Thursday, March 19, 2026
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जब 9 साल पहले भारत का एक और विदेश मंत्री पहुंचा था पाकिस्तान!

कहानी 9 साल पहले की जब भारत का एक और विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंचा था! एक ही जगह- पाकिस्तान। दो तस्वीरें। 9 साल का गैप। एक तस्वीर 2015 की। तब तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पीछे-पीछे बतौर विदेश सचिव चलते दिख रहे एस. जयशंकर। दूसरी तरफ खुद जयशंकर की जो बतौर विदेश मंत्री पूरे ठसक के साथ दिख रहे हैं। सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान को द्विपक्षीय संबंधों में सुधार का बड़ा मौका दिया था। तब द्विपक्षीय बातचीत भी हुई थी लेकिन पाकिस्तान पीठ में छुरा घोंपने की अपनी फितरत से कहां बाज आता। उसने छुरा घोंपा और दोस्ताना रिश्तों की संभावनाओं को मसल दिया। अब 9 साल बाद वही पाकिस्तान द्विपक्षीय बातचीत के लिए छटपटा रहा। जयशंकर ने तो पहले ही दो टूक साफ कर दिया कि कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं लेकिन तब भी ये भारतीय विदेश मंत्री का ये दौरा पाकिस्तान के लिए मौका हो सकता है। मौका भारत के साथ संबंध सुधारने का। मौका तनाव कम करने का। मौका द्विपक्षीय व्यापार के फिर शुरू होने की उम्मीदों को पंख देने का, अर्थव्यवस्था की डूबती नांव को साहिल तक पहुंचाने का। सबसे पहले बात सुषमा स्वराज के दिसंबर 2015 के पाकिस्तान दौरे की। तत्कालीन विदेश मंत्री अफगानिस्तान पर हुए सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गई थीं। उसमें 14 देशों ने हिस्सा लिया था। सुषमा स्वराज ने तब पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी की। तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ और तबके विदेश मंत्री सरताज अजीज से मुलाकातें हुईं।

तब एस. जयशंकर भी सुषमा स्वराज के साथ पाकिस्तान गए थे। बतौर विदेश सचिव। तस्वीर में वह स्वराज के पीछे चलते दिख रहे हैं। 9 साल बाद अब एस जयशंकर विदेश मंत्री की हैसियत से पाकिस्तान पहुंचे हैं। एससीओ की मीटिंग के लिए। अपनी स्पीच में उन्होंने बिना नाम लिए चीन और पाकिस्तान को घेरा और नसीहतें भी दी। नसीहत ये कि आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से बचना होगा। नसीहत संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की। नसीहत ये कि अगर सहयोग में विश्वास की कमी है तो दोस्ती नहीं हो सकती। अगर पड़ोसी धर्म नदारद है तो अंदर झांकने की जरूरत है। 9 साल का एक बड़ा फर्क ये है कि तब सुषमा स्वराज ने द्विपक्षीय बातचीत के जरिए पाकिस्तान को मौका दिया था, लेकिन इस बार उससे कोई बातचीत नहीं। बस पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ से 20 सेकंड का हैंडसेक।

तब पाकिस्तान दौरे से लौटने के बाद सुषमा स्वराज ने अपनी यात्रा को लेकर संसद में बयान दिया था। उन्होंने बताया था कि कैसे उनका दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों में गर्माहट का आधार बन सकता है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री सरताज अजीज से सुषमा की मुलाकात के बाद 9 दिसंबर को इस्लामाबाद में जारी हुए जॉइंट स्टेटमेंट में कॉम्प्रिहेंसिव बाइलेटरल डायलॉग का ऐलान किया गया था।

सुषमा स्वराज का पाकिस्तान दौरा बेपटरी रिश्तों को पटरी पर लाने का एक बड़ा मौका हो सकता था। लेकिन जो अपनी हरकतों से बाज आ जाए वो पाकिस्तान कहां। एक महीने भी नहीं बीते कि पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकियों ने हमला कर दिया। रिश्तों के सामान्य होने की रही-सही उम्मीदें तब जमींदोज हो गईं जब सितंबर 2016 में उरी में आतंकी हमला हुआ। जवाब में भारत को सर्जिकल स्ट्राइक करना पड़ा। मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि आतंक और बातचीत दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को बातचीत के लिए, द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य होने के लिए आतंकवाद को औजार के रूप में इस्तेमाल करना छोड़ना ही होगा।

भारत का ये रुख अब भी वही है। 9 साल बाद भारत का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान गया लेकिन द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई। एस. जयशंकर ने दौरे से पहले ही साफ कर दिया था कि यात्रा बहुपक्षीय बातचीत के लिए है, द्विपक्षीय बातचीत के लिए नहीं। हालांकि, उनके इस दौरे ने संदेश जरूर दिया है कि भारत पड़ोसी देशों से संबंधों में स्थिरता चाहता है।

पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर रहे अजय बिसारिया ने हॉन्ग कॉन्ग के एक न्यूजपेपर साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बातचीत में जयशंकर के पाकिस्तान दौरे को दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने का अहम मौका बताया था। उन्होंने कहा था, ‘भारत ने एक मंत्री को भेजने का फैसला कर संदेश दिया है कि वह अपने पड़ोसी से संबंधों में स्थिरता चाहता है। दोनों देश संबंधों की शुरुआत अपने-अपने हाई कमिश्नर भेजकर कर सकते हैं। इसके अलावा ट्रेड भी शुरू हो सकता है।’

अब पाकिस्तान के ऊपर है कि वह भारत के संदेश को कितनी गंभीरता से लेता है। द्विपक्षीय संबंध का सामान्य होना आखिरकार उसी के हित में है। भारत को अगर वह द्विपक्षीय व्यापार के लिए मना लेता है तो उसकी डूबती अर्थव्यवस्था को एक सहारा मिल सकता है। तब सुषमा के दौरे पर पाकिस्तान ने सुनहरा मौका गंवा दिया था, अब 9 साल बाद उसे एक और मौका मिला है।

 

आखिर जम्मू कश्मीर की सरकार में क्यों शामिल नहीं हुई कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि कांग्रेस जम्मू कश्मीर की सरकार में आखिर क्यों शामिल नहीं हुई! नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। सीएम के तौर पर उन्होंने दूसरी बार शपथ ली है। जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद वह सूबे के पहले मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन उनकी सरकार में सहयोगी कांग्रेस शामिल नहीं हुई। मतलब राज्य में I.N.D.I.A की सरकार नहीं बनी! दोनों पार्टियां साथ मिलकर चुनाव लड़ी थीं तो फिर कांग्रेस सरकार में क्यों शामिल नहीं हुई? इसका जवाब है- महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव। उमर अब्दुल्ला के शपथ से पहले जबरदस्त सस्पेंस बना हुआ था। सस्पेंस इस पर कि कांग्रेस सरकार में शामिल होगी या नहीं। छन-छनकर खबरें आने लगीं कि पार्टी सरकार में शामिल नहीं होगी। अटकलें लगने लगीं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में शायद सबकुछ ठीक नहीं है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैली में कहा था कि उनका घोषणापत्र देखकर पाकिस्तान बहुत खुश है। पीएम ने पाकिस्तान के मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि आर्टिकल 370 की बहाली के मुद्दे पर नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन का रुख एकदम पाकिस्तान वाला है।शपथ समारोह होते ही सबकुछ शीशे की तरह साफ हो गया। कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार में शामिल नहीं हुई। आखिर इसके पीछे वजह क्या है?

कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार का हिस्सा नहीं बनी, उसकी वजह पार्टी चाहे जो बताए लेकिन हकीकत में वजह महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव हैं। हो सकता है कि बाद में पार्टी सरकार में शामिल हो जाए लेकिन दो अहम राज्यों के चुनाव से पहले नहीं। कारण ये कि अगर वह सरकार का हिस्सा बनती है तो दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनाव घोषणा पत्र के बहाने से उसे घेरने का बड़ा मौका हाथ लग सकता है। कांग्रेस नहीं चाहती कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनावी वादों की सीधी आंच उसे महाराष्ट्र और झारखंड में झेलनी पड़े। पार्टी अभी हरियाणा चुनाव में हार के झटकों से भी नहीं उबरी है। अटकलें लगने लगीं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में शायद सबकुछ ठीक नहीं है। बता दें कि कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार का हिस्सा नहीं बनी, उसकी वजह पार्टी चाहे जो बताए लेकिन हकीकत में वजह महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव हैं।आखिर कांग्रेस को नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनावी वादों का चुनाव में नुकसान का डर क्यों सता रहा है? जवाब उसी में छिपा है यानी चुनावी वादों में।

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने आर्टिकल 370 और 35 ए की बहाली की कोशिश का वादा किया है। वादा किया है कि राजनीतिक कैदियों की रिहाई होगी। वादा किया है सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) को रद्द करने का। भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत आगे बढ़ाने का। जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से ध्वज और संविधान की बहाली का। एक वादा ये भी कि शंकराचार्य पर्वत और हरि पर्वत किला के बीच रोपवे चलाई जाएगी। अब रोपवे चलाने में क्या बुराई है लेकिन विवाद नाम का है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने मैनिफेस्टो में शंकराचार्य पर्वत को तख्त-ए-सुलेमान और हरि पर्वत किला को कोह-ए-मारन नाम दिया है। जम्मू-कश्मीर चुनाव के दौरान भी बीजेपी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के मैनिफेस्टो को लेकर कांग्रेस को घेरा था। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैली में कहा था कि उनका घोषणापत्र देखकर पाकिस्तान बहुत खुश है। पीएम ने पाकिस्तान के मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि आर्टिकल 370 की बहाली के मुद्दे पर नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन का रुख एकदम पाकिस्तान वाला है।

अब अगर कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार में शामिल होती तो बीजेपी को उसे महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव में भी नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनाव घोषणा पत्र के बहाने से घेरने का मौका मिल जाता। हरियाणा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस फूंक-फूंककर कदम रखना चाहती है। बता दें कि उमर अब्दुल्ला के शपथ से पहले जबरदस्त सस्पेंस बना हुआ था। सस्पेंस इस पर कि कांग्रेस सरकार में शामिल होगी या नहीं। छन-छनकर खबरें आने लगीं कि पार्टी सरकार में शामिल नहीं होगी। अटकलें लगने लगीं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में शायद सबकुछ ठीक नहीं है। बता दें कि कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार का हिस्सा नहीं बनी, उसकी वजह पार्टी चाहे जो बताए लेकिन हकीकत में वजह महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव हैं। हो सकता है कि बाद में पार्टी सरकार में शामिल हो जाए लेकिन दो अहम राज्यों के चुनाव से पहले नहीं। वह बीजेपी को ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहती। यही वजह है कि वह उमर अब्दुल्ला सरकार में फिलहाल शामिल नहीं हुई।

 

आखिर देश की राजधानी दिल्ली में कैसे फैल रहा है नशे का व्यापार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि देश की राजधानी दिल्ली में नशे का व्यापार कैसे फैल रहा है! पहले 6500 करोड़ रुपये और अब करीब 2400 करोड़ रुपये की कोकीन। 10 दिनों के भीतर देश की राजधानी दिल्ली से करीब 9 हजार करोड़ रुपये की कोलंबियन कोकीन बरामद की जा चुकी है। देश में कोकीन बरामदगी का ये अबतक का सबसे बड़ा मामला है। त्योहारी और पार्टी सीजन से पहले इंटरनेशनल ड्रग रैकेट के खास निशाने पर है दिल्ली। दोनों ही मामले में सरगना एक ही है। दुबई में बैठा वीरेंद्र बसोइया उर्फ वीरू। उसने कोलंबिया से ड्रग की खेप एक पुराने मालवाहक जहाज से दुबई से होते हुए चेन्नई पहुंचवाया। ड्रग को चेन्नई से हापुड़ लाया गया और वहां से दिल्ली। दोनों मामलों में हैंडलर ब्रिटिश नागरिक हैं जो शायद एक दूसरे को नहीं जानते। कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं, कुछ आरोपियों की तलाश जारी है। मनोरंजन जगत की कुछ बड़ी हस्तियों से भी इसके तार जुड़े होने की आशंका है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पश्चिमी दिल्ली में एक गोदाम से 200 किलोग्राम कोकीन बरामद की है। इसकी कीमत करीब 2,400 करोड़ रुपये है। ये कोकीन नमकीन के पैकटों में रखे गए थे। इस मामले में एक ब्रिटिश नागरिक की तलाश है, जिसके बारे में माना जा रहा है कि वह लंदन भाग गया है। इससे पहले 1 अक्टूबर को महिपालपुर एक्सटेंशन में एक ठिकाने से 562 किलोग्राम कोकीन बरामद हुई थी। उसकी कीमत 6500 करोड़ रुपये है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1 किलोग्राम कोकीन की कीमत करीब 12 करोड़ रुपये होती है।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गुरुवार को पश्चिमी दिल्ली के रमेश नगर इलाके में एक गोदाम पर छापा मारा और 200 किलोग्राम कोकीन बरामद की। स्पेशल सेल के स्पेशल कमिश्नर आरपी उपाध्याय ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘हमें रमेश नगर इलाके के एक गोदाम से 200 किलोग्राम कोकीन मिली है। एक स्पेशल टीम मामले की जांच कर रही है।’

पुलिस ने इस मामले में अखलाक नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। वह हापुड़ जिले का रहने वाला है। अखलाक ने ही इस खेप को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया था। उसी से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि ड्रग का हैंडलर ब्रिटिश नागरिक है। पुलिस ने बताया कि एक ब्रिटिश नागरिक सविंदर सिंह ने इन ड्रग्स को राष्ट्रीय राजधानी में रखवाया था। वह फिलहाल फरार है।

इससे पहले 562 किलोग्राम कोकीन वाली जो खेप जब्त की गई थी, वह भी जतिंदर पाल सिंह उर्फ जस्सी नाम के एक और ब्रिटिश नागरिक के पास थी। पुलिस का कहना है कि जस्सी भी कोकीन की बिक्री की निगरानी के लिए ब्रिटेन से भारत आया था। सविंदर और जस्सी दोनों को इस मामले के मुख्य आरोपी दिल्ली के रहने वाले तुषार गोयल से संपर्क करना था। गोयल को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। 562 किलोग्राम कोकीन बरामदगी मामले में पुलिस ने अब तक 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बताया कि आरोपी तुषार गोयल, हिमांशु और औरंगजेब के पास से 15 किलोग्राम कोकीन बरामद हुई है। उन्हें उस समय पकड़ा गया जब वे महिपालपुर एक्सटेंशन के गोदाम से सप्लाई देने के लिए बाहर निकल रहे थे। बाकी का गांजा और कोकीन गोदाम में मिला। तुषार गोयल दिल्ली के वसंत विहार का रहने वाला है जबकि हिमांशु और औरंगजेब उसके दो साथी हैं। इस मामले में पुलिस ने मुंबई के कुर्ला वेस्ट के रहने वाले एक रिसीवर भरत जैन को भी पकड़ा है।

गुरुवार को 200 किलोग्राम कोकीन बरामदगी मामले में पुलिस ने ब्रिटिश नागरिक सविंदर के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर जारी कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि रैकेट का भंडाफोड़ होने के तुरंत बाद ही वह लंदन भाग गया। स्पेशल सेल के एडिशनल सीपी प्रमोद कुशवाहा ने टीओआई को बताया कि दुबई में बैठे वीरू उर्फ वीरेंद्र बसोइया दो अन्य विदेशी नागरिकों के साथ मिलकर इस खेप की डिलीवरी करवा रहा था। ड्रग कार्टेल का सरगना बसोइया को ही माना जा रहा है। उसकी इस मामले में गिरफ्तार तुषार गोयल से 2011 में दिल्ली के तिहाड़ जेल में मुलाकात हुई थी। आरोप है कि उसने एक पुराने मालवाहक जहाज के जरिए दुबई होते हुए दक्षिण अमेरिका से भारत में कोकीन की खेप भेजी थी। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपियों ने चेन्नई से हापुड़ होते हुए दिल्ली ड्रग्स मंगवाया था।

पुलिस अब उन डीलरों की तलाश कर रही है, जिन्हें ब्रिटिश नागरिकों से खेप लेनी थी। आशंका है कि मनोरंजन जगत के कुछ बड़े नाम इस मामले में शामिल हो सकते हैं। हमारे ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि दिल्ली, मुंबई और गोवा में होने वाले आगामी कॉन्सर्ट और म्यूजिक फेस्टिवल में सप्लाई करने के लिए कार्टेल ने कोकीन का भंडार जमा किया था। अगस्त में केंद्रीय खुफिया एजेंसी से मिली एक गुप्त सूचना के बाद इस रैकेट का पर्दाफाश हुआ। स्पेशल सीपी उपाध्याय ने कहा, ‘1 अक्टूबर को टीम को दक्षिण दिल्ली के महिपालपुर में गोयल के एक गोदाम में ड्रग्स की एक बड़ी खेप आने की खबर मिली। इसके बाद आरोपियों के पास और गोदाम से बड़ी मात्रा में कोकीन और हाइड्रोपोनिक गांजा बरामद किया गया।’

 

क्या बांग्लादेश बॉर्डर पर चल रहा है अवैध घुसपैठ का कारोबार ?

वर्तमान में बांग्लादेश बॉर्डर पर अवैध घुसपैठ का कारोबार चल रहा है! बांग्लादेश से अगर किसी घुसपैठिए को भारत में घुसपैठ करनी है तो इसकी कीमत मात्र 4 हजार रुपये है। जी हां, चार हजार रुपये में हमारे बॉर्डर की सुरक्षा को धत्ता बताते हुए बांग्लादेश से बॉर्डर पार करा भारत में घुसपैठ कराई जा रही है। इसी कोशिश में पश्चिम बंगाल में बीएसएफ ने चार बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा है। इनके साथ एक भारतीय एजेंट को भी दबोचा गया है। जो भारत में घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे थे। भारत में फेस्टिव सीजन शुरू होने पर बॉर्डर पर इस तरह से घुसपैठ करने के मामले को गंभीर माना जा रहा है। चारों के पास भारत के नकली आधार कार्ड भी थे। जो की बांग्लादेश में ही प्रति एक हजार बांग्लादेशी टका देकर बनवाए गए थे। सूत्रों ने बताया कि पकड़े गए चार बांग्लादेशी नागरिकों में मोहम्मद बच्चु, मोनिरूल अली, मोहम्मद अनारूल इस्लाम और मोहम्मद युसूफ अली हैं। चारों बांग्लादेश के रहने वाले हैं। जबकि इन चारों को प्रति चार हजार रुपये लेकर बांग्लादेश से बॉर्डर पार कराकर भारत में अवैध रूप से घुसपैठ करा रहे आरोपी हसन अली को भी पकड़ा गया है। यह भारत का नागरिक है। इन सभी को 15 अक्टूबर की दोपहर बाद बीएसएफ दक्षिण बंगाल फ्रंटियर की 73वीं बटालियन की सीमा चौकी बामनाबाद के जवानों ने पकड़ा।

आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि यह सभी बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में घुसपैठ करके चेन्नै जाने की फिराक में थे। इन्हें पकड़ने के लिए बीएसएफ को क्यूआरटी का भी इस्तेमाल करना पड़ा। चारों बांग्लादेशियों के पास भारतीय आधार कार्ड मिले। पूछताछ करने पर इन्होंने बताया कि यह सब नकली हैं। जिन्हें प्रति एक हजार बांग्लादेशी टका लेकर बांग्लादेश के राजशाही के उपजिला गोदागरी में बांग्लादेशी दलाल ने बनवाकर दिए थे। केवल आधार कार्ड ही नहीं भारत के नकली वोटर कार्ड भी यहां बन जाते हैं। चारों बांग्लादेशियों ने बताया कि वह बांग्लादेश के गोदागरी के रहने वाले हैं। फिलहाल इनकी असलियत जानने के लिए विदेश मंत्रालय की मदद ली जाएगी कि यह बांग्लादेशी हैं या अन्य किसी देश के।

आरोपी विदेशी नागरिकों ने यह भी बताया कि वह तो पकड़े गए, लेकिन उनसे पहले कितने ही बांग्लादेशियों ने इसी चैनल से भारत में घुसपैठ की है। वह सब चेन्नै, बैंगलुरू, दिल्ली और मुंबई समेत अन्य शहरों में भी घुलमिल चुके हैं। सभी के पास बांग्लादेश से नकली आधार कार्ड बनवाकर दिए गए। ताकि अगर भारत में कोई उनके आधार कार्ड देखे तो एकदम से उनके भारतीय होने पर यकीन कर ले। सूत्रों का कहना है कि इन चारों को पकड़कर संबंधित पुलिस को आगे की जांच के लिए सौंप दिया है। बाकी पता लगाया जा रहा है कि यह सब भारत में मजबूरी करने के लिए घुसपैठ कर रहे हैं या फिर इनका कोई और इरादा है?

बता दे कि बांग्लादेश से भारत में बड़ी संख्या में घुसपैठ कराने वाले एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। जिसमें भारत-बांग्लादेश बॉर्डर की हिफाजत करने वाली बीएसएफ ने पश्चिम बंगाल में रहने वाले भारत की तरफ के मास्टरमाइंड को पकड़ा है। इससे पूछताछ में इस रैकेट के सरगना के बारे में भी पता लगा है। जो बांग्लादेश के श्याम नगर में बैठा है। आरोपी ने पूछताछ में बताया है कि वह कुछ ही समय में 100 से अधिक बांग्लादेशियों को अवैध रूप से भारत में प्रवेश करा चुका है। बहरहाल, मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को अन्य एजेंसियों के सुपुर्द कर दिया गया है। जिससे की यह पता लगाया जा सके कि जो घुसपैठ कराई गई हैं क्या उसमें किसी आतंकवादी और असामाजिक तत्व भी शामिल हैं? या फिर सामान्य बांग्लादेशी नागरिक शामिल हैं। जो बांग्लादेश छोड़कर भारत में गुजर-बसर करने के इरादे से लाए गए।

पूछताछ में आरोपी ने बताया कि बांग्लादेश में बैठा इस रैकेट का सरगना अपने तीन साथियों के साथ मिलकर बांग्लादेशी नागरिकों को नाव में बैठाकर नदी के माध्यम से भारत बॉर्डर तक छोड़ता था। जहां से यह भारतीय दलाल उन्हें अपने साथ लाकर पश्चिम बंगाल में छोड़ देता था। इसके लिए वह प्रति बांग्लादेशी घुसपैठ के 3500 बांग्लादेशी टका लेता था। करीब दो सालों में इस तरह से उसने 100 से अधिक बांग्लादेशी नागरिकों की भारत में घुसपैठ कराई है। बीएसएफ के डीआईजी एन के पांडेय ने बताया कि मामले में संबंधित एजेंसी आगे की तफ्तीश कर रही हैं।

 

आखिर पाकिस्तान ने SCO समिट में कश्मीर का मुद्दा क्यों नहीं उठाया?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि पाकिस्तान ने SCO समिट में कश्मीर का मुद्दा आखिर क्यों नहीं उठाया !इस्लामाबाद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शासनाध्यक्षों की परिषद (सीएचजी) की बैठक पाकिस्तान के लिए मुश्किल वक्त में बड़ा मौका बनकर आई। 15-16 अक्टूबर को हुए इस आयोजन के जरिए पाकिस्तान की पूरी कोशिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि सुधारने की रही। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बुधवार के समापन भाषण में कश्मीर मुद्दे का जिक्र न होना यह दर्शाता है कि पाकिस्तान इस आयोजन को किसी भी विवाद से दूर रखना चाहता है। कश्मीर मुद्दा भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव की वजह रहा है और यह कई बार इस्लामाबाद के आधिकारिक बयानों का हिस्सा रहा है। हालांकि पीएम शरीफ ने अपने समापन भाषण में राजनीतिक मतभेदों और विभाजनों पर सहयोग को प्राथमिकता देने की अपील की।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से जूझ रही है। भारी कर्जे में डूबे देश को बाहरी मदद की सख्त जरुरत है। इसलिए वो चाहता है कि उसकी इंटरनेशनल इमेज में सुधार हो जिससे वह विदेशी निवेश को आकर्षित कर सके। पाकिस्तानी अखबार द डॉन की मंगलवार की रिपोर्ट के मुताबिक व्यापारिक समुदाय ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई।हालांकि यह एक कम समय के लिए यात्रा नहीं होगी जैसा कि पहले सोचा गया था। जयशंकर भारत वापस जाने से पहले संभवतः पाकिस्तान में 24 घंटे से अधिक समय नहीं बिताएंगे।

लाहौर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एलसीसीआई) के अध्यक्ष मियां अबुजर शाद ने सोमवार को एक बयान में कहा, “यह आयोजन पाकिस्तान को प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भागीदारों, विशेष रूप से चीन के साथ अपने व्यापार और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। शिखर सम्मेलन वैश्विक निवेशकों को देश के व्यापार और निवेश के अवसरों के प्रति खुलेपन के बारे में एक स्पष्ट संदेश भी भेजेगा।” प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बुधवार को इस्लामाबाद में 23वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए क्षेत्र की कनेक्टिविटी की सामूहिक क्षमता में निवेश करने का आह्वान किया। पाकिस्तान विदेश नीति के मोर्च पर भी जूझ रहा है। उसके संबंध इस समय अफगानिस्तान के साथ बेहद तनावपूर्ण है। कभी तालिबान को पूरा समर्थन देने वाला पाकिस्तान अब उस पर आतंकवादियों को पालने का आरोप लगा रहा है।

इस्लामाबाद लगातार कहता रहा है तालिबान सरकार अपनी जमीन पर टीटीपी जैसे आतंकी संगठनों को पनाह दे रही है जो पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। दूसरी तरफ काबुल इन आरोपों को खारिज करता रहा है। ईरान के साथ भी पाकिस्तान के सबंधों में पिछले दिनों दरार देखी गई। दोनों देशों के बीच सैनिक झड़पें भी हुईं। ऐसे में पाकिस्तान अब नहीं चाहता है कि उसकी छवि अस्थिर विदेश संबंधों वाली देश की बने।

एससीओ में चीन, भारत, रूस, पाकिस्तान, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और बेलारूस शामिल हैं – और 16 अन्य देश पर्यवेक्षक या “वार्ता साझेदार” के रूप में इससे जुड़े हैं। पाकिस्तान कजाकिस्तान में 2017 में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन में इसका पूर्ण सदस्य बन था। एससीओ बैठक ने पाकिस्तान को वो मौका दिया जिसे वह लंबे समय से खोज रहा था। अब उसे इंतजार रहेगा कि अगले इंटरनेशनल इवेंट की मेजबानी की।

बता दे कि उम्मीद है कि मंत्री बुधवार को मुख्य शिखर सम्मेलन से पहले भारतीय विदेश मंत्री डिनर में शामिल होंगे। जयशंकर मेजबान देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अपने समकक्ष इसहाक डार के साथ दिखाई देंगे। हालांकि यह एक कम समय के लिए यात्रा नहीं होगी जैसा कि पहले सोचा गया था। जयशंकर भारत वापस जाने से पहले संभवतः पाकिस्तान में 24 घंटे से अधिक समय नहीं बिताएंगे।

जयशंकर 15-16 अक्टूबर को पाकिस्तान में होंगे। यह पिछले एक दशक में किसी भी भारतीय विदेश मंत्री की पहली पाकिस्तान यात्रा होगी। हालांकि, भारत द्वारा उनकी पाकिस्तान यात्रा की पुष्टि करने के एक दिन बाद, जयशंकर ने कहा कि वह पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों पर चर्चा करने के लिए इस्लामाबाद नहीं जा रहे हैं, बल्कि एससीओ का ‘अच्छा सदस्य’ बनने के लिए जा रहे हैं। कश्मीर मुद्दा भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव की वजह रहा है और यह कई बार इस्लामाबाद के आधिकारिक बयानों का हिस्सा रहा है। हालांकि पीएम शरीफ ने अपने समापन भाषण में राजनीतिक मतभेदों और विभाजनों पर सहयोग को प्राथमिकता देने की अपील की।एससीओ में रूस, चीन, ईरान और 4 मध्य एशियाई देशों के अलावा भारत और पाकिस्तान भी सदस्य हैं।

 

करवा चौथ 2024 फैशन सेंस, क्या पहनें, करवा चौथ पर बॉलीवुड सितारे, देखें उनके लुक

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बॉलीवुड का करबा चौथ सेलिब्रेशन हमेशा से अलग रहा है। हर साल कोई न कोई बॉलीवुड दुल्हन ऐसी होती है जो पहली बार कोरबा चौथ मना रही होती है। ऐसी और भी हीरोइनें हैं जिनके आउटफिट्स को देखने के लिए पूरा देश उत्सुक रहता है। इस बार उन्होंने निराश नहीं किया.
पूर्णिमा के बाद चतुर्थी का चंद्रमा. करबा चौथ पर भारतीय महिलाएं चांद देखकर और फिर अपने पति का चेहरा देखकर अपना व्रत खोलती हैं। किसी प्रियजन के लिए सजने-संवरने, पूरे दिन पानी न छूने के दिन का आध्यात्मिक महत्व जो भी हो, इस युग की महिलाएं इसे अपने प्रियजनों के लिए प्यार के संकेत के रूप में भी देखती हैं। जाति और धर्म के बावजूद, करबा चौथ इन दिनों कई लोगों द्वारा मनाया जाता है। त्योहार-प्रेमी बंगाली भी इन दिनों पीछे नहीं हैं। लेकिन बॉलीवुड का करबा चौथ सेलिब्रेशन हमेशा से अलग रहा है। हर साल बॉलीवुड में कोई न कोई ऐसी दुल्हन होती है जो पहली बार कोरबा चौथ मना रही होती है। ऐसी और भी हीरोइनें हैं जिनके आउटफिट्स को देखने के लिए पूरा देश उत्सुक रहता है। इस बार उन्होंने निराश नहीं किया. इस बार भी बॉलीवुड हीरोइनों के आउटफिट्स में एक सरप्राइज था। आपने कैसे कपड़े पहने?

करबा चौथ के मौके पर सोनम कपूर ने हाथ की मेहंदी से पति और बेटे का नाम लिखा। उस तैयारी की तस्वीर पहले देखी गई थी. कोरबा चौथ की रात सोनम नजर आईं. उनकी तस्वीर देखकर फैंस कह रहे हैं कि सोनम ने चतुर्थी के दिन पूरा चांद देख लिया है. करबा चौथ पर सिन्दूर-लाल रंग की साड़ी या पोशाक पहनने का अधिक चलन है। सोनम ने जानबूझकर वह रंग नहीं चुना क्योंकि वह शायद भीड़ से अलग दिखेंगी। इसकी जगह उन्होंने मेहंदी ग्रीन कलर का टिश्यू ऑर्गेनजर जैकेट लहंगा पहना था। इस पर हल्का मीनाकारी लेस वर्क है। सोनम ने कानों और हाथों पर पोल्की ज्वैलरी पहनी हुई थी। लेकिन उनके आउटफिट का मुख्य आकर्षण टिप था। वह नोक उसने अपने गले में पहनी हुई थी। टिप्स की संख्या एक नहीं बल्कि 9 है. प्रत्येक सिरा पूर्णिमा से अमावस्या तक चंद्रमा के एक आकार का प्रतीक है।

सोनाक्षी सिंह ने एक्टर जहीर इकबाल से लंबे लव अफेयर के बाद इसी साल शादी की है। शादी के बाद यह पहला करबा चौथ है. सोनाक्षी ने इंस्टाग्राम पर लिखा, ‘सौभाग्य से मुझे एक दूल्हा मिला जो मेरे साथ कोरबा चौथ का व्रत रखेगा।’ साथ में लाल नोक और सिन्दूर लगा हुआ मंगलसूत्र आभूषण के रूप में पहना हुआ है। और कुछ नहीं। कान की बाली भी नहीं. हालाँकि, सोनाक्षी के उस एक मंगलसूत्र की कीमत 13 लाख रुपये है। जिसे अंतरराष्ट्रीय ज्वेलरी ब्रांड बुगेरी ने बनाया है।

कैटरीना कैफ और विक्की कौशल ने परिवार के साथ मनाया करबा चौथ। उनके और विक्की के अलावा विक्की के माता-पिता भी वहां थे। कैटरीना ने पीच कलर की ऑर्गेना साड़ी पहनी थी. लाल मखमली स्लीवलेस ब्लाउज के साथ। हाथ में तीन चूड़ियाँ और कान में हल्का लटकता हुआ पेंडेंट आभूषण है। गला भले ही सूना हो लेकिन कैटरीना का सिन्दूर, लाल टीका, हल्की लिपस्टिक और खुले बाल आज भी फैंस पर फिदा हैं.

कृति खरबंदा कृति खरबंदा और पुलकित सम्राट का इस साल पहला करबा चौथ है। हालांकि, पहले साल में भी कृति ने लाल रंग नहीं पहना था। अभिनेत्री ने सुनहरे रंग की पीले रंग की ऑर्गेना साड़ी पहनी थी। साथ में गले में सोने का हार, कान में एक कुंदन का पेंडेंट और कुछ हरी कांच की चूड़ियों के साथ कुछ लाल और सफेद चूड़ियां। पुलकित हाथ में दो सोने की चूड़ियां पहने नजर आए. कृति ने लिखा, ‘बचपन से मैं अपनी मां को कोरबा चौथ मनाते हुए देखती थी और सोचती थी कि मैं ये सब कब करूंगी। आख़िरकार मेरी इच्छा पूरी हुई.

रकुल प्रीत सिंह
रकुल प्रीत सिंह और जैकी भगनानी ने कुछ महीने पहले ही शादी की है। हालांकि पहले करबा चौथ में रकुल थोड़ी बीमार हैं. आप कमर दर्द से परेशान हैं. उनकी कमर पर दर्द निवारक बेल्ट है। हालांकि, रकुल ने जैकी के लिए कपड़ों की कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने हाथों में चूड़ियाँ, लाल रंग पर सोने के धागे का काम के साथ अपने बालों को खुला रखा था।

मौनी रॉय
बॉलीवुड की बंगाली बेटी मौनी रॉय का आउटफिट सिंपल था. गोल्डन ब्लाउज के साथ गोल्डन बॉर्डर वाली लाल साड़ी। बालों को पीछे बांधे हुए मौनी ने कानों में सोने का झुमको पेंडेंट पहना हुआ था। उन्होंने हाथ में सोने का स्टोल और गले में सोने का चोकर पहना था।

प्रियंका चोपड़ा जोनास
प्रियंका चोपड़ा हर साल कोरबा चौथ मनाती हैं। चाहे वो भारत में हो या विदेश में. हालांकि इस बार वह भारत में हैं. लेकिन उनका करबा चौथ का पहनावा सबसे अलग था. साड़ी-लहंगा-चूड़ीदार नहीं, प्रियंका ने लाल नाइटगाउन में तोड़ी कसम. उनके हाथ में लाल चूड़ा था. झुमके बालों को वैसे ही लपेटा गया था जैसे लड़कियाँ घर पर बनाती हैं। कान के किनारे से कुछ बाल खुले हुए थे। माथे पर टीका न लगना, मस्तक पर था सिन्दूर। छत पर पति निक के सामने खड़ी प्रियंका ने छलनी के साथ-साथ सिर पर लाल रंग का घूंघट भी डाल रखा था. अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक्ट्रेस ने लिखा, ‘हां, मैं थोड़ी फिल्मी हूं।’

परिणीति चोपड़ा
परिणीति चोपड़ा ने कोरबा चौथ पति राघव चड्ढा के परिवार की महिलाओं के साथ मनाया। उन्होंने ब्राइट फूशिया कलर का शरारा सलवार सूट पहना था. आभूषण विशेष रूप से नहीं पहने जाते हैं। लेकिन सिन्दूर उसके माथे को छू गया.

अभी नहीं रुकेगी मदरसों को आर्थिक मदद, राष्ट्रीय बाल आयोग के प्रस्ताव पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने हाल ही में राज्यों से मदरसों को वित्तीय सहायता बंद करने की सिफारिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्ताव पर रोक लगा दी है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने हाल ही में राज्यों को मदरसों को वित्तीय सहायता देना बंद करने की सलाह दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस प्रस्ताव पर रोक लगा दी. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारें उस सलाह के आधार पर कोई कार्रवाई कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा सरकारों ने हाल ही में गैर-अनुमोदनित और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों के छात्रों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश देने का आदेश दिया है। दिशानिर्देश राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सिफारिशों के आधार पर जारी किए गए थे। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने दोनों राज्यों के लिए दिशानिर्देशों पर भी रोक लगा दी।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद नामक संगठन ने उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वादियों ने आरोप लगाया कि सरकारी दिशानिर्देश अल्पसंख्यकों के अपने शैक्षणिक संस्थान चलाने के अधिकार में कटौती कर रहे हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ के सामने आया। कोर्ट ने सोमवार को आयोग के प्रस्ताव और दोनों राज्यों की गाइडलाइन पर रोक लगा दी। इस बीच, यदि कोई अन्य राज्य इस संबंध में दिशानिर्देश जारी करता है, तो रोक प्रभावी रहेगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और हर राज्य सरकार से चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है. हाल ही में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने मदरसा संस्थानों पर एक रिपोर्ट तैयार की है। इसमें मदरसों की ‘ऐतिहासिक भूमिका’ और बच्चों के शिक्षा के अधिकार पर उनके प्रभाव का विवरण दिया गया है। लगभग 11 अध्यायों की रिपोर्ट में आयोग की मुख्य सिफारिश विभिन्न राज्यों में मदरसों को वित्तीय सहायता देना बंद करना और उन्हें बंद करना था। आयोग के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने बाल शिक्षा के महत्व पर टिप्पणी की, “शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई, 2009) का उद्देश्य समानता, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र स्थापित करना है। लेकिन फिर भी एक विपरीत तस्वीर सामने आती है. बच्चों के मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बीच टकराव है.”

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल एक बोर्ड और यूडीआईएसई कोड होने का मतलब यह नहीं है कि कोई मदरसा शिक्षा के अधिकार अधिनियम का पालन कर रहा है। कई घटनाओं और उदाहरणों का हवाला देते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मदरसों की मदद न करने को कहा गया है. इसके अलावा राष्ट्रीय आयोग ने सिफारिश की कि मुस्लिम समुदाय के बच्चों को मदरसों में दाखिला दिलाने के बजाय अन्य शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाया जाना चाहिए। उस सिफारिश के मद्देनजर ही उत्तर प्रदेश के अन्य सरकारी स्कूलों में मदरसा छात्रों को प्रवेश देने के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए थे।

करीब 29 साल पहले पुरशुरा के श्यामपुर पंचायत के बराडीग्रुई गांव में एक मदरसा बनाया गया था. पिछले लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले वहां की दीवार के निर्माण के लिए सांसद निधि से धन आवंटित किया गया था. लेकिन दीवार कहाँ! ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि तृणमूल द्वारा संचालित पंचायत द्वारा निविदाएं बुलाने के कारण अनियमितताओं के कारण काम रुका हुआ था। उस दीवार की उनकी मांग लंबे समय से चली आ रही है।

‘बर्दिग्रुई मदरसा सेंटर’ नामक उच्च प्राथमिक शिक्षा केंद्र के मुख्य शिक्षक शेख अबू कलाम ने शिकायत की, “मुझे पंचायत से पता चला है कि दीवार के निर्माण के लिए निविदा के निपटारे के बाद भी इसे रद्द कर दिया गया था।” कुछ शोर के लिए. मामला कई बार पंचायत प्रधान के पास लंबित है। दोबारा निविदाएं आमंत्रित नहीं की जातीं। इस बीच, स्कूल तेजी से बाहरी लोगों के लिए असामाजिक गतिविधियों और बकरी चराने का स्थान बनता जा रहा है।”

पंचायत प्रमुख राबिन माझी ने कहा, “पहले की निविदा प्रक्रिया में कुछ त्रुटियां थीं। वह टेंडर रद्द कर दिया गया है. नए सिरे से निविदाएं आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह काम करेगा।”

पंचायत सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव की घोषणा से डेढ़ महीने पहले मदरसे की दीवारों के निर्माण के लिए टेंडर बुलाए गए थे। उस ऑनलाइन टेंडर में केवल दो ठेकेदारों ने भाग लिया था. दूसरे ने बताया कि सबसे कम बोली लगाने वाले ठेकेदार के दस्तावेज़ किसी कारण से उस समय ऑनलाइन उपलब्ध नहीं थे। जिस पर आपत्ति जताते हुए सबसे कम बोली लगाने वाले ठेकेदार ने प्रशासन के विभिन्न हलकों में अपने दस्तावेज भेजकर संबंधित टेंडर को रद्द करने की मांग की. टेंडर रद्द कर दिया गया है.

दरअसल, अरक्षित शिक्षण केंद्र में गाय-बकरियां चरती हैं। मदरसा परिसर में लगे पौधे नष्ट हो रहे हैं. बकरियाँ भी कक्षा में प्रवेश कर रही हैं। बच्चों का खेल का मैदान गायों और बकरियों से भरा रहता है। स्कूल प्रशासन का आरोप है कि मदरसे की छुट्टी के बाद असामाजिक तत्व स्कूल के नल, लाइटें तोड़ रहे हैं. उस मदरसे में छात्रों की संख्या करीब 100 लोग है.

स्कूल प्रबंधन संघ और ग्रामीणों ने कहा कि पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा केंद्र को बचाने के लिए उन सभी ने समय-समय पर तत्कालीन सांसद (अपरूपा पोद्दार) से संपर्क किया। लोकसभा चुनाव की घोषणा से तीन महीने पहले दीवार के निर्माण के लिए धनराशि स्वीकृत की गई थी। योजना को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी प्रशासन द्वारा पंचायतों को सौंपी गई है।

दिल्ली धमाकों में नजर ‘जस्टिस लीग इंडिया’ प्रोफाइल, पर्दे के पीछे कौन है? पुलिस जानकारी लेने में जुटी है

दिल्ली में हुए धमाकों के बाद घटना का वीडियो ‘जस्टिस लीग इंडिया’ नाम के टेलीग्राम हैंडल से पोस्ट किया गया था. पुलिस उस प्रोफाइल के यूजर के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है. दिल्ली के रोहिणी में स्कूल के सामने हुए धमाके में अभी तक किसी आतंकी संगठन का नाम नहीं आया है. दिल्ली पुलिस के साथ-साथ एनएसजीओ भी जांच कर रही है. दिल्ली पुलिस मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर भी एक प्रोफाइल की जांच कर रही है। प्रोफ़ाइल का नाम ‘जस्टिस लीग इंडिया’ है। सूत्रों के मुताबिक, उस टेलीग्राम हैंडल से विस्फोट का सीसीटीवी फुटेज जारी किया गया था. दिल्ली पुलिस उस प्रोफाइल के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस संबंध में ‘टेलीग्राम’ की अथॉरिटी से भी संपर्क किया गया है. हालांकि, पुलिस को अब तक मैसेजिंग ऐप की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

यह धमाका रविवार सुबह दिल्ली के रोहिणी के सेक्टर 14 इलाके में एक स्कूल के पास हुआ। विस्फोट में स्कूल की दीवार क्षतिग्रस्त हो गयी. एक कार और आसपास की कुछ दुकानें भी क्षतिग्रस्त हो गईं। हालांकि, विस्फोट में कोई घायल नहीं हुआ. विस्फोट किस कारण से हुआ, इस पर दिल्ली पुलिस अभी भी स्पष्ट रूप से कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। हालाँकि, कई पुलिस सूत्रों का हवाला देते हुए, समाचार एजेंसी पीटीआई ने कहा कि यह संभवतः कम तीव्रता का आईईडी विस्फोट था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इस मामले की जांच कर रही है. पुलिस सूत्रों के मुताबिक सभी संभावित पहलुओं पर जांच की जा रही है. उस सूत्र के आधार पर पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि टेलीग्राम हैंडल के पीछे कौन है। उस टेलीग्राम हैंडल से धमाके के वक्त का एक वीडियो क्लिप पोस्ट किया गया था. खालिस्तान समर्थक नारे भी लिखे गए. दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि उपद्रवियों ने इस धमाके के जरिए प्रशासन को संदेश देने की कोशिश की है. संयोग से इस धमाके से पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट फैलाया गया था. इसमें कहा गया है कि भारत के ‘एजेंट’ खालिस्तान समर्थकों को निशाना बना रहे हैं। ये हमला बदला लेने के लिए है. इस पोस्ट को लेकर दिल्ली पुलिस ने जांच भी शुरू कर दी है.

जांचकर्ताओं का मानना ​​है कि दिल्ली के रोहिणी में सीआरपीएफ स्कूल के सामने हुआ विस्फोट एक ‘दिशात्मक विस्फोट’ था. दूसरे शब्दों में, इस मामले में इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति विस्फोट के प्रभाव को दूर तक फैलाना है। सूत्रों के मुताबिक, विस्फोटक इस तरह रखे गए थे कि 10 फीट दूर तक ‘शॉकवेव’ पैदा हो गई। परिणामस्वरूप, क्षति की मात्रा अधिक होगी। रोहिणी विस्फोट में विस्फोट के ‘परावर्तक दबाव’ के माध्यम से एक बड़े क्षेत्र में कंपन पैदा करने की तकनीक का उपयोग किया गया था।

जांच एजेंसी के एक सूत्र के मुताबिक, ऐसे मामलों में ठोस और तरल पदार्थों को गैस में बदलने के लिए उनके बीच उच्च दबाव बनाया जाता है। विस्फोट के बाद गैस तेजी से चार दिशाओं में फैल गई. और उसकी वजह से एक तेज़ कंपन महसूस होता है. जो आसपास के क्षेत्र में ध्वनि से भी तेज गति से यात्रा करता है। परिणामस्वरूप, क्षति की मात्रा बहुत अधिक है। और इसीलिए विस्फोट के तुरंत बाद कई घर और कारों की खिड़कियां टूट गईं। इसके अलावा सीआरपीएफ स्कूल की दीवारें भी टूट गईं। सूत्रों के मुताबिक विस्फोट की प्रकृति से जांचकर्ताओं को लगता है कि ‘दिशात्मक’ विस्फोट की योजना बनाई गई थी. घटना के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट मांगी है. दिल्ली पुलिस ने विस्फोटक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है. जल्द ही केस स्पेशल सेल को सौंप दिया जाएगा. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), सीआरपीएफ, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) और फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) पहले से ही विस्फोट की जांच कर रहे हैं। सूत्र के मुताबिक, विस्फोट की प्रकृति से जांचकर्ताओं को लगता है कि ‘दिशात्मक’ विस्फोट की योजना बनाई गई थी। घटना के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट मांगी है. दिल्ली पुलिस ने विस्फोटक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है. जल्द ही केस स्पेशल सेल को सौंप दिया जाएगा. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), सीआरपीएफ, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) और फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) पहले से ही विस्फोट की जांच कर रहे हैं।

यह विस्फोट रविवार सुबह करीब 7:30 बजे रोहिणी के प्रशांत विहार इलाके में स्कूल के सामने हुआ। स्कूल के आसपास सफेद धुआं छा गया। प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि विस्फोट के बाद इलाके में तेज गंध भर गई. सांस लेना मुश्किल हो गया था. हालाँकि, इस विस्फोट में आसपास की कुछ दुकानों की खिड़कियां, सड़क पर खड़ी कुछ कारें क्षतिग्रस्त हो गईं, लेकिन कोई घायल नहीं हुआ।

बार्सिलोना शीर्ष स्थान पर बरकरार, प्रीमियर लीग में लिवरपूल ने चेल्सी को हराया

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ला लीगा में बार्सिलोना ने बड़ी जीत हासिल की. रॉबर्ट लेनोडस्किस ने सेविला को 5-1 से हराया। दूसरी ओर, इंग्लिश प्रीमियर लीग मैच में मोहम्मद सलाह की लिवरपूल ने चेल्सी को 2-1 से हराया।

गावी लिगामेंट की चोट से उबरने के बाद 348 दिन बाद मैदान पर लौटे। 83वें मिनट में स्पेनिश मिडफील्डर ने मैदान में प्रवेश किया. टीम के साथी पेड्री ने उनका स्वागत किया और कप्तान को आर्मबैंड पहनाया। 20 वर्षीय पेड्रि ने पहली बार नए कोच हैंसी फ्लिक के तहत खेला। इससे पहले बार्सिलोना ने सेविला के खिलाफ 4-0 से जीत दर्ज की थी. लियोनिडस्की ने 24वें मिनट में पेनल्टी से पहला गोल किया. पेड्री ने 28वें मिनट में टीम के लिए दूसरा गोल किया. लियोनिडस्की ने 39वें मिनट में अपना दूसरा गोल कर बार्सिलोना को 3-0 की बढ़त दिला दी. पिछड़ने के बाद, सेविओर के फुटबॉलरों ने अंतर को कम करने के लिए अपना आक्रमण तेज कर दिया। रक्षा संगठन को बदलकर. बार्सा के फुटबॉल खिलाड़ी जवाबी खेल को धीमा करने की कोशिश करते हैं। हालांकि, 82वें मिनट में पाब्लो टूरे ने बार्सिलोना के लिए चौथा गोल किया। इसके बाद गेवी मैदान में उतरे. 87वें मिनट में जेवियर के स्टैनिस इडुम्बो ने अंतर कम कर दिया। 88वें मिनट में टोरे ने फिर गोल किया।

इस दिन की जीत के परिणामस्वरूप, बार्सिलोना ने 10 मैचों में 27 अंकों के साथ अंक सूची में शीर्ष स्थान बनाए रखा। दूसरे स्थान पर मौजूद रियल मैड्रिड के 10 मैचों में 24 अंक हैं। अगले मैच में दोनों टीमें भिड़ेंगी. दूसरी ओर, लिवरपूल ने इंग्लिश प्रीमियर लीग मैच में एनफील्ड में चेल्सी के खिलाफ महत्वपूर्ण जीत हासिल की। सलाह ने 29वें मिनट में पेनल्टी स्पॉट से गोल करके लिवरपूल को आगे कर दिया। पहले हाफ में कोई भी टीम गोल नहीं कर सकी. दूसरे हाफ की शुरुआत में 48वें मिनट में निकोलस जैक्सन ने चेल्सी के लिए बराबरी का गोल दागा। निःसंदेह, कुछ भी अच्छा नहीं हुआ। 3 मिनट बाद कर्टिस जोन्स ने लिवरपूल के लिए विजयी गोल किया।

फ्रांस के एंटोनी ग्रीज़मैन के बाद स्पेन के आंद्रे इनिएस्ता हैं। लगातार दो दिन दो विश्व कप विजेता फुटबॉलरों का संन्यास। हालाँकि, 40 वर्षीय मिडफील्डर अभी तक सेवानिवृत्त नहीं हुए हैं। वह 8 अक्टूबर को आखिरी बार क्लब के लिए खेलेंगे। इनिएस्ता ने करीबी लोगों को संन्यास लेने के अपने फैसले की घोषणा की।

इनिएस्ता को सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ मिडफील्डरों में से एक माना जाता है। उन्होंने अकेले दम पर स्पेन और बार्सिलोना के लिए कई मैचों का रंग बदल दिया. वह 1996 में बार्सिलोना की युवा टीम में शामिल हुए। तब से लेकर 2018 तक वह लाल-नीली जर्सी में खेले। 2018 में जापानी क्लब विसेल कोबे में शामिल हुए। पांच साल तक जापान में खेलने के बाद, वह 2023 में संयुक्त अरब अमीरात के क्लब अमीरात में शामिल हो गए। नोउ कैंप छोड़ने से पहले बार्सिलोना के लिए विभिन्न चरणों में कुल 674 मैच। बार्सिलोना के लिए नौ बार ला लीगा और चार बार चैंपियंस लीग जीती।

उन्होंने स्पेन में अंडर-15 से लेकर अंडर-21 तक सभी आयु समूहों के लिए खेला है। उन्होंने स्पेन की सीनियर राष्ट्रीय टीम के लिए 131 मैच खेले हैं। वह 2008 यूरो कप और 2010 विश्व कप विजेता टीम के प्रमुख सदस्य थे। क्लब फ़ुटबॉल में ऐसा कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है जिसमें लियोनेल मेस्सी, ज़ावी अलोंसो, जेरार्ड पिक, लुइस सुआरेज़ के पूर्व साथी शामिल न हों। चाहे क्लब फुटबॉल हो या अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल, इनिएस्ता ने हर जगह खुद को समान कौशल से साबित किया है। जब वह मैदान पर होते हैं तो स्ट्राइकरों को गेंद मिलना निश्चित है। वह प्रतिद्वंद्वी के रक्षकों के बीच अंतर ढूंढ सकता है और गेंद को सही लक्ष्य तक पहुंचा सकता है। वह विश्व फुटबॉल के उन जादूगरों में से एक हैं जो अपने साथियों के साथ गोल करने के साथ-साथ खुद भी गोल करने में सक्षम हैं। उनका संन्यास लेने का निर्णय निस्संदेह एक युग का अंत है। इनिएस्ता ने 2018 में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास ले लिया। फ़ुटबॉल प्रेमी उन्हें क्लब फ़ुटबॉल में खेलते हुए देख सकते थे। इस बार मौका नहीं मिलेगा. मेसी ने कई दिनों तक अपने पास पर गोल नहीं किया. स्कोर मत करो और कोई भी स्कोर नहीं करेगा।

बार्सिलोना ला लीगा मैच हार गया. हांसी फ्लिक की टीम लगातार सात मैचों की जीत के बाद शनिवार को ओसासुना से 2-4 से हार गई। वहीं, जर्मन कोच ने कोई मिसाल कायम नहीं की.

गेरार्डो मार्टिनो ने बार्सिलोना के कोच के रूप में ला लीगा में अपने पहले आठ गेम जीते। अगर ओसासुना को हरा दिया गया होता तो मार्टिनो की तरह फ्लिक भी पहले आठ मैच जीत लेते। पर वह नहीं हुआ। फ्लिक ने टीम के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक लैमिन यमल को बाहर के मैच के लिए शुरुआती एकादश में शामिल नहीं किया। नमनानी राफिनिया भी. उनके अलावा खेल की शुरुआत से ही गेंद पर कब्ज़ा बार्सिलोना के फ़ुटबॉल खिलाड़ियों के क़दमों में था. लेकिन वे इस मौके का फायदा नहीं उठा सके. इसके बजाय विरोधी टीम के फुटबॉल खिलाड़ियों ने मौके का फायदा उठाया और जीत छीन ली. एंटे बुदिमीर ने इसी मिनट में उनके लिए पहला गोल किया। 28वें मिनट में ब्रायन ज़रागोज़ा के गोल से बार्सा 0-2 से पिछड़ गया. इसी के साथ खेल का पहला भाग समाप्त हुआ।

पिछड़ रहे बार्सिलोना ने बराबरी की कोशिश में दूसरे हाफ में अपना आक्रमण तेज कर दिया। उन्हें परिणाम भी मिलते हैं. विक्टर पाओ ने 53वें मिनट में गोल कर अंतर कम कर दिया. लेकिन 72वें मिनट में बुदिमीर ने पेनल्टी स्पॉट से अपना दूसरा गोल कर ओसासुना को 3-1 की बढ़त दिला दी. उससे बार्सिलोना की हार पक्की हो गई है. 85वें मिनट में एबेल ब्रेटन्स ने टीम के लिए चौथा गोल कर जीत पक्की कर दी. 89वें मिनट में यमल स्थानापन्न के रूप में बार्सा के अंतर को कम करने के लिए आये।

आखिर कैसी है राजस्थान की सांगानेर जेल?

आज हम आपको राजस्थान की सांगानेर जेल के बारे में जानकारी देने वाले हैं! कुछ ही दिनों पहले सांगानेर में खुली जेल की जमीन लेने की कोशिश पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई। सांगानेर जेल को एक मॉडल जेल के तौर पर भी देखा जाता है। सांगानेर एक खुली जेल है। एक ऐसी जगह जहां कैदी दूसरे पारंपरिक जेलों की दीवारों से परे एक नई शुरुआत कर सकते हैं। यहां कैदियों को काम करने, अपनी कमाई से गुजारा करने और अपने परिवार के साथ रहने की आजादी होती है। यह एक ऐसा मॉडल है जो कैदियों को सुधारने और उन्हें समाज में फिर से शामिल करने में मदद करता है।एक ऐसे ही कैदी हैं जिन्होंने सांगानेर में एक नई जिंदगी पाई। दस साल तक एक पारंपरिक जेल में रहने के बाद, उन्हें लगा था कि उनकी जिंदगी खत्म हो गई है। लेकिन सांगानेर में उन्हें एक नया मौका मिला। उन्होंने काम किया, अपने परिवार के साथ समय बिताया और एक नए सिरे से जीना शुरू किया। सांगानेर में, न तो लोहे की सलाखें हैं और न ही ताले, और व्यवस्था विश्वास पर आधारित है।

इस कैदी का कहना है कि हम अपने परिवारों के साथ रह सकते थे, दिन में बाहर जा सकते थे और अपनी मजदूरी का इस्तेमाल अपने लिए कर सकते थे। यह बहुत बड़ा बदलाव था। 38 वर्षीय यह व्यक्ति अब चार महीने से मुक्त है, लेकिन उसका कहना है कि खुली जेलों में बिताए चार सालों ने उसे वास्तविक दुनिया में ढलने में मदद की। मुझे अपने परिवार का समर्थन और जयपुर में हमारा व्यवसाय मिला,मेरे जीवन का यह बड़ा बदलाव था।

सांगानेर का यह मॉडल कई दूसरे राज्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। हालांकि, हाल ही में इस मॉडल को खतरा पैदा हो गया। जयपुर विकास प्राधिकरण ने जेल की जमीन का एक हिस्सा एक अस्पताल को देने का प्रस्ताव रखा है। अगर ऐसा होता है, तो सांगानेर मॉडल को बहुत नुकसान पहुंच सकता है। कई विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का विरोध किया है। उनका मानना है कि सांगानेर मॉडल कैदियों के सुधार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसे बचाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है और जमीन आवंटन आदेश पर रोक लगा दी है।

TISS के सेंटर फॉर क्रिमिनोलॉजी एंड जस्टिस के प्रोफेसर विजय राघवन कहते हैं कि फरलो और पैरोल की तरह, जो दोषियों को एक तरीके से स्वतंत्रता का अनुभव करने की अनुमति देते हैं, खुली जेलें प्रशासन के पास एक सुधारात्मक उपकरण हैं। भूमि उपयोग को प्रतिबंधित करना एक बहुत ही गलत संदेश भेजता है क्योंकि सांगानेर को लंबे समय से अन्य राज्यों में दोहराने के लिए एक मॉडल के रूप में रखा गया है।

सांगानेर खुली जेल यह दिखाती है कि जेल सिर्फ सजा देने की जगह नहीं होनी चाहिए, बल्कि कैदियों को सुधारने और उन्हें समाज में वापस लाने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। यह एक ऐसा मॉडल है जिसे बचाना चाहिए और देश के अन्य हिस्सों में भी लागू करना चाहिए। जयपुर से लगभग 25 किमी दूरी पर सांगानेर जेल स्थित है और इसमें लगभग 450 कैदी रहते हैं। 1963 में जब इसे विकसित किया गया तब बगल में बंजर भूमि थी जहां कैदी रहते थे। इन वर्षों में, कैदियों ने आवास, एक स्कूल, खेल का मैदान और आंगनवाड़ी केंद्र का निर्माण किया है।

इन सुविधाओं का उपयोग न केवल कैदियों के परिवारों द्वारा बल्कि आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी करते हैं। खुली जेल से जुड़े एक सूत्र का कहना है, खेल के मैदान का उपयोग खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों जैसे कि त्योहारों के मौसम में रामलीला और वॉलीबॉल और क्रिकेट मैचों की मेजबानी के लिए किया जाता है, जो पूरे क्षेत्र के प्रतिभागियों को आकर्षित करते हैं। स्कूल और आंगनवाड़ी में क्षेत्र के बच्चे जाते हैं। औद्योगिक क्षेत्र के निकट होने का मतलब है कि दोषियों को कारखानों में काम मिल जाता है और महिलाओं को घरेलू कामगारों के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। कुछ ऐसे भी हैं जो रिक्शा चलाते हैं या समुदाय द्वारा उपयोग की जाने वाली छोटी किराने की दुकानें चलाते हैं।

मॉडल की सफलता का प्रमाण अब खुली जेलों की संख्या है। 2018 में, जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को जेलों में भीड़भाड़ की समस्या को दूर करने के लिए हर जिले में खुली जेलें शुरू करने का निर्देश दिया था, तब 60 खुली जेलें थीं। अब यह संख्या बढ़कर 152 हो गई है। अकेले राजस्थान में खुली जेलों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा होकर 22 से बढ़कर 52 हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन लोकुर, जिन्होंने सांगानेर जेल का दौरा किया है और कैदियों से बातचीत की है, कहते हैं, कि मैंने पाया कि किसी के भी भागने की कोई घटना नहीं हुई, जिससे पता चलता है कि सांगानेर जो कर रहा था उसमें दम था। जेल से एक उपयोगी नागरिक के रूप में परिवर्तन खुली जेल को एक महत्वपूर्ण उपाय बनाता है। जो चीज अच्छा काम कर रही है उसे नष्ट करना सही नहीं है।