Friday, March 20, 2026
Home Blog Page 503

क्या हमास के सैन्य प्रमुख की हत्या के बाद अब शांति आ सकती है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमास के सैन्य प्रमुख की हत्या के बाद अब शांति आ सकती है या नहीं! जब पश्चिम एशिया ईरान पर संभावित इजरायली हमले के समय को लेकर चर्चा कर रहा था, उसी समय हमास के सैन्य प्रमुख याह्या सिनवार की हत्या कर दी गई। यह कुछ लोगों के लिए आश्चर्य की बात थी। लेकिन, हमास और हिजबुल्लाह के लगभग सभी नेताओं की एक-एक करके हत्याओं के बाद, कई लोगों को यह भी उम्मीद थी कि हफ्तेभर पहले मारे गए इस्माइल हानिया के बाद हमास में दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति सिनवार को भी खत्म कर दिया जाएगा। बेशक इस बात की संभावना है कि सिनवार की मौत संयोग से हुई हो। हालांकि इजरायल सिनवार की हत्या को एक बड़ी सैन्य सफलता के रूप में पेश कर रहा है। वहीं कुछ इजरायली सूत्रों का कहना है कि उसकी मौत एक सुनियोजित हत्या नहीं थी, बल्कि जमीन पर सैन्य यूनिट्स के बीच एक आकस्मिक मुठभेड़ का परिणाम थी। इजरायल के पीएम नेतन्याहू ने सिनवार की हत्या को एक नए फेज के रूप में बताया, जिसके बाद गाजा पर हमास का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। नेतन्याहू ने कहा, ‘सिनवार की मौत के साथ, हमने बुरी ताकतों को झटका दिया है, लेकिन हमारा मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है।’ इजरायल के विदेश मंत्री कैट्ज ने हत्या की तारीख को 7 अक्टूबर के हमास हमले की पहली वर्षगांठ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ‘सिनवार, जिसने 7 अक्टूबर के नरसंहार में अहम भूमिका निभाई थी, उसको एक साल बाद इजरायली सैन्य बलों ने मार गिराया।’ इस हत्या पर अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन ने भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘यह अमेरिका और इजरायल के लिए एक अच्छा दिन है, इजरायल के लिए राहत का क्षण है।’ उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने कहा कि ‘न्याय हुआ है।’

हमास के भीतर, सिनवार की मृत्यु पर दुख व्यक्त किया गया। हमास समर्थक किए गए पोस्ट में कहा गया कि ‘सिनवार अच्छी तरह से जानता था कि वह बिस्तर पर नैचुरल मौत नहीं मरेगा। वह अपने हथियार के साथ लड़ते हुए मर गया, जैसा कि वो करना चाहता था। इस बीच, ईरान की सेना ने अपने @IRIran_Military हैंडल से X पर पोस्ट किया। सिनवार को लेकर ये पोस्ट किया गया। इसमें कहा गयाकि ‘कमांडर याह्या सिनवार: मैंने इमाम अली के इस वाक्य को अच्छी तरह से याद कर लिया है, जिसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति के जीवन में दो दिन होते हैं। एक दिन जब मौत आपकी नियति नहीं होती है, और एक दिन जब मौत आपकी नियति होती है। पहले दिन, कोई भी आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकता है, और दूसरे दिन, कोई भी आपको बचा नहीं सकता है।’

सिनवार, जिसका ‘कोडनेम’ अबू इब्राहिम था। उसे इजरायल ने दक्षिणी गाजा के खान यूनिस शरणार्थी शिविर में उसके जन्मस्थान के बाद ‘खान यूनिस का कसाई’ कहा था। हमास के राजनीतिक प्रमुख इस्माइल हनीयेह की तेहरान में हत्या के बमुश्किल 10 हफ्ते बाद मारा गया। हमास की सैन्य शाखा का संस्थापक, 62 वर्षीय सिनवार करीब 22 साल इजरायली जेलों में रहा। वह 2011 में एक अपहृत इजरायली सैनिक के बदले कैदी की अदला-बदली में 1,026 फिलिस्तीनियों के साथ रिहा हुआ। इजरायल के साथ कथित तौर पर सहयोग करने वाले फिलिस्तीनियों को कठोर सजा देने के लिए पहचाना जाने वाला सिनवार 2017 में गाजा में हमास का नेता चुना गया था। वो ‘वास्तविक शासक’ था और हनीयेह के बाद हमास में दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था।

सिनवार की मौत निस्संदेह हमास को कमजोर करेगी, और संगठन चलाने क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। लेकिन कोई भी यह उम्मीद नहीं करता कि हमास की सैन्य गतिविधियां पूरी तरह से बंद हो जाएंगी। ऐसा कहा जाता है कि सिनवार की मौत ने एक शून्य पैदा कर दिया है, जो न केवल हमास की आंतरिक संरचना को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पश्चिम एशिया में इजरायल विरोधी आंदोलनों के भविष्य को भी प्रभावित कर रहा है। क्षेत्रीय गठबंधनों का पुनर्गठन और इजरायल-फिलिस्तीनी संघर्ष की रफ्तार को फिर से आकार देने की उम्मीद की जा सकती है।

सिनवार की जगह लेने के लिए संगठन के भीतर खोज ने हमास की राजनीतिक शाखा की भूमिका पर जोर दिया है। हमास के अंतरिम नेता खालिद मशाल, वास्तव में, अधिक प्रभावशाली बन सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, शांति प्रक्रिया और इजरायल के साथ बातचीत में तेजी से परिणाम मिलने की संभावना है। यह गाजा में शांति की दिशा में ठोस कदम उठाने का अवसर है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस हत्या ने युद्ध विराम और शत्रुता को शांत करने की उम्मीद जगाई है। हालांकि, ऐसी घटनाएं अक्सर कुछ समय में तनाव बढ़ा सकती हैं, जिससे नए संघर्ष शुरू हो सकते हैं।

यह देखते हुए कि इजरायल के साथ बातचीत के पक्ष में रहने वाले हनीयेह की भी तेहरान में हत्या कर दी गई थी, यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि खालिद मशाल को अगला निशाना बनाया जा सकता है। इजराइल, ईरान या अमेरिका? ये हत्याएं वास्तव में किसके पक्ष में हैं, यह एक और सवाल है। हालांकि यह सच है कि हमास और हिज्बुल्लाह के हर प्रमुख व्यक्ति की हत्या शांति की उम्मीद जगाती है, लेकिन हमें अमेरिकी चुनावों के बाद या जनवरी तक, अगर ट्रंप चुने जाते हैं, तब तक किसी सफलता के बारे में आशावादी नहीं होना चाहिए।

सिनवार की मौत के साथ, फतह निस्संदेह राजनीतिक संघर्ष में और अधिक प्रमुख हो जाएगा, जो अब तक फिलिस्तीनियों के बीच नैरेटिव से बाहर हो गया है। यह संभावित रूप से फिलिस्तीनी आंदोलन को शांति के मार्ग पर वापस ला सकता है। यासर अराफात की ओर से स्थापित और फिलिस्तीनी प्राधिकरण को नियंत्रित करने वाली इस पार्टी की अंतर्राष्ट्रीय वैधता और मान्यता को और मजबूती मिलेगी। इस प्रकार, सिनवार की मौत से फतह प्रमुख महमूद अब्बास और उनका समर्थन करने वाले अरब राजतंत्रों के लिए सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि अरब राजतंत्रों को कट्टरपंथी धार्मिक समूहों और पश्चिम एशिया में ईरान के प्रतिनिधि हिज्बुल्लाह से एलर्जी है। यह कहा जाना चाहिए कि उन्होंने सिनवार की मौत का स्वागत किया। अगर ऐसा होता है, तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि कुछ महीनों में हमास एक ऐसे संगठन की तरह दिखाई देगा जिसने अपनी दुश्मनी को दफना दिया है और अनिश्चित काल के लिए सो गया है। बेशक, उनके संघर्ष की आग पूरी तरह से बुझ नहीं पाएगी।

 

ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई को ड्रोन से खत्म करना चाहता है इस्राइल ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस्राइल ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई को ड्रोन से खत्म करना चाहता है या नहीं! इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान से उसके 200 मिसाइल हमलों का बदला ले ही लिया। इजरायल की डिफेंस फोर्सेंज (IDF) ने कहा है कि वो ‘ईरान के सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले’ कर रही है। उसने यह भी कहा है कि ‘दुनिया के किसी भी दूसरे संप्रभु राष्ट्र की तरह इजरायल के पास जवाब देने का अधिकार है और ये उसका कर्तव्य है।’ वहीं, ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया है कि राजधानी तेहरान में कई धमाकों की आवाजें सुनी गई हैं। आईडीएफ़ के प्रवक्ता डेनियल हगारी का कहना है कि 7 अक्टूबर, 2023 के बाद ‘ईरान में मौजूद शासन और क्षेत्र में मौजूद उसके साथियों ने इजरायल पर लगातार हमले किए हैं।’ माना जा रहा है कि इन हमलों के पीछे हर्मीस 900 हत्यारे ड्रोन का भी हाथ हो सकता है। खुद ईरान की सेना ने कहा है कि इजरायल ने ज्यादातर हमले ड्रोन से किए हैं। जानते हैं डेथ ड्रोन 900 के बारे में। ईरान पर इजरायली हमले के बाद पीएमओ ऑफिस की ओर तस्वीर शेयर की गई है। इसमें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक बंकर में रक्षा मंत्री और आईडीएफ के जनरलों के साथ मीटिंग करते दिख रहे हैं। सूत्रों से जानकारी के मुताबिक यह बंकर तेल अवीव में किरिया मिलिट्री बेस का है।

इससे पहले ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई ने अपने सैन्य अफसरों से इजरायल का हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहने को कहा है। माना जा रहा है कि इजरायल का अगला कदम खामनेई को निशाना बनाने का हो सकता है। इजरायल ने हमास, हिजबुल्लाह के बाद अब ईरान की लीडरशिप को निशाना बनाने की तैयारी कर ली है। ऐसे में खामेनेई भी अगला निशाना हो सकते हैं। दरअसल, हर्मीस 900 ड्रोन एकदम सटीक निशाना बना सकते हैं। हालांकि, इस पर कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। खामनेई सोए ही थे कि जब इजरायली हमले हुए।

इजरायल डिफेंस फोर्सेस (IDF) के पास एक बेहद अनूठा और खतरनाक हथियार आया है। इसका नाम है हर्मीस 900 ड्रोन। इसे कोशेव या द स्टार भी कहा जा रहा है। ‘डिफेंस प्रोक्योरमेंट इंटरनेशनल’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस ड्रोन का निशाना इतना सटीक है कि अगर एक चलती कार में चार लोग हैं और सिर्फ ड्राइवर को निशाना बनाना है तो यह ड्राइवर को ही खत्म करेगा। बाकी पैसेंजर्स को हमले से कोई नुकसान नहीं होगा। हर्मीस 900 इजरायल के आसमान को महफूज बनाएगा। इसे हर्मीस 400 का ही अपडेटेड वर्जन बताया जा रहा है। हर्मीस 900 को हिब्रू में कोशेव या द स्टार कहा गया है। ये कई तरह के गाइडेड बम ले जा सकता है। यह एक बार में 30 घंटे उड़ान भर सकता है। 500 किलोग्राम वजन ले जा सकता है। यह HD ऑप्टिकल सेंसर्स से लैस होता है। इसके अलावा, इसमें स्पेशल एरियल सर्विलांस सिस्टम और पिन पॉइंट लेजर टारगेट मार्कर्स भी होते हैं।

माना जाता है कि इजरायल ने हमास और हिजबुल्लाह की कमर इसी डेथ ड्रोन से तोड़ी थी। IDF की ग्राउंड ऑपरेशन फोर्स और नेवी को यह बिल्कुल सटीक टारगेट और लोकेशन बताएगा। अगर इनके लिए टारगेट दूर रहा तो यह हर्मीस 900 खुद टारगेट हिट करेगा। हर्मीस 900 के सभी कैमरे रियल टाइम कवरेज करेंगे। कंट्रोल रूम पामचिन एयरबेस पर बनाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 20 दिसंबर, 2014 को इजरायल ने गाजा में पहली बार इसका इस्तेमाल किया। कंट्रोल रूम में सिर्फ दो पायलट (ऑपरेटर) मौजूद रहेंगे। यह आखिरी सेकेंड में भी बम का डायरेक्शन बदल सकते हैं। इसके कैमरे कभी बंद नहीं होंगे। हर्मीस का पहला ड्रोन 2012 में आया था। इ इसमें मिसाइलें भी इस्तेमाल की जा सकती हैं।

इसी साल, 2 फरवरी को शेफर्ड मीडिया की रिपोर्ट में बताया गया था कि इजरायल ने अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड से 20 भारतीय निर्मित हर्मीस 900 ड्रोन की डिलीवरी ली थी। इस रिपोर्ट के बाद में भारत में काफी विवाद हुआ था। हालांकि, किसी ने यह बात स्वीकार नहीं की थी। अभी इजरायल अपने युद्ध को जारी रखने पर तुला हुआ है। वजह यह है कि वो महसूस करता है कि वो अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने टिका रह सकता है। वह जो भी खतरे हैं, उसे मिटा देना चाहता है। इजरायल ने हमास प्रमुख की हत्या कर दी जब वो तेहरान में ईरान के मेहमान था। इसने हसन नसरल्लाह समेत हिज़्बुल्लाह के पूरे नेतृत्व को ख़त्म कर दिया। इसने सीरिया में राजनयिक इमारत में मौजूद ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या कर दी। कहा जा रहा है कि इजरायल का प्लान अभी दुश्मनों के खिलाफ ऑपेरशन को रोकने की नहीं है।

 

आखिर क्या है सिंथेटिक ड्रग जो बन गया है पूरे विश्व के लिए खतरा?

आज हम आपको सिंथेटिक ड्रग के बारे में जानकारी देने वाले हैं जो पूरे विश्व के लिए खतरा बन चुका है! पिछले कुछ सालों में भारत सहित पूरे विश्व में सिंथेटिक ड्रग सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है। इसकी चपेट में विश्व के लाखों लोग आ रहे हैं। खासक युवा पीढ़ी। इंटरनेट ने ड्रग्स प्राप्त करने और यहां तक कि इस्तेमाल करने के तरीके को बदल दिया है। कुछ बटनों के क्लिक से, ये बेहद खतरनाक ड्रग लोगों को आरम से मिल रहे हैं और ड्रग माफिया अब आर्गेनिक ड्रग के कारोबार से निकलर सिंथेटिक ड्रग की ओर शिफ्ट हो गये हैं। चूंकि सिंथेटिक ड्रग को पैदा करना आसान है और इसके पैदवार के लिए खेती या दूसरे संसाधनों की जरूरत उतनी नहीं पड़ती है,अभी सबसे अधिक इसका प्रसार है। इस ड्रग के प्रसार को रोकने के लिए विश्व के तमाम देशों को साझा लड़ारई लड़नी होगा। भारत भी इसकी चपेट में आ रहा है और इस ख्रतरे से बचने के लिए भारत-अमेरिका को साझा ऑपरेशन और नीति बनाने की जरूरत है। भारतीय मूल के डॉक्टर राहुल गुप्ता अमेरिका में नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी के डायरेक्टर हैं। डॉ. राहुल, व्हाइट हाउस ऑफिस ऑफ नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी का नेतृत्व करने वाले पहले डॉक्टर हैं। वे बाइडेन प्रशासन के साथ ग्लोबल स्तर पर ड्रग के प्रसार के रोकथाम के लिए बन रहे ग्लोबल नीति और एक्शन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अभी वह भारत दौरे पर हैं जिसमें उन्होंने भारत-अमेरिका के बीच ड्रग की रोकथाम के लिए बने एक्शन प्लान और भविष्य की रणनीति पर विचार मंथन किया। दरअसल दोंनों देशों में हाल में ड्रग की मिली अरबों की खेप बड़ी चिंता के रूप में उभरी है। राहुल गुप्ता ने कहा कि अभी पिछले दिनों दिल्ली में 900 किलो की कोकीन की जो बड़ी खेप बरामद की गई थी वह दोनों देशों के संयुक्त ऑपरेशन और इनपुट की मदद से सफल हुआ।

खास बातचीत में डॉ राहुल गुप्ता ने कहा कि भारत में नरेन्द्र मोदी की गुवाई वाली केंद्र सरकार ने भी ड्रग की रोकथाम में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं और अमेरिका भारत के नशा मुक्त अभियान में हर स्तर पर भारत को मदद देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि हाल में भारत में जो ड्रग की बड़ी तादाद पकड़ में आई उसमें भी दोनों देश आगे की जांच मिल कर रहे हैं। पिछले साल जुलाई में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने सिंथेटिक ड्रग खतरों से निपटने के लिए एक ग्लोबल गठबंधन की शुरूआत की थी। तब से इस मामले में कई अहम पहल हुई है और डॉ राहुल गुप्ता का भारत दौरा उसी गठबंधन के परिपेक्ष में था।

उन्होंने कहा कि जिस तरह आर्गेनिक ड्रग से सिंथेटिक ड्रग की ओर पूरा कारोबार शिफ्ट हुआ वह बेहद खतरनाक ट्रेंड है और उसपर अभी काबू नहीं पाया गया तो पूरे विश्व को इसका खामियाजा भुगतना पकड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पिछले चार सालों में अमेरिका में बाइडन प्रशासन ने पूरे विश्व को इस खतरे से निबटने के लिए एक के बाद एक ऐसी कई कोशिशें की जिसका असर अब दिखने लगा है लेकिन अभी लड़ाई बाकी है। उन्होंने कहा कि इस खतरे से निपटने के लिए 155 देशों का गठनबंधन है और भारत की इसमें भूमिका ग्लोबल लीडर की है। उन्होंने कहा कि पिछली बार भारत के पीएम नरेन्द्र मोदी जब अमेरिका में थे तब दोनों देशों के बीच ड्रग की रोकथाम के लिए साझा फ्रेमवकर्क बना था। उस पर हाल के दिनों में काफी काम हुआ है। मौजूदा दौरा भी उसी फ्रेमवर्क का हिस्सा है।

अमेरिकी प्रशासन के शीर्ष अधिकारी ने कहा कि ड्रग पर नियंत्रण के लिए किये जा रहे उपाय के कई स्तर हैं। सबसे बड़ी चुनौती इसकी ट्रैफिकिंग को रोकना और फिर इससे जुड़े प्लेयर को दबोचना है। इसके लिए । काउंटर नारकोटिक्स पर दोनों देशाें का ऑपरेशन जमीन से लेकर समुद्र तक हो रहा है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि इस ड्रग की चपेट में आए लोगों के पुनर्वास,उन्हें सामाजिक मुख्यधारा में लाना भी बड़ी चुनौती है।इस ड्रग के प्रसार को रोकने के लिए विश्व के तमाम देशों को साझा लड़ारई लड़नी होगा। भारत भी इसकी चपेट में आ रहा है और इस ख्रतरे से बचने के लिए भारत-अमेरिका को साझा ऑपरेशन और नीति बनाने की जरूरत है। डॉ गुप्ता ने कहा कि इसके बिना प्रयास सफल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि चार साल पहले के आंकड़े थे कि अमेरिका में 31 फीसद मौत बढ़ी थी ड्रग ओवरडोज के कारण लेकिन इन चार सालों में इसमें 40 फीसदी कमी आयी है।

 

आखिर कैसे तूफान दाना को समाप्त किया गया?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि तूफान दाना को आखिर कैसे समाप्त किया गया! किसी आश्चर्य से कम नहीं! लोहा लोहे को काटता है, ये तो जानते ही हैं, अब ये भी जान लीजिए कि तूफान ने तूफान को काट दिया। जी हां, यूं कहें कि दो तूफानों में मिलकर साइक्लोन दाना की गला दबाकर हत्या कर दी। यह अनोखा हत्या कांड हुआ है ओडिशा में जहां जंगल ने चक्रवात दाना से लड़कर उसकी ताकत घटा दी और वह पस्त हुआ तो एंटीसाइक्लोन का शिकार हो गया। आखिरकार दो एंटीसाइक्लोन की संयुक्त शक्ति का शिकार हो गंभीर चक्रवात दाना बेमौत मारा गया। एंटीसाइक्लोन उच्च दबाव वाले क्षेत्र होते हैं। इन दोनों ने दाना को दोनों तरफ से दबा दिया और उसकी ताकत कम कर दी। चक्रवात के कारण ओडिशा में कोई जनहानि नहीं हुई। मुख्यमंत्री ने प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए टीम वर्क और भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद को श्रेय दिया। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वैज्ञानिकों ने बताया कि दो एंटीसाइक्लोन ने चक्रवात दाना को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उच्च दबाव की स्थिति में हवा की गति की विशेषता रखने वाले इन एंटीसाइक्लोन ने चक्रवाती प्रणाली के लिए एक विपरीत शक्ति के रूप में काम किया। इन्होंने चक्रवात दाना को दोनों ओर से दबाकर गला ही घोंट दिया, जिससे इसे बड़ा विनाश होने से रोका जा सका।

दो एंटीसाइक्लोन के जटिल संपर्क के अलावा ओडिशा को चक्रवात दाना के पूर्ण प्रकोप से बचाने में भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के मैंग्रोव ने भी भूमिका निभाई। गंभीर चक्रवात शुक्रवार को सुबह 1.30 बजे से 3.30 बजे के बीच भितरकनिका में एक पर्यटक शिविर के पास पहुंचा, जिसमें केंद्रपाड़ा में 209 वर्ग किमी मैंग्रोव वन सबसे अधिक प्रभावित हुआ। मौसम विभाग के वैज्ञानिक उमा शंकर दास ने बताया कि अगर एंटीसाइक्लोन नहीं होते, तो चक्रवात के आने से पहले बहुत ज्यादा बारिश होती, जिससे ओडिशा के कई केंद्रीय जिले प्रभावित होते, जबकि बड़े क्षेत्र में तेज हवाएं महसूस की जातीं। एंटीसाइक्लोन ने चक्रवात को सीमित कर दिया। उन्होंने कहा कि केवल उत्तरी ओडिशा के बालासोर, भद्रक और मयूरभंज जिलों में भारी वर्षा हुई।

मौसम विशेषज्ञों ने कहा कि अरब सागर के ऊपर एक सक्रिय एंटीसाइक्लोन के प्रभाव के कारण तूफान के बाईं ओर उत्तर-उत्तर-पश्चिम से शुष्क वायुप्रवाह का एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इसी तरह, तूफान के पूर्वी हिस्से में भी एक सक्रिय एंटीसाइक्लोन क्षेत्र मौजूद था, जिससे दाईं ओर से इसके प्रभाव का क्षेत्र कम हो गया। उन्होंने कहा कि चक्रवात दाना इन दो एंटीसाइक्लोन के बीच केंद्रित था और उत्तर की ओर बढ़ गया, जो एक छोटे से क्षेत्र में फैल गया। एंटीसाइक्लोन ने यह भी सुनिश्चित किया कि चक्रवात के मार्ग में कोई बदलाव न हो, जिससे यह अधिक अनुमानित हो गया, जिससे अधिक निश्चितता के साथ निवारक उपाय करने में मदद मिली। भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के संभागीय वन अधिकारी सुदर्शन यादव लैंडफॉल पॉइंट के पास देखे गए न्यूनतम नुकसान से चकित थे। उन्होंने कहा कि चक्रवातों के प्रभाव को कम करने में मैंग्रोव वनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

जून में ओडिशा का मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद मोहन मांझी ने पहली बड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना किया। उन्होंने कहा, ‘हमने तूफान से एक भी मौत नहीं होने के लक्ष्य को हासिल कर लिया। उन्होंने बताया कि सरकार ने लगभग छह लाख लोगों को निकाला था, जिसमें वो खुद व्यक्तिगत रूप से देर रात विशेष राहत आयुक्त के कार्यालय के नियंत्रण कक्ष में स्थिति की निगरानी कर रहे थे।आईएमडी भुवनेश्वर की निदेशक मनोरमा मोहंती ने कहा कि जब चक्रवात तट को पार कर गया तो 110 किमी से 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलीं और भारी बारिश हुई। हवा की गति घटकर 60 से 80 किमी प्रति घंटे रह गई। उन्होंने बताया, ‘यह कमजोर होकर डिप्रेशन में बदल गया और ओडिशा के कई उत्तरी जिलों में भारी बारिश जारी है। शनिवार तक बारिश की गतिविधियां कम हो जाएंगी।’

खगोलीय ज्वार से एक से दो मीटर ऊंची अधिकतम तूफानी लहरों ने ओडिशा के केंद्रपाड़ा और भद्रक जिलों के निचले इलाकों को जलमग्न कर दिया। कई पेड़ उखड़ गए और तेज हवाओं और भारी बारिश से कच्चे मकान क्षतिग्रस्त हो गए। भद्रक जिले के चांदबाली में शुक्रवार को सुबह 8.30 बजे बारिश समाप्त हुई। बीत 24 घंटों में वहां सबसे अधिक 158.6 मिमी बारिश दर्ज की गई। वहीं, केंद्रपाड़ा, भद्रक और मयूरभंज जिलों में सात अन्य स्थानों पर इस दौरान 100 मिमी से अधिक बारिश दर्ज की गई। मौसम विभाग ने दाना के टकराने के बाद अगले 24 घंटों के लिए बालासोर, भद्रक और मयूरभंज जिलों में भारी बारिश के लिए रेड अलर्ट जारी किया।

केंद्रपाड़ा जिले के बांकुअल गांव की रहने वाली 82 वर्षीय बुजुर्ग महिला हेमावती नायक की गुरुवार रात राजनगर प्रखंड के एक चक्रवात आश्रय में मृत्यु हो गई। प्रखंड विकास अधिकारी निशांत मिश्रा ने कहा, ‘मौत का चक्रवात से कोई लेनादेना नहीं था।’ दावा किया जा रहा है कि बुजुर्ग को दिल का दौरा पड़ा था।

 

वायु प्रदूषण के लिए पंजाब और हरियाणा को क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण के लिए पंजाब और हरियाणा को फटकार लगा दी है! देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम में संशोधन करके सरकार ने इसे ‘दंतहीन’ बना दिया है। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में जलती पराली से होने वाले प्रदूषण के खिलाफ केंद्र कोई कठोर कार्रवाई नहीं कर रहा। सिर्फ मामूली जुर्माना ही वसूला जा रहा। केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि 10 दिनों के भीतर नियमों को अंतिम रूप दे दिया जाएगा और अधिनियम को पूरी तरह से लागू किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराएंगे, क्योंकि उसने कोई व्यवस्था नहीं बनाई है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम कमजोर हो गया है। आपने धारा 15 में संशोधन करके सजा हटा दी है और उसकी जगह जुर्माना लगा दिया है। जुर्माना लगाने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा सकता है। अधिनियम की धारा 15 इसके प्रावधानों के उल्लंघन में सजा का उल्लेख करती है।

शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया कि उल्लंघन करने वालों पर लगाए जाने वाले पर्यावरण मुआवजा सेस को बढ़ाने के लिए कानून में संशोधन करे। एएसजी ने बताया कि पंजाब और हरियाणा दोनों के सचिव (पर्यावरण) और अतिरिक्त मुख्य सचिव (कृषि) को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। एएसजी ने ये भी कहा कि 10 दिनों के भीतर, धारा 15 को पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल खड़े हुए कहा कि अगर ये राज्य सरकारें और केंद्र वास्तव में पर्यावरण की रक्षा के लिए तैयार होते, तो धारा 15 में संशोधन से पहले ही सब कुछ हो गया होता। यह सब राजनीति है, और कुछ नहीं। झूठा बयान क्यों दिया कि किसानों के लिए ट्रैक्टर और डीजल के लिए केंद्र सरकार से पैसे का अनुरोध किया गया है। हम अवमानना का मामला चलाएंगे। हम आपको नहीं छोड़ेंगे।बुधवार को राष्ट्रीय राजधानी में हवा की गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई, कई इलाकों में तो यह ‘गंभीर’ श्रेणी में भी पहुंच गई। सर्दियों की शुरुआत में, हरियाणा और पंजाब में जलती पराली को दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में वृद्धि के लिए एक बड़ा कारण माना जाता है।

पराली जलाने पर लगने वाले जुर्माने को लेकर कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा की खिंचाई की। शीर्ष अदालत ने पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के पंजाब और हरियाणा के प्रयासों को ‘सिर्फ दिखावा’ बताकर खारिज कर दिया। पिछली सुनवाई में, शीर्ष अदालत ने पराली जलाने पर प्रतिबंध का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए पंजाब और हरियाणा को फटकार लगाई थी। शीर्ष अदालत ने गौर किया कि पंजाब सरकार ने पराली जलाने वालों पर एक भी मुकदमा दर्ज नहीं किया है। कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव को पंजाब के महाधिवक्ता को झूठा बयान देने के लिए भी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि आपको जवाब देना होगा कि आपने पंजाब के महाधिवक्ता को झूठा बयान क्यों दिया कि किसानों के लिए ट्रैक्टर और डीजल के लिए केंद्र सरकार से पैसे का अनुरोध किया गया है। हम अवमानना का मामला चलाएंगे। हम आपको नहीं छोड़ेंगे।

इस पर, पंजाब की ओर से पेश हुए वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे और सख्त कार्रवाई करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने वाले किसानों से मात्र 2,500 रुपये का जुर्माना वसूलने के लिए भी पंजाब की आलोचना की। राज्य ने कहा कि यह राशि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) द्वारा तय की गई थी। अदालत ने कहा कि इतनी कम राशि देकर किसानों को उल्लंघन का अधिकार दे रहे हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराएंगे, क्योंकि उसने कोई व्यवस्था नहीं बनाई है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम कमजोर हो गया है। आपने धारा 15 में संशोधन करके सजा हटा दी है और उसकी जगह जुर्माना लगा दिया है। जुर्माना लगाने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा सकता है। अधिनियम की धारा 15 इसके प्रावधानों के उल्लंघन में सजा का उल्लेख करती है। यह अविश्वसनीय है। आप उल्लंघन करने वालों को यह संकेत दे रहे हैं कि उनके खिलाफ कुछ भी नहीं किया जाएगा। पिछले तीन सालों से यही हो रहा है। इस मामले पर दिवाली की छुट्टी के बाद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा।

 

आखिर क्या हो सकता है वायु प्रदूषण का हल?

आज हम आपको वायु प्रदूषण का हल बताने जा रहे हैं! कई वैज्ञानिको ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के गंभीर मुद्दे पर चिंता तो जाहिर की, लेकिन अगले पांच वर्षों में वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार के लिए आठ सूत्रीय रोडमैप भी दिया है। उन्होंने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) जैसे उपायों के पीछे की सोच पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि प्रदूषण के खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने पर ऐसे उपाय करके लीपापोती होती है, कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि अपशिष्ट प्रबंधन, खुले में जलाने पर रोक, प्रदूषण कानूनों को लागू करना, यातायात का प्रबंधन और सड़कों और निर्माण स्थलों पर धूल को दबाने जैसी क्रियाएं नियमित अभ्यास होनी चाहिए। वे वायु प्रदूषण के मूल कारणों बायोमास और कोयले का व्यापक उपयोग, भूमि क्षरण से उड़ती धूल आदि पर प्रकाश डालते हुए इनसे निपटने के लिए एक क्षेत्रीय कार्य योजना की आवश्यकता पर जोर देते हैं। उन्होंने ये आठ बेहद प्रभावी रणनीतियां बताई हैं जिन्हें अपनाकर वायु प्रदूषण के खतरे से बचा सकता है!

लेखक अपनी पिछली स्टडी का हवाला देते हुए कहते हैं कि पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के कारण वायु प्रदूषण में जितनी कमी आई, उससे ज्यादा किसी और उपाय से नहीं आई। दिल्ली-एनसीआर में खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन तक पहुंच का विस्तार करने से पीएम2.5 के स्तर को 25% तक कम किया जा सकता है। यह उद्देश्य हासिल करने के लिए पीएम उज्ज्वला योजना का 3.0 की जरूरत है जिसमें घर-घर एलपीजी या बिजली की पहुंच सुनिश्चित की जाए।रिसर्च से पता चलता है कि विशेष रूप से कम आय वाले परिवारों में एलपीजी का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए 75% सब्सिडी की जरूरत है। इस पर सरकार को सालाना लगभग 5 से 6 हजार रुपये प्रति परिवार खर्च की आवश्यकता होती है। दिल्ली-एनसीआर में इस पहल पर प्रति वर्ष लगभग 6 से 7 हजार करोड़ खर्च होंगे। इससे कई गुना तो जहरीली हवा से हुईं गंभीर बीमारियों के इलाज पर खर्च हो जाता है। सरकार ने ऐसा किया तो यह बहुत ही गरीब और महिला समर्थक पहल होगी, खासकर यह देखते हुए कि लगभग 6 लाख भारतीय हर साल घर के अंदर के वायु प्रदूषण के कारण बेवक्त मर जाते हैं जिनमें महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा होती है।

पूरे भारत के 90% से अधिक घरों में सर्दियों के दौरान गर्मी प्राप्त करने के लिए बायोमास और ठोस ईंधन का उपयोग होता, जो दिसंबर और जनवरी में प्रदूषण की स्थिति में योगदान करते हैं। चीन की महत्वपूर्ण वायु गुणवत्ता पहलों में से एक राष्ट्रीय स्वच्छ ताप ईंधन नीति थी। इसी तरह की दीर्घकालिक योजना विकसित करना आवश्यक है। इसे देखते हुए फिलहाल दिल्ली सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि सर्दियों में हीटिंग के लिए केवल बिजली का उपयोग किया जाए और खुले में जलाने पर सख्त प्रतिबंध लागू किया जाए। इससे दिल्ली की वायु गुणवत्ता में तेजी से सुधार होगा। पराली जलाने पर अंकुश लगाने से सर्दियों के महीनों में गंभीर और खतरनाक वायु प्रदूषण के दिनों की घटनाओं में कमी आएगी। इसके लिए छोटी और लंबी दोनों तरह की रणनीतियों की जरूरत है। दीर्घावधि में, पंजाब, हरियाणा और यूपी के कुछ हिस्सों में कृषि को गहन चावल-गेहूं की खेती से विविध फसल प्रणाली में बदलना चाहिए। अल्पावधि में, प्रौद्योगिकी और प्रोत्साहन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सबसे सरल तकनीकी समाधान कंबाइन हार्वेस्टर को संशोधित करना या अनिवार्य करना है जो मैन्युअल कटाई की तरह जमीन के करीब कटते हैं, जिससे न्यूनतम पराली निकलती है। हरियाणा सरकार पराली जलाने से रोकने को लिए किसानों को प्रति एकड़ ₹1,000 की प्रोत्साहन राशि देती है। फिर भी किसान पराली जलाए तो उस पर जुर्माना लगाने के साथ-साथ सरकारी योजनाओं से वंचित करने का दंड दिया जाए। इस योजना पर सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ खर्च होंगे।

इलेक्ट्रॉनिक वीइकल्स के उपयोग को बढ़ाना महत्वपूर्ण है। प्रारंभ में दोपहिया और तिपहिया वाहनों के साथ-साथ बसों के संक्रमण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए क्योंकि वे पहले से ही आर्थिक रूप से व्यवहार्य हैं। 2030 तक नए दोपहिया और तिपहिया वाहनों की बिक्री के 100% विद्युतीकरण और 2025 तक दिल्ली-एनसीआर में सभी नई बसों को इलेक्ट्रिक में बदलने का लक्ष्य, उत्सर्जन को काफी हद तक कम करेगा। इसके अतिरिक्त, कारों और अन्य वाहनों के लिए 30-50% विद्युतीकरण लक्ष्य निर्धारित करने से स्वच्छ परिवहन में परिवर्तन में तेजी लाने में मदद मिलेगी। दिल्ली और आसपास के इलाकों से धूल प्रदूषण, थार रेगिस्तान से मौसमी धूल के साथ वायु गुणवत्ता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। दिल्ली के चारों ओर एक ग्रीन बेल्ट बाहर से आने वाली धूल के खिलाफ एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में काम करेगा। इसके अतिरिक्त, स्थानीय धूल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए शहर के भीतर हरित आवरण बढ़ाना जरूरी है। इस लिहाज से सड़क किनारे और खुले स्थान पर हरियाली की व्यवस्था करने का उपाय बहुत प्रभावी होगा।

ये उपाय लागू किए जाएं तो अगले पांच वर्षों में वायु प्रदूषण को 50-60% तक कम किया जा सकता है। हालांकि, यह आसान नहीं होगा। ऐसा करने के लिए हमें लाखों घरों, किसानों और वाहन मालिकों और सैकड़ों हजारों उद्योगों के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। ऐसी कोई जादूई छड़ी नहीं है जो चुटकी बजाते ही हवा साफ कर दे। सभी हितधारकों को शामिल करते हुए केवल सिस्टमैटिक चेंज ही दिल्ली के निवासियों को आसानी से सांस लेने देंगे।

 

आखिर जम्मू कश्मीर में आतंक को कैसे खत्म करेगी भारतीय सेना?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारतीय सेना जम्मू कश्मीर में आतंक को कैसे खत्म करेगी! जम्मू-कश्मीर में बढ़ते आतंकी हमलों से निपटने के लिए सेना अब नई रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है। भारतीय सेना के उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल एम वी सुचिंद्र कुमार ने शुक्रवार को बारामूला आतंकी हमले पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हमलावरों को सीमा पार से समर्थन होने के संदेह के मद्देनजर सेना अपनी रणनीतियों पर फिर से विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि हालांकि विशिष्ट ऑपरेशनल जानकारी साझा नहीं की जा सकती है, लेकिन सेना उभरते खतरों से निपटने के लिए अपनी रणनीतियों को समायोजित कर रही है। लेफ्टिनेंट जनरल एम वी सुचिंद्र कुमार ने कहा, ‘मैं एक ऑपरेशन के बारे में जानकारी साझा नहीं करना चाहूंगा, लेकिन मैं आपको इतना बता सकता हूं कि हमने नई चुनौतियों, आतंकवादियों के तौर-तरीकों, सीमा पार से उन्हें मिल रहे समर्थन का जायजा लिया है और हम इससे निपटने के लिए रणनीति बना रहे हैं।’ भारतीय सेना युवाओं और महिलाओं को सशक्त बनाने, शिक्षा को बढ़ावा देने, खेलों को बढ़ावा देने और समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है।’ उन्होने कहा कि भारतीय सेना सामाजिक कार्यों और सैन्य अभियानों के जरिए देश को मजबूत बनाने में जुटी है। उन्होंने कहा कि इन कोशिशों से न सिर्फ लोगों से बेहतर तालमेल बना है, बल्कि जमीनी स्तर पर सैन्य अभियानों को अंजाम देने में भी मदद मिली है।

लेफ्टिनेंट जनरल एम वी सुचिंद्र कुमार ने जम्मू और कश्मीर में शांतिपूर्ण और सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए भारतीय सेना, नागरिक प्रशासन, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल के महत्व पर जोर दिया गया है। उन्होंने ‘सेवा पहले’ के सिद्धांत के प्रति सेना की प्रतिबद्धता और सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों, मानवीय सहायता, आपदा राहत और नागरिक अधिकारियों को सहायता जैसी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में एक प्रमुख सूत्रधार के रूप में इसकी भूमिका का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा, ‘राष्ट्र की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा में अपनी भूमिका के अलावा, हम इस क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों को अंजाम देने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों के सीमावर्ती और दूरदराज के इलाकों में विकासात्मक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए ऑपरेशन सद्भावना परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। हम आर्मी गुडविल स्कूलों में केंद्र शासित प्रदेशों के बड़ी संख्या में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। जम्मू और कश्मीर विशेष छात्रवृत्ति योजना और आर्मी पब्लिक स्कूल आवासीय विद्यालय कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को केंद्र शासित प्रदेशों के बाहर अध्ययन करने के लिए भी प्रायोजित किया जा रहा है, जो हमारे की ओर से संचालित किए जा रहे हैं।’

बता दे कि कांग्रेस सांसद ने आगे लिख, ‘केंद्र की NDA सरकार की नीतियां जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और शांति स्थापित करने में पूरी तरह से विफल रही हैं। उनके दावों के विपरीत, हकीकत यह है कि प्रदेश निरंतर आतंकी गतिविधियों, हमारे जवानों पर हमलों और नागरिकों की लक्षित हत्याओं के कारण खतरे के साए में जी रहा है। सरकार को तुरंत जवाबदेही लेनी चाहिए और जल्द से जल्द वादी में अमन बहाल कर सेना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।’ कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी इस आतंकी हमले की निंदा की है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट में लिखा- ‘गुलमर्ग, जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमले में दो जवानों की शहादत का समाचार अत्यंत दुखद है। हमले में दो पोर्टर ने भी जान गंवाई है। ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करें। शोक संतप्त परिवारों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं। घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करती हूं। सभ्य समाज में हिंसा और आतंकवाद अस्वीकार्य है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है।’

जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में गुरुवार को आतंकवादियों ने सेना की गाड़ी पर घात लगाकर हमला किया था। इसमें दो सेना के जवान और दो पोर्टर मारे गए। 2019 में अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर से हटाया गया था। इसके बाद यहां चुनाव हुए। कुछ वक्त पहले ही नई निर्वाचित सरकार का शपथ ग्रहण हुआ है। इसी के बाद गुरुवार को घात लगाकर आतंकियों ने बड़ी वारदात को अंजाम दिया।

गुलमर्ग में सेना की गाड़ी पर हमले से कुछ घंटे पहले, आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा स्थित त्राल इलाके में उत्तर प्रदेश के एक मजदूर को गोली मार दी थी। इसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गया। 24 अक्टूबर को कश्मीर के गांदरबल जिले में छह प्रवासी मजदूरों और एक स्थानीय डॉक्टर सहित सात लोग मारा गया था। यह क्रूर आतंकी हमला उस समय हुआ जब आतंकवादियों ने जेड-मोड़ सुरंग निर्माण स्थल पर पीड़ितों पर गोलियां चला दीं।

 

आखिर तट पर आकर ही फुस क्यों पड़ जाते हैं चक्रवर्ती तूफान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि तट पर आकर ही फुस क्यों पड़ जाते हैं आखिर चक्रवर्ती तूफान! ओडिशा में चक्रवाती तूफान दाना ने तबाही मचानी शुरू कर दी है। बीते 24 घंटों में यह तूफान 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से केंद्रपाड़ा जिले के भीतकर्णिका और भद्रक जिले के धामरा के तटों से टकराया। माना जा रहा है कि इस तूफान से ओडिशा की पूरी आबादी पर असर पड़ने की आशंका है। ओडिशा में 14 जिलों के 10 लाख लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया जाना है। तूफान का असर ओडिशा के अलावा बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों पर भी प़ड़ा है। ओडिशा में सुपर साइक्लोन की तबाही के 25 साल हो गए हैं। इस आपदा में तब 1.8 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे। 10 हजार से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। इन 25 साल में ओडिशा ने खुद को ऐसा बदला कि वह बेहतर आपदा प्रबंधन के मामले में दूसरे राज्यों के लिए नजीर साबित हो सकता है। आखिर एक छोटे से बीमारू राज्य ने खुद को कैसे बदला और किस तरह से पूरे देश के लिए रोल मॉडल बन गया। ओडिशा की वर्षों की योजना और तैयारी का फल यह मिला कि शक्तिशाली चक्रवातों से होने वाली मौतें कभी भी दोहरे अंक को पार नहीं कर पाईं। जब 2013 में चक्रवात फेलिन ओडिशा के तटों से टकराया तो ओडिशा ने दुनिया में सबसे सफल आपदा प्रबंधन प्रयासों में से एक को अंजाम दिया। सुपर चक्रवात के बाद देश में आने वाले सबसे शक्तिशाली चक्रवात से पहले करीब 10 लाख लोगों को निकाला गया। 2019 में जब एक और शक्तिशाली चक्रवात फानी आया तो ओडिशा सरकार ने उच्च स्तर की तैयारी दिखाई और इन पूर्वानुमानों के आधार पर लगभग 12 लाख लोगों को सुरक्षित निकाल लिया।

1999 में सुपर साइक्लोन के मद्देनजर ओडिशा आपदा प्रबंधन प्राधिकरण स्थापित करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया। जबकि 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की स्थापना की गई थी। ओडिशा ने सालोंसाल ऐसी आपदाओं की तैयारी की और वह आज आसानी से ऐसे तूफानों से पार पा लेता है। तूफान आने के दौरान मामूली क्षति होती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य ने स्थानीय समुदायों को प्रयास के केंद्र में रखकर आपदा प्रबंधन के पारंपरिक दृष्टिकोण को छोड़ दिया। जैसे, जमीनी स्तर के लोगों – ग्राम पंचायतों, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्वयंसेवकों के 1 लाख से अधिक कैडर को आपदा जोखिम को कम करने और बचाव और राहत कार्यों का प्रबंधन करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। हर साल जून और नवंबर में ओएसडीएमए राज्य भर में दो बड़े समुदाय आधारित मॉक ड्रिल आयोजित करता है, जिसमें कई सरकारी विभाग, जिला कलेक्टर, ग्राम पंचायत, गैर सरकारी संगठन और हजारों प्रशिक्षित स्वयंसेवक शामिल होते हैं।

ओडिशा में सभी समुद्री तटरेखा पर निकासी सड़कों के साथ 800 से अधिक बहुउद्देश्यीय चक्रवात आश्रय बनाए गए हैं। समुद्र तटीय गांवों को समुद्र के प्रवेश से बचाने के लिए तटबंध भी बनाए जा रहे हैं। कई कमजोर परिवारों को पुआल की झोपड़ियों से बने नए बहु जोखिम आपदा प्रतिरोधी घर दिए गए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ओडिशा पहला भारतीय राज्य है जिसने आपदा संबंधी जानकारी प्रसारित करने के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम बनाया है। राज्य के सभी तटीय जिलों के लगभग 1,200 गांवों को अब सायरन और सामूहिक संदेशों के जरिए चक्रवात या सुनामी की चेतावनी मिलती है। ओडिशा में तूफान की तबाही से बचाने के लिए 120 से अधिक तटीय स्थानों पर निगरानी टॉवर लगाए गए हैं। जो तूफान की शुरुआती चेतावनी देते हैं। ओडिशा के तट को समुद्री कटाव से बचाने की भी तत्काल आवश्यकता है, जिसके लिए बड़े-बड़े तटबंध बनाए जा रहे हैं।

ओडिशा के आपदा प्रबंधन मॉडल में समुदाय केंद्रित तैयारी, चक्रवातों की स्थिति में बड़े पैमाने पर निकासी के प्रयास, मॉक ड्रिल और आपदारोधी बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है। इसमें राज्य ग्राम पंचायतों, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्वयंसेवकों को शामिल किया जाता है।एक छोटे से बीमारू राज्य ने खुद को कैसे बदला और किस तरह से पूरे देश के लिए रोल मॉडल बन गया। ओडिशा की वर्षों की योजना और तैयारी का फल यह मिला कि शक्तिशाली चक्रवातों से होने वाली मौतें कभी भी दोहरे अंक को पार नहीं कर पाईं।जलवायु परिवर्तन के जोखिम के साथ ही ओडिशा अधिक तीव्र चक्रवातों, लू, बाढ़ और समुद्री कटाव के लिए तैयार है, जो आपदा जोखिम प्रबंधन को और मजबूत बनाता है। वह एडवांस्ड टेक्नोलॉजी तलाश रहा है, जो चक्रवातों या तूफानों के जोखिम को कम करता है।

 

आखिर क्यों बन चुकी है अरुगम की खाड़ी खास? जानिए!

आज हम आपको बताएंगे कि अरुगम की खाड़ी आखिर खास क्यों बन चुकी है! इजरायल ने बुधवार को अपने नागरिकों को दुनिया के कुछ पर्यटक क्षेत्रों को तुरंत छोड़ने को कहा है। इजरायल को ऐसे इनपुट मिले हैं कि दक्षिणी श्रीलंका में आतंकवादी हमला हो सकता है। यह चेतावनी हिंद महासागर में श्रीलंका के एक खूबसूरत अरुगम तटीय क्षेत्र को लेकर है। अरुगम एक समुद्री खाड़ी इलाका है, जो अपने सुंदर तट के लिए मशहूर है। इजरायल ने खतरे की सटीकता के बारे में तो नहीं बताया है, मगर अरुगम समेत श्रीलंका के बाकी हिस्सों में इजरायलियों के सतर्क रहने और खुली जगहों पर बड़ी सभा आयोजित करने से परहेज बरतने की अपील की है। यही अलर्ट अमेरिका और जर्मनी ने भी जारी किया है और अपने नागरिकों को फौरन अरुगम छोड़ने की अपील की है। जानते हैं क्या है अरुगम बीच और यह किसलिए जाना जाता है। क्या ये हिजबुल्लाह और हमास के निशाने पर है? अरुगम खाड़ी को स्थानीय लोग अरुगम कुदाह के नाम से बुलाते हैं। यह श्रीलंका के दक्षिण-पूर्वी तट के ड्राई एरिया में हिंद महासागर पर स्थित है। यह प्राचीन बट्टिकलोआ क्षेत्र (मट्टाकल्लप्पु देसम) के एक ऐतिहासिक समझौते के तहत श्रीलंका को मिला था।

अरुगम की खाड़ी बट्टिकलोआ से 117 किलोमीटर दक्षिण में, कोलंबो से 320 किलोमीटर पूर्व में और पोट्टुविल के बाजार शहर से लगभग 4 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। इसके निकटवर्ती एक मुस्लिम गांव पोट्टुविल है, जो कारोबार और यातायात का केंद्र है। इस क्षेत्र को कुमाना के नाम से भी जाना जाता है, जहां पनामा (श्रीलंका) की तमिल/सिंहली बस्ती और ओकांडा के तमिल इलाकों तक पहुंचा जा सकता है। स्थानीय क्षेत्र कई हाथियों का घर है, जो अक्सर लाहुगाला और कुमाना राष्ट्रीय उद्यानों के बीच यात्रा करते हैं। अरुगम क्षेत्र की मुख्य बस्ती को उल्लाए के नाम से जाना जाता है। यहां की मुख्य आबादी मुस्लिम है। हालांकि, गांव के दक्षिण में एक महत्वपूर्ण श्रीलंकाई तमिल और सिंहली आबादी है, साथ ही कई अंतरराष्ट्रीय प्रवासी भी हैं, जो मुख्य रूप से यूरोप और ऑस्ट्रेलिया से आते हैं। केंद्र सरकार और तमिल अलगाववादियों के बीच लड़ाई की अवधि के दौरान पर्यटन काफी कम महत्वपूर्ण था। दरअसल, यहां के ज्यादातर होटल अक्सर मछुआरों की मछली खरीद लेते थे। जब यहां शांति आई तो पर्यटन का विस्तार हुआ और कई मछली पकड़ने वाले लोग जो संघर्ष से कम प्रभावित क्षेत्रों में चले गए थे, वे वापस लौट आए।

अरुगम बे एक लोकप्रिय सर्फिंग स्थान है। यह श्रीलंका में इकलौता अंतरराष्ट्रीय सर्फ प्रतियोगिता स्थल भी है। इसे दुनिया के शीर्ष दस सर्फ स्थलों में से एक के रूप में भी दर्जा दिया गया है, जिसे ओफेक के मेन पॉइंट के रूप में भी जाना जाता है। यहां सर्फिंग करने के लिए यूरोप, अमेरिका और इजरायल से सैलानी आते हैं। अरुगम ने 2004 से श्रीलंका में अधिकांश अंतरराष्ट्रीय सर्फिंग प्रतियोगिताओं की मेजबानी भी की है। श्रीलंका में अमेरिकी दूतावास ने भी एक सुरक्षा चेतावनी जारी की है। इसमें कहा गया है अरुगम खाड़ी क्षेत्र में लोकप्रिय पर्यटन स्थलों को निशाना बनाकर हमले की पुष्ट सूचना मिली है। ऐसे में अमेरिकी नागरिकों को अगली सूचना तक अरुगम खाड़ी क्षेत्र से दूर रहने का आग्रह किया जाता है। हालांकि, इसके बारे में ज्यादा डिटेल नहीं दी गई है।

इस बीच, जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने भी पर्यटन स्थलों पर संभावित हमलों के संकेत का हवाला देते हुए अपने नागरिकों को जल्द से जल्द अरुगम समेत तटीय पर्यटन क्षेत्र को खाली करने को कहा है। आतंकी हमलों से बचने के लिए जितनी जल्दी हो सके इसे छोड़ने की अपील की है। अमेरिका और इजरायल ने अपने अलर्ट में कहा है कि इजरायली नागरिकों या दूसरे लोगों को यह सलाह दी जाती है कि वो खुले तौर पर ऐसी किसी भी चीज का प्रदर्शन करने से बचें जो उन्हें इजरायली नागरिक के रूप में पहचान सके। हिब्रू में लिखी टी-शर्ट या कोई भी प्रतीक जो इजरायलियों के धर्म या राष्ट्रीयता का खुलासा करता हो, उसे कतई न पहनें।

श्रीलंका में अरुगम इलाके में बड़ी संख्या पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई है। सभी को हाई अलर्ट पर कर दिया गया है। पुलिस प्रवक्ता निहाल थल्दुवा ने कोलंबो में जारी एक वीडियो बयान में कहा कि इलाके में पुलिस सुरक्षा बढ़ा दी गई है और अधिकारी हाई अलर्ट पर हैं। यह क्षेत्र सर्फिंग के लिए एक लोकप्रिय स्थान है और इसने बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित किया है। हम इजरायली पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल के पहले आठ महीनों में 15 लाख पर्यटक श्रीलंका पहुंचे, जिनमें इजरायल से कुल 20,515 पर्यटक शामिल थे। श्रीलंका अपने प्राचीन समुद्र तटों, चाय बागानों और ऐतिहासिक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर पर्यटकों की संख्या में फिर से बढ़ोतरी देखी जा रही है क्योंकि यह द्वीप राष्ट्र गंभीर वित्तीय संकट से उबर रहा है।

इजरायल, अमेरिका और जर्मनी की सरकारों को जिस आतंकी खतरे की सूचना मिली है, उसके तार किससे जुड़े हैं, ये स्पष्ट तो नहीं हैं। इजरायल की इस वक्त हिजबुल्लाह और हमास से जंग चल रही है। ऐसे में यह खतरा कुछ भी हो सकता है। हिंद महासागर के इलाके में ऐसा कोई हमला होता है तो यह भारत के लिए भी चिंता की बात हो सकती है।

 

क्या शरद पवार और लालू यादव ने बचा लिया है इंडिया गठबंधन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इंडिया गठबंधन को शरद पवार और लालू यादव ने बचा लिया है या नहीं! महाराष्ट्र और झारखंड। दोनों ही जगह चुनावी फिजा। दोनों ही जगह इंडिया गठबंधन टूटने के कगार पर था। महाराष्ट्र में महा विकास अखाड़ी ही I.N.D.I.A है। गठबंधन में सीट शेयरिंग का पेच ऐसा फंसा था कि कभी उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना तो कभी कांग्रेस कसमसा रही थी। अकेले चुनाव लड़ने की बातें होने लगी थीं। यही हाल झारखंड में था। तेजस्वी यादव आरजेडी के लिए सम्मानजनक सीटों पर अड़े थे। बात बनती नहीं दिख रही थी। लेकिन तभी सियासत के दो मंझे खिलाड़ियों की सीन में एंट्री होती है। ऐसी एंट्री कि पूरा सीन ही बदल जाता है। गठबंधन जो टूटने के कगार पर खड़ा था, उसमें सीट शेयरिंग पर सहमति बन जाती है। खिलाड़ियों के खिलाड़ी ये दोनों दिग्गज कोई और नहीं बल्कि शरद पवार और लालू प्रसाद यादव हैं। सबसे पहले बात महाराष्ट्र की। 288 विधानसभा सीटों वाले सूबे में 20 नवंबर को वोटिंग है। महाविकास अघाड़ी में सीट शेयरिंग का पेच ऐसा फंसा था कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत बार-बार सार्वजनिक तौर पर संकेत दे रहे थे कि सीटों पर बात नहीं बनी तो एकला चलेंगे। एकला चलो रे का राग महाराष्ट्र कांग्रेस के भीतर भी गूंजने लगा था।

समझौते की कोई गुंजाइश बनते नहीं देखकर राज्य कांग्रेस के नेताओं ने राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से गुहार लगाई। आनन-फानन में हाई कमान ने राज्य के नेताओं को चर्चा के लिए दिल्ली तलब किया। खरगे ने कांग्रेस विधायक दल के नेता बाला साहेब थोराट को जिम्मेदारी दी कि मामले को सुलझाने के लिए वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे से बात करें। मल्लिकार्जुन खरगे के निर्देश पर थोराट ने पवार और ठाकरे दोनों से संक्षिप्त मुलाकात भी की लेकिन बात नहीं। इसके बाद तो कांग्रेस नेताओं को लगने लगा कि अब वक्त आ गया है कि एमवीए से बाहर होकर अकेले चुनाव लड़ा जाए। उधर, शिवसेना यूबीटी पहले से ही सीट शेयरिंग पर अधीर हुए जा रही थी।

गठबंधन के सहयोगियों के बीच एकला चलो रे की बढ़ती गूंज के बीच एंट्री होती है शरद पवार की। इसलिए कि अगर एमवीए के साथी अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे तो बीजेपी की अगुआई वाली महायुति के लिए पूरी तरह मैदान साफ करने जैसा होता। शरद पवार ने संजय राउत, थोराट और उद्धव ठाकरे से बात की। उसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले, शिवसेना यूबीटी के संजय राउत, एनसीपी (एसपी) के जयंत पाटिल और कांग्रेस के विधायक दल के नेता बालासाहेब थोराट संग शरद पवार ने बैठक की। उनके हस्तक्षेप के बाद बिगड़ती दिख रही बात बन गई। 255 सीटों का मसला तो चुटकियों में सुलझ गया।तय हुआ कि गठबंधन की तीनों प्रमुख पार्टियां यानी कांग्रेस, शिवसेना यूबीटी और एनसीपी एसपी 85-85 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। 18 सीटें गठबंधन की छोटी पार्टियों के लिए छोड़ दी गईं। बाकी बचीं 15 सीटों का मसला हल नहीं हो पाया है। इनमें से 3 सीटें मुंबई और 12 विदर्भ में हैं।

शरद पवार ने समझाया कि और ज्यादा देरी ठीक नहीं है। जिन पर सहमति बन गई, वहां उम्मीदवार तय करने, पर्चा दाखिल करने का काम चले। बाकी 15 सीटों को लेकर बातचीत चलती रहेगी। वैसे इससे पहले जिस फॉर्म्युले की चर्चा चल रही थी, उसके मुताबिक कांग्रेस 105, एनसीपी-एसपी 84 और शिवसेना-यूबीटी को 95 सीटें मिलनी थीं। साफ है कि फायदे में एनसीपी-एसपी दिख रही है जिसे 85 सीटों पर उम्मीदवारी तो अभी मिल गई है। अब बात झारखंड की। 81 विधानसभा सीटों वाले झारखंड में 13 और 20 नवंबर को दो चरणों में वोटिंग होनी है। बिहार के विभाजन के बाद बने झारखंड में वैसे तो आरजेडी की कोई खास ताकत नहीं है लेकिन वहां उसके वजूद से इनकार नहीं किया जा सकता। तेजस्वी यादव अपनी पार्टी के लिए सम्मानजनक सीटें चाहते थे। आरजेडी को सीट देने का मतलब है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के लिए उतनी सीटों का कम होना।

आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा दावा कर रहे थे कि झारखंड में कम से कम 15 से 18 सीट ऐसी हैं जहां उनकी पार्टी अपने दम पर बीजेपी को पटखनी दे सकती है। ये और बात है कि पिछली बार उनकी पार्टी 7 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और सिर्फ एक ही सीट जीत पाई थी। सीटों का पेच ऐसा फंसा कि तेजस्वी यादव नाराज हो गए। अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करने ही वाले थे कि उनके पिता लालू प्रसाद यादव को भनक लग गई। रिपोर्ट के मुताबिक, गठबंधन को बिखरता देख लालू ने जेएमएम नेता और सीएम हेमंत सोरेन को फोन घुमा दिया। उनके दखल देते ही बिगड़ती दिख रही बात बन गई। आरजेडी अब इंडिया गठबंधन के बैनर तले ही चुनाव लड़ेगी। उसके खाते में 6 सीटों पर उम्मीदवारी आई है।