Friday, March 20, 2026
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क्या हरियाणा में हार के बाद इंडिया गठबंधन टूटने वाला है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हरियाणा हार के बाद इंडिया गठबंधन टूटने वाला है या नहीं! हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। चुनाव के नतीजों के बाद इंडिया गठबंधन में खटपट शुरू हो गई है। विपक्षी गठबंधन के दलों के बीच अब झारखंड और महाराष्ट्र चुनाव में सीट शेयरिंग को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी पार्टी, एनसीपी और शिवसेना महाराष्ट्र में ज्यादा से ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं। वहीं झारखंड में कांग्रेस, जेएमएम और आरजेडी के बीच भी बात नहीं बन पा रही। महाराष्ट्र में चुनाव से पहले महाविकास अघाड़ी में शीट शेयरिंग का फॉर्म्युला तय नहीं हो पा रहा। शिवसेना (उद्धव गुट), एनसीपी (शरद पवार) और कांग्रेस के बीच शीट शेयरिंग को लेकर लगातार बैठकों का दौर जारी है। इस बीच समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने 12 सीटों की मांग की है। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने उनसे बात की। शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि उद्धव की बातचीत “सकारात्मक” रही और एनवीए में सपा को साथ लिया जाएगा।लोकसभा चुनाव के बाद जहां कांग्रेस पार्टी फिर से फ्रंटफुट पर नजर आने लगी थी, लेकिन हरियाणा में करारी हार के बाद कांग्रेस का कद घटा है। उन्होंने कहा अगर RJD अकेले चुनाव लड़ती है तो पार्टी 60-62 सीटों पर खुलकर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों की मदद करेगी लेकिन 2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों में जहां-जहां पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी, वहां अपने उम्मीदवार भी उतारेगी।कांग्रेस के सहयोगी दल भी उसके खिलाफ बोलना शुरू हो गए हैं। हरियाणा में नतीजों के बाद महाराष्ट्र में उसकी सहयोगी शिवसेना (उद्धव गुट) ने कहा था कि कांग्रेस जहां अकेले चुनाव लड़ती है वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं करती। गौर करने वाली बात ये भी है कि हरियाणा के नतीजों के बाद कांग्रेस सीटों के बंटवारे के मसले पर भी आगे नहीं आ पा रही है। उसकी सहयोगी पार्टियां कांग्रेस से ज्यादा सीटों की मांग करती दिख रही हैं।

झारखंड में भी विपक्षी गठबंधन इंडिया के सहयोगी दलों के बीच शीट शेयरिंग पर बात नहीं बन पा रही है। राज्य में फिलहाल हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार है। वहीं बिहार में मजबूत पकड़ रखने वाली पार्टी आरजेडी झारखंड में अकेले चुनाव लड़ सकती है। कांग्रेस भी जेएमएम के साथ लगातार सीटों के बंटवारे पर चर्चा कर रही है। लेकिन कहा जा रहा है कि जेएमएम और कांग्रेस आरजेडी को मनमुताबिक सीटें देने को तैयार नहीं है। इससे आरजेडी नाराज है और अकेले चुनाव लड़ने पर विचार कर रही है। आरजेडी नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा कि उनकी पार्टी को गठबंधन में 12-13 से कम सीटें मंजूर नहीं हैं। आरजेडी का झारखंड की 18-20 सीटों पर मजबूत आधार है। हालांकि झा ने यह भी कहा कि आरजेडी किसी भी सूरत में गठबंधन को कमजोर नहीं होने देगी और आखिरी समय तक समझौते की कोशिश करेगी। झा ने कहा, हम नाव को डूबने नहीं देंगे, हम अंत तक प्रयास करेंगे … सीएम हेमंत सोरेन ही होंगे। उन्होंने कहा अगर RJD अकेले चुनाव लड़ती है तो पार्टी 60-62 सीटों पर खुलकर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों की मदद करेगी लेकिन 2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों में जहां-जहां पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी, वहां अपने उम्मीदवार भी उतारेगी।

लोकसभा चुनाव के बाद जहां कांग्रेस पार्टी फिर से फ्रंटफुट पर नजर आने लगी थी, लेकिन हरियाणा में करारी हार के बाद कांग्रेस का कद घटा है। कांग्रेस के सहयोगी दल भी उसके खिलाफ बोलना शुरू हो गए हैं। हरियाणा में नतीजों के बाद महाराष्ट्र में उसकी सहयोगी शिवसेना (उद्धव गुट) ने कहा था कि कांग्रेस जहां अकेले चुनाव लड़ती है वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं करती। बता दें कि समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने 12 सीटों की मांग की है। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने उनसे बात की। शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि उद्धव की बातचीत “सकारात्मक” रही और एनवीए में सपा को साथ लिया जाएगा।लोकसभा चुनाव के बाद जहां कांग्रेस पार्टी फिर से फ्रंटफुट पर नजर आने लगी थी, लेकिन हरियाणा में करारी हार के बाद कांग्रेस का कद घटा है। झारखंड में भी विपक्षी गठबंधन इंडिया के सहयोगी दलों के बीच शीट शेयरिंग पर बात नहीं बन पा रही है।गौर करने वाली बात ये भी है कि हरियाणा के नतीजों के बाद कांग्रेस सीटों के बंटवारे के मसले पर भी आगे नहीं आ पा रही है। उसकी सहयोगी पार्टियां कांग्रेस से ज्यादा सीटों की मांग करती दिख रही हैं।

 

क्या झारखंड चुनाव में बागी नेता दे रहे हैं अपनी पार्टियों को धोखा?

वर्तमान में झारखंड चुनाव में बागी नेता अपनी ही पार्टियों को धोखा देते नजर आ रहे हैं! झारखंड में टिकट बंटवारे के बाद इंडिया गठबंधन में थोड़ा असंतोष दिख रहा है। हालांकि तमाम राजनीतिक दल इस विरोध को कम करने के लिए काम कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक रहा, कांग्रेस के मौजूदा विधायक उमाशंकर अकेला का मामला। उनका टिकट कटने का ऐलान होने के महज 5-6 घंटे बाद ही वो एसपी में शामिल हो गए और टिकट भी हासिल कर लिया। गौरतलब है कि गुरुवार की देर रात झारखंड कांग्रेस की दूसरी लिस्ट सामने आई, जिसमें पार्टी ने बरही के विधायक उमाशंकर अकेला का टिकट काट कर उनकी जगह अरुण साहू को टिकट दे दिया। हालांकि अकेला का टिकट लगभग तय माना जा रहा था। कांग्रेस ने अपने 17 विधायकों में से 15 के टिकट पहली सूची में ही घोषित कर दिए थे। बरही और पाकुड़ का टिकट बचा था, जिसे दूसरी सूची में घोषित किया गया। उमाशंकर अकेला ने अपना टिकट कटने के बाद एसपी में जाने का फैसला किया। रातोंरात वह 170 किमी गाड़ी चलाकर डाल्टनगंज पहुंचे, जहां सुबह चार बजे वह हाथ छोड़कर एसपी की ‘साइकिल’ पर सवार हो गए। एसपी ने उन्हें बरही से टिकट दे दिया। शुक्रवार की दोपहर तक उन्होंने नामांकन भर दिया।

हालांकि टिकट कटने के बाद उमाशंकर अकेला ने टिकट बंटवारे के लिए शामिल पदाधिकारियों पर टिकट बेचने का आरोप भी लगाया। अकेला की बगावत से माना जा रहा है कि कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। उल्लेखनीय है कि अकेला यादव समुदाय से आते हैं। बरही इलाके में यादवों की तादाद ठीक-ठाक है। वहां बीजेपी ने भी यादव को उतारा है। ऐसे में स्थानीय राजनीति के जानकार मानते हैं कि अकेला कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी के वोट काटेंगे।

चर्चा है कि अकेला का टिकट कटने की एक वजह यह भी रही। दूसरी ओर अरुण साहु तेली समाज से आते हैं, जिनकी तादाद वहां खासी है। यूं तो तेली समुदाय आमतौर पर बीजेपी के साथ जाता है, लेकिन अरुण साहू के उतरने से अब माना जा रहा है कि साहू बीजेपी के उस वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल हो सकते हैं। दूसरी ओर बीजेपी ने जहां जेएमएम के घर में सेंध लगाकर उसके दो बड़े चेहरे चंपई सोरेन और सीता सोरेन को अपने खेमे में लाने का काम किया तो वहीं हेमंत सोरेन ने चुनाव से ऐन पहले बीजेपी सरकार में मंत्री रही कद्दावर महिला नेता लुइस मरांडी को अपनी तरफ खींच लिया। दरअसल, लुइस मरांडी दुमका से अपना टिकट कटने से नाराज थीं। वह अपने लिए मौका तलाश रही थीं, हेमंत सोरेन ने हाथ बढ़ा दिया। महज दो दिन पहले जेएमएम में शामिल होने वाली लुइस को पार्टी ने जामा से चुनावी मैदान में उतारा है। उल्लेखनीय है कि जामा वो सीट है, जहां से सीता सोरेन लड़ा करती थीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीता इस आदिवासी सुरक्षित सीट से नहीं लड़ सकती थीं, इसलिए उन्हें इस बार सामान्य सीट पर जाना पड़ा। बीजेपी ने उन्हें जामताड़ा से उतारा है।

ऐसे में हेमंत सोरेन ने एक झटके में जामा सीट से लुइस मरांडी को उतारकर बीजेपी और अपनी भाभी को सीधा संदेश दिया। इसी तरह से विश्रामपुर सीट भले ही कांग्रेस के खाते से निकलकर आरजेडी को चली गई हो, लेकिन कांग्रेस ने यहां से अपना उम्मीदवार उतारकर दोस्ताना मुकाबला किया है। कांग्रेस ने यहां से सुधीर कुमार चंद्रवंशी को उतारा है। बीजेपी का उम्मीदवार भी चंद्रवंशी है, जबकि आरजेडी ने नरेश सिंह को टिकट दिया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस यहां चंद्रवंशी वोट बैंक में सेंध लगाएगी। मौजूदा महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावों में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ अपनी एकजुटता और शक्ति का भी प्रदर्शन करेगा। इसके तहत इन दोनों राज्यों में चुनाव लड़ रहे इंडिया के घटक दल ही प्रचार नहीं करेंगे, बल्कि ऐसे दल भी प्रचार करेंगे, जो यहां चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। इनमें आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल का नाम प्रमुख है। हरियाणा में कुछ खास कमाल न दिखाने के बाद आप घटक दलों के साथ तालमेल कर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।

इसी के मद्देनजर केजरीवाल झारखंड में जेएमएम के लिए तो वहीं महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार के दलों के लिए प्रचार करेंगे। हालांकि अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि वह इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगे या नहीं। चर्चा है कि कुछ महीनों बाद दिल्ली में होने वाले चुनावों के मद्देनजर वह इससे बचना चाहेंगे। दरअसल दिल्ली में कांग्रेस भी अपनी पूरी ताकत से उतरने की योजना बना रही है।

 

क्या भारत की ताकत देखकर घबरा गया है ड्रैगन चीन?

हाल ही में ड्रैगन चीन भारत की ताकत को देखकर घबरा गया है! चीन डोकलाम में भी मुंह की खा चुका था, फिर भी पूर्व लद्दाख में भारत के साथ दो-दो हाथ करने की ठानी। नतीजा फिर वही हुआ। आज चीन पीछे हटकर वहीं जाने को तैयार हो गया है जहां 2020 में अतिक्रमण के प्रयासों से पहले था। लेकिन सवाल है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का शासन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में ऐसा क्या देखा कि उसने तात्कालिक तौर पर ही सही, चीन-भारत में दोस्ती को ही बेहतर समझा? सोमवार को भारत-चीन वार्ता के बाद से एक महत्वपूर्ण सवाल उठ रहा है- आखिर ऐसी कौन सी बात है जिससे शी जिनपिंग 2020 में पूर्वी लद्दाख में हुए सीमा विवाद को सुलझाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रेरित हुए? इसका सीधा सा जवाब है, चीन को भारत से बहुत उम्मीदें हैं जिन्हें वह पूरा करना चाहता है।

बुधवार को कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मौके पर नरेंद्र मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात एक-दूसरे के छिपे हुए डर और महत्वाकांक्षाओं को समझने के लिए बेहद उपयोगी साबित हुई। जैसे ही बैठक शुरू हुई मोदी सीधे मुद्दे पर आ गए, ‘हम पांच साल बाद औपचारिक बैठक कर रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत-चीन संबंध न केवल हमारे लोगों के लिए बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और प्रगति के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।’ बैठक के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि दोनों नेताओं ने सोमवार को हुई सीमा गश्ती समझौते का समर्थन किया है। यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि समझौते को लागू करने के लिए शी की ओर से पीएलए की पश्चिमी थिएटर कमान को सख्त आदेश की आवश्यकता होगी जो भारतीय सीमा से संबंधित है।

पीएलए ने पहले ही लद्दाख सीमा के पास कुछ बुनियादी ढांचे का निर्माण कर लिया है। यहां सैन्य स्टेशनों का भी निर्माण हुआ है जिसमें 11 विवादित गश्ती स्टेशन शामिल हैं। आमतौर पर सैन्य कमान को किसी विशिष्ट सीमा स्थान से सेना वापस बुलाने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। नई दिल्ली को उम्मीद है कि शी विवादित क्षेत्रों से बलों को वापस बुलाने की प्रक्रिया में तेजी लाएंगे। पूर्व राजनयिक पी स्टोबदान ने मुझे बताया, ‘चीन में बहुत सारे निर्णय सैन्य कमांडरों के स्तर पर होते हैं, न कि केवल राजनयिकों के।’ उन्होंने कहा, ‘सेना का हालात को देखने का अपना नजरिया होता है। मुझे नहीं लगता कि पीएलए पर यह भरोसा किया जा सकता है कि वह भारतीय सीमा पर अपना आक्रामक रवैया छोड़ देगी।’ शी भारत से क्या उम्मीद करते हैं यह चीनी विशेषज्ञों के बयानों से स्पष्ट है। कुछ ने कहा है कि भारत को चीन के साथ व्यापार और व्यावसायिक संबंधों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए क्योंकि अब उसके पास ‘चीन के खतरे जैसा बहाना’ मौजूद नहीं है।

यह समझना चाहिए कि भारत ने शांति प्रक्रिया के लिए पहल तब की जब एक अंतर-मंत्रालयी समूह ने चीन, हॉन्गकॉन्ग और अन्य क्षेत्रों में स्थित चीनी कंपनियों के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी। 2020 में पीएलए सैनिकों के गलवान आक्रमण के बाद चीनी निवेशों पर लगाए गए सरकारी प्रतिबंधों में यह पहली बड़ी ढील थी।

सोमवार को बॉर्डर पेट्रोलिंग अरेंजमेंट ने भारत में काफी उत्साह पैदा किया। सीमा विवाद को जीडीपी के मामले में तीसरा सबसे बड़ा देश बनने की भारतीय आकांक्षाओं में सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखा जाता है। उधर, चीनी अधिकारियों और मीडिया ने समझौते को लेकर उत्साह दिखाने से परहेज किया। समझौते के एक दिन बाद चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, ‘हाल के दिनों में चीन और भारत राजनयिक और सैन्य माध्यमों से करीबी संपर्क के बाद सीमा क्षेत्र से संबंधित मुद्दों पर समाधान पर पहुंचे हैं। चीन हुई प्रगति की सराहना करता है और इन प्रस्तावों के सही कार्यान्वयन के लिए भारत के साथ काम करना जारी रखेगा।’ उन्होंने समझौते के बारे में कोई जानकारी नहीं दी, साथ ही सैनिकों को वापस बुलाने और 2020 के गलवान हमलों से पहले की स्थिति में वापस जाने जैसे मुद्दों को भी छोड़ दिया।

अपनी ओर से अमेरिका यह दिखावा करने की पूरी कोशिश कर रहा है कि वह ब्रिक्स में अमेरिकी विरोधी उपायों पर हो रहे मंथन को लेकर चिंतित नहीं है। वाइट हाउस के प्रेस सचिव कैरिन जीन-पियरे ने कहा, ‘हम ब्रिक्स को किसी तरह के भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी (जियोपॉलिटिकल रायवल) के रूप में उभरते हुए नहीं देख रहे हैं। अमेरिका या किसी और के लिए इसे हम इस नजरिए से नहीं देखते हैं।’ भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो कैसे अमेरिकी हितों को चुनौती दिए बिना ब्रिक्स क्लब में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे। उस संदर्भ में चीन, रूस और भारत सहित ब्रिक्स के सभी सदस्य अमेरिका में चल रहे राष्ट्रपति पद चुनावों को करीब से देख रहे हैं।

युक्रेन युद्ध में भारत ने अमेरिका समेत पूरे पश्चिम की आकांक्षाओं को धता बताते हुए रूस से तेल खरीदकर अपनी ताकत दिखा चुका है। यही वजह है कि चीन को भारत पर ऐतबार हो गया है। उसे लगता है कि रिश्ते सुधरे तो जिस तरह युद्ध में भारत ने रूस को संकट से उबारा, वैसे ही उसका साथ भी निश्चित रूप से दे सकता है। रूस से तेल खरीद के फैसले से वॉशिंगटन नई दिल्ली से खुश नहीं था, लेकिन बीजिंग मुस्कुरा रहा था। उसे भारत की ताकत में अपने संकट का समाधान का रास्ता जो नजर आ रहा है।

 

दहेज उत्पीड़न के बारे में अदालत से क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों से दहेज उत्पीड़न के बारे में एक निर्देश जारी किया है! अगर आपसे पूछा जाए कि 2-4 ऐसे कानूनों का नाम बताइए जिसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग होता है। जवाब में दहेज उत्पीड़न से जुड़ा कानून शायद ही किसी की लिस्ट में जगह पाने से छूटे। इस कानून को पति के घरवालों और रिश्तेदारों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। गुनाह किसी का भी हो लेकिन घर के हर बालिग सदस्य को आरोपी बना दिया जाता है। जमानत भी मुश्किल से होती है। कानून के दुरुपयोग को लेकर समय-समय पर अदालतें भी चिंता जताती रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए अदालतों को सलाह दी है कि वे दहेज उत्पीड़न या दहेज हत्या से जुड़े मामलों सावधानी बरतें। ध्यान रखें कि कोई बेगुनाह परेशान न हो। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों को दहेज उत्पीड़न के मामलों में सावधानी बरतने को कहा है। अक्सर इन मामलों में पति के रिश्तेदारों को भी फंसा लिया जाता है, जबकि मुख्य आरोपी पति होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के कई मामलों में आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। ऐसे में अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए ताकि निर्दोष परेशान न हों। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने दहेज मृत्यु के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह बात कही।

बेंच ने कहा कि आरोपी ने मृतका की ननद से अक्टूबर 2010 में शादी की थी। दहेज उत्पीड़न का आरोप पहली बार लगने के बाद उसने शादी की थी। सिर्फ इसलिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसकी पत्नी को दोषी पाया गया था। बेंच ने कहा कि सामान्य और व्यापक आरोप अभियोजन का आधार नहीं हो सकते। अदालतों को ऐसी शिकायतों से निपटने में सावधानी बरतनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने अपने एक पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘कोर्ट ने देखा है कि यह सर्वविदित है कि बड़ी संख्या में शिकायतों में घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। बड़ी संख्या में मामलों में फंसाने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।’बेंच ने कहा, ‘हमारा विचार है कि ऐसी परिस्थितियों में, अदालतों को आरोपियों को फंसाए जाने के मामलों की पहचान करने और ऐसे व्यक्तियों द्वारा अपमान और पीड़ा को टालने के लिए सावधान रहना होगा।’

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आरोपी ने मुख्य आरोपी (पति) की बहन से अक्टूबर 2010 में शादी की और जिस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण महिला की मृत्यु हुई, वह परिवार का रिश्तेदार बनने के साढ़े पांच महीने के भीतर ही हुई। बेंच ने कहा, ‘यह एक सच्चाई है कि सामान्य, अस्पष्ट आरोपों के बावजूद, अपीलकर्ता के खिलाफ कोई विशेष आरोप नहीं लगाया गया था। इसके अलावा, हमारी सूक्ष्म जांच के बावजूद, हम अभियोजन पक्ष द्वारा अपीलाकर्ता के खिलाफ किसी भी गवाह के माध्यम से कोई विशेष सबूत नहीं पा सके। …अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने विशेष रूप से अपीलकर्ता के खिलाफ यह कहते हुए गवाही नहीं दी थी कि उसने कोई क्रूरता की है जो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A के तहत अपराध का मामला बन सके।’

बेंच ने कहा, ‘ऐसा भी कोई मामला नहीं है कि इस प्राथमिकी से पहले अपीलकर्ता के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराई गई हो। संक्षेप में, हम पाते हैं कि अपीलकर्ता के खिलाफ यह मानने के लिए कोई सबूत नहीं है कि उसने IPC की धारा 498-A के तहत अपराध किया है। दूसरे आरोपी का पति होने के नाते, जिसे निचली अदालतों ने उक्त अपराध के लिए दोषी पाया था, अपीलकर्ता को उक्त अपराध के तहत दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता है, क्योंकि रिकॉर्ड पर कोई विशेष सामग्री नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों को दहेज उत्पीड़न के मामलों में सावधानी बरतने को कहा है। अक्सर इन मामलों में पति के रिश्तेदारों को भी फंसा लिया जाता है, जबकि मुख्य आरोपी पति होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के कई मामलों में आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ इसलिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह मामले में दोषी पाई गई महिला का रिश्तेदार है। अदालत ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में सबूतों के आधार पर ही फैसला लिया जाना चाहिए।

 

आखिर संसदीय समिति में एक बार फिर से क्यों हुआ हंगामा?

हाल ही में एक और संसदीय समिति में एक बार फिर से हंगामा हो गया है! वक्फ संसोधन विधेयक पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी के हंगामे के बाद अब संसद की लोक लेखा समिति (PAC) की बैठक में बवाल खड़ा हो गया। गुरुवार को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच को पीएसी के सामने पेश होना था, लेकिन वो नहीं आईं, जिसके बाद बैठक स्थगित कर दी गई। कांग्रेस नेता और पीएसी प्रमुख केसी वेणुगोपाल ने सेबी चीफ के नहीं आने पर रोष प्रकट किया तो भाजपा नेता और समिति के सदस्य रविशंकर प्रसाद ने वेणुगोपाल पर मर्यादा भंग करने का आरोप लगा दिया। प्रसाद ने कहा कि वेणुगोपाल ने पीएसी की बैठक के बारे में मीडिया में बयान देकर नियमों का उल्लंघन किया है।

सूत्रों के मुताबिक, सेबी चीफ माधबी पुरी बुच ने सुबह वेणुगोपाल को सूचित किया कि वह दिल्ली यात्रा करने की स्थिति में नहीं हैं। इस पर वेणुगोपाल ने कहा, ‘समिति की पहली बैठक में ही हमने अपने नियामक निकायों की समीक्षा के लिए स्वतः संज्ञान लेने का फैसला किया था। इसलिए हमने आज सुबह सेबी की समीक्षा के लिए बुलाया था।’ उन्होंने आगे कहा, ‘कमिटी ब्रांच संबंधित लोगों को नोटिस भेजती है। सबसे पहले उन्होंने छूट मांगी। सेबी चेयरपर्सन ने कमिटी के सामने पेश होने से छूट मांगी, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया। उसके बाद उन्होंने पुष्टि की कि वह और उनकी टीम इस कमिटी में मौजूद रहेंगी। आज सुबह उन्होंने (SEBI चेयरपर्सन, माधबी पुरी बुच) ने मुझे सूचित किया कि वह दिल्ली यात्रा करने की स्थिति में नहीं हैं। एक महिला के अनुरोध पर विचार करते हुए हमने सोचा कि आज की बैठक को किसी और दिन के लिए स्थगित करना बेहतर होगा।’

हालांकि, रविशंकर प्रसाद ने वेणुगोपाल पर पीएसी की बैठक की कार्यवाही पर बाहर या मीडिया के साथ चर्चा करने के लिए आलोचना की और विपक्षी सदस्यों पर असंसदीय आचरण का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘आम तौर पर हम स्थायी समितियों या पीएसी की बैठकों की कार्यवाही पर बाहर चर्चा नहीं करते हैं। हमें इस बात का दुख है कि पीएसी के अध्यक्ष केसी वेणुगोपाल ने बाहर बाइट दिया।’

प्रसाद ने वेणुगोपाल पर पीएसी में मनमर्जी चलाने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘हम आज पीएसी की बैठक में बहुमत में थे। हमने इस विषय को चुनने के उनके स्वतः संज्ञान के फैसले पर आपत्ति जताई, क्या उन्होंने किसी से पूछा? पीएसी की बैठक में अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर हमें गंभीर आपत्तियां थीं… यह अजीब था, वो (के. सी. वेणुगोपाल) अचानक उठे और चले गए… पीएसी का काम सीएजी की रिपोर्ट पर चर्चा करना है, लेकिन उन्होंने स्वतः संज्ञान लेने का फैसला कैसे किया? हमारे पास भरोसेमंद सूत्रों से रिपोर्ट है कि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में सेबी पर कोई पैराग्राफ नहीं दिया है।’ समिति में शामिल बीजेपी सांसदों ने पीएएसी प्रमुख की शिकायत भी की। प्रसाद ने कहा, ‘पीएसी के चेयरपर्सन का आज का आचरण – जिस तरह से उन्होंने हमें बोलने नहीं दिया और चले गए, वह असंसदीय और राजनीति से प्रेरित है। इसलिए, हम लोकसभा अध्यक्ष से अपनी शिकायत दर्ज कराने जा रहे हैं।’

इससे पहले इस साल सितंबर में सेबी चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच ने एक संयुक्त बयान में हाल ही में उन पर लगाए गए आरोपों को ‘झूठा, गलत, दुर्भावनापूर्ण और प्रेरित’ करार दिया था। माधबी और धवल बुच ने जोर देकर कहा कि उनके आयकर रिटर्न आरोप लगाने वालों ने अवैध रूप से और कपटपूर्ण तरीके अपनाकर प्राप्त किए हैं। ध्यान रहे कि वक्फ संशोधन विधेयक पर बनी संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में टीएमसी सासंद कल्याण बनर्जी ने टेबल पर रखी कांच की ग्लास पटक दी और वो खुद घायल हो गए। बता दें कि वेणुगोपाल ने सेबी चीफ के नहीं आने पर रोष प्रकट किया तो भाजपा नेता और समिति के सदस्य रविशंकर प्रसाद ने वेणुगोपाल पर मर्यादा भंग करने का आरोप लगा दिया। प्रसाद ने कहा कि वेणुगोपाल ने पीएसी की बैठक के बारे में मीडिया में बयान देकर नियमों का उल्लंघन किया है। टूटी हुई कांच उनके हाथ में चुभ गई जिस कारण उन्हें टांके लगवाने पड़े। इस घटना के तीन दिन बाद ही अब अब लोक लेखा समिति की बैठक को लेकर बवाल हो गया है।

 

आखिर LGBTQ के ऊपर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने LGBTQ के ऊपर एक और बयान दे दिया है! कानून में ‘पति’ और ‘पत्नी’ की जगह ‘जीवनसाथी’ (Spouse) शब्द का इस्तेमाल करके इसे सभी के लिए लागू किया जा सकता है। दरअसल LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को देखते हुए ‘जीवनसाथी’ शब्द पर चर्चा तेज हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकार को इस बारे में कदम उठाने होंगे। कोर्ट ने एक कमेटी बनाने को कहा है जो इस समस्या का हल ढूंढेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के कारण, LGBTQIA+ समुदाय के लोग बैंक खाते खोलते समय अपने साथी को नॉमिनी बना सकते हैं। उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव से भी सुरक्षा मिली है। फिर भी, बहुत कुछ करना बाकी है। सुप्रीम कोर्ट का ‘सुप्रीयो बनाम भारत संघ’ मामला LGBTQIA+ समुदाय को कानूनी सुरक्षा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि LGBTQIA+ समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करना सरकार का कर्तव्य है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मुद्दे का अध्ययन करने और समाधान सुझाने के लिए एक हाई लेवल कमिटी का गठन करें। हालांकि समलैंगिक जोड़ों के लिए चीजों और सेवाओं तक पहुंच आसान बनाई जा रही है, फिर भी कुछ जरूरी कदम उठाने बाकी हैं।

विवाह कई तरह के अधिकार और सुविधाएं प्रदान करता है। इनमें भरण-पोषण, विरासत, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े फैसले लेना, संयुक्त ऋण आवेदन, और बीमा जैसे लाभों के लिए नामांकन शामिल हैं। समलैंगिक लोगों को इन अधिकारों से वंचित रखा जाता है क्योंकि कानून उनके रिश्तों को मान्यता नहीं देता है।

अधिनियम विषमलैंगिक जोड़ों के अंतर-धार्मिक विवाह को मान्यता देने के लिए बनाया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतर-धार्मिक विवाह कानून में बदलाव करके समलैंगिक जोड़ों को भी शामिल किया जा सकता है। यह कानून अभी सिर्फ अलग-अलग धर्म के स्त्री-पुरुष के विवाह को मान्यता देता है। इस कानून में ‘पति’ और ‘पत्नी’ की जगह ‘जीवनसाथी’ शब्द का इस्तेमाल करके इसे सभी के लिए लागू किया जा सकता है। इसके साथ ही, बिना किसी भेदभाव के सभी जोड़ों के लिए आर्थिक मदद का प्रावधान भी होना चाहिए। कोर्ट को यह तय करते समय घर के कामों जैसे कारणों पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अक्सर महिलाएं घर का काम करती हैं और उन्हें आर्थिक मदद की जरूरत होती है। कानून में बदलाव करके ‘पति’ या ‘पत्नी’ का जिक्र करने वाले प्रावधानों को लिंग-तटस्थ ‘जीवनसाथी’ में संशोधित किया जाना चाहिए। साथ ही, कानून में यह भी साफ होना चाहिए कि आर्थिक मदद किन बातों को ध्यान में रखकर दी जाएगी, जैसे घर के कामकाज का मूल्य।

संयुक्त बैंक खातों और राशन कार्डों के बारे में सलाह के बावजूद, एक बड़ा सवाल बना हुआ है: राज्य कैसे तय करेगा कि कौन ‘समलैंगिक रिश्ते’ में है? क्या यह स्व-घोषणा पर आधारित होगा? या संबंधित अधिकारी प्रत्येक मामले में ऐसे रिश्ते के अस्तित्व की जांच करेंगे? नागरिक संघों को मान्यता देने और उन्हें विनियमित करने वाला कानून इसका जवाब देगा। विभिन्न लाभकारी कानूनों में आंशिक संशोधनों के माध्यम से गैर-वैवाहिक संबंधों में समान लिंग वाले भागीदारों को लाभ प्रदान किया जा सकता है, एक समग्र कानून सुचारू कार्यान्वयन और स्पष्टता सुनिश्चित करेगा और शोषण से बचने में मदद करेगा।

समलैंगिक समुदाय ने मांग की है कि लोगों को स्वास्थ्य सेवा से संबंधित निर्णय लेने और बैंक खाता नामांकन से लेकर मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति के निष्पादन तक के उद्देश्यों के लिए अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को अपना निकटतम रिश्तेदार नामित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि ऐसे व्यक्ति का चुनाव जन्म परिवार के सदस्यों, वैवाहिक परिवार के सदस्यों या नागरिक संघों में भागीदारों तक सीमित नहीं होना चाहिए।

समलैंगिक व्यक्ति अक्सर खुद को मूलभूत सुविधाओं और वस्तुओं तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हुए पाते हैं, अकेले या रिश्ते के हिस्से के रूप में। इसमें आवास, शिक्षा और रोजगार तक पहुंच की कमी शामिल है। उदाहरण के लिए, किराए की संपत्तियों तक पहुंचने के साथ ही निराशाजनक कलंक जुड़ा हुआ है क्योंकि अधिकांश मकान मालिक या पड़ोसी पारंपरिक परिवारों को पसंद करते हैं। इसी तरह, समलैंगिक व्यक्ति आम तौर पर कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में अत्यधिक उत्पीड़न, बदमाशी, अलगाव और पूर्वाग्रही व्यवहार के प्रति संवेदनशील होते हैं। इसलिए, वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए विधायी और कार्यकारी उपायों की आवश्यकता होगी।

अक्टूबर 2023 में, SC ने सुप्रिया चक्रवर्ती और अन्य बनाम भारत संघ के मामले में अपना फैसला सुनाया। CJI डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली एक संविधान पीठ ने कहा कि विवाह समानता को सक्षम बनाना विधायिका का विशेषाधिकार था। इसने निर्देश दिया कि समलैंगिक संबंधों में व्यक्तियों के अधिकारों को सुरक्षित करने के उपायों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाए। ऐतिहासिक फैसले के संदर्भ में, वित्तीय सेवा विभाग ने इस साल 28 अगस्त को एक एडवाइजरी जारी कर स्पष्ट किया, अन्य बातों के अलावा, समलैंगिक व्यक्तियों को संयुक्त रूप से बैंक खाते खोलने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सामाजिक न्याय विभाग ने केंद्र सरकार की ओर से उठाए गए अंतरिम उपायों की एक सूची के साथ उसका पालन किया और आगे के उपायों पर जनता से सुझाव आमंत्रित किए। गैर-मान्यता के कारण समलैंगिक व्यक्तियों द्वारा सामना किए जाने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए ये पहले महत्वपूर्ण कदम थे। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी 2016 से समलैंगिक अधिकारों पर बड़े पैमाने पर काम कर रहा है और उसने सुप्रीयो फैसले के अनुसरण में गठित विशेषज्ञ समिति को विस्तृत प्रस्तुतियां दी हैं ताकि यह बताया जा सके कि समलैंगिक व्यक्तियों के लिए अधिकारों और सुरक्षा को कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

 

बाल विवाह रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या नियम निकाले हैं?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाह रोकने के लिए नए नियम निकाल दिए हैं! सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा है कि बाल विवाह के कारण बच्चों के अपने पसंद के जीवन साथी चुनने का अधिकार समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने इस मामले में निर्देश जारी किए हैं ताकि देश में बाल विवाह को रोका जा सके और बाल विवाह निरोधक कानून को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। गौरतलब है कि हिंदू और मुस्लिम पर्सनल लॉ में नाबालिगों की शादी की इजाजत है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बचपन में कराए गए विवाह से बच्चों के जीवन साथी चुनने का अधिकार खत्म हो जाता है, और यह अधिकार चाइल्ड मैरिज के माध्यम से उल्लंघन होता है। कोर्ट ने बाल विवाह रोकने के लिए संबंधित अधिकारियों से कदम उठाने की अपील की और नाबालिगों को सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता बताई। इसके साथ ही, कोर्ट ने कहा कि जो लोग इस प्रथा के लिए जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि बाल विवाह निरोधक कानून में कुछ कमी है। 1929 में चाइल्ड मैरिज रिस्ट्रेन एक्ट के बाद, 2006 में प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रिवेंटिव नीतियां विभिन्न समुदायों के संदर्भ में विकसित की जानी चाहिए और कानून को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए बहु-क्षेत्रीय समन्वय की आवश्यकता है। इसके अलावा, कानून लागू करने वाले अधिकारियों की ट्रेनिंग और क्षमता विकास की भी आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला सरकार पर छोड़ते हुए कहा कि यह स्पष्ट करना होगा कि बाल विवाह निरोधक कानून पर्सनल लॉ पर लागू होगा या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक फैसले में कहा है कि पीसीएमए (प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट) का उद्देश्य बाल विवाह पर रोक लगाना है लेकिन इसमें किसी बच्चे के कम उम्र में विवाह तय करने की बड़ी सामाजिक कुप्रथा का उल्लेख नहीं है। इस सामाजिक बुराई से बच्चे के चयन के अधिकार का भी हनन होता है। अदालत ने कहा कि बाल विवाह के लिए एक अंतरविषयी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो हाशिए पर पड़े समुदायों के बच्चों, विशेषकर लड़कियों के इसके कारण और कमजोर होने की बात को स्वीकार करता है। अंतरविषयी दृष्टिकोण में लिंग, जाति, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और भूगोल जैसे कारकों पर विचार करना भी शामिल है, जो कम उम्र में विवाह के जोखिम को अक्सर बढ़ाते हैं।पीसीएमए तभी सफल होगा जब व्यापक सामाजिक ढांचे में इस समस्या का समाधान करने के लिए सभी हितधारक मिलकर प्रयास करेंगे और इसके लिए बहु-क्षेत्रीय समन्वय की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने संसद से आग्रह किया है कि बच्चों की सगाई को गैरकानूनी बनाने के लिए चाइल्ड मैरिज प्रोहिबिशन एक्ट (पीसीएमए) में बदलाव पर विचार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान कानून बच्चों की सगाई को नहीं रोकता, जिससे इसे कानून से बचने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। शादी नाबालिग रहते हुए फिक्स किया जाता है और यह उनके पसंद के अधिकार का उल्लंघन करता है। अपने पार्टनर को चुनने के अधिकार को छीनता है।

अलग-अलग एक्ट के तहत शादी के प्रावधानों को समझना अहम है, विशेषकर बाल विवाह निरोधक कानून के संदर्भ में। बाल विवाह निरोधक कानून के अनुसार, यदि लड़का 21 साल से कम और लड़की 18 साल से कम है, तो उनकी शादी मान्य नहीं होगी। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत, शादी के लिए लड़के की उम्र कम से कम 21 साल और लड़की की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत यदि लड़की की उम्र 18 साल से कम है, तो भी उसकी शादी अमान्य नहीं मानी जाएगी। हालांकि, यदि कोई नाबालिग लड़की (15 साल से ऊपर) अपनी शादी को अमान्य कराना चाहती है, तो वह बालिग होने के बाद ऐसा कर सकती है। यदि वह ऐसा नहीं करती, तो शादी मान्य हो जाती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, जब लड़की शारीरिक विकास के चरण (प्यूबर्टी) में प्रवेश कर लेती है, तो उसकी शादी संभव है। यदि लड़की नाबालिग है, तो उसके माता-पिता की सहमति आवश्यक होती है और इस स्थिति में निकाह हो सकता है। इन विभिन्न प्रावधानों का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना और बाल विवाह को रोकना है।

केरल हाई कोर्ट ने 2022 में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम विवाह को प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसिस एक्ट (पॉक्सो) से बाहर नहीं रखा गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी की आड़ में किसी बच्चे के साथ शारीरिक संबंध बनाना एक अपराध है। पॉक्सो कानून के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध अपराध की श्रेणी में आता है। इस कानून के तहत, 18 साल से कम उम्र के लड़के या लड़की दोनों को सुरक्षा प्रदान की गई है। नए बीएनएस कानून के तहत, 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ संबंध बनाना दुष्कर्म के अंतर्गत आता है। कानूनी दृष्टिकोण से, यह स्पष्ट है कि बाल विवाह को हर तरीके से हतोत्साहित किया गया है, लेकिन देश में बाल विवाह अब भी जारी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश बाल विवाह रोकने के प्रयासों में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

 

महिलाओं के पीरियड्स के लिए क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के पीरियड्स के लिए एक बयान दे दिया है! बाल विवाह जीवनसाथी चुनने के अधिकार का उल्लंघन है। इससे उसकी ‘स्वतंत्र पसंद’ और ‘बचपन’ दोनों का उल्लंघन होता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने यह अहम टिप्पणी की। पीठ ने संसद से बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006 में संशोधन करके बाल विवाह पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने पर विचार करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अनिल कुमार सिंह श्रीनेत कहते हैं कि सुप्रीम टिप्पणी से वैवाहिक मामलों में भी मुस्लिमों के पर्सनल लॉ से जुड़े कानून के खात्मे का संकेत मिलता है। गेंद अब केंद्र सरकार के पाले में है। पहले तीन तलाक पर चोट की गई और अब विवाह के मामले में पर्सनल लॉ में दखल की बात कही गई है। CJI चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा-महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव का उन्मूलन (CEDAW) जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून नाबालिगों के विवाह के खिलाफ प्रावधान करते हैं। बच्चे की तय की गई शादियां उनके स्वतंत्र विकल्प, स्वायत्तता और बचपन के अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। बाल विवाह निषेध अधिनियम को किसी भी व्यक्तिगत कानून के तहत परंपराओं से बाधित नहीं किया जा सकता है और कहा कि बच्चों से संबंधित विवाह जीवन साथी चुनने की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन है। पीठ में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा भी शामिल थे। अनिल सिंह श्रीनेत कहते हैं कि यह सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कॉमन सिविल कोड की दिशा में एक और बड़ा कदम है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून लागू करने वालों को बाल विवाह को रोकने और निषिद्ध करने के लिए सर्वोत्तम प्रयास करना चाहिए। केवल मुकदमों पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। भारत में हर 3 मिनट में एक बाल विवाह होता है। यह बहुत ही भयावह स्थिति है। यानी बचपन को कुचला जा रहा है। फैसले में कहा गया है कि बाल विवाह के मूल कारणों जैसे गरीबी, लिंग, असमानता, शिक्षा की कमी को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा निवारक स्ट्रैटेजी को अलग-अलग समुदायों की विशिष्ट जरूरतों के मुताबिक बनाया जाना चाहिए।

एक एडवोकेट और चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट भुवन रिभु की किताब ‘व्हेन चिल्ड्रन हैव चिल्ड्रन’, बाल विवाह से बचपन छिन जाता है। उनकी आजादी और गरिमा पर चोट पहुंचती है। बाल विवाह का मतलब यह है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के की शादी बाल विवाह की कैटेगरी में आती है। बाल विवाह से लड़कियों के स्कूल छूट जाते हैं। उनकी आजीविका और आत्मनिर्भरता पर चोट पहुंचती है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से पीसीएमए को व्यक्तिगत कानूनों पर प्रभावी बनाए रखने का आग्रह किया था। पीठ ने इस बात पर गौर किया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम व्यक्तिगत कानूनों पर प्रभावी होगा या नहीं, यह मुद्दा संसद के पास विचार के लिए लंबित है। यह निर्णय सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया, जिसमें बाल विवाह को रोकने के लिए कानून के प्रभावी कार्यान्वयन की मांग की गई थी।

एक एडवोकेट और चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट भुवन रिभु की किताब ‘व्हेन चिल्ड्रन हैव चिल्ड्रन’ के अनुसार, बाल विवाह का नतीजा बच्ची का रेप होता है। इससे कम उम्र में प्रेग्नेंसी और बड़ी संख्या में मौतें भी होती हैं। यहां तक कि कुछ समुदायों और समाजों में इसे सही भी ठहराया जाता है। एडवोकेट अनिल कुमार सिंह श्रीनेत बताते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में बाल विवाह को जायज ठहराया गया है। सितंबर, 2022 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने यह नियम दिया था कि कि अगर कोई मुस्लिम लड़की 15 साल की हो जाती है तो उसे मान लिया जाता है कि वह शादी के काबिल हो गई है। वह अपनी सहमति से शादी कर सकती है। ऐसी शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मान्य होगी। इसी तरह का एक फैसला दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सुनाया था। ऐसे फैसलों से बाल विवाह को लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति पैदा हुई।

अनिल सिंह बताते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नियमों के अनुसार, नाबालिग से विवाह की भी अनुमति है। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के अनुसार मुस्लिमों में शादी की उम्र तय नहीं है। कोई लड़की शादी के योग्य तब मानी जाती है, जब उसका पहला पीरियड आ जाता है। यह पुबर्टी यानी युवावस्था की उम्र ( जिसे आमतौर पर 15 साल माना जाता है) तक माना जाता है। यह उम्र और वयस्क होने की उम्र समान मानी गई है। यानी पर्सनल लॉ के अनुसार मुस्लिम लड़की 15 वर्ष की आयु के बाद शादी के लिए योग्य है। हालांकि, आजकल पहला पीरियड 12-13 साल की उम्र में आ गया तो भी पर्सनल लॉ के अनुसार ऐसी शादी जायज मानी जाएगी।

एडवोकेट अनिल सिंह के अनुसार, बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 ये कहता है कि अगर दूल्हा या दुल्हन में किसी एक की भी उम्र विवाह योग्य नहीं है तो यह बाल विवाह ही माना जाएगा। 18 वर्ष या उससे कम उम्र की बच्चियों और 21 साल से कम उम्र के लड़के को बच्चा ही माना जाएगा। ऐसे में अगर किसी एक पक्ष ने भी ऐसी शादी को कोर्ट में चुनौती दी तो ऐसा बाल विवाह रद्द हो सकता है। किताब चिल्ड्रन हैव चिल्ड्रन के अनुसार, अगर जागरूकता अभियानों को बढ़ाया जाए और कानूनों से सख्ती बरती जाए तो अगले 25 साल में भारत में बाल विवाह की दर मौजूदा 23 फीसदी से गिरकर 9 फीसदी पर आ जाएगी।

 

संसदीय प्रतिनिधिमंडल फिर जाएगा संयुक्त राष्ट्र

मालूम हो कि 4 से 8 नवंबर तक चुने गए सांसद राष्ट्रीय पंचायत में रहेंगे. पहले चरण में 15 और दूसरे चरण में 15 और सांसद भेजे जाएंगे. तृणमूल की ओर से राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव मैदान में होंगी. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान राष्ट्रमंडल देशों में संसदीय प्रतिनिधिमंडलों की आधिकारिक यात्राएँ शुरू हुईं। संयुक्त राष्ट्र के आम सत्र के दौरान हर साल विभिन्न दलों के लोकसभा और राज्यसभा सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल न्यूयॉर्क जाता था। भारतीय प्रतिनिधियों को वहां बोलने का मौका मिलता था, वे विभिन्न समिति की बैठकों में भी शामिल होते थे। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद 2015 में यह लंबी परंपरा बंद हो गई. यह इस साल फिर से शुरू हो रहा है.

तृणमूल पार्टी के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने पिछले अक्टूबर में राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने एक लेख में लिखा, ‘यह बहुत शर्म की बात है कि भारतीय सांसदों को अब संयुक्त राष्ट्र में नहीं भेजा जाता है।’ अंततः संसद के दोनों सदनों के प्रतिनिधियों को न्यूयॉर्क भेजने का निर्णय लिया गया, लेकिन इसे ‘गैर-आधिकारिक यात्रा’ बताया गया। डेरेक के शब्दों में, “काना मामा नई मामा से बेहतर हैं! जो भेजा जा रहा है उसका मैं स्वागत करता हूं. यह विपक्ष की रचनात्मक मांग थी, जो आज कुछ हद तक पूरी हो गयी है. हम एक आधिकारिक दौरा चाहते थे. हालाँकि ऐसा नहीं हुआ।”

मालूम हो कि 4 से 8 नवंबर तक चुने गए सांसद राष्ट्रीय पंचायत में रहेंगे. पहले चरण में 15 और दूसरे चरण में 15 और सांसद भेजे जाएंगे. तृणमूल की ओर से राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव मैदान में होंगी. पार्टी नेतृत्व ने कहा कि तृणमूल के किस सांसद को लोकसभा से भेजा जाएगा, इसका फैसला जल्द किया जाएगा. इसके अलावा एसपी के रामगोपाल यादव, डीएमके के तिरुचि शिवा, कांग्रेस के राजीव शुक्ला, बीजेपी के संबित पात्रा जैसे सांसद उस प्रतिनिधिमंडल में हैं. गौरतलब है कि आप की ओर से किसी अन्य सांसद स्वाति मालीवाल को नहीं चुना जा रहा है, जिनके साथ पार्टी नेतृत्व के रिश्ते लगभग खराब हैं। सिंगापुर के पूर्व राजनयिक ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तत्काल सुधार की मांग की और ब्रिटेन की जगह भारत को वहां स्थायी सदस्य बनाया जाना चाहिए. किशोर महबुबानी ने एक समाचार चैनल से कहा, ”ब्रिटेन को भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट देनी चाहिए.”

महबुबानी के मुताबिक, ”इसमें कोई शक नहीं है कि भारत अब अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे शक्तिशाली देश है.” ब्रिटेन अब उतना शक्तिशाली नहीं है जितना पहले हुआ करता था. उन्होंने अमेरिका के डर से दशकों तक अपनी वीटो शक्ति का प्रयोग भी नहीं किया है। इसलिए उन्होंने दावा किया कि भारत उस स्थान का हकदार है. महबुबानी ने आगे कहा, “(संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों ने) 20वीं सदी की शुरुआत में राष्ट्र संघ के पतन से सबक सीखा- अगर कोई बड़ी शक्ति जाती है, तो संगठन ध्वस्त हो जाता है। उनका यह भी मानना ​​था कि वर्तमान महान शक्ति संगठन में होनी चाहिए न कि अतीत में।” पूर्व राजनयिक का दावा है कि अगर ब्रिटेन सुरक्षा परिषद का स्थायी पद छोड़ देता है तो यह ब्रिटेन के लिए भी अच्छा होगा. वे बहुत स्वतंत्र रूप से काम कर सकते हैं. महबुबानी ने स्वयं कई अवसरों पर संयुक्त राष्ट्र में सिंगापुर के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया। वह सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भी बने। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महीने सिंगापुर दौरे पर जाने वाले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी-अभी रूस के दौरे से लौटे हैं. उनके दौरे के बाद अमेरिका परोक्ष रूप से बोलना बंद नहीं कर रहे हैं. लेकिन नई दिल्ली मॉस्को की तरफ से हिल नहीं रही है. बल्कि मोदी की यात्रा के सकारात्मक माहौल को बरकरार रखते हुए भारत संयुक्त राष्ट्र में व्यावहारिक तौर पर रूस के साथ खड़ा रहा.

संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव पर मतदान किया जिसमें यूक्रेन में युद्ध को तत्काल समाप्त करने, ज़ापोरीज़िया परमाणु सुविधा से रूसी अधिकारियों को हटाने और यूक्रेन से रूसी सैनिकों की वापसी का आह्वान किया गया। लेकिन भारत ने उस वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने अपने रूस दौरे के दौरान प्रेस के सामने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा था कि युद्ध के मैदान में किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता है.

संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव के पक्ष में 99 देशों ने वोट किया. केवल 9 देशों ने विरोध में वोट किया. भारत सहित कुल 60 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। लगभग ढाई साल तक चले रूस-यूक्रेन युद्ध में नई दिल्ली ने एक बार भी मास्को के खिलाफ मतदान नहीं किया है।

अभिषेक-ऐश्वर्या की शादी में जुड़ा है इनका नाम, कौन हैं निमरत कौर के एक्स बॉयफ्रेंड?

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निम्रत का एक पुराना इंटरव्यू वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. वहां एक्ट्रेस ने अपने एक्स बॉयफ्रेंड के बारे में बात की. प्रैक्टिस में निम्रत कौर. फिल्म ‘दसवीं’ की शूटिंग के दौरान उनकी नजदीकियां अभिषेक बच्चन से हो गईं। इस वजह से अभिषेक की ऐश्वर्या से शादी टूट गई। ये अफवाह सोशल मीडिया पर चल रही है. इसी बीच निमरत का एक पुराने इंटरव्यू का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. वहां एक्ट्रेस ने अपने एक्स बॉयफ्रेंड के बारे में बात की.

निम्रत ने वह इंटरव्यू फिल्म ‘दसवीं’ के प्रमोशन के दौरान दिया था। उनके साथ अभिषेक भी थे. निमरत ने कहा कि वह अपने एक्स-बॉयफ्रेंड के बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहतीं क्योंकि वह अब शादीशुदा हैं। पूर्व प्रेमी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुशी से रह रहा है। इसलिए आप मीडिया के सामने उनके बारे में बात करके उन्हें असहज नहीं करना चाहेंगे.

निमरत की टिप्पणी से पता चला कि पूर्व प्रेमी उसका सहपाठी था। एक विद्यार्थी के रूप में वह बहुत अच्छे थे। वह थोड़ा शर्मीला था. वह रसायन विज्ञान की पढ़ाई में निम्रत की मदद करते थे। ‘दसवीं’ 2022 में रिलीज हुई थी। उस वक्त अभिषेक और ऐश्वर्या की शादी को 15 साल हो गए थे। यह सुनकर निम्रत हैरान रह गई.

पिछले कुछ महीनों से बी-टाउन में इस कपल की शादी में दरार आने की अटकलें चल रही हैं। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि वे तलाक लेने की तैयारी में हैं. ये अटकलें राधिका मर्चेंट और अनंत अंबानी की शादी में अलग-अलग एंट्री से और तेज हो गईं। हालांकि उन्हें शादी के मंडप के अंदर एक साथ समय बिताते हुए देखा जाता है। बच्चन दम्पति ने इन अटकलों पर कोई टिप्पणी नहीं की। बल्कि अभिषेक अपनी पत्नी और बेटी के साथ कैमरे में कैद हुए. ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन की शादी है दूरियों की वजह या निम्रत कौर! फिल्म ‘दसवीं’ की शूटिंग के दौरान अभिषेक निमरत के साथ रिलेशनशिप में आए। ये प्रथा अब बॉलीवुड में चल रही है. सोशल मीडिया पर निम्रत के साथ एक के बाद एक ट्रोलिंग हो रही है। आखिरकार एक्ट्रेस ने मीडिया के सामने अपना मुंह खोला.

निम्रत निजी जिंदगी में मानवाधिकारों के पालन के बारे में बात करती हैं। एक्ट्रेस के मुताबिक, ‘मैं जो भी करूंगी, लोग अपनी इच्छानुसार कमेंट करेंगे।’ अपने और अभिषेक बच्चन के बारे में अफवाहों पर निम्रत ने कहा, ”ऐसी कोई अफवाह नहीं है। मैं अपना काम अपने दिल से कर रहा हूं।”

अपने खिलाफ लगातार हो रही ट्रोलिंग पर एक्ट्रेस ने कोई टिप्पणी नहीं की. उन्होंने साफ किया कि वह अभी काम में व्यस्त हैं. 2022 में निमरत ने अभिषेक के साथ फिल्म ‘दसवीं’ में काम किया। उस वक्त अभिषेक और ऐश्वर्या की शादी को 15 साल हो गए थे। ये सुनकर निमरत थोड़ी हैरान हो गईं. इंटरव्यू के होस्ट ने अभिषेक की 15 साल की खुशहाल शादी की भी तारीफ की. यह सुनकर निमरत हैरान रह गईं और बोलीं, ”15 साल!” अभिषेक ने टिप्पणी की, “हां, 15 लंबे साल। 2007 से 2022 तक।” निमरत ने हैरान होकर जवाब दिया, ‘बहुत बढ़िया.’ हालांकि, इस अफवाह पर न तो ऐश्वर्या और न ही अभिषेक ने अपना मुंह खोला है। पहले तो सुनने में आया था कि सामाजिक जीवन में कमी के कारण उनके बीच दूरियां आ गई थीं. विशेष रूप से, अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट ने एक साथ शादी समारोह में प्रवेश नहीं किया, जिससे तलाक की अटकलें तेज हो गईं। हालांकि बाद में उन्हें एक साथ समय बिताते देखा गया। लेकिन पिछले कुछ दिनों से खबर फैल रही है कि ऐश्वर्या की अभिषेक से दूरियां निमरत से नजदीकियों की वजह से हैं। एक्ट्रेस ने फिल्म ‘लंचबॉक्स’ और ‘एयरलिफ्ट’ में अभिनय से लोकप्रियता हासिल की।

स्टार्स पहले से ही अपना ख्याल रखते हैं। जिस तरह आम लोग नौकरी के लिए ऑफिस में काम करते हैं, उसी तरह चांदी की दुनिया के सितारों के लिए उनकी शक्ल एक तरह का ऑफिस होती है। उसे स्वस्थ रखने के लिए हर पल काम करना पड़ता है। ख्याल रखना होगा यहां तक ​​कि एक पूर्व ब्यूटी क्वीन को भी अपना ख्याल रखना पड़ता है। हालांकि ऐश्वर्या का कहना है कि जब त्वचा की देखभाल की बात आती है तो वह इसे ज़्यादा करने में विश्वास नहीं रखती हैं। वह त्वचा की देखभाल के लिए एक सरल सिद्धांत का पालन करती हैं और मानती हैं कि यह सबसे प्रभावी तरीका है।

किसी पूर्व मिस वर्ल्ड से त्वचा की देखभाल के टिप्स लेना कोई आसान काम नहीं है। वह यह सलाह भी हर जगह नहीं कहते. लेकिन एक बार ऐश्वर्या ने एक ब्रिटिश फैशन मैगजीन से अपनी स्किन केयर के बारे में बात की थी। ऐश्वर्या से पूछा गया कि उनका रोजाना सुबह का मेकअप रूटीन क्या है? क्योंकि ज्यादातर मामलों में देखा जा सकता है कि सितारे अपने सुबह के मेकअप को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। हालांकि, ऐश्वर्या ने सवाल सुनकर कहा, बहुत आसान है। मैं कुछ भी बहुत अलग नहीं करता. और जैसे पांच महिलाएं सुबह से रात तक हर पल समय के खिलाफ लड़ती हैं, वैसे ही मैं भी लड़ती हूं। इसलिए दिन गुजारने के लिए, सबसे महत्वपूर्ण चीज जो मैं देता हूं वह है हाइड्रेटेड और स्वच्छ रहना।”

ऐश्वर्या का मानना ​​है कि स्वच्छता किसी भी समस्या के समाधान की कुंजी है। उनके मुताबिक, ”किसी भी समस्या का समाधान अंदर से ही होना चाहिए। अगर आप अंदर अच्छी तरह से रखते हैं, तो इसे साफ रखें, इसे नम रखें। लेकिन आपकी बाहरी त्वचा अपना ख्याल खुद रखेगी।” इसके अलावा, ऐश्वर्या दिन की शुरुआत और अंत में त्वचा को अच्छे से मॉइस्चराइज करने पर भी जोर देती हैं।

पूर्व विश्व सुंदरी से पूछा गया कि अगर युवा ऐश्वर्या से इस उम्र में करियर संबंधी कोई सलाह मांगी जाए तो वह क्या कहेंगी? जवाब में ऐश्वर्या ने कहा, ”मैं आपसे पानी पीने के लिए कहूंगी. क्योंकि मुझे लगता है, सारी व्यस्तता के कारण शायद मैंने पर्याप्त पानी नहीं पिया।” ऐश्वर्या ने कहा, ”किसी ने मुझसे कहा, जैसी हो वैसी ही रहो। इसे सरल रखें मुझे लगता है सबसे अच्छी सलाह यह है कि आप जो हैं उसमें आश्वस्त रहें।”