Wednesday, March 18, 2026
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पीएम मोदी के दौरे से भारत में क्यों तेज हुई राजनीतिक सियासत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि पीएम मोदी के दौरे से भारत में राजनीतिक सियासत क्यों तेज हो जाती है! पीएम नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर हैं। इधर भारत में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है।दरअसल पीएम मोदी के अमेरिका दौरे के दिन ही वहां उनके खिलाफ पोस्टर देखे गए। बीजेपी ने इस घटना के लिए राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि हाल ही में अमेरिका दौरे पर गए राहुल गांधी का इस मामले से संबंध हो सकता है। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने इन पोस्टरों को ‘भारत विरोधी नफरत की दुकान’ का काम बताया। उन्होंने कहा, ‘भारतीयों को शक है कि क्या ये पोस्टर राहुल गांधी के अमेरिका में भारत विरोधी ताकतों से मुलाकात का नतीजा तो नहीं हैं। क्योंकि वह कुछ दिन पहले ही अमेरिका से लौटे हैं।’ उन्होंने कहा कि देश के हर व्यक्ति में यह संदेह पैदा होता है टाइमलाइन को देखकर, कहीं इसके पीछे वही लोग तो नहीं हैं, जो राहुल गांधी से भारत विरोधी शक्तियों की मुलाकात कराकर, भारत विरोधी सियासत को बढ़ा रहे थे। फिर चाहे अंकल सैम से हों, या कोई भी हो और अधिक दुख इस बात का होता है कि उस प्रधानमंत्री के लिए है, जिसने भारत को 10 वर्षों में फ्रेजाइल फाइव से टॉप-5 इकोनॉमी में पहुंचाया है। जिसने 26 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। जिसने डिजिटल वर्ल्ड में भारत को सिरमौर बनाया, जिसने आंतरिक और बाह्य सुरक्षा इतनी सुधारी कि 10 साल पहले भारत का कोई ऐसा राज्य या बड़ा शहर नहीं था, जहां आतंकी हमले ना होते हो।

उन्होंने कहा कि अफसोस की बात यह है कि एक तरफ हमारे ऐसे प्रधानमंत्री जो हर भारतवासी के लिए भारत के गौरव, राष्ट्रीय अस्मिता और राष्ट्रवाद के एक महामेरु पर्वत के रूप में दिखाई पड़ते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ यह नफरती दुकान का इश्तेहार उनके ऊपर निम्न स्तरीय प्रहार करने का प्रयास दिखता है। ऐसे विज्ञापन देने वाले लोग जो भले ही मुखौटा कोई और लगाएं हों, मगर सारा देश समझ रहा है कि पीछे से वह किसके द्वारा संचालित हैं।

अमेरिका में अपने हालिया बयान के बारे में BJP पर झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी ने शनिवार को सिखों से पूछा कि उन्होंने जो कहा, उसमें कुछ गलत है। क्या भारत ऐसा देश नहीं होना चाहिए, जहां हर भारतीय बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सके। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि BJP उन्हें चुप कराने के लिए बेताब है, क्योंकि वह सच्चाई बर्दाश्त नहीं कर सकती।

राहुल ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘BJP अमेरिका में मेरे बयान के बारे में झूठ फैला रही है। मैं भारत और विदेश में रहने वाले हर सिख भाई-बहन से पूछना चाहता हूं- क्या मैंने जो कहा है उसमें कुछ गलत है? क्या भारत ऐसा देश नहीं होना चाहिए जहां हर सिख और हर भारतीय बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सके?’ राहुल ने कहा वह हमेशा उन मूल्यों के लिए बोलेंगे जो भारत को परिभाषित करते हैं- विविधता में हमारी एकता, समानता और प्रेम।

गांधी ने अमेरिका में दिए गए अपने बयान का एक छोटा विडियो भी शेयर किया, जिसमें वह एक सिख व्यक्ति का जिक्र कर रहे हैं। वॉशिंगटन डीसी के उपनगर वर्जीनिया के हर्नडॉन में भारतीय-अमेरिकियों की एक सभा में राहुल ने कहा था, ‘सबसे पहले, आपको यह समझना होगा कि लड़ाई किस बारे में है। यह लड़ाई राजनीति की नहीं है। लड़ाई इस बात पर है कि क्या उन्हें एक सिख के रूप में भारत में पगड़ी पहनने की अनुमति दी जाएगी या उन्हें एक सिख के रूप में भारत में कड़ा पहनने की अनुमति दी जाएगी। या फिर वह एक सिख के तौर पर गुरुद्वारे जा पाएंगे। लड़ाई इसी बात को लेकर है। और सिर्फ उनके लिए नहीं सभी धर्मों के लिए है।’

BJP ने कई सिख समूहों के संयुक्त बयान का हवाला देते हुए शनिवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से अमेरिका में दिए बयान को वापस लेने को कहा। BJP नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि कई सिख और गुरुद्वारा प्रबंधन निकायों ने इस मुद्दे पर गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय से मुलाकात की और उन्होंने कहा कि सिखों के बलिदान ने देश को मजबूत बनाया है। सिरसा ने कहा कि सिख संगठनों ने गांधी से बयान वापस लेने का आग्रह किया है क्योंकि यह उन्हें नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने कहा कि गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसी राष्ट्र विरोधी ताकतों ने गांधी की टिप्पणी का फायदा उठाया है।

 

क्या अब राहुल गांधी को देना चाहिए घरेलू राजनीति पर ध्यान?

अब राहुल गांधी को घरेलू राजनीति पर ध्यान देना चाहिए! यह बात हम नहीं बल्कि राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं! वर्जीनिया में सिख समुदाय के बारे में विवादास्पद टिप्पणी को लेकर खूब विवाद हुआ। ऐसे में राहुल गांधी के विदेश दौरे, जो कभी भारत के लिए उनकी पार्टी के वैकल्पिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करने के लिए एक अच्छा विचार प्रतीत होते थे, पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। एक तो, उनके पास कहने के लिए कुछ भी नया नहीं बचा है और अब वे अपनी बात को दोहराने पर मजबूर हो गए हैं। हालांकि, इससे अधिक गंभीर बात यह है कि उनके श्रोताओं में मुख्य रूप से (अक्सर पूरी तरह से) धर्मांतरित लोग शामिल होते हैं। इनमें कांग्रेस की ओर झुकाव रखने वाले भारतीय प्रवासी और भारतीय ओवरसीज कांग्रेस ओर अन्य सहानुभूति समूहों की तरफ से जुटाए गए छात्र भी होते हैं। प्रवासी बुलबुले के बाहर, भारत की घरेलू राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी उपस्थिति को मुख्यधारा के मीडिया में बमुश्किल ही जगह मिलती है।

इसलिए, यह पूछना उचित है कि वास्तव में उनके संदेश को कौन सुन रहा है? यदि इसका उद्देश्य विदेश नीति निर्माताओं को नरेंद्र मोदी सरकार के तहत भारत की यात्रा की दिशा के बारे में कांग्रेस पार्टी की चिंताओं से परिचित कराना है, तो यह स्पष्ट रूप से नहीं हो रहा है। इन परिस्थितियों में, राहुल के लिए यह सलाह होगी कि वे इन यात्राओं से ब्रेक लें। इसके बजाय घरेलू राजनीति पर ध्यान केंद्रित करें, जहां वे अधिक उपयोगी होंगे। हालांकि, यदि उन्हें इनसे जुड़े रहना है, तो कांग्रेस को उन्हें बेहतर तरीके से मैनेज करना होगा। या यूं कहें कि उन्हें राहुल गांधी को मैनेज करना होगा। हाल ही में अमेरिका दौरे के दौरान सिख समुदाय के अधिकारों के लिए उनकी चिंता की शर्मनाक अभिव्यक्तियों से उत्पन्न विवाद से कांग्रेस नेतृत्व को सचेत हो जाना चाहिए। राहुल को बिना उचित स्क्रिप्ट के मंच पर जाने की अनुमति देना खतरे से खाली नहीं है।

बेशक, वह खुद अपने बड़े बॉस हैं और उन्हें यह बताने की आदत नहीं है कि उन्हें क्या करना है। लेकिन अगर पार्टी को और अधिक अनावश्यक विवादों और शर्मिंदगी से बचना है तो किसी को (सोनिया गांधी? प्रियंका?) बिल्ली के गले में घंटी बांधनी होगी। सिख अधिकारों और सुरक्षा के रक्षक के रूप में अपनी पार्टी को पेश करने के प्रयास में उन्होंने जो गलती की, वह कोई साधारण “गलत बात” नहीं थी। कांग्रेस-सिख संबंधों के परेशान करने वाले इतिहास को देखते हुए यह एक बड़ी गलती थी।

सिखों पर राहुल का बयान यह प्राइमरी स्कूल के बच्चे जैसी गलती थी, जिसकी एक अनुभवी अग्रणी राजनीतिक नेता से अपेक्षा नहीं की जाती थी। इसकी वजह है कि सिखों के खिलाफ सबसे भयानक अत्याचारों में से एक उनकी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया था। ऐसा 1984 में इंदिरा गांधी की उनके एक सिख अंगरक्षक द्वारा हत्या के बाद हुआ था। इतिहास की थोड़ी-बहुत भी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में जाने से बचने के लिए हरसंभव प्रयास करता, भले ही इसके लिए उसकी कीमत क्यों ना चुकाई हो।

राहुल तब तक स्पष्टीकरण देते रह सकते हैं जब तक कि उनका चेहरा नीला न पड़ जाए कि उनकी टिप्पणियों को संदर्भ से बाहर ले जाया गया और गलत व्याख्या की गई। हो सकता है कि ऐसा हुआ हो – लेकिन अंततः समस्या उनकी अपनी ही वाणी की असंवेदनशीलता है। एक परिपक्व नेता की यह पहचान है कि वह संभावित राजनीतिक बारूदी सुरंग को मील भर की दूरी से पहचान सके और उससे बच सके। हालांकि, यह पहली बार नहीं है कि राहुल बिना सोचे-समझे किसी बारूदी सुरंग में फंस गए हों – अलेक्जेंडर पोप के ‘मूर्खों की तरह जो वहां भागते हैं जहां स्वर्गदूत भी कदम रखने से डरते हैं।

राहुल अपने ‘पप्पू’ दिनों से भले ही काफी आगे निकल आए हों, लेकिन उनके कम्युनिकेशन स्किल और जटिल राजनीतिक विचारों की समझ पर अभी भी एक प्रश्नचिह्न लटका हुआ है। जबकि वह हिट-एंड-रन वन-लाइनर्स (‘सूट बूट की सरकार, ‘चौकीदार चोर है’) में अच्छे हैं। वह एक तर्क विकसित करने और इसे अपने तार्किक निष्कर्ष पर ले जाने के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्जीनिया में भी यही हुआ था, जहां वे एक विषय से दूसरे विषय पर कूदते रहे और साथ ही साथ उसे बनाते भी रहे।

राहुल गांधी स्पष्ट किया है कि सिख अधिकारों के बारे में उनकी टिप्पणियों का संदर्भ, जो उनके अस्त-व्यस्त प्रस्तुतिकरण में खो गया, अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार के लिए मोदी सरकार पर उनका व्यापक हमला था। इसके बाद उन्होंने कहा कि बीजेपी अमेरिका में उनकी टिप्पणियों को लेकर झूठ फैला रही है। लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था, यहां तक कि उदार सिखों ने भी उनकी टिप्पणियों को ‘अस्पष्ट और विचित्र’ बताया, जैसा कि पत्रकार हरिंदर बावेजा ने लिखा, जिनके परिवार ने कांग्रेस द्वारा भड़काई गई 1984 की हिंसा के दौरान कष्ट झेले थे। उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने पुराने घावों को फिर से हरा कर दिया।

कई सिख समूहों ने एक संयुक्त बयान जारी कर राहुल से अपनी टिप्पणी वापस लेने को कहा, जबकि बीजेपी ने निश्चित रूप से उनके बयान को लेकर उन पर पाखंड करने और एक संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, जो स्वयं एक सिख हैं, ने कहा, यदि हमारे इतिहास में ऐसा कोई समय रहा है, जब एक समुदाय के रूप में हमने चिंता, असुरक्षा की भावना और अस्तित्व के लिए खतरा महसूस किया है, तो वह समय वह रहा है, जब राहुल गांधी का परिवार सत्ता में काबिज रहा था।

दूसरी ओर, भाजपा और उसके ‘भक्तों’ के लिए, यह सब मोदी के ‘नए’ भारत के उज्ज्वल भविष्य के बारे में है। अर्थव्यवस्था में उछाल, छद्म धर्मनिरपेक्षता की जगह सभी के लिए सामाजिक न्याय (सब का साथ, सब का विकास), भ्रष्टाचार का खात्मा, ‘अमृत काल’ आ गया है… दोनों में से कोई भी कहानी – नेहरूवादी ‘स्वर्ण युग’ के बारे में उदारवादी कहानी या आरएसएस का ‘सभ्यतागत पुनर्जागरण’ का दावा ,हमें पूरी कहानी नहीं बताती है। वास्तविकता अधिक जटिल है।

मुख्य समस्या उदारवादी-दक्षिणपंथी विभाजन नहीं है, बल्कि ध्रुवीकरण की अभूतपूर्व सीमा है, जिसमें देश के आधिकारिक नाम पर भी आम सहमति नहीं बन पा रही है। ‘औपनिवेशिक’ भारत या ‘सभ्यतागत’ प्रामाणिक भारत? इस बीच, अगर राहुल अगली बार विदेश यात्रा पर जाएं, तो उनके लिए अच्छा होगा कि वे अपने साथ एक अच्छा स्क्रिप्ट राइटर और भाषण ट्रेनर ले जाएं।

 

क्या योगी आदित्यनाथ की राह पर चल रहे हैं हिमाचल के विक्रमादित्य?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हिमाचल के विक्रमादित्य योगी आदित्यनाथ की राह पर चल रहे हैं या नहीं! हिमाचल प्रदेश में शहरी विकास मंत्री विक्रमादित्य सिंह की अध्यक्षता 25 जनवरी को हुई बैठक में फॉस्ट फूड, रेहड़ी और ढाबों के मालिकों को अपनी दुकानों के बाहर पहचान पत्र लगाने का निर्देश दिया गया। विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में भी रेहड़ी पटरी वालों को आईडी लगाने का आदेश दिया गया। अब हमने इसे अपने यहां भी मजबूती से लागू करने का फैसला किया है। इसके लिए स्ट्रीट वेडिंग कमेटी बनाई गई है, ताकि आने वाले दिनों में कोई भी ऐसा मामला प्रकाश में आए, तो पारदर्शिता के साथ उस पर कार्रवाई हो सके। खासबात है कि कुछ समय बाद ही इस मुद्दे पर सरकार में इसका विरोध दिखाई देने लगा। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने खुलकर विरोध किया। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि इससे आम व्यापारी, रेड़ी पटरी वाले, ढाबे वाले प्रताड़ित होंगे, यह कानून वापस होना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में राज्य सरकार ने सिंह के बयान से खुद को अलग कर लिया और कहा कि ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

बीजेपी ने इस मुद्दे को हाथोंहाथ लेने में देर नहीं की। विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने दावा किया कि उसने इस कदम का विरोध इसलिए किया क्योंकि यह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘मॉडल’ है। जयराम ठाकुर ने कहा कि राज्य सरकार कांग्रेस आलाकमान के दबाव के आगे झुक गई है।

मंत्री विक्रमादित्य सिंह के इस बयान का हिमाचल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने समर्थन किया है। प्रतिभा सिंह ने विक्रमादित्य सिंह के बयान पर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि सरकार ने यह फैसला किया है कि खाने की दुकान लगाने वाले लोगों की पहचान होनी चाहिए कि वे कौन हैं और कहां से आए हैं। इसके अलावा, जो सामान वे बेच रहे हैं, उसकी शुद्धता बनी रहे, इसलिए सरकार ने यह फैसला लिया है। विक्रमादित्य सिंह के इस फैसले को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। विक्रमादित्य सिंह ने कुछ समय पहले ही पार्टी के खिलाफ बागी रुख अख्तियार कर लिया था। उनके पार्टी छोड़ने की खबरें भी आईं थी। हालांकि, कांग्रेस आलाकमान ने इस असंतोष को किसी तरह से मैनेज कर लिया। अब विक्रमादित्य ने जिस तरह से फैसला लिया उससे सवाल उठ रहा है कि क्या विक्रमादित्य हिमाचल में सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रहे हैं? विक्रमादित्य सिंह को योगी सरकार का मॉडल भा गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विक्रमादित्य को लग रहा है कि पार्टी को यदि राज्य में मजबूती हासिल करनी है तो उसे हिंदू वोटों को अपने पक्ष में सुनिश्चित करना होगा। जिस तरह से देव भूमि हिमाचल की जनता वहां की डेमोग्राफी के बदलाव को लेकर सड़कों पर विरोध कर रही है तो विक्रमादित्य को इसमें अपने लिए राजनीतिक भविष्य दिखाई दे रहा है। युवा मंत्री का मानना है कि हिमाचल में वोट बैंक को आकर्षित करने के लिए पार्टी को पर्याप्त हिंदू के रूप में देखा जाना चाहिए, नाराज शीर्ष नेताओं का मानना है कि यह कदम न केवल इसे भाजपा के समान बनाता है बल्कि योगी सरकार पर इसके हमलों की तीव्रता को भी कम करता है।

हिमाचल प्रदेश में 96 प्रतिशत हिंदू आबादी है। ऐसे में विक्रमादित्य सिंह समेत कई पार्टी के नेताओं के लिए धर्म का कार्ड खेलना या इस वोट बैंक को लुभाने वाले फैसलों का समर्थन करना राजनीतिक मजबूरी बन गया है। यही कारण है कि भले ही कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखू ने घोषणा की कि इस अवसर पर राज्य सरकार की इमारतों को सजाया जाएगा और दीये जलाए जाएंगे। सिंह, वास्तव में इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अयोध्या गए थे।

इसके बाद कुसुम्पटी में मस्जिद और नमाज को लेकर विवाद गहरा गया। मंडी जिले में दशकों पुरानी एक मस्जिद को लेकर भी बवाल हुआ। रामपुर, सुन्नी और कुल्लू जिला मुख्यालय में भी ऐसे ही मामले देखने को मिले। इस सब के बीच कांग्रेस नेता विक्रमादित्य सिंह वक्फ बोर्ड के मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग बयान दिया। विक्रमादित्य इस कानून में सुधार के पक्ष में बयान दिया। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने वक्फ बोर्ड में सुधार की जरूरत की बात कही। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा ‘हिमाचल और हिमाचलियत के हित सर्वश्रेष्ठ, सर्वत्र हिमाचल का संपूर्ण विकास। जय श्री राम! समय के साथ हर कानून में तब्दीली लाना आवश्यक है। वक्फ बोर्ड में भी बदलते समय के साथ सुधार की आवश्यकता है’।

कांग्रेस भाजपा के हिंदुत्व वाली छवि को लेकर उसे हमेशा घेरती रही है। कांग्रेस की तरफ से केंद्र सरकार और जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है उनके द्वारा लिए जा रहे फैसलों को लेकर कहा जाता है कि बीजेपी हिंदुत्व की अपनी सोच के साथ आगे बढ़ रही है। हिमाचल में वीरभद्र सिंह के बाद उनकी विरासत पत्नी प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह के हाथों में है। प्रतिभा सिंह पार्टी की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। अब विक्रमादित्य जिस योगी मॉडल पर चल रहे हैं उससे कांग्रेस आलाकमान दुविधा में है। खास बात है कि प्रतिभा सिंह भी अपने बेटे के साथ खड़ी नजर आ रही है।

ऐसे में विक्रमादित्य का बागी रुख कांग्रेस के लिए भीतरखाने परेशानी का सबब बना हुआ है। पार्टी अपने पुराने सिपाही से नाता नहीं छोड़ना चाहती है। वहीं, पिछले कुछ समय से जिस तरह से विक्रमादित्य सिंह का रुख है, वह पार्टी के लिए निश्चित रूप से दुविधा वाला है। सूत्रों के हवाले से खबर यह भी है कि विक्रमादित्य सिंह की टिप्पणी से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी हाईकमान नाराज है। उन्हें हाईकमान ने दिल्ली तलब किया है। इस बीच प्रतिभा सिंह शनिवार को दिल्ली पहुंची। उन्होंने पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से मुलाकात की। वेणुगोपाल ने विक्रमादित्य सिंह से बात की। वेणुगोपाल ने कहा कि मैंने उन्हें पार्टी की भावनाओं से अवगत कराया। इस पर विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया।

 

क्या अब बढ़ सकता है चीन और भारत सीमा विवाद?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब आने वाले समय में चीन और भारत सीमा विवाद बढ़ सकता है या नहीं! भारत के साथा चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर गतिरोध बना हुआ है। दोनों पक्षों की तरफ से मुद्दे के हल को लेकर बातचीत का दौर जारी है। हालांकि, अभी तक सीमा पर गतिरोध कोई स्थायी समाधान निकलता नहीं दिख रहा है। इस बीच जनरल उपेंद्र द्विवेदी चीन के साथ भारत सेना को लेकर अहम बात कही है। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार को चीन के साथ तनाव से निपटने के मुश्किल प्रकृति पर कहा कि भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा, सहयोग, सह-अस्तित्व, टकराव और प्रतिस्पर्धा करनी होगी। सेना प्रमुख ने कहा कि जहां तक चीन का संबंध है तो वह काफी समय से हमारे मन में कौतूहल पैदा कर रहा है। मैं कह रहा हूं कि चीन के साथ आपको प्रतिस्पर्धा करनी होगी, आपको सहयोग करना होगा, आपको एक साथ रहना होगा, आपको मुकाबला करना होगा। सेना प्रमुख के बयान से साफ है कि हमारी सेना चीन के साथ किसी भी स्थिति के लिए पूरी तरह से तैयार है।

पूर्वी लद्दाख में चीन और भारत के बीच जारी सैन्य गतिरोध पर सैन्य प्रमुख ने कहा कि इस क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति स्थिर, लेकिन संवेदनशील है और सामान्य नहीं है। जनरल द्विवेदी ने कहा कि हालांकि, विवाद के समाधान पर दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक वार्ता से एक ‘सकारात्मक संकेत’ सामने आ रहा है लेकिन किसी भी योजना का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर सैन्य कमांडरों पर निर्भर करता है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कूटनीतिक वार्ता से सकारात्मक संकेत मिल रहा है लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि कूटनीतिक वार्ता विकल्प और संभावनाएं देती हैं।

दोनों सेनाओं के बीच सैन्य गतिरोध मई 2020 की शुरुआत में शुरू हुआ। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई भीषण झड़प के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव पैदा हो गया था। दोनों पक्षों ने गतिरोध वाले बिन्दुओं से कई सैनिकों को हटाया है लेकिन इसके बावजूद अभी तक सीमा विवाद का पूर्ण समाधान नहीं निकला है। भारत लगातार कहता रहा है कि जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति नहीं होगी, चीन के साथ उसके संबंध सामान्य नहीं हो सकते। गतिरोध का समाधान निकालने के लिए दोनों पक्षों के बीच अब तक कोर कमांडर स्तर की 21 दौर की वार्ता हो चुकी है। भारत, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पर देपसांग और डोमचोक इलाकों से सैनिकों को हटाने का दबाव बना रहा है। दोनों पक्षों ने आखिरी दौर की उच्च स्तरीय सैन्य वार्ता फरवरी में की थी।

पिछले महीने, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इस विवाद का जल्द समाधान तलाशने पर ध्यान केंद्रित करने के साथ रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में वार्ता की थी। ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) देशों के सम्मेलन से इतर हुई बैठक में दोनों पक्षों ने पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले शेष स्थानों से सैनिकों को पूरी तरह से पीछे हटाने के लिए ‘तत्परता’ से काम करने और अपने प्रयासों को बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की थी। बैठक में डोभाल ने वांग को बताया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और एलएसी का सम्मान द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति बनाने के लिए जरूरी है।

हालांकि, तनाव कम करने और हालात सामान्य करने के लिए भारत और चीन के बीच कई दौर की राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत हो चुकी है। इसमें कुछ प्रगति हुई है और मतभेद कम हुए हैं। लेकिन, शीर्ष रक्षा सूत्रों ने बताया है कि जमीनी स्तर पर चीन की सेना (PLA) पर भरोसा अभी भी बहुत कम है। भारतीय सेना सर्दियों की तैनाती की तैयारी में जुटी है। सर्दियों के लिए बड़े पैमाने पर सामान जुटाया जा रहा है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और सेना की सातों कमानों के प्रमुख 9-10 अक्टूबर को सिक्किम के गंगटोक में ऑपरेशनल स्टेटस की समीक्षा करेंगे।

हालिया राजनीतिक-कूटनीतिक बातचीत से पूर्वी लद्दाख में पिछले करीब साढ़े 4 साल से सैन्य गतिरोध को तोड़ने की संभावना दिखाई देती है। इन बातचीत में 31 जुलाई और 29 अगस्त को भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र (WMCC) की 30वीं और 31वीं बैठकें शामिल थीं।राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने 12 सितंबर को सेंट पीटर्सबर्ग में ब्रिक्स बैठक के मौके पर चीनी विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात की। पिछले डिसइंगेजमेंट के बाद स्थापित बफर जोन के कारण, भारतीय सैनिक पूर्वी लद्दाख में अपने 65 में से 26 गश्ती बिंदुओं तक नहीं पहुंच सकते हैं। ये पट्रोलिंग पॉइंट उत्तर में काराकोरम दर्रे से शुरू होते हैं और पूर्वी लद्दाखके दक्षिण में चुमार तक हैं।

एक अधिकारी ने कहा, ‘यहां तक कि बफर जोन को भी केवल अस्थायी व्यवस्था माना जाता था। चीन अनुचित मांगें करता रहता है और लंबे समय तक इंतजार करने का खेल खेल रहा है। भारत को चीन के जाल में फंसने से सावधान रहना होगा।’ उन्होंने कहा, ‘अगर दोनों पक्ष एक व्यापक रूपरेखा पर सहमत होते हैं, तो डेपसांग और देमचोक में वास्तविक डिसइंगेजमेंट के तौर-तरीकों पर सैन्य स्तर पर काम किया जा सकता है।’ सेना किसी भी स्थिति से निपटने के लिए प्रत्येक LAC सेक्टर में सैनिकों के समायोजन और पर्याप्त आरक्षित बलों के साथ उच्च स्तर की परिचालन तत्परता बनाए हुए है। वर्तमान गतिरोध को तोड़ने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा को संभावित रास्ता माना जा रहा है।

 

क्या वर्तमान में मोसाद बन चुका है खुफिया एजेंसियों का मालिक?

वर्तमान में मोसाद खुफिया एजेंटीयों का मालिक बन चुका है! दुनिया की सबसे खतरनाक और बेरहम मानी जाने वाली इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की पेजर ब्लास्ट टेक्नीक पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। कहा जा रहा है कि यह तकनीक मोसाद के Operation Wrath of God यानी ईश्वर का कोप ऑपरेशन का हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल तब किया गया था, जब 1972 में जर्मनी में म्यूनिख ओलंपिक चल रहे थे। उस वक्त 11 इजरायली एथलीट मारे गए थे। इसके बाद अगले 20 साल तक मोसाद ने अपने खिलाड़ियों के हत्यारों को पूरी दुनिया में खोज-खोजकर मारा। लेखक साइमन रीव की किताब ‘वन डे इन सेप्टेम्बर’ में लिखा है कि इजरायल ने म्यूनिख में मारे गए अपने खिलाड़ियों की मौत का बदला लेने के लिए अपनी खूंखार सीक्रेट एजेंसी मोसाद को इस काम में लगाया, जिसने उन्हें खोज निकालने के लिए दिन-रात एक कर दिया और उन्हें मार डाला। जॉनी…हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे, पर बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी और वह वक्त भी हमारा होगा…फिल्म सौदागर में अभिनेता राजकुमार का ये डायलॉग सबको याद तो जरूर होगा। इसकी याद एक बार फिर आई, जब मोसाद ने हिज्बुल्लाह पर पेजर ब्लास्ट कर सनसनी मचा दी। अब पेजर ब्लास्ट तकनीक से इजरायल ने हिज्बुल्लाह पर यह हमला किया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा खुफिया विश्लेषक डेविड कैनेडी के अनुसार, इजरायल ने 1996 में हमास नेता याहया अयाश की हत्या के लिए उसके फोन में 15 ग्राम आरडीएक्स विस्फोटक प्लांट कर दिया था। इस डिवाइस में उस समय विस्फोट हुआ, जब याहया ने अपने पिता को फोन किया। कहा जा रहा है कि कई महीने पहले लेबनानी आतंकी ग्रुप हिजबुल्लाह ने ताइवान में बने 5000 पेजर के ऑर्डर दिए थे। डिलीवरी से पहले ही मोसाद ने पेजर के अंदर छेड़छाड़ करके उसमें 3 ग्राम से लेकर 15 ग्राम तक विस्फोटक प्लांट कर दिए थे।

कहा जा रहा है कि मोसाद को अपने ऑपरेशन को अंजाम देने में कई महीने लगे होंगे, क्योंकि हिजबुल्लाह ने महीनों पहले अपने लड़ाकों के लिए ये ऑर्डर ताइवान की गोल्ड अपोलो कंपनी को 5,000 पेजर बनाने का ऑर्डर दिया था। हाल ही में अपने लड़ाकों को देने के लिए ये पेजर ताइवान से मंगाए गए थे, जो उनकी जेबों और थैलों में फट पड़े। हालांकि, कंपनी ने इन पेजर्स का अपना होने से इनकार किया है।

कहा जा रहा है कि मोसाद ने इन पेजर को लेबनान भेजे जाने से पहले ही उसे हैक कर लिया था। हिजबुल्लाह ने यह सोचा था कि वह उसके लड़ाके लोकेशन ट्रैकिंग से बचने के लिए पेजर का इस्तेमाल करेंगे तो उसे स्मार्टफोन की तरह हैक नहीं किया जा सकेगा। मगर, लेबनानी सूत्रों ने दावा किया कि पेजर को इजरायली खुफिया एजेंसी कंट्रोल कर रही थी। उसने इजरायल से इसका बदला लेने का ऐलान किया है।

बताया जा रहा है कि महीनों पहले मोसाद ने पेजर डिवाइस के अंदर एक विस्फोटक बोर्ड इंजेक्ट किया था। इसमें 3 ग्राम से लेकर 15 ग्राम तक विस्फोटक लगाए गए थे। इसमें लिथियम ऑयन बैटरी के साथ एक छोटा विस्फोटक छिपाया गया, जिसे बस एक मैसेज के जरिये विस्फोट कराया गया। हिजबुल्लाह ने यह समझा कि शायद बैटरी गर्म होने की वजह से फट गई, मगर बाद में माना कि यह इजरायली बम विस्फोट थे।

हाल ही में इजरायल के नंबर वन दुश्मन हमास के चीफ इस्माइल हानिया की ईरान की राजधानी तेहरान में हत्या के बाद से मोसाद काफी चर्चा में रहा था। तब यह बताया गया था कि तेहरान से 1500 किलोमीटर दूर इजरायल के किसी अनजान ठिकाने से मोसाद ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) की मदद से हानिया की हत्या को अंजाम दिया। उस दौरान सैटेलाइट इमेज की भी मदद ली गई थी।

अमेरिकी लेखक मार्क इ वार्गो की किताब ‘द मोसाद: सिक्स लैंडमार्क मिशंस’ के अनुसार, मोसाद को इंस्टीट्यूट फॉर इंटेलीजेंस एंड स्पेशल ऑपरेशंस के नाम से भी जाना जाता है। इसका मकसद है ‘खुफिया जानकारी जुटाओ, मिशन को अंजाम दो और आतंकवाद को नेस्तनाबूद कर दो। इजरायल के बनने के कुछ समय बाद ही मोसाद का गठन हुआ, जिसका तेल अवीव में मुख्यालय है। 13 दिसंबर, 1949 को जब इसका गठन हुआ तो इसे सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर कोऑर्डिनेशन के नाम से जाना गया। इजरायल में तीन प्रमुख एजेंसियां हैं – अमन, मोसाद और शिन बेट। अमन जहां सैन्य खुफिया जानकारी मुहैया कराती है। वहीं मोसाद विदेशी जासूसी मामलों को संभालती है और शिन बेट घरेलू सुरक्षा का ख्याल रखती है।

जनवरी, 2010 की बात है, जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम के एक सलाहकार की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। उनकी कार के पास खड़ी मोटरसाइकिल में छिपाकर बम रखे गए थे। उस वक्त भी मोसाद के इसमें हाथ होने के आरोप लगे थे। 2011 में ईरान के एक परमाणु परियोजना प्रमुख अपनी कार में कहीं जा रहे थे और तभी उनकी बगल चल रहे एक मोटरसाइकिल चालक ने कार की पिछली विंडशील्ड पर एक छोटी सी डिवाइस चिपका दी। चंद सेकंड बाद ही उस डिवाइस से हुए विस्फोट में 45 वर्षीय न्यूक्लियर वैज्ञानिक के चिथड़े उड़ गए। मोसाद पर 5 ईरानी वैज्ञानिकों की हत्या के आरोप लग चुके हैं।

मोसाद पर यह भी आरोप लगे हैं कि वह ईरान पर 8 बड़े साइबर हमलों में शामिल था। सबसे बड़ा साइबर हमला 2010 का माना जाता है, जब यह कहा गया कि इजरायली एजेंसी ने स्टक्सनेट वायरस का पहली बार ईरानी परमाणु संयंत्र के कंप्यूटरों में प्रवेश करा दिया। नतीजतन ईरान के 9000 सेंट्रीफ्यूज में से 1000 से ज्यादा बर्बाद हो गए।

 

आखिर कैसे तबाह हुआ लेबनान?

आज हम आपको बताएंगे कि लेबनान कैसे तबाह हुआ था !इजरायल ने अपने परंपरागत दुश्मन हिजबुल्लाह के गढ़ लेबनान में बड़े हमले किए हैं। इन हमलों में कम से कम 500 लोगों के मारे जाने की खबरें हैं। कहा जा रहा है कि इजरायल के इन हमलों में उसके रक्षा कवच आयरन डोम का भी हाथ है, जो हिजबुल्लाह की ओर से किए गए हमलों को विफल कर देता है। ये भी कयास लग रहे हैं कि इन हमलों के पीछे भी इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद है, जिसने हाल ही में लेबनान में पेजर, वॉकी-टॉकी और सोलर प्लांट में धमाकों को अंजाम दिया था। इससे पूरे लेबनान में आतिशबाजी जैसे हालात पैदा हो गए थे। जानते हैं मोसाद के कारनामे और इजरायली आयरन डोम के बारे में जिसने पूरे लेबनान में तबाही मचा दी। लेकिन उससे पहले ऑपरेशन एंतेबे की कहानी जानते हैं, जिसे इजरायली आर्मी और मोसाद के मिले-जुले एक्शन ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। 27 जून, 1976 को पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलीस्तीन के दो सदस्यों ने जर्मनी के दो लोगों के साथ मिलकर पेरिस जा रहे विमान को हाईजैक कर लिया और फिर युगांडा ले गए। इस विमान ने इजरायल की राजधानी तेल अवीव से ग्रीस की राजधानी एथेंस के लिए उड़ान भरी थी। इस फ्लाइट में 246 यात्रियों के अलावा क्रू के 12 सदस्य सवार थे। हालांकि, विमान में सवार लोगों को यह नहीं पता था कि वे एक बड़ी मुसीबत में फंसने जा रहे हैं। हाईजैकर्स ने यूगांडा के एंतेबे एयरपोर्ट पर यात्रियों और क्रू को बंधक बनाए रखा। मोसाद और इजरायली डिफेंस फोर्सेज यानी IDF ने एक हफ्ते में ही आतंकियों के चंगुल से बंधकों को छुड़ा लिया था और आतंकियों को मार गिराया था।

उस वक्त इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और आर्मी के 200 जांबाज कमांडो ने मोर्चा संभाला। उनके एक एजेंट ने विमान से एयरपोर्ट की फोटोज खींची। इसके बाद कार्रवाई को अंजाम दिया। एक हफ्ते बाद इजरायली कमांडो ने एयरपोर्ट पर हमला कर 100 इजरायली और यहूदी बंधकों को बचाया था। इस कार्रवाई में तीन बंधकों के अलावा युगांडा के कई सैनिकों और लीड कमांडो योनातन नेतन्याहू (इजराइल के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भाई) की मौत हुई थी। इस एंतेबे ऑपरेशन को ऑपरेशन थंडरबोल्ट भी कहा जाता है, जिसके लिए मोसाद ने खुफिया जानकारियां मुहैया कराईं, जबकि इजरायली सेना ने इस अभियान की कमान संभाली।

कहा जा रहा है कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने इजरायल के दुश्मनों को मारने के लिए पूरे लेबनान में 1600 टार्गेट की पहचान की। इन जगहों पर हिजबुल्लाह लड़ाकों के सबसे ज्यादा छिपे होने की पुख्ता खबर थी। फिर ये इनपुट्स इजरायली आर्मी को दिए गए, जिसने मिसाइलों से हमले किए। इस दौरान आयरन डोम सिस्टम को भी एक्टिव कर दिया गया था, जिसने हिजबुल्लाह की ओर से किए गए हमलों को विफल कर दिया। साथ में हिजबुल्लाह के रॉकेटों को नेस्तनाबूद कर दिया।

आयरन डोम को दुश्मन की आरे से आने वाले कम दूरी के हथियारों से बचाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह रक्षा कवच हर मौसम में काम करता है। यह रॉकेटों को ट्रैक करने के लिए रडार का इस्तेमाल करता है। यह उन रॉकेटों की पहले से पहचान कर लेता है, जो इजरायल पर गिरने वाली होती हैं। इंटरसेप्टर मिसाइलें केवल आबादी वाले इलाकों पर हमला करने वाले रॉकेटों पर दागी जाती हैं। इस प्रणाली में बैटरियां होती हैं, जिनमें तीन से चार लॉन्चर होते हैं। ये एकसाथ 20 इंटरसेप्टर मिसाइलों को फायर कर सकते हैं। सिस्टम के स्थिर और मोबाइल दोनों संस्करण हैं। यानी ये ट्रक से खींचकर कहीं भी ले जाए जा सकते हैं। ये 10 सेकेंड में 20 मिसाइलें एकसाथ छोड़ता है।

आयरन डोम को 2006 में इजरायल और दक्षिणी लेबनान के आतंकवादी समूह हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष के बाद विकसित किया गया था। हिजबुल्लाह ने इजरायल में हजारों रॉकेट दागे, जिससे भारी जान-माल का नुकसान हुआ। इसके जवाब में इजरायल ने नई मिसाइल रक्षा ढाल विकसित करने की शुरुआत की। यहीं से इजरायल ने अपने लिए रक्षा कवच यानी आयरन डोम सिस्टम विकसित किया। आयरन डोम को इजरायली फर्म राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज ने कुछ अमेरिकी सहयोग से बनाया था।

इजरायल की सेना ने आयरन डोम की सफलता दर 90% तक होने का दावा किया है। अमेरिका ने इजरायल को दो शक्तिशाली आयरन डोम बैटरियां दी हैं। जो बिना रुके आयरन डोम के एक्शन को ज्यादा प्रभावी बनाती हैं। साथ ही वह जल्द ही टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) मिसाइलों की बैटरी और पैट्रियट मिसाइलों की बैटरी की भी आपूर्ति करेगा।

भारत के पास एस-400 ट्रायम्फ (S-400 TRIUMF) प्रणाली है, जो तीन खतरों जैसे रॉकेट, मिसाइल और क्रूज मिसाइल से निपटने में सक्षम है। इनकी रेंज काफी अधिक होती है। इसमें खतरों से निपटने के लिए यह बहुत बड़ा एयर डिफेंस कवच है। यह रूस की डिजाइन की गई सतह से हवा में मार करने वाली गतिशील मिसाइल प्रणाली है, जिसे रूस से लिया गया है। अभी इसकी पूरी तरह तैनाती बाकी है। इसकी रेंज 400 किलोमीटर और सीमा के भीतर 30 किमी तक की ऊंचाई पर सभी प्रकार के हवाई लक्ष्यों को भेद सकती है। यह प्रणाली 100 हवाई लक्ष्यों को एकसाथ ट्रैक कर सकती है और उनमें से 6 को एक साथ निशाना बना सकती है।

 

क्या आने वाले समय में हूतियों को हर पाएगा इजराइल?

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या आने वाले समय में इजराइल हूतियों को हर पाएगा या नहीं ! इजरायल ने रविवार को हूतियों के खिलाफ दूसरी बार हवाई हमला किया। इन हमलों में इजरायली वायु सेना के दर्जनों विमान शामिल थे। इस दौरान लड़ाकू विमानों ने 1800 किलोमीटर की दूरी तय की, जिसके लिए उन्हें हवा में ही रिफ्यूल किया गया। इसे इजरायल के शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है। हमले के दौरान इजरायली लड़ाकू विमानों ने यमन के होदेइदाह बंदरगाह पर जबरदस्त बमबारी की, जिससे पूरा इलाका दहल गया। खबरों के अनुसार, इस हमले में बड़ी संख्या में हूती विद्रोही हताहत हुए। हालांकि, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ऐसे हमले हूतियों को रोक सकेगा, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन भी नाकाम हो चुके हैं। अमेरिका और ब्रिटेन ने लाल सागर में हूतियों के हमलों को रोकने के लिए यमन पर कई बार जबरदस्त बमबारी की थी। इन बमबारियों में हूतियों के कई महत्वपूर्ण ठिकानों को तबाह कर दिया गया था। इसके बावजूद हूतियों के हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन ने मिसाइलों, ड्रोन और लड़ाकू विमानों से हूतियों को निशाना बनाया। इलाके में अपने युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर को तैनात किया, लेकिन ये सभी नाकाफी साबित हुए। इसके उलट हूतियों ने लाल सागर से होने वाले व्यापार को ठप कर दिया, जिसका असर समुद्री परिवहन पर देखने को मिला।

आईडीएफ ने रविवार को कहा, “एक व्यापक, खुफिया-आधारित हवाई अभियान के दौरान, दर्जनों आईएएफ विमानों ने यमन के रस ईसा और होदेइदाह क्षेत्रों में हूती आतंकवादी शासन से संबंधित सैन्य लक्ष्यों पर हमला किया। लक्ष्यों में बिजली संयंत्र और तेल आयात करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक बंदरगाह शामिल था, जिसका इस्तेमाल हूती आतंकवादी शासन द्वारा सैन्य आपूर्ति और तेल के अलावा ईरानी हथियारों को क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए किया जाता था।”

इजरायली सेना ने कहा कि यह हूतियों द्वारा हाल ही में किए गए हमलों, विशेष रूप से मध्य इजरायल के खिलाफ तीन लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल हमलों के जवाब में किया गया था। हूती विद्रोहियों ने 15 सितंबर, 27 सितंबर और 28 सितंबर को इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे। आईडीएफ ने अपने बयान में उल्लेख किया कि “पिछले एक साल से, हूतियों ने ईरान के निर्देशन और वित्त पोषण के तहत और इराकी मिलिशिया के साथ मिलकर इजरायल पर हमला करने, क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर करने और नेविगेशन की वैश्विक स्वतंत्रता को बाधित करने के लिए काम किया है।”

हूतियों के पास लंबी दूरी की मिसाइलें हैं। ईरान ने पिछले एक दशक में उन्हें बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और कई खतरनाक हमलावर ड्रोन से लैस किया है। इससे हूतियों हे हथियारों के भंडार भरे हुए हैं। हूतियों ने यमन में सऊदी अरब और अन्य देशों द्वारा समर्थित सरकार के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी और सफल भी हुए। इस तरह, उन्हें विशेष रूप से उन्नत हथियारों वाले देशों के खिलाफ लड़ने का अनुभव है।

पिछले एक साल में, हूती लड़ाके और भी साहसी हो गए हैं। उन्होंने वाणिज्यिक जहाजों पर हमला किया और अमेरिकी नौसेना और ब्रिटिश नौसेना के हमलों का सामना किया। उन्होंने इजरायल पर भी मिसाइल और ड्रोन से हमला किया और दर्जन भर अमेरिकी रीपर ड्रोन को मार गिराया। इससे हूतियों की महत्वकांक्षा और घमंड सातवें आसमान पर है। उन्हें लगने लगा है कि यमन और उसके आसपास के इलाकों में उनकी ताकत को चैलेंज करने वाला कोई नहीं है। यमन एक ऐसे इलाके में स्थित है, जहां युद्ध होने पर सीधे तौर पर वैश्विक नौवहन को खतरा पैदा हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह देखना बाकी है कि क्या इजरायल के हमले हूतियों की महत्वाकांक्षाओं को रोक सकते हैं। चूंकि, इजरायल हूती विद्रोहियों के खिलाफ सिर्फ हवाई हमले करने में ही सक्षम है। ऐसे में यह सवाल उठ सकता है कि क्या इजरायल हवाई शक्ति का उपयोग कर अपने सभी मिशन आब्जेक्टिव्स को हासिल कर सकता है या नहीं। इलाके में अपने युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर को तैनात किया, लेकिन ये सभी नाकाफी साबित हुए। इसके उलट हूतियों ने लाल सागर से होने वाले व्यापार को ठप कर दिया, जिसका असर समुद्री परिवहन पर देखने को मिला।लेबनान और गाजा में, ऐसा करना आसान है क्योंकि वे भौगोलिक रूप से इजरायल के करीब हैं। हालांकि, लंबी दूरी के मिशन, जैसे कि सीरिया में युद्धों के बीच अभियान, ईरानी खतरे को रोकने में सफल नहीं हुए हैं।

 

आखिर नेट जीरो या कार्बन न्यूट्रल के लक्ष्य को कौनसा देश करेगा प्राप्त?

नेट जीरो या कार्बन न्यूट्रल के लक्ष्य को कौन सा देश प्राप्त करेगा यह सबसे बड़ा सवाल है! नवंबर, 2021 की बात है, जब स्कॉटलैंड के ग्लासगो में COP26 शिखर सम्मेलन का आयोजन चल रहा था। उस वक्त इसमें हिस्सा लेने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरेआम मंच से ऐसा ऐलान कर दिया कि अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश भी हैरान रह गए। पीएम ने पहली बार इस मंच से नेट जीरो का संकल्प लिया। यह दुनिया से किया गया ऐसा वादा था कि जो उस वक्त दुनिया के प्रमुख अखबारों की सुर्खियां बना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज 74वां बर्थडे है। गुजरात की राजधानी गांधीनगर में आयोजित चौथे ग्‍लोबल रिन्‍यूएबल एनर्जी इन्वेस्टर्स मीट (RE-INVEST 2024) मोदी ने पेरिस समझौते के लक्ष्यों को डेडलाइन से पहले पूरा करने, 200 गीगावाट से ज्यादा गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता जैसी उपलब्धियों और 2030 तक इसे 500 गीगावाट तक ले जाने के लक्ष्य को हासिल करने के उपायों पर चर्चा की। मोदी ने कहा कि ग्रीन फ्यूचर, नेट जीरो जैसे शब्द भारत की जरूरत और प्रतिबद्धता हैं। जानते हैं कि ये नेट जीरो क्या है? क्या नेट जीरो की वजह से भारत अमेरिका और चीन जैसे देशों को पछाड़ देगा। पीएम मोदी ने 2070 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो तक कम करने का वादा किया। आमतौर पर इस सम्मेलन में नेट जीरो का लक्ष्य 2050 तक हासिल करने का है। चीन ने 2060 तक कार्बन तटस्थता की योजना की घोषणा की। वहीं, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने 2050 तक नेट जीरो हासिल करने का ऐलान किया। उस चक्त ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस सहित कई हस्तियों ने जलवायु संकट से निपटने के लक्ष्य बताते हुए लंबे-चौड़े भाषण दिए थे। चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जक है।

नेट जीरो या कार्बन न्यूट्रल बनने का मतलब है वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड, क्लोरो फ्लोरो कार्बन और कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में बढ़ोतरी न करना। नेट जीरो का मतलब है कि जो भी कार्बन उत्सर्जन होता है, उसे वायुमंडल से उतनी ही मात्रा में निकालकर संतुलित किया जाता है। यानी हम नेट जीरो पर तब पहुंचेंगे जब हम जितना कार्बन उत्सर्जन करेंगे, वह उतनी ही मात्रा में हटाया जाएगा। इसे ऐसे समझिए कि यह लक्ष्य तब हासिल हो सकेगा, जब इंसानी गतिविधियों के चलते हो रहे प्रदूषण को वायुमंडल से हटाकर उसे संतुलित किया जाए।

यह लक्ष्य दो तरीकों से हासिल होगा। पहला तो यह है कि कारखानों, वाहनों जैसे होने वाले प्रदूषण को यथासंभव जीरो तक किया जाए। दूसरा, इसके साथ ही जंगलों को बढ़ाने जैसे प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए जो कार्बन प्रदूषकों को वायुमंडल से सोख लेते हैं। सरल शब्दों में ऐसे समझें कि आप ऐसे पेड़ लगा सकते हैं जो CO2 को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। वहीं, वायुमंडल से CO2 को बाहर निकालने के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि हम वायुमंडल में डाली जा रही CO2 की मात्रा घटाएं।

नेट जीरो का मतलब है इंसानी गतिविधियों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करना या हटाना। हम नेट जीरो पर तब पहुंचते हैं जब हमारी गतिविधियों से पैदा हुईं ग्रीनहाउस गैस की मात्रा हटाए गए कार्बन की मात्रा से अधिक नहीं होती। वहीं, जीरो कार्बन का मतलब है कि किसी उत्पाद या सेवा से होने वाले उत्सर्जन से है। यानी जीरो कार्बन में कोई कार्बन उत्सर्जन ही नहीं होता। जैसे कि पवन चक्कियों या सोलर पैनलों से हासिल बिजली। आबादी के हिसाब से बात करें तो भारत की इतनी बड़ी आबादी प्रदूषण फैलाने के मामले में दुनिया के कई बड़े देशों से काफी कम है। इसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दुनिया की प्रमुख विश्व अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है। 2019 में प्रति व्यक्ति के लिहाज से भारत ने 1.9 टन CO2 उत्सर्जित किया, जबकि उसी साल अमेरिका ने 15.5 टन और रूस ने 12.5 टन कार्बन प्रदूषण फैलाया था।

भारत ने यह भी वादा किया है कि वह 2030 तक अपनी 50% एनर्जी अक्षय ऊर्जा जैसे सोर्स से हासिल कर लेगा और 2030 तक ही कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी लाएगा। दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सना रहमान के अनुसार, भारत ने कोयला आधारित 500 गीगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता, अक्षय ऊर्जा से आधी बिजली, उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी जैसे ऐलान करके गेंद विकसित देशों के पाले में डाल दी।

नेट जीरो हासिल करने के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बनाए रखना होगा। जीरो कार्बन सोर्स के लिए 2050 तक 98% -100% बिजली की आपूर्ति अक्षय ऊर्जा से किए जाने की जरूरत होगी। वहीं, वाहनों से होने वाले धुएं को कम करने के लिए बैटरी और फ्यूल स्विचिंग जैसे उपाय करने होंगे। वहीं, खानपान की पूर्ति करने के लिए खाद्य उत्पादन की दक्षता में सुधार, आहार विकल्पों को बदलने, खराब भूमि को सही करने और खाने के नुकसान को कम करना होगा। साथ ही कोयले के इस्तेमाल में 2030 तक 6 गुना तेजी से गिरावट आनी चाहिए। दुनिया को 2030 तक वनों की कटाई को रोकने और वृक्ष आवरण को दो गुना तेजी से बढ़ाने की भी जरूरत है।

 

आखिर इसराइल ने यमन पर क्यों किया हमला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इसराइल ने यमन पर हमला क्यों किया है ! इजरायल के लेबनान पर हमले और हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की मौत के बाद मध्य पूर्व एक बड़े खतरे की ओर बढ़ रहा है। इजरायल रक्षा बल (IDF) के लड़ाकू विमान लगातार लेबनान की राजधानी बेरूत में हिजबुल्लाह के गढ़ वाले इलाकों पर बम बरसा रहे हैं। इस बीच इजरायल ने यमन में हूती चरमपंथियों के ठिकानों पर भी हमला किया है। रविवार को एक बयान में इजरायली सेना ने बताया कि फाइटर जेट ने यमन के रास ईसा और होदेइदाह बंदरगाह पर हमला किया है। हूती समूह से जुड़े मीडिया ने बताया कि इजरायल के हमले में कम से कम चार लोग मारे गए हैं। इनमें एक बंदरगाह कर्मचारी और तीन इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं। ध्यान देने वाली है कि इजरायल ने हाल ही में दूसरी बार यमन पर हमला किया है। इसके पहले जुलाई में तेल अवीव में ड्रोन हमले के बाद इजरायली जहाजों ने होदेइदाह पोर्ट पर बम बरसाए थे। आखिर इजरायल और यमन एक दूसरे पर हमलें क्यों कर रहे हैं?

इजरायली सेना ने बताया कि रविवार को किया गया हमला, हाल ही में हूतियों के मिसाइल हमलों का जवाब था। हूती विद्रोहियों ने 28 सितम्बर को इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइल दागी थी। आईडीएफ ने कहा था कि उसने यमन से दागी गई सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल को रोक दिया था। मिसाइल ने इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के विमान को निशाना बनाने की कोशिश की थी, जब वह बेन गुरियन हवाई अड्डे पर उतरने वाला था।

हूती नेता अब्दुल मलिक अल हूती ने कहा है कि हिजबुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह की मौत ‘बेकार नहीं जाएगी।’ इजरायल के गाजा में अभियान शुरू करने के बाद से ही हूती विद्रोही लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों को निशाना बना रहे हैं। इसके साथ ही हूतियों ने इजरायल के ऊपर ड्रोन भी भेजे हैं। हूतियों ने पिछले शुक्रवार को भी बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन दागा था, जिसे आईडीएफ ने रोक दिया था।

हूती यमन के एक शिया मुस्लिम अल्पसंख्यकों से बना एक चरमपंथी समूह है, जिसकी अपनी सशस्त्र विंग है। 2010 के दशक की शुरुआत में अरब क्रांति की स्थिति का लाभ उठाकर इसने अपनी स्थिति मजबूत की। 2014 के आखिर में हूती लड़ाकों ने यमन की राजधानी सना पर नियंत्रण कर लिया और फरवरी 2015 तक उन्होंने देश पर नियंत्रण घोषित कर दिया। बता दें कि इजरायल ने यमन के होदेइदाह बंदरगाह पर जबरदस्त हवाई हमला किया है। यह हमला लेबनान में हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की मौत के एक दिन बाद किया गया है। इन हमलों में सैकड़ों की संख्या में हूती विद्रोहियों के हताहत होने की सूचना है। यह बंदरगाह पिछले कई वर्षों से हूती विद्रोहियों के कब्जे में है। हूती विद्रोही इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईरान से हथियारों की तस्करी में भी करते हैं। इस बंदरगाह पर इजरायल पहले भी बमबारी कर चुका है। इजरायल ने यह हवाई हमला हूती विद्रोहियों के हालिया ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद किया है।

यमन का होदेइदाह बंदरगाह इजरायल के 1800 किलोमीटर दूर स्थित है। इतनी दूरी पर सटीक हमले करना काफी बड़ी बात मानी जाती है। हालांकि, पूरी दुनिया जानती है कि इजरायल के पास कई ऐसी मिसाइलें हैं, जो पिन पॉइंट एक्यूरेसी के साथ हमला करने में माहिर हैं। हालांकि, अभी तक इस बात की सूचना नहीं है कि इजरायल ने होदेइदाह बंदरगाह पर मिसाइल हमला किया है या फिर लड़ाकू विमानों से बम बरसाएं हैं। इससे पहले भी इजरायल ने लड़ाकू विमानों के जरिए यमन में हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर हमले किए थे।

हूती विद्रोहियों की ताकत के दो प्रमुख राज हैं। पहला- उनका लोकेशन और दूसरा- उनको मिलने वाली सैन्य सहायता। हूती विद्रोही यमन में सक्रिय हैं। यमन दो तरफ से दो मुल्कों से घिरा है जबकि बाकी दो तरफ इसकी सीमा समुद्र से सटी हुई है। यमन की उत्तरी सीमा पर सऊदी अरब और पूर्वी सीमा ओमान स्थित है। वहीं, यमन दक्षिण में अदन की खाड़ी से सटा है जबकि पश्चिम में लाल सागर से। ऐसे में हूतियों को स्वेज नहर के रास्ते लाल सागर के होकर गुजरने वाले समुद्री जहाजों पर हमले का सटीक मौका मिलता है। वहीं, उसे ईरान से भारी मात्रा में सैन्य सहायता मिलती है, जिनमें अत्याधुनिक सैन्य ड्रोन, बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें शामिल हैं।

 

जब 1968 में लापता हुआ था IAF का प्लेन!

एक समय ऐसा था जब 1968 में IAF का प्लेन लापता हुआ था और अब वह मिल चुका है ! 1968 में रोहतांग दर्रे के पास हुए एक विमान हादसे में भारतीय सेना को चार और शव मिले हैं। यह हादसा 56 साल पहले हुआ था। एक सैन्य अभियान दल ने बर्फ से ढके पहाड़ों से ये शव बरामद किए हैं। यह अभियान ‘चंद्र भागा’ नाम के एक बड़े ऑपरेशन का हिस्सा था। यह हादसा 7 फरवरी, 1968 को हुआ था। जब चंडीगढ़ से 102 यात्रियों के साथ उड़ा भारतीय वायु सेना का एएन-12 विमान खराब मौसम के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। दशकों तक, विमान का मलबा और पीड़ितों के अवशेष बर्फीले इलाके में खोए रहे। 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग के पर्वतारोहियों ने विमान के मलबे को खोज निकाला। इसके बाद सेना, खासकर डोगरा स्काउट्स ने कई अभियान चलाए। 2005, 2006, 2013 और 2019 में चलाए गए सर्च ऑपरेशन में डोगरा स्काउट्स सबसे आगे रहे। 2019 तक केवल पांच शव ही बरामद हो पाए थे। इस बार मिले चार शवों में से तीन शव सही सलामत मिले हैं जबकि चौथे के अवशेष मिले हैं। तीन सैन्यकर्मियों की पहचान उनके पास मिले दस्तावेजों से हो पाई है। ये जवान हैं सिपाही नारायण सिंह एएमसी, मलखान सिंह पायनियर कोर और थॉमस चेरियन सीईएमई।

एक अधिकारी ने बताया, ‘चौथे व्यक्ति के शरीर से मिले दस्तावेजों से उसकी पहचान तो नहीं हो पाई है, लेकिन उसके परिजनों का पता चल गया है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘चंद्र भागा ऑपरेशन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सेना अपने जवानों के परिवारों को सांत्वना देने के लिए कितनी दृढ़ है। ऊंचाई वाले अभियानों में विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध डोगरा स्काउट्स ने इस अभियान का नेतृत्व किया है।’

अधिकारी ने कहा, ‘इन शवों के मिलने से उन परिवारों को सुकून मिला है जो दशकों से इंतजार कर रहे थे। अन्य यात्रियों के अवशेषों की तलाश जारी है। यह अभियान 10 अक्टूबर तक चलेगा।’ यह अभियान डोगरा स्काउट्स और तिरंगा माउंटेन रेस्क्यू के प्रतिनिधियों के सहयोग से चलाया गया था। इसी बीच आपको बता दें कि हिमालय और लेह-लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर तैनात भारतीय सेना के जवान माइनस 40 डिग्री में भी सीमा प्रहरी बनकर डटे रहते हैं। अब इन जवानों को कठिन मौसम से बचाने के लिए ‘पीक पॉड्स’ विकसित किए गए हैं। ‘पीक पॉड्स’ माइनस 40 डिग्री की ठंड जैसे हालातों में जवानों के रहने के लिए बनाए गए हैं। फिलहाल सेना की 14 कॉर्पस के जवान इन ‘पीक पॉड्स’ में रहकर इसकी कुशलता जांच रहे हैं। सेना की यह यूनिट सियाचिन ग्लेशियर, कारगिल और लेह में तैनात है।

डीटेक 360 इनोवेशंस के प्रबंध निदेशक विनय मित्तल ने बताया कि डीआरडीओ ने गलवान घाटी में सैनिकों के रहने की व्यवस्था को लेकर उनसे संपर्क किया था। उस समय ऐसी कोई तकनीक या व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की तर्ज पर इन ‘पीक पॉड्स’ को विकसित किया। भारतीय सेना की इंजीनियरिंग कोर की मदद से लेह में ‘पीक पॉड्स’ का ट्रायल किया गया। हिमालय के लद्दाख क्षेत्र में लेह, दुरबुक और डीबीओ के कठोर तथा ठंडे वातावरण में इसका इंटेंस टेस्टिंग की गई है। इस दौरान पॉड्स में 50 से अधिक सुधार किए गए हैं। फिजिकल टेस्ट में में पॉड्स सफल रहे हैं और यह शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस कम तापमान में कुशलतापूर्वक काम करता है।

खास बात यह है कि इसे तैयार करने में 100 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक और 93 प्रतिशत भारतीय उत्पाद इस्तेमाल किए गए हैं। बर्फीली चोटियों पर अस्थायी आवास के तौर पर लगाए जाने वाले इन ‘पीक पॉड्स’ में सोफा-कम-बेड, सामान और खाद्य पदार्थों के लिए अलग-अलग भंडारण, गर्म और ठंडा रखने की सुविधा, गर्म पानी की टंकी उपलब्ध हैं। इसमें उपयोग किए जा सकने वाले बायो टॉयलेट पूरी तरह से काम कर रहे हैं।

डिफेंस एक्सपर्ट्स के मुताबिक ‘पीक पॉड्स’ दुनिया में अपनी तरह की एक नई पहल है। ‘पीक पॉड्स’ ऊंचाई वाले आर्मी बेस, रिसर्च स्टेशनों, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन आदि के लिए उपयोगी हैं। बाहर माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान होने पर शेल्टर के अंदर का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस रहता है। सभी ‘पीक पॉड्स’ में अत्याधुनिक बायो टॉयलेट हैं। इसकी असेंबली और डिस्मेंटलिंग आसान है। इसे फास्ट ट्रैक अस्पताल के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह 190 किमी प्रति घंटा तक की हवा की गति को झेलने में सक्षम है और बर्फ जमाव को रोकता है। यह बिना केरोसिन के भीतर से गर्म रहता है। साथ ही ऑक्सीजन लेवल को बरकरार रखते हुए वेंटिलेशन को बनाता है।

पीक पॉड्स’ ग्रीन स्ट्रक्चर हैं, जो सोलर एनर्जी से चलते हैं। इसलिए क्लाइमेट पर कम प्रभाव डालती हैं, जीरो इमिशन करते हैं। इसके साथ ही मोटर पंप, लाइट, चार्जिंग पॉइंट आदि सहित सभी जुड़े इक्यूपमेंट को चलाने के लिए सेल्फ डिपेंडेंट एनर्जी देते हैं। फिलहाल बर्फीले इलाकों में जवानों को केरोसिन-बेस्ड हीटर और पावर जेनसेट की आवश्यकता होती है। इसमें रेगुलर फ्यूल की आवश्यकता होती है। इससे ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ जाती है। यहां टॉयलेट मुख्य तंबू से दूर रखे जाते हैं। सेना के लिए भविष्य में ऐसे शेल्टर के विकास की कल्पना की जा रही है जो एडवांस एआई सिस्टम से लैस होंगे। हाइड्रोजन, हवा और अन्य अक्षय ऊर्जा संसाधनों से ऊर्जा का दोहन करेंगे। ‘हाइड्रो कैप्चर’ की प्रोसेस से चलने वाले, साइट पर हाइड्रो प्रोडक्शन के लिए वातावरण में ह्यूमिडिटी को कंडेंस्ड करेंगे।