Monday, March 16, 2026
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आखिर पाकिस्तान की ऐसी हालत के पीछे क्या कारण है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि पाकिस्तान की ऐसी हालत के पीछे क्या कारण है! भारत और पाकिस्तान की आजादी को 78 साल हो गए हैं। पाकिस्तान बुधवार, 14 अगस्त को अपना 78वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। पाकिस्तान में कायदे आजम कहे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए अलग देश के लिए संघर्ष किया था। पाकिस्तान के बनने के बाद मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना ने नए देश के लिए देखे कई सपनों का जिक्र किया था। हालांकि करीब आठ दशक बाद आज पाकिस्तान आर्थिक मोर्चे पर विफल है तो विदेश नीति और घरेलू मामलों में भी वह फेल है। पाकिस्तान कैसे आगे बढ़ने की बजाय पिछड़ा और राजनेताओं का इसमें क्या रोल रहा है, इस पर देश बड़े अखबार डॉन ने अपना संपादकीय लिखा है। डॉन अपने संपादकीय में लिखता है कि पाकिस्तान ऐसे समय में स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, जब देश आर्थिक स्थिरता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और उग्रवाद से जूझ रहा है। ये संकट कोई नए नहीं हैं। आजादी के बाद से ही देश एक संकट से दूसरे संकट की ओर बढ़ता रहा है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में देश पर निराशा का पहाड़ छाया हुआ है। खासतौर से युवा एक सम्मानजनक जीवन जीने की उम्मीद खो रहे हैं।

लेख कहता है कि सत्तारूढ़ वर्ग की ओर से निराशा को दूर करने के लिए बहुत कम प्रयास हुए। यही वजह है कि 24 करोड़ लोगों को कोई उम्मीद नहीं दिख रहा है। सरकारों की ओर से कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था सुधार पर है लेकिन आबादी का बड़ा हिस्सा महंगाई की मार झेल रहा है और लोग गरीबी के मुंह में जा रहे हैं। राजनीतिक मोर्चे पर ऐसा लगता है कि कोई भी सौहार्द्र हासिल करने के लिए काम नहीं करना चाहता है। अतिवादी ताकतें लगातार जिन्ना के इस देश को निगल रही हैं।

पाकिस्तान बीते दशकों में लगातार जिन्ना के नजरिए ले दूर होता जा रहा है। अगर अल्लाह जिन्ना को आज के पाकिस्तान को देखने की अनुमति दे तो वह इस मुल्क को पहचान भी नहीं पाएंगे। देश को कैसे चलाया जाना चाहिए, इसके लिए जिन्ना ने एक खाका छोड़ा लेकिन उनके बाद जो भी सत्ता में आया, उसने इस बात के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी कि उनके किसी भी निर्देश को लागू नहीं किया जाए। उदाहरण के लिए जिन्ना ने लोकतंत्र, संवैधानिकता, अल्पसंख्यकों की रक्षा, भ्रष्टाचार को खत्म करने के बारे में बात की थी। हर एक सरकार ने इसके उलट ही काम किया है।

पाकिस्तान में बनी सरकारों ने वोट के सम्मान को पैरों तले कुचल दिया गया है। किसी ने ये समझा ही नही ‘सच्ची’ आजादी केवल तभी हासिल की जा सकती है जब पाकिस्तान के बच्चों को बेहतर कल का आश्वासन दिया जाए। देश के लोग दमघोंटू अस्तित्व से मुक्त हों और अपनी पूरी क्षमता हासिल कर सकें। इसी बीच पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के बारे में इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक तबदलैब ने कहा है कि देश की माली हालत नाजुक दौर में है। थिंक टैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की ऋण प्रोफाइल बेहद चिंताजनक है। देश की उधार लेने और खर्च करने की आदतें अस्थिर होना इस चिंता को और बढ़ाता है। 68 पेज की ये रिपोर्ट रविवार को जारी की गई। इसमें कहा गया है कि देश का कुल ऋण और देनदारियां, घरेलू और विदेशी ऋण सहित 77.66 ट्रिलियन रुपए 271.2 बिलियन डॉलर हैं।

रिपोर्ट इस बात पर भी चिंता जाहिर करती है कि देश का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2011 के 1,295 डॉलर से घटकर 2023 में 1,223 डॉलर हो गया है। इसमें छह प्रतिशत की कमी आई है। इसका मतलब यह है कि देश का कर्ज उसकी आय की तुलना में बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। इससे और ज्यादा उधार लेने की जरूरत पड़ रही है। 2011 के बाद से पाकिस्तान का विदेशी ऋण करीब दोगुना हो गया है, जबकि घरेलू ऋण छह गुना बढ़ गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे देश की ऋण प्रोफाइल पर खतरे की घंटी बज गई है। देश की सरकारों के उधार लेने और खर्च करने की आदतों को भी रिपोर्ट में अस्थिर कहा गया है। देश व्यापक आर्थिक अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो गया है और बाहरी कार्यक्रमों पर बहुत अधिक निर्भर हो गया है, जिससे ऋण चक्र बढ़ गया है। रिपोर्ट में बढ़ते संकट को कम करने के जो तरीके बताए गए हैं। उनमें- कारोबारी माहौल को जोखिम से मुक्त करना, राजकोषीय अनुशासन और प्रभावी व्यय प्रबंधन को लागू करना, महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए पूंजी लाने के लिए विशेष फंड, साझेदारी के निर्माण के माध्यम से विदेशी मुद्रा प्रवाह में वृद्धि, प्रत्यक्ष कर जाल का विस्तार और निर्यात-उन्मुख औद्योगिक नीति की स्थापना शामिल है।

आखिर पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस पर क्या हुआ?

हाल ही में पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस पर कई लोगों ने काले झंडे लहराए हैं! पाकिस्तान में बुधवार को स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। देशभर में आजादी के जश्न के बीच खैबर पख्तूनख्वा प्रांत से कुछ ऐसी तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जो पाक की सत्ता में बैठे लोगों को परेशान कर सकते हैं। खैबर पख्तूनख्वा के वजीरिस्तान में स्थानीय बच्चों ने पाक झंडा लिए लोगों पर हमला किया और झंडा फाड़ने की कोशिश की। यहां बच्चों ने पाक के राष्ट्रीय झंडे को लिए लोगों को काले झंडे भी दिखाए। एक्स पर शेयर किए गए एक वीडियो में देखा जा सकता है कि एक कार में कुछ लोग पाकिस्तान का झंडा लहराते हुए निकल रहे हैं। इस दौरान कुछ बच्चे उनको घेर लेते हैं और झंडा छीनने की कोशिश करते हैं। एक शख्स गाड़ी से उतरता है तो उसके साथ धक्कामुक्की होती है। झंडे को छीनकर फाड़ने की भी कोशिश होती है। इस दौरान बच्चे इनको काले झंडे भी दिखाते हैं। इस वीडियो के वजीरिस्तान के होने का दावा किया जा रहा है। इसमें यह भी कहा गया है कि राजनीतिक हितों के लिए काम करने वाले कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों और उनके सहयोगियों की जांच जारी है।वीडियो शेयर करते हुए दावा किया गया है कि पश्तून स्वतंत्रता दिवस पर पाकिस्तान के झंडे को फाड़ रहे हैं क्योंकि वे पाकिस्तान सेना की ओर से लगातार हो रहे अत्याचारों से तंग आ चुके हैं।

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में केंद्र सरकार और सेना के लिए गुस्सा नया नहीं है। बीते कई दशकों से इन प्रान्तों के लोगों को लगता रहा है कि उनके संसाधनों को सरकार लूटकर पंजाब के विकास में लगाती है। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के ना सिर्फ लोग बल्कि मुख्यमंत्री भी कई बार आक्रामक रुख दिखा चुके हैं। पाक सेना के प्रस्तावित एंटी टेरर ऑपरेशन ने भी क्षेत्र में गुस्से को बढ़ाया है।

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में तो हालिया समय में बड़े पिरोध प्रदर्शन हुए हैं। ग्वादर में हजारों की तादाद में बलूच समुदाय बीते कुछ समय से लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहा है। बलूचों का कहना है कि पाकिस्तान में बलूचों की जनसंख्या करीब डेढ़ करोड़ है लेकिन उनको मुख्यधारा से दूर रखा जा रहा है। बलूचिस्तान के तेल, कोयला, सोना, तांबा और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों को लूटा जा रहा है और इससे स्थानीय लोगों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। यही नहीं आपको बता दें कि पाकिस्तानी में सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व चीफ फैज हमीद की गिरफ्तारी के बाद अब तीन और रिटायर्ड सैन्य अफसरों को हिरासत में लिया गया है। पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा आईएसपीआर ने जानकारी देते हुए बताया कि तीनों पूर्व सैन्य अधिकारियों को फैज हमीद से कनेक्शन के मामले में हिरासत में लिया गया है। आईएसपीआर ने कहा कि सेवानिवृत्त अधिकारियों को सैन्य अनुशासन के खिलाफ काम करने के लिए हिरासत में लिया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि राजनीतिक हितों के लिए काम करने वाले कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों और उनके सहयोगियों की जांच जारी है।

आईएसपीआर ने कहा, ‘लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) फैज हमीद की फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल कार्यवाही के संबंध में, तीन सेवानिवृत्त अधिकारी भी सैन्य अनुशासन के प्रतिकूल कार्यों के लिए सैन्य हिरासत में हैं।’ इसके पहले 12 अगस्त को आईएसआई के पूर्व प्रमुख जनरल फैज हमीद को सेना ने 12 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया था। उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू की गई है। फैज हमीद पर आईएसआई चीफ रहते हुए एक निजी हाउस सोसायटी के मालिक से कीमती सामान छीनने का आरोप है। इसके लिए आईएसआई और रेंजर्स का इस्तेमाल किया था।

टॉप सिटी केस में की गई शिकायत पर पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने फैज हमीद के खिलाफ जांच करने का आदेश दिया था। इसके बाद सेना ने हमीद के खिलाफ जांच शुरू की थी। आईएसपीआर ने कहा था कि पाकिस्तान सेना के अधिनियम के तहत लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) फैज हमीद के खिलाफ फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और उन्हें हिरासत में ले लिया गया है।एक शख्स गाड़ी से उतरता है तो उसके साथ धक्कामुक्की होती है। झंडे को छीनकर फाड़ने की भी कोशिश होती है। इस दौरान बच्चे इनको काले झंडे भी दिखाते हैं। इस वीडियो के वजीरिस्तान के होने का दावा किया जा रहा है। हाउसिग सोसायटी टॉप सिटी के सीईओ ने पूर्व आईएसआई महानिदेशक पर जमीन हड़पने और छापेमारी के दौरान कीमती समान चोरी करने का आरोप लगाया था।

क्या पाकिस्तान में मंकी पॉक्स के कारण भारत में भी खतरा है?

हाल ही में मंकी पॉक्स का एक वायरस पाकिस्तान में मिला, जिसके बाद भारत में भी खतरा बढ़ गया है! मंकीपॉक्स को लेकर WHO ने दुनिया भर में अलर्ट जारी किया है। इसी बीच पाकिस्तान में मंकीपॉक्स का पहला मामला देखा गया है। इससे एक दिन पहले अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों के माध्यम से बीमारियों के संभावित प्रसार को रोकने के लिए पाकिस्तान ने अलर्ट जारी किया था। गुरुवार को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (KP) के एक नागरिक में मंकीपॉक्स का इस साल का पहला मामला दर्ज किया गया है। हाल ही में यह शख्स सऊदी अरब से वापस लौटा है। पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि युवक दीर का है और वर्तमान में मर्दन में रह रहा है। उन्होंने बताया कि संक्रमित व्यक्ति के 3 अगस्त को सऊदी अरब से लौटने के बाद एमपॉक्स से पीड़ित होने का पता चला था। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने आगे कहा कि उन्होंने संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों के सैंपल लिए हैं। इसके बाद स्वास्थ्य सेवाओं ने सभी आने-जाने वाले रास्ते पर सख्त निगरानी का आदेश दिया है। मंकीपॉक्स के प्रसार को रोकने के लिए और कदम उठाते हुए पाकिस्तानी स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक सत्र आयोजित कर एमपॉक्स के संबंध में सलाह और दिशानिर्देश जारी किए।

भारत में अभी इस वायरस का कोई मामला नहीं आया है। हालांकि WHO के मुताबिक भारत में जनवरी 2022 और जून 2024 के बीच एमपॉक्स के 27 मामले सामने आए हैं। बड़ी संख्या में भारतीय खाड़ी देश में रहते हैं। ऐसे में पाकिस्तान में इसका मामला मिलना भारत के लिए भी चिंता बढ़ाने वाला है। पिछले साल पाकिस्तान एमपॉक्स के 9 मामलों की पुष्टि हुई थी। सभी मामले मिडिल ईस्ट और अन्य देशों से लौटने वाले यात्रियों में थे। एक मरीज जो एचआईवी और एमपॉक्स से संक्रमित था, बाद में इस्लामाबाद में मौत हो गई।

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में एमपॉक्स के मामले ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया है। इस साल की शुरुआत से अब तक 548 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं देश के सभी प्रांत इससे प्रभावित हैं। WHO ने बुधवार को एमपॉक्स के बढ़ते मामलों को लेकर वैश्विक सार्वजनिक स्वाथ्य आपातकाल घोषित कर दिया। एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल-रोजर कम्बा ने गुरुवार को कहा कि हमारे देश में इस साल की शुरुआत से 15,664 संभावित मामले और 548 मौतें दर्ज की गई हैं। बता दें कि जनवरी 2023 से शुरू हुए इस मौजूदा प्रकोप में कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में 27,000 से ज्यादा मामले सामने आए हैं और 1,100 से ज्यादा मौतें हुई हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चों की मौतें शामिल हैं। इनमें से आधे से ज्यादा मामले और काफी संख्या में मौतें (548) इस साल की शुरुआत से DRC में ही हुई हैं। मामलों और मौतों में बढ़ोतरी के साथ ही यह बीमारी बुरुंडी, केन्या, रवांडा और युगांडा तक फैल गई है। 

मंकीपॉक्स बीमारी संक्रमित लोगों के करीबी संपर्क से फैलती है। संक्रमित व्यक्ति के सामने चेहरे के पास बातचीत या सांस लेने के दौरान बूंदों के माध्यम से या त्वचा से त्वचा के संपर्क में आने से, जिसमें यौन संबंध और मुंह से मुंह या मुंह से त्वचा का संपर्क शामिल है, से संक्रमण हो सकता है।कि ऐसी दवाएं आमतौर पर दुर्लभ मामलों में ही दी जाती हैं। मंकीपॉक्स के लिए तीन वैक्सीन भी हैं – एमवीए-बीएन, एलसी16 और ऑर्थोपॉक्सवैक – जिन्हें पहले चेचक से लड़ने के लिए विकसित किया गया था। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि सिर्फ जोखिम वाले लोगों को ही, जैसे संक्रमित लोगों के करीबी संपर्क में आए लोगों को ही टीका लगवाना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण का आह्वान नहीं किया है।

यह बीमारी कुछ तरह के बंदरों और चूहों जैसे संक्रमित जानवरों के काटने या खरोंच से भी लोगों में फैल सकती है। ऐसे जानवरों की खाल उतारने या उनके मांस को अच्छी तरह न पकाकर खाने से भी बीमारी हो सकती है।चेचक के इलाज के लिए बनाई गई एक एंटीवायरल दवा, टेकोविरिमाट को साल 2022 में मंकीपॉक्स के इलाज के लिए यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी ने मंजूरी दी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि ऐसी दवाएं आमतौर पर दुर्लभ मामलों में ही दी जाती हैं। कमजोर या कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में गंभीर मंकीपॉक्स होने या मरने का खतरा अधिक होता है। जबकि कोरोना सांस लेने, बात करने, छींकने या खांसने से हवा में मौजूद छोटी-छोटी बूंदों के माध्यम से फैलता है और यह बहुत तेजी से फैलता है।

क्या वर्तमान में मंकीपॉक्स वायरस दुनिया को डरा रहा है?

वर्तमान में मंकीपॉक्स वायरस अब दुनिया को डरा रहा है! कोरोना महामारी की मार से दुनिया अभी उबरी ही थी कि एक और बीमारी दस्तक देने वाली है। यह बीमारी वैसे तो मुख्य रूप से अफ्रीका में होती है, लेकिन अब इसके मामल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी देखे जा रहे हैं। राहत की बात यह है कि एमपॉक्स कोरोना वायरस जितनी तेजी से नहीं फैलता है, लेकिन इसकी कुछ किस्में जानलेवा हो सकती हैं। भारत में बी इसे देखते हुए एहतियात बरतने को कहा गया है। यह वायरस पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान पहुंच चुका है। वायरस के बारे में खास बात और है कि 2 साल के भीतर इसने दूसरी बार पूरी दुनिया को डराया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे ग्लोबल इमरजेंसी घोषित कर दिया है। आइए इस मंकीपॉक्स के बारे में पूरी बात समझते हैं। मंकीपॉक्स स्वीडन और पाकिस्तान में तक पहुंच चुका है। स्वीडन ने कहा है कि अफ्रीका से लौटे एक व्यक्ति में एमपॉक्स पाया गया है। यह मामला विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के इस बीमारी के प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित करने और यूरोप में और अधिक मामलों की चेतावनी देने के एक दिन बाद सामने आया है। शुक्रवार को पाकिस्तान अफ्रीका के बाहर एमपॉक्स का मामला दर्ज करने वाला दूसरा देश बन गया। यह मरीज एक खाड़ी देश से लौटा था, पाकिस्तानी स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा कि जिस तरह के एमपॉक्स वायरस का संक्रमण हुआ है, यह पता लगाने के लिए जांच की जा रही है।

इस बार एमपॉक्स का जो नया मामला सामने आया है, उसमें एक नया प्रकार का वायरस है, जिसे ‘क्लेड आईबी’ कहते हैं। यह क्लेड आई का ही एक रूप है, जो अफ्रीका के कांगो में पाया जाता है। स्वीडन के अधिकारियों ने कहा है कि क्लेड आईबी मुख्य रूप से घर के सदस्यों के बीच फैल रहा है और बच्चों को ज्यादा प्रभावित कर रहा है। साल 2022 में जब दुनिया भर में एमपॉक्स की चेतावनी दी गई थी, तब फैला हुआ क्लेड IIB मुख्य रूप से यौन संपर्क से फैलता था। जुलाई 2022 में हुए एमपॉक्स के प्रकोप से लगभग 1 लाख लोग, जिनमें ज्यादातर समलैंगिक और उभयलिंगी पुरुष(Bisexual) थे, 116 देशों में प्रभावित हुए थे और करीब 200 लोगों की मौत हो गई थी। भारत में 27 मामले सामने आए थे और एक मौत हुई थी। क्लेड आईबी की बीमारी क्लेड IIB जैसी ही है, लेकिन यह तेजी से फैलती है और इससे ज्यादा लोग मर सकते हैं। पश्चिम अफ्रीका से आया क्लेड II वायरस से लगभग 1 प्रतिशत लोगों की मौत होती है, लेकिन खबरों के मुताबिक क्लेड आई से 10 प्रतिशत तक लोगों की मौत हो सकती है।

जनवरी 2023 से शुरू हुए इस मौजूदा प्रकोप में कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में 27,000 से ज्यादा मामले सामने आए हैं और 1,100 से ज्यादा मौतें हुई हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चों की मौतें शामिल हैं। इनमें से आधे से ज्यादा मामले (15,664) और काफी संख्या में मौतें (548) इस साल की शुरुआत से DRC में ही हुई हैं। मामलों और मौतों में बढ़ोतरी के साथ ही यह बीमारी बुरुंडी, केन्या, रवांडा और युगांडा तक फैल गई है।

मंकीपॉक्स बीमारी संक्रमित लोगों के करीबी संपर्क से फैलती है। संक्रमित व्यक्ति के सामने चेहरे के पास (बातचीत या सांस लेने के दौरान बूंदों के माध्यम से) या त्वचा से त्वचा के संपर्क में आने से, जिसमें यौन संबंध और मुंह से मुंह या मुंह से त्वचा का संपर्क शामिल है, से संक्रमण हो सकता है। यह बीमारी कुछ तरह के बंदरों और चूहों जैसे संक्रमित जानवरों के काटने या खरोंच से भी लोगों में फैल सकती है। ऐसे जानवरों की खाल उतारने या उनके मांस को अच्छी तरह न पकाकर खाने से भी बीमारी हो सकती है। कमजोर या कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में गंभीर मंकीपॉक्स होने या मरने का खतरा अधिक होता है। जबकि कोरोना सांस लेने, बात करने, छींकने या खांसने से हवा में मौजूद छोटी-छोटी बूंदों के माध्यम से फैलता है और यह बहुत तेजी से फैलता है।

चेचक के इलाज के लिए बनाई गई एक एंटीवायरल दवा, टेकोविरिमाट को साल 2022 में मंकीपॉक्स के इलाज के लिए यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी ने मंजूरी दी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि ऐसी दवाएं आमतौर पर दुर्लभ मामलों में ही दी जाती हैं। मंकीपॉक्स के लिए तीन वैक्सीन भी हैं – एमवीए-बीएन, एलसी16 और ऑर्थोपॉक्सवैक – जिन्हें पहले चेचक से लड़ने के लिए विकसित किया गया था। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि सिर्फ जोखिम वाले लोगों को ही, जैसे संक्रमित लोगों के करीबी संपर्क में आए लोगों को ही टीका लगवाना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण का आह्वान नहीं किया है।

मंकीपॉक्स प्रभावित देशों में जाने वाले यात्रियों को व्यक्तिगत स्वच्छता का खास ध्यान रखना चाहिए और संक्रमित लोगों और जानवरों की त्वचा पर हुए दाने के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। जंगली जानवरों का मांस और ठीक से न पका हुआ मांस खाने से बचें। कई यौन साथी रखना मंकीपॉक्स के लिए जोखिम भरा व्यवहार है। अगर आप मंकीपॉक्स प्रभावित देश से लौटने के बाद 21 दिनों के भीतर बुखार और दाने जैसे लक्षण महसूस करते हैं तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

क्या कोरोनावायरस से बड़ा खतरा साबित हो सकता है मंकीपॉक्स वायरस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मंकीपॉक्स वायरस कोरोनावायरस से भी बड़ा खतरा साबित हो सकता है या नहीं? भारत में मंकीपॉक्स के नए और तेजी से फैलने वाले वेरिएंट को लेकर केंद्र सरकार जल्द ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एडवाइजरी जारी करेगी। इस एडवाइजरी में इस नए वेरिएंट के डाइग्नोसिस, लक्षण और मैनेजमेंट के बारे में विस्तृत जानकारी होगी। हालांकि भारत में अभी तक एमपॉक्स का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन वैश्विक स्तर पर इस नए वेरिएंट को लेकर चिंता जताई जा रही है। अर्जेंटीना में एक मालवाहक जहाज कार्गो शिप को एमपॉक्स के संदिग्ध मामले के कारण क्वारंटाइन किया गया था। ये कदम उस समय उठाया गया जब अधिकारियों को पता चला कि भारतीय राष्ट्रीयता वाले क्रू मेंबर्स के एक सदस्य के सीने और चेहरे पर फोड़े जैसे घाव दिखाई दे रहे थे।कुछ मामलों में जटिलताएं हो सकती हैं, और मौतें भी हुई हैं। दो से तीन हफ्ते के अंदर, यह आमतौर पर ठीक हो जाता है। भारत में अभी तक कोई मामला सामने नहीं आया है। इस समय भारत में इसके बड़े पैमाने पर फैलने की संभावना नहीं है।जानकारी के मुताबिक, सतर्कता बरतते हुए संदिग्ध व्यक्ति को बाकी क्रू से अलग कर दिया गया और सैन लोरेंजो बंदरगाह जा रहे जहाज को नदी में ही लंगर डालना पड़ा। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने 14 अगस्त को एमपॉक्स को दो साल में दूसरी बार ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया था। इसके बाद अफ्रीका में इस वायरस के एक नए वेरिएंट का पता चला, जो तेजी से फैल रहा है। अगले ही दिन, स्वीडन में क्लैड 1बी वेरिएंट के एक मामले की पुष्टि हुई। ये अफ्रीका के बाहर इस वेरिएंट का पहला केस था।

 भारतीय अधिकारियों का कहना है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है और वे इससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।हमने राज्यों से ऐसे मामलों को अलग करने और उनके प्रबंधन के लिए संस्थान स्थापित करने को भी कहा है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के निदेशक डॉ अतुल गोयल ने बताया कि हम जल्द ही सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मंकीपॉक्स के नए वेरिएंट के बारे में एडवाइजरी जारी करेंगे। उन्होंने कहा कि यह वेरिएंट ज्यादा संक्रामक और खतरनाक है। उन्होंने ये भी कहा कि हमने पहले भी राज्यों के साथ बातचीत की थी। इस बार हम नए वेरिएंट पर दिशानिर्देशों को अपडेट करेंगे और इसके लक्षणों, निदान और प्रबंधन के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे।

बता दे कि इस मामले में डॉक्टर ने कहा कि हम एमपॉक्स वायरस से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। 32 ICMR प्रयोगशालाओं में टेस्टिंग सुविधाएं स्थापित की गई हैं। दिल्ली के तीन अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड बनाए गए हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने भारत में एमपॉक्स की स्थिति पर समीक्षा बैठकें की हैं। भारत में, 2022 से 2023 तक, 30 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 12 लोग विदेशों से थे, और बाकी भी विदेशों से थे लेकिन भारत में रह रहे थे।

डॉ. ने कहा कि एमपॉक्स आमतौर पर खुद ही ठीक हो जाता है और इसके लिए इलाज की जरूरत नहीं पड़ती है। हालांकि, कुछ मामलों में जटिलताएं हो सकती हैं, और मौतें भी हुई हैं। दो से तीन हफ्ते के अंदर, यह आमतौर पर ठीक हो जाता है। भारत में अभी तक कोई मामला सामने नहीं आया है। इस समय भारत में इसके बड़े पैमाने पर फैलने की संभावना नहीं है।भारतीय राष्ट्रीयता वाले क्रू मेंबर्स के एक सदस्य के सीने और चेहरे पर फोड़े जैसे घाव दिखाई दे रहे थे।जानकारी के मुताबिक, सतर्कता बरतते हुए संदिग्ध व्यक्ति को बाकी क्रू से अलग कर दिया गया और सैन लोरेंजो बंदरगाह जा रहे जहाज को नदी में ही लंगर डालना पड़ा। बता दें कि भारतीय अधिकारियों का कहना है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है और वे इससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के निदेशक डॉ अतुल गोयल ने बताया कि हम जल्द ही सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मंकीपॉक्स के नए वेरिएंट के बारे में एडवाइजरी जारी करेंगे। मंत्रालय ने उन लोगों के लिए सभी एंट्री प्वाइंट पर अलर्ट जारी किया गया है जिनमें इन मामलों के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमने राज्यों से ऐसे मामलों को अलग करने और उनके प्रबंधन के लिए संस्थान स्थापित करने को भी कहा है।

जम्मू कश्मीर में चुनाव करवाना क्या कठिन काम साबित होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जम्मू कश्मीर में चुनाव करवाना कठिन काम साबित होगा या नहीं! जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव से पहले सुरक्षा की स्थिति तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान और उसका खास दोस्त चीन बिल्कुल कोशिश करेंगे कि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोका जाए। हालांकि दोनों देशों के लिए हाल ही में जम्मू-कश्मीर में हुए लोकसभा चुनाव जरूर एक बड़ा संदेश होंगे। पाकिस्तान में आतंकियों की फौज तैयार हो रही है तो उसे चीन से भी खूब मदद मिल रही है। भारत भी यह जानता है कि उसके पास सीमापार से एक नहीं दो चुनौतियां हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव शांत ढंग से करा पाना भी एक चुनौती होगा। पाकिस्तान के सेना की स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) से जुड़े पाकिस्तानी आतंकवादियों की संख्या के मामले में, स्थिति 1990 के दशक और सदी के अंत में हुए विधानसभा चुनावों की तुलना में काफी बेहतर है। तब आतंकवादियों की संख्या 2,000 से 3,000 के बीच आंकी गई थी। जम्मू-कश्मीर के डीजीपी आरआर स्वेन के ताजा आकलन के अनुसार, स्थानीय आतंकवादियों की संख्या 20 है और पाकिस्तानी आतंकवादियों की संख्या उससे पांच से छह गुना ज्यादा है। भारतीय राज्य के लिए एक बेंचमार्क 1996 का विधानसभा चुनाव है, जब भारतीय सेना के नेतृत्व में सुरक्षा एजेंसियों के एक संयुक्त प्रयास से स्थिति को काबू में किया गया था। जम्मू डिवीजन, खासकर पीर पंजाल में आतंकवादी हमलों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि आतंकवादी सेना को तब निशाना बनाना पसंद करते हैं जब वह लापरवाह हो और ऐसे इलाकों में जहां अलर्ट लेवल काफी कम हो।

विधानसभा चुनावों से पहले की स्थिति ऐसे आतंकवादी हमलों के लिए अनुकूल नहीं है, जिनकी योजना पाकिस्तान की आईएसआई और एसएसजी जैसे संगठनों के पेशेवर बनाते हैं। हाल ही में ऊंचे इलाकों में घुमक्कड़ चरवाहों के बीच आतंकवादियों के ओवरग्राउंड वर्कर्स (TOGW) पर कार्रवाई, नशीली दवाओं के कारोबार से जुड़े पांच पुलिसकर्मियों को नौकरी से निकालना, जम्मू के आठ जिलों में पुलिस की 19 विशेष आतंकवाद रोधी टीमें बनाना आदि ने आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगा दी है।

इसके साथ ही, भारत के लिए चुनौती सोशल और मुख्यधारा मीडिया द्वारा बढ़ाए गए नैरेटिव की लड़ाई है। जम्मू-कश्मीर में ‘शून्य आतंकवाद’ का लक्ष्य घोषित करने के बाद, हिंसक घटनाओं की अपेक्षाकृत कम संख्या भी ‘बड़ी तस्वीर’ के नैरेटिव में असमान में छेद करने के बराबर है। आतंकवादियों ने कई कार्रवाइयों पर कुशलतापूर्वक नैरेटिव बनाए हैं, जिनका कुल प्रभाव 1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत की भारी संख्या के सामने फीका पड़ जाता है।

पारंपरिक और गुरिल्ला युद्ध के क्षेत्रों में पाकिस्तान और चीनी सेनाओं के बीच उभरते हुए तालमेल को स्वीकार करने और उसके लिए युद्ध की तैयारी करने की कुछ हद तक अनिच्छा है। कहीं ऐसा न हो कि भारत पर फिर से ऐसा कोई हमला हो जो अचानक ही आ जाए (कारगिल 1999 और पूर्वी लद्दाख अप्रैल-मई 2020), इसलिए जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों में चीनी हाथ और एलओसी पर रणनीतिक स्थिति को पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह ज्ञात है कि चीनी अपनी शक्तिशाली इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉन्सानेस (ISR) क्षमताओं के साथ पाकिस्तान की मदद कर रहा है।

जम्मू डिवीजन में आतंकवादियों के पास से पाकिस्तानी सेना के लिए बनाए गए चीनी एन्क्रिप्टेड संचार उपकरण बरामद किए गए हैं। चीनी और तुर्की के ड्रोन हथियार और नशीली दवाओं की तस्करी के लिए एलओसी पर काम कर रहे हैं। आतंकवादियों को चीनी स्टील-कोर आर्मर-पियर्सिंग असॉल्ट राइफल के गोले, डिफेंसिव हैंड ग्रेनेड आदि की लगातार आपूर्ति से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर में एक अच्छी तरह से योजनाबद्ध, समन्वित और युद्ध के लिए तैयार गुरिल्ला युद्ध चल रहा है।

जम्मू संभाग के संबंध में खुफिया तंत्र चिंता का विषय है। अक्टूबर 2021 से पीर पंजाल और जम्मू के आंतरिक इलाकों में हुए 14 आतंकी घात लगाने, फंसाने और जाल बिछाने के मेरे विश्लेषण में, सेना को भारी हताहत का सामना करना पड़ा क्योंकि आतंकवादियों के पास संभावित घात लगाने के बिंदुओं, वाहनों की आवाजाही और सैनिकों की संख्या के संबंध में सटीक जानकारी उपलब्ध थी। TOGW (आतंकी ओवरग्राउंड वर्कर्स) द्वारा आतंकवादियों को भोजन, गुफा आश्रय और मार्गदर्शन प्रदान करना एक प्रमुख तत्व था। दूसरी ओर, सेना हमेशा अचानक हमले का शिकार हो जाती थी और जवाबी कार्रवाई में कुछ ही आतंकवादियों को मार गिराती थी। गलत खुफिया जानकारी और अशुद्ध सूचनाओं ने जम्मू में सेना के लिए अभियान के माहौल को और जटिल बना दिया।

आखिर हिंदुओं के खिलाफ क्यों हो रही है बार-बार हिंसा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि वर्तमान में हिंदुओं के खिलाफ बार-बार हिंसा क्यों हो रही है! प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिंदुओं के प्रति धार्मिक घृणा में वृद्धि देखी है। लगभग 1.2 करोड़ हिंदुओं सहित अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ हमलों में कई लोग हताहत हुए हैं। बांग्लादेश में कई समूहों ने विरोध मार्च निकाले हैं, जिनमें हिंदू, बौद्ध और ईसाई धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह शामिल हैं। बांग्लादेश में हालत एक असहज सामान्य स्थिति में लौट रही है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि लगभग किसी भी विश्व नेता ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई। अगर पीड़ित हिंदू के बजाय मुस्लिम, ईसाई या यहूदी होते तो क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया अलग होती? दुनिया भर में कई मुद्दों पर बढ़ते ध्रुवीकरण के साथ, सबसे अधिक दिखाई देने वाला और चौड़ा विभाजन अब धर्म पर आधारित है, विशेष रूप से अब्राहमिक और गैर-अब्राहमिक धर्मों के बीच।

पहली बार, अक्टूबर 2021 में, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में नॉन-अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ धार्मिक घृणा या धर्म-विरोध को उठाया। भारत द्वारा ऐसा करने के कुछ खास कारण थे। सबसे पहले, संयुक्त राष्ट्र और बाकी दुनिया ने तीन अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ भय की बार-बार निंदा की है: यहूदी-विरोधी, इस्लामोफोबिया और ईसाई-विरोधी। और यह सही भी है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि किसी भी धर्म के प्रति धार्मिक घृणा की निंदा की जानी चाहिए। इन तीनों का संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया था, जबकि अन्य को बाहर रखा गया था।

हालांकि, वास्तविकता अलग है। पिछले एक दशक में, नॉन-अब्राहमिक धर्मों पर हमले तेजी से बढ़े हैं। अब हम हिंदू-विरोधी, बौद्ध-विरोधी और सिख-विरोधी घृणा सहित धर्म-विरोध के समकालीन रूपों को देख रहे हैं। हमने अपने पाकिस्तान समेत पड़ोस में मंदिरों और मूर्तियों को नष्ट होते देखा है, गुरुद्वारों पर हमले, सिख तीर्थयात्रियों का नरसंहार, बामियान बुद्ध को नष्ट करना, हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन और इसी तरह की अन्य घटनाएं देखा है। जैसा कि हमारे नेतृत्व ने बताया है, पश्चिम में, खासकर अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में सिखों और हिंदुओं के खिलाफ घृणा अपराध बढ़े हैं।

इसके अलावा, आतंकवाद को सही ठहराने के लिए इस्लामोफोबिया का इस्तेमाल करके आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने 2021 में संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद विरोधी रणनीति पर बातचीत के दौरान ऐसा करने का प्रयास किया, जो संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के बीच सहमत हुए इस बात का खंडन करता है: आतंक को कोई औचित्य नहीं दिया जा सकता। सौभाग्य से, भारत अपनी जमीन पर डटा रहा और बाद में बार-बार किए गए प्रयासों को विफल कर दिया गया।

इसके अलावा धार्मिक कट्टरता से प्रेरित हमलों को अक्सर इस तथ्य को छिपाने के लिए आतंकवादी हमले कहा जाता है कि वे धर्म से प्रेरित हैं। कुछ लोगों ने लेखक सलमान रुश्दी पर हुए हमले को या तो आतंकवादी हमला कहा है या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला। किसी ने इसे धार्मिक रूप से घृणास्पद हमला नहीं कहा, भले ही लेखक पर केवल इस्लाम के बारे में उनके बयान के लिए हमला किया गया था।

यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्तावों को भी धार्मिक रंग दिया गया है। पाकिस्तान ने मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर हिंदुओं को 1267 प्रतिबंधों के तहत सूचीबद्ध करने की पूरी कोशिश की, लेकिन परिषद ने हर प्रयास को खारिज कर दिया। इन घटनाक्रमों के मद्देनजर, भारत ने अक्टूबर 2021 में UNSC में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को आगाह किया कि हम अपने स्वयं के जोखिम पर गैर-इब्राहीम धर्मों के खिलाफ धार्मिक घृणा को नजरअंदाज कर रहे हैं। और निश्चित रूप से, मार्च 2022 में, OIC ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में 15 मार्च को इस्लामोफोबिया का मुकाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया। भारत और फ्रांस को छोड़कर सभी देशों ने इसे स्वीकार कर लिया। पहली बार, एक विशिष्ट धर्म के खिलाफ नफरत का मुकाबला करने के लिए अपना खुद का अंतरराष्ट्रीय दिवस दिया गया था।

क्या यूरोप में दक्षिणपंथी आंदोलन का उदय आश्चर्यजनक है? हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि राष्ट्रों के बीच बातचीत को सिर्फ धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता, लेकिन बार-बार होने वाली घटनाओं ने यह दिखाया है कि नॉन-अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ भय, खास तौर पर हिंदू विरोधी घृणा अपराधों को तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाएगा जब तक कि भारत नेतृत्व न करे। हम सिर्फ प्रतिक्रिया करने का जोखिम नहीं उठा सकते।

भारतीय कूटनीति धार्मिक मुद्दों से इस आधार पर दूर रही है कि चूंकि भारत एक बहुलवादी देश है, इसलिए किसी को विदेश में धर्मों के बीच पक्ष लेते हुए नहीं देखा जा सकता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को धार्मिक भय, खास तौर पर नॉन-अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ घृणा को नजरअंदाज करना चाहिए, क्योंकि इसे नजरअंदाज करने से हमारे जैसे बहुसांस्कृतिक, बहुलवादी और लोकतांत्रिक देशों पर गंभीर असर पड़ता है। ऐसी नफरत सार्वजनिक चर्चाओं में जड़ जमा रही है, खास तौर पर पश्चिम में जहां ज्यादातर देश बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक हैं। जब दूसरे देश दुनिया भर में धार्मिक नफरत के बारे में बोलते हैं, और यहां तक कि वार्षिक रिपोर्ट भी निकालते हैं, तो यह समय है कि हम अपनी झिझक को दूर करें, नेतृत्व करें और इसके खिलाफ बोलने के लिए देशों का गठबंधन बनाएं। अगर हम नहीं करेंगे, तो कोई और नहीं करेगा।

क्या आरक्षण खत्म कर सकती है मोदी सरकार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार आरक्षण खत्म कर सकती है या नहीं! संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC ने लैटेरल एंट्री के जरिए टॉप पोस्ट पर वैकेंसी निकाली है। जैसे ही ये भर्तियां निकलीं इसे लेकर सियासी घमासान तेज होने लगा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर रिएक्ट किया है। उन्होंने इस फैसले पर सवाल खड़े कर दिए। राहुल गांधी ने फेसबुक पर एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘IAS का निजीकरण’ आरक्षण खत्म करने की ‘मोदी की गारंटी’ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी अकेले नहीं हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर रिएक्ट किया है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी इसे मोदी सरकार की साजिश करार दिया। राहुल गांधी ने फेसबुक पर पोस्ट में लिखा, ‘नरेंद्र मोदी संघ लोक सेवा आयोग की जगह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जरिए लोकसेवकों की भर्ती कर संविधान पर हमला कर रहे हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती कर खुलेआम SC, ST और OBC वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है। मैंने हमेशा कहा है कि टॉप ब्यूरोक्रेसी समेत देश के सभी शीर्ष पदों पर वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं है, उसे सुधारने के बजाय लेटरल एंट्री द्वारा उन्हें शीर्ष पदों से और दूर किया जा रहा है।’

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘यह UPSC की तैयारी कर रहे प्रतिभाशाली युवाओं के हक़ पर डाका और वंचितों के आरक्षण समेत सामाजिक न्याय की परिकल्पना पर चोट है।बता दें कि मोदी सरकार बहुत ही व्यवस्थित, पद्धतिबद्ध, योजनाबद्ध और शातिराना तरीके से आरक्षण को समाप्त कर रही है।’इस तरह इंडिया गठबंधन में शामिल दलों ने UPSC की लैटरल एंट्री के जरिए सीधे निकाली गई नौकरियों के फैसले पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘चंद कॉरपोरेट्स’ के प्रतिनिधि निर्णायक सरकारी पदों पर बैठ कर क्या कारनामे करेंगे इसका ज्वलंत उदाहरण SEBI है, जहां निजी क्षेत्र से आने वाले को पहली बार चेयरपर्सन बनाया गया। प्रशासनिक ढांचे और सामाजिक न्याय दोनों को चोट पहुंचाने वाले इस देश विरोधी कदम का INDIA मजबूती से विरोध करेगा। IAS का निजीकरण आरक्षण खत्म करने की मोदी की गारंटी है।’

राहुल गांधी अकेले नहीं है इंडिया गठबंधन में शामिल समाजवादी पार्टी और आरजेडी ने भी इस मुद्दे को उठाया है। अखिलेश यादव ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, ‘भाजपा अपनी विचारधारा के संगी-साथियों को पिछले दरवाज़े से यूपीएससी के उच्च सरकारी पदों पर बैठाने की जो साजिश कर रही है, उसके खिलाफ एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है। ये तरीका आज के अधिकारियों के साथ, युवाओं के लिए भी वर्तमान और भविष्य में उच्च पदों पर जाने का रास्ता बंद कर देगा। आम लोग बाबू और चपरासी तक ही सीमित हो जाएंगे। दरअसल से सारी चाल पीडीए से आरक्षण और उनके अधिकार छीनने की है। अब जब भाजपा ये जान गयी है कि संविधान को खत्म करने की भाजपाई चाल के खिलाफ देश भर का पीडीए जाग उठा है तो वो ऐसे पदों पर सीधी भर्ती करके आरक्षण को दूसरे बहाने से नकारना चाहती है। ये देश के विरूद्ध एक बड़ा षड्यंत्र है।’

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, ‘केंद्र की मोदी सरकार बाबा साहेब के लिखे संविधान और आरक्षण के साथ कैसा घिनौना मजाक और खिलवाड़ कर रही है, यह विज्ञापन उसकी एक छोटी सी बानगी है। UPSC ने लैटरल एंट्री के जरिए सीधे45 संयुक्त सचिव, उप-सचिव और निदेशक स्तर की नौकरियां निकाली है लेकिन इनमें आरक्षण का प्रावधान नहीं है। अगर UPSC सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से 45 IAS की नियुक्ति करती तो उसे SC, STऔर OBC को आरक्षण देना पड़ता यानि 45 में से 22 अभ्यर्थी दलित, पिछड़ा और आदिवासी वर्गों से चयनित होते। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती कर खुलेआम SC, ST और OBC वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है। मैंने हमेशा कहा है कि टॉप ब्यूरोक्रेसी समेत देश के सभी शीर्ष पदों पर वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं है, उसे सुधारने के बजाय लेटरल एंट्री द्वारा उन्हें शीर्ष पदों से और दूर किया जा रहा है।’मोदी सरकार बहुत ही व्यवस्थित, पद्धतिबद्ध, योजनाबद्ध और शातिराना तरीके से आरक्षण को समाप्त कर रही है।’इस तरह इंडिया गठबंधन में शामिल दलों ने UPSC की लैटरल एंट्री के जरिए सीधे निकाली गई नौकरियों के फैसले पर सवाल खड़े कर दिए हैं। देखना होगा कि मोदी सरकार और बीजेपी इस मुद्दे पर कैसे रिएक्ट करती है।

आखिर अफसर की सीधी भर्ती पर क्यों गरमा रही है राजनीति?

वर्तमान में अफसर की सीधी भर्ती पर राजनीति गरमा रही है! केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों में जॉइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी के प्रमुख पदों पर ‘लैटरल एंट्री’ के जरिए 45 स्पेशलिस्ट नियुक्त किए जाने के फैसले पर विपक्षी दलों ने निशाना साधा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने इस फैसले को एससी, एसटी और ओबीसी के खिलाफ बताया है और केंद्र से इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। यूपीएससी ने बीते शनिवार को इन पदों के लिए विज्ञापन दिया है, जिसमें 10 जॉइंट सेक्रेटरी, 35 डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी के पद शामिल है। इन पदों को कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर लैटरल एंट्री के जरिए से भरा जाना है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर लिखा कि ये देश के खिलाफ एक बड़ा षड्यंत्र है। उन्होने अधिकारियों और युवाओं से आग्रह है कि अगर बीजेपी सरकार इसे वापस न ले तो आगामी 2 अक्टूबर से एक नया आंदोलन शुरू करने में हमारे साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़े हों। सरकारी तंत्र पर कॉरपोरेट के कब्जे को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे क्योंकि कॉरपोरेट की अमीरोंवाली पूंजीवादी सोच ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की होती है। ऐसी सोच दूसरे के शोषण पर निर्भर करती है, जबकि हमारी ‘समाजवादी सोच’ गरीब, किसान, मजदूर, नौकरीपेशा, अपना छोटा-मोटा काम-कारोबार-दुकान करनेवाली आम जनता के पोषण और कल्याण की है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी अपनी विचारधारा के संगी-साथियों को पिछले दरवाजे से यूपीएससी के उच्च सरकारी पदों पर बैठाने की जो साजिश कर रही है, उसके खिलाफ एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है।

नरेंद्र मोदी संघ लोक सेवा आयोग की जगह ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ के जरिए लोकसेवकों की भर्ती कर संविधान पर हमला कर रहे हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के ज़रिए भर्ती कर खुलेआम SC, ST और OBC वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है। मैंने हमेशा कहा है कि टॉप ब्यूरोक्रेसी समेत देश के सभी शीर्ष पदों पर वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं है, उसे सुधारने के बजाय लेटरल एंट्री द्वारा उन्हें शीर्ष पदों से और दूर किया जा रहा है। यह UPSC की तैयारी कर रहे प्रतिभाशाली युवाओं के हक़ पर डाका और वंचितों के आरक्षण समेत सामाजिक न्याय की परिकल्पना पर चोट है। ‘चंद कॉरपोरेट्स’ के प्रतिनिधि निर्णायक सरकारी पदों पर बैठ कर क्या कारनामे करेंगे इसका ज्वलंत उदाहरण SEBI है, जहां निजी क्षेत्र से आने वाले को पहली बार चेयरपर्सन बनाया गया। प्रशासनिक ढांचे और सामाजिक न्याय दोनों को चोट पहुंचाने वाले इस देश विरोधी कदम का INDIA मजबूती से विरोध करेगा।

कांग्रेस की दोहरी नीति सीधी भर्ती के मामले में साफ दिख रही है। दरअसल, लैट्रल एंट्री की शुरुआत तो यूपीए सरकार ने ही की थी। साल 2005 में यूपीए सरकार ने ही दूसला प्रशासनिक सुधार आयोग बनाया था, जिसके अध्यक्ष वीरप्पा मोइली थे। यूपीए काल के प्रशासनिक सुधार आयोग ने खास ज्ञान की जरूरत वाले पदों पर विशेषज्ञों की भर्ती की सिफारिश की थी। एनडीए सरकार ने इस सिफारिश को लागू करने के लिए एक पारदर्शी तरीका बनाया है। भर्तियां अब यू पी एस सी के जरिए पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से होंगी। इस सुधार से देश का कामकाज बेहतर होगा।

बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कहा कि केंद्र में विभिन्न कैटिगरी के 45 उच्च पदों पर सीधी भर्ती का फैसला सही नहीं है क्योंकि सीधी भर्ती के माध्यम से नीचे के पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को प्रमोशन के लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इन सरकारी नियुक्तियों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के लोगों को उनके कोटे के अनुपात में अगर नियुक्ति नहीं दी जाती है तो यह संविधान का सीधा उल्लंघन होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि इन उच्च पदों पर सीधी नियुक्तियों को बिना किसी नियम के बनाए हुए भरना बीजेपी सरकार की मनमानी होगी, जो कि गैर- कानूनी और असंवैधानिक होगा।

तेजस्वी यादव ने लिखा, ‘केंद्र की मोदी सरकार बाबा साहेब के लिखे संविधान और आरक्षण के साथ कैसा घिनौना मजाक और खिलवाड़ कर रही है, यह विज्ञापन उसकी एक छोटी सी बानगी है।’ आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा, “भारतीय जनता पार्टी आरक्षण विरोधी पार्टी है। यह पार्टी पूरे देश में पिछड़ों, वंचितों और दलितों का आदिवासियों का आरक्षण खत्म करना चाहती है। इनको 240 सीटें ही मिलीं। अगर इनकी 300 सीटें भी आ जातीं तो ये जॉइंट सेशन बुलाकर संविधान ही बदल देते। ये आरक्षण खत्म कर देते।”

आखिर क्या है लेटरल एंट्री? जिस पर हो रहा है विवाद?

आज हम आपको लेटरल एंट्री के बारे में जानकारी देंगे जिस पर वर्तमान में विवाद हो रहा है! 2005 की बात है, जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के इंडिया शाइनिंग को पछाड़कर कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के सत्ता पर काबिज हुए कुछ ही महीने हुए थे। उस वक्त पहली बार लेटरल एंट्री से नौकरशाही में शीर्ष पदों पर निजी क्षेत्रों के लोगों को बिठाने की योजना लाई गई थी। यह स्कीम उस वक्त वरिष्ठ कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली लाए थे। तब इस प्रस्ताव का दूसरे दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने जोरदार समर्थन किया था। दरअसल, लेटरल एंट्री चर्चा में इसलिए है, क्योंकि हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने लेटरल एंट्री के माध्यम से 45 संयुक्त सचिवों, निदेशकों और उप सचिवों की भर्ती के लिए एक अधिसूचना जारी की। इसे लेकर नरेंद्र मोदी सरकार विपक्ष के निशाने पर है। विपक्ष का कहना है कि लेटरल एंट्री ने ओबीसी, एससी और एसटी के आरक्षण अधिकारों को कमजोर कर दिया है। देश में पहले प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन 1966 में हुआ था। तब मोरारजी देसाई को इसका अध्यक्ष बनाया गया था। मोरारजी देसाई मार्च 1977 और जुलाई 1979 के बीच प्रधानमंत्री रहे थे। तब मोरारजी देसाई ने सिविल सेवाओं के भीतर विशेष कौशल की आवश्यकता पर जोर दिया था। हालांकि, तब लेटरल एंट्री जैसी बात नहीं की गई थी। शुरुआत में मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद लेटरल एंट्री भरा जाने लगा।

लेटरल एंट्री योजना औपचारिक रूप से नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में शुरू हुई। 2018 में सरकार ने संयुक्त सचिवों और निदेशकों जैसे वरिष्ठ पदों के लिए विशेषज्ञों के आवेदन मांगे थे। यह पहली बार था कि निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के पेशेवरों को इसमें मौका दिया गया। बाद में इसके तहत 37 लोगों की भर्ती की गई थी। 2019 में 7 और 2021 में 30 लोगों की भर्ती की गई थी। लेटरल एंट्री से आने वाले अधिकारियों को 3 साल के एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करना पड़ता है, जिसे उनके प्रदर्शन के आधार पर 2 साल और बढ़ाया जा सकता है।

लेटरल एंट्री का मतलब निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की सीधी भर्ती से है। इसके जरिये केंद्र सरकार के मंत्रालयों में संयुक्त सचिवों, निदेशकों और उप सचिवों के पदों की भर्ती की जाती है। केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, स्वायत्त एजेंसियों, शैक्षणिक निकायों और विश्वविद्यालयों में काम करने वालों को छोड़कर निजी क्षेत्र के व्यवसायों में समकक्ष स्तर पर कार्यरत न्यूनतम 15 वर्ष के अनुभव वाले व्यक्ति अफसरशाही में शामिल हो सकते हैं। ऐसे लोगों की न्यूनतम आयु 45 वर्ष होनी चाहिए और किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से स्नातक की न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए।

दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. देवनाथ पाठक के अनुसार, लेटरल एंट्री का छठे वेतन आयोग और दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी), सुरिंदर नाथ समिति (2003) और होता समिति (2004) ने भी समर्थन किया था। दरअसल, इस बारे में चिंता इस बात की है कि ऐसा वर्क कल्चर विकसित करना, जिसमें सरकारी नौकरशाहों का काम करना कठिन हो सकता है। वहीं, सुरक्षित करियर होने के नाते कुछ नौकरशाह लापरवाह हो सकते हैं। ऐसे में बाहर से आई प्रतिभाओं से उनका मुकाबला होगा तो उनकी काम करने की क्षमता में सुधार होगा और सुस्ती दूर होगी। इसके अलावा, प्रशासन में एक्सपर्ट के होने की जरूरत भी बताई जाती है। बाहर से आने वाले लोग संबंधित विषय में जरूरी विशेषज्ञता वाले हो सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि लेटरल एंट्री की व्यवस्था सिर्फ भारत में ही है। ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे पश्चिमी देशों में पहले से ही सभी क्षेत्रों के योग्य कर्मियों के लिए विशिष्ट सरकारी पदों को खोल दिया है। यह नौकरी के लिए बेहतरीन प्रतिभाओं को आकर्षित करने का एक बेहतर तरीका पाया गया है। देश में हर साल IAS, IPS की नियुक्ति के लिए संघ लोक सेवा द्वारा सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की जाती है। इसके बाद भी देश में करीब 2500 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की कमी है। बीते साल 3 अगस्त को राज्यसभा में बोलते हुए केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया था कि IAS के 1,365 पद खाली पड़े हैं। वहीं, IPS के कुल 703 पद खाली हैं। जबकि, 1042 पद इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) में हैं। इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) में कुल 301 पद खाली हैं। उन्होंने बताया है कि सरकार ने UPSC के तहत होने वाली भर्ती के लिए IAS के पदों पर इनटेक बढ़ा दिया है। IAS के पद अब 180 कर दिए गए हैं। IPS के पद भी साल 2020 से बढ़ाकर 200 कर दिए गए हैं। 2022 में IFS के पदों को बढ़ाकर 150 किया गया था।

ऐसी आशंका जताई जाती रही है कि लेटरल एंट्री केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण सेटअप में सेंध है। इससे आशंका यह है कि राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों की भर्ती के लिए ‘लूट-प्रणाली’ यानी पिछले दरवाजे से प्रवेश का बहाना बन सकता है। इस संबंध में प्रशासनिक सुधार समिति ने केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की जरूरत बताई थी। जो एक स्वायत्त निकाय है और प्रस्तावित भर्ती प्रक्रिया की निगरानी के लिए स्वतंत्र प्राधिकरण के रूप में काम करता है।