Thursday, March 19, 2026
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क्या भारत और कनाडा के बीच की दूरियां बढ़ती जा रही है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत और कनाडा के बीच की दूरियां बढ़ती जा रही है या नहीं! कनाडा और भारत के बीच एक बार फिर से तनाव बढ़ गया है। कनाडा सरकार ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की जांच में भारत के उच्चायुक्त के शामिल होने का आरोप लगाया। भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का राजनीतिक एजेंडा बताया है। इसी के साथ भारत ने कनाडा से अपने उच्चायुक्त को वापस बुलाने का फैसला किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि उन्हें कनाडा सरकार पर सुरक्षा को लेकर भरोसा नहीं है। भारत और कनाडा के बीच खराब रिश्तों का एक लंबा इतिहास रहा है। खालिस्तानी कट्टरपंथी हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड में कनाडा ने पिछले साल भारत पर आरोप लगाए थे। लेकिन कनाडा इस केस में कोई सबूत पेश नहीं कर पाया। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हो गया। वहीं अब एक बार फिर से कनाडा ने बेबुनियादी आरोप लगाया है। कनाडा ने आरोप लगाया कि भारतीय उच्चायुक्त और अन्य राजनयिक निज्जर हत्याकांड की जांच से संबंधित मामले में ‘पर्सन ऑफ इंटरेस्ट’ हैं। विदेश मंत्रालय ने कनाडा के इन आरोपों को निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया।

भारत और कनाडा के बीच तनावपूर्ण संबंधों का इतिहास मौजूदा घटनाओं से कहीं आगे तक फैला हुआ है। खासतौर पर ट्रूडो के पिता, पियरे इलियट ट्रूडो, को कनाडा के पंद्रहवें प्रधान मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान भारत के साथ संबंधों को संभालने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा था। यह ऐतिहासिक तनाव 1974 में भारत के परमाणु परीक्षणों के दौरान स्पष्ट हो गया जब कनाडा के विदेश नीति एक्सपर्ट्स ने अपना आक्रोश व्यक्त किया। उन्हें संदेह था कि इन परीक्षणों के लिए कनाडाई-डिजाइन वाले CIRUS रिएक्टर का उपयोग किया गया था, जो कनाडा की पिछली धारणा को चुनौती देता था कि भारत ने कनाडा के साथ परमाणु हथियारों के विकास के विरोध किया था।

इसके बाद पोखरण परमाणु परीक्षणों ने दोनों देशों के रिश्तों को और खराब कर दिया। घरेलू और बाहरी कारकों के मिश्रण से प्रेरित, जिसमें चीन से सुरक्षा खतरे शामिल हैं, इन परीक्षणों ने कनाडा और पश्चिमी दुनिया के अधिकांश देशों के साथ भारत के संबंध में खटास डाली। कनाडाई नीति निर्माताओं ने पोखरण की घटना को विश्वासघात के रूप में देखा, इस चिंता के साथ कि भारत की परमाणु क्षमता गैर-परमाणु राज्यों द्वारा इसी तरह की खोजों को प्रेरित करेगी। तत्कालीन विदेश मंत्री मिशेल शार्प ने यह कहते हुए निराशा व्यक्त की कि ‘दोनों देशों के बीच विश्वास खत्म हो गया है।’

इसके अलावा, खालिस्तानी चरमपंथियों के खिलाफ पियरे ट्रूडो के प्रशासन की निष्क्रियता ने भारत-कनाडा संबंधों को काफी नुकसान पहुंचाया। 1980 के दशक में, पंजाब के कई आतंकवादी भारत में ऐक्शन के बाद कनाडा में शरण लेने के लिए भाग गए। खालिस्तानी समूह बब्बर खालसा के सदस्य तलविंदर सिंह परमार 1981 में पंजाब में दो पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद कनाडा भाग गए थे। भारत ने परमार के प्रत्यर्पण का अनुरोध किया, लेकिन पियरे ट्रूडो प्रशासन ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। यहां तक कि भारतीय खुफिया एजेंसियों की चेतावनियों पर भी ध्यान नहीं दिया गया।

23 जून 1985 को एयर इंडिया फ्लाइट 182 (कनिष्क) में विस्फोट के बाद रिश्ते और ज्यादा खराब हो गए। इस फ्लाइट में सामान में छिपाए गए एक बम ने विमान में सवार सभी 329 लोगों की जान ले ली, जिनमें से अधिकांश कनाडाई थे। परमार को इस हमले के पीछे का मास्टरमाइंड बताया गया था। अपनी संलिप्तता के बावजूद, उस पर मुकदमा नहीं चलाया गया और बम विस्फोट के संबंध में केवल एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था। हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड में कनाडा ने पिछले साल भारत पर आरोप लगाए थे। लेकिन कनाडा इस केस में कोई सबूत पेश नहीं कर पाया। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हो गया। वहीं अब एक बार फिर से कनाडा ने बेबुनियादी आरोप लगाया है।रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि जून 2023 में कनाडा के आसपास परमार का सम्मान करते हुए पोस्टर देखे गए, जिससे संबंधों में और तनाव आ गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पहले पियरे ट्रूडो के साथ खालिस्तानी ताकतों के खिलाफ कनाडा सरकार की कार्रवाई की कमी के बारे में चिंता व्यक्त की थी, जो रिश्ते में गहरी जड़ें जमाए हुए मुद्दों पर जोर देती हैं।

 

देश में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के बारे में क्या बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत?

हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने देश में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के बारे में बयान दिया है! आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव के अपने भाषण में कई मुद्दों पर चर्चा की। संघ प्रमुख ने देश के सामने चुनौतियों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि डीप स्टेट, वोकिजम और कल्चरल कल्चरल मार्क्सिस्ट आजकल काफी चर्चा में है। ये सभी सांस्कृतिक परम्पराओं के घोषित शत्रु हैं। इसके अलावा भागवत ने बांग्लादेश में हुए हिंदुओं पर अत्याचार का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि दुर्बल रहना अपराध है, इसलिए हिंदुओं को एकजुट होने की जरूरत है। आरएसएस प्रमुख ने कहा, ”डीप स्टेट’, ‘वोकिज़म’, ‘कल्चरल मार्क्सिस्ट’, आजकल चर्चा में हैं। वास्तव में ये सभी सांस्कृतिक परम्पराओं के घोषित शत्रु हैं। सांस्कृतिक मूल्यों, परम्पराओं तथा जहां जहां जो भी भद्र, मंगल माना जाता है, उसका समूल उच्छेद इस समूह की कार्यप्रणाली का अंग है। समाज मन बनाने वाले तंत्र व संस्थानों को अपने प्रभाव में लाना, उनके द्वारा समाज का विचार, संस्कार, और आस्था को नष्ट करना, यह इस कार्यप्रणाली का प्रथम चरण होता है।

उन्होंने आगे कहा, असंतोष को हवा देकर उस घटक को शेष समाज से अलग, व्यवस्था के विरुद्ध, उग्र बनाया जाता है। समाज में टकराव की सम्भावनाओं को (fault lines) ढूंढ कर प्रत्यक्ष टकराव खड़े किए जाते हैं। व्यवस्था, कानून, शासन, प्रशासन आदि के प्रति अश्रद्धा व द्वेष को उग्र बना कर अराजकता व भय का वातावरण खड़ा किया जाता है। इससे उस देश पर अपना वर्चस्व स्थापित करना सरल हो जाता है। मोहन भागवत ने बांग्लादेश में हुए हिंदुओं पर अत्याचार को लेकर कहा, अभी अभी बांग्लादेश में जो हिंसक तख्तापलट हुआ उसके तात्कालिक व स्थानीय कारण उस घटनाक्रम का एक पहलू है । परन्तु तद्देशीय हिंदु समाज पर अकारण नृशंस अत्याचारों की परंपरा‌ को फिर से दोहराया गया । उन अत्याचारों के विरोध में वहां का हिंदु समाज इस बार संगठित होकर स्वयं के बचाव में घर के बाहर आया इसलिए थोड़ा बचाव हुआ । परन्तु यह अत्याचारी कट्टरपंथी स्वभाव जब तक वहां विद्यमान है तब तक वहां के हिंदुओं सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के सिर पर खतरे की तलवार लटकी रहेगी ।

उन्होंने आगे कहा, इसीलिए उस देश से भारत में होनेवाली अवैध घुसपैठ व उसके कारण उत्पन्न जनसंख्या असंतुलन देश में सामान्य जनों में भी गंभीर चिंता का विषय बना है । देश में आपसी सद्भाव व देश की सुरक्षा पर भी इस अवैध घुसपैठ के कारण प्रश्न चिन्ह लगते है । उदारता, मानवता, तथा सद्भावना के पक्षधर सभी के, विशेष कर भारत सरकार तथा विश्वभर के हिंदुओं के सहायता की बांग्लादेश में अल्पसंख्यक बने हिंदु समाज को आवश्यकता रहेगी । असंगठित रहना व दुर्बल रहना यह दुष्टों के द्वारा अत्याचारों को निमंत्रण देना है यह पाठ भी विश्व भर के हिंदु समाज को ग्रहण करना चाहिए । परन्तु बात यहां रुकती नहीं ।

अब वहां (बांग्लादेश में) भारत से बचने के लिए पाकिस्तान से मिलने की बात हो रही है । ऐसे विमर्श खड़े कर व स्थापित कर कौनसे देश भारत पर दबाव बनाना चाहते हैं इसको बताने की आवश्यकता नहीं है । इसके उपाय यह शासन का विषय है । परंतु समाज के लिए सर्वाधिक चिन्ता की बात यह है कि समाज में विद्यमान भद्रता व संस्कार को नष्ट-भ्रष्ट करने के, विविधता को अलगाव में बदलने के, समस्याओं से पीड़ित समूहों में व्यवस्था के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करने के तथा असन्तोष को अराजकता में रूपांतरित करने के प्रयास बढ़े हैं!

भागवत ने आगे कहा, देश में विनाकारण कट्टरपन को उकसाने वाली घटनाओं में भी अचानक वृद्धि हुई दिख रही है । परिस्थिति या नीतियों को लेकर मन में असंतुष्टि हो सकती है परन्तु उसको व्यक्त करने के और उनका विरोध करने के प्रजातांत्रिक मार्ग होते हैं । उनका अवलंबन न करते हुए हिंसा पर उतर आना, समाज के एकाध विशिष्ट वर्ग पर आक्रमण करना, विना कारण हिंसा पर उतारू होना, भय पैदा करने का प्रयास करना, यह तो गुंडागर्दी है । इसको उकसाने के प्रयास होते हैं अथवा योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है ऐसे आचरण को पूज्य डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर जी ने अराजकता का व्याकरण कहा है । समाज मन बनाने वाले तंत्र व संस्थानों को अपने प्रभाव में लाना, उनके द्वारा समाज का विचार, संस्कार, और आस्था को नष्ट करना, यह इस कार्यप्रणाली का प्रथम चरण होता है।अभी बीत गए गणेशोत्सवों के समय श्रीगणपति विसर्जन की शोभायात्राओं पर अकारण पथराव की तथा तदुपरान्त बनी तनावपूर्ण परिस्थिति की घटनाएं उसी व्याकरण का उदाहरण है।

 

क्या बांग्लादेश जैसा हाल भारत में भी हो सकता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बांग्लादेश जैसा हाल भारत में भी हो सकता है या नहीं! संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपनी विजया दशमी स्पीच में बांग्लादेश का उदाहरण देकर भारत के लोगों को सचेत किया। उन्होंने कहा कि भारत के खिलाफ ‘मंत्र विप्लव’ हो रहा है। उन्होंने कहा कि समाज की विविधताओं को अलगाव में बदलकर टकराव की स्थिति पैदा करना, सत्ता, प्रशासन, कानून, संस्था सबके प्रति अनादर का व्यवहार सिखाना… इससे उस देश पर बाहर से वर्चस्व चलाना आसान हो जाता है और इसे मंत्र विप्लव कहते हैं। उन्होंने अपील की कि इसे लेकर सचेत रहें। भागवत ने कहा कि हमारे पड़ोस बांग्लादेश में जो हुआ उसके तात्कालिक कारण हैं लेकिन इतना बड़ा उत्पात उससे ही नहीं होता। उत्पात के कारण वहां के हिंदू समाज पर अत्याचार को दोहराया गया। उन्होंने कहा कि संस्कारों का क्षरण ना हो इसलिए कानून- संविधान की मर्यादा में रहते हुए योजना बनानी पड़ेगी। समाज को सुरक्षित रखने के लिए इसी का उपयोग होगा। संस्कारों का क्षरण इन विभेदकारी ताकतों को बलवान बनाता है।पहली बार हिंदू समाज संगठित होकर अपने बचाव में आया इसलिए कुछ बचाव हो गया। लेकिन कहीं कोई गड़बड़ हो दुर्बलों पर अपना गुस्सा निकालने की कट्टरपंथी प्रवृति है, ये प्रवृति जबतक वहां हैं तब तक वहां के सभी अल्पसंख्यकों के सर पर खतरे की तलवार लटकी रहेगी। उन्हें मदद की जरूरत है। विश्वभर के हिंदुओं की और भारत सरकार की मदद उन्हें मिले यह जरूरी है। संघ प्रमुख ने कहा कि हम अगर दुर्बल हैं तो अत्याचार को निमंत्रण दे रहे हैं। सशक्त रहना है, संगठित रहना है, हिंसा नहीं करनी पर सशक्त रहना है।

मोहन भागवत ने कहा कि बांग्लादेश में यह चर्चा चलती है कि भारत से हमको खतरा है इसलिए पाकिस्तान को साथ लेना चाहिए। दोनों मिलकर भारत को रोक सकते हैं। जिस बांग्लादेश के बनने में भारत ने सहायता की, भारत ने कभी कोई बैर नहीं रखा, वहां ये चर्चाएं कौन करा रहा है। ऐसे नेरेशन वहां चलें, ये किन किन देशों के हित की बात है, ये सब समझते हैं। हमारे देश में भी ऐसा हो ये कुछ लोगों की इच्छा है। डीप स्टेट, वोकेइजम, कल्चरल मार्कशिजम, ये हमारे यहां बहुत पहले से हैं। इसके लिए सबसे पहले संस्थाओं को कब्जे में लेने की कोशिश होती है।

भागवत ने कहा क शिक्षा संस्थान, बौद्धिक जगत में कब्जा कर विचारों में विकृति पैदा करने की कोशिश करते हैं। ऐसा माहौल बनाते है कि हम ही अपनी परंपरा को तुच्छ समझें। उन्होंने कहा कि समाज की विविधताओं को अलगाव में बदलने की कोशिश करना, लोगों में टकराव की स्थिति पैदा करना, सत्ता, प्रशासन, कानून, संस्था सबके प्रति अनादर का व्यवहार सिखाना… इससे उस देश पर बाहर से वर्चस्व चलाना आसान है। इसे मंत्र विप्लव कहते हैं। ऐसी भ्रम की स्थिति में उन्हें (देश विरोधी ताकतों को) देश के अंदर भी जाने अनजाने साथी मिल जाते हैं। उन्होंने कहा कि बॉर्डर एरिया में इसकी वजह से क्या हो रहा है हम देख सकते हैँ। हमें सतर्क रहकर इन्हें रोकना पड़ेगा। भागवत ने कहा कि भारत आगे बढ़ रहा है लेकिन भारत आगे ना बढ़े ऐसा चाहने वाली शक्तियां भी हैं।

उन्होंने कहा कि संस्कारों का क्षरण ना हो इसलिए कानून- संविधान की मर्यादा में रहते हुए योजना बनानी पड़ेगी। समाज को सुरक्षित रखने के लिए इसी का उपयोग होगा। संस्कारों का क्षरण इन विभेदकारी ताकतों को बलवान बनाता है। बच्चों के हाथ में भी मोबाइल है। वह क्या देख रहे हैं, क्या दिखाया जा रहा है उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। घर परिवारों में यह नियंत्रण स्थापित करना और कानून भी बनाना इसकी जरूरत है। क्योंकि संस्कार भ्रष्ट होने पर कई तरह के कुपरिणाम होते हैं। बता दें कि बांग्लादेश में जो हुआ उसके तात्कालिक कारण हैं लेकिन इतना बड़ा उत्पात उससे ही नहीं होता। उत्पात के कारण वहां के हिंदू समाज पर अत्याचार को दोहराया गया। पहली बार हिंदू समाज संगठित होकर अपने बचाव में आया इसलिए कुछ बचाव हो गया। लेकिन कहीं कोई गड़बड़ हो दुर्बलों पर अपना गुस्सा निकालने की कट्टरपंथी प्रवृति है, ये प्रवृति जबतक वहां हैं तब तक वहां के सभी अल्पसंख्यकों के सर पर खतरे की तलवार लटकी रहेगी। कई जगह नई पीढ़ी नशीली दवाओं से खोखली होती जा रही है। संघ प्रमुख ने जम्मू-कश्मीर में हुए शांतिपूर्ण चुनाव का भी जिक्र किया। साथ ही कहा कि दुनिया में भारत की साख बढ़ी है।

 

क्या दलित मतदाताओं ने राहुल गांधी से मोह तोड़ लिया है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दलित मतदाताओं ने वर्तमान में राहुल गांधी से मुंह तोड़ लिया है या नहीं! कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी फिर वहीं पहुंच गए जहां वो 2014 के बाद से ही ठोस रूप से जमे हुए हैं। बीच-बीच में एकाध विचलन होता है, लेकिन ‘पुनर्मूषको भव:’ के भाव से न कांग्रेस दूर हट पाती है, ना राहुल। हरियाणा विधानसभा चुनावों की हार को कांग्रेस और राहुल गांधी की चूलें हिला देने वाले झटकों में एक मानना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अभी-अभी तो राहुल गांधी ने कम-से-कम उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में दलित मतदाताओं को यह समझाने में सफलता हासिल की थी कि उनका बीजेपी के साथ रहना घाटे का सौदा है। लेकिन 8 अक्टूबर के हरियाणा विधानसभा चुनावों के परिणाम ने 4 जून के लोकसभा चुनावों के परिणाम से बने नैरेटिव को मटियामेट कर दिया। लोकसभा रिजल्ट के बाद से दलित मतदाताओं की चिंता में डूबी बीजेपी अब बमबम है। कांग्रेस की खुशी इतनी जल्दी काफूर हो जाएगी, यह तो उसने भी नहीं सोचा था। लोकसभा चुनावों के दौरान यूपी और महाराष्ट्र में बिदक गए दलित मतदाताओं ने हरियाणा विधानसभा चुनावों में न केवल बीजेपी का साथ दिया बल्कि पूरी ताकत लगाकर जाट-मुस्लिम कॉम्बिनेशन को धता बता दिया। इस तरह, महज चार महीने में दलितों ने दो बार साबित कर दिया कि पलड़ा हलका और भारी करने में उसकी कोई सानी नहीं हो सकती। तो सवाल है कि हरियाणा चुनाव परिणाम से कांग्रेस को क्यों चिंता होनी चाहिए? परस्पर प्रभाव का दूसरा सवाल है कि आखिर बीजेपी को इतना खुश क्यों होना चाहिए जब उसे पता है कि दलित पाला बदल सकते हैं?

पहले कांग्रेस की चिंता की बात करते हैं। हरियाणा में चुनाव की घोषणा से बहुत पहले से ही कांग्रेस के लिए अनुकूल परिस्थितियां थीं। बीजेपी का हरियाणा में अपना मुख्यमंत्री बदलना इस बात की ठोस तस्दीक है। बीजेपी ने लोकसभा चुनावों के छह महीने पहले ही मनोहर लाल खट्टर को हटाकर हरियाणा की कमान नायब सिंह सैनी को सौंप दिया था। फिर संसदीय चुनाव हुए तो कांग्रेस ने बीजेपी से पांच यानी आधी सीटें झटक लीं। यानी बीजेपी की मुख्यमंत्री बदलो की चाल भी हरियाणा में कांग्रेस के पक्ष में बने मोमेंटम को बदल नहीं पाई। और विधानसभा चुनावों में बहुत देर भी तो नहीं हुई।

तीसरे महीने में ही 16 अगस्त को हरियाणा विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई। इस बीच बीजेपी ऐसा कुछ नहीं कर सकी थी कि मोमेंटम उसके पक्ष में हो जाए। जवान, किसान और पहलवान प्रमुख प्रदेश हरियाणा में ये तीनों फैक्टर बीजेपी के विरुद्ध बताए जा रहे थे। कांग्रेस को करना था तो सिर्फ इतना कि बीजेपी के खिलाफ नाराजगी की पकी हुई वोटों की फसल को सावधानी से समेटकर घर ले आए। लेकिन उन्हीं राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस इतना भी नहीं कर पाई जिन्हें तीन महीने पहले 4 जून के लोकसभा रिजल्ट के बाद जननायक बताने का अभियान उसने तेज कर दिया था। हरियाणा की हार ‘जननायक’ की छवि को कितना बड़ा नुकसान है, इसका अंदाजा इन बिंदुओं से लगा सकते हैं! कांग्रेस पार्टी को हरियाणा में बीजेपी से सिर्फ 0.85% वोट ही कम आए। बीजेपी को 39.94 प्रतिशत वोट मिले तो कांग्रेस ने भी 39.09 प्रतिशत वोट हासिल किया। यह इस बात की पुष्टि करता है कि हरियाणा में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना था। फिर भी करारी हार मिली। इसका मतलब है कि कांग्रेस के स्थानीय संगठन से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक सही रणनीति बनाने में असफल रही। उधर, जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस सबसे शानदार प्रदर्शन करने वाली नैशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) का साथ पाकर भी फिसड्डी रही।

अब तो यही लगता है कि जवानों, किसानों और पहलवानों के प्रदेश हरियाणा में इन तीनों की बीजेपी से नाराजगी का नैरेटिव बिल्कुल फर्जी था। कांग्रेस ने बनावटी असंतुष्टों के कई वर्ग खड़े करके बीजेपी पर सामूहिक चोट करने की रणनीति अपनाई तो, लेकिन बिल्कुल फेल रही। यह ओलिंपिक में दमदार प्रदर्शन के दम पर फाइनल में पहुंचने और फिर स्वर्ण पदक के लिए अखाड़े में उतरने से पहले ही अयोग्य घोषित होने जैसा मामला है। यह कोई रणनीति में बिल्कुल अक्षम या असंयमित और लापरवाह या फिर अहंकार में डूबे इंसान का ही परिचायक हो सकता है। कांग्रेस का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा।

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने दलितों के बीच आरक्षण को लेकर जो डर पैदा किया था, उसके असर से उसकी सीटें बढ़ गईं और बीजेपी के चार सौ पार के अभियान को करारा झटका लगा। कांग्रेस के सामने दलितों को यह समझाए रखने की चुनौती थी कि बीजेपी सरकार से आरक्षण का खतरा वास्तविक है। नायब सिंह सैनी सरकार ने भी ग्रुप-ए और ग्रुप-बी के सरकारी पदों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण 15% से बढ़ाकर 27% कर दिया। सैनी सरकार ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले ओबीसी की क्रीमी लेयर को ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹8 लाख कर दिया। बावजूद इसके कांग्रेस दलितों को यह समझाने में नाकामयाब रही कि आरक्षण पर बीजेपी सरकार का रवैया ओबीसी हितैषी है, ना कि दलित हितैषी। उधर, संभावित नाराजगी को टालने के लिए बीजेपी के चतुर चुनावी प्रबंधक धर्मेंद्र प्रधान ने दलित जातियों, खासकर रविदासी, जोगी, बाजीगर और अन्य के साथ बैठकें कीं और उनकी आशंकाओं का समाधान किया।

हरियाणा में कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा दलित चेहरा कुमारी शैलजा का है। उन्होंने चुनाव परिणाम आने के बाद कहा कि सभी अंडे एक ही टोकरी में रखने की नीति कभी सही नहीं मानी जाती है। उनका इशारा उम्मीदवारों के चयन प्रक्रिया में भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पूरा दबदबा होने की तरफ है। कांग्रेस को जाटों पर हद से ज्यादा भरोसा करके बाकी जातियों को नजरअंदाज करने की कीमत चुकानी पड़ी है। अब शैलजा कह रही हैं कि शीर्ष नेतृत्व को इस रणनीति पर पुनर्विचार करते हुए हार के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करनी चाहिए। शीर्ष नेतृत्व यह सब कर भी ले तो अब क्या? वो कहते हैं ना- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। कांग्रेस के लिए हरियाणा में चिड़िया के खेत चुगने का नहीं, दंबंगों द्वारा जमीन ही कब्जा कर लिए जाने जैसा मामला है। इसलिए झटका सामान्य नहीं, बहुत तगड़ा है। कांग्रेस इससे कैसे उबरेगी, यह राहुल गांधी और उनकी टीम को बहुत गंभीरता से सोचना होगा।

 

आखिर राहुल गांधी के लिए क्या बोले ओबीसी मोर्चा के चेयरमैन कैप्टन अजय यादव?

हाल ही में ओबीसी मोर्चा के चेयरमैन कैप्टन अजय यादव ने राहुल गांधी के लिए एक बयान दे दिया है! राहुल गांधी इन दिनों जाति जनगणना, आरक्षण और संविधान के मुद्दे पर अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में आरक्षण का मुद्दा चल गया और कांग्रेस की सीटें 52 से बढ़कर 99 हो गईं। इससे उत्साहित होकर राहुल गांधी ने इन तीनों मुद्दों को और जोरशोर से उछालना शुरू किया। लेकिन 8 अक्टूबर को आए हरियाणा और जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव परिणाम ने राहुल के सपनों पर पानी फेर दिया। सवाल है कि बस चार-पांच महीने में ही राहुल के उठाए मुद्दों की हवा कैसे निकल गई? इसका जवाब एक टीवी डिबेट में निकली बातों में ढूंढा जा सकता है। इंडिया टीवी के एक कार्यक्रम में कांग्रेस ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष कैप्टन अजय सिंह यादव ने जो बातें बताईं, उससे पता चलता है कि राहुल गांधी इन मुद्दों पर राजनीति ही करना चाहते हैं, उनमें जमीन पर बदलाव लाने की कोई इच्छा नहीं है।

कांग्रेस ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष ने टीवी कार्यक्रम में बताया कि कैसे हरियाणा में चुनावी प्रबंधन को लेकर कांग्रेस के अंदर बड़े पैमाने पर धांधली हुई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में ओबीसी, दलित, आदिवासी नेताओं टिकट दिए जाने या उन्हें जमीन पर मजबूत करने की बात तो दूर, सामान्य तवज्जो दिए जाने की भी पहल नहीं होती है। कैप्टन अजय यादव ने बताया कि उनकी तीसरी पीढ़ी कांग्रेस के लिए काम कर रही है। फिर भी उनसे कोई राय-मशविरा नहीं होता है।

कैप्टन अजय यादव ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में हुई अपनी फजीहत की बात की। उन्होंने बताया, ‘राहुल गांधी के खास प्रफुल्ल जी ने मुझे कहा कि आपके यहां राहुल जी आ रहे हैं, आप तैयारी कीजिए। मैंने सबको तैयारी के लिए बोल दिया, फिर दो दिन तक कोई बात नहीं हुई। फिर जब राहुल जी के स्टाफ से कहा कि यह तो बड़ी फजीहत की बात है तो जवाब मिला कि राहुल जी के आने की संभावना थी, गारंटी नहीं।’ कैप्टन अजय यादव कहते हैं कि उनकी तीन पीढ़ियां कांग्रेस से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरे पिता 1952 राव बिरेंद्र सिंह को हराकर कांग्रेस के विधायक बने थे, 1972 में राव बिरेंद्र के छोटे भाई को हराया। 1989 में राव इंद्रजीत के छोटे भाई राव अजीत को हराया मैंने और अब मेरा बेटा विधायक बना है।’ कांग्रेस पार्टी ने गुरुग्राम से टिकट काट दिया, कैप्टन अजय यादव को इस बात की भी तकलीफ है। उन्होंने कहा, ‘आज ओबीसी कांग्रेस से छिटका तो इसलिए कि पार्टी में हमारी कोई दखल नहीं रह गई है। गुरुग्राम से मेरा खुद का टिकट काट दिया। जहां यादव लड़ना चाहिए था, उसको भिवानी से लड़ा दिया और भिवानी में किरन चौधरी का टिकट काट दिया। किरन चौधरी ने भिवानी की चारों सीटें जीत लीं बीजेपी के लिए।’

वो कहते हैं कि एससी-एसटी, ओबीसी मोर्चे के चेयरमैन को एक्सटेंडेड वर्किंग कमिटी में शामिल करना चाहिए। हम इसकी लगातार मांग कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। वो कहते हैं, ‘कांग्रेस की एक्सटेंडेड वर्किंग कमिटी में हरियाणा से एक भी ओबीसी नहीं है। अगर मैं कांग्रेस वर्किंग कमिटी और कांग्रेस एक्सटेंडेट वर्किंग कमिटी में नहीं हूं तो लोग मेरे पास तो आएंगे ही नहीं। हमारा प्रदेश कांग्रेस कमिटी में भी कोई स्टेक है तो आपको ओबीसी के सारे वोट कैसे मिल जाएंगे?’

कैप्टन अजय यादव ने कहा कि आज राहुल गांधी की कांग्रेस में एनजीओज का दबदबा है, नेता-कार्यकर्ता पीछे छूट गए हैं। योगेंद्र यादव जब चाहें मिल सकते हैं राहुल गांधी से, लेकिन इतनी आसानी से पार्टी के नेता-कार्यकर्ता नहीं मिल सकते। उन्होंने कांग्रेस नेता मामन खान के बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘मामन खान ने कहा कि जिन लोगों ने हम पर अत्याचार किया था, उन्हें चुन-चुनकर बाहर निकालूंगा। इसका क्या संदेश जाएगा? हमारा अहिरवाल बेल्ट तो बिल्कुल साथ लगता है। ये मुद्दा भी गरमा गया।’

कार्यक्रम में मौजूद राजनीति के जानकार और लेखक शांतनु गुप्ता ने कैप्टन अजय यादव की बताई बातों पर कहा कि राहुल गांधी की कथनी और करनी में अंतर है। उन्होंने कहा, ‘पिछले एक साल से राहुल गांधी किन मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं- जाति जनगणना, ओबीसी, दलित, संविधान। लेकिन ये सब सामने से झूठ दिख रहा है। ओबीसी के चेयरमैन को तो राहुल गांधी से मिलना मुश्किल है। तो खाने के दांत अलग हैं और दिखाने के अलग।’ गुप्ता ने कहा, ‘आपको राजनीति करनी है दलित-ओबीसी की, लेकिन आप कुमारी शैलजा और ओबीसी लीडर्स, दोनों को दबाएंगे लेकिन जनता में ओबीसी, संविधान, आरक्षण, जाति जनगणना का नारा देंगे। 2024 में आपकी सीटें बढ़ गईं, लेकिन ये दोहरी राजनीति ज्यादा लंबी नहीं चल सकती।’

 

दशहरा के दिन अपने संबोधन में क्या बोले आरएसएस के प्रमुख?

हाल ही में आरएसएस के प्रमुख ने दशहरा के दिन अपना संबोधन दिया था! राष्ट्रीय स्वयंसेवक प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी समारोह के संबोधन में पूरे हिंदू समाज को संयमित व्यवहार करने की नसीहत दी। साथ ही कहा कि अगर किसी ने कुछ गलत किया है तो उसके लिए पूरे वर्ग को जिम्मेदार मानकर उपद्रव करना गलत है। संघ प्रमुख ने कहा कि समाज में विविधताएं हैं लेकिन यह अलगाव नहीं है ये विशिष्टता है। ऐसी बातों को लेकर आपस में लड़ना ठीक नहीं है। हम सब संवेदनशील रहते हैं इन बातों को लेकर वो ठीक है लेकिन उन्हें प्रकट करने का रास्ता संयम का होता है। कानून व्यवस्था को धत्ता बताकर उपद्रव करना, किसी ने कुछ गलत किया पूरे वर्ग को जिम्मेदार मानना ये गलत है। गुस्सा कितना भी हो असंयम से बचना चाहिए। भागवत ने कहा कि मन वाणी और कर्म से किसी की श्रद्धा का, श्रद्धा वाले स्थान का, महापुरुष, ग्रंथ, अवतारों, संतों का अपमान ना हो इसका ध्यान अपने व्यवहार में रखना चाहिए। अगर किसी से ऐसा हो गया तो भी खुद पर संयम रखना चाहिए। असंयम के बदले असंयम से संयम निर्माण नहीं होता। बैर से बैर की शांति नहीं होती। उन्होंने कहा कि संयत व्यवहार करना सीखें। सब बातों से ऊपर समाज की एकता और सद्भावना जरूरी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल अगले साल हो जाएंगे। संघ अब समरसता और सद्भावना का अभियान तेज करेगा। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदुओं में अलग अलग जातियों के लोगों को मिलकर रहने और एक दूसरे के संतों, त्योहारों को साथ मनाने की अपील की। संघ प्रमुख ने हिंदू समाज को एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि समाज को संगठित और सशक्त रहना चाहिए। दुर्बलों की परवाह देव भी नहीं करते। उन्होंने कहा कि हम शताब्दी वर्ष के बाद समाज में यह विषय लेकर जाएंगे। समाजिक समरसता और सद्भावना लेकर हम जाएंगे। भागवत ने कहा कि विषमता इतनी हो गई है कि हमने अपने संतों को, त्योहार को बांट दिया।उन्होंने कहा कि ये मैं किसी को लड़ाने या डराने के लिए नहीं कह रहा है, ये परिस्थिति है, इसलिए कह रहा हूं। बाल्मीकि जयंती बाल्मीकि बस्ती में ही क्यों पूरा हिंदू समाज बनाए। उन्होंने कहा कि मंदिर, पानी, श्मशान सबके लिए खुले हों, ऐसा वातावरण चाहिए। उन्होंने कहा कि संघ- समरसता, पर्यावरण, कुटुंबप्रबोधन, नागरिक अनुशासन और स्वदेशी, इन पांच चीजों को लेकर समाज में अभियान चलाएगा।

संघ प्रमुख ने कहा कि कई जगह कट्टरपंथ को उकसाकर उपद्रव किए जाते हैं। समाज में असंतोष के कई कारण हो सकते हैं। असंतोष को व्यक्त करने के तरीके भी संविधान में बताए हैं। उसका पालन होना चाहिए उसे ताक में रखकर और कहीं किसी ने कुछ किया और पूरे समाज को जिम्मेदार मानकर जो उपद्रव होते हैं, ये गुंडागर्दी होती है। कहीं ये समाज के कट्टरस्वभाव के कारण होती है कई बार कोई उपद्रवी लोग बीच में आकर ऐसा करते हैं। भागवत ने कहा कि गणेश उत्सव के दौरान विसर्जन के जुलूसों पर पथराव क्यों हुआ, कोई वजह नहीं थी। ऐसी बातों का नियंत्रण तुरंत करना प्रशासन का काम है। लेकिन समाज को तैयार रहना चाहिए, गुंडागर्दी किसी की नहीं चलने देनी है, अपना और अपनों का प्राण और वस्तु की रक्षा करना मूलभूत अधिकार है। जो पुलिस, प्रशासन को करना है वो उन्हें ही करने देना चाहिए लेकिन उनके आने तक अपनों के और अपने प्राण को बचाना अपना अधिकार है। उसके लिए समाज को सजग रहना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ये मैं किसी को लड़ाने या डराने के लिए नहीं कह रहा है, ये परिस्थिति है, इसलिए कह रहा हूं।

संघ प्रमुख ने कोलकाता के हॉस्पिटल में हुए रेप केस का जिक्र करते हुए कहा कि एक द्रोपदी के वस्त्र को हाथ लगा महाभारत हो गया, सीता का हरण हुआ रामायण हो गया। लेकिन कोलकाता के आरजी कार हॉस्पिटल में क्या हुआ… समाज को कलंकित करने वाली घटना है। भागवत ने कहा कि मन वाणी और कर्म से किसी की श्रद्धा का, श्रद्धा वाले स्थान का, महापुरुष, ग्रंथ, अवतारों, संतों का अपमान ना हो इसका ध्यान अपने व्यवहार में रखना चाहिए। अगर किसी से ऐसा हो गया तो भी खुद पर संयम रखना चाहिए।घटना हो ही नहीं इसलिए चौकन्ना रहना चाहिए। लेकिन वहां घटना होने के बाद भी जिस तरह अपराधियों को संरक्षण देने की कोशिश हुई, ये जो अपसंस्कृति फैली है और उसके साथ अपराध और राजनीतिक का गठबंधन हो गया है उसका यह नतीजा है।

 

आखिर क्या है कुटुंब प्रबोधन जिस पर काम कर रहा है आरएसएस?

आज हम आपको कुटुंब प्रबोधन के बारे में जानकारी देने वाले हैं जिस पर आरएसएस काम कर रहा है ! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपनी विजयादशमी स्पीच में चार विषयों का जिक्र किया जिन पर संघ फोकस करेगा। इसमें सामाजिक समरता, पर्यावरण, नागरिक अनुशासन और स्वदेशी के साथ कुटुंब प्रबोधन शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि संघ ने पहली बार कुटुंब प्रबोधन की बात कही है। संघ काफी वक्त से इस पर काम कर रहा है। ये संघ का शताब्दी वर्ष है। अगले साल विजय दशमी को संघ के 100 साल पूरे हो जाएंगे और इसके बाद संघ इन पांच बिंदुओं पर ज्यादा फोकस करेगा जो संघ प्रमुख ने बताए हैँ। संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार ने कहा कि संघ शताब्दी वर्ष पूरा होने के बाद कुटुंब प्रबोधन का काम समाजव्यापी करेंगे। अभी एक साल स्वयंसेवक अपने जीवन में, अपने परिवार और अपने आसपास इन बातों को लेकर जाएंगे। जिसके बाद समाज के बीच लेकर इन्हें जाएंगे। बता दें किसंघ प्रमुख ने सामाजिक समसरता और कुटुंब प्रबोधन पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कानून के जरिए भी संस्कारों का क्षरण रोकने की बात कही। उन्होंने कहा कि अब बच्चों के हाथ में भी मोबाइल है। वह क्या देख रहे हैं, क्या दिखाया जा रहा है उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। घर परिवारों में यह नियंत्रण स्थापित करना और कानून भी बनाना इसकी जरूरत है। उन्होंने कहा कि ये सिर्फ संघ का विषय नहीं है ये पूरे समाज का विषय है। समाज में हर कोई चाहता है कि अपना परिवार अच्छा और संस्कारित हो। उन्होंने कहा कि संघ लंबे वक्त से कुटुंब प्रबोधन का काम कर रहा है।

2016 में भी संघ ने पूरा साल कुटुंब प्रबोधन पर फोकस किया था। इसमें संघ के स्वयंसेवकों ने परिवारों में जाकर हर फैमिली मेंबर से एक संकल्प पत्र में साइन भी करवाए। जिसमें यह लिखा था कि हमारे परिवार के लोग हफ्ते में कम से कम एक दिन एक घंटे एक साथ बैठेंगे, साथ भोजन करेंगे और इस दौरान टीवी और सब के मोबाइल फोन बंद रहेंगे। संघ की तरफ से अभी भी इस पर काम हो रहा है। अलग अलग आयु वर्ग के लोगों के लिए सम्मेलन आयोजित किए गए जिसमें फैमिली वैल्यूज की सीख दी जाती है। संघ के एक सीनियर प्रचारक ने कहा कि फैमिली वैल्यूज घटने की वजह से समाज में कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं। तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, परिवार के लोग ही एक दूसरे पर केस कर रहे हैं, परिवार के भीतर ही असहिष्णुता बढ़ रही है। हमारा मानना है कि समाज का निर्माण परिवार नाम की इकाई से ही होता है इसलिए कुटुंब प्रबोधन जरूरी है।

संघ तीन स्तर पर कुटुंब प्रबोधन का काम कर रहा है। पहला स्तर है परिवार। इसमें स्वयंसेवक अपने परिवार में इसे लागू कर रहे हैं। हफ्ते में कम से कम एक दिन परिवार के साथ बैठकर अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास पर बात करते हैं। दूसरा स्तर है स्वयंसेवकों के परिवारों की बैठक। इसमें तीन-चार महीने में स्वयंसेवकों के परिवार एकत्र होते हैं और चर्चा करते हैँ। तीसरा स्तर है स्वयंसेवकों के आसपास रहने वाले परिवार। स्वयंसेवक अपने आसपास के परिवारों के बीच इसे लेकर बातचीत करते हैं।

संघ के छह अहम गतिविधि हैं जिसके लिए संघ ने अखिल भारतीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक अलग टीम भी बनाई हुई है। यानी इसका पूरा एक सिस्टम है कि कैसे इस पर आगे बढ़ना है। इसमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, ग्राम विकास, गौसेवा और धर्म जागरण है। संघ का स्थापना दिवस विजयादशमी के दिन मनाया जाता है और इस दिन दी गई संघ प्रमुख की स्पीच संघ के लिए आगे की गाइडलाइन होती है।

संघ प्रमुख ने सामाजिक समसरता और कुटुंब प्रबोधन पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कानून के जरिए भी संस्कारों का क्षरण रोकने की बात कही।संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कानून के जरिए भी संस्कारों का क्षरण रोकने की बात कही। उन्होंने कहा कि अब बच्चों के हाथ में भी मोबाइल है। वह क्या देख रहे हैं, क्या दिखाया जा रहा है उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। उन्होंने कहा कि अब बच्चों के हाथ में भी मोबाइल है। वह क्या देख रहे हैं, क्या दिखाया जा रहा है उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। घर परिवारों में यह नियंत्रण स्थापित करना और कानून भी बनाना इसकी जरूरत है।

 

क्या दुनिया में हिंदी का नाम करने के लिए बॉलीवुड की है अहम भूमिका?

वर्तमान में दुनिया में हिंदी का नाम करने के लिए बॉलीवुड की एक अहम भूमिका बताई जाती है! हिंदी दिवस के मौके पर जब भी दुनियाभर में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता की चर्चा होती है, तो इसमें एक बड़ा योगदान बॉलीवुड यानी कि हिंदी सिनेमा की फिल्मों का भी माना जाता है। हालांकि कोविड के बाद साल 2022 में खुले सिनेमाघरों में हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता में काफी कमी आई थी। एक बार को यह माना जाने लगा था कि अब हिंदी सिनेमा की जगह जल्द ही साउथ सिनेमा ले लेगा। लेकिन अगले ही साल 2023 में हिंदी सिनेमावालों ने जोरदार वापसी करके दिखा दिया कि बॉलीवुड का दम कहीं से भी कम नहीं हुआ है। कोरोना से पहले साल 2019 में बॉलीवुड अपने चरम पर था। लेकिन कोरोना के चलते हिंदी सिनेमा को काफी नुकसान हुआ। साउथ सिनेमा की डब फिल्में उत्तर भारतीय काफी लंबे अरसे देखते आ रहे हैं। लेकिन साल 2021 के आखिर में रिलीज हुई तेलुगू सुपरस्टार अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा ने बॉलीवुड को जबरदस्त चुनौती दी। इस फिल्म ने सीधे 100 करोड़ क्लब में एंट्री की। वहीं उसके साल 2022 में बाहुबली फेम डायरेक्टर एस एस राजामौली की तेलुगू के सुपरस्टार्स रामचरण और जूनियर एनटीआर स्टारर ‘आरआरआर’ ने हिंदी बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ क्लब में एंट्री की, तो दुनियाभर में 1000 करोड़ से ज्यादा कमाई की। उसके बाद कन्नड़ के सुपरस्टार यश की फ्रेंचाइजी फिल्म ‘केजीएफ 2’ ने हिंदी बॉक्स ऑफिस पर 400 करोड़ क्लब में एंट्री की और दुनियाभर में 1000 करोड़ क्लब में एंट्री की। यही नहीं, साल के आखिरी महीनों में रिलीज हुई कन्नड़ सितारे ऋषभ शेट्टी की फिल्म ‘कांतारा’ भी हिंदी भाषी दर्शकों को खासी पसंद आई।

साल 2022 के आखिर तक फिल्मी दुनिया के तमाम जानकारों ने हिंदी सिनेमा का मर्सिया (शोकगीत) पढ़ना शुरू कर दिया था। एक के बाद एक पोस्टपोन हो रही बॉलीवुड की बड़ी फिल्मों के बीच हर किसी का यही कहना था कि अब हिंदी भाषी दर्शकों के बीच भी साउथ सिनेमा का ही राज होगा। बची-कुची कसर साउथवालों ने एक के बाद एक पैन इंडिया प्रोजेक्ट घोषित करके पूरी कर दी। साल 2023 की शुरुआत में गणतंत्र दिवस वीकेंड पर रिलीज हुई शाहरुख खान की फिल्म ‘पठान’ ने इस पूरे समीकरण को पलट दिया। काफी अरसे से एक अदद हिट को तरस रहे किंग खान की फिल्म ने जोरदार अंदाज में घरेलू बॉक्स ऑफिस पर न सिर्फ 500 करोड़ क्लब में एंट्री की, बल्कि दुनियाभर में भी 1000 करोड़ से ज्यादा कमाई करके हिंदी फिल्मों का दम दिखा दिया।

शाहरुख की फिल्म से शुरु हुआ हिंदी फिल्मों की धमाकेदार वापसी का यह सिलसिला पूरे साल कायम रहा। स्वतंत्रता दिवस वीकेंड पर रिलीज हुई सनी देओल की फिल्म ‘गदर 2’ ने भी सबको चौंकाते हुए 500 करोड़ क्लब में एंट्री की, तो उसके अगले ही महीने SRK की ‘जवान’ ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए 600 करोड़ क्लब में एंट्री की। इस फिल्म ने भी दुनियाभर में 1000 करोड़ से ज्यादा कमाई की। जबकि साल के आखिरी महीने में रिलीज हुई रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ ने हैरतअंगेज तरीके से 500 करोड़ क्लब में एंट्री करके सबको हैरान कर दिया। इस फिल्म ने दुनियाभर में भी 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की।

प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर हिंदी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता से इत्तफाक रखते हैं। वह कहते हैं, ‘कोविड के बाद ‘पुष्पा’ और ‘आरआरआर’ जैसी तेलुगू और ‘केजीएफ 2’ व ‘कांतारा’ जैसी कन्नड़ फिल्मों के जोरदार प्रदर्शन ने हिंदी सिनेमावालों की परेशानी बढ़ा दी थी। खासकर साल 2022 बॉलीवुड के लिए काफी खराब बीता था। लेकिन साल 2023 में बॉलीवुड की चार फिल्मों में 500 करोड़ क्लब में एंट्री की और इस साल एक और फिल्म इस एलीट क्लब में पहुंच गई है। बेशक इसे हिंदी सिनेमा की जोरदार वापसी ही कहा जाएगा कि इस दौरान कई हिंदी फिल्मों ने दुनियाभर में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की।’

साल 2024 हिंदी फिल्मों के लिए बीते साल जितना धमाकेदार भले ही नहीं रहा हो। लेकिन हिंदी फिल्मों की बंपर सफलता का सिलसिला अभी भी जारी है। साल 2023 में जहां चार फिल्मों ने 500 करोड़ क्लब में एंट्री करके नया रिकॉर्ड बनाया था। वहीं मौजूदा साल में भी फिल्म ‘स्त्री 2’ ने 500 करोड़ क्लब में एंट्री करके फिल्मवालों को चौंका दिया है। माना जा रहा है कि यह फिल्म जल्द ही 600 करोड़ रुपए क्लब में एंट्री कर सकती है। वहीं दुनियाभर में इस फिल्म की कमाई का आंकड़ा 850 करोड़ रुपए से ज्यादा हो सकता है।

कोरोना से पहले भी आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ ने दुनियाभर में दुनियाभर में 1900 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करके सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म का खिताब अपने नाम किया था। हालांकि आमिर की फिल्म की कमाई में काफी बड़ा हिस्सा चाइना से हुए कलेक्शन का था। जबकि उसके अलावा कोई दूसरी भारतीय फिल्म 1000 करोड़ क्लब में भी नहीं पहुंची थी। ऐसे में, साल 2023 में फिल्म ‘जवान’ ने 1148 करोड़ और फिल्म ‘पठान’ ने 1050 करोड़ रुपए की कमाई करके दिखा दिया कि हिंदी सिनेमा दुनियाभर के दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय है। इसके अलावा रणबीर कपूर की ‘एनिमल’ ने दुनियाभर में 917 करोड़, ‘स्त्री 2’ ने 790 करोड़ और ‘गदर 2’ ने 691 करोड़ की कमाई की।

 

क्या बॉलीवुड नई-नई एक्ट्रेस पर चल रहा है दाव?

वर्तमान में बॉलीवुड नई-नई एक्ट्रेस पर दाव चल रहा है! मौजूदा दौर में फिल्मवाले अपनी आने वाली फिल्मों के लिए नई कहानियों की कमी का सामना कर रहे हैं। यही वजह है कि फिलहाल उन्होंने सुपरहिट फिल्म बनाने की चाहत में सीक्वल फिल्मों का फॉर्मूला अपना लिया है। बीते कुछ अरसे में तमाम सीक्वल फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, तो कई सीक्वल फिल्मों पर काम चल रहा है, जो कि आने वाले दिनों में रिलीज होंगी। खास बात यह है कि इस सभी सीक्वल फिल्मों में हीरो जहां पुराने ही हैं, वहीं बतौर हीरोइन नए चेहरों पर दांव आजमाया जा रहा है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में रिलीज होने जा रहीं तमाम सीक्वल फिल्मों में आपको नई हीरोइनें नजर आएंगी।अगले महीने दिवाली पर बॉलीवुड की दो बड़ी फिल्मों ‘सिंघम अगेन’ और ‘भूलभुलैया 3’ के बीच क्लैश होने वाला है। खास बात यह है कि ये दोनों ही सीक्वल फिल्में हैं। हालांकि इन दोनों ही फिल्मों में पुराने हीरो हैं, लेकिन हीरोइन के तौर पर नई एक्ट्रेस नजर आएंगी। मसलन पिछली बार ‘भूलभुलैया 2’ में कियारा आडवाणी नजर आई थीं। वहीं, अबकी बार फिल्म में तृप्ति डिमरी और माधुरी दीक्षित हैं। साथ ही पहली वाली ‘भूलभुलैया’ से इस बार विद्या बालन भी इस फिल्म में एंट्री करने वाली हैं। उधर ‘सिंघम अगेन’ में इस बार बतौर फीमेल कॉप दीपिका पादुकोण की एंट्री होने वाली है। अपने पुरुष सितारों के इस पुलिस यूनिवर्स में डायरेक्टर रोहित शेट्टी ने महिला पुलिस ऑफिसर की एंट्री कराई है। अजय देवगन की ही आने वाली दो और सीक्वल फिल्मों की बात करें, तो उनमें भी वह नई हीरोइनों के अपोजिट नजर आएंगे। अगले साल रिलीज होने वाली फिल्म ‘रेड 2’ में अजय के अपोजिट वाणी कपूर नजर आएंगी। जबकि पिछली फिल्म में उनके अपोजिट इलियाना डीक्रूज थीं। वहीं, ‘सन ऑफ सरदार 2’ की शूटिंग भी शुरू हो चुकी है। पिछली फिल्म में आपने सोनाक्षी सिन्हा को देखा था। लेकिन इस बार निर्माताओं ने मृणाल ठाकुर को बतौर फीमेल लीड साइन किया है।

बीते साल रिलीज हुई आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘ड्रीम गर्ल 2’ में निर्माताओं ने नुसरत भरुचा की बजाय अनन्या पांडे को साइन कर लिया था। हालांकि अनन्या को फिल्म में मिक्स रिव्यूज मिले थे। वहीं अक्षय कुमार की सुपरहिट ‘वेलकम’ फ्रेंचाइजी की सीक्वल फिल्म ‘वेलकम 3’ में भी इस बार नई हीरोइनों दिशा पटानी और जैकलीन फर्नांडिस को मौका मिला है। जबकि इस फ्रेंचाइजी की पिछली फिल्मों में कटरीना कैफ और श्रुति हासन नजर आ चुकी हैं।

इन फिल्मों के अलावा भी बॉलीवुड में ढेरों सीक्वल फिल्मों पर काम चल रहा है। मसलन ऋतिक रोशन की ‘कृष 4’ में भी नई हीरोइन को लिए जाने की चर्चा है। वहीं डायरेक्टर मधुर भंडारकर भी अपनी सुपरहिट फैशन के सीक्वल की प्लानिंग कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि मधुर भी नई कास्ट पर दांव लगा सकते हैं। सीक्वल फिल्मों में नई हीरोइनों को साइन करने के ट्रेंड से फिल्मी दुनिया के जानकार भी इत्तफाक रखते हैं।

प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘जब भी निर्माता किसी फिल्म का सीक्वल घोषित करते हैं, तो फिल्म की रिकॉल वैल्यू के लिए वे पुराने एक्टर को साइन करते हैं, जो कि फिल्म का फेस भी होता है। लेकिन बात जब एक्ट्रेस की आती है, तो तमाम फैक्टर्स काम करते हैं। कई बार फिल्म के प्रीक्वल की हीरोइन शादी के बाद इंडस्ट्री से बाहर हो चुकी होती है, तो कई बार वह उपलब्ध नहीं होती। वैसे भी आजकल निर्माता काफी पुरानी फिल्मों के भी सीक्वल बना रहे हैं। वहीं कई बार निर्माता नई हीरोइनों को मौका देना चाहते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर सीक्वल फिल्मों में नई हीरोइनें नजर आती हैं।’ यही नहीं लंबे समय से में अपने गुस्से और अधीरता जैसी खामियों से लड़ रही हूं। आज दशहरा के दिन मैं अपने भीतर के क्रोध और बेसब्री के रावण का दहन करना चाहती हूं। वहीं डायरेक्टर मधुर भंडारकर भी अपनी सुपरहिट फैशन के सीक्वल की प्लानिंग कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि मधुर भी नई कास्ट पर दांव लगा सकते हैं। सीक्वल फिल्मों में नई हीरोइनों को साइन करने के ट्रेंड से फिल्मी दुनिया के जानकार भी इत्तफाक रखते हैं।अपने जीवन में मैंने यदि अपनी इन कमियों पर विजय पा ली, तो मैं और ज्यादा समझदार और संतुलित व्यक्ति बन जाऊंगी और यह मेरे समुचित विकास में बहुत बड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन होगा। सामाजिक स्तर पर मैं इस साल करप्शन और असहिष्णुता के रावण को खत्म होते देखना चाहूंगी।

 

आखिर हिंसक फिल्में क्यों बनाता जा रहा है बॉलीवुड?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बॉलीवुड वर्तमान में हिंसक फिल्में क्यों बनाता जा रहा है! बॉलिवुड फिल्में एक अरसे तक रोमांस और फैमिली ड्रामा को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में कई फिल्मों में मन विचलित करने वाली हिंसा और क्रूरता का अतिरेक नजर आ रहा है। आखिर, कभी अपनी फिल्मों में श्रृंगार, हास्य, शांत और करुण जैसे रसों को तरजीह देने वाले बॉलिवुड को रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स रस क्यों लुभाने लगा है? सिनेमाघरों में सुर्खियां बटोरने के बाद हाल ही में OTT पर आई फिल्म ‘किल’ को देखकर एक दोस्त की प्रतिक्रिया थी- ‘इसका टाइटल हत्या करने के 101 तरीके भी हो सकता था। पूरी फिल्म में सिर्फ हत्या, हत्या, वो भी बेहद वीभत्स तरीके से। OTT के बाद आजकल सिनेमाई फिल्मों में भी बहुत वॉयलेंस दिखाया जाने लगा है।’ गौर करें, तो उनकी बात बिल्कुल वाजिब है। आम तौर पर रोमांस, कॉमिडी और फैमिली ड्रामा के लिए मशहूर रहे बॉलिवुड की हालिया फिल्मों में हिंसा और क्रूरता पर खासा जोर दिख रहा है। चाहे वह रणबीर कपूर की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘एनिमल’ हो, जिसमें वह ‘अर्जन वैली वे’ की धुन पर कुल्हाड़ी से लोगों को काटते जाते हैं या फिर देश की सबसे हिंसक फिल्म के तौर पर प्रचारित किल। हाल ही में आई ‘सेक्टर 36’ हो या फिर ‘युध्रा’, इन सभी में इतना विद्रूप (gory) वॉयलेंस और खून खराबा है कि कमजोर दिल वाले सिहर जाएं।

वैसे, हॉलिवुड फिल्मों में दिल दहलाने वाले क्रूर एक्शन सीक्वेंस हमेशा से दिखाए जाते रहे हैं। हॉलिवुड के महान निर्देशकों में गिने जाने वाले क्वेंटिन टैरेंटीनो तो अपनी फिल्मों में ऐसे वीभत्स (gory) एक्शन और हिंसा दिखाने के लिए मशहूर ही हैं। उनकी फिल्म ‘रिजर्वायर डॉग्स’ हो, ‘पल्प फिक्शन’ हो या ‘किल बिल’, सभी में ऐसे हिंसक सीन है, जिसके लिए उनकी आलोचना भी हुई है। इसी तरह, कोरियन सिनेमा भी अपने मन विचलित करने वाले एक्शन के लिए जाना जाता है। साउथ सिनेमा में भी ऐसे रॉ एक्शन सीन दिखाए जाते रहे हैं। मगर बॉलिवुड के फिल्मकार नाट्यशास्त्र के नौ रसों श्रृंगार, हास्य, करुण, शांत, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत में से श्रृंगार, हास्य, शांत और करुण रस को तरजीह देते रहे हैं। ऐसे में, इन दिनों बॉलिवुड को रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स रस क्यों लुभाने लगा है?

यह पूछने पर ‘सेक्टर 36’ में अपनी गंभीर भूमिका के लिए तारीफें बटोर रहे एक्टर दीपक डोबरियाल कहते हैं, ‘यह दौर-दौर की बात है। आजकल ऐसे एक्शन का दौर चल रहा है। अभी कोई पारिवारिक फिल्म या रिलेशनशिप ड्रामा चल जाए तो सब वही बनाने लग जाएंगे तो इंडस्ट्री में एक भेड़चाल भी चलती है कि जो जॉनर हिट हो जाए, सब उसी के पीछे भागते हैं। जैसे, स्त्री 2 इतनी बड़ी हिट हो गई, तो मैं दस जगह सुन रहा हूं कि हॉरर कॉमिडी कभी फेल नहीं होती है।’ वहीं, खांटी एक्शन वाली फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘रंगबाज: डर’ की राजनीति करने वाले एक्टर विनीत कुमार सिंह का कहना है, ‘ये सिनेमा के अलग-अलग जॉनर हैं। रोमांस या ड्रामा एक जॉनर है, जो हमेशा से रहा है, लेकिन पहले भी गाइड, दो बीघा जमीन जैसी फिल्मों में उस समय की समस्याएं या दुर्दशा पर्दे पर आई हैं।’

यह कोई आधार कार्ड तो है नहीं कि बनवाना जरूरी है। आपको जो चीज नहीं देखनी, आप वो मत देखिए, लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो ऐसी चीजें देखना चाहते हैं, इसलिए डायरेक्टर अपनी कहानी कहने के लिए अलग-अलग माध्यम चुनते हैं। यह सही है कि आज बहुत सारी ऐसी फिल्में बन रही हैं जिसमें एक्शन बहुत ज्यादा है, पर मुझे लगता है कि उन्हें अपनी बात अपने तरीके से कहने की आजादी होनी चाहिए। किसी को वो चीज नहीं समझ में आती तो वह ना देखें।’ सेक्टर 36 देखने के बाद कोरियन ड्रामा की शौकीन एक साथी जर्नलिस्ट का कहना था कि उनको विक्रांत के किरदार में वह क्रूरता महसूस नहीं हुई जो होनी चाहिए थी। शायद कोरियन ड्रामा देख-देखकर उन्हें ऐसे सीन्स निर्मम नहीं आम लगते हैं। तो क्या पर्दे पर हिंसा या क्रूरता भरे सीन देखना हमें असंवेदनशील बना सकता है?

इस सवाल पर जाने-माने मनोचिकित्सक डॉक्टर हरीश शेट्टी का कहना है, ‘सिनेमा समाज का ही आईना होता है। सिनेमा वही दिखाता है, जो समाज में चल रहा होता है। दरअसल, हम समाज के तौर पर ही वॉयलेंस के प्रति असंवेदनशील हुए हैं। बीते सालों में आतंकवाद, युद्ध, अपराध की घटनाएं जिस तरह बढ़ी हैं, उसमें प्रिमिटिव इमोशंस यानी जलन, नफरत, गुस्सा, बदला प्रभावी होते हैं। जब समाज शांत होता है तो भजन गाता है, जबकि भागते हुए समाज को हिंसा अच्छी लगती है।

ग्लोबलाइजेशन का सबसे बड़ा नुकसान ही है, डिस्कनेक्शन (अलगाव) और स्पीड ( गति)। जब गति बढ़ती है तो गर्मी बढ़ती है, उस समय प्रिमिटिव इमोशंस में लुत्फ आता है। अभी बांग्लादेश में इतने लोग मरे, हाथरस में मरे, किसी को फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि हम डीह्यूमनाइज हुए हैं, क्योंकि एक के बाद एक जब हम वॉयलेंस देखते हैं तो एक आदत सी हो जाती है। आज टीवी पर, न्यूज में हर जगह तो अपराध की खबरों का बोलबाला है, इसलिए लोगों को अब ये चीजें चौंकाती नहीं।’