Friday, March 20, 2026
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आखिर लगातार सत्ता में कैसे बनी आ रही है बीजेपी की सरकार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीजेपी की सरकार आखिर सत्ता में लगातार कैसे बनी आ रही है! हरियाणा चुनाव में जिस तरह से बीजेपी ने शानदार हैट्रिक लगाई उसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही होगी। हाल में संपन्न हुए चुनाव के दौरान बीजेपी के प्रदर्शन पर सवाल उठाए जा रहे थे। यही नहीं सभी एग्जिट पोल में कांग्रेस की जीत और बीजेपी की हार का दावा किया जा रहा था। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने सत्ता विरोधी लहर के बावजूद ग्राउंड इंटेलिजेंस के सहारे हारी बाजी को जीत में बदल दिया। हरियाणा चुनाव को लेकर पार्टी ने उत्तर प्रदेश के बीजेपी सांसदों को मैदान में उतारा। उन्हें पूरे राज्य में तैनात किया था। इस दौरान एक सांसद ने करनाल में बाइक से यात्रा की और सड़क किनारे की दुकानों पर चाय पी और स्थानीय चर्चा सुनी। इस यात्रा के दौरान सांसद ने देखा कि मुख्यमंत्री नायब सैनी उनसे पहले के सीएम मनोहर लाल खट्टर से ज्यादा लोकप्रिय थे। उन्होंने तुरंत ही चुनाव से जुड़ी टीम को इस संबंध में सूचित किया। इसके बाद सीएम सैनी को सार्वजनिक बैठकों में कुछ ही समय रहने और अपनी बात रखने के लिए कहा गया। उन्हें बाकी समय लोगों से मिलने, उनके साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके सुरक्षा कर्मियों को सख्त निर्देश दिया गया कि वे किसी को भी सीएम के पास जाने से नहीं रोकें। नायब सिंह सैनी स्वेच्छा से उन लोगों के पास जाते और सेल्फी लेते थे। इस कदम का हरियाणा में खासा असर नजर आया।

यह सिर्फ एक उदाहरण है कि विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी कैसे काम करती है। पिछले एक दशक में, बीजेपी ने गोवा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मणिपुर समेत 10 ऐसे राज्यों में सत्ता बरकरार रखी है, जहां ये माना जा रहा था कि लोगों में पार्टी के खिलाफ नाराजगी है। बीजेपी इन रा्ज्यों में शिकस्त का सामना कर सकती है। इसके विपरीत, 2004 से 14 तक यूपीए के 10 साल के शासन के दौरान, कांग्रेस ने 6 राज्यों में सत्ता बरकरार रखी। जिसमें से आखिरी 2011 में पार्टी असम में सत्ता पर काबिज हुई थी। वहीं बीजेपी का प्रदर्शन कांग्रेस कहीं ज्यादा बेहतर नजर आया। आखिर वो कौन से फैक्टर रहे जिससे बीजेपी हारी हुई बाजी अपने नाम करने में सफल रही। बीजेपी पूरे साल कार्यकर्ताओं से संपर्क में रहती है। पार्टी पूरे साल कार्यक्रमों की मेजबानी करके जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के अपने विशाल नेटवर्क को चुनाव के लिए तैयार रखती है। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने ईटी से कहा, ‘हमारे पास वैचारिक रूप से प्रेरित पार्टी कार्यकर्ताओं का एक व्यापक नेटवर्क है। हम न केवल चुनावों के दौरान, बल्कि पूरे साल उनके साथ जुड़े रहते हैं।’

बीजेपी हमेशा 24/7 काम करती है, इसलिए चुनाव की तैयारी का कोई तय समय नहीं है। हालांकि, चुनाव से सात से आठ महीने पहले ये और तेजी से आगे बढ़ने लगती है। शुरुआती इनपुट पार्टी को जनता के असंतोष को दूर करने में मदद करते हैं। पार्टी नेताओं ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने लाडली बहना योजना को लागू किया, जिसका वादा कांग्रेस ने चुनाव से पहले किया था। कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह की घोषणा की गई। कर्नाटक चुनाव से पहले, बीजेपी सरकार ने अनुसूचित जाति के आरक्षण को 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को 3 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया।

बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में कई चुनाव एक्सपर्ट को तैयार किया है। इनमें केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, अश्विनी वैष्णव, मनसुख मंडाविया और जी किशन रेड्डी के साथ-साथ नए चेहरे शिवराज सिंह चौहान और हिमंत बिस्वा सरमा भी शामिल हैं। इन नेताओं को शुरू में ही बड़ी जिम्मेदारी दे दी जाती है। जिससे उन्हें जमीनी हालात का आकलन करने और राज्य के लिए पार्टी की रणनीति बनाने का मौका मिलता है। अक्टूबर 2022 में, बीजेपी ने मई 2023 के चुनाव के लिए कर्नाटक के प्रभारियों के नाम का खुलासा कर दिया। जुलाई 2023 में, पार्टी ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के लिए प्रभारियों के नाम का ऐलान किया। वहां नवंबर में चुनाव हुए। हाल ही में हुए हरियाणा चुनाव के लिए 17 जून को प्रभारी नियुक्त किए गए।

पिछले 5 सालों में, बीजेपी ने चुनाव से पहले पांच राज्यों गुजरात, उत्तराखंड, त्रिपुरा, कर्नाटक और हरियाणा में मुख्यमंत्रियों को बदल दिया। कर्नाटक को छोड़कर सभी राज्यों में पार्टी का ये दांव काम कर गया। बीजेपी नेताओं ने ईटी को बताया कि नया चेहरा चुनना कठिन है। अगस्त 2016 में, गुजरात के सीएम विजय रूपाणी ने आनंदीबेन पटेल की जगह ली, जिनकी जाति के साथी आरक्षण के लिए अभियान चला रहे थे। जब 2021 में पटेलों ने बीजेपी का समर्थन किया, तो पार्टी ने रूपाणी की जगह भूपेंद्र पटेल को सीएम बनाया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राज्य प्रभारी सुनील बंसल और दूसरे नेताओं ने दिल्ली में एक जरूरी बैठक में हिस्सा लिया। कॉल सेंटर कर्मियों के पास बहु-स्तरीय रिएक्शन एकत्र करने और एक रिपोर्ट पेश करने के लिए 24 घंटे का समय दिया। रिपोर्ट ने बीजेपी को बीजेडी के साथ गठबंधन की अपनी योजना को छोड़ने के लिए प्रेरित किया। इसका सीधा असर ओडिशा के नतीजों में दिखा। बीजेपी ने अकेले दम पर वहां सरकार बनाई। बीजेपी अपने बागियों को अन्य पार्टियों की तुलना में बेहतर तरीके से मैनेज करती है। हाल ही में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी से करीब 33 और कांग्रेस से 36 बागी थे। दोनों पार्टियों ने अपने बागियों को मैनेज करने की कोशिश की, लेकिन बीजेपी का प्रबंधन बेहतर रहा। पार्टी के वरिष्ठ नेता रामविलास शर्मा को मनाने के लिए सीएम सैनी ने व्यक्तिगत रूप से उनसे मुलाकात की। इसी तरह, पार्टी के चुनाव सह-प्रभारी बिप्लव देव ने कई बागियों से मुलाकात की और उन्हें नामांकन वापस लेने के लिए राजी किया।

 

क्या हरियाणा की हार ने इंडिया गठबंधन को हरा दिया है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हरियाणा की हार ने इंडिया गठबंधन को हरा दिया है या नहीं! दावेदारी आधी की, मिला शून्य। यह हाल है उत्तर प्रदेश में उस कांग्रेस का जिसे 4 जून को लोकसभा चुनाव परिणाम में छह सीटें मिलीं तो ऐसा लगा कि समाजवादी पार्टी (सपा) की साझेदारी में उसकी मजबूती का रास्ता खुल गया है। लेकिन उसी समाजवादी पार्टी ने चार महीने बाद ही ऐसी पटखनी दी है कि कांग्रेस की हड्डी-पसली तक टूट गई। ऊपर से तुर्रा ये कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ये भी दावा कर दिया है कि कांग्रेस की सहमति से उसे यह धोबीपछाड़ दी है। अखिलेश ने बुधवार की देर रात सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर ऐलान किया कि सपा यूपी में होने जा रहे उपचुनाव में सभी नौ विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। मतलब, गठबंधन दल कांग्रेस रह गई ठन-ठन गोपाल। अखिलेश ने एक्स पर लिखा, ‘बात सीट की नहीं जीत की है। इस रणनीति के तहत इंडिया गठबंधन के संयुक्त प्रत्याशी सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल के निशान पर चुनाव लड़ेंगे।’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने सपा को अभूतपूर्व सहयोग दिया है। वो लिखते हैं, ‘कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं के साथ आने से समाजवादी पार्टी की शक्ति कई गुना बढ़ गयी है। इस अभूतपूर्व सहयोग और समर्थन से सभी 9 विधानसभा सीटों पर इंडिया गठबंधन का एक-एक कार्यकर्ता जीत का संकल्प लेकर नयी ऊर्जा से भर गया है।’

राजनीति का एक रंग ये भी है। जमकर कूटो और रोने भी न दो। कांग्रेस ने तो पांच सीटों पर दावेदारी करके जताया था कि वो सपा का छोटा नहीं बल्कि बराबर का साझेदार है, लेकिन सपा ने कहा- छोटा ही हो, बराबरी की सोची तो निकल लो। अखिलेश ने ‘कांग्रेस के बूथ लेवल कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक के सहयोग’ की दावेदारी की ऐसी चाल चली कि कांग्रेस करे तो क्या? वो मुंह खोलती है तो उस गठबंधन में दरार का संदेश जाएगा जिसने लोकसभा चुनाव में यूपी में परचम लहरा दिया। बस चार-साढ़े चार महीने ही तो हुए इस बात के, जब सपा-कांग्रेस ने मिलकर यूपी 80 में से 43 लोकसभा सीटें जीत लीं और बीजेपी को छोटा कर दिया। लेकिन इसी दौरान एक और बात हो गई- हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार। बस इसी हार ने गठबंधन में कांग्रेस की मिट्टी पलीत कर दी। हरियाणा में कांग्रेस जीत गई होती तो सपा यूपी में उसकी जबर्दस्त धुनाई करके रोने का रास्ता भी नहीं छोड़ने जैसी बड़ी हिमाकत नहीं कर पाती।

यूपी उपचुनाव में सपा की तरफ से कांग्रेस को ठेंगा दिखाने के पीछे एक और कारक भी काम कर रहा है। लोकसभा चुनाव में सपा ने 63 जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर साझेदारी में चुनाव लड़ा था। सपा 63 में से 37 सीटें जीतकर 59% का स्ट्राइक रेट हासिल कर लिया जबकि कांग्रेस 17 में सिर्फ छह सीटें जीतकर स्ट्राइक रेट में सपा से बहुत दूर रह गई। कांग्रेस पार्टी का स्ट्राइक रेट सिर्फ 35 रहा। अब उपचुनाव की बारी आई तो सपा ने कांग्रेस को पांच की मांग पर सिर्फ दो सीटों का ऑफर रखा। वो भी ऐसी सीटें जहां का ट्रैक रिकॉर्ड ही कहता है कि कांग्रेस की हार लगभग तय होगी। ये सीटें हैं- गाजियाबाद सदर और अलीगढ़ की खैर विधानसभा सीट। कांग्रेस ने चुनावी मैदान में विरोधियों के हाथ पिटने की जगह साथी के हाथों पछाड़े जाने का विकल्प चुना और उप-चुनाव से कदम वापस खींच लिए।

जिस तरह सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने नाम लिए बिना कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की आड़ लेकर राहुल गांधी की दरियादिली की प्रशंसा की है, ठीक वही मौका राहुल के पास महाराष्ट्र में है। राहुल भी महाराष्ट्र में अखिलेश को जमीन सुंघाकर उनकी ही दरियादिली का गुणगान कर सकते हैं। महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के बीच लंबी खींचतान के बाद सीटों की साझेदारी का जो समीकरण बना है, उसमें भी यही गुंजाइश रह गई है कि कांग्रेस पार्टी ही सपा के लिए कुछ कर सकती है। कुल 288 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बीच 85-85 सीटों पर बात बनती दिख रही है। इस तरह कुल 255 सीटें गठबंधन के इन तीन बड़े दलों के खाते में जाएंगी और बाकी बचीं 33 सीटें छोटे सहयोगियों के बीच बांटी जानी है। ऐसे में देखना होगा कि अखिलेश के खाते में क्या आएगा? अखिलेश वहां 12 सीटों पर दावेदारी जता चुके हैं।

खैर, ये तो हुई कांग्रेस के पास यूपी का बदला महाराष्ट्र में लेने के मौके की। असल बात ये है कि कांग्रेस बदला ले तो कितनों से? महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा की 13 सीटें जीतकर गठबंधन में सबसे शानदार प्रदर्शन किया था। इस लिहाज से उसे विधानसभा चुनावों में बाकी घटक दलों से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए थीं। लेकिन वहां भी शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस की एक न चलने दी। ऊपर से उद्धव ठाकरे की यह दावेदारी भी कि मुख्यमंत्री तो वही बनेंगे। कांग्रेस और शरद गुट की एनसीपी बड़ी मुश्किल से उद्धव को चुनाव से पहले सीएम पद का राग अलापने से बाज आने को मना पाए। उद्धव चाहते थे कि गठबंधन की तरफ से उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। कांग्रेस को पता है कि इस बात को लेकर उद्धव ठाकरे रोष में तो होंगे।

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधारकर राहुल गांधी ने जो भी सपने देखे थे, हरियाणा की हार ने उन सब पर पलीता लगा दिया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश ने राहुल का हाथ जिस ताकत से झटका है, उसका अंदाजा तो राहुल को हो गया होगा। उधर, झारखंड में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने कांग्रेस को बराबर का साझेदार मानने से इनकार कर दिया है। 81 सीटों वाली विधानसभा में जेएमएम ने अपने पास 40 जबकि कांग्रेस को 30 सीटें दी हैं। सवाल है कि क्या हरियाणा में कांग्रेस पार्टी जीत जाती तो भी सीट शेयरिंग का यही फॉर्म्युला रहता?

 

अगर इंडिया गठबंधन उपचुनाव में जीत गया तो क्या होगा?

आज हम आपको बताएंगे कि यदि इंडिया गठबंधन उपचुनाव में जीत गया तो आखिर क्या होगा! महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव को लेकर घमासान चरम पर है। एनडीए हो या इंडिया गठबंधन, दोनों ही खेमा चुनाव प्रचार से लेकर कैंडिडेट्स सेलेक्शन में जुटा है। सभी की निगाहें इन विधानसभा चुनावों पर है। हालांकि, इन चुनावों के साथ 15 राज्यों की 48 सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर भी सियासी हंगामा तेज है। खास तौर पर विपक्षी INDI अलायंस में इन सीटों को लेकर कहीं-कहीं पेंच फंस रहा तो कहीं गठबंधन ही खतरे में जाता नजर आ रहा। आखिर कहां-कहां उपचुनाव वाली सीटों ने सियासी दलों के बीच गठबंधन में दरार पैदा कर दी है, बताते हैं आगे। 15 राज्यों की 48 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर विपक्षी खेमे में तनाव और बेचैनी का माहौल है। बात करें उत्तर प्रदेश की तो यहां समाजवादी पार्टी के अड़ियल रवैये के कारण कांग्रेस ने सभी नौ उपचुनावों में अपने उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में अपने खराब प्रदर्शन से जूझ रही कांग्रेस अब पश्चिम बंगाल में भी मुश्किल में है। यहां उसकी सहयोगी सीपीएम ने छह सीटों पर होने वाले उपचुनाव में उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।

सीपीएम का कहना है कि वो लगातार कांग्रेस की ओर से बातचीत शुरू होने का इंतजार करती रही। कोई पहल नहीं होने पर आखिरकार उन्होंने थक कर 6 सीटों पर उपचुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिए। इसी तरह, असम में भी उपचुनाव विपक्षी खेमे में राजनीतिक समीकरणों को नया रूप देते दिख रहे। ऐसा तब हुआ जब कांग्रेस ने बेहाली सीट पर उम्मीदवार उतार दिया। कांग्रेस के आश्चर्यजनक तरीके से लिए गए इस फैसले के कारण 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर बना विपक्ष दलों के गठबंधन असम संयुक्त मोर्चा में टूट हो गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बेहाली सीट से CPI-ML (लिबरेशन) के उम्मीदवार का समर्थन करने का फैसला लिया गया था।

उत्तर प्रदेश में, कांग्रेस ने उपचुनावों की आशंका में कुछ जमीनी काम भी किया था, और 10 उपचुनाव वाली सीटों में से पांच के लिए सौदेबाजी शुरू कर दी थी। हालांकि चुनाव आयोग ने मिल्कीपुर सीट के लिए उपचुनाव की घोषणा नहीं की। कांग्रेस नेताओं को उम्मीद थी कि 9 सीटों के उपचुनाव में समाजवादी पार्टी उन्हें कम से कम तीन सीटें देगी। हालांकि, क्षेत्रीय दल ने उसे केवल दो सीटें दीं। वो भी खैर और गाजियाबाद जैसी मुश्किल सीटें। बीजेपी ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में ये दोनों सीटें जीती थीं। सपा की ओर से झुकने का इनकार करने के बाद, कांग्रेस ने प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करने का फैसला किया।

कांग्रेस इस फैसले के लिए तर्क दिया कि समय की मांग बीजेपी को हराने की है। वह बिना किसी शर्त के सभी सीटों पर सपा को समर्थन दे रही। हालांकि, हकीकत यह थी कि हरियाणा के नतीजों के बाद उसके पास बहुत कम सौदेबाजी की शक्ति रह गई थी। सपा ने इस पर कांग्रेस के खिलाफ भी नाराजगी जताई, क्योंकि कांग्रेस ने हरियाणा और उससे पहले मध्य प्रदेश में सीट बंटवारे के समझौते की उसकी मांगों को नजरअंदाज कर दिया था।

पश्चिम बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन ध्वस्त हो गया है। वाम मोर्चे ने कांग्रेस से सलाह-मशविरा किए बिना ही छह उपचुनाव वाली सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। वामपंथी और कांग्रेस हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव गठबंधन में लड़े थे। कोई विकल्प न बचने के कारण कांग्रेस ने मंगलवार को छह सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। जिन छह सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, उनमें से पांच पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है, जो आरजी कर रेप और मर्डर मामले से निपटने और उसके बाद के आंदोलन को लेकर काफी राजनीतिक दबाव में है। हालांकि विपक्षी खेमा अब बंटा हुआ है।

कर्नाटक में, NDA के सहयोगी दलों बीजेपी और जेडीएस को उस समय झटका लगा जब अभिनेता से नेता बने सीपी योगेश्वर ने बुधवार को बीजेपी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए। चन्नापटना उपचुनाव के लिए बीजेपी की ओर से टिकट नहीं दिए जाने से योगेश्वर नाराज थे। गुरुवार को उन्होंने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार की मौजूदगी में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। केरल में भी उपचुनावों के कारण कुछ उथल-पुथल मची हुई है और कांग्रेस से एक प्रमुख नेता ने पाला बदल लिया। यूथ कांग्रेस के प्रमुख राहुल मम्कुट्टाथिल को पलक्कड़ विधानसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बनाने के कांग्रेस के फैसले के विरोध में उसके सोशल मीडिया प्रमुख पी शरीन ने पार्टी छोड़ दी। शरीन अब पलक्कड़ में वामपंथी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार हैं।

 

क्या पश्चिम बंगाल को किसी भी हालत में प्राप्त करना चाहते हैं गृहमंत्री अमित शाह?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल को किसी भी हालत में प्राप्त करना चाहते हैं या नहीं! अमित शाह की पहचान बीजेपी के ‘चाणक्य’ के रूप में होती है। शाह के लिए यह विशेषण यूं ही नहीं बन गया है। शाह ने चुनावी राजनीति में गुजरात से लेकर दिल्ली तक अपनी काबिलियत को साबित किया है। पार्टी अध्यक्ष के रूप में शाह ने बीजेपी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। पीएम मोदी के साथ उनके तालमेल की तो मिसाल दी जाती है। कहा जाता है कि शाह जो लक्ष्य तय करते हैं उसे हर हाल में पूरा करके ही छोड़ते हैं। अब पार्टी के इस कुशल रणनीतिकार ने अपने लिए पश्चिम बंगाल को बड़े लक्ष्य के रूप में तय किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर शाह ने यह लक्ष्य क्यों रखा है। अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव और आरजी कर की घटना के बाद शाह हाल ही में पहली बार पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचे थे। शाह ने यहां पार्टी की सदस्यता अभियान की शुरुआत की। इसके साथ ही शाह ने घोषणा की कि बीजेपी का ‘अगला बड़ा लक्ष्य’ 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सरकार बनाना है।

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में बंगाल से 30 से अधिक सीट जीतने का लक्ष्य रखा था, लेकिन उसे 2019 की तुलना में छह कम यानी 12 सीट पर जीत मिली। पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीट हैं। राज्य में संदेशखाली का मुद्दा काफी गरम रहा था। इस मुद्दे को लेकर बीजेपी ने महिला सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरने का पुरजोर प्रयास किया था। पार्टी ने संदेशखाली पीड़ित में से एक रेखा पात्रा बशीरहाट लोकसभा सीट से पार्टी का उम्मीदवार बनाकर एक संदेश देने की कोशिश भी की थी। पीएम मोदी ने रेखा पात्रा को शक्ति स्वरूपा तक कहा था। इसके बाद पीएम मोदी खुद बंगाल जाककर संदेशखाली की पीड़ित महिलाओं से मिले थे।

हालांकि, बीजेपी महिला सुरक्षा जैसे मजबूत मुद्दे को भुनाने में असफल रही थी। इससे पार्टी को बड़ा झटका लगा था। ऐसे में शाह में संदेशखाली मुद्दे को पार्टी की तरफ से नहीं भुना पाने की टीस तो जरूर रही होगी। ऐसे में शाह नहीं चाहते हैं कि वह अगली बार विधानसभा चुनाव में किसी भी तरह से पिछड़ें। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी लगातार अपनी स्थिति मजबूत किए हुए हैं। पश्चिम बंगाल में अब तक मोदी लहर से लेकर शाह की रणनीतिक बेअसर रही है। बीजेपी तमाम कोशिशों के बावजूद यहां मजबूत स्थिति में खुद को नहीं पहुंचा पाई है। ममता ने विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में भी अपनी ताकत का अहसास दिया है। बंगाल में लोकसभा चुनाव में जीत से ममता यह संदेश देने में कामयाब रही हैं कि बंगाल में उनका अभी कोई विकल्प नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों के साथ ही लोगों के एक वर्ग में यह राय भी बन गई है कि बीजेपी का जादू बंगाल में फेल हो जाता है। ऐसे में शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल में ममता को पटखनी देकर बीजेपी का दम दिखाना है।

अमित शाह ने 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में दो तिहाई बहुमत हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। शाह ने पार्टी सदस्यों से राज्य में अपने प्रभाव को कम नहीं आंकने का आग्रह किया है। शाह एक कुशल रणनीतिकार की तरफ से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बीजेपी ने राज्य में सदस्यता अभियान के दौरान पिछली बार 88 लाख से अधिक सदस्य बनाए थे। मौजूदा समय में पार्टी में अधिक सांसद और विधायक हैं। ऐसे में पार्टी का लक्ष्य एक करोड़ सदस्यों को पार करना है। पार्टी कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिला रही है कि वे चुनौती को स्वीकार करते हुए पार्टी के लक्ष्य को हासिल करने में जुट जाएं।

बीजेपी का राज्य में प्रदर्शन टुकड़ो-टुकड़ों में रहता है। पार्टी एक साथ पूरे राज्य में मजबूत नजर नहीं आती है। नार्थ परगना, साउथ परगना, कोलकाता, हावड़ा और हुगली में पार्टी का संगठन तुलनात्मक रूप से कमजोर है। इस क्षेत्र में 16 लोकसभा सीटों आती हैं। 2019 के चुनाव में बीजेपी ने 16 में से महज 3 सीटे ही जीती थी। इस बार यह प्रदर्शन और भी कमजोर रहा। राज्य में दिलीप घोष, सुवेंदु अधिकारी, तापस रॉय जैसे गिने-चुने ही चेहरे नजर आते हैं। ऐसे में शाह की नजर राज्य में क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत चेहरों को सामने करने की होगी। इस तरह शाह के लिए पश्चिम बंगाल में अगले दो साल रणनीतिक रूप से काफी अहम है। शाह के सामने ममता के मजबूत किले को ध्वस्त करने की चुनौती है।

 

आखिर क्या है भारत चीन सीमा की नई व्यवस्था?

आज हम आपको भारत चीन सीमा की नई व्यवस्था के बारे में जानकारी देने वाले हैं! बड़े लोगों की बात ही कुछ और होती है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बड़े लोगों का जमावड़ा हो रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस सम्मेलन का हिस्सा होंगे। बड़े लोगों की इस मुलाकात से पहले ‘कुछ मीठा हो जाए’ जैसी खबर आ गई है। भारत के विदेश सचिव विवेक मिसरी ने बताया है कि भारत और चीन अपनी सीमा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की साझी पेट्रोलिंग पर सहमत हो गए हैं। 2020 से ही जारी विवाद पर यह घोषणा वाकई बड़ा डेवलपमेंट है। इससे यह उम्मीद थोड़ी पक्की होती दिख रही है कि रूस के कजान शहर में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात सम्मेलन के इतर भी हो सकती है। सवाल है कि अमेरिका इसे किस नजरिए से देखेगा? इसमें कोई संदेह नहीं कि एलएसी पर गश्त को लेकर समझौते पर पहुंचना एक बड़ी कामयाबी है क्योंकि भारत और चीन के बीच 2020 से शुरू हुआ सीमा विवाद बेहद भयंकर रूप ले चुका है। ताजा समौझते से इससे सीमा पर तैनात सेनाओं की वापसी हो सकती है और तनाव कम हो सकता है। इस समझौते को क्षेत्र में शांति बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने रूस जाने वाले हैं। इस दौरान उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात होने की उम्मीद है। हालांकि, बैठक को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि दोनों नेता नई व्यवस्था और सीमा विवाद को सुलझाने के अन्य राजनयिक प्रयासों पर चर्चा करेंगे।

भारत-चीन सीमा विवाद मई 2020 में चरम पर पहुंच गया था, जब एलएसी पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़पें हुई थीं। जून 2020 में गलवान घाटी में सबसे गंभीर टकराव हुआ था। इस झड़प में 20 भारतीय सैनिक और 40 से अधिक चीनी सैनिक मारे गए थे या गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लद्दाख के पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में हुई यह घटना, दशकों में दो परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकराव थी। तब से, दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं।

भारत-चीन के बीच सीमा का अस्पष्ट रेखांकन नहीं है। इस कारण पिछले कुछ वर्षों में कई बार झड़पें हुई हैं, लेकिन 2020 की गलवान झड़प ने दोनों देशों को एक बड़े सैन्य संघर्ष के कगार पर धकेल दिया था। गतिरोध ने न केवल उनके राजनयिक संबंधों को बल्कि आर्थिक संबंधों को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। इसके बाद से भारत ने चीनी निवेशों की जांच कड़ी कर दी है और चीनी फर्मों से जुड़ी कई बड़ी परियोजनाओं को रोक दिया है।

2020 की झड़प के बाद से माहौल को शांत करने के लिए दोनों देशों के बीच कई दौर की राजनयिक और सैन्य वार्ता हुई है। यह प्रक्रिया धीमी रही है क्योंकि दोनों पक्ष इस क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, हाल के घटनाक्रम इन वार्ताओं की गतिशीलता में बदलाव का संकेत देते हैं। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, बातें रचनात्मक रही हैं और इस कारण ‘भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त की व्यवस्था’ हुई है। इन पेट्रोलिंग अरेंजमेंट से सैन्य बलों की वापसी और 2020 से चली आ रही कई समस्याओं के समाधान की उम्मीद है। नया समझौता कथित तौर पर देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में गश्त से संबंधित है, जो एलएसी के साथ तनाव के दो प्रमुख बिंदु हैं। वार्ता में सीमा पर यथास्थिति को अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में बहाल करने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है, जो भारत की ओर से एक प्रमुख मांग है।

प्रगति के बावजूद, अभी भी कई अनसुलझे मुद्दे हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है। इससे पहले कि स्थिति पूरी तरह से सामान्य हो सके, भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस महीने की शुरुआत में बताया था कि जहां ‘आसान’ मुद्दों का समाधान हो गया है, वहीं अधिक कठिन परिस्थितियां अभी भी बनी हुई हैं। विशेष रूप से देपसांग के मैदानों और पूर्वी लद्दाख के कुछ हिस्सों में ये अनसुलझे क्षेत्र पूर्ण वापसी के लिए एक चुनौती बने हुए हैं। विशेष रूप से देपसांग एक विवादास्पद क्षेत्र बना हुआ है जहां माना जाता है कि चीनी सेनाएं भारत के दावा वाले क्षेत्र के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जमी हुई हैं। सितंबर 2022 में गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से दोनों पक्षों के सैनिक पीछे हट गए थे, देपसांग में गतिरोध को हल करना इसके रणनीतिक महत्व के कारण अधिक चुनौतीपूर्ण रहा है।

एलएसी पर शांति और सामान्य स्थिति की बहाली को व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने के लिए एक शर्त के रूप में देखा जाता है। भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र की रिपोर्टों के अनुसार, दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि संबंधों को सामान्य करने के लिए एलएसी का सम्मान और शांति की बहाली जरूरी है। तथ्य यह है कि दोनों देशों ने धीमी प्रगति के बावजूद राजनयिक संवाद जारी रखा है, यह एक सकारात्मक संकेत है कि दोनों सीमा विवाद का दीर्घकालिक समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

अमेरिका ने कनाडा में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और अपने यहां आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश के आरोपों में भारत को घेरने की लगातार कोशिशें की हैं। अमेरिका ने न केवल निज्जर की हत्या मामले में कनाडा के कंधे पर हाथ रखकर भारत की तरफ आंखें तरेर रहा है बल्कि पन्नू मामले में भारत पर लगातार दबाव बनाना चाह रहा है। ऐसे में उसके घोर प्रतिस्पर्धी चीन के साथ भारत के सबसे बड़े विवाद के सुलझने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना काफी दिलचस्प होगा।

 

क्या चीन कर सकता है भारत के साथ चालबाजी?

आने वाले समय में चीन भारत के साथ चालबाजी भी कर सकता है! ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक प्रेस वार्ता में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने घोषणा की कि भारत और चीन पूर्वी लद्दाख में LAC पर गश्त पैटर्न पर एक समझौते पर पहुंच गए हैं। इसके तुरंत बाद, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सुनिश्चित किया कि भारत-चीन सीमा के इस हिस्से में गश्त गलवान से पहले की अवधि में वापस आ जाएगी। अगले दिन चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने पुष्टि की कि दोनों सरकारें पूर्वी लद्दाख में अपने मुद्दों को हल करने में सक्षम हैं। एलएसी पर जारी गतिरोध कम करने को लेकर इस विकास का भारत में कई लोगों ने स्वागत किया है। अंग्रेजी में कहावत है- डेविल इज इन द डीटेल्स। डीटेल में जाने पर ही समस्या का पता चलता है। दुर्भाग्य से, इस समय गश्त पर समझौते के काम करने के तरीके के बारे में बहुत कम संकेत हैं। कोई यह समझ सकता है कि ऐसे कई उपाय हैं जिन्हें हर सरकार ने करने का वादा किया है और जिन्हें इस प्रक्रिया में अगले चरण से पहले दूसरे पक्ष द्वारा सत्यापित किया जाएगा। भारत और चीन की सेनाओं और सरकारों के बीच विश्वास के निम्न स्तर के साथ, यह कदमों की एक धीमी, कठिन और श्रमसाध्य श्रृंखला होगी।

इसे लागू करने में कई सप्ताह भी लग सकते हैं। यदि यह प्रक्रिया पूर्वी लद्दाख में यथास्थिति की बहाली की ओर ले जाती है, जैसा कि पीएलए द्वारा 2020 की गर्मियों में अपनी हरकतों को अंजाम देने से पहले था, तो परिणाम भारत के लिए अच्छे होंगे। इससे कम कुछ भी उतने ही सवाल खड़े करेगा जितने गश्त समझौते पर पहुंचने से पहले पूछे जा रहे थे। अगर भारत सरकार संसद के साथ-साथ आम जनता को भी विश्वास में लेती है तो यह दूरदर्शी कदम होगा। भारत जैसे लोकतंत्र के लिए यह हमेशा सबसे अच्छा रास्ता होता है, खासकर चीन के साथ उसके संबंधों में। भारत-चीन सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए रखना हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। दोनों देशों की सरकारों ने इस लक्ष्य पर कड़ी मेहनत की थी और 1990 और 2000 के दशक में हुए कई समझौते इस इच्छा के प्रमाण हैं। यह दृष्टिकोण 2020 की गर्मियों में काफी बदल गया जब चीन की पीएलए ने पूर्वी लद्दाख में सैन्य कार्रवाई की। इस एक कदम ने दोनों देशों के बीच की गतिशीलता को बदल दिया है और पिछले संतुलन को बहाल करने के लिए बहुत सारे पारस्परिक प्रयास करने होंगे।

कई आम भारतीय सोचेंगे कि पूर्वी लद्दाख में इस सीमा मुद्दे के सुलझ जाने के बाद हम चीन के साथ पहले की तरह ही व्यवहार कर सकते हैं। आखिर, क्या विदेश मंत्री ने खुद नहीं कहा था कि जब तक सीमा पर शांति नहीं होगी, तब तक चीन के साथ संबंधों में सामान्यता नहीं आ सकती? अब जब समस्या सुलझ गई है, तो क्या भारत और चीन के बीच संबंध 2019 जैसे नहीं होने चाहिए? दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं है। हम 2020 से 2024 के बीच पिछले साढ़े चार वर्षों में चीन के साथ अपने अनुभव को नजरअंदाज नहीं कर सकते। चीन की हरकतों के कारण दोनों सरकारों के बीच विश्वास गंभीर रूप से कम हुआ है। इसे एक बार में एक कदम आगे बढ़ाकर ही फिर से बनाया जा सकता है। पूर्वी लद्दाख से पहले जो विश्वास का स्तर था, उसे वापस पाने में कई साल लगेंगे।

दुर्भाग्य से, भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में चीन से भारत में अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने के बारे में अपनी घुमावदार बातों से लोगों को भ्रमित कर दिया। निश्चित रूप से, हमारे वित्त मंत्रालय के ऐसे वरिष्ठ अधिकारी को सरकार में हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों से यह पूछना चाहिए था कि क्या इस विचार को आधिकारिक दस्तावेज में इतने स्पष्ट रूप से व्यक्त करना उचित था। निश्चित रूप से, एक संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण बेहतर होता। ऐसा करना बिल्कुल गलत था क्योंकि इससे चीन को स्पष्ट रूप से संदेश गया कि हमारी सरकार चीनी निवेश के मामले में दो हिस्सों में बंटी हुई है। इस तरह के संकेत ने दिल्ली में चीनी राजदूत और उनके कर्मचारियों को इन विभाजनों का फायदा उठाने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया कि भारत चीन के पक्ष में निर्णय ले।

इसी तरह, जहां तक चीनी फर्मों द्वारा एफडीआई का सवाल है, प्रेस नोट 3 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऐसा हो सकता है, लेकिन इसका मूल्यांकन केस-दर-केस आधार पर किया जाएगा। अगर हमने समयबद्ध तरीके से ऐसा करने के लिए पहले से ही शासन संरचनाएं स्थापित नहीं की हैं, तो हमें इसे अभी स्थापित कर लेना चाहिए। भारत में चीनी कंपनियों द्वारा निवेश के लिए मुफ्त लाइसेंस नहीं दिया जा सकता है। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। भारत की जनता स्पष्ट रूप से यह समझने के लिए पर्याप्त परिपक्व है कि गलवान नदी में बहुत पानी बह चुका है। 2020 के बाद के हाल के अतीत को न तो भुलाया जा सकता है और न ही भुलाने की कोशिश की जा सकती है। चीन के साथ भारत के संबंधों को सुधारा जा सकता है, लेकिन केवल धीरे-धीरे और दोनों पक्षों के प्रयास से।

इस बीच, भारत चीन जैसे देश के साथ आगे बढ़ने के तरीके को लेकर सतर्क और सावधान रहेगा। हर कार्रवाई की बारीकी से जांच और विश्लेषण किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई तत्काल समाधान नहीं है। चीन के साथ अचानक हमेशा की तरह व्यापार नहीं हो सकता।

 

महाराष्ट्र चुनाव से पहले विदेश मंत्री ने क्या कर दिखाया?

हाल ही में महाराष्ट्र चुनाव से पहले विदेश मंत्री ने एक बड़ा दाव खेल दिया है! विदेश मंत्री जयशंकर ने दीवाली से पहले मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में विकास कार्यों की रफ्तार का जिक्र किया। विदेश मंत्री ने कहा कि विकसित भारत के लिए विकसित महाराष्ट्र की जरूरत है। जयशंकर ने कहा कि आजादी के बाद से इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में महाराष्ट्र का योगदान सबसे अधिक रहा है। विदेश मंत्री ने जर्मनी के चांसलर की भारत यात्रा और पीएम मोदी के सिंगापुर दौरे, जी-7 मीटिंग, अमेरिका दौरे का जिक्र किया। विदेश मंत्री ने कहा कि सरकार का पूरा फोकस भारत में निवेश लाने पर है। जयशंकर ने डबल इंजन की सरकार का जिक्र कर महाराष्ट्र चुनाव में बीजेपी सरकार लाने की भी पैरवी भी कर दी। विदेश मंत्री ने अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग इंडस्ट्रियल पॉलिसी से जुड़े सवाल का जवाब दिया। महाराष्ट्र की दुनिया में छवि भी बनेगी। जयशंकर ने कहा कि विदेशी निवेशकों का महाराष्ट्र में बहुत रुचि होती है। ऐसे में महाराष्ट्र में ऐसी सरकार की जरूरत है जो केंद्र के साथ मिलकर नीतियों की समानता के साथ प्रोजेक्ट को जमीन पर उतार सके। उन्होंने कहा कि यदि कोई नीति बनती है तो उसे जमीन पर उतारने में राज्य सरकार की भूमिका काफी अहम होती है। विदेश मंत्री ने कई राज्यों में नीति अलग के साथ नीयत पर भी सवाल उठाए।

विदेश मंत्री ने कहा कि कोई भी निवेशक निवेश से पहले अपने मन में अपने हिसाब से फैसला लेता है। वह पहले राज्य सरकार की स्थिरता और प्रदर्शन को देखता है। ऐसे में अगर निवेश नहीं आता है तो वहां कि सरकार की भूमिका भी अहम होती है। ऐसे में यह कहना कि निवेश लाने में केंद्र सरकार का दोष है तो आपको अपने मेरिट के हिसाब से सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले 10 साल में हर प्रोजेक्ट बीजेपी के शासन वाली सरकारों में नहीं आया। उन्होंने कहा कि जितना ही केंद्र और राज्य सरकार में तालमेल होगा, निवेशकों का भरोसा उतना ही मजबूत होगा। विदेश मंत्री ने कहा कि विदेशी निवेशकों के मन में क्वालिटी ऑफ गवर्नेंस होता है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि हमारा मानना है कि रोजगार केवल देश तक सीमित नहीं है। हम आज एक वैश्विक कार्यक्षेत्र देख रहे हैं। उन्होंने कहा, चाहे वह यूरोप हो, अमेरिका हो या मलेशिया – हमने समझौतों के साथ ऐसी स्थितियां बनाई हैं कि हमारे लोग रोजगार के लिए वहां जा सकते हैं। जयशंकर ने कहा कि जब पीएम मोदी अमेरिका गए, तो उन्होंने निवेश आकर्षित करने के लिए बड़ी कंपनियों के सीईओ से मुलाकात की। फिर चाहे वह सीमा सुरक्षा हो, आतंकवाद का मुकाबला हो या हमारे पड़ोस में अस्थिरता हो – हम इसे अच्छी तरह से संभाल रहे हैं।

जयशंकर ने सुरक्षा के मुद्दे पर बात करते हुए पड़ोसी देशों में अस्थिरता का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसी देशों में होने वाली घटनाओं को सही तरीके से मैनेज करने में सफल हुआ है। जयशंकर ने मौजूदा समय में दुनिया में चल रहे तनाव और युद्ध की बात की। विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया के क्षेत्रों में तनाव है। पीएम मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में रूस-यूक्रेन युद्ध के संबंध में पहल की। पीएम मोदी रूस गए। वहां, उन्होंने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की यात्रा के दौरान राष्ट्रपति पुतिन से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि यह हमारे प्रयासों की एक सम्रग तस्वीर है।

पिछले दशक में सीमा पर स्थिति बदली है। फेंसिंग में बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में पहले की तरह होने वाली घुसपैठियों की संख्या में कमी आई है। कुछ महीने पहले बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता रही। इस दौरान सीमा पर कुछ अस्थिरता रही है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के मन में कोई दुविधा नहीं हैं।  बता दें कि जयशंकर ने कहा कि विदेशी निवेशकों का महाराष्ट्र में बहुत रुचि होती है। ऐसे में महाराष्ट्र में ऐसी सरकार की जरूरत है जो केंद्र के साथ मिलकर नीतियों की समानता के साथ प्रोजेक्ट को जमीन पर उतार सके। उन्होंने कहा कि यदि कोई नीति बनती है तो उसे जमीन पर उतारने में राज्य सरकार की भूमिका काफी अहम होती है। विदेश मंत्री ने कई राज्यों में नीति अलग के साथ नीयत पर भी सवाल उठाए। जयशंकर ने कहा कि जहां-जहां सीमा पर सुरक्षा की जरूरत है, उसे मजबूत कर रहे हैं। म्यांमार के बॉर्डर की स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। अब पहले की नीति बदल चुकी है।

 

कनाडा के मामले में क्या बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा के मामले में एक बड़ा बयान दे दिया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘हल्के में लेने’ में विश्वास नहीं करता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया को एहसास हो रहा है कि भरोसा और विश्वसनीयता ही देश के साथ अच्छे संबंधों की नींव रखते हैं। पीएम मोदी की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की कूटनीति ने द्विपक्षीय संबंधों को कठिन मोड़ पर पहुंचा दिया है। वहीं, कुछ पश्चिमी देशों की तरफ से कनाडा के प्रति आत्मीयता के संकेत मिल रहे हैं। कनाडा की तरफ से खालिस्तान समर्थक आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने का आरोप लगाया रहा है। भारत ने इसे पूरी तरह से आधारहीन बताते हुए आरोपों का खंडन किया है। इसके बाद से दोनों देशों के संबंधों में तल्खी आ गई है। निज्जर को कनाडा की नागरिकता हासिल थी। खास बात है कि कनाडा अपने दावों को सबूतों के साथ साबित करने में विफल रहा है।

इसके बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि जब अधिकांश देश संकटों का सामना करने के बाद भविष्य को लेकर चिंतित हैं, तब भारत एक उम्मीद बनकर उभरा है। मोदी ने कहा कि भारत ने डिजिटल इनोवेशन के जरिये दिखाया है, लोकतांत्रिक मूल्य एक साथ रह सकते हैं। इसने दिखाया है कि टेक्नोलॉजी समावेशन एक साधन है, न कि नियंत्रण या विभाजन का। पीएम मोदी ने अपनी बात रखने के लिए यूपीआई, पीएम गति शक्ति और ओएनडीसी जैसे तकनीक-संचालित प्लेटफार्मों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया ने भारत के सफल चंद्रयान मिशन को ‘एक त्यौहार की तरह’ मनाया क्योंकि भारत की तरक्की ईर्ष्या का कारण नहीं बनती क्योंकि इसकी प्रगति से पूरी दुनिया को लाभ होता है। भारत के उत्थान से दुनिया खुश होती है।

इससे पहले एक कार्यक्रम में विदेश मंत्री ने भी कनाडा पर तंज कसा। जयशंकर ने भारत-कनाडा के संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि कनाडा को भारतीय राजनयिकों के साथ एक समस्या है, वे भारत के संबंध में यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि वहां क्या हो रहा है। लेकिन, भारत में कनाडा के राजनयिक को हमारी सेना या पुलिस के बारे में जानकारी इकट्ठा करने में कोई समस्या नहीं होगी। विदेश मंत्री ने कनाडा पर तंज कसते हुए कहा कि जब हम उनसे कहते हैं कि कुछ लोग भारत के नेताओं और राजनयिकों को खुलेआम धमकी देते हैं तो उनका जवाब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होता है।

जस्टिन ट्रूडो जब 2015 में कनाडा के प्रधानमंत्री बने तब से ही भारत के साथ कनाडा के रिश्तों में खटास आने लगी। ट्रूडो से पहले के कनाडाई प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने भारत के साथ अच्छे संबंध बना रखे थे, लेकिन ट्रूडो ने भारत के प्रति उदासीनता दिखाई। फिर भारत और कनाडा के बीच संबंध धीरे-धीरे खराब होने लगे। ट्रूडो की खालिस्तानी समर्थकों के प्रति नरम नीति और जगमीत सिंह के साथ गठबंधन से यह तनाव और बढ़ा। 2018 में ट्रूडो की विवादित भारत यात्रा के बाद से संबंधों में खटास बढ़ने लगी। 2020 में किसान आंदोलन पर ट्रूडो की टिप्पणी ने भी तनाव को और बढ़ाया। 2023 में हरदीप निज्जर की हत्या और ट्रूडो द्वारा भारत पर लगाए गए आरोपों ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को बुरी तरह से प्रभावित किया।

भारत के साथ संबंध सुधारने के उद्देश्य से ट्रूडो ने भारत की यात्रा की, लेकिन यात्रा विवादास्पद रही क्योंकि खालिस्तानी आतंकवादी जस्पाल अटवाल को कनाडा के एक राजनयिक कार्यक्रम में निमंत्रण दिया गया था। यह निमंत्रण रद्द कर दिया गया, लेकिन इस घटना ने भारत में नाराजगी पैदा की। भारत और कनाडा ने आतंकवाद विरोधी सहयोग पर एक समझौता किया, जिसमें पहली बार खालिस्तानी आतंकवाद का उल्लेख किया गया। लेकिन कनाडा की सरकार पर खालिस्तानी समूहों के दबाव के कारण अगले साल इस रिपोर्ट से खालिस्तानी चरमपंथ का जिक्र हटा दिया गया।

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि हरदीप निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों का हाथ है। यह एक चौंकाने वाला बयान था और इससे राजनयिक तनाव अपने चरम पर पहुंच गया। भारत ने इन आरोपों को सख्ती से नकार दिया और दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित कर दिया। कनाडा अपने आरोपों को लेकर ठोस सबूत देने में असफल रहा तो यह तनाव और गहरा गया। भारत ने कनाडा पर खालिस्तानी अलगाववाद का समर्थन करने का आरोप लगाया।

 

क्या भारत कर रहा है दुनिया में एक नया कनेक्शन पैदा?

वर्तमान में भारत दुनिया में एक नया कनेक्शन पैदा कर रहा है! उथल पुथल के इस वक्त में भारत दुनिया को कॉन्फ्लिक्ट से बाहर लाने और कनेक्ट करने की कोशिश कर रहा है। प्राचीन सिल्क रूट से लेकर मौजूदा के टेक्नोलॉजी रूट तक, भारत का मिशन दुनिया को कनेक्ट करने का है। प्रधानमंत्री मोदी ने एशिया पैसिफिक में पहली बार हो रही वर्ल्ड टेलीकम्युनिकेशन स्टैंडर्डाइजेशन असेंबली 2024 को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। इसके साथ ही पीएम मोदी ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के आठवें एडिशन का भी आगाज़ किया। प्रधानमंत्री ने इस अंतर्राष्ट्रीय इवेंट के मंच से दोहराया कि डिजिटल टेक्नोलॉजी को लेकर एक ग्लोबल फ्रेमवर्क कायम किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ये विषय भारत की जी 20 अध्यक्षता के दौरान उठाया गया था। पीएम ने कहा कि ” अब वक्त आ गया है कि ग्लोबल संस्थाओं को ग्लोबल गवर्नेंस के महत्व को महसूस करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ग्लोबल लेवल पर टेक्नोलॉजी को लेकर एक फ्रेमवर्क की दिशा में काम वक्त की जरूरत है। उन्होंने एविएशन सेक्टर के फ्रेमवर्क की ही तर्ज पर एक सेफ डिजिटल इकोसिस्टम बनाए जाने वकालत की। पीएम ने कहा कि भारत का डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और नेशनल साइबर सेक्योरिटी स्ट्रेटेजी एक सेफ डिजिटल वातावरण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को ही दर्शाता है। पीएम ने WTSA से अपील की वो ऐसे मानक बनाएं जो भविष्य को देखते हुए सेफ और समावेशी हो, इसमें एथिकल एआई और डेटा प्राइवेसी स्टैंडर्ड भी शामिल होने चाहिए।

पीएम ने भारत की टेलीकॉम और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर यात्रा के बारे में विस्तार से बात करते हुए कहा कि जहां तक टेक्नोलॉजी और टेलीकॉम की बात है, भारत आज की दुनिया में सबसे happening देशों की कैटेगरी में है। उन्होंने कहा कि भारत में 120 करोड़ मोबाइल फोन यूजर्स, 95 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं । इसके साथ ही पूरी दुनिया के 40 फीसदी वित्तीय लेन देन होता है। उन्होंने कहा कि भारत ने ये दिखा दिया है कि आखिरी व्यक्ति तक पब्लिक सेवाओं का लाभ पहुंचाने के लिए डिजिटल कनेक्टिविटी एक अहम हथियार की तरह साबित हो सकता है। पीएम ने कहा WTSA दुनिया कंसेसस यानि आम सहमति के जरिए एंपावर करती है तो इंडिया मोबाइल कांग्रेस दुनिया को कनेक्टिविटी के जरिए जोड़ती है ।

उन्होंने कहा संघर्षों से जूझ रही दुनिया को कनेक्टिविटी और कंसेंसस दोनों को की ही जरूरत है। इस दौरान पीएम ने जी 20 का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा ही वन अर्थ, वन फैमिली और वन फ्यूचर का संदेश दिया है। इसीलिए मौजूदा हालात में WTSA और IMC की साझेदारी एक बेहतरीन संदेश है जहां लोकल और ग्लोबल की कड़ियां आपस में जुड़ जाती हैं और इससे सिर्फ एक देश को नहीं बल्कि पूरी दुनिया को फायदा पहुंचता है। प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि भारत डीपीआई के क्षेत्र में अपने अनुभव दूसरे देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है।

भारत की मोबाइल यात्रा का जिक्र करते हुए पीएम ने कहा कि 21वीं सदी का ये सफर दुनिया गौर से देख रही है। पहले टेलीकॉम दुनिया के लिए सिर्फ एक सुविधा के तौर पर देखा जाता था लेकिन टेलीकॉम महज कनेक्टिविटी का जरिया नहीं है। भारत में ये समानता और अवसर का माध्यम भी है। पीएम ने कहा कि टेलीकॉम बतौर मीडियम गांवों और शहरों के बीच के गैप को कम करने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि दस साल पहले जब उन्होंने डिजिटल इंडिया की संरचना सामने रखी थी, तब कहा था कि इसे लेकर एक संपूर्ण अप्रोच रखनी होगी। भारत के टेलीकॉम सेक्टर में बदलाव की बात करते हुए पीएम ने कहा कि भारत ने हजारों मोबाइल टावर बनाए हैं , जिनमें आदिवासी, पहाड़ी और बॉर्डर के इलाके भी शामिल हैं।

उन्होंने टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर का जिक्र करते हुए कहा कि रेलवे स्टेशन पर वाई फाई लगाया गया है तो अंडमान निकोबार जैसे इलाकों को अंडरसी केबल से जोड़ा गया है। उन्होंने ऑप्टिकल फाइबर के क्षेत्र में प्रगति पर लिखा कि महज 10 सालों में भारत ने धरती और चांद के बीच की दूरी का आठ गुना ज्यादा ऑप्टिकल फाइबर लगाया गया है। 5 जी को लेकर भारत की कनेक्टिविटी पर पीएम ने कहा कि दो साल पहले लांच गया फाइव जी अब हर जिले से कनेक्टेड है, जिसकी वजह से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा 5 जी मार्केट बन गया और भारत अब तेजी से 6जी टेक्नोलॉजी की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।

टेलीकॉम के रिफॉर्म्स के बारे में बात करते हुए पीएम ने जोर देकर कहा कि प्रति जीबी इंटरनेट डेटा का खर्च भारत में 12 सेंट जितना है जबकि दूसरे कई देशों में एक जीबी डेटा 10 से 20 गुना ज्यादा महंगा है। ऐसे में एक औसतन भारत हर महीने में 30 जीबी डेटा का इस्तेमाल करता है। इस के अलावा पीएम मोदी ने डिजिटल टेक्नोलॉजी के लोकतांत्रिक करण का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने ऐसे डिजिटल प्लैटफॉर्म्स बनाए जिन्होंने कई लाख अवसरों का रास्ता खोला, इस दौरान उन्होंने जनधन और आधार का भी जिक्र किया। यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस के बारे में बात करते हुए पीएम ने कहा कि कई कंपनियों को कई अवसर दिए हैं । पीएम ने कहा कि कोविड के वक्त इन डिजिटल प्लैटफॉर्म ने गाइडलाइंस, वैक्सीनेशन और वैक्सीन सर्टिफिकेट में जिस तरह कम्युनिकेशन के जरिए मदद की, वो जगजाहिर है। पीएम ने इस दौरान WTSA में वीमेन नेटवर्क के महत्व पर बात करते हुए मोदी सरकार की वीमेन लेड डेवलपमेंट मुहिम के बारे में बात की .पीएम ने कहा कि भारत में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के जरिए महिलाओं को एंपावर किया गया है, उन्होंने इस दौरान नमो ड्रोण दीदी से लेकर बैंक सखी प्रोग्राम का भी जिक्र किया।

 

डिजिटल अरेस्ट जैसे मुद्दे पर क्या बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल अरेस्ट जैसे मुद्दे पर एक बड़ा बयान दे दिया है! देश में डिजिटल अरेस्ट के मामले इन दिनों तेजी से बढ़ रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट के जरिए साइबर ठग आसानी से लोगों को अपना शिकार बना लेते हैं। कई लोग इसमें फंसकर अपने मेहनत की कमाई गंवा भी चुके हैं। हालांकि, पुलिस और सरकार की ओर से लगातार डिजिटल अरेस्ट से बचने को लेकर कई सुझाव सामने आते रहते हैं। फिर भी इन मामलों में लगाम लगती नहीं दिख रही। ऐसे में अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को इस संबंध में आगाह किया। उन्होंने एक वीडियो क्लिप के जरिए बताया कि कैसे साइबर अपराधी डिजिटल अरेस्ट के जरिए लोगों को ठगते हैं। पीएम मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 115वें संस्करण में लोगों को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर होने वाले धोखाधड़ी के प्रति आगाह किया। पीएम मोदी ने बताया कि जांच एजेंसियां इस मुद्दे से निपटने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ के शिकार लोगों में हर वर्ग और हर उम्र के लोग शामिल हैं। डर के कारण लोगों ने अपनी मेहनत से कमाए लाखों रुपए गंवा दिए हैं। अगर आपके पास भी कभी ऐसा कोई फोन आए तो आपको डरना नहीं चाहिए। उसे पेनल्टी या जुर्माना देना होगा। डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा शब्द है जो कानून में नहीं है। लेकिन, अपराधियों के इस तरह के बढ़ते अपराध की वजह से इसका उद्भव हुआ है।पीएम मोदी ने लोगों को आगाह करते हुए कहा कि आपको पता होना चाहिए कि कोई भी जांच एजेंसी कभी भी फोन कॉल या वीडियो कॉल पर इस तरह की पूछताछ नहीं करती है।

पीएम मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ के 115वें एपिसोड में बताया कि कैसे डिजिटल अरेस्ट से बचा जा सकता है। पीएम मोदी ने इस दौरान धोखाधड़ी करने वालों के तौर-तरीकों को दिखाते हुए एक वीडियो क्लिप भी दिखाया। उन्होंने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाले धोखाधड़ी से सावधान रहें। कानून के तहत डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। कोई भी सरकारी एजेंसी इस तरह की किसी जांच के लिए आपसे कभी भी फोन या वीडियो कॉल के जरिए संपर्क नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि धोखाधड़ी करने वाले खुद को पुलिस, CBI, नारकोटिक्स और कभी-कभी RBI के अधिकारी बताते हैं। इस तरह के विभिन्न नामों का इस्तेमाल करके, वे बहुत आत्मविश्वास के साथ नकली अधिकारियों बनकर आपसे बात करते हैं। अकसर लोग उनके झांसे में आ जाते हैं। पीएम मोदी ने लोगों से साइबर घोटालों के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने का आग्रह किया। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में स्कूलों और कॉलेजों से इस संबंध में जागरूकता अभियान चलाने की अपील भी की।

पीएम मोदी ने इस दौरान डिजिटल अरेस्ट से सुरक्षित रहने के लिए इन 3 चरणों का पालन करने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी कॉल या वीडियो कॉल आए तो रुकें, सोचें तब कार्रवाई करें। जल्दबाजी में कोई कदम न उठाएं। अपनी व्यक्तिगत जानकारी न दें। सबसे पहले, शांत रहें और घबराएं नहीं। हो सके तो रिकॉर्ड करें या स्क्रीन रिकॉर्डिंग करें। दूसरा, याद रखें कि कोई भी सरकारी एजेंसी ऐसे आपको फोन या ऑनलाइन धमकी नहीं देगी। तीसरा, राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन से जुड़ने के लिए 1930 पर कॉल करके कार्रवाई करें! परिवार के सदस्यों और पुलिस को भी ऐसे अपराध की जानकारी दें। इस मामले से जुड़े सबूत सुरक्षित रखें।

डिजिटल अरेस्ट में किसी शख्स को ऑनलाइन माध्यम से डराया जाता है कि वह सरकारी एजेंसी के माध्यम से अरेस्ट हो गया है। उसे पेनल्टी या जुर्माना देना होगा। डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा शब्द है जो कानून में नहीं है। लेकिन, अपराधियों के इस तरह के बढ़ते अपराध की वजह से इसका उद्भव हुआ है। पिछले तीन महीने में दिल्ली-एनसीआर में 600 मामले ऐसे आए हैं, जिनमें 400 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई है। इसके अलावा कई सारे अन रिपोर्टेड मामले होते हैं। कई ऐसे मामले भी आते हैं जिसमें ठगी करने की कोशिश करने वाले सफल नहीं हो पाते हैं। डिजिटल अरेस्ट‘ के शिकार लोगों में हर वर्ग और हर उम्र के लोग शामिल हैं। डर के कारण लोगों ने अपनी मेहनत से कमाए लाखों रुपए गंवा दिए हैं। अगर आपके पास भी कभी ऐसा कोई फोन आए तो आपको डरना नहीं चाहिए।डिजिटल अरेस्ट के संगठित गिरोह का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है, जिसकी वजह से डिजिटल अरेस्ट के मामले बढ़ते जा रहे हैं।