Thursday, March 19, 2026
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अपनी पहचान को लेकर बिग बॉस में क्या बोली शिल्पा शिरोडकर?

हाल ही में शिल्पा शिरोडकर ने बिग बॉस में अपनी पहचान को लेकर एक बयान दे दिया है! 90 के दशक में ‘खुदा गवाह’, ‘गोपी किशन’, ‘बेवफा सनम’, ‘मृत्युदंड’ जैसी चर्चित फिल्मों का हिस्सा रहीं एक्ट्रेस शिल्पा शिरोडकर शादी के बाद लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध से दूर विदेश में बस गई थीं। लेकिन अब वह एक बार फिर सुर्खियों में हैं, छोटे पर्दे के विवादित रिएलिटी शो ‘बिग बॉस 18’ को लेकर, जिसमें वह प्रतियोगी बनकर पहुंची हैं। Shilpa Shirodkar का कहना है कि उन्हें Bigg Boss शो बहुत ज्यादा पसंद है। इसलिए, वह खुद इस अनुभव को जीने जा रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि वह शो से बहुत सारी यादें लेकर वापस आएंगी। साथ ही, इस बड़े मंच की वजह से उनका करियर भी दोबारा रफ्तार पकड़ेगा। शिल्पा की बहन नम्रता शिरोडकर तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारे महेश बाबू की पत्नी हैं। ऐसे में, शिल्पा के बिग बॉस में जाने की ज्यादातर खबरों में उन्हें महेश बाबू की साली ही लिखा गया। खुद कई हिट फिल्में करने वाली शिल्पा अपने इस परिचय के बारे में क्या सोचती हैं? यह पूछने पर उन्होंने कहा, ‘मुझे इस बात पर बहुत गर्व है कि महेश (बाबू) मेरे जीजा हैं। वह मेरे लिए परिवार हैं। वह बहुत खुश भी हैं कि मैं बिग बॉस से फिर काम शुरू कर रही हूं, लेकिन जैसा आपने कहा, मैं भी इस इंडस्ट्री में बहुत लंबे समय तक रही हूं और ठीकठाक काम किया है। इसलिए, सिर्फ एक ही तरह से सोचने की कोई वजह नहीं है।’

वो कहती हैं, ‘मेरे बिग बॉस करने की एक वजह यह भी है कि यह बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है। मैं चाहती हूं कि मेरा इस घर में जितना भी लंबा सफर हो, जब मैं वापस आऊं तो लोग मुझे मेरी वजह से जानें और प्यार करें। इसके बाद मुझे अच्छे काम की भी उम्मीद है।’ शिल्पा ने अपनी पहली फिल्म ‘भ्रष्टाचार’ से लेकर ‘किशन कन्हैया’, ‘गोपी किशन’, ‘खुदा गवाह’, ‘मृत्युदंड’ जैसी ज्यादातर दो हीरोइनों वाली फिल्में की हैं? इसकी वजह पूछने पर वह कहती हैं, ‘इसकी वजह कुछ नहीं थी।’

वो आगे बोलती हैं, ‘असल में, उस वक्त में हम फिल्म चुनने में इतना ज्यादा सोचते नहीं थे। हम गिनकर पांच-छह लड़कियां थीं। हमारी सोच यह रहती थी कि अच्छी फिल्में करना बहुत जरूरी था, तो हम देखते थे कि प्रड्यूसर-डायरेक्टर अच्छा हो।’ वो कहती हैं,’तब ये नहीं सोचते थे कि वह सोलो है या दो एक्ट्रेसेज हैं। फिर, तब मल्टीस्टारर फिल्में भी बहुत बनती थीं। इसीलिए, जब आजकल जिस तरह की फिल्में, जिस तरह का कॉन्टेंट बन रहा है, उसे देखकर लगता है कि अगर मैं अब एक्टिंग में होती तो ज्यादा बेहतर काम करती।’ शिल्पा ने उस दौर की ज्यादातर एक्ट्रेसेज की तरह साल 2000 में शादी के बाद एक्टिंग को टाटा बोल दिया। क्या इस फैसले का उन्हें कभी अफसोस होता है? इस पर वह कहती हैं, ‘बिल्कुल भी नहीं।’

शिल्पा ने बताया, ‘शादी के बाद मैं देश छोड़कर चली गई, पर अपने इस फैसले से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं, क्योंकि उन 13 सालों में मैंने बहुत कुछ सीखा। मैं बहुत कमाल के लोगों से मिली। अलग-अलग देशों में रही और वो मेरे जिंदगी के बहुत ही हसीन पल हैं। देखिए, काम अपनी जगह है, लेकिन मैंने हमेशा कहा है कि मैं ऐक्टर होना मिस नहीं करती थी, मैं बिजी रहना मिस करती थी।’ वो आगे कहती हैं, ‘जब आप देश छोड़कर ट्रैवल करते हैं तो ज्यादातर समय अकेले होते हैं तो मैं लोगों का साथ, उनसे बात करना और बिजी रहना मिस करती थी, न कि कैमरे के आगे ऐक्टिंग करना, क्योंकि मेरे हिसाब से वह मेरे लिए एक नई जिंदगी शुरू करने का सही समय था। मेरी शादीशुदा जिंदगी थी, आज मेरी 20 साल की बेटी है। ये चीजें वैसे नहीं होती, अगर मैं यहां होती।’

शिल्पा अपनी पहली फिल्म ‘भ्रष्टाचार’ समेत करीब नौ फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती की जोड़ीदार रहीं। उन दोनों की ऑन स्क्रीन जोड़ी काफी पसंद की जाती थी। हाल ही में मिथुन चक्रवर्ती को दादा साहेब फाल्के सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई, इस पर मिथुन संग अपनी यादें साझा करते हुए शिल्पा ने कहा, ‘दादा के बारे में मैं जितना बोलूं, उतना कम है।’

मिथुन के लिए शिल्पा ने आगे कहा, ‘इंडस्ट्री में मेरी शुरुआत दादा की वजह से हुई है। उनकी वजह से मुझे ‘भ्रष्टाचार‘ मिली, जिससे मेरा करियर शुरू हुआ। मैं हमेशा उनकी कर्जदार हूं। वह बहुत प्यारे इंसान हैं। इसलिए नहीं कि उन्होंने मुझे इस इंडस्ट्री में आने में मदद की, बल्कि उन्होंने बहुत सारे लोगों की मदद की है। हर एक इंसान के दिल को वह बहुत ही खूबसूरती से छू लेते थे। इसके अलावा, उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का है। आप कितने भी खराब मूड में हों, दादा आपको हंसा सकते हैं।’

 

आखिर दशहरा और अपने मन की बुराई के लिए क्या कहते हैं बॉलीवुड स्टार्स?

आज हम आपको बताएंगे कि दशहरा और अपने मन की बुराई के लिए बॉलीवुड स्टार्स क्या विचार रखते हैं! कई बार ऐसा होता है कि मैं आस -पास की चीजों को लेकर नकारात्मक हो जाती हूं, शक करने लगती हूं। मुझे उस तमाम प्रक्रिया पर शक होने लगता है और ऐसे में मैं उस सोच से दूर होती जाती हूं कि जो होता है कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है, तो मैं अपने भीतर के नकारात्मकता के रावण का नाश करना चाहती हूं। मैं विश्वास करने पर ज्यादा ठहरना चाहती हूं। जहां तक समाज की बात है, तो एक अरसे से मैं देख रही हूं कि लोगों का अच्छाई से विश्वास उठ -सा गया है। हम भी आम तौर पर यही बोलते हैं कि जो कामयाब है, वो जरूर शातिर होगा।हम इस सोच से दूर हो गए हैं कि सचाई और ईमानदारी के बलबूते पर कुछ हासिल किया जा सकता है। हम जानते हैं कि मेहनत करने से फल मिलेगा, हम करते भी हैं, मगर उसी के साथ हम आक्रामक भी होते हैं और कई बार खुद को बहुत ज्यादा पुश कर देते हैं। मगर मैं ये मानती हूं कि शॉर्ट टर्म में भले मेहनत और सचाई का फल न मिले, मगर लॉन्ग रन तक धूर्तता नहीं चल सकती। आखिर में तो सच और अच्छे की ही जीत होनी है। इसलिए मैं चाहती हूं कि समाज में लोग अच्छाई और सच का दामन न छोड़ें। दशहरे के दौरान हमें अपने भीतर के उन रावण को जलाना चाहिए जो हमारे जीवन और करियर में बाधा उत्पन्न करता है। मैं बहुत भावुक हूं .हालांकि मैं खुद को मानसिक रूप से मजबूत मानती हूं, मगर मुझे लगता है कि मुझे मुझे थोड़ा और प्रैक्टिकल होने की जरूरत है क्योंकि आसक्ति अक्सर दर्द की ओर ले जाती है। यह वो रावण है, जिसे मैं अपने जीवन से निकालना चाहती हूं। मैं लोगों पर बहुत जल्दी भरोसा भी कर लेती हूं, जिसका मुझे अक्सर खामियाजा भुगतना पड़ता है। इसके अलावा क्रोध रूपी रावण से भी मैं जूझती रहती हूं, तो मैं अपने भीतर के गुस्से के रावण को जलता देखना चाहती हूं। समाज में तो अनगिनत रावण हैं, मगर महिलाओं की बात करें, तो मैं सोचती हूं कि हम समानता क्यों नहीं प्राप्त कर सकते? 21वीं सदी में भी हम अभी भी महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा कर रहे हैं। बेटों को ऐसे माहौल में बड़ा करना जरूरी है, जहां वे महिलाओं का सम्मान करना सीखें। समाज को महिलाओं का उत्थान और सशक्तिकरण करना चाहिए, उन्हें वह सम्मान और अधिकार देना चाहिए, जिसकी वे हकदार हैं। जब महिलाओं को सशक्त बनाया जाता है, तो यह दुनिया में संतुलन और सकारात्मकता लाता है। फिल्मों और धारावाहिकों में अक्सर बुराई पर अच्छाई की जीत होते दर्शाया जाता है, मगर इस चक्कर में ध्यान रखना होगा कि कोई आपकी अच्छाई का फायदा न उठाए। दशहरा के दौरान क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता जैसी बुराई को खत्म करना जरूरी है। जब आप अपने अंदर की नकारात्मकता को खत्म करते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से अपने जीवन में सकारात्मक स्थितियों को आकर्षित करते हैं।

कई बार अज्ञानता और तुरत-फुरत प्रतिक्रिया देना मुसीबत का कारण बन जाता है, क्योंकि ये दुर्गुण हालत को और देते हैं, तो मैं चाहता हूं कि मेरे भीतर समझ और ज्ञान की रौशनी रहे और मैं चीजों को सोच -समझ कर आगे बढ़ाऊं। इस दशहरे पर, मेरा लक्ष्य सकारात्मक रूप से काम करना और खुद को नकारात्मकता से मुक्त करना है। जहां तक समाज का सवाल है, तो मैं चाहता हूं कि समाज आत्म-सुधार पर ध्यान केंद्रित करे। बदलाव व्यक्तिगत स्तर पर होता है, और हालांकि मुझे यकीन नहीं है कि सामूहिक प्रयास कितने सफल होंगे, लेकिन यह सब जागरूकता पर वापस आता है। एक बार जब आप अपने आस-पास की दुनिया के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो आप उन मुद्दों को संबोधित कर सकते हैं। यदि आप अनभिज्ञ हैं, तो आपके मन में हमेशा यह रवैया रहेगा कि ‘मुझे क्या फर्क पड़ता है?’ लेकिन सच तो यह है कि इससे फर्क पड़ता है। मेरे लिए बुराई पर अच्छाई की जीत की अवधारणा, सिर्फ एक अवधारणा नहीं है, यह एक वास्तविकता है, एक अस्तित्वगत सत्य है जिसके साथ हमें जीना चाहिए। विशेष रूप से नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान, यह उन नौ रातों में बुराई पर विजय पाने के बारे में है। अंतिम दिन, दशहरा, इस जीत का जश्न मनाता है। यह तम, रज और सत्व के गुणों पर नियंत्रण पाने के बारे में भी है। इसलिए, यह केवल एक अवधारणा नहीं है, यह एक वास्तविकता है। इसलिए, हमारी संस्कृति में, दशहरा के बाद कई त्यौहार मनाए जाते हैं – दिवाली, छठ पूजा, और भी बहुत कुछ। जब तक आप अपने भीतर की बुराई पर विजय नहीं पा लेते, तब तक अच्छाई को सही मायने में नहीं देखा जा सकता।

लंबे समय से में अपने गुस्से और अधीरता जैसी खामियों से लड़ रही हूं। आज दशहरा के दिन मैं अपने भीतर के क्रोध और बेसब्री के रावण का दहन करना चाहती हूं। अपने जीवन में मैंने यदि अपनी इन कमियों पर विजय पा ली, तो मैं और ज्यादा समझदार और संतुलित व्यक्ति बन जाऊंगी और यह मेरे समुचित विकास में बहुत बड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन होगा। सामाजिक स्तर पर मैं इस साल करप्शन और असहिष्णुता के रावण को खत्म होते देखना चाहूंगी। ये मुद्दे हमारे सामाज को जहरीला बनाते हैं। यह जरूरी है कि हम सामूहिक रूप से इन विनाशकारी ताकतों को खत्म करने और सभी के बीच सहानुभूति, सम्मान और समझ को प्रोत्साहित करने वाले मूल्यों को बढ़ावा देने की दिशा में काम करें। मुझे लगता है कि आदिकाल से ही अच्छाई और बुराई की लड़ाई चली आ रही है। सामाज में फैली असमानता, शोषण, हक न मिलाना, गरीबों का गरीब होते जाना जैसे कई रावण हैं, काश इन सारे रावणों का विनाश हो।

मेरा मानना है कि बुराई पर अच्छाई की जीत यही दर्शाती है कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, जीत हमेशा सच की होगी। इसी सोच पर मेरा विश्वास मुझे सही काम करते रहने और सकारात्मक बने रहने को प्रेरित करता है। अपने भीतर के रावण की बात करूं, तो कई बार मैं बहुत ज्यादा ओवर थिंकिंग कर लेता हूं। कई बार उन चीजों को लेकर परेशान होता हूं, जो मेरे नियंत्रण में हैं ही नहीं। मुझे लगता है, मुझे पानी के प्रवाह की तरह बहते रहना सीखना होगा। मैं नफरत और असहिष्णुता के रावण को खत्म होते देखना चाहूंगा। समाज में बहुत ज्यादा नेगेटिविटी है और अगर नफरत हमें खोखला कर रही है। अगर हम धर्म, जाति, ऊंच-नीच की नफरत का नाश कर सकें, तो ये दुनिया बेहतर बन सकती है।

 

क्या भारत अपना रहा है चीन को जवाब देने का एक अनोखा तरीका?

वर्तमान में भारत चीन को जवाब देने का एक अनोखा तरीका अपना रहा है! लद्दाख में चीन यानी ड्रैगन को घेरने के लिए भारत ने बेहद खास प्लान तैयार किया है। डोकलाम गतिरोध के बाद भारतीय सेना लद्दाख में कोई कोताही नहीं बरतना चाहती है। इन इलाकों में ऊंचे-ऊंचे पहाड़, मौसम का कोई भरोसा नहीं होता। ऐसी जगह गश्त करना या सामान पहुंचाना काफी मुश्किल होता है। मशीनों से भी उम्मीद के मुताबिक सहयोग नहीं मिल पाता। ऐसे में सेना को गश्त के लिए और सामान पहुंचाने के लिए नए साथी की तलाश है। इस तलाश में दो कूबड़ वाले ऊंट अहम जरिया बनकर सामने आए हैं। लेह में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) का एक खास संस्थान है, डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (DIHAR)। ये संस्थान इन जंगली ऊंटों को अपना साथी बनाकर बोझा ढोने वाले जानवरों के तौर पर तैयार करने में जुटा है। दो कूबड़ वाले इन ऊंटों को बैक्ट्रियन ऊंट भी कहा जाता है। बैक्ट्रियन ऊंट बहुत कठोर होते हैं। ये ऊंचाई पर भी आसानी से रह सकते हैं और लगभग दो हफ्ते तक बिना खाए-पिए भी रह सकते हैं। ये ऊंट 150 किलो से ज्यादा वजन उठा सकते हैं।

मध्य एशिया में इन्हें बोझा ढोने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। ठंडे और सूनसान वातावरण में भी ये 150 किलोग्राम से ज्यादा वजन आसानी से ले जा सकते हैं। लेह, लद्दाख में रिमाउंट वेटरनरी कॉर्प्स के कर्नल रविकांत शर्मा ने बताया कि प्राचीन काल में माल ढुलाई के लिए दो कूबड़ वाले ऊंटों का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, भारत में इन्हें पालतू बनाने और आज्ञाकारी बनाने का जानकारी लगभग खो गई है। कर्नल शर्मा, जो DRDO के DIHAR का हिस्सा हैं, उन्होंने बताया कि सेना की रसद आपूर्ति, खासकर अंतिम छोर तक सामान पहुंचाने के लिए दो कूबड़ वाले ऊंट एक बेहतरीन विकल्प हैं। DRDO के वैज्ञानिकों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों में रसद आपूर्ति करना किसी बुरे सपने से कम नहीं होता। लद्दाख में सड़कों के निर्माण ने परिवहन के विकल्पों को बढ़ाया है, लेकिन अंतिम छोर तक सामान पहुंचाने के लिए सैनिकों को अभी भी कुली और जानवरों पर निर्भर रहना पड़ता है। उनका कहना है कि पहाड़ी इलाकों में जानवरों ने रसद आपूर्ति में अपनी उपयोगिता साबित की है।

डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यहां ड्रोन, क्वाडकॉप्टर और ऑल-टेरेन व्हीकल (ATV) की क्षमता अभी तक पूरी तरह से साबित नहीं हो पाई है। ऊंचाई पर, तकनीकी विकल्पों का इस्तेमाल मौसम, पर्यावरण और भू-भाग पर निर्भर करता है। ऐसे में जानवरों से सहायता मिलने पर परिचालन क्षमता में वृद्धि होगी। 1999 के करगिल युद्ध के बाद से लद्दाख सेक्टर में जंस्कारी टट्टुओं का इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जा रहा है। पूर्वी लद्दाख में, इसी उद्देश्य के लिए बैक्ट्रियन ऊंटों पर शुरुआती टेस्टिंग सफल रहे हैं। भारतीय सेना की उत्तरी कमान ने कहा कि दो कूबड़ वाले ऊंट पठारी इलाकों में रेतीले मैदानों में गश्त और सामान ढोने का एक नया और कारगर तरीका प्रदान कर सकते हैं। ऊंटों के इस्तेमाल से स्थानीय आबादी के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो रहे। उनके संरक्षण के प्रयासों को भी बढ़ावा मिल रहा है।

कर्नल रविकांत शर्मा ने कहा कि दो कूबड़ वाले ऊंट को एक सैनिक के रूप में प्रशिक्षित करना, उसे पर्यटकों को सैर कराने के लिए प्रशिक्षित करने से बहुत अलग है। युद्ध के समय, जानवर को स्थिर रहना होता है। चारों ओर मशीनों की गड़गड़ाहट के बीच भी सभी आदेशों का पालन करना होता है। अत्यधिक ऊँचाई (15,000 फीट से अधिक) पर बोझा ढोने के लिए याक के इस्तेमाल पर भी परीक्षण किए जा रहे हैं। याक में देसी मवेशियों की तुलना में तीन गुना अधिक लाल रक्त कोशिकाएं होती हैं और उनके फेफड़े भी बड़े होते हैं। वे ऊंचाई पर 100 किलोग्राम तक भार ढोने के लिए पूरी तरह से अनुकूल होते हैं।

याक के घने बाल उन्हें माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी जीवित रहने में मदद करते हैं। वे 15,000 से 17,000 फीट की ऊंचाई पर चर सकते हैं।ऊंचाई पर भी आसानी से रह सकते हैं और लगभग दो हफ्ते तक बिना खाए-पिए भी रह सकते हैं। ये ऊंट 150 किलो से ज्यादा वजन उठा सकते हैं। इन जानवरों का इस्तेमाल आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अगर दुश्मन जैमर का इस्तेमाल करता है तो ड्रोन और रोबोट उस समय काम करना बंद कर सकते हैं जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत हो।

 

महंगे कंडीशनर के बिना चमकदार बाल पाने के लिए शैम्पू करने के बाद अपने बालों को दूध से धोएं।

दूध से बाल धोने से सिर की त्वचा में नमी बनी रहती है, जिससे बाल मुलायम और रेशमी हो जाते हैं। दूध प्रोटीन और वसा भी बालों की जड़ों को पोषण प्रदान करते हैं। दूध से बालों की देखभाल? अगर आप कमर पर प्रिंट के साथ सीधे बाल चाहती हैं तो बाजारू सौंदर्य प्रसाधन नहीं बल्कि दूध आपके काम आ सकता है! शैम्पू करने के बाद बालों में आने वाले रूखेपन को दूर करने के लिए दूध व्यावसायिक कंडीशनर की तुलना में कहीं बेहतर काम करता है। तुम आश्चर्यचकित हो! दूध से बाल धोने से सिर की त्वचा में नमी बनी रहती है, जिससे बाल मुलायम और रेशमी हो जाते हैं। दूध प्रोटीन और वसा भी बालों की जड़ों को पोषण प्रदान करते हैं। परिणामस्वरूप बालों के झड़ने की समस्या भी कम हो जाती है।

बालों के लिए कितना फायदेमंद है दूध?

दूध एक संतुलित भोजन है, यह शरीर को पोषण देता है। बहुत से लोग नहीं जानते कि दूध को बालों में लगाने से बालों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। दूध में प्रोटीन, फैट के अलावा कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में होता है, जो बालों के विकास में मदद करता है। इसके अलावा विटामिन ई, विटामिन बी6, विटामिन बी7 और पोटैशियम बालों को मुलायम और स्वस्थ रखते हैं। दूध में कैसिइन प्रोटीन होता है, जो बालों को घना और मजबूत बनाने में मदद करता है।
पबमेड जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दूध के नियमित सेवन से डैंड्रफ की समस्या खत्म हो सकती है। सूर्य की पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आने से सिर की त्वचा में सामान्य प्रोटीन का स्तर कम हो जाता है। बाल बहुत रूखे हो जाते हैं, दोमुंहे बालों की समस्या हो जाती है। दूध के इस्तेमाल से ये सभी समस्याएं आसानी से दूर हो जाएंगी। दूध कोलेजन के उत्पादन में मदद करता है, इसलिए इसके उपयोग से बालों को पोषण और विकास दोनों मिलेगा।

बालों में दूध कैसे लगाएं?

1)शैम्पू करने के बाद गीले बालों को दूध से अच्छी तरह धोएं। दस मिनट तक प्रतीक्षा करें और अपने बालों को साफ पानी से धो लें। दूध से धोए बालों को धूप में सुखाएं। ड्रायर का उपयोग न करना ही बेहतर है।

2) एक कप दूध में एक अंडा मिलाएं और इस पैक को अपने बालों पर लगाएं और आधे घंटे तक प्रतीक्षा करें। इसके बाद स्नान करें.

3) आप एक कप दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर अपने बालों पर लगा सकते हैं. इसे 20-30 मिनट के लिए छोड़ दें और अपने बाल धो लें। हफ्ते में दो बार इस पैक का इस्तेमाल करने से झड़े हुए बाल वापस आ जाएंगे।

4) अगर बाल बहुत रूखे और बेजान हो जाएं तो एक कप दूध में केला निचोड़कर हेयर मास्क बनाएं। इस मिश्रण को बालों पर लगाकर 1 घंटे तक रखें। इसके बाद अपने बालों को धो लें. सप्ताह में दो दिन प्रयास करें. हालाँकि, यदि आप इस हेयर पैक का उपयोग करते हैं, तो अपने बालों को बहुत हल्के शैम्पू से धोएं। सल्फेट-मुक्त शैंपू सर्वोत्तम हैं।

पूजा के दिन सुबह-शाम कई लोग बाहर गये थे. हालाँकि सूरज की रोशनी में एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक टैगोर के दर्शन करना आनंददायक है, लेकिन त्वचा और बाल बारह बजे होते हैं। खासकर सिर पर पसीना और गंदगी जमा होने के कारण बाल रूखे और चिपचिपे हो जाते हैं। अगर आप पूजा के बाद खर्च उठाने के लिए सैलून नहीं जाना चाहते तो घर पर ही अपने बालों की देखभाल करें।

घर पर बालों की देखभाल कैसे करें?

1) रोजाना शैंपू करने से सिर की त्वचा का पीएच संतुलन बिगड़ सकता है। अगर आपको ज्यादा पसीना नहीं आता तो आप हर दूसरे दिन शैम्पू कर सकते हैं। नहीं तो हफ्ते में तीन दिन शैंपू करें। जरूरत पड़ने पर आप ड्राई शैम्पू का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

2) गर्मियों में स्ट्रेटनर, ड्रायर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल न करें तो बेहतर है। ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल से त्वचा अधिक तैलीय हो जाती है। डैंड्रफ भी बढ़ जाता है.

3) कई लोगों को पसीने के कारण बालों से बदबू आने लगती है। इसके बारे में पढ़ना भी असहज है. हेयर मिस्ट अपने पास रखें। यदि आवश्यक हो तो बालों पर स्प्रे करें।

5) 3-4 जबाफूल को पानी में उबाल लें. फिर उस पानी को छानकर एक बोतल में भर लें। आप जाबाफ्लॉवर के पानी का स्प्रे अपने बालों पर कर सकते हैं। आप इसे तेल के साथ भी मिला सकते हैं. हफ्ते में कम से कम दो बार इस्तेमाल करने से बालों का चिपचिपापन दूर हो जाएगा।

6) ब्राह्मी साग को सुखाकर पीस लें. इसे नारियल तेल, जैतून तेल, जोबार तेल जैसे वाहक तेल के साथ मिश्रित किया जाना चाहिए। बेहतर परिणाम पाने के लिए आप इसमें तुलसी, आमलकी या नीम पाटा मिला सकते हैं। पूरे मिश्रण को बालों पर अच्छे से लगाएं और एक घंटे के लिए छोड़ दें और फिर धो लें, इससे बालों की चमक वापस आ जाएगी।

सौंदर्य प्रसाधनों में एलोवेरा की भूमिका अद्वितीय है। घृतकुमारी किसी भी प्रतिष्ठित कंपनी के सौंदर्य प्रसाधनों को दो लक्ष्य देगी। त्वचा और बालों की देखभाल के लिए केवल एलोवेरा पर निर्भर रहने से लाभ मिलेगा। अलग से पार्लर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. एलोवेरा जितना त्वचा को टाइट रखने के लिए उपयोगी है उतना ही यह बालों को झड़ने से रोकने में भी बहुत कारगर है। एलोवेरा का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है। हालाँकि, एलोवेरा की सुंदरता के अलावा और भी कई भूमिकाएँ हैं। आप एलोवेरा का और कैसे उपयोग कर सकते हैं?

मेकअप हटाने के लिए

त्वचा मुलायम और नमी से भरपूर होती है। एक्सफोलिएट करते समय नरम और तरल पदार्थों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है, खासकर संवेदनशील त्वचा के लिए। ऐसे में एलोवेरा एक बेहतरीन विकल्प है। एलोवेरा जेल को कॉटन पैड पर लगाकर हल्के दबाव से अपने चेहरे पर लगाएं। मेकअप उतर जाएगा. त्वचा अंदर से मुलायम भी होगी. एलोवेरा का इस्तेमाल सिर्फ त्वचा को गोरा करने के लिए ही नहीं, बल्कि गुलाब की धूल हटाने के लिए भी इसी तरह किया जा सकता है।

शेविंग क्रीम के रूप में

एलोवेरा गाढ़ा और तैलीय होता है। एलोवेरा को शेविंग क्रीम के रूप में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन बेहतर होगा कि इसका इस्तेमाल सीधे तौर पर न किया जाए। शेविंग करते समय गर्म पानी, थोड़ा सा तेल और एलोवेरा जेल का मिश्रण इस्तेमाल किया जा सकता है। चूँकि यह सूजन को कम करने में भी बहुत प्रभावी है, इसलिए यह शेविंग के बाद होने वाली जलन को भी कम करता है।

दंत चिकित्सा देखभाल में

एलोवेरा जूस दांत और मसूड़ों के दर्द से राहत दिलाता है। अगर दांतों में कोई संक्रमण हो तो एलोवेरा के गुण उसे कम कर देते हैं। दांतों को मजबूत बनाने के लिए भी एलोवेरा बहुत अच्छा है। एलोवेरा जूस के नियमित सेवन से दांतों की सड़न को रोका जा सकता है।

शराब न पीने पर भी 5 आदतों के कारण शरीर में घर कर सकती है लिवर की बीमारी

कम तैलीय खाना खाना, घर में खाना पकाने की आदत डालना, शराब न पीना – ये लीवर को स्वस्थ रखने के कुछ तरीके हैं। यह बहुत ग़लत नहीं है. लेकिन ये आखिरी शब्द नहीं हैं. लिवर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ अन्य नियमों का भी पालन करना चाहिए। क्या पर? रहन-सहन में कई तरह की अनियमितताओं के कारण लिवर की बीमारी हर घर में आम है। ज्यादातर मामलों में कुछ बुरी आदतों और गलतियों के कारण लिवर की बीमारी शरीर में घर कर जाती है। बच्चों के मामले में भी अगर उनके माता-पिता शुरू से ही जागरूक रहेंगे तो बचपन से ही जीवनशैली पर नियंत्रण बन जाएगा। वयस्कों को भी लिवर को स्वस्थ रखने के तरीके सीखने चाहिए। कई लोगों के अनुसार, कम तैलीय खाना खाना, घर में खाना पकाने की आदत डालना, शराब न पीना-ये लीवर को स्वस्थ रखने के सबसे अच्छे तरीके हैं। यह बहुत ग़लत नहीं है. लेकिन ये आखिरी शब्द नहीं हैं. लिवर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ अन्य नियमों का भी पालन करना चाहिए। क्या पर?

चीनी का सेवन करें: कई लोग आसानी से वजन कम करने के लिए अपना खुद का डाइट प्लान बनाते हैं। चीनी से बचने के लिए कृत्रिम चीनी पर भरोसा करें। सबसे पहले इस रवैये से छुटकारा पाएं. यह वास्तव में शरीर को अत्यधिक नुकसान पहुंचा रहा है। अधिक चीनी खाने की आदत हमारे लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। फ्रुक्टोज या कृत्रिम चीनी यकृत रोग का कारण बनती है। अपने आहार में प्राकृतिक कार्बोहाइड्रेट शामिल करें।

ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थों से बचें: शरीर में कार्बोहाइड्रेट-प्रोटीन-वसा का उचित संतुलन बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है। हाल ही में घर के खाने की तुलना में रेस्तरां के खाने, बाहर के खाने, पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड के प्रति रुझान बढ़ा है। और इसके कारण शरीर में ट्रांस फैट का स्तर बढ़ रहा है। लिवर का दुश्मन है ट्रांस फैट. यह वसा लीवर के आसपास जमा हो जाती है। परिणामस्वरूप, इस अंग की कार्यक्षमता कम हो जाती है। इसलिए अपने आहार में ट्रांस फैट को सीमित मात्रा में रखें।

मुंह से दर्द निवारक दवाएं लेना बंद करें: कई दर्द निवारक दवाएं लीवर पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। टाइलेनॉल या कोलेस्ट्रॉल दवाएं भी लीवर को गंभीर क्षति पहुंचाती हैं। इसलिए बेहतर है कि आप स्वयं औषधि न लें। डॉक्टर की सलाह के बिना दर्द की दवा न लें। कई लोग नींद न आने पर बिना डॉक्टर की सलाह के नींद की गोलियां लेना शुरू कर देते हैं। यह आदत लीवर की गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है।

अपने शरीर को निर्जलित न करें: जितना अधिक विषाक्त पदार्थ आप बाहर निकालेंगे, आपका लीवर उतना ही स्वस्थ रहेगा। इसलिए अधिक पानी पियें। तभी शरीर के विषाक्त पदार्थ पेशाब के साथ बाहर निकलेंगे। दिन में कई बार गर्म पानी में नींबू का रस मिलाकर पियें। अपने आहार में खट्टा दही जैसे प्रोबायोटिक्स शामिल करें। छोटी-मोटी अनियमितताओं से निपटने में वे आपकी मदद हैं। आहार में इनकी मात्रा तभी बढ़ाएं जब तेल-मसालेदार भोजन का सेवन किया जाए।

तनाव से दूर रहें: अवसाद, चिंता शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्राव बढ़ा देते हैं। यह हार्मोन लीवर को नुकसान पहुंचाता है। बहुत से लोग तनाव या अवसाद को भूलने के लिए भोजन या शराब में राहत पाते हैं। जल्दी से इस आदत से बाहर निकलें. यदि आवश्यक हो तो ध्यान करें, मनोचिकित्सक से सलाह लें।

जीवनशैली में अनियमितता, खान-पान में बदलाव, रोज की भागदौड़ में शरीर पर ध्यान न देना, ज्यादा शराब पीना – अगर ये आधुनिक जीवन के साथी हैं तो नतीजा निश्चित तौर पर फैटी लीवर या लीवर सिरोसिस जैसी बीमारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में लीवर की बीमारियों से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

लिवर रोग के मरीजों में बढ़ोतरी से डॉक्टर भी चिंतित हैं। उनके मुताबिक लिवर की बीमारी ज्यादातर हमारी अपनी बुरी आदतों और गलतियों के कारण होती है। बच्चों के मामले में भी अगर उनके माता-पिता शुरू से ही जागरूक रहेंगे तो बचपन से ही जीवनशैली पर नियंत्रण बन जाएगा। वयस्कों को भी लिवर को स्वस्थ रखने के तरीके सीखने चाहिए।

बहुत से लोग सोचते हैं कि कम तैलीय खाना खाना, घर के खाने की आदत डालना और शराब छोड़ना लिवर को स्वस्थ रखने के तरीकों में से एक है। यह गलत नहीं है. लेकिन ये आखिरी शब्द नहीं हैं. लिवर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ अन्य नियमों का भी पालन करना चाहिए। क्या पर?

1. सप्लीमेंट्स: चाहे वजन कम करना हो या त्वचा पर बढ़ती उम्र को रोकना हो या किसी अन्य शारीरिक कारण से, कई लोग बिना डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ से सलाह लिए खुद ही सप्लीमेंट्स का चयन कर लेते हैं। ख़ूबसूरत होने की उम्मीद में हम अब जिगर को याद नहीं करते। इसलिए प्रोटीन या विटामिन सप्लीमेंट का सेवन करते समय सावधान रहें।

2. दर्द निवारक: कई दर्द निवारक दवाएं लीवर पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। इसलिए, यदि आपको सिरदर्द या मासिक धर्म में दर्द हो, तो डॉक्टर की सलाह के बिना मुट्ठी भर दर्द निवारक दवाएं लेना बंद कर दें।

3. कम वसा, कृत्रिम चीनी से बचें: बहुत से लोग जो आसानी से अपना वजन कम करना चाहते हैं वे अपना आहार स्वयं बनाते हैं और सोचते हैं कि वसा को रोकने के लिए उन्हें डिब्बाबंद कम वसा वाले खाद्य पदार्थों और चीनी से बचने के लिए कृत्रिम चीनी पर निर्भर रहना चाहिए। सबसे पहले इस रवैये से छुटकारा पाएं. यह वास्तव में शरीर को अत्यधिक नुकसान पहुंचा रहा है। न केवल वह पतले होते जा रहे हैं, बल्कि उनका लीवर भी ख़त्म हो रहा है। यदि आप अपने लीवर को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो ट्रांस वसा, तले हुए खाद्य पदार्थ, पैकेज्ड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से दूर रहें।
4. विषाक्त पदार्थ: शरीर से जितने अधिक विषाक्त पदार्थ बाहर निकलेंगे, लिवर उतना ही स्वस्थ रहेगा। दिन में कई बार गर्म पानी में नींबू का रस मिलाकर पियें। अपने आहार में खट्टा दही जैसे प्रोबायोटिक्स शामिल करें। छोटी-मोटी अनियमितताओं से निपटने में वे आपकी मदद हैं। यदि किसी दिन भारी भोजन किया जाए तो ही आहार में उनकी उपस्थिति बढ़ाएं।

5. शराब पीना: थोड़ी या महंगी शराब पीना ठीक है – यह खुद को आराम देने के अलावा और कुछ नहीं है। केवल पसंद करने, पसंद करने, लत से दूर न जाने की चाहत के लिए एक स्व-निर्मित सर्वनाश। इसलिए जितनी जल्दी हो सके आप शराब पीने की आदत छोड़ दें। प्रतिदिन कम मात्रा में शराब पीने से भी लीवर को कुछ नुकसान होता है। लीवर में विषाक्त पदार्थों का जमा होना, शरीर को अंदर से सुखाना

चाय के बागान, पहाड़ उत्तर में ही देखने लायक नहीं हैं, आप दक्षिण भारत के रॉक टाउन में भी जा सकते हैं

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पर्वतों का मतलब केवल हिमालय नहीं है। दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट हैं। आप यहां 5 लोकप्रिय पर्यटन केंद्रों की यात्रा कर सकते हैं। जब हम पहाड़ों पर जाने के बारे में सोचते हैं तो कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश दिमाग में आते हैं। ऊँचे-ऊँचे पहाड़, बर्फ़ से ढकी चोटियाँ की छवियाँ मन में तैरने लगीं।

परन्तु पर्वतों की निकटता केवल उत्तर में ही पाई जाती है? यदि हिमालय जैसे ऊंचे पहाड़ नहीं हैं, तो भारत के दक्षिणी राज्यों में चट्टानी शहर भी हैं। यहां पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट की सुंदरता का आनंद लिया जा सकता है। पहाड़, चाय के बागान, नदियाँ, हरियाली से वे जगहें भी कम खूबसूरत नहीं हैं। अगर आप दक्षिण भारत घूमने का प्लान बना रहे हैं तो इन 5 जगहों पर जा सकते हैं।

ऊटी

जब आप ऊटी के बारे में सोचते हैं तो एक पहाड़ी शहर की छवि दिमाग में आती है। कुछ कुछ होता है, राज, दीवाना, बर्फी, अजब प्रेम की गजब कहानी सहित कई बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग तमिलनाडु के इस चट्टानी शहर में की गई है। नीलगिरि जिले में, नीलगिरि पहाड़ियों की तलहटी में बसा यह रॉक टाउन दक्षिण भारत में एक बहुत लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। यहां साल भर पर्यटक आ सकते हैं। यहां का मौसम भी काफी आरामदायक है. ऊटी में एक बहुत ही खूबसूरत झील है। इसके अलावा यहां से डोडाबेटा पीक, रोज़ गार्डन, बॉटनिकल गार्डन, पैकारा झील, कुन्नूर भी देखा जा सकता है। यहां तीन-चार दिन रहने के बाद आसपास का इलाका अच्छी तरह से चकाचक हो जाएगा। आप ऊटी से कुन्नूर तक टॉय ट्रेन पकड़ सकते हैं। ऊटी जाएं तो यहां की कॉफी और चॉकलेट का स्वाद लेना न भूलें।

कोडईकनाल

तमिलनाडु में एक और लोकप्रिय पर्यटन स्थल कोडईकनाल है। पश्चिमी घाट की पलानी पहाड़ियों की खूबसूरती का आनंद लेने के लिए आप खूबसूरत शहर चुन सकते हैं। 2285 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कोडाइकनाल झील यहां के आकर्षणों में से एक है। कृत्रिम झील में नाव द्वारा तैराया जा सकता है। यहां से मन्नावानूर झील, गुना गुफा, डोलीफॉन नोज समेत कई जगहें देखी जा सकती हैं।

कूर्ग

कूर्ग को उसकी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भारत का स्कॉटलैंड कहा जाता है। यह कर्नाटक का लोकप्रिय पहाड़ी शहर है। पहाड़ियों, चाय के बागानों और झरनों से घिरे कूर्ग को देखने के लिए साल भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। आप मदिकेरी किला, एबी फॉल्स, इरुपु फॉल्स, होन्नमाना केरे झील, मल्लाली फॉल्स की यात्रा कर सकते हैं।

वेनार्ड

केरल का वेनार्ड भी धीरे-धीरे पर्यटन स्थल के रूप में लोकप्रिय होता जा रहा है। यहां आने पर पहाड़, जलाशय, गुफाएं, झरने – ये सब एक साथ ही देखा जा सकता है। आप बाणासुर सागर, एडक्कल गुफाएं, चेम्बरा पीक, सेंटिनल रॉक वॉटर फॉल्स और आसपास के कई अन्य स्थानों की यात्रा कर सकते हैं।

मुन्नार

केरल का एक और लोकप्रिय रॉक टाउन मुन्नार है। 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पर्यटन केंद्र में साल भर हल्की सर्दियां रहती हैं। लहरदार हरी चाय के बागान, मसालों के बागान, घने जंगल, कल-कल करते झरने, झीलें, पहाड़ी नदियाँ – ये सभी मुन्नार को अद्वितीय बनाते हैं। मुन्नार पहुंचने से 46 किमी पहले रास्ते में भालारा फॉल्स पड़ता है। मुन्नार को अच्छे से देखने में दो दिन लग जाते हैं। 13 किमी दूर मट्टुपेट्टी जलाशय भी खूबसूरत है। आप लहरदार पन्ना-हरे पानी में नाव के साथ तैर सकते हैं। आप चाय फैक्ट्री का दौरा कर सकते हैं। यहां आकर स्थानीय चॉकलेट का स्वाद लेना न भूलें।

घर को सजाने के लिए लगाएं रबर, स्नेक प्लांट, पोथोस, क्या आप जानते हैं कितने साल तक जीवित रहते हैं पौधे?
यदि उचित देखभाल की जाए तो घरेलू पौधे भी लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। मॉन्स्टेरा, स्लेकप्लेट समेत कई पौधे 50 साल तक जीवित रह सकते हैं।

घर में कितनी भी महंगी और फैंसी चीजें क्यों न रखी हों, इंटीरियर डेकोरेशन में पौधों का कोई विकल्प नहीं है। ऐसे कई पौधे हैं जो कम रोशनी की स्थिति के अनुकूल हो सकते हैं। ऐसे पौधों का उपयोग मुख्य रूप से घर की सुंदरता के लिए किया जाता है।

क्या आप जानते हैं, इनमें से कुछ घरेलू पौधे 50 साल तक जीवित रह सकते हैं? उचित देखभाल से वे भी आपके घर के बूढ़े सदस्य बन सकते हैं। जानिए इस लिस्ट में 5 पेड़ों के नाम.

मॉन्स्टेरा

चमकीले, बड़े पत्तों वाला यह पौधा आंतरिक साज-सज्जा में बहुत लोकप्रिय है। उचित देखभाल से यह पेड़ कम से कम 50 वर्षों तक जीवित रह सकता है। पौधे को बढ़ने के लिए ज्यादा रोशनी और हवा की जरूरत नहीं होती है। लेकिन अगर सभी बढ़ती परिस्थितियाँ सही रहें, तो मॉन्स्टेरा आपके घर का लंबे समय तक सदस्य बन सकता है।

साँप का पौधा

लंबी, कड़ी, नुकीली पत्तियाँ कुछ-कुछ साँप जैसी दिखती हैं। हरे के साथ-साथ पीले रंग का स्पर्श भी है। कम रोशनी और हवा में उगने वाले स्नेक प्लांट का जीवन लगभग 70 वर्ष है।

मकड़ी का पौधा

संकरी और लंबी पत्तियों वाले इस पौधे का उपयोग आंतरिक सजावट में भी किया जाता है। मकड़ी के पौधों को बढ़ने के लिए समय-समय पर पानी और हल्की धूप की आवश्यकता होती है। अगर सही तरीके से रखा जाए तो यह पेड़ 50 साल तक जीवित रह सकता है।

जेड प्लांट

छोटे पत्तेदार पौधे का उपयोग टेबल की सजावट में किया जाता है। घर के आसपास रखने पर यह अच्छा लगता है। इस पेड़ की उम्र भी कम नहीं होती. अगर ठीक से रखा जाए तो जैज़ का पौधा लंबे समय तक जीवित रह सकता है।

पोथोस

हरे रंग में पीले रंग का छींटा। पेड़ की पत्तियां पान के पत्ते की तरह दिखती हैं। अगर ठीक से देखभाल की जाए तो यह पौधा आपके घर में आधी सदी भी लगा सकता है।

वर्ल्ड कप में बुरी तरह हार गई छह बार की चैंपियन ऑस्ट्रेलियाl

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फाइनल में दक्षिण अफ्रीकी लड़कियों ने 8 विकेट से जीती जीत दक्षिण अफ्रीका की महिला टीम ने छह बार की टी20 वर्ल्ड कप विजेता ऑस्ट्रेलिया को हराया. वे फाइनल में पहुंचे. साउथ अफ़्रीकी लड़कियों ने ऑस्ट्रेलिया को 8 विकेट से हराया. महिला क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया का दबदबा लंबे समय से बना हुआ है. उन्होंने आठ में से छह टी20 विश्व कप जीते हैं। ऑस्ट्रेलिया महिला टीम ने पिछले तीन बार टी20 वर्ल्ड कप जीता है. सेमीफाइनल में साउथ अफ्रीका ने ऑस्ट्रेलिया को 8 विकेट से हरा दिया. फाइनल तक पहुंच गया. लड़कों के बाद दक्षिण अफ्रीकी लड़कियां भी टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल में हैं.

सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी की. बेथ मूनी, ताहलिया मैकग्राथ, एलिस पेरी के साथ ऑस्ट्रेलिया का बल्लेबाजी विभाग 134 रन से अधिक नहीं बना सका। दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाज़ों ने सिर्फ़ 5 विकेट लिए लेकिन ज़्यादा रन नहीं दिए. मेरिजेन कप, अयाबंगा खाकरा ने मुनियों को कभी आक्रामक नहीं होने दिया। नतीजा यह हुआ कि विकेट हाथ में रहते हुए भी ऑस्ट्रेलिया ज्यादा रन नहीं बना सका.

लक्ष्य था 135 रन. 20 ओवरों में जो बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन अगर प्रतिद्वंद्वी ऑस्ट्रेलिया है, तो परीक्षण की संभावना है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका की सलामी बल्लेबाज लौरा वूलवर्थ (42) और नंबर तीन एनेके बोस्क (74 रन पर नाबाद) ने मिलकर चीजें आसान कर दीं। दक्षिण अफ्रीका ने 16 गेंद शेष रहते मैच जीत लिया। मैच शुरू होने से पहले यह अनुमान नहीं था कि सेमीफाइनल में दक्षिण अफ्रीका ऑस्ट्रेलिया को हरा देगा। ऑस्ट्रेलिया ने 2018 से लगातार तीन महिला टी20 विश्व कप जीते हैं। दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटरों को मैदान पर उन्हें खोने की खुशी जाहिर करते देखा जा सकता है. मैन ऑफ द मैच बोस्क ने मेगन स्कूटर की गेंद पर चौका मारकर मैच जीत लिया। जैसे ही उनकी डेड बॉल बाउंड्री के पार गई, बाकी दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटरों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया. समर्थकों में भी उत्साह देखा जा रहा है. उधर, ऑस्ट्रेलिया के कोच, क्रिकेटर निराश हैं। वे दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हार के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

वेस्टइंडीज मंगलवार रात इंग्लैंड को हराकर महिला टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंच गया. इसके साथ ही वर्ल्ड कप की आखिरी चार टीमें फाइनल हो गई हैं. इंग्लैंड हार गया और बाहर हो गया। सेमीफाइनल का कार्यक्रम भी तय हो गया है.

ग्रुप ए से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सेमीफाइनल में पहुंच गए हैं। दक्षिण अफ्रीका ने ग्रुप बी से वेस्टइंडीज के साथ अंतिम चार के लिए क्वालीफाई किया। दो ग्रुपों की शेष छह टीमें प्रतियोगिता से बाहर हो गई हैं।

ऑस्ट्रेलिया रिकॉर्ड सातवीं बार टी20 विश्व कप जीतने की ओर अग्रसर है। वे सेमीफाइनल में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेलेंगे. यह मैच 17 अक्टूबर को दुबई स्टेडियम में होगा। अगले दिन वेस्टइंडीज दूसरे सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेलेगी. वह मैच शारजाह में होगा. फाइनल 20 अक्टूबर को. वह मैच दुबई में होगा. विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया ने चार ग्रुप मैचों में से चार जीते। पिछले मैच में भारत को हराकर हरमनप्रीत कौर का सपना टूट गया. दूसरे स्थान पर मौजूद टीम न्यूजीलैंड ने चार में से तीन मैच जीते हैं। ग्रुप बी में वेस्टइंडीज और दक्षिण अफ्रीका ने चार-चार मैचों में से तीन-तीन मैच जीते हैं। लेकिन रन रेट के मामले में वेस्टइंडीज टॉप पर है.

बांग्लादेश के बाद भारत न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट खेलने में व्यस्त है. पहला टेस्ट बेंगलुरु में चल रहा है. इस बीच सौरव गांगुली को ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका दौरे की याद आ रही है. साल के अंत में भारत दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया का दौरा करेगा. सौरव को लगता है कि यह दौरा आसान नहीं होगा.

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान को पता है कि टीम में संतुलन होना कितना जरूरी है. सौरव को लगता है कि रोहित शर्मा की भारतीय टीम में वह संतुलन है। उन्होंने कहा, ”भारतीय टीम में युवा क्रिकेटरों के साथ-साथ सीनियर भी हैं. एक अच्छी टीम बनाने के लिए सीनियर और जूनियर क्रिकेटरों का यह संतुलन जरूरी है। तभी सर्वश्रेष्ठ टीमें बनती हैं। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका का दौरा भारत के लिए कठिन होगा. लेकिन अच्छा क्रिकेट भी देखने को मिलेगा.”

सौरभ युवाओं पर भरोसा कर रहे हैं. अपनी कप्तानी के दौरान वह वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, जहीर खान, हरभजन सिंह, महेंद्र सिंह धोनी जैसे युवा क्रिकेटरों को लेकर आए। सौरव ने कहा, ”भारतीय टीम में अच्छे क्रिकेटर हैं. उन्होंने अभी बांग्लादेश के खिलाफ टी20 जीता है. युवाओं की जीत हुई है।”

आखिर क्या है भारत का सबसे बड़ा हथियार एक्वा बम?

आज हम आपको भारत के सबसे बड़े हथियार एक्वा बम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! बता दे कि बम और गोलाबारी से कोई भी सेना किसी जमीन को इतनी तबाह नहीं कर सकती जितनी पाकिस्तान के खेतों ओर लोगों को हरा-भरा रखने वाले पानी के सोर्स को भारत स्थायी रूप से बंद करके तबाह कर सकता है। अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख रहे डेविड लिलिएनथल ने यह बात 60 के दशक में कही थी। इसके कुछ समय बाद ही भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तानाशाह फील्ड मार्शल जनरल अयूब खान कराची में 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल समझौते की खातिर एक मेज पर आए थे। माना जाता है कि भारत ने आजादी के वक्त से 13 साल तक पाकिस्तान के साथ कुछ न कुछ विवाद में उलझा रहा था। तब नेहरू ने पानी देने के बदले स्थायी शांति की वकालत की थी। मगर, उनकी यह सोच बाद के बरसों में कितनी बड़ी भूल साबित हुई। कई विशेषज्ञों ने इसे एकतरफा समझौता करने की नेहरू की चूक करार दिया था। हाल ही में भारत ने एक बार फिर इस समझौते की समीक्षा किए जाने की मांग पाकिस्तान से की है। जानते हैं सिंधु जल संधि विवाद की जड़ें कहां हैं और क्या वाकई में नेहरू ने कोई गलती की थी। क्या है इसके पीछे की कहानी, जानते हैं।

चाइनाज वॉर क्लाउड्स’ किताब के लेखक और डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी के अनुसार, यह संधि एक तरह से भारत के लिए ‘एक्वा बम’ है जो वास्तव में पाकिस्तान के खिलाफ भारत का सबसे शक्तिशाली हथियार है। भारत सिंधु बेसिन में बहने वाली सात नदियों के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है। मगर, भारत ने बस एक बार इस ताकत को आजमाया था, जिससे पाकिस्तान घुटनों के बल आ गया था। हालांकि, वो कदम बेहद मामूली था। अमेरिका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के ऐरॉन वुल्फ और जोशुआ न्यूटन अपनी एक केस स्टडी में बताते हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल बंटवारे का विवाद 1947 में बंटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था। उस वक्त पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच यह झगड़ा काफी चल रहा था।

1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियर मिले और उन्होंने पाकिस्तान की तरफ जाने वाली दो प्रमुख नहरों पर एक ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार पाकिस्तान को लगातार पानी मिलता रहा। ये समझौता 31 मार्च 1948 तक ही लागू हो पाया। 1 अप्रैल को इस समझौते के खात्मे के साथ भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ जमीन सूखने लगी। भारतीय पंजाब में इंजीनियरों ने फिरोजपुर हेडवर्क्स से देपालपुर नहर और लाहौर तक पानी की आपूर्ति बंद कर दी। मंडी जलविद्युत योजना से बिजली की आपूर्ति भी काट दी गई। पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर में पानी बांटा जाने लगा।

दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. देवनाथ पाठक के अनुसार, उस वक्त भारत के इस कदम के पीछे कई कारण बताए गए, जिसमें एक यह था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था। हालांकि बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राजी हो गया। 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलिएनथल भारत आए। वो पाकिस्तान भी गए। जब लौटकर वह अमेरिका पहुंचे तो उन्होंने सिंधु नदी के बंटवारे पर एक लेख लिखा।

डेविड का वो लेख उनके दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा, जो उस वक्त विश्व बैंक के तत्कालीन प्रमुख थे। ब्लैक ने तब सिंधु जल बंटवारे के लिए भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से संपर्क किया। इसी के बाद से दोनों देशों के बीच में इसे लेकर कई दौर की बातचीत शुरू हो गई। आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए। संधि पर नेहरू और अयूब खान ने दस्तखत किए। 1960 में दोनों देशों के बीच हुए सिंधु जल समझौते में छह नदियों ब्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी के वितरण और इस्तेमाल करने के अधिकार शामिल हैं। इस संधि के तहत ‘तीन पूर्वी नदियों’ ब्यास, रावी और सतलुज के पानी का इस्तेमाल भारत बिना किसी बाधा के कर सकता है। वहीं तीन ‘पश्चिमी नदियां’ सिंधु, चिनाब और झेलम का पानी का मालिकाना हक पाकिस्तान को दे दिया गया। हालांकि, भारत इन पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल अपने घरेलू कामों, सिंचाई और पनबिजली के लिए कर सकता है। संधि पर अमल के लिए सिंधु आयोग बना, जिसमें दोनों देशों के कमिश्नर हैं। वे हर साल मिलते हैं और विवाद निपटाते हैं।

पाकिस्तान के लेखक मोइन अंसारी की किताब ‘इंडियाज एक्वा बम’ के अनुसार, 90 प्रतिशत सिंचित भूमि होने के बाद भी पाकिस्तान को महज 80 प्रतिशत पानी ही क्यों दिया गया। यह बड़ा नुकसान है। वहीं, इस मसले पर ब्रिटेन और अमेरिका ने पाकिस्तान का मूक समर्थन किया था। दरअसल, पाकिस्तान को ब्रिटेन और अमेरिका ने रूस के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में तैयार किया था। ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिससे वे इसे विफल होने देते। वहीं पानी पर वैश्विक झगड़ों पर किताब लिख चुके ब्रह्म चेलानी ने एक बार लिखा था, भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के अंतर्गत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ कर रहा है। अंततराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

सिंधु नदी का इलाका करीब 11.2 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। ये इलाका पाकिस्तान 47 प्रतिशत, भारत 39 प्रतिशत, चीन 8 प्रतिशत और अफगानिस्तान 6 प्रतिशत में है। एक आंकड़े के मुताबिक करीब 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आसपास के इलाकों में रहते हैं। ऐसे में यह पानी इन देशों के लिए बेहद अहम है।

 

क्या जानवर की काटने के बाद लगवाना चाहिए रेबीज का टीका?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जानवर की काटने के बाद रेबीज का टीका लगवाना चाहिए या नहीं! इंसान का सबसे पहला कोई वफादार पालतू पशु साथी रहा है तो वो है कुत्ता। ऐतिहासिक साक्ष्य तो यही कहते हैं, जब 30 हजार साल से ज्यादा वक्त से कुत्ते हम इंसानों के साथ रह रहे हैं। यह 10 हजार साल पहले घोड़े को पालतू बनाए जाने से भी ज्यादा पुराना है। भारत के पौराणिक कथाओं में तो महाभारत काल में कुत्ता ही पांडव युधिष्ठिर के साथ सशरीर स्वर्ग जा पाया था। बाकी पांडवों को रास्ते में ही मरना पड़ा था। अब यही कुत्ता हम इंसानों को काट रहा है। यह इतना काट रहा है कि पूरी दुनिया में हर साल कुत्तों के काटने के 10 करोड़ मामले सामने आ रहे हैं। अकेले अमेरिका में कुत्तों के काटने के करीब 1 करोड़ केस सामने आते हैं। भारत में भी करीब 28 लाख ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। ये हालात दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। एक उद्योगपति को भी कुत्ते के काटने से जान गंवानी पड़ी है। आइए-समझते हैं कि कुत्तों के काटने के मामले लगातार क्यों बढ़ रहे हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? कितना घातक है कुत्तों का काटना? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एसोएिशन फॉर द प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ रेबीज इन इंडिया (APCRI) के आंकड़ों के अनुसार, भारत कुत्तों के काटने से होने वाली मौतों के मामले में रेबीज कैपिटल है। कुत्तों के काटने से होने वाली पूरी दुनिया में होने वाली मौतों का 36 फीसदी मौत भारत में ही हो जाती हैं।

भारत में 2021 से कुत्ते काटने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। बीते तीन साल में यह करीब तीन गुना बढ़ चुका है। 2022 से 2023 के बीच कुत्ते के काटने के केस 21.8 लाख से बढ़कर 27.5 लाख हो चुके हैं। 2018 में कुत्तों ने सबसे ज्यादा 75 लाख लोगों को काटा था। वहीं, अमेरिका में हर साल करीब 45 लाख लोगों को कुत्ते काट लेते हैं। बीते साल वाघ बकरी के मालिक पराग देसाई की कुत्ते के काटने से मौत हो गई थी। बताया जा रहा था कि सुबह-सुबह वो मॉर्निंग वॉक पर निकले थे, जब कुछ अवारा कुत्तों ने उन पर हमला कर दिया। हमले के बाद उनका अस्पताल में इलाज चल रहा था, मगर उन्हें बचाया नहीं जा सका। उस वक्त कई रिपोर्ट्स में यह कहा गया कि पराग देसाई को कुत्ते के काटने के बाद ब्रेन हेमरेज हो गया, जिससे मस्तिष्क में ब्लीडिंग हो गई। PubMed की एक रिपोर्ट बताती है कि कुत्ता काटने के बाद अगर रेबीज वायरस फैल जाता है तो ये ब्रेन डैमेज का कारण बन सकता है।

यूरोप में एक देश है चेकोस्लोवाकिया, जिसे अब चेक रिपब्लिक कहते हैं। यहां के प्रेडमोस्टी साइट पर मुंह में हड्डी लिए एक कुत्ता दफन है। माना जाता है कि यह कुत्ता 32 हजार साल पुराना है। वहीं, जर्मनी में ओबेर कैसेल में एक महिला और पुरुष के बीच में कुत्ते का दफनाया गया है। रेडियो कार्बन डेटिंग में इस कुत्ते को 14,300 साला पुराना माना गया है। 6 हजार साल पहले मिस्र की अनुबिस सभ्यता, मध्य अमेरिका की माया सभ्यता और यूनान की सरबेरस सभ्यता में इंसान के साथ कुत्तों के रहने के साक्ष्य मिले हैं। चेक गणराज्य में कुत्ते के इंसान के साथ दफनाए जाने के साक्ष्य भी मिल चुके हैं।

रेबीज का इतिहास कम से कम 4,000 साल पुराना है, जब यह हकीकत लोगों को पता चली कि कुत्ते के काटने से मौत हो सकती है। प्राचीन इराक में तो कुत्तों के काटने पर जुर्माना भरने तक के नियम बनाए गए थे। मौजूदा वक्त में 99 फीसदी रेबीज के मामले अफ्रीका और एशिया में हैं। यह लैटिन अमेरिकी देशों से गायब ही हो चुके हैं, जहां साल भर में करीब 20 ही रेबीज के मामले सामने आते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार, कुत्ते सबसे ज्यादा बच्चों को काटते हैं, जो उनके लिए आसान शिकार हैं। अमेरिका में करीब 50 फीसदी बच्चों को कुत्ते कभी न कभी जरूर काट लेते हैं। 12 साल की उम्र तक के बच्चे इसके ज्यादा शिकार होते हैं। वहीं, दूसरे नंबर पर बुजुर्गों को कुत्ते काट खाते हैं। ऐसे में बच्चों या बुजुर्गों को कुत्तों से बचाना बेहद जरूरी है, क्योंकि इन दोनों ही उम्र वालों में इम्यून सिस्टम युवाओं जितना ताकतवर नहीं होता है।

नेशनल रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम गाइडलाइंस के अनुसार कुत्ते का काटना 100 फीसदी घातक है। अगर पीड़‍ित को सही समय पर ट्रीटमेंट नहीं मिलता है तो उसकी मौत होनी तय है। ऐसी लापरवाही कतई न करें। कुत्ते के काटने पर खून संक्रमित हो जाता है और खून जहरीला होने लगता है। बहुत से लोग इस जहर को कम करने के लिए घाव पर नमक, हल्‍दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, नींबू, खड़‍िया या मिट्टी लगाने लगते हैं। कुछ लोग पीपल के पत्ते भी घाव पर लगाते हैं। मगर, ऐसी कोई भी चीज मरीज की जान नहीं बचा सकती है। साथ ही झाड़-फूंक भी काम नहीं आती है। इस तरह की किसी भी सलाह को बिल्‍कुल न मानें और हर हाल में रेबीज का टीका समय से लगवाएं।

 

क्या भारत ने ढूंढ लिया है अंधेपन का इलाज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत ने अंधेपन का इलाज ढूंढ लिया है या नहीं! ट्रैकोमा, भारत में इसका नाम सुनते ही कई लोग दहशत के साए में जीने लगते थे। कारण है कि यह एक संक्रामिक बीमारी जिसका अगर तय समय पर उपचार न किया जाए तो यह अंधा भी कर सकती है। कहते हैं न कि बुरे वक्त की एक अच्छी बात यह होती है कि वह भी गुजर जाता है। देश में ट्रैकोमा बीमारी भी किसी बुरे वक्त की तरह चली गई। अंधेपन का कारण बनने वाली इस बीमारी से देश ने 7 साल पहले जंग जीत ली थी, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO को इसे कबूल करने में 7 साल लग गए। इसके साथ, भारत चीन, नेपाल, पाकिस्तान और म्यांमार सहित 19 अन्य देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने इस बीमारी को समाप्त कर दिया है। बीमारी उन्मूलन का अर्थ किसी विशिष्ट क्षेत्र या देश में किसी बीमारी को फैलने से रोकना है, लेकिन विश्व स्तर पर नहीं। बीमारी को भगाने के बाद, होने वाले किसी भी मामले को उस क्षेत्र या जनसंख्या के बाहर से आया हुआ माना जाता है। यह उन्मूलन के समान नहीं है, जो एक बीमारी को दुनिया भर में समाप्त करने को संदर्भित करता है। हां कुछ प्रयोगशालाओं में कुछ शीशियों को छोड़कर।

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एक बीमारी को तब समाप्त किया जाता है जब यह किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं रहती है। किसी बीमारी को समाप्त करने के लिए प्रमाणित होने के लिए, देशों को WHO के निर्धारित मापनीय लक्ष्यों को पूरा करना होगा। लक्ष्यों को पूरा करने के बाद, देशों को उन्मूलन बनाए रखने या आगे संक्रमण को बाधित करने के लिए कार्रवाई जारी रखनी चाहिए क्योंकि एक खत्म हो चुकी बीमारी हमेशा वापस आ सकती है।ट्रैकोमा के समाप्ति की WHO की परिभाषा को पूरा करने के लिए, ट्रैकोमा ट्रिचियासिस की घटना को देखना होगा। यह एक स्थिति है जो पलकों को रगड़ने के कारण होती है, जिससे निशान बन जाता है। यह 15 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों में 0.2% से कम होना चाहिए। इसके अलावा, 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में ट्रैकोमेटस सूजन की घटना 5% से कम होनी चाहिए।

ट्रैकोमा क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस बैक्टीरिया के कारण होता है। यह संक्रामक है और संक्रमित लोगों के आंखों, पलकों और नाक या गले के स्राव के संपर्क में आने से फैलता है। इसे संक्रमित वस्तुओं जैसे रूमाल को संभालकर भी पास किया जा सकता है। भीड़भाड़ वाली परिस्थितियों में रहने वाले लोग जिनके पानी की पर्याप्त पहुंच के कारण गंदे चेहरे और हाथ हो जाते हैं, उन्हें इस बीमारी से ज्यादा खतरा है।

जहां यह सक्रिय है, वहां बच्चों के संक्रिमत होने का खतरा ज्यादा होता है। महिलाएं भी संवेदनशील होती हैं, क्योंकि उनके पास चाइल्डकेयर की मुख्य जिम्मेदारी होती है। लक्षणों में आंखों और पलकों में हल्की खुजली और जलन, सूजन पलकें और आंखों से मवाद निकलना, आंखों में दर्द आदि शामिल हैं। बार-बार संक्रमण से नेत्रश्लेष्मला की सूजन और निशान हो सकता है, जिससे पलकें अंदर की ओर मुड़ जाती हैं और पलकें आंख के गोले के खिलाफ रगड़ती हैं। इससे कॉर्निया अंधा हो सकता है, जिससे अंधापन हो सकता है।

मोतियाबिंद न तो संक्रामक रोग है और न ही बैक्टीरिया, वायरस, कवक या परजीवी के कारण होता है। लेकिन ट्रैकोमा दुनिया में अंधेपन का प्रमुख संक्रामक कारण है, और यह दुनिया के सबसे गरीब हिस्सों में अधिकतर होता है। इसका इलाज न होने और बार-बार संक्रमण से दृष्टि दोष और अंधापन हो सकता है। भारत ने 1976 में नेशनल प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस (NPCB) को एक केंद्र-प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में लॉन्च किया था। यह ऐसा करने वाला पहला देश था। 1959-1963 के आंकड़ों से पता चला कि छह मौजूदा राज्यों में 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में सक्रिय ट्रैकोमा का प्रसार 50% से अधिक था: पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी, उत्तराखंड और गुजरात।

राष्ट्रीय ट्रैकोमा नियंत्रण कार्यक्रम 1963 में शुरू किया गया था और बाद में इसे एनपीसीबी में शामिल किया गया था। भारत में अंधेपन पर WHO के 1986-89 के सर्वेक्षण से पता चला कि इन राज्यों में ट्रैकोमा का प्रसार 10% से कम था। 2006 में उन्हीं छह राज्यों में किए गए त्वरित आकलनों से पता चला कि 10% से कम बच्चों में सक्रिय ट्रैकोमा था, जबकि इस बीमारी से पीड़ित वयस्कों का अनुपात 0.03% से 0.5% के बीच था। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला गया कि ट्रैकोमा एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई थी, भले ही सभी छह में मामले पाए गए थे, जो मुख्य रूप से कुछ जिलों – बीकानेर (राजस्थान) और पौड़ी (उत्तराखंड) में केंद्रित थे। 2010 में कार निकोबार द्वीप पर किए गए एक ट्रैकोमा त्वरित आकलन से पता चला कि 51% बच्चों में सक्रिय ट्रैकोमा था, जिसका समाधान अगले तीन वर्षों में एज़िथ्रोमाइसिन के बड़े पैमाने पर प्रशासन द्वारा किया गया। इससे प्रसार घटकर 6.8% हो गया। WHO के अनुसार, 2005 में भारत में अंधेपन के सभी मामलों में से 4% के लिए ट्रैकोमा जिम्मेदार था। 2018 तक, प्रसार घटकर 0.008% हो गया था।

राष्ट्रीय ट्रैकोमेटस ट्रिचियासिस (TT) सर्वेक्षण भी 2021-24 के दौरान अंधता और दृष्टि दोष के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत 200 स्थानिक जिलों में किया गया था, जो एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में ट्रैकोमा को समाप्त करने के लिए भारत को प्रमाणित करने के लिए WHO के आदेश के हिस्से के रूप में किया गया था। अपने देश कार्यालय द्वारा जांच के बाद, WHO ने अंततः घोषणा की कि भारत ने एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में ट्रैकोमा को समाप्त कर दिया है। इसने कहा कि देश ने WHO के दिशानिर्देशों के आधार पर एक पोस्ट-वैलिडेशन निगरानी योजना भी विकसित की है, जो निरंतर उन्मूलन प्रयासों के लिए है।