Friday, March 20, 2026
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क्या ब्रिक्स सम्मेलन में भारत और चीन के मुद्दे सुलझ सकते हैं?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ब्रिक्स सम्मेलन में भारत और चीन के मुद्दे सुलझ सकते हैं या नहीं! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग अगले हफ्ते 22-23 अक्टूबर को रूस के कजान शहर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस दौरान मोदी और शी का आमना-सामना भी होगा। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के न्योते पर मोदी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मंगलवार से कजान की दो दिन की यात्रा पर होंगे। पेइचिंग में चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि शी शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग ने ब्रिक्स (ब्राजील-रूस-भारत-चीन-दक्षिण अफ्रीका) शिखर सम्मेलन से इतर जोहानिसबर्ग में अनौपचारिक बातचीत की थी। भारत या चीन की ओर से हालांकि अभी तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। भारतीय और चीनी सैनिक चार साल से अधिक समय से पूर्वी लद्दाख में LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर तीखे गतिरोध में उलझे हुए हैं।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि मोदी के कजान में ब्रिक्स सदस्य देशों के समकक्षों और आमंत्रित नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करने की भी उम्मीद है। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी, रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। इस दौरान दोनों नेता यूक्रेन संघर्ष पर विचार-विमर्श करेंगे। पुतिन ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक का पिछले महीने प्रस्ताव रखा था, जब NSA अजीत डोभाल ने सेंट पीटर्सबर्ग में उनसे मुलाकात की थी। इससे पहले मोदी ने जुलाई में मॉस्को का दौरा किया था और कुछ सप्ताह बाद वह यूक्रेन गए थे। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ बातचीत में मोदी ने कहा कि यूक्रेन और रूस को बिना समय बर्बाद किए एक साथ बैठकर युद्ध को समाप्त करना चाहिए। भारत क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है। इस तरह चार महीनों में मोदी का यह दूसरा रूस दौरा होगा। विदेश मंत्रालय ने बताया कि ‌BRICS सम्मेलन नेताओं को दुनिया के प्रमुख मुद्दों पर चर्चा के लिए अहम मंच देगा। इस सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए नए युग की शुरुआत करने को लेकर अन्य पक्षों से बातचीत करेंगे। ब्रिक्स के विस्तार के बाद पहला शिखर सम्मेलन होगा, जिसका आयोजन रूस की अध्यक्षता में हो रहा है। ब्रिक्स में मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका शामिल थे, लेकिन अब इसमें पांच और देश शामिल हो गए हैं।

नईब्रिक्स समिट की मेजबानी करने जा रहे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार को कहा है कि यह मंच ‘पश्चिम विरोधी’ नहीं है, यह सिर्फ नॉन-वेस्ट यानी ‘गैर-पश्चिम’ समूह है। इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी का जिक्र किया और कहा कि वह भी ऐसा कह चुके हैं। इसके अलावा पुतिन ने यह भी कहा कि ब्रिक्स के दरवाजे नए सदस्यों के लिए बंद नहीं हैं। ब्रिक्स आने वाले वर्षों में दुनिया के आर्थिक विकास को दिशा देगा। पुतिन ने आर्थिक विकास का जिक्र करते हुए कहा कि आने वाले वक्त में ब्रिक्स देशों की इकनॉमिक ग्रोथ बाहरी कारणों और दखल पर कम निर्भर हो सकेगी। यह उनकी आर्थिक संप्रभुता की दिशा में अहम होगा। पुतिन ने यह भी कहा कि करीब 30 देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा जताई है और आने वाली समिट में इस विस्तार को लेकर और विचार होने की संभावना है। जैसे-जैसे समूह विकसित होगा, गैर-सदस्य देशों को भी फायदा मिलेगा।

उन्होंने अमेरिका पर चीन में विकास को रोकने की कोशिश करने का आरोप लगाया। पुतिन ने कहा, ‘यह सूरज से यह कहने जैसा है कि वह उगना बंद कर दे।’ यह पूछे जाने पर कि क्या यूक्रेन में युद्ध समाप्त होने की कोई समयसीमा है, पुतिन ने कहा कि कोई समयसीमा तय करना कठिन और प्रतिकूल होगा। उन्होंने कहा कि रूस विजयी होगा। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रुप के सदस्य स्विफ्ट जैसी फाइनैंशनल मेसेजिंग सिस्टम पर भी काम कर रहे हैं, जिन पर पश्चिमी प्रतिबंध काम नहीं करेंगे। रूस देशों की स्थानीय करंसी के इस्तेमाल पर जोर देता रहा है।

ब्रिक्स समिट पर सबकी निगाहें इसलिए भी लगी हैं कि इसमें हिस्सा लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग भी वहां पहुंचे होंगे। ऐसे में सवाल है कि क्या मोदी-जिनपिंग की मुलाकात हो सकती है, वह भी तब, जबकि हाल में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि चीन के साथ सैनिकों को पीछे करने का मुद्दा 75% हल हो चुका है। बीती जुलाई में हुई मोदी की रूस यात्रा चाहे अनचाहे ही सही, पश्चिमी देशों में चर्चा का विषय बन गई थी। ऐसे में युद्ध के बीच इस समिट के इतर होने वाली मुलाकातों और बयानों पर पश्चिम की भी नजर होगी।

 

क्या आने वाले समय में भारत चीन सीमा विवाद समाप्त हो सकता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आने वाले समय में भारत चीन सीमा विवाद समाप्त हो सकता है या नहीं! हमेशा से सुनते आए हैं- बड़े लोगों की बात ही कुछ और होती है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बड़े लोगों का जमावड़ा हो रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस सम्मेलन का हिस्सा होंगे। बड़े लोगों की इस मुलाकात से पहले ‘कुछ मीठा हो जाए’ जैसी खबर आ गई है। भारत के विदेश सचिव विवेक मिसरी ने बताया है कि भारत और चीन अपनी सीमा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की साझी पेट्रोलिंग पर सहमत हो गए हैं। 2020 से ही जारी विवाद पर यह घोषणा वाकई बड़ा डेवलपमेंट है। इससे यह उम्मीद थोड़ी पक्की होती दिख रही है कि रूस के कजान शहर में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात सम्मेलन के इतर भी हो सकती है। सवाल है कि अमेरिका इसे किस नजरिए से देखेगा? इसमें कोई संदेह नहीं कि एलएसी पर गश्त को लेकर समझौते पर पहुंचना एक बड़ी कामयाबी है क्योंकि भारत और चीन के बीच 2020 से शुरू हुआ सीमा विवाद बेहद भयंकर रूप ले चुका है। ताजा समौझते से इससे सीमा पर तैनात सेनाओं की वापसी हो सकती है और तनाव कम हो सकता है। इस समझौते को क्षेत्र में शांति बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने रूस जाने वाले हैं। इस दौरान उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात होने की उम्मीद है। हालांकि, बैठक को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि दोनों नेता नई व्यवस्था और सीमा विवाद को सुलझाने के अन्य राजनयिक प्रयासों पर चर्चा करेंगे। भारत-चीन सीमा विवाद मई 2020 में चरम पर पहुंच गया था, जब एलएसी पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़पें हुई थीं। जून 2020 में गलवान घाटी में सबसे गंभीर टकराव हुआ था। इस झड़प में 20 भारतीय सैनिक और 40 से अधिक चीनी सैनिक मारे गए थे या गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लद्दाख के पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में हुई यह घटना, दशकों में दो परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकराव थी। तब से, दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं।

भारत-चीन के बीच सीमा का अस्पष्ट रेखांकन नहीं है। इस कारण पिछले कुछ वर्षों में कई बार झड़पें हुई हैं, लेकिन 2020 की गलवान झड़प ने दोनों देशों को एक बड़े सैन्य संघर्ष के कगार पर धकेल दिया था। गतिरोध ने न केवल उनके राजनयिक संबंधों को बल्कि आर्थिक संबंधों को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। इसके बाद से भारत ने चीनी निवेशों की जांच कड़ी कर दी है और चीनी फर्मों से जुड़ी कई बड़ी परियोजनाओं को रोक दिया है। 2020 की झड़प के बाद से माहौल को शांत करने के लिए दोनों देशों के बीच कई दौर की राजनयिक और सैन्य वार्ता हुई है। यह प्रक्रिया धीमी रही है क्योंकि दोनों पक्ष इस क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, हाल के घटनाक्रम इन वार्ताओं की गतिशीलता में बदलाव का संकेत देते हैं।

भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, बातें रचनात्मक रही हैं और इस कारण ‘भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त की व्यवस्था’ हुई है। इन पेट्रोलिंग अरेंजमेंट से सैन्य बलों की वापसी और 2020 से चली आ रही कई समस्याओं के समाधान की उम्मीद है। नया समझौता कथित तौर पर देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में गश्त से संबंधित है, जो एलएसी के साथ तनाव के दो प्रमुख बिंदु हैं। वार्ता में सीमा पर यथास्थिति को अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में बहाल करने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है, जो भारत की ओर से एक प्रमुख मांग है। प्रगति के बावजूद, अभी भी कई अनसुलझे मुद्दे हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है। इससे पहले कि स्थिति पूरी तरह से सामान्य हो सके, भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस महीने की शुरुआत में बताया था कि जहां ‘आसान’ मुद्दों का समाधान हो गया है, वहीं अधिक कठिन परिस्थितियां अभी भी बनी हुई हैं। विशेष रूप से देपसांग के मैदानों और पूर्वी लद्दाख के कुछ हिस्सों में ये अनसुलझे क्षेत्र पूर्ण वापसी के लिए एक चुनौती बने हुए हैं।

ताजा समझौता एक सकारात्मक कदम तो है, लेकिन इसे जमीन पर लागू करने में काफी सावधानी बरतनी होगी। यह सुनिश्चित करने में दोनों पक्षों के सैन्य कमांडर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि वापसी सुचारू रूप से हो और तनाव फिर से न भड़के। जनरल द्विवेदी ने इस बात पर जोर दिया है कि राजनयिक संकेत सकारात्मक हैं, लेकिन बहुत कुछ आने वाले हफ्तों और महीनों में सैन्य कमांडरों द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करता है। हालिया समझौते के भारत-चीन संबंधों के लिए व्यापक निहितार्थ हैं। 2020 के संघर्ष ने राजनयिक संबंधों को बुरी तरह प्रभावित किया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर समझौतों का उल्लंघन करने और स्थिति को भड़काने का आरोप लगाया। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को भी झटका लगा। भारत ने चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता को कम करने के लिए कदम उठाए। संघर्ष के बाद चीनी निवेश पर जांच कड़ी कर दी गई और कई चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

अमेरिका ने कनाडा में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और अपने यहां आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश के आरोपों में भारत को घेरने की लगातार कोशिशें की हैं। अमेरिका ने न केवल निज्जर की हत्या मामले में कनाडा के कंधे पर हाथ रखकर भारत की तरफ आंखें तरेर रहा है बल्कि पन्नू मामले में भारत पर लगातार दबाव बनाना चाह रहा है। ऐसे में उसके घोर प्रतिस्पर्धी चीन के साथ भारत के सबसे बड़े विवाद के सुलझने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना काफी दिलचस्प होगा।

 

ड्रग्स के आरोप से घिरने पर बीजेपी को क्या बोली कांग्रेस?

हाल ही में ड्रग्स के आरोपों से घिरने पर कांग्रेस ने बीजेपी पर ही हमला बोल दिया है! दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 5 हजार करोड़ रुपये के इंटरनेशनल ड्रग्स सिंडिकेट में चौंकाने वाला खुलासा किया। इस खुलासे से देश का सियासी पारा चढ़ गया है। इस केस में मास्टरमाइंड तुषार गोयल का नाम सामने आया है, जो 2022 तक दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के आरटीआई सेल का चेयरमैन रह चुका है। गोयल की कांग्रेस से जुड़ी पृष्ठभूमि और ड्रग्स सिंडिकेट से जुड़े तार ने इस मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है। उधर इस मामले को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला है। स्पेशल सेल की पूछताछ में तुषार गोयल ने यह खुलासा किया कि वह कांग्रेस के आरटीआई सेल का प्रमुख था, और उसने अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पर ‘आरटीआई सेल चेयरमैन, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस’ लिखा हुआ है। इसके अलावा, गोयल ने ‘डिग्गी गोयल’ के नाम से भी एक प्रोफाइल बनाई हुई है। जांच के दौरान, कई कांग्रेस नेताओं के साथ गोयल के फोटो भी सामने आए हैं।

कांग्रेस और बीजेपी के बीच एक्स पर इस मामले पर जुबानी जंग छिड़ी हुई है। कांग्रेस ने बीजेपी पर आरोप लगाया है कि वो झूठ फैलाकर देश को गुमराह कर रही है। मामला एक शख्स तुषार गोयल से जुड़ा है, जिसे बीजेपी ने युवा कांग्रेस का नेता बताया है। कांग्रेस ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि तुषार गोयल अक्टूबर 2022 से ही युवा कांग्रेस से नहीं जुड़े हैं। कांग्रेस ने बीजेपी पर कुछ तथ्य छिपाने का आरोप भी लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि तुषार गोयल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण अक्टूबर 2022 में ही दिल्ली प्रदेश युवा कांग्रेस के आरटीआई विभाग से हटा दिया गया था। 17 अक्टूबर 2022 के बाद से गोयल का युवा कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं है।

कांग्रेस ने दिल्ली पुलिस की ओर से मीडिया में दी गई जानकारी का भी हवाला दिया, जिसमें खुद तुषार गोयल ने स्वीकार किया है कि 2021-22 के बाद उनका युवा कांग्रेस से कोई संबंध नहीं रहा।कांग्रेस ने बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी और बीजेपी आईटी सेल पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने कहा कि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तथ्य छिपाए और जानबूझकर तुषार गोयल को युवा कांग्रेस का पदाधिकारी बताया। कांग्रेस ने इसे भारतीय युवा कांग्रेस की छवि धूमिल करने की कोशिश बताया है और कहा है कि वह इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी।

बुधवार को दिल्ली पुलिस ने ड्रग्स की अब तक की बड़ी खेप पकड़ी। अधिकारियों के अनुसार, 560 किलोग्राम से अधिक कोकीन और 40 किलोग्राम ‘हाइड्रोपोनिक मारिजुआना’ जब्त किया गया। जब्त किए गए ड्रग्स की अनुमानित कीमत लगभग 5,620 करोड़ रुपये है। स्पेशल सेल टीम ने महिपालपुर से चार व्यक्तियों को गिरफ्तार किया। गोयल इस अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स गिरोह का सरगना बताया जा रहा है। 1 अक्टूबर को महिपालपुर में एक गोदाम के बाहर सबको गिरफ्तार किया गया, जहां 22 कार्टन में 547 किलोग्राम कोकीन और 40 किलोग्राम हाइड्रोपोनिक मारिजुआना मिला।

गिरफ्तार किया गया व्यक्ति युवा कांग्रेस का पदाधिकारी है, जिसका नाम तुषार गोयल उर्फ डिक्की है। उसका सामाजिक प्रोफाइल हरियाणा कांग्रेस नेतृत्व के साथ-साथ अन्य लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है। राहुल गांधी को ड्रग कार्टेल में कांग्रेस की संलिप्तता और लाखों युवा पुरुषों और महिलाओं के जीवन को बर्बाद करने के उनके प्रयासों के बारे में बताना चाहिए।”अमित मालवीय ने आगे लिखा,”कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (2006-2013) के तहत, पूरे भारत में केवल 768 करोड़ रुपये की ड्रग्स जब्त की गई थी। इसके विपरीत, भाजपा साशन 2014-2022 के बीच, 22,000 करोड़ रुपये की ड्रग्स बरामद की गई है। एक राष्ट्रीय पार्टी, जो ड्रग्स की तस्करी करती है, कल्पना से परे डरावनी है।”वहीं, भाजपा ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा,”ये बात साफ हो रही है कि राहुल गांधी के मोहब्बत की दुकान में अभी तक नफरत का सामान तो दिख रहा था, लेकिन अब नशे का सामान भी मिल रहा है। कांग्रेस का बरामद हुए ड्रग्स और आरोपी के साथ क्या कनेक्शन है?”

संभावना जताई जा रही है कि ड्रग यह खेप समुद्री मार्ग से लाई गई हो। बरामद ड्रग्स की कीमत पुलिस ने 5000 करोड़ से अधिक के होने का दावा किया है।एडिशनल पुलिस कमिश्नर, स्पेशल सेल, प्रमोद सिंह कुशवाहा के मुताबिक डीसीपी अमित कौशिक, एसीपी कैलाश सिंह बिष्ट व इंस्पेक्टर राहुल कुमार के नेतृत्व में सेल की टीम ने अंतरराष्ट्रीय कार्टेल के चार सदस्यों को गिरफ्तार किया। इनकी गिरफ्तारी ड्रग्स तस्करी में शामिल संगठित अपराध सिंडिकेट को नष्ट करने के प्रयासों में एक बड़ी सफलता है।

 

जेलों में जाति के आधार पर काम के लिए क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जाति के आधार पर काम के लिए एक बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि देश की किसी भी जेल में जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जेल नियमावली में मौजूद ऐसे सभी प्रावधानों को हटाया जाना चाहिए जो इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। यह याचिका महाराष्ट्र के कल्याण की रहने वाली सुकन्या शांता ने दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ राज्यों की जेल नियमावली जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देती है। जेल में भेदभाव से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या दलीलें दी गईं? आइए बताते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जेल में भेदभाव करने वाले 10 राज्यों के जेल नियमावली को ‘असंवैधानिक’ करार दिया। इन भेदभावों में शारीरिक श्रम का विभाजन, बैरकों को अलग-अलग करना और जाति के आधार पर कैदियों से पक्षपात शामिल हैं। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा किसम्मान के साथ जीने का अधिकार कैदियों को भी प्राप्त है।

अदालत ने कहा, ‘औपनिवेशिक काल के आपराधिक कानून औपनिवेशिक काल के बाद के दौर को भी प्रभावित कर रहे हैं।’ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से तीन महीने के भीतर अपने जेल नियमावली और कानूनों में संशोधन करने और उसके समक्ष अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। पीठ ने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के जेल नियमावली के कुछ भेदभावपूर्ण प्रावधानों पर गौर किया और उन्हें खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि सभी लोग एकसमान जन्म लेते हैं। किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व, स्पर्श या उपस्थिति से कोई कलंक नहीं जोड़ा जा सकता। अनुच्छेद 17 के माध्यम से, हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक की स्थिति की समानता को मजबूत करता है…। अदालत ने एक उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि कास्ट सिस्टम में निचले समुदायों के दोषियों से जेल में अपने पारंपरिक व्यवसाय जारी रखने की अपेक्षा की जाती है और जेल के बाहर के जातीय सिस्टम को जेल के भीतर भी दोहराया जाता है। कोर्ट ने आगे कहा, ‘ऐसे नियम जो विशेष रूप से या परोक्ष रूप से जाति पहचान के आधार पर कैदियों के बीच भेदभाव करते हैं, वे अवैध वर्गीकरण और मौलिक समानता के उल्लंघन के कारण अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हैं।’ उदाहरण के लिए, झाड़ू लगाने का काम सौंपने संबंधी नियम, जिसमें यह प्रावधान है कि ‘सफाई कर्मियों का चयन मेहतर या हरि जाति से किया जाएगा’, भी भेदभाव का हिस्सा है।

पत्रकार सुकन्या शांता की एक जनहित याचिका पर 148 पेजों का फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस ने जेलों के अंदर विचाराधीन या दोषी कैदियों के रजिस्टरों से ‘जाति’ कॉलम और जाति के किसी भी संदर्भ को हटाने का आदेश भी दिया। सुकन्या शांता ने जेलों में प्रचलित जाति-आधारित भेदभाव पर एक लेख भी लिखा था।सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा, ‘सम्मान के साथ जीने का अधिकार कैदियों को भी है। कैदियों को सम्मान प्रदान न करना औपनिवेशिक काल की निशानी है, जब उन्हें मानवीय गुणों से वंचित किया जाता था।’ फैसले में कहा गया है, ‘संविधान-पूर्व युग के सत्तावादी शासन ने जेलों को न केवल कारावास के स्थान के रूप में देखा, बल्कि वर्चस्व के उपकरण के रूप में भी देखा। इस अदालत ने संविधान द्वारा लाए गए बदले हुए कानूनी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करते हुए माना है कि कैदियों को भी सम्मान का अधिकार है।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘इन प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव का निषेध), 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और 23 (जबरन श्रम के खिलाफ अधिकार) का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक घोषित किया जाता है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया जाता है कि वे तीन महीने की अवधि के भीतर इस फैसले के अनुसार अपने जेल नियामवली/नियमों को संशोधित करें।’ इसने केंद्र को आदेश दिया कि वह तीन महीने के भीतर मॉडल जेल नियमावली, 2016 और मॉडल जेल और सुधार सेवा अधिनियम, 2023 में जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए फैसले के अनुसार आवश्यक बदलाव करे।

फैसले में कहा गया है कि अगर किसी राज्य में आदतन अपराधी कानून नहीं है, तो केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाता है कि वे फैसले के अनुसार जेल नियमावली में आवश्यक बदलाव करें। इसके साथ ही पुलिस को गाइडलाइन का पालन करने का निर्देश दिया जाता है… ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विमुक्त जनजातियों के सदस्यों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार न किया जाए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट जेलों के अंदर जाति-आधारित भेदभाव के मामलों का भी स्वतः संज्ञान लिया और मामले को तीन महीने बाद ‘जेलों के अंदर भेदभाव के संबंध में’ शीर्षक के साथ सूचीबद्ध किया। उसने राज्यों से फैसले की अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा। अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह फैसले की प्रति तीन सप्ताह की अवधि के भीतर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को प्रसारित करे।

 

संविधान के वह परिवर्तन जो गैरकानूनी कहलाए!

आज हम आपको संविधान के वह परिवर्तन बताएंगे जो गैर कानूनी कहलाए गए हैं! क्या धर्मनिरपेक्षता एक यूरोपीय अवधारणा है जिसकी भारत में कोई जगह नहीं है? तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने हाल ही में यह कहकर सबको चौंका दिया कि धर्मनिरपेक्षता एक यूरोपीय अवधारणा है जिसका भारत में कोई स्थान नहीं है। यह ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ पर हमले का एक हिस्सा है। माना जाता है कि यह मानसिकता मुस्लिम और ईसाई विजेताओं की एक हजार साल की गुलामी के कारण बनी है। अब कांग्रेस ने इसे अपना लिया है। केंद्र की एनडीए सरकार के नियुक्त किए गए राज्यपाल आर. एन. रवि ने यह सही कहा है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समााजवादी’ शब्दों को 1976 में आपातकाल के दौरान एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था। हमें हर हाल में उस प्रविष्टि को हटाना चाहिए। इससे संविधान के धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव न करने के मूल सिद्धांत में कोई बदलाव नहीं आएगा। इसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को शामिल करने के लिए धर्मनिरपेक्षता से कहीं आगे तक जाना शामिल है।

संविधान का मसौदा भारतीयों द्वारा तैयार किया गया था जो सबसे अच्छी प्राचीन परंपराओं को बुद्धिमान आधुनिक परंपराओं के साथ जोड़ना चाहते थे। मसौदा तैयार करने वालों ने प्राचीन ग्रंथों में निहित कई भेदभावपूर्ण मान्यताओं को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। उन्हें यूरोपीय विजेताओं को बाहर निकालने पर गर्व था, लेकिन उन्होंने दोषपूर्ण परंपराओं को सुधारने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने संकीर्ण परंपराओं को खारिज करते हुए सार्वभौमिक अधिकारों के सिद्धांत को अपनाया। इसे ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ कहना अपमानजनक है। रवि ने कहा, ‘यूरोप में, धर्मनिरपेक्षता का उदय तब हुआ जब चर्च और राजा के बीच लड़ाई हुई और इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए यह अवधारणा विकसित की गई।’ यह इतिहास के छात्रों को हैरान कर देगा। ‘स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व’ का नारा, जिसमें धर्मनिरपेक्षता भी शामिल है, राजाओं की ओर से किसी मध्ययुगीन सौदे से नहीं बल्कि यूरोपीय ज्ञानोदय से आया था। यह विचारों का वह समूह था जिसने 1776 की अमेरिकी क्रांति और 1789 की फ्रांसीसी क्रांति को प्रेरित किया। क्या रवि चाहते हैं कि भारत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अस्वीकार कर दे क्योंकि इन आदर्शों की जड़ें यूरोपीय हैं, और इनका उल्लेख मनु स्मृति या धर्मशास्त्रों में नहीं है?

क्या उन्हें प्राचीन हिंदू परंपराओं के अलावा कोई दार्शनिक, सांस्कृतिक या नैतिक मूल्य नहीं दिखता? सभी प्राचीन धार्मिक परंपराएं – हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी – विभिन्न प्रकार के भेदभाव का प्रयास करती थीं। लेकिन बाद में दुनिया भर के राष्ट्रों ने सार्वभौमिक, गैर-भेदभावपूर्ण मूल्यों की ओर बढ़ने की आवश्यकता को स्वीकार किया। संविधान भारत के लिए भी ऐसा करता है। मध्य पूर्व के शुरुआती इस्लामी विजेताओं ने तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन किया, लेकिन उनके पास धर्मनिरपेक्षता के लिए समय नहीं था। ऐतिहासिक रूप से, हिंदुओं ने मनु के कानूनों को स्वीकार किया, जिसमें निचली जातियों, आदिवासियों, गैर-हिंदुओं और महिलाओं के साथ भेदभाव किया गया था। धर्मशास्त्रों ने जातिगत मानदंडों का उल्लंघन करने के लिए सजा निर्धारित किए, जिसमें ऊंची जाति की महिलाओं के लिए निम्न जाति के पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने की हिम्मत करने पर असाधारण सजा था। गैर-हिंदुओं को ‘म्लेच्छ’ कहा जाता था, जो बर्बर थे, जिनके साथ समाजीकरण नहीं किया जा सकता था। कर्म के सिद्धांत का उपयोग गरीबों और निचली जातियों की दयनीय स्थिति को उचित ठहराने के लिए किया जाता था, जो पिछले जन्म में किए गए पापों के लिए उचित दंड था।

फिर भी आज लगभग सभी देश सार्वभौमिकता और गैर-भेदभाव को सुनिश्चित करने वाले मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र का समर्थन करते हैं। रवि कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता कोई ‘भारतीय’ विचार नहीं है, बल्कि धर्म की प्रशंसा करती है। लेकिन क्या वे द्रोणाचार्य की ओर से आदिवासी युवा एकलव्य से आदिवासियों पर क्षत्रियों की श्रेष्ठता सुनिश्चित करने के लिए अपना अंगूठा काटने के लिए कहने को स्वीकार करते हैं? और शूद्र शंबूक को ब्राह्मणों के लिए आरक्षित श्लोकों का उच्चारण करने की हिम्मत दिखाने के लिए मृत्युदंड दिए जाने के बारे में क्या? क्या वे उन प्रथाओं की वापसी चाहते हैं जो आज अवैध हैं? संविधान का निर्माण उन गौरवशाली भारतीयों की ओर से किया गया था जिन्होंने यूरोपीय उपनिवेशवाद से लड़ाई लड़ी और उसे परास्त किया, फिर भी यूरोपीय विचारों में बहुत कुछ मूल्यवान पाया। आधुनिकीकरण करने वालों में न केवल जवाहरलाल नेहरू जैसे नास्तिक शामिल थे, बल्कि राजेंद्र प्रसाद से लेकर महाभारत के प्रसिद्ध अनुवादक सी राजगोपालाचारी तक जैसे धर्मपरायण हिंदू भी शामिल थे।

एक अन्य संविधान निर्माता, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बाद में बीजेपी के पूर्ववर्ती जनसंघ की स्थापना की। वे सभी स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की आवश्यकता को देखते थे। गांधी और टैगोर अंतर्राष्ट्रीयता के सबसे महान एक्सपोनेंट्स में से थे। गांधी ने प्रसिद्ध रूप से कहा था कि मैं नहीं चाहता कि मेरे घर को चारों तरफ से दीवारों से घेर दिया जाए और मेरी खिड़कियों को बंद कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि सभी देशों की संस्कृतियां मेरे घर के आस-पास यथासंभव स्वतंत्र रूप से बहें। लेकिन मैं उनमें से किसी से भी अपने पैर नहीं हटाना चाहता।’

टैगोर, एक अंतरराष्ट्रीयतावादी, जो राष्ट्रवाद से सावधान थे। उन्होंने एक प्रसिद्ध कविता, ‘व्हेयर द माइंड इज विदाउट फियर’ लिखी। इसमें उन्होंने एक ऐसे भारत की कामना की “जो संकीर्ण घरेलू दीवारों की ओर से टुकड़ों में नहीं टूटा है। जहां ‘तर्क की स्पष्ट धारा मृत आदत की सूखी रेगिस्तानी रेत में अपना रास्ता नहीं भूली है।’ संविधान निर्माताओं का उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता और गैर-भेदभाव को अपनाकर ऐसा ही करना था। हमें कोई भी मृत आदत के सूखे रेगिस्तानी रेत में वापस न ले जाए।

 

संविधान की प्रस्तावना को बदलने को लेकर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना को बदलने को लेकर एक बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक जनहित याचिका दायर कर संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग की है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता को हमेशा से भारतीय संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग माना गया है। वहीं याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 1976 में संविधान में 42वां संशोधन, जिसके तहत ये शब्द जोड़े गए थे, संसद में कभी बहस का विषय नहीं था। इस मामले में कोर्ट में क्या-क्या हुआ? आइए बताते हैं। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने पूर्व राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी, वकील विष्णु शंकर जैन और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई की। बेंच ने कहा, ‘इस अदालत ने कई फैसलों में माना है कि सेक्युलर हमेशा से संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा रही है। अगर समानता के अधिकार और संविधान में प्रयुक्त ‘बंधुत्व’ शब्द को सही से देखा जाए, तो इस बात का साफ संकेत मिलता है कि धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मुख्य विशेषता माना गया है।’

इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1976 में लाए गए 42वें संविधान संशोधन के तहत संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल किये गये थे। इस संशोधन ने प्रस्तावना में भारत का उल्लेख “संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य” से बदलकर “संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” कर दिया। सुनवाई के दौरान जैन ने दलील दी कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने कहा था कि ‘समाजवाद’ शब्द को शामिल करने से व्यक्तिगत आजादी पर अंकुश लगेगा। उन्होंने कहा कि प्रस्तावना को संशोधनों के जरिये संशोधित नहीं किया जा सकता। जस्टिस खन्ना ने कहा कि समाजवाद के अलग-अलग अर्थ हैं और पश्चिमी देशों में अपनाए गए अर्थ को नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘समाजवाद का अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसर की समानता होनी चाहिए और देश की संपत्ति समान रूप से वितरित की जानी चाहिए।’

याचिकाकर्ताओं में शामिल अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि वह न तो ‘समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता’ शब्दों के खिलाफ हैं और न ही संविधान में उनके शामिल किए जाने के खिलाफ हैं, बल्कि वह इन शब्दों को 1976 में प्रस्तावना में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं और वह भी 26 नवंबर, 1949 से पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ। उन्होंने कहा कि एक शब्द जोड़ने से देश में कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि भविष्य की सरकारों के लिए भानुमती का पिटारा खुल जाता है। उन्होंने कहा कि ये सरकारें इन शब्दों के साथ खेल सकती हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावना से एक शब्द हटाया जा सकता है। दूसरी ओर, स्वामी ने कहा कि प्रस्तावना 26 नवंबर, 1949 को की गई एक घोषणा थी, इसलिए बाद में संशोधन के माध्यम से इसमें और शब्द जोड़ना मनमाना था। उन्होंने कहा कि यह दर्शाना गलत है कि वर्तमान प्रस्तावना के अनुसार, भारतवासी 26 नवंबर, 1949 को भारत को एक समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाने के लिए सहमत हुए थे। पीठ ने कहा कि वह मामले की पड़ताल करेगी।

इसने मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 नवंबर की तारीख निर्धारित की। सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी को सवाल किया था कि क्या संविधान की प्रस्तावना को अपनाने की तारीख, 26 नवंबर 1949 को बरकरार रखते हुए संशोधित किया जा सकता है। जैन ने कहा कि भारत के संविधान की प्रस्तावना एक विशिष्ट तिथि के साथ आती है, इसलिए बिना चर्चा के इसमें संशोधन नहीं किया जा सकता। स्वामी ने कहा कि 42वां संशोधन अधिनियम आपातकाल (1975-77) के दौरान पारित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर 2022 को स्वामी की याचिका को अन्य लंबित मामले ‘बलराम सिंह और अन्य’ के साथ सुनवाई के लिए संलग्न कर दिया था। स्वामी और सिंह दोनों ने प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग की है।

स्वामी ने अपनी याचिका में दलील दी कि प्रस्तावना को बदला या निरस्त नहीं किया जा सकता है। समाजवाद के अलग-अलग अर्थ हैं और पश्चिमी देशों में अपनाए गए अर्थ को नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘समाजवाद का अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसर की समानता होनी चाहिए और देश की संपत्ति समान रूप से वितरित की जानी चाहिए।’उन्होंने कहा कि प्रस्तावना न केवल संविधान की आवश्यक विशेषताओं को इंगित करती है, बल्कि उन मूलभूत शर्तों को भी दर्शाती है जिनके आधार पर इसे एकीकृत समुदाय बनाने के लिए अपनाया गया था।

 

शाहरुख की अनगिनत गलतियां, नाइंसाफी! गौरी ने 33 साल की शादी को कैसे निभाया?

शाहरुख के शब्दों में, ”मैंने कभी नहीं सोचा था कि गौरी इतनी अच्छी मां बनेंगी। वह बच्चों के साथ आसानी से घुल-मिल नहीं पाता है।” शाहरुख खान और गौरी खान ने एक साथ 33 साल बिताए हैं। अब वे तीन बच्चों के माता-पिता हैं। आर्यन, सुहाना और अबराम के दुनिया में आने के बाद जिंदगी के मायने ही बदल गए। ये बात शाहरुख ने ‘कॉफी विद कर्ण’ इवेंट में कही। लेकिन उन्होंने कभी नहीं सोचा था, गौरी में एक अच्छी मां बनने के गुण हैं. इसके उलट शाहरुख को लगता था कि गौरी बच्चों से ज्यादा मेलजोल नहीं रखेंगी।

शाहरुख ने कहा, ”मैंने कभी नहीं सोचा था कि गौरी इतनी अच्छी मां बनेंगी। वह बच्चों से आसानी से घुल-मिल नहीं पाते। मैंने उन्हें कभी बच्चों को इतनी खुशी देते नहीं देखा। लड़कियाँ आमतौर पर बच्चों को देखकर बहुत स्नेही हो जाती हैं। लेकिन बिलकुल नहीं. इसलिए मुझे आश्चर्य हुआ कि गौरी एक माँ के रूप में इतनी अद्भुत कैसे निकलीं।”

शाहरुख ने कहा, गौरी एक साधारण मध्यमवर्गीय जीवनशैली पसंद करती हैं। जिस दुनिया में उसके जैसा पिता हो, वहां गौरी जैसी मां की जरूरत होती है। गौरी या बुद्धि हर चीज़ सोच-समझकर संभालती हैं। लेकिन सिर्फ एक मां के तौर पर ही नहीं, गौरी ने शाहरुख के साथ उनकी जिंदगी के हर मोड़ पर साथ दिया है। यानी 33 साल बाद भी प्यार में कोई कमी नहीं आई। शाहरुख ने एक इंटरव्यू में कहा, ”मुझे लगता है कि गौरी ने सब कुछ संभाल लिया है। मैंने कई गलतियाँ कीं। मैंने बहुत से बुरे काम किये हैं। लेकिन कहीं न कहीं, गौरी मुझे चुप कराने में कामयाब रही।” शाहरुख के मुताबिक, गौरी ने ही उन्हें जमीन से जुड़ा रहना सिखाया।

पहले बच्चे एरियन का जन्म 1997 में हुआ। जब आर्यन का जन्म हुआ तो शाहरुख भी ऑपरेशन थिएटर में मौजूद थे। एक्टर ने कहा, ”मुझे लगा कि गौरी शायद नहीं बचेंगी. उस समय बच्चा आपे से बाहर था। बच्चा इतना महत्वपूर्ण नहीं लग रहा था. गौरी कांप रही थी. मैं जानता हूं, जन्म देते वक्त ऐसे कोई नहीं मरता. लेकिन मैं बहुत डरा हुआ था।”

शाहरुख को लगता है कि आर्यन को उनके और गौरी की तरह दिखना होगा। शाहरुख ने ये भी कहा कि उन्होंने अपने बेटे का नाम आर्यन इसलिए रखा क्योंकि आर्यन नाम महिलाओं को पसंद आ सकता है. आर्यन की पहली निर्देशित फिल्म ‘स्टारडम’ जल्द ही रिलीज होने वाली है। 2007 में आई फिल्म ‘चौक दे इंडिया’ बॉक्स ऑफिस पर हिट रही थी। अभिनय के लिए शाहरुख खान जीते. इस फिल्म की कहानी हकीकत से बुनी गई है. हालांकि फिल्म के मेकर्स ने कभी ये दावा नहीं किया कि ‘चौक दे इंडिया’ किसी की बायोपिक है. इस बार इस फिल्म को लेकर दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर ने धमाकेदार दावा किया है. ‘चक दे ​​इंडिया’ जैसी फिल्मों में इस्लाम के अनुयायियों की जीत होती है. लेकिन हिंदुओं को अपमानित किया जाता है। अन्नू का दावा है.

अन्नू के मुताबिक, यह फिल्म हॉकी कोच रंजन नेगी के जीवन पर आधारित है। फिल्म में इस किरदार का नाम कबीर खान था। ये है अन्नू की आपत्ति. फिल्म में हिंदू व्यक्ति का नाम और धार्मिक पहचान क्यों बदली गई है? दिग्गज अभिनेता ने उठाया सवाल. उनके शब्दों में, ”दरअसल, भारत में मुसलमानों को अच्छे इंसान के तौर पर दिखाया जाता है. दूसरी ओर, हिंदू विद्वानों का मज़ाक उड़ाया जाता है।” यह स्पष्ट नहीं है कि अन्नू का यहाँ ‘विद्वान’ से तात्पर्य किससे है।

इंटरव्यू में बात करते-करते अन्नू रो पड़ीं। उन्होंने दावा किया कि वह अपनी आखिरी सांस इसी देश में लेना चाहते हैं. भले ही उनकी मृत्यु हो जाए, वह इस देश को नहीं छोड़ेंगे।’ हालांकि यह सीधे तौर पर रंजन नेगी की बायोपिक नहीं है, लेकिन हॉकी कोच ने फिल्म के निर्माण के दौरान कई सुझाव दिए। इसलिए फिल्म देखने के बाद कुछ दर्शकों को लगा कि इस फिल्म की कहानी रंजन नेगी के जीवन से ली गई है.

फिल्म ‘चौक दे इंडिया’ में कबीर खान को राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी के रूप में दिखाया गया था। पाकिस्तान से हारने के बाद उन पर देश को धोखा देने का आरोप लगा. जिसके चलते लोग उनके घर पर पथराव कर रहे हैं. उसका अंडकोश जल रहा है. उनके नाम के साथ ‘गद्दार’ की उपाधि जुड़ी हुई है. इसके बाद उन्हें महिला टीम हॉकी को प्रशिक्षित करने का मौका मिला। उनकी ट्रेनिंग से भारत जीता. कबीर खान को फिर मिला सम्मान!

रंगीन आलू! किस सब्जी को खाने से क्या फायदे होते हैं?

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पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आप रंगा आलू को घर में ‘मेहमान’ बनाकर रखेंगे तो यह बिल्कुल भी काम नहीं करेगा। दूसरी ओर, यदि आप आलू को छोड़कर उसे हेन्शेल का मित्र बना सकते हैं, तो अंत में यह उनके लिए ही बेहतर होगा। रंगा अलु एक दूर के रिश्तेदार रंगापिसी की तरह है। अगर कोई खास त्योहार हो तो वह घर मिलने आते हैं। यह सब्जी रोजाना बाजार में थैले में देखने को नहीं मिलती है. जब सुक्तो पक जाए तब जाकर रंगा आलू ढूंढ़ें. कई लोग इस सब्जी से पाई भी बनाते हैं. मुद्दा यह है कि, आलू ऐसी सब्जी नहीं है जिससे हेन्शेल बहुत परिचित है। लेकिन पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आप रंगा आलू को घर में ‘मेहमान’ बनाकर रखेंगे तो यह बिल्कुल भी काम नहीं करेगा। दूसरी ओर, यदि आप आलू को छोड़कर उसे हेन्शेल का मित्र बना सकते हैं, तो अंत में यह उनके लिए ही बेहतर होगा।
अमेरिकन ओबेसिटी एसोसिएशन के अनुसार, लाल आलू का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) इतना कम होता है कि इससे उत्पन्न ग्लूकोज जल्दी से रक्त में अवशोषित हो जाता है। इसलिए रक्त में अतिरिक्त शुगर का खतरा नहीं होता है। इसके अलावा पोषण विशेषज्ञ इंद्राणी घोष का कहना है कि रंगा आलू में भरपूर मात्रा में कैंसर रोधी तत्व मौजूद होते हैं। उन्होंने कहा, ”इस सब्जी में विटामिन ए, सी, दो प्रकार के फाइबर, पोटेशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट जैसे कई आवश्यक तत्व होते हैं। जो सामान्य आलू में नहीं पाया जाता. इसलिए खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों को रंगीन आलू खाने के लिए कहा जाता है।’

क्या मधुमेह रोगी मीठे या रंगीन आलू खा सकते हैं?

बहुत से लोग सोचते हैं कि मधुमेह रोगी इस सब्जी को नहीं खा सकते क्योंकि इसमें कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। हालांकि, इंद्राणी के मुताबिक, ”रंगा आलू का जीआई बहुत कम है। इसमें आवश्यक फाइबर और खनिज भी होते हैं। इसलिए नाश्ते में मिल्क-ओट्स खाएं, भले ही वह स्टार्चयुक्त सब्जी ही क्यों न हो। थोड़ा सा अलसी या अलसी का बीज फैलाएं। अगर आपको ऑफिस में काम के बीच थोड़ी भूख लगती है या आधी रात को अचानक कुछ मीठा खाने की इच्छा होती है, तो अलग-अलग बीजों से बने स्वास्थ्यवर्धक लड्डू खाएं। इसमें अलसी भी काफी मात्रा में होती है। अलसी के पोषण मूल्य के बारे में सोचते हुए कभी-कभी दालों और करी में भीगी हुई अलसी मिला दी जाती है। लेकिन क्या अतिरिक्त अलसी खाना अच्छा है? पोषण विशेषज्ञ इंद्राणी घोष ने आनंदबाजार ऑनलाइन को बताया।

पोषण विशेषज्ञों की रिपोर्ट है कि इन बीजों में स्वस्थ वसा, फाइबर और ओमेगा-3 फैटी एसिड होते हैं। इसके अलावा अलसी में एक प्रकार का पदार्थ होता है जिसे ‘लिगनन्स’ कहते हैं। जो एंटीऑक्सीडेंट और कैंसर रोधी एजेंट माने जाते हैं। लेकिन इंद्राणी के मुताबिक, ”जो चीज अच्छी हो उसे ज्यादा खाने की प्रवृत्ति खतरनाक है। यदि आप यह समझ लें कि कितना खाना है तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

अलसी या अलसी खाने से किस तरह की समस्याएं हो सकती हैं?

1) अगर आपको एलर्जी संबंधी समस्या है तो अलसी का सेवन नहीं किया जा सकता है। पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि अलसी का तेल खाने से भी ऐसी ही समस्याएं हो सकती हैं। अलसी के सेवन से त्वचा पर किसी प्रकार के दाने, खुजली, लालिमा या सूजन दिखाई दे सकती है। हालांकि, ‘जर्नल ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी’ में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, अलसी से एलर्जी के मामले दुर्लभ हैं।

2) अलसी अक्सर प्रजनन हार्मोन एस्ट्रोजन के प्राकृतिक पूरक के रूप में कार्य करती है। परिणामस्वरूप, हार्मोनल परिवर्तन हो सकते हैं। कुछ मामलों में यह सामान्य मासिक धर्म चक्र को भी प्रभावित करता है। इंद्राणी ने कहा कि गर्भाशय संबंधी समस्याओं में अलसी की भूमिका हो सकती है।

बालों का झड़ना रोकने के लिए आपने कितनी चीजें की हैं! तेल, शैंपू, सीरम कुछ भी नहीं छोड़ा. फिर भी बालों का झड़ना नहीं रुक सका. ऊपर से मॉनसून के दौरान डैंड्रफ, फंगल इंफेक्शन की समस्या भी हो जाती है. हेयरड्रेसिंग विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए सिर पर एक विशेष प्रकार का तेल लगाना चाहिए। वह तेल तीन तरह के बीजों से बनाया जाएगा. अगर आप उस तेल को नियमित रूप से लगाएंगे तो बालों को पोषण मिलेगा और बालों का खोया हुआ हिस्सा भी वापस आ जाएगा। कद्दू, अलसी और काला जीरा- मूलतः इन तीन बीजों की आवश्यकता होती है। पसंद का तेल और कुछ सामग्री डालें।

बालों के लिए क्यों फायदेमंद है यह तेल?

कद्दू के बीज में जिंक और ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है। ये सभी तत्व बालों के रोमों को पोषण देते हैं। जो नए बालों के विकास के लिए उत्तेजक के रूप में कार्य करता है।

अलसी एंटीऑक्सीडेंट से भी भरपूर होती है। यह एंटीऑक्सीडेंट स्कैल्प की सूजन को दूर रखता है।

बालों के लिए कलौंजी के उपयोग के बारे में कहने को कोई नई बात नहीं है। एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर यह मसाला डैंड्रफ की समस्या को खत्म करता है।

रोज़मेरी सिर में रक्त संचार बढ़ाने में मदद करती है और विटामिन ई तेल बालों की चमक बनाए रखता है।

इज़राइल ने ईरान पर सीधा हमला किया, तेहरान में सैन्य ठिकानों पर लगातार हमले किए

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इज़राइल ने कहा है कि उसने पिछले कुछ महीनों में ईरान के लगातार हमलों का जवाब देना शुरू कर दिया है। उनका प्राथमिक लक्ष्य ईरान का सैन्य अड्डा है। इजराइल ने इराक और सीरिया में भी कई विस्फोट किए हैं। इस बार इजराइल ने ईरान पर सीधा हमला बोल दिया. शनिवार सुबह से राजधानी तेहरान में कई हवाई हमले हुए हैं. इजरायली मीडिया का दावा है कि कई युद्धक विमानों ने ईरान पर हमला किया है. इसराइल ने इस हमले की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए कहा कि उन्होंने पिछले कुछ महीनों में ईरान के लगातार हमलों का जवाब देना शुरू कर दिया है. उनका प्राथमिक लक्ष्य ईरान का सैन्य अड्डा है। इसके अलावा तेल अवीव ने इराक और सीरिया में भी कई विस्फोट किए हैं।

इज़रायली रक्षा बलों ने शनिवार को कहा कि वे ईरानी सैन्य ठिकानों पर “विशिष्ट” हमले कर रहे थे। शनिवार रात से तेहरान और आसपास के इलाकों में कम से कम दो हवाई हमले हुए हैं। ईरान पर इजराइल के सीधे हमले ने पश्चिम एशिया में युद्ध को बढ़ा दिया। इजरायली सेना ने एक बयान में कहा, “महीनों से इजरायल के खिलाफ ईरान से हो रहे लगातार हमलों के जवाब में, इजरायली सेना अब कुछ ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर विशिष्ट हमले कर रही है।” इजराइल पर हमला. तेल अवीव पर कम से कम 180 मिसाइलें दागी गईं। उस वक्त इजरायली सेना ने लेबनान में ‘ग्राउंड ऑपरेशन’ शुरू किया था. इसके जवाब में ईरान ने इजराइल पर मिसाइलें दागीं. हालाँकि इज़राइल ने दावा किया, उन्होंने हवा में हमले का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। यह पहली बार था कि पश्चिम एशिया की किसी ताकत ने सीधे तौर पर इजराइल को निशाना बनाया। इस बार इजराइल ने सीधे ईरान पर हमला बोल दिया. ऐसे में पश्चिम एशिया में युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है.

फिलिस्तीनी सशस्त्र संगठन हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हमला कर दिया. इसके तुरंत बाद इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. तभी से युद्ध जारी है. एक-एक करके लेबनान के सशस्त्र समूह हिजबुल्लाह और यमन के हौथी विद्रोही इजरायल के खिलाफ भिड़ गए। हालाँकि इन विद्रोही समूहों के पीछे ईरान का समर्थन है, लेकिन तेहरान ने इतने लंबे समय तक सीधे तौर पर लड़ाई नहीं लड़ी है। अक्टूबर की शुरुआत में लेबनान पर इजरायली हमले के बाद, उन्हें तेल अवीव से खदेड़ दिया गया और वे सीधे युद्ध में शामिल हो गए। इस बार इजराइल की ओर से भी जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई है.

इजराइली सेना ने ठीक 25 दिन में ईरान पर जवाबी कार्रवाई की. और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार की इस हरकत से पश्चिम एशिया में अशांति का नया माहौल बन गया है. हालाँकि, नेतन्याहू के कार्यालय के एक बयान में कहा गया है, “यह कदम हमारे देश को सुरक्षित रखने के लिए है।”

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के कार्यालय के एक बयान में संघर्ष के दोनों पक्षों से अपने हथियार डालने का अनुरोध किया गया है। उधर, वहां की मीडिया के मुताबिक, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और आगामी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री को फोन कर उन्हें समर्थन देने का संदेश दिया है. इजरायली मीडिया ने दावा किया कि एक दर्जन से ज्यादा युद्धक विमानों ने हमले को अंजाम दिया.

भारतीय समयानुसार शनिवार सुबह करीब 4 बजे ईरान की राजधानी तेहरान और उसके नजदीकी शहर कारज में सिलसिलेवार विस्फोटों की आवाज सुनी गई। कुछ ही देर में वजह साफ हो जाती है. 1 अक्टूबर को तेल अवीव ने ईरान के मिसाइल हमले का “जवाब” दिया. प्रधानमंत्री नेतन्याहू और रक्षा मंत्री गैलेंट इजरायली रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय में एक भूमिगत कमरे (बंकर) में थे। वे हमले का ‘लाइव टेलीकास्ट’ देख रहे थे. इजराइली सेना के प्रवक्ता डेनियल हघारी ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा, ”अगर भविष्य में उसने दोबारा कोई गलती की तो उसे इसी तरह जवाब दिया जाएगा.”

इज़रायली मीडिया आउटलेट न्यूज़ ट्वेल्व ने बताया कि शनिवार सुबह तड़के हुए हमले के कुछ घंटों बाद ईरान में “दूसरे दौर” का हमला किया गया। इस बार निशाना सिराज शहर था. इजरायली रक्षा बलों (आईडीएफ) ने दावा किया कि ईरान में विशिष्ट सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए गए। हालांकि पश्चिम एशियाई समाचार मीडिया अल जज़ीरा ने ईरानी सरकार का हवाला देते हुए बताया कि 1 अक्टूबर को इजरायली क्षेत्र पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले में शामिल रिवोल्यूशनरी गार्ड्स एयरोस्पेस फोर्स को कोई नुकसान नहीं हुआ था। ईरानी राज्य मीडिया ने एक वीडियो फुटेज प्रकाशित किया जिसमें दावा किया गया कि अधिकांश इजरायली मिसाइलों ने उनकी ‘वायु रक्षा प्रणाली’ को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया है।

‘ईशा ने एक साल में कैसे घटाया वजन’ अंबानी परिवार में हर किसी के पास एक पर्सनल ट्रेनर है।

एक साल में ईशा ने अपना काफी वजन कम कर लिया है। अंबानी परिवार में हर किसी के पास एक पर्सनल ट्रेनर है। हालांकि, उनका कहना है कि अपने बिजी शेड्यूल के कारण अंबानी परिवार को एक्सरसाइज करने का समय नहीं मिल पाता है, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वह जल्द ही बॉलीवुड एक्ट्रेसेस को टक्कर देंगी। क्योंकि, एक मॉडल के तौर पर काफी लोगों को हिट करना शुरू कर चुकी हैं। मुकेश अंबानी की इकलौती बेटी ईशा अंबानी, जो कभी चुलबुली दिखती थीं, अब बेंत की तरह टाइट और हील्स में दिखती हैं। टॉप भारतीय ड्रेस निर्माता उन्हें मॉडल बनाकर अपने कपड़ों का प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं। यहां तक ​​कि कुछ दिनों पहले ईशा एक पॉपुलर इंटरनेशनल फैशन मैगजीन की कवर गर्ल भी बनी हैं। लेकिन ईशा का दावा है कि वह शारीरिक रूप से ठीक नहीं हैं. बाहर से भले ही वह कैसा भी दिखता हो, लेकिन उसके शरीर में फिलहाल थोड़ी सी भी फिटनेस नहीं बची है।

इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर ओरी ने यूट्यूब पर ईशा के कवर शूट का एक कोलाज वीडियो पोस्ट किया। यहीं पर ईशा को यह कहते हुए सुना जाता है, “अगर मुझे अभी 50 मीटर दौड़ने के लिए कहा जाए, तो मैं नहीं दौड़ सकती।” ओरी को जवाब देते हुए सुना जाता है, “आखिरी बार आपको 50 मीटर दौड़ने की जरूरत कब पड़ी थी?” इस पर ईशा हंसती है ईशा ने कहा, ”पहले मैं बिल्कुल फिट थी।” अंबानी परिवार में हर किसी के पास एक पर्सनल ट्रेनर है। हालांकि, उनका कहना है कि अंबानी परिवार को अक्सर अपने व्यस्त कार्यक्रम के कारण व्यायाम करने का समय नहीं मिल पाता है। हालांकि, ईशा ने कहा कि तेजी से वजन कम होना या व्यायाम की कमी उनकी समस्या का कारण नहीं है। ईशा ने कहा, ”अपने बच्चे को जन्म देने से पहले मैं बिल्कुल फिट थी.” गौरतलब है कि मुकेश की बेटी ईशा और उनके पति आनंद पीरामल दो बच्चों के माता-पिता हैं. ईशा ने 2022 में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया।

मुकेश और नीता अंबानी की बेटी ईशा 32 साल की उम्र पार कर 33 साल की हो गई हैं। वह देश और विदेश में समान रूप से व्यस्त हैं। वह दो बच्चों की मां हैं. उनकी बिजनेस जिम्मेदारियां भी कम नहीं हैं. वह रिलायंस रिटेल के प्रमुख हैं। ईशा की ड्रेस, फैशन का चलन हर तरफ है। हालाँकि, एक साक्षात्कार में खुलासा हुआ कि अंबानी-बेटी ईशा की खूबसूरत त्वचा और स्वस्थ बालों की पृष्ठभूमि में एक भूमिका है।

बहुत से लोग जानते हैं कि मां बनने के बाद शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। त्वचा, बालों का भी विशेष ख्याल रखना चाहिए। हालांकि, ईशा मशहूर सैलून ट्रीटमेंट या फेशियल पर भरोसा किए बिना नियमित मेकअप पर जोर देती हैं। वह दिनचर्या बहुत आम है. इसमें ज्यादा समय नहीं लगता. उन्होंने त्वचा को बरकरार रखने के लिए दो चीजों पर जोर दिया। एक है नमी, दूसरा है सुरक्षा. वह त्वचा की नमी बरकरार रखने के लिए अच्छी क्वालिटी का सीरम, मॉइश्चराइजर लगाते हैं। त्वचा को धूप और प्रदूषण से बचाने के लिए सनस्क्रीन पर निर्भर रहें। चाहे फैशन शो हो या परिवार के किसी सदस्य की शादी – ईशा को बहुत ज्यादा मेकअप करने की मनाही है। वह लगभग हर तरह के इवेंट में बेहद ‘नेचुरल लुक’ में नजर आते हैं। लाइट फाउंडेशन, सॉफ्ट ब्लश और न्यूड लिपस्टिक – ये उनके आउटफिट साथी हैं।

ईशा अंबानी पीरामल की पतली पीठ, स्वस्थ बाल भी कई लोगों को ईर्ष्या कर सकते हैं। ऐसे बाल पाना कोई मुश्किल काम नहीं है. बालों की देखभाल के लिए ईशा भारसा तेल और अच्छी गुणवत्ता वाला मास्क। लेकिन ये यहीं नहीं रुकेगा. बालों की लगातार देखभाल करनी चाहिए। खान-पान पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। ईशा ने शरीर और दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए ‘संतुलित आहार’ और नियमित व्यायाम की सलाह दी।

फैशन के मामले में अंबानी परिवार की महिलाएं बॉलीवुड हीरोइनों को भी मात दे सकती हैं। चाहे घर में शादी हो या कोई कार्यक्रम, कोई बिजनेस मीटिंग हो या कोई पुरस्कार समारोह – अंबानी परिवार हमेशा तैयार रहता है। ईशा हाल ही में एक अवॉर्ड समारोह में अवॉर्ड लेने के लिए मौजूद थीं। उस मौके पर अंबानी-कन्या ब्लैक एंड व्हाइट ड्रेस में अलग अंदाज में नजर आईं।

इटालियन फैशन लेबल सैपोराली की ओपन ड्रेस में ईशा ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। उसने सफेद गिलेट जैकेट और काले रंग की फ्लोर लेंथ स्कर्ट पहनी हुई थी। ड्रेस पर गोल्डन बटन का काम आकर्षक था। ईशा अपना मेकअप हमेशा लाइट रखती हैं। खुले बाल, गहरा काजल, टॉप इयररिंग्स और एक्सपोज्ड क्लीवेज – ईशा बेहद आकर्षक लुक में कैमरे में कैद हुई हैं। ईशा ने जो जैकेट पहनी थी उसकी कीमत करीब 4 लाख रुपये और स्कर्ट की कीमत करीब 5 लाख रुपये थी. इससे पहले भी उनके भाई अनंत अंबानी की शादी में ईशा के आउटफिट की फैशन जगत में खूब चर्चा हुई थी। कभी दोनों कानों में दो तरह के पेंडेंट तो कभी हेयर टाई में इनोवेशन – अनंत की शादी में वे ‘क्वार्की फैशन ट्रेंड’ में तैरते रहे।