Tuesday, April 23, 2024
HomeIndian Newsआखिर भारत जोड़ो यात्रा से क्या संदेश देना चाहते हैं राहुल गांधी?

आखिर भारत जोड़ो यात्रा से क्या संदेश देना चाहते हैं राहुल गांधी?

भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी ने एक संदेश दे दिया है! भारतीय जनता पार्टी 2014 से चुनाव दर चुनाव जीत रही है। भाजपा ने देश में धर्मनिरपेक्षता पर पूरा माहौल बदलकर रख दिया। अपनी ऐतिहासिक धर्मनिरपेक्षता से वोट घटने के डर से नरम हिंदुत्व अपनाने के लिए कांग्रेस पार्टी की मैंने अक्सर आलोचना की है। कांग्रेस को लगा कि बीजेपी ने मतदाताओं को यह समझाने में सफलता पा ली है कि धर्मनिरपेक्षता और कुछ नहीं, हिंदूविरोध की आड़ है। इसलिए राहुल गांधी कलाई पर मौली बांधने लगे। उन्होंने मंदिरों की परिक्रमा शुरू कर दी और खुद को शिवभक्त बता दिया। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने खुद को हिंदूवादी साबित करने के चक्कर में मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार पर चुप्पी साध ली। उन्हें लगता है कि बीजेपी को हिंदुत्व के नाम पर मिलने वाले मतों में सेंध लगाने का यही मंत्र है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के वक्त मैंने प्रियंका गांधी से पूछा था कि कांग्रेस अब धर्मनिरपेक्षता का नगाड़ा क्यों नहीं बजाती है? उन्होंने जवाब में कहा कि सेक्युलरिजम शब्द से ही कुछ वोट कट जाते हैं, इसलिए उन्होंने महिला अधिकारों जैसी अन्य तरकीबों से मंजिल हासिल करने की ठानी है। यह बिल्कुल हास्यास्पद तर्क था। चुनावी नजरिए से यह बिल्कुल असफल साबित हुआ। नरम हिंदुत्व कभी कठोर हिंदुत्व को हरा नहीं सकता। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस को साफ-सुथरी धर्मनिरपेक्षता की पटरी पर ला दिया है। राहुल ने हिंदू राष्ट्रवाद से प्रेरित सांप्रदायिक घृणा की बार-बार आलोचना की है। लाल किले पर उन्होंने कहा कि हर मुद्दे पर ‘हिंदू-मुसलमान, हिंदू मुसलमान’ चिल्लाने से बड़ी आर्थिक समस्याओं से ध्यान भटकता है। उन्होंने इन नफरती संदेशों को मात देने के लिए सद्भाव और सांप्रदायिक प्रेम का आह्वान किया। यह हिम्मत दिखाने से संभवतः तुरंत वोटों की बहार नहीं आ जाएगी, लेकिन कांग्रेस की गिरावट रोकने में मदद जरूर मिल सकती है। यह बुजुर्गों और भ्रम के आगोश में जाने से बच गए समर्थकों में जोश भरेगा, साथ ही युवाओं का दिल जीतेगा जब उन्हें लगेगा कि कांग्रेस कुछ राजनीतिक कीमत चुकाकर भी सिद्धातों के साथ खड़ी है।

कांग्रेस पार्टी को हाल ही में हिमाचल प्रदेश चुनाव में छोटी सी जीत मिली है। उसे बीजेपी के मुकाबले सिर्फ एक प्रतिशत ज्यादा वोट मिला है। यह एक प्रतिशत अधिक वोट संभवतः यात्रा से राहुल गांधी के बढ़े कद के कारण मिला है। चुनावी अभियान की शुरुआत में ओपिनियन पोल्स बीजेपी को आगे बता रहे थे लेकिन यात्रा आगे बढ़ी तो कांग्रेस को ताकत मिल गई। राहुल गांधी की ‘पप्पू’ की छवि ने कई और चीजों के लिए ठोस रास्ते खोले हैं। बीजेपी ने खुद माना कि यात्रा का असर हुआ है। कुछ दक्षिण पंथियों ने कहा कि यात्रा को शहरी नक्सलियों, लुटियंस के रईसों और देशविरोधी ताकतों का समर्थन मिल रहा है। इन आरोपों से राहुल गांधी का संकल्प मजबूत ही होना चाहिए ना कि कमजोर।

राहुल गांधी ने हिंदुत्व के जनक माने जाने वाले वीर सावरकर पर चौतरफा हमला बोलकर विवाद खड़ा कर दिया। सावरकर ने जेल में ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के आगे घुटने टेक दिए और ‘वीर’ के अतीत से आगे निकलकर आजादी के बदले ब्रिटिशों के प्रति निष्ठा का संकल्प जताया। इतिहासकार आरसी मजूमदार ने सावरकर के प्रार्थना पत्र के बारे में लिखा है, ‘भारत का हित चाहने वाला और मानवता के लिए प्यार से लबालब दिल वाला कोई भी व्यक्ति अब बेहिचक इस कांटेदार रास्ते पर कदम नहीं बढ़ाएगा जिसने 1906-07 में भारत की उत्तेजक और मायूस परिस्थितियों में हमारे कदम शांति और प्रगति की राह से भटका दिया था। इसलिए, अगर सरकार उपकार और दया भाव से मुझे रिहा करती है तो मैं संवैधानिक प्रगति का मुखर समर्थक और अंग्रेज सरकार के प्रति निष्ठावान बनूंगा जो प्रगति की पहली शर्त है।’ राहुल गांधी ने अपनी यात्रा के दौरान कहा कि सावरकर ने दया याचिका लिखी जबकि हजारों कांग्रेसी स्वतंत्रता की मांग को लेकर जेल गए। निश्चित रूप से वो कांग्रेसी वीर कहलाने लायक हैं, वो नहीं जिन्होंने दया की भीख मांगी। राहुल के महाराष्ट्र में गठबंधन सहयोगी उद्धव ठाकरे ने तुरंत इस बयान से खुद को दूर कर लिया। उद्धव ने कहा कि उनकी पार्टी में वीर सावरकर के प्रति अथाह सम्मान और श्रद्धा है।

कोई यात्रा जमीनी बदलाव की जगह ज्यादातर तमाशा ही होती है। राहुल गांधी को अपनी लंबी पदयात्रा से हुए लाभ को भुनाना होगा। सांप्रदायिक सद्भाव उनकी वापसी के एजेंडे का एक हिस्सा जरूर हो सकता है, लेकिन उन्हें मतदाताओं को और भी कारण बताने होंगे कि आखिर वो कांग्रेस को वोट क्यों करें। हालांकि, जब नफरत का कारोबार हो रहा है तब सेक्युलरिजम एक अच्छा प्रस्थान बिंदु है। हिंदू राष्ट्रवादी अब दावा करते हैं कि सेक्युलरिजम को बढ़ावा देने से हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचती है। कोई भी विद्वान आपको यही बताएंगे कि हिंदुत्व सहिष्णुता का नाम है ना कि घृणा का। लेकिन हजारों ट्रोल नफरती भाषणों को हिंदुत्व का उत्थान और घृणा की आलोचना को पीड़ादायक हिंदू विरोधी गतिविधि मानते हैं।

बिहार के आरजेडी लीडर अब्दुल बारी सिद्दिकी ने पिछले सप्ताह कहा कि मुसलमानों के लिए देश का माहौल इतना खराब है कि उन्होंने अपने बच्चों को विदेश में बसने की सलाद दे दी। बिहार बीजेपी ने हिंदू भावना को ठेस पहुंचाने के लिए सिद्दिकी को निशाना बनाया। सिद्दिकी की पार्टी आरजेडी ने उनका समर्थन किया, लेकिन गठबंधन दल जेडीयू ने न केवल खुद को किनारा कर लिया बल्कि उन्हें यह कहने को भी मना लिया कि अगर किसी की भावना आहत हुई है तो वो अपने बयान के लिए माफी मांगते हैं। यह एक आजाद और खुले समाज के लिए हानीकारक परिस्थिति है। निश्चित रूप से माफी उन्हें मांगनी चाहिए जिन्होंने सांप्रदायिक माहौल खराब किया, ना कि जो इसके पीड़ित हैं। राहुल गांधी को सेक्युलर पॉलिटिक्स के लिए और हिम्मत से आगे बढ़ना चाहिए और रक्षात्मक मुद्रा अपनाने की नीति त्यागनी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता एक सुंदर अवधारणा है। इसके गुणों को चीख-चीखकर बताएं।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments