Tuesday, March 17, 2026
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जब 78 साल पहले बंगाल में बहा था खून!

एक ऐसी कहानी जिसमें 78 साल पहले बंगाल में खून बहा था! भारत में अंग्रेजों का शासन खत्म होने से एक साल पहले, कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक खूनी संघर्ष हुआ था। उस संघर्ष में कोलकाता की गलियां खून से लाल हो गईं थीं। सिर्फ 72 घंटों में लगभग 5,000 लोग मारे गए। एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए। हिंदू-मुस्लिमों के बीच हुए इस दंगे में हजारों लोगों की जान चली गई। दंगे इतने भयानक थे कि उन्होंने भारत के विभाजन की जमीन तैयार कर दी। 16 से 19 अगस्त तक चला ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ स्वतंत्रता और विभाजन से पहले का सबसे हिंसक नरसंहार था। दरअसल, 16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में उस समय सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जब जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान राज्य की मांग को लेकर ‘सीधी कार्रवाई’ का आह्वान किया था। इस तरह इस घटना का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम से भी जाना जाता है। उस समय देश में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दो बड़ी पार्टियां थीं। मुस्लिम लीग, 1940 से ही ये मांग कर रही थी कि जहां ज्यादातर मुसलमान रहते हैं, उन इलाकों को अलग देश बना दिया जाए। 1946 में, ब्रिटिश प्रधानमंत्री, क्लिमेंट एटली ने भारत की सत्ता भारतीय नेताओं को सौंपने की योजना को अंतिम रूप देने के लिए तीन मंत्रियों का एक दल भारत भेजा था। इस दल ने मुस्लिम लीग की अलग देश की मांग को तो ठुकरा दिया, लेकिन उन्होंने भारत को चलाने के लिए एक तीन स्तरीय ढांचे का सुझाव दिया। ये ढांचा केंद्र सरकार, प्रांतों के समूह और अलग-अलग प्रांतों का था। इस योजना में ये भी बताया गया था कि इन “प्रांतों के समूहों” में मुस्लिम लीग की मुस्लिम-बहुल इलाकों को अलग देश बनाने की मांग को पूरा किया जा सकता है। शुरूआत में दोनों पार्टियों, मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने इस सुझाव को मान लिया था।

हालांकि, 10 जुलाई 1946 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि पार्टी को कैबिनेट मिशन की योजना को संशोधित करने का अधिकार है। इसके बाद चीजें बदल गईं। इस टिप्पणी पर मुस्लिम लीग के नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई। मुस्लिम लीग के नेताओं को डर था कि ब्रिटिश से सत्ता हस्तांतरण के बाद केंद्रीय सरकार में बहुसंख्यक हिंदुओं का वर्चस्व हो जाएगा। मुस्लिम लीग के राजनेताओं की तरफ से उकसाए जाने पर, जिन्ना ने कार्यवाहक सरकार को सत्ता हस्तांतरण के लिए ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की योजना को अस्वीकार कर दिया। इतना ही नहीं जिन्ना ने संविधान सभा का बहिष्कार करने का फैसला भी ले लिया।

अगस्त 1946 तक मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच संबंध इतने खराब हो चुके थे कि उन्हें सुधारा नहीं जा सकता था। 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने एक प्रस्ताव पारित कर 16 अगस्त को “सीधी कार्रवाई दिवस” घोषित किया। उन्होंने कांग्रेस के रुख के खिलाफ देशव्यापी विरोध की घोषणा की। साथ ही सभी कामकाज को स्थगित करने का आह्वान किया। तनाव स्पष्ट था और पूरा देश बेचैन था। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार पहले ही गहरी हो चुकी थी। ऐसे में जिन्ना के आह्वान पर 16 अगस्त को कलकत्ता की सड़कों पर हिंदुओं-मुस्लिमों के बीच दंगे भड़क उठे।

हुसैन सुहरावर्दी बंगाली मुसलमानों के सबसे बड़े नेता थे। उस वक्त बंगाल के मुख्यमंत्री भी थे। वह मुस्लिम लीग में जिन्ना के प्रतिद्वंदी भी माने जाते थे। मुसलमानों में उनकी बहुत इज्जत थी, लेकिन हिंदुओं में उनकी बहुत नफरत थी। हिंदू उन्हें 1943 के बंगाल के अकाल के लिए जिम्मेदार मानते थे, जिसमें करीब तीन लाख लोग मारे गए थे। उस वक्त वे खाद्य आपूर्ति मंत्री थे। सुहरावर्दी अपने गुस्से वाले बयानों के लिए भी बदनाम थे। कई इतिहासकारों का मानना है कि कोलकाता में 16 अगस्त को हिंसा शुरू होने के लिए सुहरावर्दी के काम और उनके विचार मुख्य रूप से जिम्मेदार थे। हिंसा शुरू होने से पहले सुहरावर्दी ने कई भाषण दिए थे, जिनसे ऐसा लगता था कि वे हिंसा का समर्थन कर रहे हैं, भले ही खुलकर नहीं।

मुस्लिम लीग के नेताओं ने रैली में भड़काऊ भाषण दिए। इससे भीड़ उन्मादित हो गई और बड़े पैमाने पर हिंसा और आगजनी हुई। रैली शुरू होने से पहले ही दुकानें बंद करवाने और पत्थरबाजी की घटनाओं के चलते तनाव बढ़ गया था। दंगों में महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। कलकत्ता में कई संस्थानों को आग लगा दी गई। दंगों का असर दूसरे इलाकों पर भी पड़ा और जल्द ही पूर्वी बंगाल के नोआखली में हिंदुओं के घरों में आग लगा दी गई। हालांकि सटीक आंकड़े नहीं हैं, लेकिन कई जानकारों का अनुमान है कि कोलकाता दंगों में मरने वालों की संख्या 5,000 से 10,000 के बीच थी। लगभग 15,000 लोग घायल हुए थे।

इतिहासकार मार्कोविट्स क्लाउड ने अपनी किताब ‘द कलकत्ता रायट्स ऑफ 1946, मास वायलेंस एंड रेसिस्टेंस’ (2007) में बताया कि हिंसा की क्रूरता वीभत्स थी। पीड़ितों को न केवल बेरहमी से मारा गया, बल्कि उन्हें बहुत ही क्रूर तरीके से शव को क्षत-विक्षत भी किया गया। 21 अगस्त को बंगाल में राज्यपाल शासन लगाने के बाद दंगे थमे। हालांकि, इन दंगों ने कलकत्ता के इतिहास पर गहरे घाव दे दिए।

आखिर बंगाल में क्यों बढ़ रही है इतनी हिंसा?

वर्तमान ही नहीं अपितु भूतकाल से भी वर्तमान में हिंसा बढ़ती आ रही है! कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक महिला जूनियर डॉक्टर के बलात्कार और हत्या के मामले में राज्य सचिवालय नबन्ना तक मार्च के दौरान इस सप्ताह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच भारी झड़पें हुईं। इससे पहले, इस जघन्य अपराध के विवरण सामने आने और पुलिस की निष्क्रियता के बाद, पूरे बंगाल और देश के अन्य हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर आए। मांग ‘रीक्लेम द नाइट’ की यानी रात में भी बेधड़क और सुरक्षित घूमने की आजादी। लेकिन प्रदर्शनों में कुछ संगठित हिंसा का सामना करना पड़ा और जिस अस्पताल में अपराध हुआ था, वहां लक्षित बर्बरता की घटनाओं ने विश्वसनीय सबूत इकट्ठा करने की हम अभी भी निश्चित रूप से नहीं जान सकते हैं कि युवती को आखिर क्या पता चल गया था जिसके कारण उसे क्रूर तरीके से चुप करा दिया गया। कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने ‘राज्य मशीनरी की विफलता’ की निंदा की। लेकिन भीड़ खुद राज्य मशीनरी का एक हिस्सा है। ध्यान दें कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने अपने कथित कार्यकर्ताओं की हिंसा से खुद को दूर रखा है, और प्रदर्शनकारियों की मांगों के साथ खड़े होने की कोशिश की।संभावना को नष्ट करने का प्रयास किया।

स्थानीय हिंसा पर नियंत्रण बंगाल की राजनीति की मुख्य विशेषता है, जो कम से कम 1946 के कुख्यात कलकत्ता हत्याकांड के बाद से स्पष्ट है, जब मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा हिंसा का आह्वान गुंडा-संचालित गिरोहों द्वारा हजारों लोगों की हत्या में बदल गया था। गुंडे राज्य में पार्टी की राजनीति की धुरी बने हुए हैं। यह वाम मोर्चे के लिए उतना ही सच है जितना कि तृणमूल के लिए। इससे पहले, बंगाल कांग्रेस ने तत्कालीन सीएम सिद्धार्थ शंकर रे के तहत धमकाने की प्रथाओं का खुलकर इस्तेमाल किया, जिन्होंने नक्सलियों के खिलाफ अनौपचारिक और राज्य प्रायोजित हिंसा का शासन चलाया। अब तक, बंगाल गुंडों के लिए एक प्राकृतिक आवास बन चुका है। गुंडा यानी एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास राजनीतिक संपर्क हैं और जो अनौपचारिक हिंसक बल में श्रमिकों को संगठित करने में सक्षम है। वाम मोर्चा सरकार की मार्क्सवादी भाषा में, गुंडों ने ‘लुम्पेनप्रोलिटेरिएट’ को संगठित किया और इसलिए उनकी नजर में, कांग्रेस की राह पर चलते हुए, पार्टी द्वारा उन्हें तैनात करना सही था। लुम्पेनप्रोलिटेरिएट कम्यूनिस्ट शब्दावली का हिस्सा है जिसका मतलब अपराधियों, आवारा और बेरोजगारों का समूह है जिनमें वंचित वर्ग के तौर पर अपने सामूहिक हितों के बारे में जागरूकता की कमी होती है। गुंडों ने अगली सरकार का मुख्य सपोर्ट बेस बनाया।

स्थानीय गुंडों को खुश किए बिना कोई स्थानीय सेवाओं तक नहीं पहुंच सकता, कोई छोटा व्यवसाय नहीं चला सकता, या रोजमर्रा की जिंदगी नहीं जी सकता। दलबदल करने वाला गुंडा राजनीतिक धाराओं में बदलाव की पहले से चेतावनी देता है। वाम मोर्चे के एक वफादार ‘भद्रलोक’ ने समझाया कि ‘जनता’ के बुर्जुआ डर के लिए गुंडों पर भरोसा किया जा सकता है कि वे चीजों को चेक कर सकें। अक्सर वास्तविक हिंसा से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है उसका खतरा। स्थानीय हिंसा की कहानियां, जो पार्टी के भीतर के झगड़ों का हिस्सा होती हैं, जिनमें बलात्कार या नरभक्षण भी शामिल हो सकता है, बहुत लंबी-चौड़ी बताई जाती हैं।

जल्द ही तृणमूल ने उन लोगों पर ही हमला कर दिया जिन्होंने इसे सत्ता में लाया था। केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का साथ देते हुए, इसने अपने हानिरहित नाम ऑपरेशन ग्रीन हंट के साथ नक्सलियों के खिलाफ राज्य स्तर पर हिंसा शुरू कर दी। और तृणमूल को सीपीएम के बुद्धिजीवियों की विरासत तो नहीं मिली लेकिन उसे लेफ्ट कैडर का एक बड़ा हिस्सा और राजनीतिक धमकी के तरीके विरासत में जरूर मिले। सीपीएम के बुद्धिजीवी तो बहुत पहले ही निराश हो चुके थे। पश्चिम बंगाल में कैडर खुद, जो अक्सर पक्ष बदलता रहता है, कम से कम संभावित रूप से पार्टी और पार्टी से बाहर की अवैध गतिविधियों और वफादारी के साथ एक क्रॉस-पार्टी घटना है।

तृणमूल ने कोई संयम नहीं रखा। पार्टी की वफादारी के इनाम के तौर पर कैडर के जबरन वसूली, हिंसा, बलात्कार और हत्या के इस्तेमाल की बहुत हद तक छूट दे दी गई है। भारत और दुनिया भर में कई लोकलुभावन राजनीतिक दलों के समान, तृणमूल द्वारा हिंसा का गैर-कानूनी उपयोग एक पार्टी कैडर द्वारा किया जाता है, जिसका पार्टी से संबंध यदि आवश्यक हो तो नकारा जा सकता है खासकर तब जब वे बहुत आगे बढ़ जाते हैं या पकड़े जाते हैं। नागरिक आबादी के खिलाफ हिंसा के संभावित इस्तेमाल के लाभ अक्सर हिंसा के वास्तविक उपयोग से अधिक होते हैं। और फिर भी यह परेशान करने वाला सवाल बना हुआ है: आखिर किस वजह से समाज महिलाओं के प्रति इतनी जल्दी शत्रुतापूर्ण हो गया, बलात्कार को रोजमर्रा की राजनीतिक हिंसा के रूप में इस्तेमाल करने के लिए इतना उत्सुक हो गया, रोजमर्रा की बातचीत में बलात्कार की धमकी इतनी आम क्यों हो गई? क्या यह एक दमित प्रवृत्ति थी जो कभी-कभी उभरती थी, और एक बार जब दमन हटा दिया जाता है तो इसे पूरी तरह से महसूस किया जा सकता है?

क्या वर्तमान में फेल हो चुका है मोदी द्वारा रखा गया शांति सम्मेलन ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वर्तमान में मोदी द्वारा रखा गया शांति सम्मेलन फेल हो गया है या नहीं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूक्रेन दौरे से शांति की उम्मीद जगी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा है कि दूसरा यूक्रेन शांति शिखर सम्मेलन होना ही चाहिए। अच्छा होगा अगर यह ग्लोबल साउथ के देशों में से किसी एक में हो। हम भारत में वैश्विक शांति शिखर सम्मेलन आयोजित कर सकते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस बारे में सऊदी अरब, कतर, तुर्किये और स्विटजरलैंड के साथ भी बातचीत चल रही है। दरअसल, पहला शांति शिखर सम्मेलन जून में स्विट्जरलैंड में आयोजित किया गया था, जिसमें 90 से अधिक देशों ने हिस्सा लिया था। हालांकि, तब यह शांति सम्मेलन पूरी तरह से विफल हो गया था। इसके फेल होने की एक बड़ी वजह जेलेंस्की की एक गलती भी थी। यह पहली बार है जब युद्ध में फंसे दो देशों में से एक ने शांति की पहल के लिए भारत पर भरोसा जताया है। आइए- समझते हैं कि आखिर क्या वजह है कि यूक्रेन ने शांति शिखर की मेजबानी के लिए भारत का नाम लिया है। यह भी समझेंगे कि पिछला शांति सम्मेलन क्यों फेल हो गया था? जेलेंस्की ने मीडिया से कहा है कि उन्होंने पीएम मोदी से भारत की मेजबानी में दूसरे यूक्रेन शिखर सम्मेलन आयोजित किए जाने के बारे में बात की है। जेलेंस्की ने भारत के साथ व्यापार बढ़ाने की इच्छा जताते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि भारत के साथ वस्तुओं का कारोबार तीन से पांच गुना बढ़े। यूक्रेनी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने शुक्रवार को मोदी के साथ बैठक के दौरान पिछले शांति शिखर सम्मेलन पर चर्चा की थी। वार्ता के दौरान पीएम मोदी ने जेलेंस्की से कहा कि मैं शांति का संदेश लेकर आया हूं। मोदी ने जेलेंस्की को पिछले महीने मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति के साथ हुई बैठक की बातें भी बताईं।

बता दे इसी साल 15-16 जून को स्विट्जरलैंड में बहुचर्चित यूक्रेन शांति शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसका मुख्य मकसद जेलेंस्की के शांति सूत्र के पीछे वैश्विक बहुमत को एकजुट करना था। इसमें यह मांग की गई थी कि यूक्रेन के पूरे क्षेत्र से रूस की वापसी और युद्ध अपराधों के लिए पुतिन की सरकार पर मुकदमा चलाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का गठन शामिल। हालांकि, यह शिखर सम्मेलन फेल हो गया, क्योंकि इसमें की गई मांगों पर आमराय नहीं बन पाई। वैसे भी ऐसे समझौते केवल युद्ध के मैदान पर जीत के बाद ही किए जा सकते हैं।

इस सम्मेलन में रूस को शामिल न करना भी बड़ी गलती थी। क्योंकि यूक्रेन के साथ जंग रूस ही कर रहा था। ऐसे में बिना रूस के ऐसा सम्मेलन जेलेंस्की के शांति सूत्र की एक तरह से मौत थी। शिखर सम्मेलन में शामिल 81 देशों को संभावित समझौते की रूपरेखा भी नहीं बताई गई थी। इसमें केवल तीन गौण मुद्दों को शामिल किया गया। यूक्रेन का अनाज निर्यात, परमाणु ऊर्जा स्टेशनों की सुरक्षा और युद्ध क्षेत्र से रूस की ओर से बनाए गए युद्ध बंदियों और यूक्रेनी बच्चों की रूस से वापसी।

2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था तब जेलेंस्की और उनकी सरकार के सदस्यों ने इस हमले को रूस की ओर से छेड़े गए औपनिवेशिक युद्ध के शिकार के रूप में पेश किया था, ताकि ग्लोबल साउथ की सहानुभूति हासिल की जा सके। मगर, उस वक्त दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और यहां तक कि भारत ने भी यूक्रेन के इस खोखले तर्क को नजरअंदाज कर दिया था। क्योंकि सबको यह याद था कि जून में सिंगापुर में आयोजित एक सुरक्षा सम्मेलन में जेलेंस्की ने खुद को सभ्य दुनिया का देश बताया था। इसी बात पर विकासशील देश भड़क गए थे, क्योंकि ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों ने खुद को सभ्य ही बताकर दुनिया के कई देशों को गुलाम बनाया था।

मीडिया से बातचीत में जेलेंस्की ने कहा, जब आप रणनीतिक साझेदारी या कुछ बातचीत शुरू करते हैं, तो आपको समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। इसलिए मुझे लगता है कि फिर से मुलाकात करना अच्छा रहेगा और अगर हमारी बैठक भारत में होती है तो मुझे खुशी होगी। मुझे काफी जरूरत है कि भारत हमारे पक्ष में रहे। जेलेंस्की ने भारतीय पत्रकारों से बातचीत में कहा-मैंने आपके बड़े और महान देश के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है। यह बहुत दिलचस्प है। इसलिए जब आपकी सरकार, प्रधानमंत्री (मोदी) मुझसे मिलना चाहेंगे, तब भारत आने पर मुझे खुशी होगी। जेलेंस्की ने कहा, प्रधानमंत्री मोदी पुतिन के मुकाबले शांति के ज्यादा समर्थक हैं। समस्या यह है कि पुतिन (शांति) नहीं चाहते।

क्या हथियारों के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं भारत और अमेरिका ?

वर्तमान में भारत और अमेरिका साथ-साथ हथियारों के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं! देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस समय अमेरिका के दौरे पर हैं। इस दौरे के दौरान, दोनों देश कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी एक राय रखी है। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका एंटी सबमरीन उपकरणों की खरीद, लड़ाकू विमान इंजन और मानव रहित प्लेटफार्म जैसे महत्वपूर्ण प्रणालियों के सह-उत्पादन के साथ आगे बढ़ने पर सहमत हुए हैं। यात्रा के साथ ही, अमेरिकी विदेश मंत्री ने अनुमानित $52.8 मिलियन के लिए पनडुब्बी रोधी युद्ध सोनोबॉय और संबंधित उपकरणों की विदेशी सैन्य बिक्री को मंजूरी दी है। हाई एल्टीट्यूड एंटी-सबमरीन वारफेयर सोनोबॉय को भारतीय नौसेना के एमएच -60आर हेलीकॉप्टरों द्वारा अग्रिम युद्धपोतों पर तैनात किया जाएगा। रक्षा मंत्री सिंह ने रक्षा सचिव लॉयड जे. ऑस्टिन III के साथ अपनी बैठक में द्विपक्षीय रक्षा पहलों पर चर्चा की, जिसमें आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा बढ़ाने और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बढ़ाने के प्रयास शामिल हैं।शीर्ष अमेरिकी रक्षा कंपनियों के नेताओं के साथ बातचीत करते हुए, सिंह ने कहा कि भारत उभरती चुनौतियों का समाधान करने के लिए रक्षा डोमेन में क्षमता निर्माण और स्थायी प्रौद्योगिकी और औद्योगिक साझेदारी के लिए उनके देश के साथ मिलकर काम करना चाहता है। टेक्नोलॉजी के साझाकरण पर दृढ़ता से ध्यान केंद्रित करते हुए, दोनों पक्षों ने यूएस-इंडिया रोडमैप फॉर डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन के तहत जेट इंजन, मानव रहित प्लेटफार्म, युद्ध सामग्री और ग्राउंड मोबिलिटी सिस्टम सहित प्राथमिक सह-उत्पादन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की है।

पेंटागन ने शनिवार को कहा कि भारत और अमेरिका एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक का समर्थन करने के लिए दोनों देशों के बीच प्रमुख रक्षा साझेदारी को गहरा करने के चल रहे प्रयासों को तेज किया जाएगा। शुक्रवार को वाशिंगटन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन के बीच हुई चर्चा का मुख्य विषय महत्वपूर्ण इंडो-पैसिफिक, विकसित भूराजनीतिक स्थिति और प्रमुख क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दे थे। सिंह ने कहा कि हमने आपसी हित के प्रमुख सामरिक मामलों पर अपने दृष्टिकोण साझा किए हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड जे ऑस्टिन के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग, औद्योगिक सहयोग और सैन्य अंतर्क्रिया को मजबूत करने के उपायों पर प्रतिनिधिमंडल स्तर की बैठक के बाद, चीन द्वारा दक्षिण और पूर्वी चीन सागरों के साथ-साथ भारत के साथ सीमाओं पर आक्रामक विस्तारवादी व्यवहार प्रदर्शित करने की पृष्ठभूमि पर चर्चा हुई।

एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि सिंह और सुलिवन ने चल रही द्विपक्षीय रक्षा-औद्योगिक सहयोग परियोजनाओं और उन संभावित क्षेत्रों पर भी चर्चा की जहां दोनों देशों के उद्योग एक साथ काम कर सकते हैं। शीर्ष अमेरिकी रक्षा कंपनियों के नेताओं के साथ बातचीत करते हुए, सिंह ने कहा कि भारत उभरती चुनौतियों का समाधान करने के लिए रक्षा डोमेन में क्षमता निर्माण और स्थायी प्रौद्योगिकी और औद्योगिक साझेदारी के लिए उनके देश के साथ मिलकर काम करना चाहता है।

भारतीय अधिकारी ने बताया कि रक्ष मंत्री राजनाथ सिंह ने जोर दिया कि भारत अमेरिकी निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग का स्वागत करता है, और कुशल मानव संसाधन आधार, मजबूत प्रो-एफडीआई और प्रो-व्यवसाय इकोसिस्टम और बड़े घरेलू बाजार के साथ तैयार है। बदले में, पेंटागन ने कहा कि सिंह-ऑस्टिन बैठक ने आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा बढ़ाने, हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बढ़ाने और अमेरिकी कमानों में भारतीय संपर्क अधिकारियों की तैनाती के माध्यम से परिचालन समन्वय को मजबूत करने के लिए नए समझौते का लाभ उठाने सहित कई द्विपक्षीय रक्षा पहलों में प्रगति का जश्न मनाया। बता दें कि हाई एल्टीट्यूड एंटी-सबमरीन वारफेयर सोनोबॉय को भारतीय नौसेना के एमएच -60आर हेलीकॉप्टरों द्वारा अग्रिम युद्धपोतों पर तैनात किया जाएगा। रक्षा मंत्री सिंह ने रक्षा सचिव लॉयड जे. ऑस्टिन III के साथ अपनी बैठक में द्विपक्षीय रक्षा पहलों पर चर्चा की, जिसमें आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा बढ़ाने और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बढ़ाने के प्रयास शामिल हैं। पेंटागन ने शनिवार को कहा कि भारत और अमेरिका एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक का समर्थन करने के लिए दोनों देशों के बीच प्रमुख रक्षा साझेदारी को गहरा करने के चल रहे प्रयासों को तेज किया जाएगा।इसमें कहा गया कि वे भारत-अमेरिका रक्षा-औद्योगिक सहयोग के लिए रोडमैप के तहत प्राथमिक सह-उत्पादन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए।एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि सिंह और सुलिवन ने चल रही द्विपक्षीय रक्षा-औद्योगिक सहयोग परियोजनाओं और उन संभावित क्षेत्रों पर भी चर्चा की जहां दोनों देशों के उद्योग एक साथ काम कर सकते हैं। उन्होंने समुद्री और अंतरिक्ष डोमेन में सहयोग का विस्तार करने के लिए भी चर्चा आगे बढ़ाई है।

क्या हिंद महासागर में आमने-सामने हो रहे हैं भारत चीन?

वर्तमान में भारत चीन हिंद महासागर में आमने-सामने हो रहे हैं! हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव के लिए भारत और चीन के बीच ‘बड़ा खेला’ जारी है। दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच एलएसी पर भी विवाद बरकरार है। सोमवार सुबह कोलंबो में एक अग्रिम भारतीय युद्धपोत, गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक आईएनएस मुंबई की डॉकिंग हुई। इस समय चीन के तीन युद्धपोतों भी कोलंबों पहुंचे। इसके बाद से पड़ोसी देश में हलचल तेज हो गई है। “चीनी युद्धपोतों में कुछ उनके समुद्री डकैती रोधी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा हैं। एक भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के अधिकारी ने कहा कि अब हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी युद्धपोत पहले की तुलना में बहुत अधिक समय तक रह रहे हैं। राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे अभी भी नेशनल पीपुल्स पावर के अनुरा कुमारा दिसानायके से बेहतर दावेदार हैं। दिसानायके को चीन समर्थक माना जाता है। 360 से अधिक युद्धपोतों और पनडुब्बियों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना के साथ, चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपने “पानी के नीचे के डोमेन जागरूकता” को लगातार मजबूत कर रहा है।साथ ही आठ युआन-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां भी पाइपलाइन में हैं। “2028-29 तक, पाकिस्तान के पास भारत के पश्चिमी नौसैनिक कमान के बराबर की ताकत होगी।अधिकारी ने बताया कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, साथ ही क्षेत्र में अतिरिक्त लॉजिस्टिक बदलाव सुविधाओं की मांग, भारत के लिए एक प्रमुख चुनौती बन गई है। उन्होंने कहा कि ये निश्चित रूप से, 140 युद्धपोतों वाली भारतीय नौसेना को पाकिस्तान पर ‘नजर रखने’ और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन को ‘रोकने’ के लिए निश्चित रूप से पर्याप्त फोर्स की आवश्यकता है। भारतीय नौसेना ने तीन चीनी युद्धपोतों, विध्वंसक हेफेई और लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक वुझिशान और कियानशान के हिंद महासागर क्षेत्र में प्रवेश करने से लेकर कोलंबों में डॉकिंग के समय से ही उन पर करीब से नजर रखी। इन युद्धपोतों पर लगभग 1,500 कर्मियों का संयुक्त दल तैनात है।

श्रीलंका ने आईएनएस मुंबई का स्वागत किया। इस युद्धपोत की कमान कैप्टन संदीप कुमार के पास है। कैप्टन कुमार के साथ 410 नाविकों का दल है। वहीं, चीनी युद्धपोतों का भी “नौसैनिक परंपराओं का पालन करते हुए” स्वागत किया। आईएनएस मुंबई और चीनी युद्धपोतों के लिए श्रीलंकाई युद्धपोतों के साथ अपने प्रस्थान पर ‘पैसेज एक्सरसाइज’ अलग-अलग आयोजित करने का कार्यक्रम है। मालदीव में पहले ही बीजिंग से हार चुके भारत ने मोहम्मद मुइज्जु सरकार के साथ एक रक्षा सहयोग समझौता पर हस्ताक्षर करने और भारत को अपने सैन्य कर्मियों को एक डोर्नियर विमान और दो उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर संचालित करने के लिए वापस लेने के लिए मजबूर हो चुका है।

अब कोलंबो में चीनी युद्धपोतों के डॉकिंग से निश्चित रूप से भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है। भारत ने अतीत में श्रीलंका के साथ अपना जोरदार विरोध दर्ज कराया था। उस समय श्रीलंका ने चीनी युद्धपोतों, जासूसी जहाजों और पनडुब्बियों को श्रीलंकाई बंदरगाहों पर लंगर डालने करने की अनुमति दी थी।

इस रणनीतिक खींचतान के बीच, अब सबकी निगाहें 21 सितंबर को होने वाले श्रीलंकाई राष्ट्रपति चुनावों पर टिकी हैं। भारत के लिए, राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे अभी भी नेशनल पीपुल्स पावर के अनुरा कुमारा दिसानायके से बेहतर दावेदार हैं। दिसानायके को चीन समर्थक माना जाता है। 360 से अधिक युद्धपोतों और पनडुब्बियों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना के साथ, चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपने “पानी के नीचे के डोमेन जागरूकता” को लगातार मजबूत कर रहा है। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले ही खबर दी थी कि चीन इस क्षेत्र में सर्वेक्षण और रिसर्च ‘जासूस’ जहाजों की अपनी लगभग स्थायी तैनाती के माध्यम से नेविगेशन और पनडुब्बी संचालन के लिए उपयोगी समुद्र विज्ञान और अन्य डेटा को मैप करने के लिए प्रयोग कर रहा है।

एक अधिकारी ने कहा कि समुद्री क्षेत्र में तेजी से बढ़ती चीन-पाकिस्तान की मिलीभगत भी एक प्रमुख चिंता का विषय है। भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के अधिकारी ने कहा कि अब हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी युद्धपोत पहले की तुलना में बहुत अधिक समय तक रह रहे हैं। अधिकारी ने बताया कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, साथ ही क्षेत्र में अतिरिक्त लॉजिस्टिक बदलाव सुविधाओं की मांग, भारत के लिए एक प्रमुख चुनौती बन गई है।चीन पाकिस्तान को एक मजबूत नौसेना बनाने में मदद कर रहा है, पहले ही चार टाइप 054A/P मल्टी रोल फ्रिगेट्स उपलब्ध करा चुका है। साथ ही आठ युआन-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां भी पाइपलाइन में हैं। “2028-29 तक, पाकिस्तान के पास भारत के पश्चिमी नौसैनिक कमान के बराबर की ताकत होगी।

क्या पीएम मोदी जाएंगे पाकिस्तान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी पाकिस्तान जाएंगे या नहीं! पाकिस्तान ने पीएम नरेंद्र मोदी को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के अन्य नेताओं के साथ व्यक्तिगत बैठक के लिए आमंत्रित किया है। एससीओ की मीटिंग इस साल अक्टूबर में आयोजित की जाएगी। भारत की तरफ से इस न्योता को हां नहीं कहा गया है। ऐसा मुमकिन भी है कि पीएम मोदी इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं करेंगे,लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह इस कार्यक्रम में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी मंत्री को नियुक्त करते हैं या नहीं। इससे पहले उन्होंने पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए ऐसा ही किया था। पाकिस्तान 15-16 अक्टूबर को बैठक की मेजबानी करेगा, क्योंकि वह सीएचजी की रोटेटिंग चेयरमैनशिप की अध्यक्षता करता है। यह राष्ट्राध्यक्षों की परिषद के बाद यूरेशियन समूह में दूसरा सबसे बड़ा निर्णय लेने वाला निकाय है। मोदी राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में नियमित रूप से शामिल होते रहे हैं, हालांकि उन्होंने इस साल कजाकिस्तान में ऐसा नहीं किया, क्योंकि जुलाई की शुरुआत में संसद सत्र और एससीओ की तारीखों के साथ टकराव हो गया था।

सीएचजी में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी मंत्री को नामित करने की प्रथा रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले साल बिश्केक में सीएचजी बैठक में भाग लिया था। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अगर नेता शारीरिक रूप से भाग लेने में असमर्थ हैं, तो उन्हें पाकिस्तान में वर्चुअली कार्यक्रम को संबोधित करने की अनुमति दी जाएगी या नहीं। भारत और पाकिस्तान दोनों रूस और चीन के नेतृत्व वाले समूह के पूर्ण सदस्य हैं, जिसे नई दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा और मध्य एशियाई देशों के साथ सहयोग के लिए महत्वपूर्ण मानता है।हालांकि, यह एससीओ में चीनी प्रभुत्व और समूह को पश्चिम विरोधी मंच के रूप में स्थापित करने के प्रयासों से सावधान है। अन्य सभी सदस्य-देशों के विपरीत, भारत ने एससीओ के संयुक्त वक्तव्यों में चीन के बीआरआई का कभी समर्थन नहीं किया है और पिछले साल, मोदी द्वारा वर्चुअली आयोजित राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में, इसने उस दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति में शामिल होने से इनकार कर दिया था जिसकी घोषणा ब्लॉक ने की थी क्योंकि ऐसा लगता था कि यह चीनी हितों को पूरा करने के लिए डिजाइन की गई थी।

 हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि एससीओ शायद एकमात्र बहुपक्षीय मंच है जहां भारत और पाकिस्तान एक साथ काम करने में कामयाब रहे हैं। वो भी तब जब 2015 में वार्ता प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के उनके असफल प्रयास और उसके बाद हुए आतंकवादी हमलों के बाद से संबंधों में शत्रुता आ गई थी। जबकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल एससीओ अभ्यासों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं और पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी पिछले साल एससीओ विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत आए थे। यह सहयोग एससीओ चार्टर द्वारा संभव हुआ है जो सदस्य-राज्यों को द्विपक्षीय मुद्दों को उठाने की अनुमति नहीं देता है।

भारत सरकार ने सीएचजी बैठक के लिए एससीओ प्रोटोकॉल के अनुसार दिए गए निमंत्रण पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। जम्मू में हुए हालिया आतंकी हमले पाकिस्तान में किसी भी उच्च-स्तरीय मंत्री-स्तरीय यात्रा के खिलाफ निवारक के रूप में कार्य करेंगे। पिछले महीने अपने कारगिल विजय दिवस संदेश में, मोदी ने पाकिस्तान का नाम लेते हुए कहा था कि उसने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा है और आतंकवाद और छद्म युद्ध के माध्यम से प्रासंगिक बने रहने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान का दौरा करने वाली आखिरी भारतीय विदेश मंत्री 2015 में सुषमा स्वराज थीं। मोदी के अपने समकक्ष शहबाज शरीफ के भाई नवाज शरीफ के साथ तालमेल के बावजूद, भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुधार की संभावना कम ही है। बता दें कि राष्ट्राध्यक्षों की परिषद के बाद यूरेशियन समूह में दूसरा सबसे बड़ा निर्णय लेने वाला निकाय है। मोदी राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में नियमित रूप से शामिल होते रहे हैं, हालांकि उन्होंने इस साल कजाकिस्तान में ऐसा नहीं किया, क्योंकि जुलाई की शुरुआत में संसद सत्र और एससीओ की तारीखों के साथ टकराव हो गया था। जबकि पाकिस्तान चाहता है कि भारत जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने के अपने फैसले को पलट दे, वहीं भारत का कहना है कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ चर्चा करने के लिए पाक अधिकृत कश्मीर पर उसके अवैध कब्जे के अलावा और कोई मुद्दा नहीं बचा है।

क्या आने वाले समय में भारत को न्योता देगा पाकिस्तान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाकिस्तान आने वाले समय में भारत को न्योता देगा या नहीं! पाकिस्तान इस्लामाबाद में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत को आमंत्रित करेगा। इस साल पाकिस्तान अक्टूबर में शंघाई सहयोग संगठन की मेजबानी करने जा रहा है। वह इस समय सम्मेलन की तैयारियों में जुटा हुआ है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक निजी चैनल पर यह बयान उन अटकलों के बीच दिया, जिसमें यह कहा गया था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी SCO बैठक में शामिल नहीं होंगे। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ से जब पूछा गया कि क्या पाकिस्तान SCO शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री को आमंत्रित करेगा। इस पर आसिफ ने कहा, हां, निश्चित रूप से इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। आसिफ ने यह भी कहा कि भारत ने जुलाई, 2023 में क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन की मेजबानी करते समय तत्कालीन विदेशमंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी को आमंत्रित किया था। आइए-समझते हैं कि क्या मोदी पाकिस्तान जा सकते हैं? शंघाई सहयोग संगठन (SCO) एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा संगठन है। वैसे तो इसकी स्थापना साल 2001 में चीन और रूस ने की थी, जो अब दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन बन चुका है। भारत और पाकिस्तान 9 जून 2017 को अस्ताना में ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में आधिकारिक तौर पर पूर्ण सदस्य के रूप में एससीओ में शामिल हो गए।

SCO में यूरेशिया के लगभग 80% क्षेत्र और इसके दायरे में दुनिया की 40% आबादी है। SCO के 9 सदस्य देश हैं- चीन, भारत, पाकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान। ईरान वर्ष 2023 में इसका सदस्य बना। अफगानिस्तान, बेलारूस और मंगोलिया पर्यवेक्षक का दर्जा रखते हैं। संगठन के वर्तमान और आरंभिक संवाद भागीदारों में अजरबैजान, आर्मेनिया, मिस्र, कतर, तुर्किए, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका शामिल हैं।

SCO का मकसद सदस्य देशों के बीच विश्वास और पड़ोसी व्यवहार बढ़ाना है। तकनीकी, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तरों पर सहयोग बढ़ाना है। परिवहन, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, ऊर्जा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देना है। यूरेशियाई क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और शांति के स्तर को बढ़ाया जाएगा। एक लोकतांत्रिक और नियम आधारित वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक वातावरण के निर्माण को बढ़ावा देना इसका अन्य अहम मकसद है। एससीओ का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों बीच शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखना है।

पूरी दुनिया की जीडीपी में एससीओ देशों की 20 फीसदी हिस्सेदारी है। दुनिया भर के तेल रिजर्व का 20 फीसदी हिस्सा इन्हीं देशों में है। एससीओ का कहना है कि इसका एक अहम मकसद ‘तीन बुराइयों’ यानी आतंकवाद, अलगाववाद और अतिवाद से लड़ना है। ब्रिटेन स्थित विदेश मामलों के थिंक टैंक चैथम हाउस के एनेट बोर के अनुसार, संगठन का जो मकसद है, उसे पूरा करने में चीन ही आड़े आ रहा है, क्योंकि उसके उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र शिनजियांग में अलगाववाद की आवाजें उठ रही हैं। चीन के इस इलाके में उइघुर मुस्लिम राष्ट्रवादी, स्वतंत्र शिनजियांग या पूर्वी तुर्किस्तान की संयुक्त राष्ट्र में मांग कर चुके हैं। चीन इसके लिए उठ खड़े हुए उग्रवादियों को दबाना चाहता है। ये मुस्लिम और नस्ली तौर पर तुर्की मूल के लोग हैं।

रूस भी इस्लामिक स्टेट-खोरासन और हिज्ब उत-तहरीर जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों को रोकने में दिलचस्पी रखता है। रूस चाहता है कि ये संगठन उसकी जमीन पर हमला न करें। एससीओ ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए ‘क्षेत्रीय आतंक विरोधी ढांचा’ तैयार किया है। इसके तहत आतंक विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान होता है। चीन एससीओ को मध्य एशिया में अपने व्यापारिक संपर्क को बढ़ावा देने के जरिये के तौर पर भी देखता है। चीन, कजाखस्तान जैसे देशों से ज्यादा से ज्यादा तेल और गैस खरीदना चाहता है। उसने यहां से तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई हासिल करने में सफलता हासिल की है। चीन पाकिस्तान से होकर जाने वाले अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के जरिये पश्चिमी देशों के साथ जो संपर्क कायम करना चाहता है, वे इन मध्य एशियाई देशों से ही होकर गुजरेंगे। चीन अपने निर्यात के लिए रूसी रेलवे पर निर्भर रहा है। ऐसे में वो पूरे मध्य एशिया में ऐसा रेल नेटवर्क बनाना चाहता है जो ईरान में समुद्र तक इसके सामान को पहुंचाने में मदद करे।

राजीव रंजन गिरि के अनुसार, भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध उतार चढ़ाव भरे रहे हैं। फरवरी 2019 में पुलवामा में हमले के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में आई तल्खी भारत के जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त करने के बाद और बढ़ गई है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों से कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है जबकि भारत इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के बजाए दो देशों के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा मानता है। अगर मोदी पाकिस्तान जाते हैं तो बातचीत के मौके जरूर खुलेंगे।

क्या भूमि घोटाले मामले में सीएम सिद्धारमैया को मिल चुकी है राहत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भूमि घोटाले मामले में कम सिद्धारमैया को राहत मिल चुकी है या नहीं! कर्नाटक के कथित MUDA भूमि घोटाले में कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया को हाईकोर्ट से राहत मिली है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोट को निर्देश दिया है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ इस मामले में तक कोई कार्रवाई नहीं करे, जब तक कि इस मामले में ऊपरी अदालत में दलीलें पूरी न हो जाएं। कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत ने कथित MUDA भूमि घोटाला मामले में कांग्रेस नेता के खिलाफ अभियोजन को मंजूरी दी थी। इसके बाद कर्नाटक की राजनीति गरमा गई थी। बीजेपी ने कर्नाटक सीएम से इस्तीफा देने की मांग की थी। तो वहीं इस मुद्दे पर सीएम सिद्धारमैया ने हाईकोर्ट का रुख किया था। सिद्धारमैया ने कहा था कि वह 40 साल सार्वजनिक जीवन में हैं। उन्होंने कभी कोई गलत काम नहीं किया है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए। हाईकोर्ट ने इस मामले मुश्किलों में घिरे मुख्यमंत्री को अंतरिम राहत दी है। हाईकोर्ट का यह निर्देश 29 अगस्त पर प्रभावी रहेगा। इसी दिन फिर कोई में सुनवाई होगी। सिद्धारमैया ने राज्यपाल द्वारा मुकदमा चलाने की मंजूरी देने के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने इस आधार पर अंतरिम राहत मांगी थी कि राज्यपाल की कार्रवाई अवैध और कानून के अधिकार के बिना थी। सिद्धारमैया ने कहा था कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने से उनकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति होने का गंभीर और आसन्न खतरा पैदा हो सकता है। सीएम ने कहा था कि इसके साथ ही शासन में बाधा उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने राज्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने की आशंका भी व्यक्त की थी।

सीएम की तरफ वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मामले को कोर्ट के सामने रखा। सिंघवी ने न्यायालय से कोई जल्दबाजी में कार्रवाई न करने का निर्देश देने का आग्रह किया था और दावा किया था कि राज्यपाल द्वारा दी गई स्वीकृति कर्नाटक की विधिवत निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने के लिए एक ठोस प्रयास का हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि मामले की सुनवाई इस अदालत द्वारा की जा रही है और दलीलें पूरी की जानी हैं। इसलिए अगली सुनवाई की तारीख तक संबंधित न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) को अपनी कार्यवाही स्थगित कर देनी चाहिए। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता (अर्थात मुख्यमंत्री सिद्धारमैया) द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में कई आदेश बिंदुओं का उल्लेख किया गया है। ताकि प्रथम दृष्टया यह प्रदर्शित हो कि (अभियोजन की स्वीकृति देने वाला) आदेश राज्यपाल द्वारा विवेक का प्रयोग न करने वाला है। राज्यपाल ने 26 जुलाई को मुकदमा चलाने की स्वीकृति दी थी।

हाईकोर्ट का फैसला आने से कुछ घंटे पहले मुख्यमंत्री ने कहा था कि उन्होंने चार दशकों के राजनीतिक करियर में कोई भी अवैध काम नहीं किया है, और विश्वास जताया कि न्यायपालिका उनकी मदद करेगी। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने घोषणा की कि वे अपने करियर के दौरान मुख्यमंत्री और मंत्री रहे हैं और उन्होंने कहा कि कभी भी निजी लाभ के लिए सत्ता का दुरुपयोग नहीं किया। उन्होंने भाजपा के विरोध को भी खारिज करते हुए कहा कि राजनीति में यह स्वाभाविक है कि पार्टियां विरोध करेंगी। इसलिए उन्हें विरोध करने दें, मैं बेदाग हूँ। यही नहीं बीजेपी सरकार ने भी इसमें दिलचस्पी नहीं ली। इस बीच बिहार में भी आर्थिक-सामाजिक सर्वे हुआ, जिससे जुड़ी जानकारी के बाद पता चला कि राज्य में ओबीसी की आबादी 60 फीसदी से अधिक है। इसके बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति के सियासी रथ पर सवार हुए और हर चुनाव में जातीय जनगणना वकालत की।

कर्नाटक में दोबारा सरकार बनाने के बाद 9 अक्तूबर को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। इस बैठक में जाति जनगणना के निष्कर्ष जारी करने का फैसला किया गया था। फिलहाल इस मीटिंग के भी 10 महीने बीत चुके हैं, मगर सिद्धारमैया सरकार रिपोर्ट पर कुंडली मारकर बैठी है। कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने कहा कि अब कर्नाटक में जातीय जनगणना का मुद्दा पार्टी के लिए बाघ की सवारी जैसा हो गया है। पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट लीक हो चुकी है। राज्य के अधिकतर मंत्रियों को पता है कि सर्वे में कई खामियां थीं। 6 करोड़ की आबादी वाले कर्नाटक के करीब 32 लाख लोगों को सर्वे में शामिल नहीं किया गया। सर्वे से छनकर आई सूचनाओं के आधार पर दावा किया गया कि कर्नाटक में ओबीसी से अधिक दलित आबादी है। दूसरी बड़ी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। राजनीति और सामजिक तौर पर ताकतवर माने जाने वाली वोक्कालिगा और लिंगायत की कुल आबादी 1.25 करोड़ है।

 

क्या कर्नाटक नहीं दे रहा है राहुल गांधी का साथ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कर्नाटक राहुल गांधी का साथ नहीं दे रहा है! कांग्रेस के नेता राहुल गांधी पिछले एक साल से जातीय जनगणना के समर्थन में बयान दे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने प्रयागराज के संविधान सम्मान सम्मेलन में कहा कि जातीय जनगणना उनके जीवन का मिशन है और वह इसके लिए राजनीतिक कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि जाति वाला दांव से पार्टी एक बार फिर ओबीसी वोटरों का समर्थन हासिल कर लेगी, जिसे वह मंडल आंदोलन के बाद खो चुकी है। कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार के दूसरे कार्यकाल के 15 महीने बीत चुके हैं, मगर 10 साल पहले कराए गए जातीय सर्वे की रिपोर्ट को अभी भी सार्वजनिक नहीं किया है। कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि अगर सरकार कर्नाटक में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करती है तो राहुल गांधी के अभियान को तगड़ा झटका लग सकता है। यह भी माना जा रहा है कि आरोपों के घिरे सिद्धारमैया इसे सियासी तीर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार दो मुद्दों पर घिर गई है। पहले तो खुद सिद्धारमैया पत्नी के नाम आवंटित जमीन को लेकर सवालों से घिरे हैं। राज्यपाल ने इस मामले में केस चलाने की मंजूरी दे दी है। दूसरा मोर्चा 2013-14 में कराए गए जातीय जनगणना की रिपोर्ट का है। कांग्रेस नेता और डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार रिपोर्ट के आंकड़े को खारिज कर चुके हैं। कर्नाटक कांग्रेस में भी इसे लेकर आम सहमति नहीं है। मुद्दा गरम हुआ तो सरकार को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।एक दशक पहले कांग्रेस ने ‘सामाजिक एवं आर्थिक’ सर्वे के नाम पर कर्नाटक में जाति की गिनती कराई थी। पिछड़ी जाति आयोग ने सर्वे के बाद रिपोर्ट सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में ही सौंप दी, मगर कांग्रेस सरकार ने इसे सार्वजनिक नहीं किया। इसके बाद बीजेपी सरकार ने भी इसमें दिलचस्पी नहीं ली। इस बीच बिहार में भी आर्थिक-सामाजिक सर्वे हुआ, जिससे जुड़ी जानकारी के बाद पता चला कि राज्य में ओबीसी की आबादी 60 फीसदी से अधिक है। इसके बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति के सियासी रथ पर सवार हुए और हर चुनाव में जातीय जनगणना वकालत की। कर्नाटक में दोबारा सरकार बनाने के बाद 9 अक्तूबर को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। इस बैठक में जाति जनगणना के निष्कर्ष जारी करने का फैसला किया गया था। फिलहाल इस मीटिंग के भी 10 महीने बीत चुके हैं, मगर सिद्धारमैया सरकार रिपोर्ट पर कुंडली मारकर बैठी है।

कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने कहा कि अब कर्नाटक में जातीय जनगणना का मुद्दा पार्टी के लिए बाघ की सवारी जैसा हो गया है। पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट लीक हो चुकी है। राज्य के अधिकतर मंत्रियों को पता है कि सर्वे में कई खामियां थीं। 6 करोड़ की आबादी वाले कर्नाटक के करीब 32 लाख लोगों को सर्वे में शामिल नहीं किया गया। सर्वे से छनकर आई सूचनाओं के आधार पर दावा किया गया कि कर्नाटक में ओबीसी से अधिक दलित आबादी है। दूसरी बड़ी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। राजनीति और सामजिक तौर पर ताकतवर माने जाने वाली वोक्कालिगा और लिंगायत की कुल आबादी 1.25 करोड़ है। इसमें लिंगायत की आबादी वोक्कालिगा समुदाय से अधिक बताई गई। इसके अलावा ओबीसी कैटिगरी में कई जातियों को शामिल करने पर भी विवाद हुआ।

सूत्रों के अनुसार, ओबीसी आयोग की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को सरकार जारी करती है तो कर्नाटक में असंतोष भड़क सकता है। खुद कांग्रेस नेता और डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार रिपोर्ट के आंकड़े को खारिज कर चुके हैं। कर्नाटक कांग्रेस में भी इसे लेकर आम सहमति नहीं है। मुद्दा गरम हुआ तो सरकार को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। सिद्धारमैया पहले ही जमीन घोटाले के आरोपों से जूझ रहे हैं।

डी. के. शिवकुमार लगातार सीएम पद की दावेदारी कर रहे हैं।बता दें कि कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि अगर सरकार कर्नाटक में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करती है तो राहुल गांधी के अभियान को तगड़ा झटका लग सकता है। यह भी माना जा रहा है कि आरोपों के घिरे सिद्धारमैया इसे सियासी तीर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने कहा कि अब कर्नाटक में जातीय जनगणना का मुद्दा पार्टी के लिए बाघ की सवारी जैसा हो गया है। पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट लीक हो चुकी है।माना जा रहा है कि सिद्धारमैया जातिगत जनगणना की रिपोर्ट का राजनीतिक इस्तेमाल कर सकते हैं। वह मौके के इंतजार में हैं।

क्या जातिगत जनगणना पर यू टर्न ले सकते हैं पीएम मोदी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जातिगत जनगणना पर पीएम मोदी यू टर्न ले सकते हैं या नहीं! मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में एक के बाद एक फैसलों पर यू-टर्न लेती दिख रही है। लेटरल एंट्री, न्यू पेंशन स्कीम, ब्रॉडकास्टिंग बिल के ड्राफ्ट से लेकर वक्फ संशोधन एक्ट और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन जैसे मुद्दे शामिल हैं। खास बात है कि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सरकार के यू-टर्न पर खूब खुश नजर आ रही है। इतना ही नहीं वह यह संदेश देने की भी कोशिश कर रही है कि किस तरह से नरेंद्र मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में में विपक्ष और अपने सहयोगी दलों के दबाव में अपने फैसलों पर पीछे हटने को मजबूर हो रही है। हालांकि, सरकार की तरफ से यू-टर्न के पीछे अपने तर्क दिए जा रहे हैं। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकार की तरफ से यह कदम जनता की प्रतिक्रिया के प्रति जागरूक होने के का प्रतीक है। साथ ही सरकार कांग्रेस की रणनीति को ध्वस्त करती जा रही है। बीजेपी में कई लोगों का मानना है कि यह लोकसभा चुनावों में जीत के बाद पॉलिटिकल नैरेटिव को फिर से अपने पक्ष में करने का हिस्सा है। इसके अलावा पीएम मोदी की तरफ से दिखाई गई राजनीतिक व्यावहारिकता का एक उदाहरण है।

रिपोर्ट के अनुसार अब सत्ता के गलियारों में दो बड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ये मुद्दे अग्निपथ योजना और जातिगत जनगणना है। विपक्ष इन मुद्दों को लेकर मोदी सरकार पर लगातार हमला कर रहा है। इसके अलावा एनडीए के सहयोगी दल भी इन मुद्दों पर मुखर हो रहे हैं। चिराग पासवान तो जातिगत जनगणना के पक्ष में खुल कर बोल रहे हैं। वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी कई मौकों पर यह कह चुके हैं सरकार ‘अग्निपथ’ योजना में और सुधार के लिए बदलाव के लिए तैयार है। सशस्त्र बलों में प्रवेश के लिए दो साल पहले शुरू की गई इस योजना को लोकसभा चुनावों में भाजपा की चुनावी हार के प्रमुख कारणों में एक माना जा रहा है। कांग्रेस ने सत्ता में आने पर अग्निपथ योजना को खत्म करने का वादा भी किया था।

इसी तरह, जाति जनगणना एक ऐसा मुद्दा है जिसके पक्ष में एनडीए के दोनों प्रमुख सहयोगी दल जेडीयू और एलजेपी सरकार से अलग अपना रुख व्यक्त कर चुके हैं। बिहार में जाति की राजनीति की प्रकृति को देखते हुए यह मुद्दा काफी अहम हैं। खास बात है कि राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं। दूसरी तरफ अब तक, प्रधानमंत्री ने ‘अग्निपथ’ योजना का जोरदार बचाव किया है। पिछले महीने कारगिल में भी मोदी ने इसका बचाव किया गया था। सरकार ने भी जाति जनगणना की सभी मांगों को दृढ़ता से खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि यह ‘विभाजनकारी कदम’ साबित होगा। हालांकि, पेंशन योजना समेत प्रमुख मुद्दों पर सरकार ने जिस तरह से दो कदम पीछे खींचे हैं। ऐसे में ऐसे में आने वाले दिनों में पीएम मोदी इस दोनों मुद्दों पर कोई बड़ी घोषणा करें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

इन दोनों मुद्दों के अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का ऐसा मुद्दा है जो सुलग रहा है। इस मुद्दे पर विचार करने के लिए समिति गठित हो चुकी हैं। विपक्ष किसानों के लिए MSP की गारंटी देने वाले कानून की मांग कर रहा है। हरियाणा, पंजाब के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान संगठनों की मोदी सरकार से नाराजगी जगजाहिर है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल और दूसरे कार्यकाल में दो बड़े फैसले वापस लिए गए थे। इनमें से एक भूमि अधिग्रहण अधिनियम और दूसरा तीन कृषि कानूनों में बदलाव था। ये बदलाव तब हुए जब केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी। मोदी सरकार के हाल के कदम खींचने को लेकर पार्टी के नेता कहते हैं कि सरकार के निर्णय के पीछे की वजह विपक्ष का दबाव नहीं बल्कि राजनीतिक व्यावहारिकता है।

केंद्रीय राजनीतिक विमर्श में जाति की राजनीति की वापसी भी सरकार के अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर बहिष्कार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करने या पहली बार लेटरल एंट्री स्कीम में आरक्षण को पेश करने के फैसलों को निर्धारित कर रही है। न्यूज 18 ने अपनी रिपोर्ट में बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से बताया है सरकार ऐसे मुद्दों पर लोगों को आंदोलन के लिए उकसाने की विपक्ष की साजिशों से भी वाकिफ है। ऐसे में वह देश की विकास कहानी को पटरी से नहीं उतारना चाहती है।