Thursday, March 19, 2026
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नागरिकता की धारा 6A पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता की धारा 6A पर एक बड़ा बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से नागरिकता कानून की धारा 6A को संवैधानिक बताया है। 4 जजों ने फैसले का समर्थन किया, जबकि जस्टिस जेबी पारदीवाला ने असहमति जताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राज्यों को बाहरी खतरों से बचाना केंद्र सरकार का कर्तव्य है। आर्टिकल 355 के तहत कर्तव्य को अधिकार मानना नागरिकों और अदालतों को आपातकालीन अधिकार देगा, जो विनाशकारी होगा। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से लिए गए अपने फैसले में नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। ये असम में प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करती है। भारत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस मनोज मिश्रा ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की वैधता पर सहमति जताई। जस्टिस पारदीवाला ने धारा 6ए पर कहालागू किए जाने के समय कानून वैध हो सकता है लेकिन यह समय के साथ अस्थायी रूप से त्रुटिपूर्ण हो सकता है। सर्वोच्च अदालत ने फैसले में कहा कि असम में प्रवेश और नागरिकता प्रदान करने के लिए 25 मार्च, 1971 तक की समय सीमा सही है। किसी राज्य में विभिन्न जातीय समूहों की उपस्थिति का मतलब अनुच्छेद 29(1) का उल्लंघन नहीं है।

कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से तीन फैसले सुनाए और नागरिकता कानून की धारा 6ए की वैधता बरकरार रखी। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने अल्पमत का अपना फैसला सुनाते हुए असहमति जताई और नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए को असंवैधानिक करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि किसी राज्य में अलग-अलग जातीय समूहों का होना आर्टिकल 29(1) का उल्लंघन नहीं है। याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि एक जातीय समूह अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकता क्योंकि वहां दूसरा जातीय ग्रुप भी रहता है। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर किसी स्थिति का उद्देश्य से उचित संबंध है, तो उसे अस्थायी रूप से अनुचित नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि भारत में नागरिकता देने का एकमात्र तरीका रजिस्ट्रेशन नहीं है और धारा 6A को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इसमें रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया नहीं दी गई है। इसलिए मेरा भी निष्कर्ष है कि धारा 6A वैध है। कोर्ट साथ ही अब बांग्लादेशियों की पहचान और निर्वासन के काम की निगरानी भी करेगा। नागरिकता कानून की धारा 6A को 1985 में असम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए संशोधन के बाद जोड़ा गया था। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि वह राज्यों को बाहरी आक्रमण से बचाए। आर्टिकल 355 के तहत कर्तव्य को अधिकार मानना नागरिकों और अदालतों को आपातकालीन अधिकार देगा, जो विनाशकारी होगा। उन्होंने आगे कहा कि किसी राज्य में अलग-अलग जातीय समूहों का होना अनुच्छेद 29(1) का उल्लंघन नहीं है। याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि एक जातीय समूह अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकता क्योंकि वहां दूसरा जातीय समूह भी रहता है।

सिटीजनशिप एक्ट की धारा 6A को 1985 में असम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए संशोधन के तहत जोड़ा गया था। इस धारा में कहा गया कि जो लोग 1985 में बांग्लादेश समेत दूसरे क्षेत्रों से जनवरी 1966 और मार्च 1971 से पहले आए हैं, उन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए धारा 18 के तहत रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा, ‘मैं असम समझौते का समर्थन करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करता हूं। असम समझौता ऐतिहासिक समझौता था जिसने वर्षों के राजनीतिक आंदोलन के बाद राज्य में शांति स्थापित की। उस दौरान भारत के प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी राजनीतिक मतभेदों के बावजूद छात्र नेताओं से बातचीत करते थे। आज परिदृश्य अलग है। भाजपा प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही और खालिस्तानी कहती है, या मणिपुर की तरह प्रधानमंत्री मोदी ऐसा दिखावा करते हैं जैसे राज्य का अस्तित्व ही नहीं है।

इस मामले में फैसला सुनाते हुए, सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि धारा 6A असम की एक अनोखी समस्या का राजनीतिक समाधान था। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के निर्माण के बाद राज्य में बड़े पैमाने पर अवैध अप्रवासियों के आने से असम की संस्कृति और जनसांख्यिकी को गंभीर खतरा पैदा हो गया था। असम में छात्र आंदोलन के प्रमुख कारणों में से एक बांग्लादेश से भारी अवैध प्रवासन के कारण राज्य की मूल आबादी के मतदान अधिकारों का कमजोर होना था और धारा 6A ने इस विकट स्थिति को दूर करने का प्रयास किया था।

 

आखिर क्या है नागरिकता की धारा 6A? जानिए पूरी कहानी!

आज हम आपको नागरिकता की धारा 6A के बारे में जानकारी देने वाले हैं! सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को असम में अवैध अप्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने से संबंधित नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। इस फैसले से असम में 1985 के असम समझौते के बाद से अवैध प्रवासियों को नागरिकता देने के मुद्दे पर एक नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने 4:1 से बहुमत से धारा 6A को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जेबी पारदीवाला शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा, ‘मैं असम समझौते का समर्थन करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करता हूं। असम समझौता ऐतिहासिक समझौता था जिसने वर्षों के राजनीतिक आंदोलन के बाद राज्य में शांति स्थापित की। उस दौरान भारत के प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी राजनीतिक मतभेदों के बावजूद छात्र नेताओं से बातचीत करते थे। आज परिदृश्य अलग है। भाजपा प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही और खालिस्तानी कहती है, या मणिपुर की तरह प्रधानमंत्री मोदी ऐसा दिखावा करते हैं जैसे राज्य का अस्तित्व ही नहीं है।

इस मामले में फैसला सुनाते हुए, सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि धारा 6A असम की एक अनोखी समस्या का राजनीतिक समाधान था। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के निर्माण के बाद राज्य में बड़े पैमाने पर अवैध अप्रवासियों के आने से असम की संस्कृति और जनसांख्यिकी को गंभीर खतरा पैदा हो गया था। असम में छात्र आंदोलन के प्रमुख कारणों में से एक बांग्लादेश से भारी अवैध प्रवासन के कारण राज्य की मूल आबादी के मतदान अधिकारों का कमजोर होना था और धारा 6A ने इस विकट स्थिति को दूर करने का प्रयास किया था। सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेशी प्रवासियों के प्रवेश के लिए 24 मार्च, 1971 की कट-ऑफ तारीख को भी बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान के ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान बांग्लादेशियों पर किए गए अत्याचारों को देखते हुए सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया था। अदालत ने कहा कि मार्च 1971 के बाद, सरकार द्वारा प्रवासियों की आमद को अलग तरह से देखा गया।

एक अलग राय में, जस्टिस सूर्यकांत ने खुद के लिए और जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस मनोज मिश्रा के लिए लिखते हुए, CJI चंद्रचूड़ की राय से सहमति जताई। हालांकि, जस्टिस कांत ने धारा 6A की गहन जांच की और कहा कि सरकार कानून व्यवस्था के साथ-साथ नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाने में सक्षम थी। नागरिकता अधिनियम में धारा 6ए को 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद जोड़ा गया था। यह समझौता केंद्र की राजीव गांधी सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के बीच बांग्लादेश से असम में प्रवासियों के प्रवेश के खिलाफ छह साल तक चले आंदोलन के बाद हुआ था। छात्र नेताओं से बातचीत करते थे।वहीं 24 मार्च 1971 के बाद प्रवेश करने वालों को अवैध प्रवासी माना जाएगा।असम समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह तय करना था कि राज्य में विदेशी कौन है। असम समझौते के खंड 5 में कहा गया है कि 1 जनवरी, 1966 को ‘विदेशियों’ का पता लगाने और उन्हें हटाने के लिए आधार कट-ऑफ तिथि के रूप में काम करेगा, लेकिन इसमें उन लोगों को नियमित करने के प्रावधान भी शामिल हैं जो उस तारीख के बाद और 24 मार्च, 1971 तक राज्य में आए थे।

इसे सुविधाजनक बनाने के लिए नागरिकता अधिनियम में धारा 6ए को शामिल किया गया था। ‘भारतीय मूल’ के सभी व्यक्ति जिन्होंने 1 जनवरी 1966 से पहले राज्य में प्रवेश किया था और तब से असम में निवासी हैं, उन्हें भारत का नागरिक माना जाएगा। इसके अलावा यह प्रावधान करता है कि जो कोई भी 1 जनवरी 1966 के बाद लेकिन 24 मार्च 1971 से पहले असम में प्रवेश किया और निवास किया और जिसे विदेशी पाया गया है को केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार खुद को रजिस्टर करने का मौका मिलेगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा, ‘मैं असम समझौते का समर्थन करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करता हूं। असम समझौता ऐतिहासिक समझौता था जिसने वर्षों के राजनीतिक आंदोलन के बाद राज्य में शांति स्थापित की। भारत के प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी राजनीतिक मतभेदों के बावजूद छात्र नेताओं से बातचीत करते थे।वहीं 24 मार्च 1971 के बाद प्रवेश करने वालों को अवैध प्रवासी माना जाएगा।

 

आखिर बांग्लादेश ने शेख हसीना की गिरफ्तारी का क्यों निकाला वारंट?

हाल ही में बांग्लादेश ने शेख हसीना की गिरफ्तारी का वारंट निकल दिया है! बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल ने वारंट जारी कर दिया दिया है। बांग्लादेश में हुए हिंसक छात्र आंदोलन के दौरान मानवता के विरुद्ध अपराध के आरोप के तहत पूर्व पीएम शेख हसीना और अन्य 45 लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया है। हसीना को 18 नवंबर तक ट्रिब्यूनल के सामने पेश होना है। ऐसे में अब बड़ा सवाल भारत की प्रतिक्रिया को लेकर है। ये देखना होगा कि भारत इस मामले में अगला कदम क्या उठाता है। हसीना फिलहाल भारत में शरण लिए हुए हैं। शेख हसीना ने 5 अगस्त को बांग्लादेश छोड़ा था। वो तभी से भारत में शरण लेकर रह रही हैं। वहीं बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है। बांग्लादेश में पहले से ही हसीना के खिलाफ कई केस चल रहे हैं। इस बीच अब हसीना के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट से तकनीकी रूप से देश की अंतरिम सरकार द्वारा भारत से उनके प्रत्यर्पण की संभावना बन सकती है। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि हसीना समेत भगोड़ों को वापस लाने के लिए इंटरपोल की मदद ली जाएगी।

भारत और बांग्लादेश में प्रत्यर्पण को लेकर पहले से एक समझौता है। 2013 में दोनों देशों के बीच हुए इस प्रत्यर्पण समझौते के तहत भारत सरकार हसीना को वापस भेज सकती है। लेकिन बांग्लादेश की मांग के बाद भी अब तक भारत ने ऐसा नहीं किया है। लेकिन सवाल ये है कि अगर अब इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल या बांग्लादेश की सरकार शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करती है तो क्या भारत उसकी अपील खारिज कर पाएगा?

भले ही दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि हो। लेकिन इस समझौते में 2016 में एक संशोधन हुआ था। इस संशोधन के मुताबिक प्रत्यर्पण के लिए सबूतों की भी जरूरत नहीं है। अगर किसी देश की अदालत गिरफ्तारी का वारंट जारी किया है, तो प्रत्यर्पण से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि संधि का अनुच्छेद 6 कहता है कि अगर अपराध राजनीतिक प्रकृति का है तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। इसके अलावा सैन्य अपराध के मामलों में भी प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। ऐसे में भारत हसीना के अपराध को राजनीतिक प्रकृति का करार देकर प्रत्यर्पण से मना कर सकता है। बता दें कि बांग्लादेश के इंटरनैशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल ने छात्रों के व्यापक आंदोलन के दौरान मानवता के विरुद्ध कथित अपराध के लिए पूर्व पीएम शेख हसीना और अवामी लीग के शीर्ष नेताओं समेत अन्य 45 लोगों के खिलाफ गुरुवार को गिरफ्तारी वारंट जारी किया। स्थानीय मीडिया के अनुसार ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे हसीना और अन्य को 18 नवंबर तक उसके समक्ष पेश करें। इस मुद्दे पर बांग्लादेश भारत से संपर्क कर सकता है। ढाका ने पहले भी संकेत दिया है कि यह एक विकल्प बना हुआ है।

अभियोजन पक्ष ने इस संबंध में ट्रिब्यूनल में दो याचिकाएं दायर की थीं और गिरफ्तारी वारंट जारी करने की अपील की थी। अब तक हसीना, उनकी अवामी लीग पार्टी और 14 दलों के गठबंधन के अन्य नेताओं, पत्रकारों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के पूर्व शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ ट्रिब्यूनल में जबरन गायब करने, हत्या और सामूहिक हत्याओं की 60 से अधिक शिकायतें दर्ज की गई हैं। हसीना पर लगभग 200 मामले दर्ज हैं, जिनमें से अधिकतर मामले सामूहिक छात्र विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हत्याओं से संबंधित हैं।

बता दे कि केंद्र सरकार ने दो दिन पहले ही इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन हिज्ब-उत-तहरीर को आतंकवादी संगठन घोषित किया है। बताया जा रहा है कि यह संगठन भोले-भाले लोगों को अपनी जाल में फंसाकर उन्हें आतंक की राह पर चलने के लिए उकसाता था। मामले से परिचित लोगों ने बताया कि नरेंद्र मोदी सरकार मध्य एशिया के विस्तारित पड़ोस में आतंकी संगठन की बढ़ती गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही है। खास बात है कि बांग्लादेश के अलावा पांच मध्य एशियाई देशों ने भी इस संगठन पर प्रतिबंध लगा रखा है। HUT का संस्थापक तकी अल-दीन अल-नभानी हैं। भारत में, अनुयायियों को सिखाया गया था कि राष्ट्र दारुल कुफ्र (गैर-विश्वासियों की भूमि) है, और उन्हें हिंसक जिहाद के माध्यम से एक इस्लामी साम्राज्य की स्थापना करके इसे दारुल इस्लाम में परिवर्तित करना था।

ब्रिटेन सरकार ने इस साल जनवरी में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, जब उन्होंने 7 अक्टूबर को इजरायल में हुए भयानक हमलों की प्रशंसा की और जश्न मनाया। हिज्ब उत-तहरीर को कुछ मुस्लिम बहुल देशों में प्रतिबंधित किया गया है। हालांकि यह पश्चिमी देशों में यह स्वतंत्र रूप से काम करता है, जबकि पहले कई सरकारों ने इसे गैरकानूनी घोषित करने का प्रयास किया था। गुरुवार को गृह मंत्रालय ने यूएपीए के तहत इस पर प्रतिबंध लगा दिया।

आतंकवाद-रोधी एक्सपर्ट्स का दावा है कि भारत में इस संगठन की मौजूदगी मामूली थी और इसे गैरकानूनी नहीं माना गया था। इस साल की शुरुआत में मध्य प्रदेश एटीएस ने एक मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया जो पूरे राज्य में सक्रिय था। इसके बाद मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को भेजा गया। एजेंसी ने हिज्ब-उत-तहरीर के 17 सदस्यों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया।

 

क्या बीजेपी ने बदल दी है लोकसभा चुनाव के नतीजे से रणनीतियां?

वर्तमान में बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के नतीजे से रणनीतियां बदल दी है! हरियाणा विधानसभा चुनावों में जीत ने बीजेपी को जरूरी ताकत दी है। लोकसभा चुनाव में मिले उम्मीद से कमतर परिणाम ने बीजेपी खेमे में मायूसी का संचार कर दिया था। फिर हरियाणा में जब प्रदेश की दबंग जाति जाट ने बीजेपी के खिलाफ मोर्च खोल दिया तो पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई। प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ ‘जवान, किसान, पहलवान’ की एकजुटता का नैरेटिव गढ़ा गया। ऐसे माहौल में बीजेपी ने अपने दम पर बहुमत हासिल कर तीसरी बार सरकार बनाना सुनिश्चित कर लिया। इस कामयाबी ने आगामी विधानसभा चुनावों का माहौल भी पलट गया। बीजेपी ने जिस तरह हरियाणा में सबसे दबंग जाति समूह जाट के विरोध को काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया, उससे महाराष्ट्र में मराठा और झारखंड में आदिवासियों को संदेश तो जरूर जाएगा जिन्होंने लोकसभा चुनावों में बीजेपी का विरोध किया था। बता दें किझारखंड में आजसू नेता सुदेश महतो ने दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ दो बैठकें कीं। महतो 13 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। हालांकि, भाजपा उन्हें आठ सीटें ऑफर कर रही थी, जिस पर 2014 में आजसू ने भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था। 2019 में आजसू ने अकेले 53 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल दो सीटें जीत सकी। हरियाणा में जीत के साथ भाजपा अब आजसू को सिंगल डिजिट नंबर पर लाने के लिए दबाव बनाएगी। आजसू के अलावा भाजपा दो सीटों के साथ जेडीयू को समायोजित कर सकती है। लोजपा (रामविलास) को एक सीट देने पर अभी चर्चा नहीं हुई है।इन दोनों प्रदेशों में इसी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से बीजेपी ने कई विधानसभा चुनावों में गैर-प्रमुख जातियों के साथ-साथ अति पिछड़े वर्ग (ईबीसी) को एकजुट करने की कोशिशें की हैं। इस ईबीसी समूह में कारीगर जातियां हैं, जिनके पास जमीन नहीं है। हरियाणा की तरह, सैनी, कुम्हार, खाती (बढ़ई) और नाई जैसी गैर-प्रमुख जातियों ने भाजपा का समर्थन किया और राज्य में पार्टी के लिए नए सपोर्ट बेस के रूप में उभरीं। झारखंड और महाराष्ट्र में भाजपा ने अतीत में राजनीतिक रूप से गैर-प्रमुख जातियों को एकजुट करने की कोशिश की है, जो जनसंख्या में छोटे हैं। हरियाणा में भाजपा की जीत झारखंड और महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए उसकी रणनीति को और मजबूत करेगी, ताकि छोटी-छोटी राजनीतिक रूप से कम प्रभावशाली जातियों को अपने पक्ष में किया जा सके। दूसरी तरफ बीजेपी यह भी चाहेगी कि वह उच्च जातियों के बीच अपने सपोर्ट बेस के साथ इन पिछड़ी जातियों की सोशल इंजीनियरिंग करके उन्हें चुनाव मैदान में उतरा जा सके।

हरियाणा की जीत के साथ ही भाजपा अब सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारे के मामले में भी आगे है। महाराष्ट्र में शिवसेना हाल के लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर सीट बंटवारे पर बातचीत करने की कोशिश कर रही है, जहां भाजपा ने नौ सीटें जीती थीं और शिवसेना ने सात। लेकिन हरियाणा चुनावों में बीजेपी की जीत ने पासा पलट दिया। अब बीजेपी सीट बंटवारे का फैसला करेगी और सहयोगियों को स्वीकार करना होगा। महाराष्ट्र भाजपा के सूत्रों ने हमारे सहयोगी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स (ईटी) से कहा कि बीजेपी सहयोगियों के साथ अब भी उदारता से ही पेश आएगी लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा सभी क्षेत्रों में चुनाव लड़ेगी क्योंकि इसमें सहयोगियों के लिए भी वोट आकर्षित करने की क्षमता है।

झारखंड में आजसू नेता सुदेश महतो ने दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ दो बैठकें कीं। महतो 13 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। हालांकि, भाजपा उन्हें आठ सीटें ऑफर कर रही थी, जिस पर 2014 में आजसू ने भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था। 2019 में आजसू ने अकेले 53 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल दो सीटें जीत सकी।भाजपा उन्हें आठ सीटें ऑफर कर रही थी, जिस पर 2014 में आजसू ने भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था। 2019 में आजसू ने अकेले 53 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल दो सीटें जीत सकी। हरियाणा में जीत के साथ भाजपा अब आजसू को सिंगल डिजिट नंबर पर लाने के लिए दबाव बनाएगी। हरियाणा में जीत के साथ भाजपा अब आजसू को सिंगल डिजिट नंबर पर लाने के लिए दबाव बनाएगी। आजसू के अलावा भाजपा दो सीटों के साथ जेडीयू को समायोजित कर सकती है। लोजपा (रामविलास) को एक सीट देने पर अभी चर्चा नहीं हुई है।

 

क्या हरियाणा के नतीजे से महाराष्ट्र की रणनीति बना रही है बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी महाराष्ट्र की रणनीति हरियाणा के नतीजे से बना रही है या नहीं ! हरियाणा में चुनाव से पहले कांग्रेस अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थी, लेकिन नतीजों ने कांग्रेस और राहुल गांधी के अरमानों पर पानी फेर दिया। उधर 48 सीटों के साथ बीजेपी ने हरियाणा में जीत की हैट्रिक लगा दी और कांग्रेस 37 सीटों पर सिमट गई। हरियाणा के बाद अब सबकी नजर महाराष्ट्र चुनाव पर हैं। राजनीतिक गलियारों में बीजेपी के महाराष्ट्र प्लान को लेकर चर्चा तेज है। महाराष्ट्र में सभी 288 विधानसभा सीट के लिए एक चरण में 20 नवंबर को मतदान होगा और मतगणना 23 नवंबर को होगी। बीजेपी ने हरियाणा की तर्ज पर महाराष्ट्र में भी जबरदस्त जीत का पूरा प्लान तैयार कर लिया है। बीजेपी कुछ अहम मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए आत्मविश्वास से लबरेज है। बीजेपी 288 सदस्यीय विधानसभा में से 155 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है और अपने सहयोगियों शिवसेना (शिंदे) और एनसीपी (अजित पवार) के साथ मिलकर एकजुट चुनाव प्रचार करना चाहती है। इसके साथ ही, ‘लाडली बहना योजना’ को लेकर मतदाताओं में उत्साह बरकरार रखना भी बीजेपी की प्राथमिकता है। गैर-प्रमुख समुदायों तक पहुंचना, मराठा आंदोलन के प्रभाव को कम करना, सहयोगियों के बीच वोट ट्रांसफर सुनिश्चित करना, और माइक्रो लेवल पर सामाजिक और राजनीतिक सत्ता विरोधी लहर को संबोधित करते हुए चुनाव प्रचार चलाना भी बीजेपी की प्राथमिकताओं में शामिल है।

बीजेपी ने बुधवार रात को अपनी पहली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी के अन्य नेता मौजूद थे। सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी दो दिनों के भीतर अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर सकती है और 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में 154 से 158 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। 2019 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी 105 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। उस दौरान के सहयोगी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली अविभाजित शिवसेना ने 56 सीटें जीती थीं, जबकि अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 41 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने 44 सीटें जीती थीं। 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी को महाराष्ट्र में करारी हार का सामना करना पड़ा था, जहां पार्टी 28 सीटों में से केवल 9 सीटें ही जीत सकी थी। बीजेपी अब राज्य में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। महाराष्ट्र बीजेपी के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां देश की आर्थिक राजधानी मुंबई है, जो निवेश, एफडीआई और मोदी 3.0 के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा महाराष्ट्र मराठा गौरव और मुखर दलित-आंबेडकरवादी समूहों का केंद्र भी है, जो RSS के कट्टर विरोधी रहे हैं।

बीजेपी का मानना है कि आगामी लोकसभा चुनावों में शिवसेना (UBT) के वोटर्स कांग्रेस को वोट नहीं देंगे। बीजेपी इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेगी। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 16 सीटें जीती थीं, जिससे शिवसेना (UBT) के कई वोटर्स नाराज हैं। बीजेपी का दावा है कि शिवसेना (UBT) के वोटर्स कांग्रेस को पसंद नहीं करते हैं। बीजेपी को उम्मीद है कि इस बार भी ऐसा ही होगा और इससे उन्हें फायदा होगा।

हरियाणा में बीजेपी के चुनाव प्रचार में एक बड़ा बदलाव RSS की बढ़ती भागीदारी थी। राज्य प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने पार्टी की संगठनात्मक ताकत को मजबूत करने पर जोर दिया। पार्टी के एक पदाधिकारी ने कहा, ‘धर्मेंद्र प्रधान RSS की छात्र शाखा ABVP से आते हैं। उनके RSS के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं, खासकर दत्तात्रेय होसबोले जैसे नेताओं के साथ। इसी तरह महाराष्ट्र में भूपेंद्र यादव RSS की वकीलों की शाखा, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से आते हैं। वे जानते हैं कि RSS बीजेपी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्होंने चुनाव प्रचार को कार्यकर्ता केंद्रित बनाया है।’

एक पदाधिकारी ने कहा, ‘कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। गृह मंत्री अमित शाह 1500 से 2000 कार्यकर्ताओं के समूहों में बैठकें कर रहे हैं ताकि उनकी समस्याओं को समझा जा सके।’

गठबंधन के चुनाव प्रचार का तुरुप का पत्ता मुख्यमंत्री की ओर से घोषित लोकलुभावन उपाय ही रहेंगे, जिसमें ‘मुख्यमंत्री लाडकी बहन योजना’ – 18 से 65 वर्ष की आयु वर्ग की 2.5 करोड़ महिलाओं को 1,500 रुपये मासिक भत्ता और BMC कर्मचारियों को दिवाली बोनस शामिल है। ‘लाडली बहना योजना’ को काफी ज्यादा प्रतिक्रिया मिली है, और बीजेपी को लगता है कि यह गेम-चेंजर साबित होगी, क्योंकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसी तरह की योजनाओं ने पिछले साल विधानसभा चुनावों में बीजेपी को जीत दिलाई थी। बीजेपी मराठवाड़ा में काफी ज़्यादा मेहनत कर रही है, जहां वह यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है कि मराठा कार्यकर्ता मनोज जरंगे पाटिल का आंदोलन उसकी संभावनाओं को प्रभावित न करे।

पार्टी ने अपने सहयोगियों के साथ यह तय किया है कि वह एकजुट चेहरा दिखाने के लिए एक सामान्य नारा के साथ एक सामान्य चुनाव प्रचार करेगी। एक अन्य पदाधिकारी ने कहा, ‘यह स्वाभाविक है, लेकिन बीजेपी को कांग्रेस के साथ सीधे मुकाबले में और उन सीटों पर उतारा जा रहा है जहां OBC समुदाय का दबदबा है। जहां कहीं भी मराठा हैं, वहां शिंदे सेना हमारा सबसे अच्छा विकल्प है। अजीत पवार के उम्मीदवारों के प्रभाव वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखा गया है।’ सूत्रों ने कहा कि महाराष्ट्र में प्रधानमंत्री मोदी की रैलियां दिवाली के बाद शुरू होने की संभावना है ताकि अधिक प्रभाव पड़े। महाराष्ट्र के 6 प्रभागों में से प्रत्येक में कम से कम एक प्रधानमंत्री की रैली होगी।

बीजेपी छोटे, गैर-मराठा समुदायों तक भी पहुंच बना रही है। हरियाणा में अपनी रणनीति से सबक लेते हुए, बीजेपी समुदायों के एक इंद्रधनुषी गठबंधन पर नजर गड़ाए हुए है। पिछले कुछ दिनों में पार्टी नेताओं के नेतृत्व में ऐसी करीब 100 बैठकें हो चुकी हैं। लोकसभा चुनावों में दलित वोटों का बीजेपी से दूर जाना चिंता का विषय है। सूत्रों ने कहा कि किरेन रिजिजू बौद्ध दलितों पर काम कर रहे हैं, जो दलित आबादी का 60 प्रतिशत हैं, पार्टी को उम्मीद है कि कल्याणकारी योजनाओं से दलित वापस पार्टी के पास आ जाएंगे। राज्य में अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए नौ आरक्षित सीटें हैं, जिनमें से नंदुरबार, गढ़चिरौली-चिमूर, पालघर और डिंडोरी ST के लिए आरक्षित हैं, जबकि अमरावती, रामटेक, लातूर, सोलापुर और शिरडी SC के लिए आरक्षित हैं।

 

इलायची त्वचा की खूबसूरती भी लौटा सकती है, चेहरे पर कैसे लगाएं इलायची ?

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अगर आप नेचुरल तरीके से मेकअप करना चाहती हैं तो हेशेल मटेरियल चुन सकती हैं। आप बहुत दिनों से इलायची खा रहे हैं, इस बार इसे ट्राई करें. थोड़ी सी इलायची खाने का स्वाद बदल देगी. चाहे मांस हो या पाई, कुछ चुटकी इलायची खाना पकाने में स्वाद और सुगंध जोड़ने के लिए पर्याप्त है। भारतीय हर्बल चिकित्सा में मसाले के रूप में उपयोग की जाने वाली इलायची का उपयोग त्वचा की देखभाल के लिए भी किया जा सकता है। जो लोग रसायनों से बचना चाहते हैं और घरेलू सामग्रियों से सौंदर्य उत्पाद बनाना चाहते हैं, वे ऐसे मसाले चुन सकते हैं जो आसानी से उपलब्ध हों।

त्वचा की देखभाल में छोटी इलायची

एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। जर्नल मॉलिक्यूल्स में प्रकाशित, छोटी इलायची में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं। इसमें फ्लेवोनोइड्स, फेनोलिक एसिड और आवश्यक तेल होते हैं, जो त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मौजूद होते हैं। इसका उपयोग प्राकृतिक स्क्रबर के रूप में किया जा सकता है।

त्वचा की देखभाल कैसे करें?

1. छोटी इलायची एक अच्छे स्क्रबर का काम करती है। मृत त्वचा कोशिकाओं को हटाने के लिए स्क्रबिंग जरूरी है। 1 चम्मच इलायची पाउडर, 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच चीनी मिलाकर स्क्रब बनाएं। चेहरे पर हल्के हाथों से पांच मिनट तक मसाज करें और फिर गुनगुने पानी से धो लें। इस स्क्रबर का इस्तेमाल आप होंठों की देखभाल के लिए भी कर सकते हैं। 2. आप छोटी इलायची से टोनर बना सकते हैं. एक कप पानी में 1 बड़ा चम्मच छोटी इलायची पाउडर मिलाएं. आप इसे बोतल में भरकर टोनर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।

3. 1 बड़ा चम्मच छोटी इलायची का पाउडर, 2 बड़े चम्मच शहद मिला लें. अपना चेहरा धोने या फेसवॉश से रगड़ने के बाद इस मिश्रण को लगाएं। इसे 15 मिनट के लिए छोड़ दें और गुनगुने पानी से धो लें। छोटी इलायची और शहद का मास्क त्वचा की नमी बनाए रखने और चमक बहाल करने में मदद करेगा।

अतिरिक्त वजन से परेशान हैं? नियमित व्यायाम और उचित आहार के साथ-साथ कुछ टिप्स भी चर्बी कम करने में मदद करते हैं। बिरयानी हो या पाई, इलायची डालने से खाना पकाने का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन यही इलायची आपका वजन कम कर सकती है, क्या पता?

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार छोटी इलायची को ‘सुपर फूड’ कहा जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इलायची खाने से खाने की इच्छा बढ़ती है. हालाँकि, यह भोजन शरीर में ऊर्जा के उत्पादन को तेज करता है और वसा कम करने में मदद करता है। इलायची मेलाटोनिन का अच्छा स्रोत है, जो चयापचय दर को बढ़ाती है, पाचन में सुधार करती है। वसा कम करने की प्रक्रिया को तेज करता है। इसलिए इलायची खाने से आपका वजन कम हो सकता है। यही कारण है कि इलायची का उपयोग चेहरे के क्लींजर के रूप में भी किया जाता है। सूखी इलायची नहीं, छोटी इलायची पानी में उबालने से फल जल्दी मिलेगा।

इलायची का पानी कैसे बनाएं?
दो गिलास पानी में सात से आठ इलायची के दाने डालकर पांच मिनट तक उबालें। पानी को छान लें और इसे नियमित रूप से रात को सोने से पहले पियें। इलायची का उपयोग खाना बनाने में भी किया जा सकता है. इसमें कोई दिक्कत नहीं है.

इलायची के और क्या स्वास्थ्य लाभ हैं?

1) इलायची के नियमित सेवन से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है। जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है वे रोजाना इलायची खा सकते हैं।

2) इलायची रक्त के थक्के जमने की समस्या को भी कम कर सकती है। हेनशेल का यह घटक रक्त संचार की गति को भी बढ़ाता है।

3) जिन लोगों की त्वचा पर अन्य लोगों की तुलना में तेजी से उम्र बढ़ने के लक्षण दिख रहे हैं, वे इस पानी को पी सकते हैं। यह त्वचा में कसाव लाता है, झुर्रियाँ कम करता है।

4) इस पानी को पीने से दांतों की जड़ों के विभिन्न प्रकार के संक्रमण भी कम हो जाते हैं।

पूरे दिन की थकान दूर करने के लिए एक कप ब्लैक कॉफी काफी है। कुछ लोगों के लिए, कॉफी की गंध एक वेक-अप कॉल की तरह होती है। व्यस्त कार्यक्रम के बीच एक छोटा सा ब्रेक गरमागरम कॉफी पीने का आनंद है। हालांकि, कई लोगों का कहना है कि बार-बार कॉफी पीना शरीर के लिए अच्छा नहीं है।

लेकिन पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ा सा चिया बीज मिलाने से वह कॉफी स्वास्थ्यवर्धक बन सकती है। 2023 में ‘मेडिकल एंड हेल्थ साइंस’ जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, हाइपोकैलोरिक, कम कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ जैसे बिना दूध वाली ब्लैक कॉफी, चीनी और चिया जैसे फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ मिलाने से तेजी से वसा हानि में मदद मिलती है। और इस पेय में क्या खास है?

सलमान की सुरक्षा को लेकर हर कोई चिंतित है, ऐसे में अनूप जलोटा ने भाईजान को सुरक्षित जिंदगी जीने की खास सलाह दी है

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बाबा सिद्दीकी की हत्या के बाद हर कोई सलमान खान की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। संगीतकार अनूप जलोटा ने अभिनेता को बिश्नोईयों के साथ अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए विशेष सलाह दी। बाबा सिद्दीकी की हत्या के बाद से सलमान की सुरक्षा को लेकर चर्चा हो रही है. गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई की टीम द्वारा अभिनेता को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए कहा गया था। इसके बाद सलमान के पिता सलीम खान ने दावा किया कि सलमान ने अपने जीवन में कभी किसी जानवर की हत्या नहीं की है. इसी सिलसिले में गजल कलाकार अनूप जलोटा ने भाईजान से खास गुजारिश की है.

हाल ही में एक इंटरव्यू में अनूप ने सलमान को लेकर अपने विचार साझा किए. 1998 में जोधपुर में फिल्म की शूटिंग के दौरान काले हिरण की हत्या के मामले को लेकर बिश्नोई समुदाय आज भी सलमान पर अड़ा हुआ है। अनुप ने कहा, ”यह फैसला करने का समय नहीं है कि किसने किसको मारा, क्यों मारा. ध्यान रहे कि दावा किया गया है कि इस घटना के चलते सलमान के करीबी दोस्त बाबा सिद्दीकी की मौत हो गई. अब हमें सोचना होगा कि दोनों पक्षों की समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए.

अनुप के मुताबिक, स्थिति को शांत करने के लिए सलमान को फिलहाल माफी मांग लेनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मैं सलमान से अनुरोध करूंगा कि वह अपनी और पूरे परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मंदिर जाएं और माफी मांगें।’ मुझे विश्वास है कि वे (बिश्नोई समाज) उनकी माफी स्वीकार कर लेंगे. उनके शब्दों में, “यह निर्णय करने का समय नहीं है कि उसने काले हिरण को मारा या नहीं। उन्हें माफी मांगनी चाहिए.”

पिता सिद्दीकी की मौत के बाद सलमान खान की जिंदगी उलट-पुलट हो गई है। वह लॉरेंस बिश्नोई का मुख्य निशाना है। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के बावजूद हर पल डर में बीत रहा है. कॉन्ट्रैक्ट के तहत वह ‘बिग बॉस 18’ में लगातार काम कर रहे हैं। वहां संचालन करते हुए उन्होंने कहा कि वह कठिन दौर से गुजर रहे हैं. और इस बार भाईजान ने एक बड़ा फैसला लिया है.

कुछ दिनों पहले फिल्म ‘सिंघम अगन’ की झलक जारी की गई थी। सितारों से सजी इस फिल्म में सलमान खान एक कैमियो रोल निभाने वाले थे। वह अपने दोस्तों रोहित शेट्टी और अजय देवगन के अनुरोध पर फिल्म में एक कैमियो भूमिका में आने के लिए सहमत हुए। लेकिन सुनने में आया है कि सलमान अपनी बात पर कायम नहीं रह सकते. उन्हें एक के बाद एक जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं. उन्हें यह भी धमकी दी गई है कि परिणाम बाबा सिद्दीकी से भी ज्यादा गंभीर होंगे. इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्होंने फिल्म ‘सिंघम आएं’ में काम न करने का फैसला किया है।

सलमान को मुंबई की एक तंबाकू फैक्ट्री में एक दिन के लिए शूटिंग करनी थी। बाबा सिद्दीकी की मौत और एक के बाद एक धमकियों के कारण शूटिंग रद्द कर दी गई। एक करीबी सूत्र के मुताबिक, ”रोहित शेट्टी और अजय देवगन ने भी आपस में चर्चा की है। ऐसे में वे भी सलमान से रिक्वेस्ट नहीं करना चाहते. इस समय सलमान से अनुरोध करना असंवेदनशील नहीं होगा। सूत्र ने बताया, ‘बाबा सिद्दीकी की मौत के बाद सलमान के साथ शूटिंग करना बेहद असंवेदनशील होगा। इसके अलावा रोहित को 18 अक्टूबर तक फिल्म सेंसर बोर्ड को सौंपनी थी. तो ऐसे में उन्होंने सलमान के बिना ही फिल्म पूरी करने का फैसला किया है.”

रोहित शेट्टी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दीपिका पादुकोण, करीना कपूर खान, रणवीर सिंह, अक्षय कुमार और टाइगर श्रॉफ भी हैं।

डर के साये में दिन गुजार रहे हैं सलमान खान! वह लॉरेंस बिश्नोईड के निशाने पर हैं. आप किसी भी वक्त खतरे में पड़ सकते हैं. इसलिए वह हमेशा सुरक्षा घेरे में रहते हैं. बाबा सिद्दीकी की मृत्यु के बाद वह और अधिक सतर्क हो गये। 1998 में कृष्णासर की हत्या के लिए भाईजान लॉरेंस बिश्नोई आज भी निशाने पर हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बिश्नोई लोग काले हिरण को पवित्र मानते हैं। लेकिन सलमान को नहीं पता था कि इस हिरण की पूजा की जाती है. सलमान की एक्स गर्लफ्रेंड सोमी अली ने हाल ही में दावा किया है.

सोमी उस वक्त सलमान के साथ रिलेशनशिप में थीं। उन्होंने हर चीज़ को बहुत करीब से देखा. घटना के बाद सलमान ने खुद कहा था कि उन्हें नहीं पता था कि काला हिरण इतना पवित्र होता है. इसलिए सोमी लॉरेंस बिश्नोई से आमने-सामने बातचीत करना चाहती हैं। एक्ट्रेस ने कहा कि वह हिंसा के खिलाफ हैं. इसलिए आप इस मामले से मुंह मोड़ रहे हैं। उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है.

सोमी ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा, ”किसी की जान न जाए. मैं बस इतना ही चाहता हूं. इससे मुझे कुछ हासिल नहीं होगा. मैं प्रचार पाने के लिए कुछ नहीं कर रहा हूं. किसी को भी मरना नहीं चाहिए, चाहे वह मेरा दोस्त हो या पड़ोसी। मैं हिंसा के ख़िलाफ़ हूं. मैं सलमान के साथ कई बार शिकार पर गया हूं।’ तो मुझे पता है।” सोमी ने यह भी कहा कि वह अगले नवंबर में लॉरेंस से मुलाकात करेंगी। यह घटना ‘हम साथ-साथ है’ की शूटिंग के दौरान घटी थी. काले हिरण की हत्या के दौरान सलमान के साथ सैफ अली खान, तब्बू, सोनाली बेंद्रेरा थे। लेकिन सोमी अली ने कहा कि वह उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते थे. उन्होंने कहा, ”हमारे देश में कानून हैं. तो सलमान को माफ़ी क्यों मांगनी चाहिए? किसी की हत्या नहीं होनी चाहिए. वे सही नहीं हैं. इसलिए मैं लॉरेंस बिश्नोई से बात करना चाहता हूं. मैं उसे समझाऊंगा, यह ठीक नहीं है. नवंबर में मैं बिश्नोई फोर्स के प्रमुख प्रमुख देवेन्द्र से बात करूंगा. क्योंकि, लॉरेंस बिश्नोई मूर्ख है। मैं सलमान से माफी मांगता हूं.’ सलमान ने खुद मुझसे कहा, उन्हें नहीं पता था कि बिश्नोई कबीले में काले हिरण की पूजा की जाती है.”

जूनियर एशिया कप सेमीफाइनल में रसिख की गेंदबाजी से भारत ने अमीरशाही को हराया

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अभिषेक शर्मा के अर्धशतक और रसिख सलाम दार की गेंदबाजी ने भारत को इमर्जिंग एशिया कप के सेमीफाइनल में पहुंचा दिया. उन्होंने सोमवार को ओमान के अल अमीरात में यूएई को 7 विकेट से हराया। अभिषेक शर्मा के अर्धशतक और रसिख सलाम दार की गेंदबाजी ने भारत को इमर्जिंग एशिया कप के सेमीफाइनल में पहुंचा दिया. उन्होंने सोमवार को ओमान के अल अमीरात में यूएई को 7 विकेट से हराया।

इसके साथ ही भारत ने लगातार दूसरा मैच जीत लिया। पहले मैच में उसने पाकिस्तान को हराया था. अभिषेक ने ओपनिंग करते हुए 24 गेंदों पर 58 रन बनाए. उन्होंने पांच चौके और चार छक्के लगाए. कप्तान तिलक वर्मा ने 18 गेंदों पर 21 रन बनाये. अगले ओवर में आयुष बदोनी ने चौका और छक्का लगाकर भारत को जीत दिला दी. भारत ने 55 गेंद शेष रहते जीत दर्ज की।

पहले बल्लेबाजी करते हुए अमीरशाही 16.5 ओवर में 107 रन पर ऑल आउट हो गई। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला शुरू में ही पलट दिया गया। उन्होंने पहले दो ओवरों में दो सलामी बल्लेबाज मयंक कुमार (10) और अर्यांश शर्मा (1) खो दिए। रसिख ने पहले ओवर में तीन बल्लेबाजों को आउट किया. पावर प्ले में अमीरशाही ने 40 रन पर 5 विकेट खो दिए। रसिख ने 15 रन देकर 3 विकेट लिए. रमनदीप सिंह ने 7 रन देकर 2 विकेट लिए। अमीरशाही के लिए राहुल चोपड़ा (50) सफल रहे। उन्होंने कप्तान बासिल हामिद (22) के साथ 41 रन की साझेदारी की. भारत दो मैचों में चार अंकों के साथ ग्रुप में शीर्ष पर है। आखिरी मैच में वे बुधवार को ओमान के खिलाफ खेलेंगे.

इमर्जिंग एशिया कप के फाइनल में यश ढुल की टीम इंडिया फेल हो गई. भारत पाकिस्तान से 128 रनों से हार गया. इस प्रतियोगिता में प्रत्येक देश की ‘ए’ टीम खेल रही थी। फाइनल में भारत की हार ने मुझे छह साल पहले चैंपियंस ट्रॉफी की याद दिला दी। रविवार को भारतीय टीम बैटिंग, बॉलिंग और फील्डिंग तीनों ही कैटेगरी में फेल रही. पाकिस्तान ने लगातार दो बार इमर्जिंग एशिया कप जीता। इससे पहले वे 2019 में जीते थे.

भारत ने ग्रुप चरण में 2017 चैंपियंस ट्रॉफी जीती। लेकिन फाइनल में 180 रनों से हारना पड़ा. इस साल के इमर्जिंग एशिया कप में यही हुआ। यश ढुल की टीम इंडिया ने ग्रुप स्टेज में धमाकेदार जीत हासिल की. लेकिन फाइनल में 140 रनों से हार गई. इस हार के लिए गेंदबाजी या बल्लेबाजी से ज्यादा भारत की फील्डिंग जिम्मेदार है. एकाधिक कैच. युवा कप्तान यश ढुल ने जिस तरह से फील्डिंग व्यवस्थित की वह भी हार का कारण बना। पाकिस्तान के बल्लेबाजों को खाली जगह मिल गई और वे खुशी से दौड़ पड़े.

रविवार को फाइनल की शुरुआत से ही पाकिस्तान के बल्लेबाज आक्रामक मूड में थे। ग्रुप स्टेज मैच में पाकिस्तान को 205 रन पर आउट करने वाले भारतीय गेंदबाज इस मैच में बदलाव के मूड में थे. दो ओपनर सैयाम अयूब और साहिबजादा फरहान ने मिलकर 121 रन बनाए. पाकिस्तान के दोनों ओपनरों ने ये रन सिर्फ 17 ओवर में ले लिए. मानव सुतार ने उस जोड़ी को तोड़ा. भारतीय बाएं हाथ के ऑलराउंडर की ओर से गेंद काफी नीचे आती है। सय्याम (59) गेंद को कट करने के चक्कर में विकेटकीपर को कैच दे बैठे. साहिबजादा भी ज्यादा देर तक क्रीज पर नहीं टिक सके. वह 62 गेंदों पर 65 रन बनाकर रन आउट हुए. इसके बाद रियान पराग ने भारत को मैच में वापस ला दिया. उन्होंने लगातार दो गेंदों पर ओमायर यूसुफ और कासिम अकरम को आउट किया। 35 रन बनाने वाले यूसुफ का कैच रियान ने ही लिया. उन्हें पूरा यकीन था कि कैच ठीक से लिया गया है या नहीं. जब थर्ड अंपायर ने आउट देने का फैसला किया तो पाकिस्तान के बल्लेबाजों की तरह भारत भी हैरान रह गया. अगली गेंद पर चौका लगाते हुए अकरम ने बाउंड्री पर कैच पकड़ लिया. कप्तान मोहम्मद हैरिस भी ज्यादा देर तक क्रीज पर नहीं टिक सके. उन्होंने केवल दो रन बनाये. 187 रन पर पाकिस्तान के पांच विकेट चटकाने के बाद भारत मैच में वापसी की कोशिश कर रहा था.

जब पाकिस्तान कुछ ख़तरे में था तो तैयब और मुबासिर खान ने टीम की कमान संभाली. दोनों ने 186 रनों की जोड़ी बनाई. उन्होंने तेज पारी खेलकर भारतीय गेंदबाजों को दबाव में ला दिया. तैयब ने 71 गेंदों पर 108 रन बनाए. मुबासिर ने 35 रन बनाये. इन दोनों को राजवर्धन हंगरगेकर ने आउट किया. भारतीय तेज गेंदबाज ने 6 ओवर में 48 रन देकर 2 विकेट लिए। हर्षित राणा, सुतार और निशांत सिंधु ने एक-एक विकेट लिया। पाकिस्तान की पारी 352 रन पर ख़त्म हुई.

साई सुदर्शन को यह बड़ा रन लेने के लिए शुरू से ही तेज दौड़ना पड़ा। वह और अभिषेक शर्मा यही कर रहे थे।’ लेकिन वह लंबे समय तक ऐसा नहीं कर सके. भारत ने अपना पहला विकेट 64 रन पर खोया. सुदर्शन 29 रन बनाकर आउट हुए. निकिन जोस तीसरे नंबर पर खिसक गए और 11 रन बनाए. सलामी बल्लेबाज अभिषेक शर्मा ने कुछ संघर्ष करने की कोशिश की. लेकिन 61 रन बाद सुफयान मुकीम ने उनका विकेट ले लिया. कप्तान यश ढुल भी 39 रन से ज्यादा नहीं बना सके. बाकी बल्लेबाज़ आते-जाते रहे। भारत ने नियमित अंतराल पर विकेट गंवाये. पाकिस्तान ने 60 गेंद शेष रहते जीत हासिल की.

कुश्ती ओलंपिक में पदक जीतने वाली भारत की पहली अब तक की एकमात्र महिला

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साक्षी मलिक ने कुश्ती में इतिहास रच दिया है. ओलंपिक में पदक जीतने वाली भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला पहलवान। मैदान के बाहर भी उनका संघर्ष कम नहीं है. उन्होंने देश के एक ताकतवर राजनेता और ‘सिस्टम‘ के खिलाफ दहाड़ लगाई है. वह लड़ाई कुश्ती की चटाई की तरह छह मिनट में ख़त्म नहीं हुई थी. यह आज भी चल रहा है. लेकिन साक्षी ने बहुत कुछ जीता है. उनके या उनके आंदोलन के कारण ‘बाहुबली’ बृजभूषण शरण सिंह को हटना पड़ा। कुश्ती में थोड़ा बदलाव आया है. लेकिन गवाह ने खुद कहा कि सजा मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी.

‘गवाह’। यदि आप बांग्ला बोलते हैं, तो आप साक्षी के रूप में खड़े होते हैं। साक्षी ने बहुत ही चतुराई से अपने ही नाम का अलग अर्थ में प्रयोग करते हुए अपनी आत्मकथा लिखी है। सिर्फ नाम के ही नहीं, वह अपने 32 साल के जीवन में कई घटनाओं के ‘गवाह’ रहे हैं। इतना कि आत्मकथा लिखने के लिए शब्दों की कभी कमी नहीं होती। बल्कि पूरा पढ़ने के बाद भी ऐसा लगता है कि अभी बहुत कुछ बाकी है.

प्रिंस हैरी की आत्मकथा के लेखक आंद्रे अगासी, फिल नाइट और पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार जेआर मॉरिंगर ने पिछले साल कहा था कि उन्होंने हैरी की आत्मकथा लिखने से इनकार कर दिया है। उनके अनुसार आज की आत्मकथा पुरानी कहानी है। किसकी जीवनी, उसने क्या किया, वह कितना अच्छा था, उसने कितनी सफलता हासिल की, यह कितना कठिन था – यह सब एक काल्पनिक कहानी है। मॉरिंगर ने आत्मकथा को छह शब्दों में परिभाषित किया, ‘एक कहानी, एक जीवन से उकेरी गई।’ एक कहानी, जो जिंदगी से बनी है.

भारतीय खिलाड़ियों की आत्मकथा अभी भी उस शैली से बाहर नहीं निकल पाई है। अब वहां वो शब्द लिखे हैं, जो उन्होंने कई बार सार्वजनिक तौर पर कहे हैं. अधिकांश आत्मकेन्द्रित हैं। अहंकार से भरा हुआ कुछ अपवाद भी हैं. ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा की आत्मकथा ‘ए शॉट एट हिस्ट्री’ या रविचंद्रन अश्विन की ‘आई हैव द स्ट्रीट्स’ उल्लेखनीय हैं। गवाह मालिक के ‘गवाह’ को उस सूची में जोड़ा जा सकता है। अभी बाज़ार में नहीं है. निस्संदेह एले कई तरह की सुर्खियाँ बटोरेगी।

आम लोगों को अब साक्षी के रेसलिंग करियर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए. नहीं वह रेसलिंग मैट से काफी दूर हैं। बल्कि साक्षी को राजधानी के मैदान में साथी पहलवानों के साथ विरोध प्रदर्शन के लिए याद किया जाता है। दिल्ली ले जाते समय पुलिस द्वारा उन्हें घसीटे जाने का दृश्य आज भी कई लोगों की आंखों में ताजा है। जिन लोगों के खिलाफ साक्षी ने चुनाव लड़ा, उनमें से विनेश फोगाट पेरिस ओलंपिक से वापस लड़ने और खाली हाथ चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक मैदान में उतरी हैं। बजरंग पुनिया कुश्ती और राजनीति के बीच कहीं बैठते हैं. साक्षी चुपचाप लड़ती रहती है।

साक्षी सिर्फ कुश्ती के लिए ही नहीं बल्कि महिलाओं के लिए भी कुश्ती लड़ती हैं। उन महिलाओं को पहलवान बनने की ज़रूरत नहीं है। अगर दिहाड़ी मजदूर या प्रतिष्ठित कॉरपोरेट में काम करने वाली महिलाओं पर भी अत्याचार होता है तो साक्षी भी उनके साथ हैं। साक्षी की आत्मकथा साहस का प्रतीक है, जिसे लिखना आसान नहीं है। जिसे कहना आसान नहीं है. खासकर यदि आप एक भारतीय एथलीट हैं। क्योंकि खेल की दुनिया में भी अन्य विषयों की तरह कई स्याह सच छुपे हुए हैं, जिनके उजागर होने पर खतरा बढ़ जाएगा। साक्षी ने साहसपूर्वक इसे उठाया। अपने जोखिम की परवाह किए बिना.

गवाह इस विवाद से दूर रह सकता था. उनके ऐतिहासिक पदकों, कुश्ती करियर, महिला कुश्ती के लिए उनके काम के बारे में आसानी से लिख सकते हैं। वो वहां थे। लेकिन साथ ही पहलवानों का विरोध, बृजभूषण का यौन शोषण का इतिहास, लड़कियों के शरीर पर भद्दी टिप्पणियाँ, अपने प्रिय मित्र (अब पति) सत्यव्रत से शादी करने के लिए परिवार के खिलाफ लड़ना और बार-बार लैंगिक भेदभाव का शिकार होना भी लिखा है महत्व के साथ.

किताब में बृजभूषण के बारे में एक पूरा चैप्टर है. गवाह ने कहा कि जब वह 2012 में बृजभूषण कुश्ती संगठन के प्रमुख बने, तो उन्हें नहीं पता था कि संगठन कैसे चलाया जाता है। उन्हें सिर्फ हर चार साल में चुनाव की जानकारी थी. बाद में आप समझ सकते हैं कि कैसे बृजभूषण ने राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर अपनी ताकत बनाई. एक अन्य राजनीतिक नेता ने उनकी मदद की. साक्षी को समझ आ गया था कि बृजभूषण भारतीय कुश्ती पर पूरी तरह कब्ज़ा कर चुके हैं। लेकिन जब तक उसकी रोशनी खुद पर पड़ रही थी तब तक साक्षी को कोई परवाह नहीं थी।

साक्षी ने लिखा, ”भारत में कुश्ती प्रतियोगिताओं की स्थिति पहले से ही खराब थी। इस बीच मुझे समझ नहीं आया कि जूनियर नेशनल प्रतियोगिता उत्तर प्रदेश के नंदिनी नगर में क्यों आयोजित की जा रही है. पिछड़े इलाके में एक छोटा सा गाँव। कोई फर्क नहीं पड़ता कि। लखनऊ से अयोध्या जाने वाले हाईवे पर वो गांव. स्थानीय रेलवे स्टेशन भी 40 किमी दूर है. मुझे बाद में एहसास हुआ कि वहां प्रतियोगिता आयोजित करने का असली कारण बृजभूषण थे, जो क्षेत्र से लोकसभा सांसद और उत्तर प्रदेश कुश्ती संघ के अध्यक्ष हैं।

उस प्रतियोगिता में गोल्ड जीतने के बाद साक्षी पर बृजभूषण की ‘नजरें’ टिक गईं। उस समय साक्षी के कानों में उनके ‘बाहुबली’ उपनाम और माफिया से संबंध की बात चल गई। साक्षी ने लिखा, ”मैंने खुद को इन सब से दूर रखा. बस मैट पर ध्यान केंद्रित किया… एक बार जब मैंने उसे देखा तो वह नियमित रूप से राष्ट्रीय शिविरों में आने लगा। तब एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए ट्रायल चल रहे थे। हालाँकि, बृजभूषण का रिश्ता या चर्चा जिससे भी उनकी नज़र में गई, वह कुश्ती तक ही सीमित नहीं थी। उन्हें जो भी मैच देखना अच्छा लगता था, वह उसके करीब जाने की कोशिश करते थे। कुछ लड़कियाँ हर चीज़ में रुचि रखती थीं। एक फिजियोथेरेपिस्ट था जिसका काम लड़कियों के बारे में बृजभूषण को खबर देना था… कुछ लोगों को यह दिलचस्पी थी। वह बृजभूषण से सहजता से बात करते थे. मैं जानता हूं कि कुछ के साथ रिश्ता आगे बढ़ा. उन्हें विभिन्न प्रतियोगिताओं में खेलने और विदेश जाने के अवसर मिलते थे।”

साक्षी ने यह भी लिखा, ”मैंने वह काम कभी नहीं किया. अपनी बुद्धि और अपने अतीत के इतिहास को जानना। 2012 में परीक्षण के समय मैं 19 वर्ष का था। मुकदमा जीतने के बाद उसने मुझे बंदर कहना शुरू कर दिया। वह

ममता पर लगे गंभीर आरोप क्या ममता बनर्जी लेंगे बलात्कारी का पक्ष ?’ कहा तक पहुंची जांच

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8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कुलपति की नियुक्ति पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित की अध्यक्षता में एक ‘खोज-सह-चयन’ समिति का गठन किया था।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति के लिए चयन सूची में से चयन के आधार पर सूची तैयार कर कुलाधिपति और राज्यपाल को भेजेंगी. सुप्रीम कोर्ट दोबारा इस प्रक्रिया में दखल नहीं दे रहा है. न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयार की पीठ ने आज कहा कि ऐसे में कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया में देरी होगी. मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को है.

8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कुलपति की नियुक्ति पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित की अध्यक्षता में एक ‘खोज-सह-चयन’ समिति का गठन किया था। शीर्ष अदालत ने कहा, यह समिति प्रत्येक विश्वविद्यालय के कुलपतियों की नियुक्ति के लिए तीन नामों का चयन करेगी और उन्हें मुख्यमंत्री को भेजेगी। प्रथमाक्षर के आधार पर सूची में तीन नाम होंगे। मुख्यमंत्री तीनों में से वरीयता के आधार पर सूची बनाएंगे. जो सबसे ज्यादा पसंद आएगा उसका नाम सबसे पहले होगा. अगर आपको किसी के नाम पर आपत्ति है तो कारण सहित बताएं। वह सूची राज्यपाल और आचार्य के पास जायेगी.

लेकिन हाल ही में राज्यपाल ने इस आदेश में कुछ संशोधन की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. राज्यपाल ने कहा कि ललित समिति वरीयता क्रम के अनुसार सूची मुख्यमंत्री को भेजे. 3 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांतेर की बेंच ने इस पर सहमति जताई, लेकिन आज राज्य सरकार की ओर से वकील जयदीप गुप्ता ने आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. नाम का खुलासा हो गया है. अगर मुख्यमंत्री और आचार्य असहमत होंगे तो मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में आएगा. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि राज्यपाल की याचिका खारिज नहीं की जा रही है. इस पर आवश्यकतानुसार बाद में सुनवाई की जाएगी। फिलहाल पिछला आदेश ही लागू रहेगा। यदि मुख्यमंत्री, राज्यपाल समिति की सिफारिशों से असहमत हैं तो सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करेगा। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा, अब हस्तक्षेप करने में बहुत देर हो जाएगी.

आरजी टैक्स घटना के बाद राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में डराने-धमकाने के आरोप सामने आये हैं. संबंधित कॉलेज परिषदें पहले से ही विभिन्न चिकित्सा और शैक्षणिक संस्थानों में इस धमकी-प्रथा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही हैं। लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को नवान्न में जूनियर डॉक्टरों के साथ बैठक में यह व्यावहारिक रूप से स्पष्ट कर दिया कि वह उस कदम से नाखुश हैं.

यहां तक ​​कि आरजी टैक्स प्रिंसिपल ने मानस बनर्जी से सीधे पूछा कि उन्होंने किसकी इजाजत से 47 लोगों को सस्पेंड किया है? उन्होंने यह भी कहा, ”आपने हमें इसके बारे में नहीं बताया. सीधे विश्वविद्यालय भेजा गया। क्या यह ख़तरे की संस्कृति नहीं है?” हालांकि, उस मेडिकल सेंटर के जूनियर डॉक्टर और आंदोलन के नेता अनिकेत महतो ने मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी का तुरंत विरोध किया. यहां तक ​​कि अनिकेत ने सीधे तौर पर कहा, ”जिनके खिलाफ कार्रवाई की गई है, वे कुख्यात बदमाश हैं. हम उनका समर्थन नहीं कर सकते. सर (प्रिंसिपल) ने जांच कर कार्रवाई की है.” उस वक्त मुख्यमंत्री ने अनिकेत को रोकने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुका. इसके बजाय उन्होंने कहा, ”मैडम, हम अपराधी के लिए जाएंगे या बलात्कारी के लिए?” इसके बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि वह किसी के लिए नहीं हैं. तब अनिकेत ने फिर कहा, ”जरूरत हो तो आप जांच कर लें. उसके बाद आरोपी को वापस कॉलेज ले आएं.” उस वक्त मुख्यमंत्री ने कहा था, ”आप प्रशासन पर अपनी नाक नहीं उठा सकते.” अनिकेत ने भी पलटवार करते हुए कहा कि वह प्रशासन में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं. रास्ता। लेकिन वे कॉलेज के प्रिंसिपल को अपना अभिभावक मानते हैं. इसलिए, जैसे ही आप उन्हें शिकायत बताते हैं, आप वहां से उचित कार्रवाई की उम्मीद करते हैं।

इस दिन मुख्यमंत्री स्वास्थ्य सचिव से जानना चाहते हैं कि आरजी टैक्स के संबंध में प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में ‘एकेडमिक काउंसिल’ या ‘कॉलेज काउंसिल’ का गठन कैसे किया जाता है. मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य सचिव के इस जवाब पर नाराजगी व्यक्त की कि काउंसिल का गठन प्रत्येक मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य, अधीक्षक और विभागाध्यक्षों को लेकर किया गया है. उन्होंने कहा, ”क्या हमें कभी इस बारे में सूचित किया गया? क्या सरकार को सूचित करना कर्तव्य नहीं है?” चिकित्सा समुदाय के अनुसार, मुख्यमंत्री ने ऐसी टिप्पणी करके इतने लंबे समय तक हर मेडिकल कॉलेज में आरोपियों के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई को व्यावहारिक रूप से विफल कर दिया है।

बैठक की शुरुआत में आंदोलनकारी जूनियर डॉक्टर देबाशीष हलदर ने छात्र परिषद का चुनाव नहीं होने से आरजी के आशीष पांडे और अभिक डे जैसे अन्य जूनियर डॉक्टरों द्वारा बनाए गए धमकी भरे माहौल के बारे में बात करना शुरू किया. उन्हें रोकते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ”जो लोग यहां नहीं हैं, उनके नाम पर बात न करें तो बेहतर है.” देबाशीष ने कहा, ‘क्या मैं इसे शिकायत कह सकता हूं?’ मुख्यमंत्री ने कहा, कई लोगों के खिलाफ शिकायतें हैं. इसलिए ये सब कहना बेकार है. दूसरी ओर, मुख्यमंत्री आरजी द्वारा 47 लोगों (हालांकि संख्या 59 है) को बर्खास्त करने के फैसले का विवरण जानना चाहते हैं. अनिकेत ने कहा, ”कॉलेज काउंसिल ने एक जांच कमेटी बनाई.” इसके बाद जांच समिति और स्वास्थ्य क्षेत्र शिकायत निवारण समिति के सदस्य डॉक्टर देबब्रत दास ने कहा कि सभी सूचनाओं की जांच के बाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नियमों के अनुसार कदम उठाए गए हैं. लेकिन ममता ने कहा, ”सरकार नाम की भी एक चीज होती है. आप यह सब स्वयं नहीं करते हैं।” मुख्यमंत्री ने यह भी कहा, ”मैं प्रिंसिपलों से अनुरोध करता हूं कि अगर आगे से ऐसी शिकायतें आती हैं तो हमें सूचित करें.” हम जांच करेंगे. मैं किसी का करियर बर्बाद करना चाहता हूं