क्या आपराधिक मानहानि क्रिमिनल लॉ में होगा विग्रह?

0
159

आपराधिक मानहानि का क्रिमिनल लॉ से विग्रह हो सकता है! लॉ कमिशन ने अपनी सिफारिश में कहा है कि आपराधिक मानहानि का मामला क्रिमिनल लॉ में बने रहना चाहिए। इससे फर्जी और झूठे आरोपों और बयान देने वालों में डर बना रहेगा। साथ ही लॉ कमिशन ने अपनी एक अन्य सिफारिश में कहा है कि पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाने वालों को तभी जमानत मिले जब वह नुकसान की भरपाई के लिए उतनी रकम जमा कर दें। लॉ कमिशन ने 284 वीं और 285 वीं रिपोर्ट में ये सिफारिशें की हैं। लॉ कमिशन ने अपनी 284 वीं रिपोर्ट में कहा है कि सा्र्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले में आरोपी को तभी जमानत मिलनी चाहिए जब वह नुकसान के बराबर की राशि जम कर दे। जस्टिस रितु राज अवस्थी की अगुवाई वाले लॉ कमिशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाए जाने से सरकार के राजस्व का नुकसान होता है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने से सरकारी राजस्व को नुकसान और लोगों को इस कारण परेशानी होती है। इस मामले में लॉ कमिशन ने तमाम जजमेंट और मसले की गंभीरता को देखते हुए लॉ कमिशन ने प्रीवेंशन ऑफ डैमेज ऑफ पब्लिक प्रोपर्ट एक्ट 1984 में बदलाव की सिफारिश की है।

इसके लिए कहा गया है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले में जमानत के प्रावधान कड़े किए जा सकते हैं। इसके लिए प्रावधान किया जा सकता है कि नुकसान जितने का हुआ है उसके बराबर की राशि जमा करने पर ही जमानत हो। ऐसा माना जा रहा है कि ऐसे कड़े प्रावधान करने से लोग ऐसे अपराध करने से बचेंगे। लॉ कमिशन ने अपनी 285 वीं रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की है कि क्रिमिनल मानहानि का मामला क्रिमिनल लॉ में बने रहना चाहिए। लॉ कमिशन ने रिपोर्ट में कहा है कि विचार और अभिव्यक्ति का जो अधिकार है वह लोगों को संविधान के तहत मिला हुआ है वहीं दूसरी तरफ लोगों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार मिला हुआ है और अनुच्छेद-21 के तहत यह अधिकार लोगों को मिला हुआ है। समाज में शांति और सौहार्द बना रहे इसके लिए प्रावधान किए गए हैं। कोई भी अधिकार पूर्ण नहीं है। लोगों की गरिमा और मान प्रतिष्ठा को प्रोटेक्ट करने के लिए आराधिक मानहानि का अपराध कानून के किताब में है। यह जरूरी है कि लोगों की गरिमा और प्रतिष्ठा को प्रोटेक्ट किया जाए और कोई किसी और की प्रतिष्ठा का हनन न करे। इसे अपराध के तौर पर इसलिए रखा गया है ताकि फर्जी और झूठे बयान से किसी की प्रतिष्ठा का हनन न किया जा सके।

आईपीसी और नए भारतीय न्याय संहिता में अपराधिक मानहानि अपराध के तौर पर रखा गया है। यह ध्यान रहे कि नए भारतीय न्याय संहिता में आपराधिक मानहानि के मामले में दोषी करार शख्स को सोशल सर्विस करने जैसी सजा देने का भी प्रावधान किया गया है। पहले जुर्माना, जेल की सजा का प्रावधान था और अब सोशल सर्विस जैसी सजा भी जोड़ी गई है। यही नहीं आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की याचिका पर सुनवाई 29 जनवरी तक स्थगित कर दी। इसमें उन्होंने अपनी कथित टिप्पणी ‘केवल गुजराती ही ठग हो सकते हैं’, को लेकर अहमदाबाद की एक मजिस्ट्रेट अदालत में उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मानहानि की शिकायत को गुजरात के बाहर किसी अन्य स्थान पर, संभव हो तो दिल्ली, स्थानांतरित करने का अनुरोध किया है। न्यायमूर्ति ए एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने प्रतिवादी के वकील द्वारा समय दिए जाने का अनुरोध करने के बाद मामले पर सुनवाई स्थगित की।

पीठ ने कहा, ‘जब उन्होंने तेजस्वी ने बयान वापस ले लिया है तो अभियोजन को मुकदमा जारी क्यों रखना चाहिए? आप निर्देश लें वरना हम अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करेंगे।’ शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘प्रतिवादी के वकील ने 19 जनवरी को याचिकाककर्ता तेजस्वी यादव के दर्ज कराए बयान पर निर्देश लेने के लिए वक्त मांगा है। मामले पर अगली सुनवाई के लिए सोमवार की तारीख तय करें।’ उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय जनता दल राजद के नेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए पहले आपराधिक मानहानि की शिकायत में सुनवाई पर रोक लगा दी थी और याचिका दायर करने वाले गुजरात निवासी को नोटिस जारी किया था। कथित आपराधिक मानहानि के लिए यादव के खिलाफ भारतीय दंड संहिता आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। गुजरात की एक अदालत ने अगस्त में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 202 के तहत यादव के खिलाफ प्रारंभिक जांच की थी और एक स्थानीय व्यवसायी और कार्यकर्ता हरेश मेहता द्वारा दायर शिकायत पर उन्हें तलब करने के लिए पर्याप्त आधार पाया था। शिकायत के अनुसार, यादव ने मार्च 2023 में पटना में मीडिया से बात करते हुए कहा था, ‘वर्तमान स्थिति में केवल गुजराती ही ठग हो सकते हैं, और उनकी धोखाधड़ी को माफ कर दिया जाएगा।’ बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कथित तौर पर पूछा था, ‘अगर वे एलआईसी या बैंकों का पैसा लेकर भाग गए तो कौन जिम्मेदार होगा?’ मेहता ने दावा किया था कि यादव की टिप्पणी ने सभी गुजरातियों की मानहानि की।