Saturday, March 21, 2026
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क्या तेलंगाना में शुरू हो सकती है जातिगत जनगणना?

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यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या तेलंगाना में जातिगत जनगणना शुरू हो सकती है या नहीं! जाति जनगणना का हमेशा समर्थन करने वाली कांग्रेस सरकार ने आज इसको लेकर बड़ा कदम उठाया है। आज तेलंगाना सरकार ने जातिगत जनगणना शुरू कर दी है। जिसको लेकर अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर निशाना साधा है। पीएम मोदी और भाजपा पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा- मोदी जी, आज से तेलंगाना में जातिगत गिनती शुरू हो गई है. इससे मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल हम प्रदेश के हर वर्ग के विकास के लिए नीतियां बनाने में करेंगे। जल्द ही यह महाराष्ट्र में भी होगा, सबको पता है कि भाजपा देश में एक व्यापक जाति जनगणना नहीं करवाना चाहती है।

इसके साथ ही उन्होंने पीएम मोदी पर चैलेंज देते हुए कहा कि मैं मोदी जी से साफ कहना चाहता हूं- आप देश भर में जातिगत जनगणना को रोक नहीं सकते हैं। हम इसी संसद में जातिगत जनगणना को पास करके दिखाएंगे और आरक्षण पर से 50% की दीवार को तोड़ देंगे। जाति जनगणना पर कांग्रेस पार्टी ने शनिवार को कहा कि देशभर में जाति जनगणना कराना और SC, ST और OBC आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की 50% की सीमा हटाना उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। तेलंगाना में कांग्रेस सरकार शनिवार से जाति सर्वेक्षण शुरू कर रही है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने बताया कि अगले कुछ हफ्तों में 80,000 कर्मचारी घर-घर जाकर 33 जिलों के 1.17 करोड़ से ज्यादा घरों का सर्वेक्षण करेंगे। उन्होंने कहा कि 1931 के बाद यह पहली बार है जब तेलंगाना में सरकार जाति आधारित सर्वेक्षण करा रही है।

जयराम रमेश ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम है। यह तेलंगाना के लोगों की भावनाओं का सम्मान है और बाबा साहेब आंबेडकर के संविधान के आदर्शों को स्थापित करता है।उन्होंने आगे कहा कि जैसा कि राहुल गांधी ने इस हफ़्ते हैदराबाद में कहा था कि यह राष्ट्रीय जाति जनगणना का एक नमूना है जो ‘इंडिया’ की सरकार करवाएगी। बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जाति आधारित जनगणना की एक बार फिर वकालत की है। उन्होंने बुधवार को कहा कि देश में यह कवायद होकर रहेगी और इस प्रक्रिया से दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों और आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय का पता चलेगा। जाति आधारित जनगणना का वास्तविक अर्थ न्याय है और उनकी पार्टी 50 फीसदी आरक्षण सीमा की दीवार को भी तोड़ेगी। महाराष्ट्र में 20 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले नागपुर में संविधान सम्मान सम्मेलन में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने ये बातें कही। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया वो बेहद अहम है। इससे पहले उन्होंने तेलंगाना में भी जाति जनगणना पर आवाज बुलंद की।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक दिन पहले कहा कि वो तेलंगाना में जाति जनगणना कराने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि वो तेलंगाना को देश भर में जाति जनगणना के लिए एक मॉडल बनाएंगे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने भारत में जातिगत भेदभाव को अनोखा और दुनिया में सबसे बुरे में से एक बताया। वो देश में 50 प्रतिशत आरक्षण की बनावटी बाधा को ध्वस्त कर देंगे। भेदभाव की सीमा और प्रकृति का आकलन करने के लिए सबसे पहले जाति जनगणना की जानी चाहिए। इसलिए, मैं न केवल तेलंगाना में जाति जनगणना सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हूं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करूंगा कि तेलंगाना देश में जाति जनगणना के लिए एक मॉडल बने।

सवाल उठ रहे कि क्या कांग्रेस नेतृत्व को कास्ट सेंसस में भविष्य नजर आ रहा? जिस तरह से हरियाणा के चुनाव में पार्टी को शिकस्त मिली उसे देखते हुए कांग्रेस अब कोई गलती नहीं करना चाहती। ऐसा इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। पार्टी को उम्मीद है कि आरक्षण और जातीय जनगणना के मुद्दे से पार्टी को फायदा हो सकता है। यही वजह है कि राहुल गांधी ने नागपुर में संबोधन के दौरान संविधान, आरक्षण और कास्ट सेंसस का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब आंबेडकर की ओर से तैयार किया गया संविधान सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। उसी तरह जाति जनगणना विकास का प्रतिमान है। इससे स्पष्टता आएगी और नया प्रतिमान बनेगा।

राहुल गांधी यूं ही जातिगत जनगणना की पैरवी नहीं कर रहे। इस मुद्दे को लेकर वो सीधे तौर पर आरएसएस और बीजेपी को टारगेट करना चाहते हैं। यही वजह है कि नागपुर में संविधान सम्मान सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि बीजेपी और आरएसएस अभी जातीय जनगणना को लेकर चर्चा कर रहे हैं कि उन्हें क्या रुख अपनाना चाहिए। जाति जनगणना पर उन्हें क्या कहना चाहिए। कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आरएसएस-बीजेपी कुछ भी कर लें, जातीय जनगणना होकर रहेगी। इस पर जो भी चर्चा करनी है कर लें। भारत की जनता ने तय कर लिया है कि जाति जनगणना होकर रहेगी और 50 फीसदी की दीवार टूटेगी। यह आवाज धीरे-धीरे बढ़ रही है। हमारा काम है कि हम लोगों को समझाएं कि जाति जनगणना से ही संविधान की रक्षा होगी।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी महाराष्ट्र और झारखंड चुनावों में संविधान की रक्षा और जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं। खास बात है कि इस बार राहुल मनुस्मृति की आलोचना भी कर रहे। हरियाणा में दलित वोटरों की नाराजगी से जो झटका लगा उसी को देखते हुए शायद कांग्रेस ने नई रणनीति बनाई है। पार्टी इस बार किसी भी कीमत पर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के वोटों को खोना नहीं चाहती है। यही वजह है कि पार्टी झारखंड और महाराष्ट्र में ‘संविधान सम्मान सम्मेलन’ कर रही। झारखंड में हुए इसी सम्मेलन के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति को संविधान विरोधी पुस्तक बताया था। उन्होंने कहा कि संविधान और मनुस्मृति के बीच की लड़ाई वर्षों से चली आ रही है।

 

क्या लोक लुभावना वादे चुनाव में फायदा देते हैं?

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आज हम आपको बताएंगे कि लोक लुभावना वादे चुनाव में फायदा देते हैं या नहीं! महाराष्ट्र के साथ ही झारखंड में विधानसभा चुनाव की तारीख करीब आ चुकी है। इस बीच एक बार फिर से चुनावी रेवड़ी बनाम कल्याणकारी योजनाओं को लेकर बहस छिड़ गई है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की तरफ से महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा योजना की समीक्षा को लेकर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की नसीहत के बाद बीजेपी को कांग्रेस पर हमलावर होने का मौका मिल गया है। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार की तरफ से राज्य में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा योजना में संशोधन का संकेत दिया गया। इस पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सार्वजनिक रूप से शिवकुमार को फटकार लगाई। खरगे ने पार्टी की असहजता को उजागर करते हुए कहा कि पार्टी नेतृत्व ने अपनी राज्य इकाइयों से केवल वही वादे करने को कहा है जो वित्तीय रूप से संभव हों। खरगे की इस टिप्पणी को बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही बीजेपी नेतृत्व को कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिल गया। बीजेपी ने कहा कि कांग्रेस को अब एहसास हो गया है कि बिना सोचे-समझे घोषणाएं नहीं करनी चाहिए। मोदी ने कहा कि कांग्रेस अब लोगों के सामने बुरी तरह से बेनकाब हो चुकी है। लोगों को ‘कांग्रेस की तरफ से प्रायोजित झूठे वादों की संस्कृति के प्रति सतर्क रहना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि लोगों के लिए मुफ्त के चुनावी वादे सिर्फ दल विशेष तक ही सीमित हों। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों चुनाव में जनता के लिए चुनावी रेवड़ियों की घोषणा करते हैं। उंगली उठाने के अलावा, कोई भी पार्टी यह दावा नहीं कर सकती कि वह पूरी तरह से ईमानदार है। कांग्रेस पर हमला करने वाली बीजेपी के घोषणापत्र में गोगो दीदी योजना जैसी पहल का वादा किया गया है। इसके तहत महिलाओं को हर महीने 2,100 रुपये दिए जाएंगे। ‘युवा साथी भत्ता’ कार्यक्रम के तहत युवाओं को 2,000 रुपये का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। गैस सिलेंडर 500 रुपये में उपलब्ध कराने का भी वादा है। साथ ही त्योहारों के दौरान दो मुफ्त सिलेंडर दिए जाएंगे।

चुनाव से पहले राजनीतिक दल जीत के लिए मुफ्त की घोषणाओं के साथ ही कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक निर्भर नजर आते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ये योजनाएं चुनावी परीक्षा में फेल हो गईं। दोनों सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। वहीं, मध्यप्रदेश में बीजेपी ने इनके दम पर सत्ता बरकरार की। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दिशाहीन लोकलुभावन योजना अपने आप ही वोट में बदल जाती हैं। खासकर उस दल के लिए जो सत्ता में होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घोषणाओं और इस प्रकार की योजनाओं के प्रभाव के साथ ही इसकी पहुंच पर बहस होनी चाहिए।

यहां चुनाव आयोग के उस निर्देश को लेकर भी सवाल उठता है जिसमें आयोग ने राजनीतिक दलों से अपने घोषणापत्र के वादों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने के तरीके और साधन बताने को कहा गया था। इसमें यह भी बताने को कहा गया था कि घोषणापत्र में किए वादों का राज्य या केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? अक्टूबर 2022 में, चुनाव आयोग ने पार्टियों के लिए एक स्टैंडर्डराइज्ड डिस्क्लोजर प्रोफार्मा जारी किया था। इसमें वादा की गई योजना के कवरेज की सीमा और विस्तार, फिजिकल कवरेज की मात्रा और वित्तीय निहितार्थ और वादों को पूरा करने में होने वाले अतिरिक्त व्यय को पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने के तरीकों और साधनों का डिटेल घोषित करना था।

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने ही 2022 में मुफ्त चीजों पर बहस शुरू की थी। उस समय उन्होंने ‘रेवड़ी’ कल्चर का मजाक उड़ाया था। इसका आशय राजनीतिक दलों की तरफ से दी जाने वाली मुफ्त चीजों का संदर्भ था। इसके बाद बीजेपी और विपक्षी दलों के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया था। कांग्रेस ने कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में महिलाओं के लिए बेरोजगारी भत्ता और वित्तीय सहायता के बारे में इसी तरह के वादे किए थे। उस समय प्रधानमंत्री ने बेपरवाह वादे करने के लिए कांग्रेस की आलोचना की थी।

मोदी की तरफ से लोकलुभावन योजनाओं को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधने के बावजूद, बीजेपी इस महीने महाराष्ट्र में होने वाले चुनावों में एकनाथ शिंदे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के साथ चुनाव प्रचार कर रही है। इसमें एक लड़की बहिन योजना भी है। राजनीतिक विश्लेषकों के साथ ही कांग्रेस नेताओं का भी मानना है कि बीजेपी के हमलावर रुख के बीच कांग्रेस आलाकमान को इस मोर्चे पर बीजेपी और उसके सहयोगियों का मुकाबला करने के लिए कुछ वादे करने होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस के लिए चुनावी राज्यों में आगे की राह मुश्किल हो जाएगी।

 

क्या राजनीतिक दलों के लिए महंगी पड़ेगी मुफ्त की रेवड़ियां?

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यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राजनीतिक दलों के लिए मुफ्त की रेवड़ियां महंगी पड़ेगी या नहीं! बिजली फ्री, पानी फ्री, राशन फ्री, बस सेवा फ्री… अगर बस चले तो नेता चुनाव से पहले जनता के 7 खून भी माफ कर दें।सत्ता पर काबिज होने के जुनून के चलते राजनीतिक दलों ने भारत की राजनीति का फोकस मुफ्त की रेवड़ियों की तरफ मोड़ दिया है। फ्री में मिलने वाली सेवाएं कुछ समय तक तो जनता और नेताओं के लिए फायदे का सौदा होती हैं। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम काफी घातक साबित हो सकते हैं। फ्री योजनाओं के चक्कर में राज्य कर्जे में डूब सकता है। मूलभूत सुविधाओं को सुचारू रखने के लिए भी पर्याप्त फंड का इंतजाम करना सरकारों के लिए चुनौती बन सकता है। इसका ताजा उदाहरण कर्नाटक से सामने आया है। कांग्रेस की कर्नाटक सरकार इस वक्त आर्थिक तंगी से जूझ रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ही पार्टी नेताओं और सरकार को सख्त लहजे में खरा-खरा सुना डाला। खरगे ने साफ कहा कि उतनी ही गारंटी का वादा करें, जितना दे सकें। वरना सरकार दिवालियापन की तरफ चली जाएगी। कर्नाटक से ‘मुफ्त की रेवड़ी’ को लेकर जो उदाहरण सामने आया है, उससे सभी राजनीतिक दलों को सबक लेने की जरूरत है।

कर्नाटक में ‘शक्ति’ गारंटी की समीक्षा किए जाने संबंधी टिप्पणी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार की खिंचाई की है। दरअसल, शिवकुमार ने पिछले दिनों कहा था कि सरकार ‘शक्ति’ योजना पर फिर से विचार करेगी क्योंकि कुछ महिलाओं ने सरकारी बसों में यात्रा के लिए भुगतान करने की इच्छा व्यक्त की है। प्रदेश की कांग्रेस सरकार की इस गारंटी के तहत महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा प्रदान की जाती है। खरगे ने शिवकुमार के इस बयान पर तंज कसते हुए कहा था, ‘आपने कुछ गारंटी दी हैं। उन्हें देखने के बाद मैंने भी महाराष्ट्र में कहा था कि कर्नाटक में 5 गारंटी हैं। अब आपने (शिवकुमार) कहा कि आप एक गारंटी छोड़ देंगे।’ एक बार फिर देश के सियासी गलियारों में ‘मुफ्त की रेवड़ी’ चर्चा में है।

कर्नाटक में ‘शक्ति’ गारंटी की समीक्षा किए जाने संबंधी टिप्पणी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार की खिंचाई की है। दरअसल, शिवकुमार ने पिछले दिनों कहा था कि सरकार ‘शक्ति’ योजना पर फिर से विचार करेगी क्योंकि कुछ महिलाओं ने सरकारी बसों में यात्रा के लिए भुगतान करने की इच्छा व्यक्त की है। प्रदेश की कांग्रेस सरकार की इस गारंटी के तहत महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा प्रदान की जाती है। खरगे ने शिवकुमार के इस बयान पर तंज कसते हुए कहा था, ‘आपने कुछ गारंटी दी हैं। उन्हें देखने के बाद मैंने भी महाराष्ट्र में कहा था कि कर्नाटक में 5 गारंटी हैं। अब आपने (शिवकुमार) कहा कि आप एक गारंटी छोड़ देंगे।’ एक बार फिर देश के सियासी गलियारों में ‘मुफ्त की रेवड़ी’ चर्चा में है।

चुनावों में मुफ्त की सौगात का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जिसकी शुरुआत तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता ने की थी। उन्होंने मुफ्त साड़ी, प्रेशर कुकर जैसी चीजें देकर इस चलन की नींव रखी थी। बाद में, आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में मुफ्त बिजली और पानी का वादा करके 2015 का चुनाव जीता। केरल में भी वाम दलों ने मुफ्त राशन किट देकर जीत हासिल की।

केरल में 2021 के विधानसभा चुनावों में भी मुफ्तखोरी का असर दिखा। लोकसभा चुनावों में हार के दो साल बाद सत्ताधारी वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने सब्सिडी वाले चावल और खाद्य किट मुफ्त में देने का वादा करके लगातार दूसरी बार प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की। पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को भी प्रचंड बहुमत मिला था। आप ने सत्ता में आने पर पंजाब के लोगों को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली और 18 साल या उससे ज्यादा उम्र की हर महिला को 1,000 रुपये प्रति माह देने का वादा किया था।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दिल्ली में बिजली के बिल फ्री करने वाली स्कीम से आम आदमी पार्टी (AAP) को दिल्ली में जबदस्त सीटें मिली थीं। इसे देखते हुए अन्य राजनीतिक दलों ने भी फ्री की स्कीम को तवज्जो देना शुरू कर दिया। हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अपनी पदयात्रा में दिल्लीवालों को वादा किया है कि वह पानी के ‘बढ़े हुए’ बिल भी माफ कर देंगे। साथ ही उन्होंने दावा किया कि बीजेपी अगर दिल्ली में सत्ता में आती है, तो वह ‘आप’ सरकार की मुफ्त बिजली, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और महिलाओं के लिए बस यात्रा की योजनाओं को बंद कर देगी। दिल्ली में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि फ्री सेवाओं के मामले में बीजेपी भी पीछे नहीं है। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव से पहले 5 साल तक फ्री राशन वाली स्कीम को बढ़ा दिया था। दरअसल भारत सरकार ने कोरोना काल में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना शुरू की थी जिसके तहत हर गरीब जरूरतमंद इंसान को 5 किलोग्राम तक मुफ्त राशन देती है। सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को 1 जनवरी 2024 से अगले पांच सालों तक के लिए बढ़ा दिया गया है। हाल ही में बीजेपी हरियाणा में प्रचंड जीत मिली है। चुनाव से पहले बीजेपी ने हरियाणा में जो संकल्प पत्र जारी किया था, उसमें कहा था कि वह हर महीने महिलाओं को लाडो लक्ष्मी योजना के तहत 2100 रुपये देगी। ताज्जुब की बात यह है कि बीजेपी पहले मुफ्त की योजनाओं के खिलाफ थी, लेकिन धीरे-धीरे वह भी इस राह पर चल पड़ी।

 

क्या फ्री में चीज बांटना आम आदमी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित होगा?

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यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या फ्री में चीज बांटना आम आदमी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित होगा या नहीं! देश में एक तरफ जहां महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ कुछ राज्यों में होने वाले उपचुनाव को लेकर भी सभी राजनीतिक दल ऐक्टिव हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) पंजाब की 4 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर ग्राउंड पर है। आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने खुद चुनावी प्रचार की कमान को मजबूती संभाल रखा है। यहां भी केजरीवाल फ्री बिजली के मुद्दे का जिक्र जनता के बीच कर रहे हैं। अगले साल दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गए है, क्या फ्री बिजली और पानी वाला दांव एक बार फिर केजरीवाल के लिए चमत्कार साबित होगा। पंजाब की चार विधानसभा सीटों – गिद्दरबाहा, डेरा बाबा नानक, चब्बेवाल और बरनाला – पर उपचुनाव 20 नवंबर को होंगे और मतों की गिनती 23 नवंबर को होगी। केजरीवाल ने शनिवार को पंजाब के चब्बेवाल में आगामी उपचुनाव को लेकर चुनावी रैली की। रैली में केजरीवाल ने कहा, ‘हमने आपके लिए बहुत काम किया है।’ केजरीवाल ने कहा कि 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले लोग बिजली के बिलों से घिरे हुए थे। उन्होंने जनता से सवाल करते हुए कहा, ‘ हमने आपसे वादा किया था कि हम बिजली के लंबित बिल माफ करेंगे और बिजली मुफ्त में देंगे। बताइए, हमने वो वादा पूरा किया या नहीं? ’

अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली का सियासी पारा भी चढ़ा हुआ है। आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली की हर गली और कॉलोनी के लोगों से सीधी मुलाकात कर रहे हैं। केजरीवाल पदयात्रा के जरिए दिल्लीवालों से लगातार संपर्क में जुटे हैं। हाल ही में दिल्ली में पदयात्रा के दौरान केजरीवाल ने जनता से बीजेपी को वोट नहीं देने की अपील की। पॉलिसी रोकने के लिए विरोधियों ने बिजली विभाग के अफसरों को सस्पेंड करने और जेल में डालने की चेतावनी तक दे डाली थी। लेकिन, फिर भी सरकार ने सब्सिडी पॉलिसी को आगे जारी रखने का फैसला किया है।उन्होंने यहां भी लोगों को फ्री बिजली और अन्य फ्री सेवाओं की याद दिलाई। उन्होंने दावा किया कि ‘बीजेपी अगर दिल्ली में सत्ता में आती है, तो वह ‘आप’ सरकार की मुफ्त बिजली, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और महिलाओं के लिए बस यात्रा की योजनाओं को बंद कर देगी।’

उन्होंने यह भी वादा किया था कि वह दिल्ली में पानी के बढ़े हुए बिल माफ कर देंगे। केजरीवाल ने लोगों से AAP को वोट देने और उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाने में मदद करने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था, ‘फरवरी (2025) में चुनाव होने हैं। मैं मार्च में इन (पानी के बढ़े हुए) बिल को माफ करवा दूंगा।

दिल्ली सरकार ने इस साल मार्च महीने में दावा किया था कि दिल्ली में 22 लाख परिवारों को 200 यूनिट फ्री बिजली का लाभ मिल रहा है। इन परिवारों का बिल जीरो आता है। लाखों लोगों को इस पॉलिसी से फायदा मिल रह है। फिर भी विरोधी पॉलिसी को रोकने की कोशिश करते हैं। AAP ने कहा था कि पिछले साल भी सब्सिडी रोकने की काफी कोशिशें की गईं थीं। इस साल भी पॉलिसी को रोकने की कोशिशें हुईं। लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार ने लोगों से जो वादा किया है, उसे निभाया है। पॉलिसी रोकने के लिए विरोधियों ने बिजली विभाग के अफसरों को सस्पेंड करने और जेल में डालने की चेतावनी तक दे डाली थी। लेकिन, फिर भी सरकार ने सब्सिडी पॉलिसी को आगे जारी रखने का फैसला किया है।

2019 में भाई दूज के अवसर पर दिल्ली सरकार ने बसों में महिलाओं के मुफ्त सफर की जो योजना शुरू की थी, उसे जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला है। योजना की शुरुआत से लेकर अब तक 150 करोड़ से ज्यादा महिलाएं डीटीसी और क्लस्टर बसों में मुफ्त यात्रा कर चुकी हैं। बता दें कि अगले साल दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गए है, क्या फ्री बिजली और पानी वाला दांव एक बार फिर केजरीवाल के लिए चमत्कार साबित होगा। पंजाब की चार विधानसभा सीटों – गिद्दरबाहा, डेरा बाबा नानक, चब्बेवाल और बरनाला – पर उपचुनाव 20 नवंबर को होंगे और मतों की गिनती 23 नवंबर को होगी। इस योजना की वजह से महिलाओं के बीच सार्वजनिक परिवहन का उपयोग भी बढ़ा है और बसों में सफर करने वाली महिलाओं की तादाद में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

 

महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव से पहले क्या है कांग्रेस का नया प्लान?

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आज हम आपको महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा बनाया गया नया प्लान के बारे में जानकारी देने वाले हैं ! चुनावी गारंटी’ पूरा ना करने के मुद्दे पर अपनी फजीहत करा बैठी कांग्रेस अब इसी मुद्दे को अपनी ताकत बना रही है। महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के दिग्गज नेता जनता को विश्वास दिलाने में जुट गए हैं कि कांग्रेस शासित प्रदेशों में चुनावी वादों को प्राथमिकता से पूरा किया जा रहा है। साथ ही पार्टी बीजेपी के उस आरोप का भी खंडन कर रही है कि जिसमें कहा गया था कि उनके राज्यों में चुनावी वादों को पूरा नहीं किया जा रहा है। कांग्रेस शासित तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री ने शनिवार को बीजेपी के उस आरोप का कड़ा विरोध किया, जिसमें कहा गया था कि उनके राज्यों में चुनावी वादों को पूरा नहीं किया जा रहा है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया।

शिवकुमार ने कहा, ‘महायुति के नेताओं को मेरे राज्य का दौरा करना चाहिए और देखना चाहिए कि कांग्रेस की कल्याणकारी गारंटी (योजनाओं) से लोगों को किस तरह लाभ मिल रहा है। कांग्रेस जब भी सत्ता में आती है तो समाज के हर वर्ग के लिए कोई न कोई योजना लागू करती है।’ शिवकुमार ने कहा, ‘(पूर्व प्रधानमंत्री) जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के दिनों से चली आ रही किसी भी योजना को वापस नहीं लिया गया है। हम वोट नहीं बल्कि राज्य का विकास चाहते हैं।’ तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेड्डी ने प्रधानमंत्री पर उनके राज्य से संबंधित योजना के बारे में झूठ बोलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘हम गारंटियों को व्यवस्थित ढंग से लागू कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने सत्ता में आने के बाद कृषि ऋण माफ कर दिया। रेड्डी ने कहा, ‘22,22,067 किसानों का कृषि ऋण माफ किया गया, जिससे सरकार पर 17,869 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा।’

रेड्डी ने कहा कि 10 महीनों में उनकी सरकार ने युवाओं को 50,000 सरकारी नौकरियां दी हैं, जबकि 200 यूनिट मुफ्त बिजली योजना से 50 लाख परिवारों को लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि बीजेपी के पास महाराष्ट्र में गर्व करने लायक कोई सफलता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी-बड़ी निवेश परियोजनाएं महाराष्ट्र से गुजरात स्थानांतरित की जा रही हैं।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि उनकी सरकार के पुरानी पेंशन योजना लागू करने के फैसले से लोगों को काफी लाभ हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले जो व्यक्ति नई पेंशन योजना के तहत 5,000 रुपये प्रतिमाह पा रहा था, उसे पुरानी पेंशन योजना के तहत 50,000 रुपये मिल रहे हैं। उन्होंने जून 2022 में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार के गिरने का स्पष्ट जिक्र करते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र के लोगों को यह तय करना होगा कि पैसे के बल पर सरकार को गिराना लोकतंत्र है या नहीं।’ सुक्खू ने कहा कि उनकी सरकार ने भाजपा के ‘ऑपरेशन कमल’ का सफलतापूर्वक मुकाबला किया।

इस हफ्ते की शुरुआत में महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने चुनावी वादों की घोषणा की, जिसमें कृषि ऋण माफी, मुख्यमंत्री लाडकी बहिन योजना के तहत 1,500 रुपये मासिक राशि को दोगुना करके 3,000 रुपये करना शामिल था। जब यह पूछा गया कि महा विकास आघाडी (एमवीए) कैसे राजकीय अनुशासन सुनिश्चित करेगी, क्योंकि उसने दावा किया था कि इन रियायतों से राजकोष पर बोझ बढ़ेगा, तो रेड्डी ने कहा कि उनकी पार्टी को अच्छी तरह से पता है कि जनता के पैसे का उनके कल्याण के लिए कैसे उपयोग किया जाए। उन्होंने कहा, ‘हमने 70 वर्षों तक सरकार चलाई है। हमें इसका व्यापक अनुभव है। हम जानते हैं कि अतिरिक्त व्यय को कहां रोकना है।’

कांग्रेस की कर्नाटक सरकार इस वक्त आर्थिक तंगी से जूझ रही है। हाल ही में इस मुद्दे पर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ही पार्टी नेताओं और सरकार को सख्त लहजे में खरा-खरा सुना डाला था। खरगे ने साफ कहा कि उतनी ही गारंटी का वादा करें, जितना दे सकें। वरना सरकार दिवालियापन की तरफ चली जाएगी। इसके बाद से ही कांग्रेस पर बीजेपी ने गारंटी पूरा ना करने को लेकर हमले शुरू कर दिए थे।

कर्नाटक में ‘शक्ति’ गारंटी की समीक्षा किए जाने संबंधी टिप्पणी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार की खिंचाई की थी। दरअसल, शिवकुमार ने हाल ही में कहा था कि सरकार ‘शक्ति’ योजना पर फिर से विचार करेगी क्योंकि कुछ महिलाओं ने सरकारी बसों में यात्रा के लिए भुगतान करने की इच्छा व्यक्त की है। प्रदेश की कांग्रेस सरकार की इस गारंटी के तहत महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा प्रदान की जाती है। खरगे ने शिवकुमार के इस बयान पर तंज कसते हुए कहा था, ‘आपने कुछ गारंटी दी हैं। उन्हें देखने के बाद मैंने भी महाराष्ट्र में कहा था कि कर्नाटक में 5 गारंटी हैं। अब आपने (शिवकुमार) कहा कि आप एक गारंटी छोड़ देंगे।’

 

आखिर कौन से है पूर्व जस्टिस ऑफ इंडिया के महत्वपूर्ण फैसला ?

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आज हम आपको पूर्व जस्टिस ऑफ इंडिया के महत्वपूर्ण फैसलों के बारे में जानकारी देने वाले हैं!सुप्रीम कोर्ट जज के तौर पर कुल 8 साल से ज्यादा समय तक जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने काम किया और इस दौरान आखिरी के दो साल वह चीफ जस्टिस रहे। 9 नवंबर 2022 को वह भारत के चीफ जस्टिस बने थे और दो साल बाद आज रिटायर हो रहे हैं। चीफ जस्टिस के तौर पर उन्होंने कई अहम फैसले दिए, साथ ही अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग से लेकर न्याय की देवी की आंखों से पट्टी हटाने जैसे कई प्रशासनिक फैसले भी लिए जो बेहद अहम साबित होंगे। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की विरासत विशेष रूप से उन तकनीकी सुधारों के लिए भी याद की जाएगी। इसके अलावा कुल आठ साल के सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के कार्यकाल के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कई अहम मामलों में फैसले दिए, जिनमें राम मंदिर, अनुच्छेद-370, एडल्टरी को अपराध से बाहर करने, समलैंगिक संबंध को सहमति के मामले में अपराध से बाहर करने आदि फैसले शामिल हैं। CJI डीवाई चंद्रचूड़ के पहल पर यह कदम उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट के जजों की लाइब्रेरी में दशकों से न्याय की देवी का स्टैच्यू था जिनके बाएं हाथ में तलवार था और आंखों पर पट्टी थी, लेकिन अब नया स्टैच्यू लगाया गया है, जिसमें न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी नहीं है और दाएं हाथ में तराजू है और बाएं हाथ में संविधान है। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट एमएल लाहौटी बताते हैं कि इस नए बदलाव के पीछे यह संदेश दिया जा रहा है कि कानून समान तौर पर सबकुछ देख सकता है और हाथ में तलवार की जगह संविधान रखे जाने के पीछे यह मकसद है कि देश में न्याय संविधान के मुताबिक होता है।

CJI चंद्रचूड़ ने अदालती फैसलों में जेंडर स्टिरियोटाइप शब्दों के इस्तेमाल से निपटने के लिए हैंडबुक जारी किया। 16 अगस्त 2023 को चीफ जस्टिस ने कहा था कि जेंडर स्टिरियोटाइप (लैंगिक घिसेपीटे यानी रूढिवादी) शब्दों का उपयोग अदालती कार्रवाई में होता रहा है, जिसे पहचान कर उसे हटाने और उसके वैकल्पिक शब्दों के इस्तेमाल के लिए जागरुकता पैदा करने के लिए हैंडबुक जारी किया गया है। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा जारी हैंडबुक में कहा गया कि एक गलत रूढीबादी सोच है कि महिलाएं पुरुष के अधीन हैं। भारत का संविधान सभी जेंडर के लोगों को समान अधिकार की गारंटी देता है तो फिर महिलाओं को पुरुष के अधीन रहने की जरूरत क्यों? महिलाएं ही घर का सारा काम करें यह रूढीवादी सोच क्यों?

अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग की इजाजत दी थी। हाइब्रिड मोड में अदालत की सुनवाई चले इसके लिए उन्होंने रास्ता साफ कर दिया था। चंद्रचूड़ की विरासत विशेष रूप से उन तकनीकी सुधारों के लिए याद की जाएगी, जिन्हें उन्होंने बढ़ावा दिया, जिसमें वर्चुअल सुनवाई को संस्थागत रूप देना, लाइव स्ट्रीमिंग, और न्यायपालिका को आधुनिक बनाने के लिए महत्वाकांक्षी ई-कोर्ट परियोजना शामिल है। उनके कार्यकाल की प्रमुख पहलों में ईएससीआर परियोजना (सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टों का डिजिटलीकरण), डिजीएससीआर (सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का मुफ्त ऑनलाइन खोज डेटाबेस), संविधान पीठ की सुनवाई के और निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करने के लिए एआई का उपयोग, न्यूट्रल साइटेशन सिस्टम का कार्यान्वयन, और सुप्रीम कोर्ट के आँकड़ों को राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) में एकीकृत करना शामिल है।

भारत के 50वें चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ का दो साल का कार्यकाल रहा। जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ का कार्यकाल सबसे लंबा रहा था और वह 7 साल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे थे। जस्टिस चंद्रचूड़ का जन्म 11 नवंबर 1959 को हुआ था। उनके पिता वाईवी चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस थे वह सबसे ज्यादा समय तक देश के चीफ जस्टिस रहे थे। उनकी मां प्रभा क्लासिकल म्युजिशियन थीं। डीवाई चंद्रचूड़ सेंट कोलंबस से स्कूल पास किया और फिर दिल्ली के सेंट स्टीफन्स से उन्होंने इकोनॉमिक्स और मैथ में ग्रैजुएशन किया। फिर उन्होंने सीएलसी डीयू से लॉ किया।

इसके बाद हॉर्वर्ड से 1983 में एलएलएम किया। इसके बाद वकालत की और 1998 में सीनियर एडवोकेट बने। इसके बाद वह अडिशनल सॉलिसिटर जनरल बनाए गए। 29 मार्च 2000 को बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस बने और 30 अक्टूबर 2013 तक जस्टिस बने रहे इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट का उन्हें 31 अक्टूबर 2013 को चीफ जस्टिस बनाया गया और इस पद पर वह 12 मई 2016 तक रहे इसके बाद उन्हें 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस बनाया गया। चंद्रचूड़ 9 नवंबर 2022 को भारत के चीफ जस्टिस बने और 10 नवंबर 2024 को रिटायर हो रहे हैं।

भारत के 51 वें चीफ जस्टिस के तौर पर जस्टिस संजीव खन्ना 11 नवंबर को शपथ लेंगे। वर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने 17 अक्टूबर को शीर्ष अदालत के सबसे सीनियर जस्टिस संजीव खन्ना का नाम अगले चीफ जस्टिस के तौर पर नियुक्त करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी और 24 अक्टूबर राष्ट्रपति ने उनकी नियुक्ति का आदेश जारी किया।जस्टिस खन्ना भारत के 51वें चीफ जस्टिस बनेंगे। जस्टिस खन्ना का चीफ जस्टिस के तौर पर छह महीने से थोड़ा ज्यादा का कार्यकाल होगा वह 13 मई 2025 को रिटायर हो जाएंगे। जस्टिस खन्ना 18 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के तौर पर नियुक्त हुए थे। 2005 में जस्टिस खन्ना को दिल्ली हाई कोर्ट का जस्टिस बनाया गया था। उनका जन्म 14 मई 1960 को हुआ था। उनकी पढ़ाई लिखाई दिल्ली में हुई। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सीएलसी (कैंपस लॉ सेंटर) से लॉ की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने प्रैक्टिस शुरू की थी।

 

मीनाक्षी शेषाद्रि ने याद किए पुराने दिन:बोलीं- स्टूडियो में सभी के लिए एक टॉयलेट होते थे, फीमेल एक्ट्रेस को होती थीं परेशानी

मीनाक्षी शेषाद्रि 80 और 90 के दशक की जानी मानी एक्ट्रेस रही हैं। उन्होंने दामिनी, हीरो, मेरी जंग, घातक जैसी फिल्मों में काम किया है। हाल ही में एक पॉडकास्ट में एक्ट्रेस ने पुराने दिनों को याद करते हुए एक किस्सा शेयर किया। उन्होंने कहा कि पहले के समय में स्टूडियो के हालात बहुत खराब हुआ करते थे, हालात इतने बुरे होते थे कि शूट करना भी बेहद मुश्किल होता था। एक्ट्रेस ने कहा कि सेट पर सबसे बड़ी समस्या टॉयलेट की हुआ करती थी, क्योंकि एक ही टॉयलेट होता था और उसे 100 से ज्यादा लोग यूज करते थे। मीनाक्षी ने बताया कि उस समय सिर्फ पूनम ढिल्लन पहली ऐसी एक्ट्रेस थीं, जिनके पास अपनी वैनिटी वैन थी। 100 लोग एक टॉयलेट यूज करते थे – मीनाक्षी
मीनाक्षी ने कबीर वाणी के यूट्यूब चैनल पर बातचीत के दौरान बताया कि सेट पर लगभग 100 से ज्यादा लोग एक ही टॉयलेट यूज करते थे। पुरुषों और महिलाओं के लिए भी अलग-अलग शौचालय नहीं थे। एक्ट्रेस ने बताया कि सेट पर टॉयलेट न होने के कारण काफी परेशानी होती थी। उन्होंने कहा कि पहले के समय में साफ-सफाई पर भी ध्यान नहीं दिया जाता था, शूट के दौरान हम फैंसी कॉस्ट्यूम पहनते थे तो कॉस्ट्यूम गंदे न हो इसका भी ध्यान रखना होता था। डायरिया होते हुए भी शूट किया – मीनाक्षी बातचीत के दौरान जब मीनाक्षी से उनके सबसे बुरे दिनों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने उस टाइम को याद किया जब उन्हें डायरिया हो गया था। उन्होंने बताया कि डायरिया होने के बावजूद भी वह बारिश में एक रोमांटिक गाने की शूटिंग कर रही थीं। उन्होंने कहा कि बतौर एक्टर सभी हालातों में काम करना पड़ता है। क्योंकि एक्टिंग बहुत मेहनत का प्रोफेशन है। आउटडोर शूट में काफी परेशानियां होती थीं – जया बच्चन
सिर्फ मीनाक्षी ही नहीं बल्कि इससे पहले, जया बच्चन ने भी पुराने दिनों को याद करते हुए बताया था कि पहले के समय में फीमेल एक्ट्रेस को आउटडोर शूट में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। यूट्यूब चैनल व्हाट द हेल नव्या पर बातचीत में, जया बच्चन ने बताया कि अच्छी फैसिलिटी न होने के कारण फीमेल एक्ट्रेस को आउटडोर शूटिंग के दौरान झाड़ियों के पीछे सैनिटरी पैड बदलना पड़ता था। उन्होंने कहा, जब हम आउटडोर शूट करते थे, तो हमारे पास वैन नहीं होती थी। हमें झाड़ियों के पीछे कपड़े बदलने पड़ते थे। जया बच्चन ने कहा कि ये अजीब तो था ही बल्कि बहुत शर्मनाक भी था। हम 3-4 सैनिटरी पैड यूज करते थे और पैड को फेंकने के लिए प्लास्टिक की थैलियां ले जाते थे और उन्हें एक टोकरी में रख देते थे।

पिता कमल हासन के फेम से बचना चाहती थीं श्रुति:एक्ट्रेस बोलीं- कई बार अपनी पहचान छिपाई, बाद में समझी उनके बिना मैं कुछ नहीं

श्रुति हासन अक्सर अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में बनी रहती हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में श्रुति हासन ने बताया कि फिल्मी परिवार में जन्म लेना अक्सर मुश्किल होता है, खासकर तब जब आपके पिता बड़े स्टार हों। एक्ट्रेस की मानें तो उन्होंने कई बार अपनी पहचान छिपाने की कोशिश भी की। हालांकि, बाद में उन्हें यह समझ में आ गया कि पिता कमल हासन के बिना वह खुद को नहीं सोच सकतीं। मदन गौरी से बातचीत में श्रुति हासन ने कहा, ‘लोग हमेशा मुझसे मेरे पिता के बारे में सवाल करते थे। ऐसा एक-दो बार नहीं, बल्कि कई बार होता था। मुझे लगता था कि मैं श्रुति हूं, मुझे अपनी पहचान चाहिए। लोग मुझे देखकर कहते थे यह तो कमल हासन की बेटी है। अगर कोई मुझसे पूछता, तो मैं कहती, नहीं, मेरे पिता डॉ. रामचंद्रन हैं, जो हमारे डेंटिस्ट का नाम था। मेरा नाम पूजा रामचंद्रन है। यह नाम मैंने खुद चुना था।’ श्रुति हासन ने कहा, ‘यह सिर्फ इस कारण नहीं था कि मेरे पिता एक एक्टर या फिर फेमस इंसान हैं, बल्कि बचपन से ही मुझे यह महसूस होता था कि वह बाकी सभी से अलग हैं। मुझे और मेरी बहन को बहुत जिद्दी लोगों ने पाला था, और यह हमारी आदत बन गई। जब मेरे माता-पिता अलग हुए, तो मैं मुंबई चली गई। यहां श्रुति बनकर रहना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। जब हर जगह पापा के पोस्टर लगे हों, तो उनके नाम से अलग होना बहुत मुश्किल था। आज मुझे लगता है कि कमल हासन के बिना श्रुति का कोई अस्तित्व नहीं है।’ श्रुति ने 1999 में अपना करियर शुरू किया था। वह साउथ इंडियन सिनेमा की लीडिंग अभिनेत्रियों में से एक मानी जाती हैं। श्रुति ने ‘डी-डे’, ‘रमैय्या वस्तावैया’, ‘गब्बर इज बैक’, ‘वेलकम बैक’, ‘रॉकी हैंडसम’ जैसी फिल्मों में काम किया है। वह शॉर्ट फिल्म ‘देवी’ में भी नजर आई थीं।

‘मैं नीलम के ऊपर गिरा, तो वह चिढ़ गईं’:महेश ठाकुर बोले- चलती बस में गाना शूट हो रहा था, सलमान ने एक्ट्रेस को खूब

हम साथ साथ हैं फिल्म साल 1999 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म के हर किरदार और उनकी जोड़ी को खूब पसंद किया गया था। महेश ठाकुर, जिन्होंने फिल्म में महेशा बाबू का रोल निभाया था। उन्होंने नीलम कोठारी से जुड़ा एक किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि फिल्म की शूटिंग के दौरान एक हादसा हो गया था, जिससे नीमल उनसे चीड़ गई थीं। लेकिन सलमान खान लगातार नीलम को चिड़ाते रहे। महेश ठाकुर ने रेडियो नशा से बातचीत में बताया, ‘हम ‘ABCD’ गाने की शूटिंग कर रहे थे। गाने के दौरान मुझे डांस स्टेप्स में थोड़ी दिक्कत हो रही थी। हमें शरीर हिलाने थे और बस भी सड़क के हिसाब से हिल रही थी, तो मैं अपना स्टेप मिस कर गया और नीलम जी पर गिर गया। इस कारण वह मुझसे थोड़ी नाराज हो गईं और बोलीं ‘क्या कर रहे हो?’ इसके बाद सलमान, सैफ और तब्बू ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया।’ महेश ने कहा, ‘इसके बाद सेट पर लगातार मजाक चलता रहा, जिससे सबका मूड भी काफी हल्का और अच्छा हो गया था। नीलम जी ने भी इस बात को फिर नजर अंदाज कर दिया। फिर हम सभी अच्छे दोस्त बन गए। हम सभी के बीच काफी अच्छा तालमेल था।’ डांस रियलिटी शो इंडिया बेस्ट डांसर-3 में करिश्मा कपूर ने भी हम साथ-साथ हैं फिल्म की यादे शेयर की थीं। एक्ट्रेस ने बताया था कि कैसे वह और तब्बू अक्सर सोनाली बेंद्रे को अपनी किताब छोड़कर बातचीत में शामिल होने के लिए मनातीं थीं, क्योंकि सोनाली शूटिंग के दौरान अक्सर चुपचाप अपनी किताब पढ़ती रहती थीं। करिश्मा कपूर ने कहा, ‘हम सभी फिल्म हम साथ-साथ हैं के दिनों को बहुत याद करते हैं। इस फिल्म से जुड़ी बहुत सारी अच्छी यादें हैं। सोनाली बहुत शांत थीं, और मैं सेट पर ज्यादा बात करने वाली थी। सोनाली अपनी किताब में खोई रहती थीं, जबकि तब्बू और मैं अक्सर सोचते थे, ‘वो क्या पढ़ रही हैं? वो हमसे बात क्यों नहीं करतीं? तब्बू और मैं फिल्मों और गाने की शूटिंग के बारे में बातें करते थे, जबकि सोनाली चुपचाप अपनी किताब पढ़ती रहती थीं। हम दोनों उन्हें लंच के लिए बुलाने जाते, तो वो कहती थीं मैं वेजिटेरियन हूं, इसलिए सिर्फ सलाद खाती हूं,’ और मैं कहती थीं ठीक है, पर आ जाओ सलाद लेकर!’

प्रोड्यूसर होते हैं फिल्म के असल हीरो:शाहरुख खान ने डिस्ट्रीब्यूटर से नहीं लिए 25 लाख, साउथ में प्रोड्यूसर एक्टर को बैन कर देते हैं

फिल्म मेकिंग के हर डिपार्टमेंट में प्रोड्यूसर की भागीदारी होती है। प्रोड्यूसर के लिए सबसे मुश्किल काम लोगों को हैंडल करना और फंड इकट्ठा करना होता है। किस तरह से कहानी का चयन करके प्रोड्यूसर फिल्म का निर्माण करता है। फिल्म की शूटिंग से रिलीज तक किस तरह की चुनौतियां आती हैं। इस हफ्ते के रील टु रियल के इस एपिसोड में जानेंगे। फिल्म मेकिंग के पूरी प्रोसेस को समझने के लिए हमने फिल्ममेकर विवेक शर्मा और सुनील दर्शन से बात की। फिल्म के मुखिया होते हैं प्रोड्यूसर किसी भी फिल्म की पूरी जिम्मेदारी प्रोड्यूसर के ऊपर ही होती है। प्रोड्यूसर का काम सिर्फ फंडिंग तक ही नहीं होता है। बल्कि फिल्म मेकिंग के हर डिपार्टमेंट में प्रोड्यूसर की भागीदारी होती है। फिल्म के लिए एक्टर को कास्ट करने की जिम्मेदारी डायरेक्टर और प्रोड्यूसर दोनों पर फिल्म के लिए एक्टर की कास्टिंग डायरेक्टर और प्रोड्यूसर दोनों करते हैं। हालांकि आमतौर पर एक्टर और प्रोड्यूसर के बीच कॉन्ट्रैक्ट होता है। कॉन्ट्रैक्ट में यह मेंशन होता है कि डबिंग से पहले उनकी लगभग पेमेंट कर दीजाएगी। लेकिन 20 परसेंट रोक दी जाती है, ताकि वे प्रमोशनल इवेंट में जरूर शामिल हों। बाकी क्रू वगरैह का भी पेमेंट प्रोड्यूसर ही मैनेज करते हैं। फिल्म की अधिक कमाई का हिस्सा प्रोड्यूसर को मिलता है जब फिल्में एग्रीमेंट में तय कीमत से ज्यादा की कमाई कर लेती हैं, तो उस कमाई को ओवर फ्लो कहते हैं। जैसे कि फिल्म RRR ने रिलीज के पहले ही करीब 500 करोड़ की कमाई की थी और फिल्म का कुल कलेक्शन करीब 1100 करोड़ का था। इस ओवर फ्लो की कमाई का कुछ हिस्सा डिस्ट्रीब्यूटर के अलावा फिल्म प्रोड्यूसर को भी जाता है। कितने प्रतिशत की हिस्सेदारी प्रोड्यूसर की होगी, ये एग्रीमेंट में पहले से ही लिखा होता है। फिल्मों की कमाई में प्रोड्यूसर की हिस्सेदारी कैसे होती है? प्रोड्यूसर जब डिस्ट्रीब्यूटर को फिल्म बेचता है तो उसका 50% का मालिकाना हक होता है। अगर इन्वेस्टर ने फिल्म में 20 करोड़ लगाए हैं तो पहले उनको 20 करोड़ वापस करेंगे। उसके बाद नेट प्रॉफिट में से 50% अपने इन्वेस्टर को देता है। फिल्मों के अलग-अलग राइट्स से भी प्रोड्यूसर कमाते हैं पैसें आजकल फिल्मों के बहुत सारे राइट्स होते हैं। फिल्में रीजनल भाषाओं में डब की जाती हैं। फिल्मों के रीमेक राइट्स, कॉपी राइट्स, डिजिटल राइट्स भी होते हैं। आम तौर पर प्रोड्यूसर को थिएटर, ओटीटी ( डिजिटल राइट्स ) और सेटेलाइट राइट्स से कमाई होती है। प्रोड्यूसर डबिंग राइट्स भेजता है। 7-8 घंटे चलने वाली फ्लाइट्स में जो फिल्में दिखाई जाती हैं, उसके अलग से राइट्स होते हैं। इस तरह से 30-35 राइट्स होते हैं, जिससे प्रोड्यूसर पूरी जिंदगी प्रॉफिट कमाता है। हालांकि बहुत सारी बातें आपसी सहमति पर निर्भर करती हैं। मान लीजिए कोई फिल्म बड़ी हिट हो गई तो प्रोड्यूसर तय करता है कि उसे कितना प्रॉफिट मिलना चाहिए। डिस्ट्रीब्यूटर और थिएटर मालिक के बीच इतनी स्ट्रॉन्ग बॉन्डिंग होती है कि वो लोग प्रोड्यूसर से प्रॉफिट में कम हिस्सा कराने की कोशिश करते हैं। प्रोड्यूसर के साथ डिस्ट्रीब्यूटर को भी नुकसान होता है अगर फिल्म फ्लॉप हो गई तो प्रोड्यूसर को बहुत नुकसान होता है। इन्वेस्टर के पैसे वापस करने में घर ऑफिस भी बिक जाते हैं। कई बार डिस्ट्रीब्यूटर का भी बहुत नुकसान होता है। डिस्ट्रीब्यूटर कभी ज्यादा प्राइज में फिल्म खरीद लेता है। जिसकी रिकवरी नहीं होती है। थिएटर मालिक को भी नुकसान होता है। कई बार ऐसा होता है कि फिल्म नहीं चली तो थिएटर के AC का भी भाड़ा नहीं निकलता है। एग्रीमेंट पर कभी भी फिक्स अमाउंट नहीं होता है परसेंटेज के हिसाब से एग्रीमेंट होता है। उसी हिसाब से डिस्ट्रीब्यूटर, प्रोड्यूसर को प्रॉफिट देता है। फिल्म की प्रॉफिट में इन्वेस्टर, प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर का कॉम्बिनेशन होता है। मान लीजिए किसी इन्वेस्टर ने फिल्म में 100 करोड़ रुपए लगाए हैं तो प्रोड्यूसर पहले इन्वेस्टर को कैपिटल अमाउंट वापस करेगा। डिस्ट्रीब्यूटर अपनी प्रॉफिट से जो परसेंटेज प्रोड्यूसर को भेजेगा। उसी में से प्रोड्यूसर इन्वेस्टर को प्रॉफिट शेयर करेगा। आज के दौर में प्रोड्यूसर की हालत सबसे ज्यादा खराब विवेक शर्मा ने बताया कि आज के दौर में प्रोड्यूसर बनना बहुत मुश्किल काम है। पहले प्रोड्यूसर के लिए फंडिंग इक्ट्ठा करना आसान होता था। एक्टर्स की फीस भी बहुत ज्यादा नहीं होती। लेकिन आज के दौर में एक्टर्स की फीस ही बहुत ज्यादा होती है। दूसरा, एक्टर्स अपनी डिमांड भी प्रोड्यूसर्स पर थोपते हैं। पहले प्रोडक्शन के काम में एक्टर्स या किसी दूसरे की दखलअंदाजी नहीं होती थी। हालांकि अब सब कुछ इसके विपरीत है। साउथ में प्रोड्यूसर एक्टर को बैन कर देते हैं हालांकि हैदराबाद में प्रोड्यूसर आपस में मिलते हैं और एक दूसरे से अपने अनुभव शेयर करते हैं। उनकी प्रोड्यूसर लॉबी बहुत ही स्ट्रॉन्ग है। अगर कोई एक्टर या एक्ट्रेस किसी प्रोड्यूसर को परेशान करते हैं तो उन्हें बैन कर दिया जाता है। इसलिए वहां के एक्टर प्रोड्यूसर के कंट्रोल में हैं। स्टार्स का अब फिल्मों की प्रॉफिट मांगना गलत विवेक कहते हैं कि आज कल स्टार्स फिल्मों की प्रॉफिट में हिस्सा मांगने लगे हैं। यह बहुत ही गलत चलन है। अगर स्टार्स प्रॉफिट में शेयर मांग रहे हैं तो उन्हें नुकसान भी सहना चाहिए। फिल्म का मालिक प्रोड्यूसर होता है, स्टार नहीं। स्टार कहानी का एक प्रवक्ता होता है। शाहरुख ने डिस्ट्रीब्यूटर से नहीं लिए 25 लाख शाहरुख खान की फिल्म ‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ नहीं चली थी। मुंबई में इस फिल्म को यशराज ने डिस्ट्रीब्यूट किया था। यहां फिल्म को सिर्फ 3 लाख प्रॉफिट हुआ था, लेकिन बाकी सेंटर पर फिल्म नहीं चली थी। राजस्थान के डिस्ट्रीब्यूटर राज बंसल ने फिल्म को 25 लाख में लिया था, लेकिन उनको नुकसान हुआ। शाहरुख खान को जब यह बात पता चली तो उन्होंने डिस्ट्रीब्यूटर से 25 लाख नहीं लिए। राज बंसल को लगा कि शाहरुख नाराज हो गए। इसलिए पैसे नहीं लिए। शाहरुख ने उन्हें समझाया कि आप हमारी फैमिली मेंबर की तरह हैं। आप का नुकसान नहीं होना चाहिए, मैं अगली फिल्म में मैनेज कर लूंगा। उसके बाद शाहरुख खान ने फिल्म ‘मैं हूं ना’ में 25 लाख बढ़ाकर लिए थे। उस फिल्म से डिस्ट्रीब्यूटर ने अच्छा कमाया था। पहले प्रोड्यूसर का बहुत सम्मान होता था फिल्ममेकर सुनील दर्शन ने कहा- पहले प्रोड्यूसर का बहुत सम्मान होता था। प्रोड्यूसर का मतलब सिर्फ यह नहीं होता था कि वो फिल्मों के लिए फंड इकट्ठा कर रहा है। प्रोड्यूसर फिल्ममेकिंग की हर विधा में इनवाल्व होता था। अब कॉरपोरेट कंपनियों के आने से काफी बदलाव हो गया है। अब तो सब कुछ स्टार्स तय करने लगे हैं। _____________________________________________________ बॉलीवुड से जुड़ी ये स्टोरी भी पढ़ें.. पिता के निधन के बाद तंगी छाई:कभी 35 रुपए थी कमाई, एक्ट्रेस के कपड़े प्रेस किए; आज रोहित शेट्टी ने दी कई हिट फिल्में ‘छोटा ही था कि तभी पिता का साया सिर से उठ गया। घर की हालत से वाकिफ था। इस वजह से परिवार की जिम्मेदारियां खुद के कंधों पर ले लीं। दिन-रात मेहनत की। एक दिन में 3-3 शिफ्ट की, ताकि काम की कमी न रहे। लोगों को लगता है कि मैंने स्ट्रगल नहीं किया है। पूरी खबर पढ़ें..