Wednesday, March 18, 2026
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अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे को लेकर विपक्ष में क्यों हो रही है खींचातानी?

वर्तमान में विपक्ष में अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे को लेकर खींचातानी हो रही है! आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल ने दो दिन बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया है। केजरीवाल के ऐलान पर भारतीय जनता पार्टी ने सवाल उठाए हैं। बीजेपी का कहना है कि केजरीवाल का इस्तीफे के लिए 48 घंटे का समय मांगना रहस्यमय है। बीजेपी से राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि अरविंद केजरीवाल को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए था। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि जेल में रहकर केजरीवाल ने इस्तीफे की बात नहीं की। बाहर आकर इस्तीफा देने की बात क्यों हो रही? बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल के 48 घंटे के समय मांगने पर सवाल उठाए। त्रिवेदी ने कहा कि यह 48 घंटे का समय, जो उन्होंने (अरविंद केजरीवाल) मांगा है, रहस्य में डूबा हुआ है। 48 घंटे बाद की बात क्या है? 48 घंटे में क्या-क्या सेटल करना है? उन्होंने आगे कहा कि यह हास्यास्पद है कि एक मुख्यमंत्री, जिसके पास विधानसभा में भारी बहुमत है, अगर उनके इरादों में और जो वह कह रहे हैं, उसमें थोड़ी भी सच्चाई है, तो उन्हें मंत्रिमंडल की बैठक बुलानी चाहिए। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए और विधानसभा को भंग करने की सिफारिश करनी चाहिए।

सुधांशु त्रिवेदी ने केजरीवाल पर तिहाड़ जेल से रिहाई पर AAP समर्थकों के पटाखे फोड़ने पर भी निशाना साधा। त्रिवेदी ने कहा कि जेल से बाहर आने के बाद आतिशबाजी की गई। वह जेल से बाहर आने और अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए नियमों को तोड़ने वाले देश के पहले मुख्यमंत्री बने। दिल्ली सरकार ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया और दिल्ली के मुख्यमंत्री जेल से बाहर आए और दिल्ली सरकार के नियमों को तोड़ा। उन्होंने आगे कहा कि अरविंद केजरीवाल बाहर आने के बाद इस्तीफा देने की बात क्यों कर रहे। 48 घंटे बाद क्या माजरा है? देश और दिल्ली की जनता जानना चाहती है कि 48 घंटे का राज क्या है, 48 घंटे में क्या कुछ तय होना है? सुधांशु त्रिवेदी के ’48 घंटे का राज क्या है’ वाले बयान पर आम आदमी पार्टी की ओर से जवाब दिया गया। आप नेता और दिल्ली की मंत्री आतिशी ने बताया कि सीएम केजरीवाल ने दो दिन बाद इस्तीफे की बात क्यों कही।अगर आपको लगता है कि मैं ऐसा नहीं हूं, तो वोट न दें। आपका वोट मेरी ईमानदारी का प्रमाण पत्र होगा, उसके बाद ही मैं मुख्यमंत्री पद पर बैठूंगा। इसका सीधा सा कारण है। आज रविवार है और कल सोमवार को ईद की छुट्टी है। इसलिए अगले वर्किंग डे यानी मंगलवार को केजरीवाल इस्तीफा देंगे।

उधर, दिल्ली BJP प्रमुख वीरेंद्र सचदेवा ने भी केजरीवाल सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल किया कि 2021 में आप की सरकार की ओर से लाई गई आबकारी नीति को एक साल बाद वापस क्यों लिया गया। उन्होंने कहा कि मेरा अरविंद केजरीवाल से सवाल है- अगर आप शराब नीति घोटाले में शामिल नहीं हैं, तो नीति वापस क्यों ली गई? पूरी पार्टी शराब नीति घोटाले में शामिल है, और इसीलिए आप नेताओं जेल भेजा गया। दिल्ली की जनता जानती है कि आपने उन्हें लूटा है।

इससे पहले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने रविवार सुबह में AAP कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अपने इस्तीफे का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि मैं दो दिन बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने जा रहा हूं। जब तक लोग अपना फैसला नहीं सुना देते, मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठूंगा। मैं हर घर और गली में जाऊंगा और जब तक मुझे लोगों से फैसला नहीं मिल जाता, मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठूंगा। बता दें कि जेल से बाहर आने के बाद आतिशबाजी की गई। वह जेल से बाहर आने और अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए नियमों को तोड़ने वाले देश के पहले मुख्यमंत्री बने। दिल्ली सरकार ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया और दिल्ली के मुख्यमंत्री जेल से बाहर आए और दिल्ली सरकार के नियमों को तोड़ा। कुछ महीनों बाद चुनाव हैं। अगर आपको लगता है कि केजरीवाल ईमानदार है, तो मुझे वोट दें, मैं चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का पदभार संभालूंगा। अगर आपको लगता है कि मैं ऐसा नहीं हूं, तो वोट न दें। आपका वोट मेरी ईमानदारी का प्रमाण पत्र होगा, उसके बाद ही मैं मुख्यमंत्री पद पर बैठूंगा।

दिल्ली की नई मुख्यमंत्री के बारे में क्या बोला विपक्ष?

हाल ही में दिल्ली की नई मुख्यमंत्री के बारे में विपक्ष ने एक बयान दे दिया है! दिल्ली का एक ही मुख्यमंत्री है और वो है अरविंद केजरीवाल। आम आदमी पार्टी की बैठक में दिल्ली की नई मुख्यमंत्री चुनी गईं आतिशी का कहना है कि वो इस जिम्मेदारी से खुश तो हैं, लेकिन उन्हें इसका भारी गम भी है कि अरविंद केजरीवाल सीएम नहीं रहेंगे। सोचिए, जो दिल्ली जैसे अहम प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं, वो खुलकर यह नहीं कह सकतीं कि हां, अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन अब वो यह कमान संभालने जा रही हैं। वो कह रही हैं कि दिल्ली का एक ही मुख्यमंत्री है और उसका नाम है- अरविंद केजरीवाल। आतिशी ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं आज ये जरूर कहना चाहती हूं आम आदमी पार्टी के सभी विधायकों की तरफ से, दिल्ली की दो करोड़ जनता की तरफ से कि दिल्ली का एक ही मुख्यमंत्री है, और उस मुख्यमंत्री का नाम अरविंद केजरीवाल है।’ आतिशी के इस बयान के बाद क्या विरोधियों का यह आरोप साबित नहीं होता है कि दिल्ली के असली मुख्यमंत्री तो इस्तीफे के बाद भी अरविंद केजरीवाल ही रहेंगे, आतिशी तो बस रबर स्टांप रहेंगी? ध्यान रहे कि यही छवि देश के लगातार दो बार प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह की रही। तथ्यों, तर्कों और सबूतों के आधार पर एक बड़ा वर्ग मानता है कि 2004 से 2014 तक भारत की असली प्रधानमंत्री तो सोनिया गांधी थीं, मनमोहन सिंह तो बस यस मैन की भूमिका में फाइलों पर दस्तखत करने तक सीमित थे।

2004 के लोकसभा चुनावों में 145 सीटों के साथ कांग्रेस पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। बीजेपी 138 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर खिसक गई। कांग्रेस पार्टी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के साथी दलों के साथ केंद्र में सरकार बना ली। सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की स्वाभाविक दावेदार थीं, लेकिन विदेशी मूल का मुद्दा उछला और सोनिया को कदम वापस खींचने पड़े। बीजेपी की धाकड़ नेता सुषमा स्वराज ने तब खुला ऐलान किया था कि यदि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनती हैं, तो वह राजनीतिक संन्यास ले लेंगी और अपना सिर मुंडवाकर जमीन पर सोएंगी।

विपक्ष के कड़े विरोध के आगे सोनिया को झुकना पड़ा। वो झुकीं, लेकिन हार मानने के बजाय बाजी अपने हाथों में रखी। सोनिया ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री चुना। मनमोहन सिंह हमेशा से ब्यूरोक्रैट रहे, राजनेता नहीं। उनका ट्रैक रिकॉर्ड गारंटी दे रहा था कि वो कभी सोनिया की खिंची लक्ष्मण रेखा पार नहीं करेंगे। सोनिया को और क्या चाहिए था? दायरा क्रॉस करने की आशंका जिनसे थी, उन प्रणब मुखर्जी को सोनिया ने दरकिनार कर दिया था। बाद में प्रणब दा को राष्ट्रपति भवन भेज दिया गया।

22 मई, 2004, दिन मंगलवार। मनमोहन सिंह सरकार ने शपथ ले ली। इसके 13वें दिन ही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का गठन हो गया। सोनिया गांधी इसकी चेयरपर्सन बन गईं। एनएसी के गठन के पीछे दलील यह दी गई कि यूपीए के कई साथी दल हैं, जिनके साझा घोषणापत्र को लागू करने के लिए एक ऐसी संस्था की दरकार है जो सरकार को वक्त-वक्त पर सही सुझाव दे सके। लेकिन यह तो कहने की बात थी। सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एनएसी के फैसले और सरकार में उसकी दखल के सबूत सामने आने लगे तो पता चल गया कि दरअसल असली पीएम सोनिया ही हैं, मनमोहन सिंह तो बस मुखौटा हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन सरकार का संचालन भले ही संवैधानिक रूप से स्वतंत्र था, लेकिन एनएसी के जरिए सोनिया गांधी की सीधी या परोक्ष भागीदारी ने इसे ‘समानांतर सत्ता केंद्र’ की शक्ति दे दी। बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों ने एनएसी को ‘सुपर कैबिनेट’ कहकर इसकी आलोचना की और कहा कि मनमोहन सिंह की सरकार पर सोनिया गांधी की छाया बनी हुई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे ‘दो सत्ता केंद्रों’ वाली सरकार कहा, जिसमें मनमोहन सिंह एक निर्वाचित और संवैधानिक प्रधानमंत्री थे, लेकिन निर्णय लेने में उनका योगदान सीमित था।

फिर जब उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम का अध्यक्ष होने के कारण समाजवादी पार्टी (सपा) नेता जया बच्चन को राज्यसभा सांसद के पद से अयोग्य ठहराया गया तो एनएसी चेयरपर्सन को लाभ का पद बताकर विपक्ष ने सोनिया के सामने नैतिकता का प्रश्न खड़ा कर दिया। आखिरकार सोनिया गांधी ने 23 मार्च, 2006 को एनएसी के अध्यक्ष पद से और साथ ही रायबरेली से सांसद पद से भी इस्तीफा दे दिया। मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में एनएसी ने 2004 से 2008 तक और फिर दूसरे कार्यकाल में 2010 से 2014 तक काम करती रही।

इन दोनों कार्यकाल में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह सरकार को कभी फ्री हैंड नहीं छोड़ा और उस पर साया बनकर मंडराती रहीं। 2014 में बीजेपी सत्ता में आई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो सरकार ने एनएसी से जुड़ी सैकड़ों फाइलें सार्वजनिक कर दीं। वो फाइलें बताती हैं कि किस तरह देश को सूचना का अधिकार (आरटीआई) देने वाली एनएसी ने अपने ही कामकाज को गुप्त रखने का पक्का इतंजाम किया था। एनएसी ने 2005 में तय किया था कि उसके रिकॉर्ड सिर्फ एनएसी के सदस्य ही देख सकते हैं, वो भी तब जब सदस्य इसकी मांग करें।

एनएसी की बैठकों में मंत्रियों और नौकरशाहों को बुलाया जाता था। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की फाइलें सोनिया गांधी के पास जाती थीं और वहां से पास होकर पीएमओ आती थीं। कई बार उलटा होता था। सोनिया गांधी की तरफ से ही फाइलें तैयार होकर पीएमओ आती थीं जिन्हें लागू करवाना मनमोहन सिंह सरकार के लिए अनिवार्य होता था। नो इफ, नो बट, सोनिया गांधी का निर्देश सर माथों पर। यही थी बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी जिम्मेदारी।मोदी सरकार तरफ से सार्वजनिक कई गई कई एनएसी फाइलें चीख-चीखकर यह सत्य बताती हैं। इन फाइलों से साफ झलकता है कि कैसे सोनिया गांधी के निर्देशों को मनमोहन सिंह को मानना ही पड़ता था।

अब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी कह रहे हैं कि आतिशी के रूप में दिल्ली को राबड़ी देवी मिल गई हैं। इशारा साफ है- मुख्यमंत्री की कुर्सी भले ही आतिशी के पास हो, लेकिन ताकत तो केजरीवाल के पास ही रहेगी, निर्णय तो वही लेंगे। इसे आतिशी भी मान ही चुकी हैं। राबड़ी देवी अशिक्षित थीं और आतिशी उच्च शिक्षित, दशा एक जैसी। राजनीति में खड़ाऊं पूजन की व्यवस्था से पद पाए लोगों की महत्वाकांक्षा भी जग सकती है, जीतन राम मांझी ने ही यह साबित किया है। आतिशी को ‘शीशमहल’ अपने मोहपाश में बांधा पाता है कि नहीं, ये आने वाला वक्त ही बताएगा।

चंद्रबाबू नायडू ‘झूठे’, तिरूपति प्रसादी लड्डू विवाद पर जगनमोहन ने पीएम मोदी को लिखा पत्र

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इस बार जगनमोहन रेड्डी ने तिरूपति प्रसादी लड्डू विवाद पर प्रधानमंत्री मोदी को पत्र भेजा है. उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर झूठ बोलने का आरोप लगाया. आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने तिरुपति मंदिर प्रसादी लड्डू विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजा है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तिरूपति मंदिर की गरिमा और पवित्रता को नष्ट करने की कोशिश की है. जगन ने प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में इसका भी जिक्र किया है. वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख ने दावा किया कि तिरूपति में प्रसादी लड्डू को लेकर लगाए गए आरोप पूरी तरह से निराधार हैं. उन्होंने मोदी से ऐसे ‘निराधार आरोपों’ के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया।

चंद्रबाबू अब मोदी की गठबंधन सरकार में सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक हैं। इस साल के लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए गठबंधन काफी हद तक बिहार के नीतीश और आंध्र के चंद्रबाबू पर निर्भर है. ऐसे में ‘इंडिया’ खेमे के जगन ने मोदी को पत्र भेजकर चंद्रबाबू के खिलाफ शिकायत की है. उस पत्र में वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख ने लिखा, ”चंद्रबाबू हर समय झूठ बोलते हैं। झूठ बोलना उसकी आदत है. अब वह अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए इतना नीचे गिर गए हैं।’ इतने निर्लज्ज तरीके से झूठ फैलाने के लिए चंद्रबाबू के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए और सच्चाई सामने लानी चाहिए।” मोदी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थान की गरिमा और पवित्रता को ‘नष्ट करने’ की कोशिश की थी।

चंद्रबाबू ने पिछले बुधवार को तिरूपति प्रसादी लड्डू पर ‘विवादित’ टिप्पणी की थी। उनकी शिकायत थी कि जगन के शासनकाल में तिरुमाला के प्रसादी लड्डू बनाने में इस्तेमाल होने वाले घी में जानवरों की चर्बी मिलाई जाती थी। उन्होंने गुजरात की एक सरकारी प्रयोगशाला की जुलाई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि तिरूपति बेंकटेश्वर मंदिर के प्रसादी लड्डुओं में ‘शुद्ध’ घी के साथ जानवरों की चर्बी मिलाई जा रही है. यहीं से विवाद शुरू हुआ. वाईएसआर कांग्रेस ने पहले आरोपों से इनकार किया था और चंद्रबाबू की टिप्पणियों को “राजनीति से प्रेरित” बताया था।

मंदिर को घी निर्यात करने वाली एक कंपनी ने कहा कि वे ‘शुद्ध गाय के दूध’ से घी बनाते हैं। कंपनी ने यह भी कहा कि उनके पास शुद्धता के सबूत के तौर पर प्रयोगशाला रिपोर्ट हैं। तिरूपति मंदिर के प्रसादी लड्डू पर विवाद बढ़ता देख केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा पहले ही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को एक विस्तृत रिपोर्ट भेज चुके हैं।

तिरूपति मंदिर के प्रसादी लड्डू में जानवर की चर्बी! कथित तौर पर आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू के विशेष ‘श्रीवरी लड्डू’ का इस्तेमाल तिरुपति के बेंकटेश्वर मंदिर में प्रसाद के रूप में किया जाता है। ‘तिरुमाला तिरूपति देवस्थानम’ अधिकारी इसे देश-विदेश के भक्तों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी करते हैं। उन्हीं के राज्य में विश्व प्रसिद्ध तिरूपति बेंकटेश्वर मंदिर के प्रसादी लड्डुओं में ‘शुद्ध’ घी के साथ जानवरों की चर्बी मिलाई जा रही है! ऐसी सनसनीखेज शिकायत की आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने!

उन्हीं के राज्य में विश्व प्रसिद्ध तिरूपति बेंकटेश्वर मंदिर के प्रसादी लड्डुओं में ‘शुद्ध’ घी के साथ जानवरों की चर्बी मिलाई जा रही है! आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के मुखिया चंद्रबाबू नायडू ने की ऐसी सनसनीखेज शिकायत!
तिरूपति के वेंकटेश्वर मंदिर में प्रसाद के रूप में एक विशेष ‘श्रीवरी लड्डू’ का उपयोग किया जाता है। तिरूपति मंदिर के प्रबंधन और रखरखाव के लिए जिम्मेदार तिरुमाला तिरूपति देवस्थानम (टीटीडी) प्राधिकरण इसे हर दिन दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भक्तों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी करते हैं। पिछले जनवरी में अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में ‘विशेष प्रसाद’ के रूप में तिरूपति मंदिर का लड्डू भी लाया गया था। चंद्रबाबू के साथ-साथ उनके बेटे और आंध्र के आईटी मंत्री ने भी उन पर लड्डू में जानवरों की चर्बी मिलाने का आरोप लगाया है. एक्स पोस्ट में उन्होंने लिखा, ”तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर हमारा सबसे पवित्र मंदिर है। मैं यह जानकर हैरान हूं कि वाईएस जगनमोहन रेड्डी के प्रशासन ने तिरुपति प्रसादम में घी के बजाय पशु वसा का उपयोग किया है।” पार्टी सांसद सुब्बा रेड्डी ने कहा, ”चंद्रबाबू गंदी राजनीति कर रहे हैं. उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के करोड़ों भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।”

वामपंथी दिशानायके श्रीलंका के नए राष्ट्रपति बनने को तैयार हैं, विक्रमसिंघे तीसरे स्थान पर हैं।

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श्रीलंका के निवर्तमान राष्ट्रपति विक्रमसिंघे को 17.27 फीसदी वोट मिले. वोट प्रतिशत के मामले में वह तीसरे स्थान पर हैं. संसद में विपक्ष के नेता साजिथ प्रेमदासा दूसरे स्थान पर हैं। प्रारंभिक गणना में जो संकेत मिले उन्हें अंत तक बरकरार रखा गया। मतपेटी बंद होने के बाद वोट-नतीजों से पता चलता है कि वामपंथी नेता अनुराकुमार दिशानायके श्रीलंका के नए राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। मैदान में उतरे 38 उम्मीदवारों में से वामपंथी गठबंधन पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (जेवीपी) के नेता दिशानायकेई को सबसे ज्यादा वोट शेयर (42.31 प्रतिशत) मिला।

वहीं, देश के निवर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे को सिर्फ 17.27 फीसदी वोट मिले. वोट प्रतिशत के मामले में वह तीसरे स्थान पर हैं. श्रीलंका की संसद में विपक्ष के नेता साजिथ प्रेमदासा 32.76 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक विक्रमसिंघे की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है. उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी. हालांकि, देश के विदेश मंत्री अली साबरी ने कहा, ”वोट से साफ है कि दिशाने की जीत हुई है.”

संयोग से, पांच साल पहले, 2019 में श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में दिशानायक के नेतृत्व वाले वाम गठबंधन को केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। कई लोग केवल पांच वर्षों में देश के लोगों के रवैये में आए इस आमूल-चूल बदलाव का कारण श्रीलंका की आर्थिक उथल-पुथल को बता रहे हैं। 2022 में, प्रधान मंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने कड़े विरोध के कारण अपदस्थ होने के बाद देश छोड़ दिया। सांसदों की वोटिंग में रानिल ने अंतरिम सरकार के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली. लेकिन रानिल उस आर्थिक संकट को नियंत्रित नहीं कर सके जिसने राजपक्षे के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन को उकसाया। ऐसे में माना जा रहा है कि रानिल के नेतृत्व में अविश्वास जताने के बाद 56 साल के दिशानायक को श्रीलंका का राष्ट्रपति चुना गया.

श्रीलंका में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 17 लाख है. उनमें से लगभग 75 प्रतिशत ने शनिवार के राष्ट्रपति चुनाव में मतदान किया। यानी करीब 1 करोड़ 27 लाख वोट पड़े. वोटों की गिनती शुरू होने के बाद दिशानायक ने बढ़त बना ली है. लेकिन उस देश के चुनाव नियमों के अनुसार उन्हें पहली पसंद के कम से कम 50 प्रतिशत वोट नहीं मिले। उन्हें 49 फीसदी वोट मिले. अंत में दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती शुरू होती है. फिर भी उन्हें करीब 43 फीसदी वोट मिले और बाकियों को काफी पीछे छोड़ दिया.

दिशानायक ने जीत का संकेत मिलने के बाद सोशल मीडिया पर लिखा, “यह जीत हम सभी की है।” दिशानायक की पार्टी के एक सूत्र के मुताबिक, वह सोमवार को कोलंबो में राष्ट्रपति आवास पर शपथ लेंगे।

श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में वाम गठबंधन के नेता अनुराकुमार दिशानायक अभी भी आगे हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, वह पहले दस लाख वोटों में से करीब 53 फीसदी वोटों से आगे हैं. दूसरे स्थान पर द्वीप की संसद में विपक्ष के नेता साजिथ प्रेमदासा हैं। उन्हें करीब 22 फीसदी वोट मिले. निवर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे शुरुआती गिनती में थोड़ा पीछे रह गए हैं। न्यूज एजेंसी के ताजा अपडेट के मुताबिक वह तीसरे स्थान पर हैं।

श्रीलंका में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 17 लाख है. उनमें से लगभग 75 प्रतिशत ने शनिवार के राष्ट्रपति चुनाव में मतदान किया। यानी करीब 1 करोड़ 27 लाख वोट पड़े हैं. मतगणना के शुरुआती रुझान में श्रीलंका के वाम गठबंधन के नेता दिशानायक आगे चल रहे हैं.

पिछले कुछ वर्षों में आए वित्तीय संकट के संदर्भ में श्रीलंका में यह पहला राष्ट्रपति चुनाव है। आज़ादी के बाद श्रीलंका के साढ़े सात दशक के इतिहास में पहली बार, द्वीप राष्ट्र इतने बड़े वित्तीय संकट का सामना कर रहा है। वस्तुतः दिवालिया हो चुके श्रीलंका में बड़े पैमाने पर विद्रोह हुए हैं। 2022 में, तत्कालीन प्रधान मंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई राष्ट्रपति गोटबाया ने कड़े विरोध के कारण अपदस्थ होने के बाद देश छोड़ दिया। सांसदों की वोटिंग में रानिल ने अंतरिम सरकार के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली.

हालांकि, इस चुनाव में राजपक्षे परिवार श्रीलंका की राजनीति में खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहा है। राजपक्षे परिवार के नमल राजपक्षे भी इस बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे हैं. रॉयटर्स के ताजा आंकड़ों के मुताबिक नमल चौथे स्थान पर हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में कुल 38 उम्मीदवार हैं. शनिवार को चुनाव चरण खत्म होने के बाद गिनती शुरू हुई. राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए कुल मतों का 50 प्रतिशत आवश्यक होता है। श्रीलंका का चुनाव आयोग रविवार को चुनाव नतीजों की घोषणा कर सकता है.

आंखों में चमक लाएगा लिक्विड आईशैडो! लेकिन अगर आप 5 केरामाटी को जान लें तो यह भी ‘जादुई’ हो जाएगा

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मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा अपनी पलकों पर पन्ना हरे रत्न का पाउडर लगाती थीं। और ऊपरी पत्तियों पर वह लैपिस लाजुली पत्थर का बारीक पाउडर फैलाकर गाढ़ा नीला रंग लाता था। प्यार में आशिकों को आशिकों की नजरों का चस्का लग गया है. आँखों की गहराइयों में गोता लगाने के बाद उन्हें कोई सीमा नहीं मिली। चाहे वह काले हिरण की आंख हो या बिल्ली की आंख – रंग के उपयोग से आंखें अधिक आकर्षक हो सकती हैं। काजोल का रंग काला, ग्रे, मैट, हरा या नीला हो सकता है। उदाहरण के लिए, मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा अपनी पलकों पर पन्ना हरे रत्न का पाउडर इस्तेमाल करती थीं। और ऊपरी पत्तियों पर वह लैपिस लाजुली पत्थर का बारीक पाउडर फैलाकर गाढ़ा नीला रंग लाता था। रानी की आंखों में सुनहरी चमक लाने के लिए काजोल के साथ-साथ सोने के रंग के खनिजों का भी इस्तेमाल किया जाता था।

निःसंदेह, वह यीशु मसीह के जन्म से 50 वर्ष पहले की बात है। इस युग में आंखों की जादुई चमक के लिए रत्न चूर्ण की जरूरत नहीं है। लिक्विड आईशैडो लें। एक बार आईशैडो लगाने के बाद दाग लगने का डर नहीं रहता है। सुबह से रात एक जैसी होगी. लेकिन पलकों पर जादू का स्पर्श लाने के लिए, आपको यह जानना होगा कि लिक्विड आईशैडो का उपयोग कैसे किया जाए।

तरल लेकिन ठोस

लिक्विड आईशैडो तरल हो सकता है लेकिन इसका उपयोग करना थोड़ा मुश्किल है, यहां तक ​​कि मेकअप आर्टिस्ट भी इस बात से सहमत हैं। लेकिन साथ ही उनका ये भी कहना है कि आईशैडो लगाने का कोई खास नियम नहीं है.

थोड़ी संतुष्टि

इस प्रकार के आईशैडो के उचित उपयोग के लिए पहला नियम संयम से उपयोग करना है। याद रखें, यदि आप थोड़ा देते हैं, तो आप आवश्यकतानुसार राशि बढ़ा सकते हैं। यदि आप अधिक उपयोग करते हैं, तो इसे संभालना मुश्किल है।

पल्लवी पल्लवित

आंखों के आकार पर ध्यान दें. वहां सबसे पहले आईशैडो लगाएं। अगर आप काजल नहीं भी लगाएंगी तो भी ऐसा लगेगा जैसे आपने काजल लगा रखा है। आंखें गहरी दिखेंगी.

जादू आपकी उंगलियों पर है

उंगली के स्पर्श से आईशैडो को क्रीज से लेकर आंख के ऊपरी हिस्से तक ब्लेंड करें। अगर लिक्विड आईशैडो ‘चमकदार’ है तो थोड़ा इधर-उधर हो जाए तो कोई दिक्कत नहीं है। हालाँकि, यदि यह ‘मैट फ़िनिश’ है, तो आपको सावधान रहना होगा। ऐसे में चैटलो ब्रश का इस्तेमाल किया जा सकता है।

पहनने के लिए रंग

एकाधिक रंगों का उपयोग किया जा सकता है. या आप एक ही रंग का कम या ज्यादा उपयोग करके आंखों के खूबसूरत क्षेत्रों को और अधिक स्पष्ट बना सकते हैं। लेकिन रंग को लंबे समय तक टिकाए रखने के लिए नीचे पाउडर का इस्तेमाल किया जा सकता है। खासतौर पर इससे तैलीय त्वचा को फायदा होगा।

मेकअप में बेस्ट टच लिपस्टिक। आंखों पर गाढ़ा काजल और होठों पर लिपस्टिक लुक को पूरा कर रही है। हालाँकि, यह लिपस्टिक वास्तव में बहुत कार्यात्मक है। सिर्फ होठों पर ही नहीं, लिपस्टिक को और भी कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। जानिए लिपस्टिक इस्तेमाल करने के कुछ ऐसे तरीके.

ब्लश के रूप में- लिपस्टिक ब्लश के रूप में बहुत अच्छा काम करती है। अच्छी तरह मिश्रित करने से लिपस्टिक पाउडर ब्लश की तुलना में अधिक प्राकृतिक दिखती है। लंबे समय तक रहें.

कलम के रूप में – लिखने के लिए लिपस्टिक का उपयोग करना बहुत स्टाइलिश है। आप शीशे पर लिख सकते हैं, लिपस्टिक से टी-शर्ट पर लिख सकते हैं। लिपस्टिक का उपयोग यादृच्छिक नोट्स बनाने के लिए पेपर नैपकिन या सफेद बोर्ड पर लिखने के लिए भी किया जा सकता है।

लिप ग्लॉस- अगर लिपस्टिक खत्म होने वाली है तो आप इसे ग्लॉस की तरह इस्तेमाल कर सकती हैं। इसे ट्यूब से बाहर निकालें या लिपस्टिक को तोड़ दें। इस बार इसमें वैसलीन मिलाकर लगाने से बहुत अच्छा निखार आएगा।

आईशैडो – ब्लशर की तरह, लिपस्टिक आईशैडो के रूप में बहुत अच्छा काम करती है। सबसे पहले आईशैडो को न्यूड लिपस्टिक से बेस करें। इसके बाद रंगीन लिपस्टिक के साथ आईशैडो लगाएं। लिपस्टिक क्रीम आईशैडो का लुक देगी।

कंटूरिंग और हाइलाइटिंग – गहरे भूरे या कॉफी रंग की लिपस्टिक कंटूरिंग और हाइलाइटिंग के लिए बहुत अच्छी होती हैं। नाक, चीकबोन्स, माथे और मेकअप ब्लेड पर गहरे रंग की लिपस्टिक लगाएं।

कलम के रूप में – लिखने के लिए लिपस्टिक का उपयोग करना बहुत स्टाइलिश है। आप शीशे पर लिख सकते हैं, लिपस्टिक से टी-शर्ट पर लिख सकते हैं। लिपस्टिक का उपयोग यादृच्छिक नोट्स बनाने के लिए पेपर नैपकिन या सफेद बोर्ड पर लिखने के लिए भी किया जा सकता है।

आखिर महमूद गजनी की आंखों में क्यों चुभता रहा कश्मीर?

एक समय ऐसा था जब महमूद गजनी की आंखों में कश्मीर हमेशा से ही चुभता रहा! अरब के मुसलमानों के साथ कश्मीरी हिंदू शासकों का पहली बार सामना तब हुआ, जब कश्मीर पर कार्कोट वंश (625 से 885 ईसवी) का राज था। इस राजवंश के राजाओं चंद्रपीड और ललितादित्य ने जब मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक अपने सैन्य अभियान छेड़े तब उनका परिचय नए-नए उभरे इस्लाम धर्म से हुआ। अरब आततायियों से सम्राट ललितादित्य तो इतना डर गया कि उसने इनके खिलाफ चीनी सम्राट से मदद मांगी। चीन के सम्राट के पास भेजे गए कश्मीर के एक राजदूत ने कहा कि सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड अरबों के खिलाफ एक सैन्य गठबंधन बनाना चाहते हैं और इसमें आपकी मदद चाहते हैं। इसके कुछ समय बाद ही सिंध पर अरबों ने 712 में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में आक्रमण किया। मगर, वह कश्मीर नहीं जा पाया। कुछ समय बाद ही यानी करीब 1000 ईसवी के आसपास अफगानिस्तान गजनी शहर से एक मुस्लिम आक्रमणकारी महमूद गजनवी या गजनी भारत की अपार दौलत के बारे में सुनकर आया। उसने भारत पर 17 बार आक्रमण किया, कई शहर जीते, मगर वह कश्मीर को कभी जीत नहीं पाया। मोहम्मद गजनी के साथ ही एक अरब इतिहास अल्बरूनी भी भारत आया था। अलबरूनी (973-1048) एक फारसी विद्वान, लेखक, वैज्ञानिक और विचारक माना जाता था। अल्बरूनी ने भारत के साथ-साथ श्रीलंका की यात्रा भी की थी। उसे भारतीय इतिहास का पहला मुस्लिम जानकार कहा जाता है। अल्बरूनी की एक किताब ‘किताब-उल-हिंद’ भारत के बारे में विस्तार से लिखा गया है। अल्बरूनी ने 1017 में भारत आने के साथ ही शिकायती लहजे में कश्मीर के बारे में कहा था कि उनके साथ किसी भी तरह का व्यापार करना भी बहुत मुश्किल है। वे किसी ऐसे हिंदू को भी अपने राज्य में नहीं घुसने देते जिन्हें वे व्यक्तिगत रूप से जानते न हों।

कश्मीर में भी इस्लाम के आगमन की कहानी इतिहास से पहले मिथकों के रूप में शुरू होती है। ख्वाजा मोहम्मद आजम दीदामरी नाम के एक सूफी ने फारसी में ‘वाकयात-ए-कश्मीर’ नाम से 1747 में एक किताब छपवाई, जो बेहद मनगढ़ंत थीं। इसमें जानबूझकर कश्यप ऋषि को काशिफ बताया गया है। यह इतिहास से छेड़छाड़ की बड़ी कोशिश थी। इसमें कहा गया कि एक राक्षस ने पूरे कश्मीर को पानी में डुबा दिया, मगर काशिफ ने महादेव का तप करते हैं, जिसके बाद विष्णु इस राक्षस को मारकर इस क्षेत्र को पानी से उबारते हैं। इसका नाम तब काशिफ सिर दिया गया।

1962 में प्रकाशित किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ की भूमिका खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी। कौल के अनुसार, मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध विजय के बाद 1015 में ही कश्मीर जीतना चाहा था, मगर वहां की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से उसे कामयाबी हाथ नहीं लगी। ऐसे में वहां पर किसी तरह का बाहरी घुसपैठ आसान नहीं था। अफगानिस्तान के गजनी शहर का रहने वाला महमूद गजनी या गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण किए और वहां की दौलत लूटकर गजनी ले गया। मगर, वह कश्मीर में कभी कामयाब नहीं हो सका।

गजनी से 100 साल पहले काबुल में लल्लिय नाम के एक ब्राह्मण मंत्री ने अपनी राजशाही स्थापित की थी जिसे इतिहासकार ‘हिंदू शाही’ कहते हैं। उन्होंने कश्मीर के हिंदू राजाओं के साथ गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध कायम किए थे। गजनी ने जब उत्तर भारत पर हमला करने की ठानी तो उसका पहला निशाना यही साम्राज्य बना। उस समय काबुल का राजा था जयपाल। जयपाल ने कश्मीर के राजा से मदद मांगी। मदद मिली भी, लेकिन वह गजनी के हाथों हार गया। पराजित होने के बाद भी जयपाल के बेटे आनंदपाल और पोते त्रिलोचनपाल ने गजनी के खिलाफ लड़ाई जारी रखी।

गजनी या गजनवी ने 1015 में पहली बार तोसा-मैदान दर्रे के रास्ते कश्मीर पर हमला किया। मगर यहां पर पहाड़ों और खाइयों ने उसका साथ नहीं दिया। साथ ही कश्मीरियों ने गजनी की सेनाओं के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी और उसे भागने पर मजबूर कर दिया। गजनी को बेहद अपमान के साथ कश्मीर से लौटना पड़ा। लौटते वक्त उसकी फौज रास्ता भटक गई और बाढ़ में फंसकर जान गंवा बैठी। अल्बरूनी ने कश्मीर के लोगों के स्वभाव और रहन-सहन के बारे में विस्तार से बताया है। महमूद गजनी ने 6 साल बाद यानी 1021 में अपने सम्मान को लौटाने के लिए फिर उसी दर्रे से कश्मीर पर हमला किया। वह एक महीने तक वहां डेरा डाले बैठा रहा, मगर लौहाकोट की जबरदस्त किलेबंदी की एक ईंट भी टस से मस नहीं कर सका। सर्दियां शुरू हो गई थीं और घाटी में बर्फबारी की शुरुआत हो गई। गजनी समझ गया कि इस बार उसकी फौजों का मरना तय है। वह फौरन वहां से खिसक लिया।

इटली के वेनिस शहर के एक यात्री मार्को पोलो भी भारत आया था। उसने विजयनगर साम्राज्य का दौरा किया। मार्को पोलो के अनुसार, 1277 में कश्मीर में बड़ी संख्या में मुस्लिम मौजूद थे। उस दौरान कश्मीर के बाहरी हिस्सों और सिंधु नदी के आस-पास बसे दराद जनजातियों के लोग बड़ी संख्या में धर्म-परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार कर रहे थे। उन्हें मजबूरी में धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। कश्मीर के शासन काल का 1301 से 1320 तक का साल राजा सहदेव के शासनकाल के नाम था। इस दौरान बड़ी संख्या में कश्मीर की जनता सूफी धर्म प्रचारकों के प्रभाव में और मजबूरी में इस्लाम स्वीकार कर चुकी थी। दरअसल, तुर्किस्तान से आए एक सूफी धर्म-प्रचारक बुलबुल शाह ने इस्लाम को कश्मीर में जमकर फैलाया, जिसे सैयद शरफुउद्दीन, सैय्यद अब्दुर्रहमान और बिलाल शाह भी कहा गया है। बुलबुल शाह सुहरावर्दी मत के सूफी खलीफ शाह नियामतुल्लाह वली फारसी के चेले थे। इसी के दौर में तिब्बत से भागे हुए रिंचन कश्मीर पहुंचे, जिसे कश्मीरी राजा ने शरण दी।

माना जाता है कि रिंचन ने हिंदू राजा रामचंद्र की बेटी से शादी कर ली। वह हिंदू धर्म अपनाना चाहते थे, मगर उन्हें शामिल नहीं किया गया। उस समय के कश्मीरी शैव गुरु ब्राह्मण देवस्वामी ने उन्हें हिंदू धर्म में शामिल करने से इनकार कर दिया। ऐसे में रिंचन ने हारकर इस्लाम कबूल कर लिया। तब बुलबुल शाह ने रिंचन को सद्रउद्दीन नाम दे दिया। इस तरह वह कश्मीर के पहले मुस्लिम शासक बन गए।

जानिए पानीपत की जंग के हीरो हेमू की पूरी कहानी!

आज हम आपको पानीपत की जंग के हीरो हेमू की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं !सल्तनत काल के बाद मध्य एशिया के फरगना से आए मोहम्मद जहीरूद्दीन बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई से हिंदुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। मगर उसके बेटे हुमायूं ने बाबर की विरासत गंवा दी। ऐसे ही समय में रेवाड़ी का एक शेर हुआ, जिसका नाम था हेमू। हुमायूं को हराने वाले और 1540 में भारत से खदेड़ने वाले हेमू को हिंदुस्तान का अंतिम हिंदू सम्राट कहा जाता है। शेरशाह सूरी की सेनाओं में शामिल होकर हेमू एक समय काफी ऊंचे ओहदे तक पहुंच गया। हेमू सूर वंश के एक शासक आदिल शाह के जमाने में सैन्य जनरल और प्रधानमंत्री बन गया था। वह बंगाल में था, जब 27 जनवरी 1556 को हुमायूं की मौत हो गई। मुगल सम्राट की मृत्यु ने हेमू को मुगलों को हराने और खोए हुए क्षेत्र को पुनः प्राप्त करने का एक आदर्श अवसर प्रदान किया। मगर, एक दुर्भाग्य ने हिंदुस्तान की किस्मत पलट दी। हरियाणा के इसी हीरो की कहानी जानते हैं। हुमायूं की मौत के बाद हेमू ने बंगाल से तेजी से सैन्य मार्च शुरू किया और मुगलों को बयाना, इटावा, भरथना, बिधूना, लखना, संभल, कालपी और नारनौल से बाहर निकाल दिया। आगरा में तो मुगल सेनाओं ने जब यह सुना कि हेमू ने हमला कर दिया तो वह बिना लड़े ही वहां से भाग गए। अपने 50 हजार घुड़सवारों और 500 हाथियों के साथ हेमू दुश्मन पर टूट पड़ते थे। वह 1553 से 1556 के दौरान इस्लाम शासन के महामात्य (प्रधानमंत्री) और जनरल के रूप में रहा।

इसके बाद हेमू दिल्ली के ठीक बाहर एक गांव तुगलकाबाद पहुंचा। यह सुनकर आगरा की तरह ही दिल्ली का मुगल गवर्नर तरदी बेग खान तो भाग गया, मगर उसकी सेनाओं ने मुकाबला किया। 7 अक्टूबर, 1556 को एक दिन की लड़ाई में हेमू ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और उसे विक्रमादित्य या बिक्रमजीत खिताब से नवाजा गया। जब तुगलकाबाद की लड़ाई की यह खबर 13 साल के अकबर तक पहुंची तो उसके जनरल बैरम खां ने फौरन दिल्ली की ओर कूच किया। अकबर को रास्ते में संयोग से अली कुली खान शैबानी की मदद मिली, जिसने उन्हें अपनी 10 हजार की मजबूत घुड़सवार सेना दे दी। रास्ते में अकबर और उसकी सेनाओं ने हेमू के तोपखाने पर कब्जा जमा लिया, जो हेमू के लिए बड़ी चूक साबित हुई।

हेमू की सेना में 30,000 अफगानी घुड़सवार थे। वहीं, इसमें 500 हाथियों की टुकड़ी शामिल थी, जो जंग में दुश्मन की सेनाओं को कुचल देती थी। हर हाथी को कवच से ढका गया था। हेमू खुद हवाई नाम के एक हाथी पर सवार होकर जंग लड़ता था। पानीपत युद्ध से पहले तक हेमू और उसकी सेना ने बंगाल से पंजाब तक 22 लड़ाइयों में जीत हासिल की थी। 5 नवंबर 1556 को पानीपत के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र में हेमू की सेनाओं का मुकाबला मुगल सेना से हुआ। अकबर और बैरम खान युद्ध के मैदान से आठ मील दूर पीछे ही रहे। अकबरनामा के लेखक अबुल फजल के अनुसार, हेमू और अकबर की सेनाएं ऐसे टकराईं, जैसे पानी से आग निकल रही हो।

हेमू ने पानीपत में मुगलों पर हमला शुरू किया और मुगलों के दाएं और बाएं विंग के बीच अपने हाथियों को छोड़ दिया। मुगल सेना इस लड़ाई में पिछड़ रही थी। इसी वक्त हेमू ने बीच में लड़ रही मुगल सेना को कुचलने के लिए हाथियों और घुड़सवार सेना की टुकड़ी आगे कर दी। इसी जगह पर हेमू खुद नेतृत्व कर रहा था। वह जीतने ही वाला था कि मुगल सेना की ओर से किसी ने एक तीर हेमू की ओर चलाया और यह तीर सीधा हेमू की आंख में जाकर लगा। हाथी के हौदे पर बैठा हेमू वहीं बेहोश हो गया। हाथी पर हेमू को न देखकर उसके सैनिकों का मनोबल टूट गया। हेमू की सेना में भगदड़ मच गई।

आखिरकार कई घंटे की लड़ाई के बाद हेमू की सेना ने हार मान ली। 5 हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए। हेमू को ले जा रहे हाथी को पकड़ लिया गया। उस पर हेमू करीब-करीब बेहोश हो चुका था। उसे मुगल सैन्य शिविर में ले जाया गया। अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फजल कहता है कि जब बैरम खान ने 13 साल के अकबर से हेमू का सिर काटने को कहा तो उसने मना करते हुए कि मरे हुए को क्या मारना? तब बैरम खान ने खुद सिर काट दिया। हालांकि, समकालीन लेखक मोहम्मद आरिफ कंधारी ने कहा है कि अकबर ने ही हेमू का सिर काट लिया और गाजी का खिताब धारण कर लिया।

हेमू के जाने के बाद से सदियों से उसकी समाधि उपेक्षित पड़ी थी। राज्य सरकार ने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया। ऐसे में प्रवासी मुस्लिमों ने वहां पर एक दरगाह बना दिया। 1990 तक यह जगह भारतीय पुरातत्व विभाग के पास थी। मगर, 1990 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओपी चौटाला ने समाधि समेत पूरे 10 एकड़ के क्षेत्र को वक्फ बोर्ड के हवाले कर दिया। हरियाणा वक्फ बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन मेवात क्षेत्र के एक मुस्लिम विधायक थे, जिन पर कुछ लोगों से पैसे लेकर अतिक्रमण की अनुमति देने के आरोप लगे थे। पानीपत का प्रथम युद्ध (अप्रैल 1526) पानीपत के निकट लड़ा गया था। पानीपत वह स्थान है जहाँ बारहवीं शताब्दी के बाद से उत्तर भारत पर नियंत्रण को लेकर कई निर्णायक लड़ाइयां लड़ी गईं। पानीपत के प्रथम युद्ध ने ही भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। यह उन पहली लड़ाइयों में से एक थी जिसमें मुगलों ने बारूद और तोपों का इस्तेमाल किया। बाबर और दिल्ली के लोदी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच लड़े गए इस युद्ध में बाबर ने लोदी को परास्त किया था।

हिंदुओं और हिंदू धर्म के बारे में क्या बोले मोहन भागवत?

हाल ही में मोहन भागवत ने हिंदू धर्म और हिंदुओं के बारे में एक बयान दे दिया है! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चीफ मोहन भागवत ने एक बार हिंदू धर्म को लेकर अपनी राय व्यक्त की है। संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हिंदू धर्म को सबके कल्याण की कामना करने वाला विश्व धर्म बताते हुए कहा है कि हिंदू का मतलब विश्व का सबसे उदारतम मानव… जो सब कुछ स्वीकार करता है। यह पहली बार नहीं है जब भागवत ने हिंदू धर्म पर अपनी राय रखी हो। संघ प्रमुख का हिंदू धर्म को लेकर दिए गए कई बार अलग-अलग तरह की राय दी गई है। आरएसएस चीफ हिंदू धर्म को विशेषण बताने के साथ ही हिंदुओं को देश का कर्ताधर्ता के साथ ही कई रूपों में अभिव्यक्त कर चुके हैं। संघ प्रमुख की हिंदू धर्म पर की गई टिप्पणियों को लेकर कई बार विवाद भी हो चुका है। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या आरएसएस इस विषय को लेकर हमेशा उलझन में रहता है।

रविवार को संघ प्रमुख ने कहा कि हमारे राष्ट्र को समर्थ करना है। यह हिंदू राष्ट्र है क्योंकि हिंदू समाज इसका उत्तरदायी है। इस राष्ट्र का अच्छा होता है तो हिंदू समाज की कीर्ति बढ़ती है। उन्होंने आगे कहा कि इस राष्ट्र में कुछ गड़बड़ होता है तो इसका दोष हिंदू समाज पर आता है क्योंकि वे ही इस देश के कर्ताधर्ता हैं। भागवत ने आगे कहा कि हिंदू का मतलब विश्व का सबसे उदारतम मानव, जो सब कुछ स्वीकार करता है, सबके प्रति सद्भावना रखता है। पराक्रमी पूर्वजों का वंशज है जो विद्या का उपयोग विवाद पैदा करने के लिए नहीं करता, ज्ञान देने के लिए करता है। संघ प्रमुख ने पिछले सप्ताह ही पूजा-पाठ को लेकर धर्म पर राय व्यक्त की थी। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि धर्म का अर्थ सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक अवधारणा है जिसमें सत्य, करुणा, समर्पण शामिल है। उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द एक विशेषण है जो विविधताओं को स्वीकार करने का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जीवन शक्ति हमारे राष्ट्र का आधार है और यह धर्म पर आधारित है जो हमेशा रहेगा।

मोहन भागवत ने पिछले साल सितंबर में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है और सभी भारतीय हिंदू हैं तथा हिंदू सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है और यह एक सच्चाई है। वैचारिक रूप से, सभी भारतीय हिंदू हैं और हिंदू का मतलब सभी भारतीय हैं। संघ प्रमुख का कहना था कि वे सभी जो आज भारत में हैं, वे हिंदू संस्कृति, हिंदू पूर्वजों और हिंदू भूमि से संबंधित हैं, इनके अलावा और कुछ नहीं। नवबंर 2022 में संघ प्रमुख ने बिहार में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि भारत में रहने वाले सभी लोग ‘परिभाषा’ के अनुसार हिंदू हैं। सरसंघचालक ने कहा कि लोगों को यह समझना चाहिए कि क्योंकि वे हिंदुस्थान में रहते हैं वे सभी हिंदू हैं। भागवत का कहना था कि हिंदुत्व सदियों पुरानी संस्कृति का नाम है जिसके लिए सभी विविध धाराएं अपनी उत्पत्ति का श्रेय देती हैं। उन्होंने कहा था कि अलग-अलग शाखाएं उत्पन्न हो सकती हैं और एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन वे पाते हैं कि सभी की शुरुआत एक ही स्रोत से है। उन्होंने कहा था हिंदुत्व एक सूत्र है, जो सभी को जोड़ता है। जो अपने को हिन्दू मानते हैं, वे सब हिन्दू हैं। जिनके पूर्वज हिंदू थे, वे सब भी हिंदू हैं।

मोहन भागवत हिंदू धर्म और हिंदुओं से जुड़े अपने बयानों के लेकर विवादों में रहे हैं। मोहन भागवत ने पिछले साल ही हिंदू धर्म ग्रंथों की समीक्षा की बात कही थी। नागपुर में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि पहले ग्रंथी इधर-उधर हो गए फिर कुछ स्वार्थी लोगों ने अपने ग्रंथ में कुछ-कुछ घुसा दिया। उन्होंने कहा था कि हमारे यहां पहले ग्रंथ नहीं थे। हमारा धर्म मौखिक परंपराओं से चलता आ रहा था। बाद में ग्रंथ इधर-उधर हो गए। उन्होंने कहा था कि हिंदू धर्म चॉइस सिखाने वाला धर्म है। इसको लेकर विवाद हुआ था। इसके अलावा भागवत ने कहा था कि अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज, जर्मनी में रहने वाले जर्मन और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो, फिर हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों नहीं हो सकते। उनके इस बयान पर भी हंगामा मचा था।

जानिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई ऐतिहासिक फैसलों के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई ऐतिहासिक फैसलों के बारे में जानकारी देने वाले हैं! स्वतंत्र भारत में जन्मे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को अपना 74वां जन्मदिन मना रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पिछले दो कार्यकाल के 10 साल के शासन में पीएम नरेंद्र मोदी ने कई ऐतिहासिक फैसले लेकर दूरदर्शी प्रधानमंत्री की छवि बनाई। कई राष्ट्र प्रमुखों के साथ उनका दोस्ताना व्यवहार मोदी को ग्लोबल लीडर के रूप में खड़ा कर द‍िया। दो बार पूर्ण बहुमत और एक बार गठबंधन की सरकार में प्रधानमंत्री पद पर आसन्न नरेंद्र मोदी ने कई कड़े और बड़े फैसले लिए, जो भारत के विकास में दूरगामी प्रभाव डालेंगे। उनके जन्मदिन के अवसर पर आज हम उनके द्वारा लिए गए साहसिक फैसलों और जनहित योजनाओं की बात करेंगे।

नरेंद्र मोदी के 10 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल के साथ ही उनके द्वारा लाए गए जन धन योजना के भी 10 साल पूरे हुए। इस योजना की देश के बाहर भी तारीफ की जाती है। इसके अंतर्गत देश में बिना किसी न्यूनतम राशि के अकाउंट खोले गए, जिसमें महिलाओं ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। सरकार की पीएमजेडीवाई वेबसाइट के अनुसार अब तक इस योजना के अंतर्गत 53 करोड़ से अधिक बैंक अकाउंट खोले गए हैं, जीरो बैंक बैलेंस सुविधा के बावजूद इसमें अब तक करीब 2,30,000 रुपये जमा हैं। जनधन योजना के अलावा नमामि गंगे और स्वच्छ भारत अभियान योजनाएं भी काफी सुर्खियां बटोरी, जिसने सफाई अभियान को युद्धस्तर पर लाने का काम किया। आठ नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया था। जिसके तहत देश में 500 और 1,000 रुपए के नोट के प्रचलन को बाहर कर दिया गया। इसका मुख्य मकसद काले धन पर अंकुश लगाना, बाजार में चल रहे जाली नोटों से छुटकारा पाना और टेरर फंडिंग को रोकना था। हालांकि, सरकार को इस फैसले के बाद काफी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। क्योंकि आम लोगों को अपना नोट बदलने के लिए लंबी-लंंंबी लाइनों में लगना पड़ा था।

मेक इन इंडिया मोदी सरकार का एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी विचार रहा है। इसका मकसद भारत को विनिर्माण का केंद्र बनाना और विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में निवेश की राहों को आसान बनाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मई 2014 को मेक इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया की शुरुआत की। इसका उद्देश्य देश को डिजिटल क्षेत्र में सशक्त बनाना है। इसमें ऑनलाइन बुनियादी ढांचे में सुधार, इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाना, ग्रामीण इलाकों को हाई-स्पीड इंटरनेट से जोड़ना शामिल है।

मोदी सरकार 2016 में आधार एक्ट लाई। इसके तहत भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) की स्थापना की गई। अगर, इससे जुड़े लाभों की बात करें तो यूआईडीएआई 12 अंकों की आधार संख्या जारी करके नागरिकों को सब्सिडी, लाभ और सेवाएं दी जाती हैं। पीएम मोदी एक मई 2016 को बलिया से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य बीपीएल परिवारों को एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराना है। योजना के अंतर्गत पात्र परिवारों को गैस कनेक्शन के लिए पैसे नहीं दिए जाते, बल्कि सरकार गैस कंपनी को 1,600 रुपए देती है। इसके तहत लाभार्थियों को सिलेंडर, रेगुलेटर, सुरक्षा नली और डीजीसीसी पुस्तिका दी जाती है।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वपूर्ण फैसलों में 2016 का सर्जिकल स्ट्राइक शामिल है। इसके तहत भारतीय सेना ने 28-29 सितंबर, 2016 में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। ये 18 सितंबर, 2016 में कश्मीर के उरी में हुए आतंकी हमले के जवाबी कार्रवाई थी, जिसमें हमारे 19 जवान शहीद हुए थे। सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता का आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि भारतीय सेना ने बिना केजुअल्टी 38 से अधिक आतंकियों को मार गिराया था। मोदी सरकार इस दिन ‘सर्जिकल स्ट्राइक दिवस’ के रूप में नामित किया है।

मोदी सरकार के प्रमुख फैसलों में जीएसटी को लागू करना शामिल है। मोदी कैबिनेट के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक जुलाई, 2017 को जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) लागू किया। इसके अंतर्गत चार जीएसटी स्लैब 5 प्रति‍शत, 12 प्रत‍िशत, 18 प्रत‍िशत और 28 प्रत‍िशत को इंट्रोड्यूस किया गया। पीएम की एक और महत्वाकांक्षी योजना आयुष्मान भारत योजना भी उनके महत्वपूर्ण फैसलों में शामिल है। इसके अंतर्गत लाभार्थियों को पांच लाख रुपए तक सालाना मुफ्त इलाज की सुव‍िधा मिलती है। हाल ही में इस क्षेत्र में 70 वर्ष से अधिक आयु वाले सभी लोगों को शामिल किया गया है।

कई वर्षों से भाजपा के एजेंडे में लगे सीएए को लेकर मोदी सरकार नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 लाई। इसका मुख्य मकसद पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम धर्मों के लोगों भारतीय नागरिकता देना है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने के लिए एक विशेष प्रावधान मौजूद है। यह विशेष रूप से उन कुछ व्यक्तियों के लिए है जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुके हैं और हिंदू या सिख या बौद्ध या जैन या पारसी या ईसाई समुदाय से हैं।

आखिर कितनी है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी संपत्ति जानिए?

आज हम आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी संपत्ति बताने जा रहे हैं! तीसरी बार देश की कमान संभालने वाले प्रधानमंत्री मोदी आज 74 वर्ष के हो गए हैं। साफ-स्वच्छ राजनीतिक छवि वाले प्रधानमंत्री बड़े संघर्षों के बाद इस सबसे बड़े पद तक पहुंचे। खुद को चायवाला कहने वाले पीएम ने अपने शुरुआती जीवन की कठिनाइयों से पार पाकर पहले आरएसएस फिर भारतीय जनता पार्टी के अहम पदों पर, गुजरात के सीएम और बाद में देश की कमान संभाली। इस मुकाम तक पहुंचने के बाद पीएम मोदी की संपत्ति के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में उन्होंने अपनी संपत्ति के बारे में पूरी जानकारी एक हलफनामे में दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव 2024 के दौ रान चुनावी हलफनामे में अपनी कुल संपत्ति 3.02 करोड़ रुपये बताई है। प्रधानमंत्री की संपत्ति में चल संपत्ति और अचल संपत्ति दोनों शामिल हैं, साथ ही निवेश भी शामिल है। 2019 और 2014 में अपने घोषणाओं की तुलना में, पीएम मोदी की संपत्ति में वृद्धि हुई है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म द्वारा रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2019 में उन्होंने 2.51 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी, जबकि 2014 में यह 1.66 करोड़ रुपये थी।

पीएम मोदी के निवेश में 2.67 लाख रुपये का सोना शामिल है, जो चार सोने की अंगूठियों के रूप में रखा गया है। इसके अलावा, उन्होंने राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र में 9.12 लाख रुपये का निवेश किया है। 2019 में 7.61 लाख से एनएससी में यह निवेश लगभग 2 लाख बढ़ गया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री के पास 2024 के हलफनामे के अनुसार, बैंक के सावधि जमा (एफडी) में 2.85 करोड़ रुपये हैं। हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी के पास कोई भूमि या शेयर नहीं है, न ही उनके पास म्यूचुअल फंड में निवेश है। मोदी के पास 52,920 रुपये नकद हैं, जैसा कि उनकी ओर से दी गई जानकारी में बताया गया है।

पीएम ने जशोदाबेन को अपनी पत्नी के रूप में नामित किया था। मोदी ने घोषणा की है कि उनके पास गुजरात विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री है। हलफनामे में कहा गया है कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय (1978) से कला स्नातक हैं। हलफनामे में आगे बताया गया कि उन्होंने 1967 में गुजरात बोर्ड से एसएससी परीक्षा पास की थी। मोदी ने घोषणा की है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है और उन पर कोई सरकारी बकाया नहीं है। बता दें कि देश के सबसे सफल प्रधानमंत्रियों की लिस्ट में शुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 74 वर्ष के हो गए हैं। इस खास मौके पर पीएम मोदी किसी बड़े आयोजन या केक कटिंग सेरेमनी जैसी चीजों से खुद को दूर ही रखते हैं। पीएम बनने के बाद वह अपने हर जन्मदिन पर या तो किसी योजना को लॉन्च करते हैं या देश के लोगों के साथ समय बिताते हैं। बीजेपी इस मौके पर सेवा पखवाड़ा शुरू करेगी तो वहीं राजस्थान के अजमेर शरीफ दरगाह में 4000 किलो शाकाहारी भोजन परोसा जाएगा। देश की जनता को पीएम मोदी के बारे में और जानने की दिलचस्पी होती है, जैसे उनकी सैलरी, मोबाइल नंबर आदि। आज हम आपको बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी हर महीने कितनी सैलरी पाते हैं।

प्रधानमंत्री के पास काफी कार्यकारी अधिकार होने के अलावा, वे भारत सरकार के प्रमुख भी हैं। उन्हें भारत का राष्ट्रपति नियुक्त करता है और उन्हें संसद के दो सदनों में से किसी एक के सदस्य होने की आवश्यकता होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रति माह 1.66 लाख रुपये वेतन के रूप में मिलते हैं। इसमें 45,000 रुपये का संसदीय भत्ता, 3,000 रुपये का व्यय भत्ता, 2,000 रुपये का दैनिक भत्ता और 50,000 रुपये का मूल वेतन शामिल है। बाकी चीजें हटा दें तो पीएम को केवल सैलरी के रूप में 50 हजार रूपये मिलते हैं।

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को मिलने वाले सबसे बड़े फायदों में से एक उनका आवास है। पीएम मोदी दिल्ली में 7, लोक कल्याण मार्ग पर रहते हैं, जो देश की राजधानी सबसे अच्छे स्थानों में से एक है। इस आवास का कोई किराया या आवास लागत नहीं है। प्रधानमंत्री को एक विशेष लाभ भी मिलता है, जो है एयर इंडिया वन, जो उनका निजी और विशेष विमान है। जब प्रधानमंत्री मोदी दूसरे देशों का दौरा करते हैं, तब अक्सर उन्हें इस विमान में चढ़ते-उतरते देखा जाता है। भारतीय वायु सेना द्वारा संचालित, एयर इंडिया वन विमानों में स्व-सुरक्षा सूट और पूर्ण कार्यालय स्थान के साथ केबिन हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विशेष सुरक्षा समूह (SPG) सुरक्षा के हकदार हैं, जो एक ऐसी इकाई है जो केवल उनकी रक्षा के लिए समर्पित है। एसपीजी अधिकारी उच्च नेतृत्व गुणों, व्यावसायिकता और निकट सुरक्षा देने में दक्ष हैं। एसपीजी अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च बलिदान देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि सरकार की ओर से संगठन को सौंपा गया पवित्र कार्य किसी भी कीमत पर पूरा हो।