही लागू नहीं होती है, बल्कि तेजस्वी यादव भी अपने ‘चाचा’ के लिए न जाने कितने ‘शुभ वचन’ बोले थे। मगर 10 अगस्त को पटना के राजभवन में गले मिल-मिलकर पोज पर पोज दिए जा रहे थे। समाजवाद की दुहाई दे रहे थे। खैर, सियासत का यही चरित्र है, कुर्सी के लिए पाला बदलने का ये खेल न तो नीतीश कुमार पहली बार खेल रहे थे और ना ही लालू के वारिस तेजस्वी। मीडिया वाले इसे अपने-अपने हिसाब से एक्सप्लेन करने में लगे रहे।
बिहार में सबकुछ सेट हो गया तो नीतीश ने अपना दायरा बढ़ाना चालू किया। पटना में एक से बढ़कर एक पोस्टर लगाए गए। लालू परिवार से टारगेट सेंटर को पीएम मोदी पर सेट किया गया। ऐसा लग रहा था कि बस कल-परसों की बात है, नीतीश कुमार दिल्ली के सेंट्रल हॉल में शपथ लेने ही वाले हैं। 48 घंटे तक देश का सियासी पारा चढ़ा रहा। इसके बाद नीतीश कुमार के ‘दिल्ली कूच प्लान’ को मीडिया के सामने रखा गया। पटना से दिल्ली तक पत्रकारों की फौज लगा दी गई। दिल्ली पहुंचते ही सबसे पहले उन्होंने कांग्रेस के वारिस राहुल गांधी के दरवाजे पर दस्तक दी। उससे पहले उन्होंने (नीतीश कुमार) साफ कर दिया कि वो 2024 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। शायद दिल्ली की हवा ने उन्हें इस बात का अहसास करा दिया। तीन दिनों तक दिल्ली में रहकर नीतीश कुमार ने मथ डाला। कभी इस दरवाजे पर चाय पकौड़े तो कभी उस दरवाजे पर कॉफी बिस्किट। फ्लैश पर फ्लैश चमकते रहे। फोटो खींचाते रहे। दिल्ली की गर्मी में पसीना पोंछते-पोंछते पत्रकार सवाल पर सवाल दाग रहे थे। इसके बाद नीतीश कुमार पटना लौट गए।
पॉलिटिशियन नीतीश कुमार भला चैन से कहां बैठनेवाले थे। वो तो राजनीति को खाते, पीते, पहनते और सोते हैं। लिहाजा उन्होंने अपने पुराने दोस्त पवन वर्मा को बुलावा भेजा। स्टेट गेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम कराया। रात में डिनर टेबल पर सियासी सेटिंग का खेल शुरू हुआ। दरअसल, बिहार में नीतीश की परेशानी बीजेपी कम, प्रशांत किशोर ज्यादा बने हुए हैं। प्रशांत किशोर और पवन वर्मा की दोस्ती काफी पुरानी है। सीधे-सीधे प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार कॉल करना नहीं चाहते थे। लिहाजा उन्होंने पवन वर्मा के जरिए मेसेज भेजवाया। पवन की बात को पीके टाल नहीं पाए। दो दिनों की मेहनत बाद वो तैयार हो गए। पवन वर्मा से दोस्ती की लाज उन्होंने (प्रशांत किशोर) ने रख ली। बुधवार को डिनर टेबल पर नीतीश कुमार के साथ प्रशांत और पवन वर्मा दोनों थे। नीतीश कुमार ने अपने पुराने दोस्तों से दिल की बात कही। मगर ये गुपचुप मुलकात मीडिया में लीक हो गई। कन्फर्मेशन के लिए पत्रकारों ने सीधे-सीधे नीतीश से ही पूछ लिया। मिलने की बात तो उन्होंने मानी लेकिन क्या बात हुई, इसके बारे में नहीं बताया। अंदजा लगाया कि नीतीश की पीके से बात नहीं बनी। अगले दिन प्रशांत किशोर ने दिनकर की कविता ट्वीट कर जता दिया कि वो जिस रास्ते पर चल रहे हैं, पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। वैसे राजनीति कब 360 डिग्री पर घूम जाए कहना मुश्किल है। हमेशा की तरह पत्रकार अपना माथा खुजा रहे हैं।