Thursday, March 19, 2026
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क्या ईरान और इजराइल का युद्ध दुनिया में एक बड़ा परिवर्तन ला सकता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इसराइल और ईरान का युद्ध दुनिया में बड़ा परिवर्तन ला सकता है या नहीं! पिछले साल 7 अक्टूबर को हमास की ओर से इजरायली नागरिकों पर किए गए आतंकी हमले के बाद दुनिया भर में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। जहां एक तरफ इस आतंकवाद की निंदा हुई और इजरायल से संयम बरतने की अपील की गई। वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में फिलिस्तीन समर्थक संगठनों ने सड़कों और यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रदर्शन किए। इन प्रदर्शनों में फिलिस्तीनी झंडों की भरमार देखने को मिली, जिसका मकसद हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों से ध्यान हटाना और दुनिया को फिलिस्तीनियों के साथ हो रहे अन्याय की याद दिलाना था। हमास द्वारा इजरायली नागरिकों पर किए गए हमले के बाद दुनिया भर में फिलिस्तीन के समर्थन में जो माहौल बना, उसका पूरा असर अभी आंकना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तो तय है कि इसने पश्चिमी देशों में मुस्लिम पहचान को मजबूत किया है और वामपंथी विचारधारा वाले छात्रों को अपनी ओर आकर्षित किया है। हालांकि, यह उतना बड़ा आंदोलन नहीं बन पाया जितना कि वियतनाम युद्ध या दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आंदोलन था।

यह बात भी गौर करने लायक है कि लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई पर दुनिया भर में उतना आक्रोश देखने को नहीं मिला। इतना जरूर है कि युद्धविराम की अपील और इजराइल से संयम बरतने की मांग उठी। लेकिन इस बार वह गुस्सा गायब था जो कुछ महीने पहले देखने को मिला था। जब यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि इजरायल अंदर से टूट रहा है और बेंजामिन नेतन्याहू का राजनीतिक करियर खतरे में है। यह भी कहा गया कि अमेरिकी नेता इजरायल से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि कोई भी इस बात को खुलकर नहीं कहेगा, लेकिन लेबनान में इजरायल की कार्रवाई, जिसमें उसने पहले धमाके करने वाले पेजर भेजे और फिर हिजबुल्लाह नेतृत्व को निशाना बनाया। इसके बाद दुनिया को एक बार फिर इजरायल की ताकत और उसके इरादों की याद दिला दी। इसके विपरीत, पिछले मंगलवार को जब ईरान ने इजराइल पर 180 मिसाइलें दागीं तो तेहरान में हुई खुशी बनावटी सी लग रही थी। कहा जा रहा है कि ईरान की इन मिसाइलों में से दो-चार से ज्यादा इजराइल के अत्याधुनिक हवाई सुरक्षा सिस्टम को भेद नहीं पाईं।

ईरान कागजी शेर है या नहीं, यह तो अभी पता नहीं। लेकिन इजरायल के साथ लड़ाई में अपने सहयोगी हिजबुल्लाह को कमजोर होता देख अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों को एक बार फिर इजरायल के प्रति अपना समर्थन दोहराना पड़ा है। इसका असर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ा है और दोनों उम्मीदवार इजरायल के प्रति अपना समर्थन जताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अगर इससे अमेरिका में रहने वाले मुस्लिम और अरब मतदाता कमला हैरिस से दूरी बनाते हैं तो इसका फायदा डोनाल्ड ट्रंप को हो सकता है।

यूरोप में भी फिलिस्तीन समर्थक रवैये (खासकर विश्वविद्यालय परिसरों में) को लेकर मुख्यधारा के राजनेताओं का धैर्य जवाब देने लगा है। गाजा के साथ एकजुटता दिखाने के नाम पर मुस्लिम पहचान को इस तरह से आगे बढ़ाया गया कि इससे यूरोप के मतदाताओं में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई । आज एक के बाद एक देश में मतदाता ऐसी पार्टियों को चुन रहे हैं जो आव्रजन रोकने की बात करती हैं और यहां तक कि पुनर्वास, यानी शरणार्थियों को वापस भेजने की मांग भी करती हैं। पिछले हफ्ते ऑस्ट्रिया में फ्रीडम पार्टी ने जीत हासिल की और इससे पहले गर्मियों में जर्मनी के प्रांतीय चुनावों में अल्टरनेटिव फॉर ड्यूशलैंड ने शानदार प्रदर्शन किया था।

कई यूरोपीय देशों में लोगों को दूसरे देशों से आने वाले लोगों पर नाराजगी हो रही है। इस वजह से, इन देशों की सरकारें यूरोपीय संघ के नियमों की परवाह किए बिना, अपने देश में आने वाले लोगों पर बहुत सख्त नियम लगा रही हैं। यूरोप के कई देशों में लोगों को लगता है कि दूसरे देशों से आने वाले लोग उनके देश के लिए समस्याएं पैदा कर रहे हैं। इसीलिए, ये देश अपने देश में आने वाले लोगों पर बहुत सख्त नियम लगा रहे हैं। ये नियम यूरोपीय संघ के उन नियमों के खिलाफ हैं जो सभी देशों के लिए समान हैं।

इसके अलावा, यूरोपीय देशों के बीच विदेश नीति को लेकर भी मतभेद बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए जब इजरायल और लेबनान के बीच झगड़ा हुआ तो यूरोपीय देशों के मंत्री इस बात पर सहमत नहीं हो पाए कि इस मामले में क्या करना चाहिए। कुछ देश इजराल का समर्थन कर रहे थे तो कुछ लेबनान का।

 

क्या महाराष्ट्र चुनाव से पहले मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा एक बड़ा कदम है?

आज हम आपको बताएंगे कि महाराष्ट्र चुनाव से पहले मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देना एक बड़ा कदम है या नहीं! केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गुरुवार को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने को मंजूरी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला लिया गया। मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने पर पीएम मोदी ने बधाई दी। उन्होंने कहा कि मराठी भारत का गौरव है। पीएम नरेंद्र मोदी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, मराठी भारत का गौरव है। इस अभूतपूर्व भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने पर बधाई। यह सम्मान हमारे देश के इतिहास में मराठी के समृद्ध सांस्कृतिक योगदान को मान्यता देता है। मराठी हमेशा से भारतीय विरासत की आधारशिला रही है। मुझे यकीन है कि शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने से और भी कई लोग इसे सीखने के लिए प्रेरित होंगे।’

मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी देते हुए सूचना प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, ‘सरकार ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमी और बंगाली को शास्त्रीय भाषा (क्लासिकल लैंग्वेज) का दर्जा देने का फैसला किया है।’ उन्होंने कहा कि लिंग्विस्टिक एक्सपर्ट्स की कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर इन भाषाओं को चुना गया। उन्होंने कहा, ‘इन भाषाओं में 1500 से 2000 साल तक का लिटरेचर है, कंटीन्यूटी है, पुराने इंस्क्रिप्शन हैं और ओरल ट्रेडिशन भी है। इन सबका ध्यान रखकर फैसला किया गया।’

यह एक ऐतिहासिक निर्णय है और यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार के हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाने, हमारी विरासत पर गर्व करने और सभी भारतीय भाषाओं तथा हमारी समृद्ध विरासत पर गर्व करने के दर्शन के अनुरूप है।’ सरकार ने कहा कि शास्त्रीय भाषाएं भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के रूप में काम करती हैं, तथा प्रत्येक समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सार को प्रस्तुत करती हैं।

भारत सरकार ने 12 अक्टूबर 2004 को ‘शास्त्रीय भाषा’ के रूप में भाषाओं की एक नई श्रेणी बनाने का निर्णय लिया, जिसके तहत तमिल को शास्त्रीय भाषा घोषित किया गया तथा उसके बाद संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और उड़िया को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया। एक सरकारी बयान में कहा गया है कि 2013 में महाराष्ट्र सरकार की ओर से एक प्रस्ताव प्राप्त हुआ था जिसमें मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का अनुरोध किया गया था। इस प्रस्ताव को भाषा विज्ञान विशेषज्ञ समिति (एलईसी) को भेज दिया गया था। एलईसी ने शास्त्रीय भाषा के लिए मराठी की सिफारिश की।

महाराष्ट्र में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं और यह राज्य में एक बड़ा चुनावी मुद्दा था। महाराष्ट्र सरकार ने 2013 में मराठी के लिए प्रस्ताव दिया था। इसके बाद बिहार, असम और वेस्ट बंगाल की ओर से पाली, प्राकृत, असमी और बंगाली के लिए प्रस्ताव आए थे। केंद्र सरकार ने 12 अक्टूबर 2004 को क्लासिकल लैंग्वेज की एक नई कैटेगरी बनाई थी और तब तमिल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था। 2005 में संस्कृत को यह दर्जा मिला। इनके अलावा अब तक मलयालम, ओडिया, तेलुगु और कन्नड़ को भी यह दर्जा दिया जा चुका है।

बता दे कि शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने शुक्रवार को मराठी को अभिजात भाषा का दर्जा दिए जाने पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि पिछले 15-20 सालों से शिवसेना और महाराष्ट्र के अन्य मराठी सांसदों ने इस मांग के लिए लगातार प्रयास किए हैं। उन्होंने कहा कि हर मुख्यमंत्री ने इस संबंध में प्रस्ताव भेजा है और मराठी भाषा के देश की संस्कृति में योगदान के प्रमाण दिए हैं। कई बार हमें नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी मिलीं, विशेषकर पिछली सरकार के दौरान। इसके बावजूद, हर संसद सत्र में महाराष्ट्र के सांसदों ने मराठी को अभिजात भाषा का दर्जा देने की मांग की। अंततः कल यह घोषणा हुई कि मराठी भाषा को भी अन्य चार भाषाओं के साथ अभिजात दर्जा मिल गया है। हम इस फैसले का स्वागत करते हैं।

उन्होंने कहा कि यह एक लंबी मांग थी, जो अब पूरी हुई है। इसके कारण मराठी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी और कई विश्वविद्यालयों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह भाषा छत्रपति शिवाजी महाराज, संत ज्ञानेश्वर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, बालासाहेब ठाकरे और महात्मा फुले की भाषा है। इस फैसले से इस भाषा की प्रतिष्ठा और सम्मान बढ़ेगा।

राउत ने कहा कि बालासाहेब ठाकरे ने एक समय मराठी भाषा को कम आंका जाने के बावजूद उसे प्रतिष्ठा दिलाने का काम किया था। अब जब मराठी भाषा को सरकारी स्तर पर प्रतिष्ठा मिली है, तो मेरा केंद्र सरकार से आग्रह है कि मराठी लोगों का रोजगार जो अन्य राज्यों में चला जाता है, उसे रोका जाए। मराठी भाषा के साथ-साथ मराठी लोगों को उनके अधिकार का रोजगार महाराष्ट्र में मिलना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि इस फैसले में सबका योगदान है, और किसी को भी श्रेय लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कुछ लोग जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रेय लेने की कोशिश करेंगे, लेकिन हमें आपकी दया और कृपा की आवश्यकता नहीं है। मराठी भाषा महान है, यह वीरों और संतों की भाषा है।

 

आखिर कैसे मिलता है एक भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा?

आज हम आपको बताएंगे कि एक भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा कैसे मिलता है! केंद्र ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। अब तक यह दर्जा तमिल, मलयालम, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़ और ओडिया को दिया गया था। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सरकार भारत की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने के लिए शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए कदम उठा रही है। सरकार की तरफ से जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने को मंजूरी दे दी है। शास्त्रीय भाषाएं भारत की गहन और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के रूप में काम करती हैं, जो प्रत्येक समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मील के पत्थर का सार है।

सरकार का मानना है कि शास्त्रीय भाषा के रूप में भाषाओं को शामिल करने से रोजगार के महत्वपूर्ण अवसर पैदा होंगे, खासकर अकादमिक और रिसर्च के क्षेत्र में। इसके अलावा, इन भाषाओं के प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण से संग्रह, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटल मीडिया में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। शास्त्रीय भाषाएं स्वतंत्र परंपराओं और समृद्ध साहित्यिक इतिहास वाली प्राचीन भाषाएं हैं जो विभिन्न साहित्यिक शैलियों और दार्शनिक ग्रंथों को प्रभावित करती रहती हैं। शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 2020 में संस्कृत भाषा के लिए तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए थे।मंत्रिमंडल की नवीनतम मंजूरी के साथ, भारत में मान्यता प्राप्त शास्त्रीय भाषाओं की कुल संख्या अब 11 हो गई है। इससे पहले, तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया को पहले ही शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त था।

सरकार ने 12 अक्टूबर 2004 को ‘शास्त्रीय भाषा’ नामक एक नई श्रेणी बनाई थी। इसने तमिल को उसके एक हज़ार साल से ज़्यादा पुराने इतिहास, मूल्यवान माने जाने वाले ग्रंथों और साहित्य तथा मौलिकता के आधार पर शास्त्रीय भाषा घोषित किया। नवंबर 2004 में, साहित्य अकादमी के तहत संस्कृति मंत्रालय द्वारा शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने के लिए प्रस्तावित भाषाओं की पात्रता की जांच करने के लिए एक भाषा विशेषज्ञ समिति (LEC) का गठन किया गया था। अगले वर्ष, संस्कृत को शास्त्रीय भाषा घोषित किया गया। धीरे-धीरे, 2008 में तेलुगु और कन्नड़, और 2013 और 2014 में मलयालम और ओडिया भी इस सूची में शामिल हो गए। इसके लिए संबंधित भाषा वाले राज्यों की तरफ से प्रस्ताव भेजना होता है। इसके बाद साहित्य कला अकादमी के तहत भाषा विशेषज्ञ समिति की तरफ से प्रस्ताव पर विचार के बाद मान्यता देने की प्रक्रिया पूरी होती है। 2005 की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, शास्त्रीय भाषा घोषित करने के लिए निम्नलिखित मानदंड रेखांकित किए गए थे। उच्च पुरातनता: भाषा में प्राचीन ग्रंथ या दर्ज इतिहास होना चाहिए जो 1,500-2000 वर्षों से अधिक पुराना हो। मूल्यवान विरासत: प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का एक महत्वपूर्ण संग्रह जिसे बोलने वालों की पीढ़ियों द्वारा संरक्षित और मूल्यवान माना गया है। मौलिकता: भाषा में एक अलग और मूल साहित्यिक परंपरा होनी चाहिए, जो किसी अन्य भाषण समुदाय से प्राप्त न हो। आधुनिक रूपों से भिन्नता: शास्त्रीय भाषा और उसके आधुनिक रूपों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। प्राचीन और बाद के संस्करणों के बीच संभावित असंतुलन के साथ।

शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 2020 में संस्कृत भाषा के लिए तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए थे। प्राचीन तमिल ग्रंथों के अनुवाद की सुविधा, शोध को बढ़ावा देने और यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम प्रदान करने के लिए केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान की स्थापना की गई थी। शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और संरक्षण के लिए, मैसूर में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान के तत्वावधान में शास्त्रीय कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओडिया में अध्ययन के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए थे। इन पहलों के अलावा, शास्त्रीय भाषाओं के क्षेत्र में उपलब्धियों को मान्यता देने और प्रोत्साहित करने के लिए कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार स्थापित किए गए हैं। बता दें कि सरकार की तरफ से जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने को मंजूरी दे दी है। शास्त्रीय भाषाएं भारत की गहन और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के रूप में काम करती हैं! शिक्षा मंत्रालय शास्त्रीय भाषाओं के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, विश्वविद्यालयों में पीठ और शास्त्रीय भाषा के प्रचार के लिए केंद्र सहित शास्त्रीय भाषाओं को लाभ प्रदान करता है।

 

क्या अमेरिका ने धार्मिक रिपोर्ट के सहारे फिर से भारत को घेरा?

हाल ही में अमेरिका ने धार्मिक रिपोर्ट के सहारे भारत को एक बार फिर से घेर लिया है! भारत में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है और कितनी हैरत की बात है कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान मरे जा रहे हैं भारत में घुसपैठ को! जहां धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं, वहीं घुसपैठ कर रहे हैं मुसलमान? अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने हर वर्ष की तरह 2024 की रिपोर्ट जारी कर दी है। 2 अक्टूबर को जारी इस रिपोर्ट में भारत में अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर चिंता जाहिर की गई है। यूएससीआईआरएफ की वेबसाइट पर लिखा है, ‘अपनी 2024 की वार्षिक रिपोर्ट में यूएसआईसीआरएफ ने सिफारिश की कि अमेरिकी विदेश विभाग भारत को ‘विशेष चिंता का देश’ के रूप में नामित करे या धार्मिक स्वतंत्रता के व्यवस्थित, निरंतर और गंभीर उल्लंघन में संलग्न देश के रूप में।’ इस वर्ष अमेरिकी संस्था ने भारत पर अपनी रिपोर्ट को ‘भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की बदहाल होती स्थिति पर रिपोर्ट’ शीर्षक दिया है। इसमें कहा गया है, ‘यह रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि 2024 के दौरान किस तरह से लोगों को निगरानी समूहों द्वारा मारा गया, पीटा गया और लिंच किया गया, धार्मिक नेताओं को मनमाने ढंग से गिरफ्तार किया गया और घरों और पूजा स्थलों को ध्वस्त किया गया। ये घटनाएं धार्मिक स्वतंत्रता का विशेष रूप से गंभीर उल्लंघन हैं।’

रिपोर्ट के बारे में कहा गया है, ‘इसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों के खिलाफ हिंसक हमलों को भड़काने के लिए सरकारी अधिकारियों द्वारा नफरत फैलाने वाला भाषण समेत भ्रामक और गलत सूचना के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है। इसमें नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और कई राज्यों के धर्मांतरण और गोहत्या विरोधी कानूनों सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों को टारगेट करने और उन्हें वंचित करने के लिए भारत के कानूनी ढांचे में बदलाव और प्रवर्तन का भी वर्णन किया गया है।

वेबसाइट पर ‘धार्मिक स्वतंत्रता क्या है?’ इस बारे में भी बताया गया है। इसमें कहा गया है, ‘धार्मिक स्वतंत्रता में निहित है अपने विवेक के अनुसार विश्वास करने या न करने का अधिकार, और अपने विश्वासों को खुले तौर पर, शांतिपूर्वक और बिना किसी डर के जीना। धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता एक व्यापक अधिकार है जिसमें विचार, विवेक, अभिव्यक्ति, संघ और सभा की स्वतंत्रता शामिल है।’ आगे बताया गया है कि अमेरिका धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को कितना तवज्जो देता है। अब भारत में कथित अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसकी हरकतों पर नजर डाल लीजिए और समझिए कि क्या अत्याचार का सामना कर रहा कोई समुदाय ऐसी-ऐसी हिमाकतें कर सकता है! देश में कौन ऐसी पार्टी है जिसे मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए? बीजेपी ने भी पसमांदा मुसलमानों को रिझाने का अभियान छेड़ा है। वोट बैंक की राजनीति का मुसलमानों ने जमकर फायदा उठाया है।

मुसलमान नेताओं की मजबूरी का फायदा अपनी सभी गलत नीतियों को मनवाने में करते हैं। मुसलमानों के वोटों की इच्छा रखने वाले दल और नेता हिंदुओं और उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ खुलकर जहर उगलते हैं क्योंकि मुसलमान हिंदू-विरोध से ही खुश होता है, मुसलमान पूरे देश में रणनीतिक रूप से वोटिंग करता है। कितनी हैरत की बात है कि मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है और वो देश के सत्ताधारी दल के खिलाफ खुलकर खड़ा है!

मुसलमान को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई अपराधी है या आतंकी या फिर देश का गद्दार, बस कौम का होना चाहिए, फिर वो किसी भी हद तक समर्थन में खड़ा रहेगा। इसके उलट अगर कौम से किसी ने देशभक्ति दिखाई तो उसका सामाजिक बहिष्कार हो जाएगा।

यूएससीआईआरएफ की वेबसाइट पर बताया गया है कि यह अमेरिकी संस्था आखिर दूसरे देशों में धार्मिक स्वंतत्रता की स्थिति का पता कैसे लगाता है। इसके विभिन्न उपाय बताए गए हैं। एक उपाय में कहा गया है, ‘अनुसंधान, यात्रा, तथा विदेशी अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों, स्वतंत्र मानवाधिकार समूहों और अन्य गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधियों, धार्मिक नेताओं, उत्पीड़न के शिकार लोगों और अन्य लोगों के साथ बैठकों के माध्यम से विदेशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति की निगरानी करना।’

सवाल है कि क्या उसने कभी बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति जानने-समझने की कोशिश की? क्या उसने कभी हिंदुओं के धार्मिक नेताओं से बात की? क्या उसने जानने की कोशिश की कि सिर्फ हिंदू धर्मस्थलों पर ही सरकारों का नियंत्रम क्यों है? अगर नहीं तो क्या धार्मिक स्वतंत्रता सिर्फ अल्पसंख्यकों की होती है, उसमें भी सिर्फ मुसलमानों और ईसाइयों की? भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं बल्कि दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला समुदाय है। क्या उसने कभी भारत में ईसाई संस्थाओं की हरकत पर गौर किया है कि कैसे वो अंधविश्वास फैलाकर हिंदुओं का धर्मांतरण करवा रहे हैं? इन सब पर गौर किया जाए तो यूएससीआईआरएफ के लिए ‘चोरी भी और सीनाजोरी भी’ की कहावत सटीक बैठती है। सबको सताओ और खुद को ही पीड़ित बताओ। ऐसी संस्थाएं सचमुच धार्मिक स्वतंत्रता की नहीं बल्कि धार्मिक अत्याचार की हितैषी हैं।

यही वजह है कि भारत ने यूएससीआईआरएफ की इस रिपोर्ट को न सिर्फ सिरे से खारिज किया है बल्कि अमेरिका भारत के मामले में चौधरी बनने की कोशिश दूर रहकर अपने अंदर के हालात पर गौर करने की नसीहत भी दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, ‘यूएससीआईआरएफ पर हमारे विचार पहले से स्पष्ट हैं कि यह एक पक्षपाती संगठन है जिसका राजनीतिक एजेंडा है। यह तथ्यों को गलत तरीके से पेश करता रहता है और भारत के बारे में एक गलत नैरेटिव को बढ़ावा देता है। हम इस दुर्भावनापूर्ण रिपोर्ट को खारिज करते हैं, जो केवल यूएससीआईआरएफ की विश्वसनीयता घटाती है। हम यूएससीआईआरएफ से ऐसे एजेंडा संचालित प्रयासों से बचने का आग्रह करते हैं। यूएससीआईआरएफ के लिए यह भी अच्छा होगा कि वह अपना समय अमेरिका में मानवाधिकार मुद्दों से निपटने में खर्च करे।’

 

भारतीय वायुसेना की ताकत के लिए क्या बोले वायुसेना चीफ?

हाल ही में वायुसेना चीफ ने भारतीय वायुसेना की ताकत के बारे में बयान दिया है! ईस्टर्न लद्दाख में एलएसी पर चीन के साथ चल रहे लंबे गतिरोध के बीच एयरफोर्स चीफ ने कहा कि हमारी एयरफोर्स ट्रेनिंग और एक्सपोजर के मामले में चीन से काफी बेहतर है। लेकिन तकनीक और रक्षा उपकरणों के उत्पादन की रफ्तार के मामले में हम चीन से पीछे हैं। एयरफोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल ए पी सिंह ने कहा कि हम ह्यूमन रिसोर्स और ट्रेनिंग के मामले में चीन से बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि हमारा अनावश्यक आक्रामक रुख अपनाने का कोई इरादा नहीं है। सिर्फ तब जब हम पर दबाव डाला जाएगा, हम कुछ करेंगे… हमारे प्लानिंग तैयार हैं।

उन्होंने कहा कि हम प्रशिक्षण के मामले में उनसे (चीन से) कहीं बेहतर हैं। हमें अधिक अनुभव है। हमें पता चलता है कि वे कैसे ट्रेनिंग लेते हैं और कितने देशों की एयरफोर्स के साथ उनका संपर्क है और कितनों के साथ हमारा। एयरफोर्स चीफ ने कहा कि जहां तक तकनीक की बात है, हम फिलहाल इतने अच्छे नहीं हैं। हम पहले उनसे बेहतर थे, लेकिन अब हम पिछड़ गए हैं और हमें उस पर पकड़ बनानी होगी।

एलएसी के दूसरी तरफ चीन के लगातार बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर और ईस्टर्न लद्दाख पर सिचुएशन को लेकर एयरफोर्स चीफ ने कहा कि ईस्टर्न लद्दाख में स्थिति टेक्टिकली वैसी ही है जैसे एक साल पहले थी। बस हम यह देख रहे हैं कि एलएसी के दूसरी तरफ तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। हम कोशिश कर रहे हैं उसे मैच करने की। हमारे नए एयरफील्ड बन रहे हैं और उसमें तेजी से काम हो रहा है। हम अपने पहले से बने एयरफील्ड की कैपेसिटी बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यह भी योजना है कि सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया जाए। सेंट्रल सेक्टर में अडवांस लैंडिंग ग्राउंड हैं, हम राज्य सरकारों के टच में है कि या तो उन्हें टेकओवर कर सकें या कम से कम यह आश्वासन मिले कि वे हमारे ऑपरेशंस के लिए भी उपलब्ध रहेंगे। एयर चीफ मार्शल ए पी सिंह ने कहा कि हमारा लक्ष्य है कि 2047 तक पूरी इन्वेंटरी या तो भारत में उत्पादित हो या भारत में विकसित और उत्पादित हो। कम होती फाइटर स्क्वॉड्रन पर एयरफोर्स चीफ ने कहा कि हम इस पर भी ध्यान दे रहे हैं कि फाइटर स्क्वाड्रन 30 से कम न हो।

उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को अब हर साल 24 एयरक्राफ्ट बनाने के अपने वादे पर खरा उतरना चाहिए ताकि देरी की भरपाई हो सके। उन्होंने प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि हम एक ही एजेंसी पर निर्भर नहीं रह सकते। यहां तक कि HAL की भी सीमाएँ होंगी, खासकर जब इतनी बड़ी संख्या की आवश्यकता हो।बता दें कि एयरफोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल ए पी सिंह ने कहा कि हमारे पास जो एयर डिफेंस सिस्टम जो है और जो हम खरीद रहे हैं वे उसी तरह कॉम्बिनेशन में वही काम कर सकते हैं जो आयरन डोम करता है। हमारे पास जो भी नए एयर डिफेंस वेपन सिस्टम होंगे जो वह काफी सक्षम होंगे। लेकिन यह बात सही है कि हमें नंबर बहुत ज्यादा चाहिए होंगे, अगर हमें सब कुछ प्रोटेक्ट करना है।

उन्होंने कहा ‘अभी हमारे पास जो नंबर्स हैं उससे पूरा देश …अगर कहें कि कहीं भी कोई मिसाइल नहीं गिर पाएगी…ऐसा नहीं हो पाएगा। हमें अपनी प्राइयॉरिटी देखनी पड़ेगी कि कहां पर हमारे वाइटल एरिया हैं जो हमें पहले प्रोटेक्ट करने हैं। उन पर हमें ज्यादा कॉन्संट्रेट करना पड़ेगा’। एयरफोर्स चीफ ने कहा कि जहां तक टेक्नॉलजी का सवाल है तो जो सिस्टम आ चुके हैं और जो पाइप लाइन में हैं, जिनके कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए हैं, हम इन चीजों को (मिसाइल) इंटरसेप्ट कर सकते हैं। हमारा बड़ा देश है इसलिए ज्यादा नंबर चाहिए। अभी जो नंबर हैं वे उतने नहीं है जहां सबकुछ कर सकें।

एयरफोर्स चीफ ने बताया कि एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 की तीन यूनिट डिलीवर हो गई हैं और बाकी दो यूनिट अगले साल मिल जाएंगी। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से इसमें देरी हुई। रूस से भारत ने एस-400 की पांच रेजिमेंट की डील की है। एस-400 के लिए भारत ने रूस के साथ साल 2018 में 35000 करोड़ रुपये में रक्षा सौदा किया। एस-400 की एक रेजीमेंट में 16 गाड़ियां होती हैं। यह सिस्टम 500 किलोमीटर की दूरी से दुश्मन के हमले को ट्रैक करता है और रेंज में आते ही दुश्मन की मिसाइल को तबाह कर देता है। यह 400 किलोमीटर के इलाके में दुश्मन के ड्रोन से लेकर बैलेस्टिक मिसाइल तक के हमले को रोक सकता है।

 

क्या भारतीय विदेश मंत्री का पाकिस्तान दौरा होने वाला है खास?

आने वाले समय में भारतीय विदेश मंत्री का पाकिस्तान का दौरा खास होने वाला है! पाकिस्तान से संबंधों में तनाव के बीच भारत की तरफ से बड़ा फैसला लिया गया है। पाकिस्तान की मेजबानी में आयोजित हो हो रहे शंघाई शिखर संगठन की बैठक में भारत हिस्सा लेगा। पाकिस्तान अक्टूबर के मध्य में एससीओ के शासनाध्यक्षों की परिषद (सीएचजी) की बैठक की मेजबानी करेगा। खास बात है कि भारत की तरफ से इस मीटिंग में विदेश मंत्री एस जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। पाकिस्तान की तरफ से इस सम्मेलन के लिए पीएम मोदी को न्योता दिया गया था। ऐसे में भारत ने एस जयशंकर को पाकिस्तान भेजने को लेकर काफी अहम फैसला किया है। जयशंकर को पीएम मोदी का ‘चाणक्य’ माना जाता है। अगस्त में, पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एससीओ के शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया था। जयशंकर की पाकिस्तान यात्रा महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे नई दिल्ली की ओर से एक बड़े फैसले के रूप में देखा जा रहा है। वरिष्ठ मंत्री को भेजने के फैसले को एससीओ के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब पीएम मोदी ने जयशंकर को अहम मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी दी है। जयशंकर पहले भी कई अहम मौके पर पीएम मोदी के भरोसे पर खरे उतरे हैं। अमेरिका से लेकर रूस तक, चीन से लेकर यूरोपीय देशों तक जयशंकर कूटनीतिक के मोर्चे पर भारत के पक्ष को दमदार तरीके से रखते हैं। जयशंकर ने कई बार ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर पश्चिमी देशों को दोहरे रवैये की पोल खोली है। जयशंकर कूटनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। ऐसे में जब पाकिस्तान में जब वह भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे तो भारत अपना पक्ष इस बहुराष्ट्रीय मंच पर साफतौर पर रख पाएगा।

भारत लगातार कहता रहा है कि वह पाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी संबंध चाहता है। भारत इस बात पर जोर देता रहा है कि इस तरह के संबंधों के लिए आतंक और शत्रुता से मुक्त वातावरण बनाने की जिम्मेदारी इस्लामाबाद पर है। ऐसे में जब विदेश मंत्री पाकिस्तान में होंगे तो निश्चित रूप से वे दुनिया को संदेश जरूर देंगे। पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए जयशंकर ने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि सीमा पार आतंकवाद की उसकी नीति कभी सफल नहीं हो सकती। उन्होंने पाकिस्तान के आर्थिक संकट का भी उल्लेख किया था। ऐसे में एससीओ समिट में आतंकवाद के मुद्दे पर परोक्ष रूप से निशाने पर पड़ोसी होगा तो इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

विदेश मंत्री केवल एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान जाएंगे। इसके अलावा अभी तक विदेश मंत्री के किसी अन्य कार्यक्रम को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में साफ है कि जयशंकर का पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात का कोई कार्यक्रम नहीं हैं। इसके अलावा विदेश मंत्री बैठक से इतर अपने पाकिस्तानी समकक्ष इशाक डार से भी कोई मीटिंग तय नहीं है। पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी गोवा में एससीओ देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए मई 2023 में भारत आए थे। यह लगभग 12 वर्षों में किसी पाकिस्तानी विदेश मंत्री की पहली भारत यात्रा थी।

पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में फरवरी 2019 में भारत के युद्धक विमानों द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर पर बमबारी के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध गंभीर तनाव में आ गए थे। पाकिस्तान की तरफ से लगातार सीमापार से आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। इतना ही नहीं पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र जैसे ग्लोबल मंच पर कश्मीर को लेकर बेसुरा राग अलापता रहता है। इसको लेकर भारत ने कई बार दुनिया के सामने पड़ोसी मुल्क की पोल भी खोली है। भारत ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को खत्म किया तो इस पर पड़ोसी मुल्क ने ऐतराज जताया था। अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंधों को सीमित कर दिया था।

एससीओ के शासनाध्यक्षों की परिषद का सम्मेलन समूह का दूसरा सबसे बड़ा मंच है। भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान से मिलकर बना एससीओ एक प्रभावशाली आर्थिक और सुरक्षा समूह है, जो सबसे बड़े अंतरक्षेत्रीय अंतरराष्ट्रीय संगठनों में से एक के रूप में उभरा है। भारत पिछले साल एससीओ का अध्यक्ष था। उसने पिछले साल जुलाई में डिजिटल तरीके से एससीओ शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। एससीओ के साथ भारत का जुड़ाव 2005 में एक पर्यवेक्षक देश के रूप में शुरू हुआ था। वर्ष 2017 में अस्ताना शिखर सम्मेलन में यह एससीओ का पूर्ण सदस्य देश बन गया। पाकिस्तान भी 2017 में भारत के साथ इसका स्थायी सदस्य बना था।

 

क्या अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत के सामने आ सकती है कई चुनौतियां?

आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत के सामने कई चुनौतियां आ सकती है! भारत की कूटनीति का लोहा अमेरिका, रूस समेत दुनिया के सभी ताकतवर देश मानते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-हमास युद्ध, भारत ने पूरी समझदारी के साथ शांति और सद्भावना का संदेश दुनिया के सामने रखा। अब भारत को कूटनीति की पिच पर एक साथ कई मैच खेलने हैं। सबसे बड़ा मैच पाकिस्तान के साथ होगा। अक्टूबर का महीना भारतीय कूटनीति के लिए बेहद व्यस्त रहने वाला है। अक्टूबर में दो अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन होने वाले हैं जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा, कुछ देशों के उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत आएंगे, जिनमें मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइजू और जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज शामिल हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस महीने पाकिस्तान जाएंगे। वह इस्लामाबाद में 15-16 अक्टूबर को होने वाली शंघाई सहयोग को-ऑपरेशन संगठन (SCO) की बैठक में भाग लेंगे। 9 साल बाद भारत के विदेश मंत्री पाकिस्तान दौरे पर जाएंगे। 2015 में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान गई थीं। जयशंकर का यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान के साथ रिश्ते अच्छे नहीं हैं। जयशंकर दो बार कह चुके हैं कि सीमा पार आतंकवाद के लिए पाकिस्तान को नतीजे भुगतने होंगे। पिछले हफ्ते ही उन्होंने यूएन में कहा था कि ‘पाकिस्तान अपने कर्मों का फल भुगत रहा है।’ यह दौरा भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बदलाव की उम्मीद जगाता है। देखना होगा कि इस मीटिंग के बाद दोनों देशों के रिश्तों में क्या बदलाव आते हैं।

इस महीने की शुरुआत में ही जमैका के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा से हुई, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना थी। एंड्रयू होलनेस ने 1 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता की, जिसमें दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। ये समझौते खासतौर पर डिजिटल वित्तीय सेवाओं और खेल के क्षेत्र में सहयोग पर केंद्रित हैं। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइजू रविवार को चार दिवसीय द्विपक्षीय यात्रा पर भारत आ रहे हैं। उनकी यह यात्रा 6 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक चलेगी। 17 नवंबर, 2023 को राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। मुइजू इससे पहले 9 जून को प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए भारत आए थे। भारत और मालदीव के बीच रिश्ते मुइजू के कार्यकाल के शुरुआती महीनों में थोड़े तनावपूर्ण रहे थे, लेकिन अब स्थिति सामान्य हो गई है।

इंडिया आउट’ अभियान के जरिए चुने गए मालदीव के राष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों में तुर्की, यूएई और चीन की यात्राएं कीं। यह परंपरा से हटकर था क्योंकि इससे पहले मालदीव के नए राष्ट्रपति की पहली विदेश यात्रा हमेशा भारत की होती रही है। इसके बाद, तीन उप मंत्रियों ने मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिससे रिश्तों में और भी खटास आ गई। यही नहीं, माले ने भारत से अपने देश में तैनात निहत्थे सैनिकों को हटाने का दबाव भी बनाया। ये सैनिक तीन विमानन प्लेटफार्मों के रखरखाव में मदद के लिए वहां मौजूद थे। आखिरकार एक समझौता हुआ जिसके तहत वर्दीधारी जवानों की जगह तकनीकी टीम को तैनात किया गया। इसके बाद से भारत ने द्वीपीय देश को 50 मिलियन डॉलर के कम से कम दो ऋण दिए हैं और उसकी सरकार को बजटीय सहायता की पेशकश की है।

इस महीने दो बड़े शिखर सम्मेलन भी होने वाले हैं। 19वां पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) और 21वां आसियान-भारत शिखर सम्मेलन 6 अक्टूबर से 11 अक्टूबर के बीच लाओस में आयोजित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने अतीत में आसियान (दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संघ) के तहत आयोजित इन दोनों शिखर सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया है। 2014 से, मोदी 2020 और 2022 को छोड़कर हर EAS और आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए हैं। 2020 में, विदेश मंत्री (EAM) एस. जयशंकर ने वियतनाम की ओर से आयोजित वर्चुअल शिखर सम्मेलन में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व किया था। ऐसा कोविड-19 महामारी के कारण किया गया था।

22 अक्टूबर से 24 अक्टूबर तक, रूस कजान में 16वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित कर रहा है। यह एक और मंच है, जहां प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में सरकार का प्रमुख बनने के बाद से हर साल भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया है। मोदी ने महामारी के कारण 2020 और 2022 के बीच आयोजित तीन आभासी शिखर सम्मेलनों में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। 2016 और 2021 में, भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मेजबान देश था। 2016 में, शिखर सम्मेलन गोवा में आयोजित किया गया था, जबकि 2021 में, यह वस्तुतः आयोजित किया गया था। मोदी के इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है।

अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में भारत आने वाला एक और उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज का होगा। शोल्ज, कई वरिष्ठ जर्मन मंत्रियों के साथ, 7वें भारत-जर्मनी अंतर-सरकारी परामर्श के लिए यहां आएंगे। फरवरी 2023 में अपनी राजकीय यात्रा और सितंबर 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के बाद शोल्ज की यह तीसरी भारत यात्रा होगी।

 

घरेलू चर्चा में बिडेन ने ट्रंप को बताया अभद्र नाम! एक नई किताब लीक हो गई

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डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर अमेरिकी सामानों पर 200 फीसदी आयात शुल्क लगाने का आरोप लगाया है. ब्राजील के टैरिफ भी ऊंचे हैं. लेकिन भारत में यह दर सबसे ज्यादा है. संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और आगामी चुनावों में फिर से राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने आरोप लगाया है कि भारत संयुक्त राज्य अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर सबसे अधिक टैरिफ वसूलता है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन अमेरिकी उत्पादों पर 200 फीसदी आयात शुल्क लगाता है. ब्राजील के टैरिफ भी ऊंचे हैं. लेकिन भारत में यह दर सबसे ज्यादा है. यहां तक ​​कि वे इसे चेहरे पर मुस्कान के साथ भी करते हैं। ट्रंप का वादा, सत्ता में वापस आए तो जवाबी कार्रवाई करेंगे. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अन्य देशों के व्यापार के मामले में ऐसी नीति लाई जाएगी, जिससे पारस्परिक लाभ हो।

हालिया चुनावी भाषण में ट्रंप का संदेश, ”मेरा लक्ष्य अमेरिका को असाधारण रूप से समृद्ध देश बनाना होगा.” इसके लिए पारस्परिक लाभ पर आधारित कर नीति लागू करना बहुत जरूरी है। व्यापार में तेजी आई। उस समय उन्होंने भारत में उच्च करों और अमेरिकी बाजार में प्रवेश करने वाले विभिन्न देशों के सामानों पर उच्च टैरिफ लगाए जाने की भी शिकायत की थी। जिससे काफी कन्फ्यूजन हो रहा है. ट्रंप की फिर से धमकी से चिंतित हलकों को टैरिफ वॉर की झलक मिल रही है. बाहर भले ही उन्हें कितना भी ‘मिस्टर ट्रंप’ कहकर संबोधित किया जाए, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन घरेलू चर्चाओं में अपने प्रतिद्वंद्वी डोनाल्ड ट्रंप को अभद्र नामों से बुलाते हैं। ऐसे सनसनीखेज दावे अगले हफ्ते प्रकाशित होने वाली एक किताब में किए गए हैं। सीएनएन ने किताब के सारांश पर प्रकाश डाला और कहा कि बिडेन ने व्हाइट हाउस की घरेलू चर्चाओं में भी ट्रम्प के बारे में अपशब्दों का इस्तेमाल किया। हालाँकि, बिडेन ने हाल ही में विभिन्न सार्वजनिक बैठकों में ट्रम्प को मेरे ‘पूर्ववर्ती’ या ‘पूर्व’ के रूप में संबोधित किया है।

2021 में पोलिटिको की एक रिपोर्ट में भी दावा किया गया था कि एक मीटिंग के दौरान बिडेन अचानक उत्तेजित हो गए और अपशब्दों का इस्तेमाल किया। उस समय उनका अचानक आपा खोना भी आम बात हो गई थी. पुस्तक को लेकर हालिया विवाद को शुरू में रूसी-यूक्रेन युद्ध और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर अमेरिकी प्रशासन की स्थिति से संबंधित माना जाता है। न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट में पुस्तक के प्रकाशक के हवाले से कहा गया है कि यह “अमेरिकी इतिहास में एक अशांत समय का व्यापक विवरण” है। इसराइल-हमास संकट और पश्चिम एशिया की मौजूदा अशांत स्थिति को भी किताब में अलग से जगह दी गई है. किताब में एक घटना का जिक्र करते हुए दावा किया गया है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाने के फैसले के बारे में बाइडेन को फोन किया था. वहां भी नहीं, क्या बिडेन ने अपनी दुर्दशा समझाने के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

हमला करना ही काफी नहीं है बल्कि पहले परमाणु केंद्र पर हमला करना होगा. और अगर हम वहां हमला कर सकें तो ही ईरान की कमर टूट सकती है. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल-ईरान संघर्ष के संदर्भ में इजरायल को सलाह दी.

ट्रंप शुक्रवार को उत्तरी कैरोलिना में एक अभियान रैली के लिए गए थे। वहां उन्होंने इजराइल और ईरान के बीच हालिया संघर्ष का मुद्दा उठाया. इसके बाद उन्होंने इजराइल से कहा, ”जब तक वे (इजरायल) ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे, तब तक वे (ईरान) नहीं रुकेंगे. इसलिए, ईरान को सबक सिखाने के लिए इजराइल को अब ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला कर देना चाहिए.” पिछले बुधवार को पत्रकारों ने राष्ट्रपति जो बाइडन से पूछा था कि क्या वह ईरान पर हमले का समर्थन कर रहे हैं? तब बाइडेन ने अपने जवाब में कहा, ”बिल्कुल नहीं.” इसी संदर्भ में ट्रंप ने बाइडेन पर तंज कसा. उन्होंने बिडेन पर निशाना साधते हुए कहा, ‘जब उनसे (बिडेन) पूछा गया कि क्या वह संघर्ष का समर्थन करते हैं, तो उन्हें जवाब देना चाहिए था कि पहले ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हमला किया जाना चाहिए।’ उसके बाद अगली बात के बारे में सोचा जा सकता है!” ट्रंप ने कहा, ”लेकिन उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया.”

इजराइल दो सप्ताह से अधिक समय से लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ लड़ रहा है। ईरान ने हिजबुल्लाह के साथ खड़े होकर इजराइल पर हमला करना शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि अब त्रिकोणीय संघर्ष शुरू हो गया है. इजराइल ने लेबनान के अलावा ईरान पर भी हमले तेज कर दिए हैं. जवाब में ईरान ने भी हमले जारी रखे हैं. ऐसे में ट्रंप ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करना बेहतर समझते हैं.

आसियान पक्ष की बैठक में ब्लिंकन और श्री नरेंद्र मोदी की बातचीत

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जयशंकर सितंबर के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क गए थे। वहीं आज लाओस में भारत-आसियान शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्लिंकन आमने-सामने बैठे. दो हफ्ते पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन से मुलाकात की थी और अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने का संकल्प लिया था। जयशंकर सितंबर के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क गए थे। वहीं आज लाओस में भारत-आसियान शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्लिंकन आमने-सामने बैठे. मोदी ने हाल ही में अमेरिका में तूफान मिल्टन के कारण हुई क्षति और जानमाल के नुकसान पर दुख व्यक्त किया। इसके अलावा दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने पर भी बात की.

इसी सम्मेलन से इतर मोदी ने जापान और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्रियों के साथ बैठक की. मोदी ने जापान के नये प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा को बधाई दी. कहा, भारत हमेशा की तरह जापान को कूटनीतिक प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ेगा। आने वाले दिनों में भी दोनों देश वफादार दोस्त और रणनीतिक साझेदार बने रहेंगे।

न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के साथ मोदी की यह पहली मुलाकात और मुलाक़ात है. प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन में शामिल होने के न्यूजीलैंड के फैसले पर लैक्सन को बधाई दी और भारत आने का निमंत्रण दिया।

अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने फिर से युद्धविराम का प्रस्ताव रखा. सोमवार को इजरायली राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग के साथ बैठक के दौरान उन्होंने कहा, “कैदियों को घर लाने, युद्धविराम लागू करने और ईरान समर्थित आतंकवादियों द्वारा संचालित शांति और सुरक्षा का रास्ता चुनने का यह शायद सबसे अच्छा, आखिरी मौका है।” संगठन हिजबुल्लाह. इजराइल ने भी पलटवार किया.

अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकन युद्ध के दस महीनों के भीतर नौ बार पश्चिम एशिया गए। हर बार उन्होंने शांति की मांग की, युद्धविराम की पेशकश की। इस दिन ब्लिंकन ने कहा कि युद्धविराम के लिए यह “सबसे अच्छा” समय है। साथ ही उन्होंने ईरान को लेकर कहा, ‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी इस (संघर्ष विराम) प्रक्रिया को गुमराह नहीं कर सके।’ इसहाक हर्ज़ोग भी इस कथन से सहमत थे।

हालाँकि, बेंजामिन नेतन्याहू के प्रशासन ने युद्धविराम प्रस्ताव पर आपत्ति जताई। हमास ने आज एक बयान में अपना “गहरा असंतोष” व्यक्त करते हुए कहा कि नेतन्याहू मध्यस्थों के सभी प्रयासों को विफल कर रहे हैं। हालाँकि, इज़राइल ने बताया है कि प्रस्ताव में कुछ ऐसी बातें हैं जिनसे समझौता नहीं किया जा सकता है।

अमेरिका ने दावा किया है कि भारत में हेट स्पीच चिंताजनक रूप से बढ़ी है. बुधवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता पर एक रिपोर्ट (धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट) जारी की। रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा अभी भी पूरी दुनिया में कई लोगों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए.

ब्लिंकेन की बातों में भारत का भी जिक्र आता है. उन्होंने कहा, “हम भारत में घृणा भाषण, धर्मांतरण विरोधी कानूनों, अल्पसंख्यक घरों और पूजा स्थलों की बर्बरता में चिंताजनक वृद्धि देख रहे हैं। साथ ही, दुनिया भर में लोग धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।” रिपोर्ट के मुताबिक, शीर्ष अमेरिकी अधिकारी इन मुद्दों पर नई दिल्ली से बात कर रहे हैं।

संयोग से, लगभग सभी दलों के कई नेताओं पर लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नफरत भरे भाषण देने का आरोप लगाया गया है। राजस्थान में एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक टिप्पणी पर भी विवाद खड़ा हो गया. कांग्रेस ने दावा किया कि प्रधानमंत्री सीधे तौर पर विभाजन के लिए उकसा रहे हैं. हालांकि, बीजेपी ने आरोपों से इनकार किया है और कांग्रेस पर हमला बोला है. पिछले साल अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता पर आई एक रिपोर्ट में भी भारत में बहुलवाद, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई थी. हालाँकि, भारत ने रिपोर्ट को “गलत जानकारी पर आधारित निर्णय” कहकर खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारी उद्देश्यपूर्ण और पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट बना रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना ​​है कि अमेरिका और भारत के बीच मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के कारण दोनों में से कोई भी पक्ष नहीं चाहता कि बहस बहुत आगे तक जाए.

न्यूजीलैंड सीरीज के लिए भारत ने किया टीम का ऐलान, शमी को नहीं मिली जगह, KKR के क्रिकेटर रिजर्व

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भारत ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 15 सदस्यीय टीम का ऐलान कर दिया है. तीन टेस्ट मैचों की इस टीम में मोहम्मद शमी को जगह नहीं मिली. हालांकि, कोलकाता नाइट राइडर्स से खेलने वाले क्रिकेटर को रिजर्व टीम में जगह मिली है. भारत ने बांग्लादेश के खिलाफ आखिरी ट्वेंटी-20 मैच की पूर्व संध्या पर न्यूजीलैंड के खिलाफ 15 सदस्यीय टीम की घोषणा की। कप्तान रोहित शर्मा के नेतृत्व में तीन टेस्ट मैचों की इस टीम में मोहम्मद शमी को जगह नहीं मिली. हालांकि, रिजर्व टीम में कोलकाता नाइट राइडर्स के क्रिकेटर हर्षित राणा को जगह मिली है.

बांग्लादेश के खिलाफ टेस्ट सीरीज खेलने वाली भारतीय टीम और सीरीज में न्यूजीलैंड की टीम के बीच ज्यादा अंतर नहीं है. लेकिन उस टीम में कोई उपकप्तान नहीं था. न्यूजीलैंड के खिलाफ यशप्रित बुमरा को उपकप्तान बनाया गया है. यानी वह कप्तान रोहित के सहायक की भूमिका में नजर आएंगे. यह घोषणा कर क्रिकेट बोर्ड ने शायद टेस्ट में भारत के भावी कप्तान का संकेत दे दिया है.

न्यूजीलैंड के खिलाफ बल्लेबाजों की सूची में रोहित के अलावा यशस्वी जयसवाल, शुबमन गिल, विराट कोहली, लोकेश राहुल और सरफराज खान शामिल हैं। दो विकेटकीपर ऋषभ पंत और ध्रुव जुरेल हैं। टीम में चार स्पिनर हैं. रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जड़ेजा में से अक्षर पटेल और कुलदीप यादव को बाहर रखा गया है. टीम में बुमराह के अलावा दो अन्य तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज और आकाश दीप हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत ने न्यूजीलैंड सीरीज में तीन पेसर और चार स्पिनर लिए हैं. आश्चर्य टीम की आरक्षित सूची में. उनके युवा क्रिकेटर टीम के साथ रहेंगे. केकेआर के हर्षित उस लिस्ट में हैं. उनके अलावा नीतीश कुमार रेड्डी, मयंक यादव और प्रसिद्ध कृष्णा को रखा गया है. नितीश और मयंक ने बांग्लादेश के खिलाफ टी20 सीरीज में डेब्यू किया था. उन्होंने आंख पकड़ ली है. हर्षित का अभी डेब्यू होना बाकी है। शनिवार को होने वाले आखिरी टी20 के लिए उन्हें टीम में जगह मिल सकती है. उससे पहले कोलकाता के तेज गेंदबाज को एक और अच्छी खबर मिली.

भारत न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला टेस्ट 16 अक्टूबर से बेंगलुरु में खेलेगा. दूसरा टेस्ट 24 अक्टूबर से पुणे में। रोहित 1 नवंबर से मुंबई में न्यूजीलैंड के खिलाफ तीसरा टेस्ट खेलेंगे.

भारत आने से पहले न्यूजीलैंड को झटका लगा था. केन विलियमसन पहले टेस्ट में नहीं खेल पाएंगे. कमर में चोट के कारण उन्हें बाहर कर दिया गया था। उनके स्थान पर अनुभवी क्रिकेटर माइकल ब्रेसवेल को लिया गया है। इंग्लैंड ने बुधवार को भारत दौरे के लिए टीम की घोषणा की.

न्यूजीलैंड 16 अक्टूबर से भारत के खिलाफ टेस्ट सीरीज की शुरुआत करेगा. बेंगलुरु में पहला टेस्ट. विलियमसन उस मैच में नहीं खेल पाएंगे. इस एक टेस्ट के लिए ब्रेसवेल को विकल्प के तौर पर लाया गया है. इसके अलावा स्पिनर ईश सोढ़ी भी पहले टेस्ट में नहीं खेल पाएंगे. वह अगले दो टेस्ट खेलेंगे.

कुछ दिन पहले ही टिम साउदी ने टेस्ट टीम की कप्तानी से इस्तीफा दे दिया था. इसलिए भारत सीरीज में नए कप्तान के तहत न्यूजीलैंड से खेलेगा। टॉम लैथम नेतृत्व करेंगे. न्यूजीलैंड की वेबसाइट ने लिखा, “श्रीलंका के खिलाफ गुल में दूसरे टेस्ट में विलियमसन को कमर में मामूली परेशानी हुई।” इसलिए उन्हें भारत सीरीज से पहले रिहैब के लिए भेजा गया है।”

न्यूजीलैंड के चयनकर्ता सैम वेल ने कहा कि विलियमसन को अतिरिक्त आराम देने के लिए टीम में शामिल नहीं किया गया है. उन्होंने कहा, ”हमें बताया गया कि केन को आराम देना सबसे अच्छा होगा. ऐसा नहीं करने पर उनकी चोट बढ़ने की आशंका है. मुझे उम्मीद है कि केन पुनर्वास के बाद ठीक हो सकता है। दौरे के अंत में खेल सकते हैं. लेकिन हम केन को शुरू से ही नहीं पकड़ पाने से निराश हैं। हालाँकि, दूसरों को उसकी भूमिका निभाने का अवसर मिलता है।” न्यूजीलैंड को मार्क चैपमैन पर भरोसा है. उन्हें अभी भी लाल गेंद वाले क्रिकेट में देश के लिए खेलना बाकी है। हालाँकि, उन्होंने प्रथम श्रेणी में 44 मैच खेले। वेल्स ने दावा किया, “हमें लगता है कि जब स्पिन खेलने की बात आती है तो चैपमैन टीम में सर्वश्रेष्ठ में से एक है।” उपमहाद्वीप का भी अच्छा खेलने का इतिहास रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स्पिन को कुशलता से खेला. प्रथम श्रेणी में भी अच्छा रिकॉर्ड है.”

 

न्यूजीलैंड के चयनकर्ता सैम वेल ने कहा कि विलियमसन को अतिरिक्त आराम देने के लिए टीम में शामिल नहीं किया गया है. उन्होंने कहा, ”हमें बताया गया कि केन को आराम देना सबसे अच्छा होगा. ऐसा नहीं करने पर उनकी चोट बढ़ने की आशंका है. मुझे उम्मीद है कि केन पुनर्वास के बाद ठीक हो सकता है। दौरे के अंत में खेल सकते हैं. लेकिन हम केन को शुरू से ही नहीं पकड़ पाने से निराश हैं। हालाँकि, दूसरों को उसकी भूमिका निभाने का अवसर मिलता है।”