Monday, March 16, 2026
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क्या दुश्मन देश का काल बनकर आएगा कामिकेज ड्रोन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कामिकेज ड्रोन दुश्मन देश का काल बनकर सामने आएगा या नहीं! भारत के 78वें स्वतंत्रता दिवस पर डिफेंस सेक्टर से बड़ी खबर सामने आई है। नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) ने बताया है कि वह मानव रहित हवाई वाहन बना रही है जो ‘कामिकेज ड्रोन’ की तरह काम करेगा। इसका मतलब है कि यह खुद को दुश्मन के ठिकाने पर नष्ट कर देगा। यह ड्रोन पूरी तरह से स्वदेशी होगा, यानी भारत में बना होगा। इसमें भारत में बना इंजन भी लगा होगा। यह ड्रोन 1000 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है। भारतीय कामिकेज ड्रोन लगभग 2.8 मीटर लंबे हैं। इनके पंखों का फैलाव 3.5 मीटर है। इनका वजन लगभग 120 किलोग्राम है। ये ड्रोन 30 हॉर्स पावर के वेंकल इंजन से उड़ते हैं। यह इंजन भी नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज ने ही बनाया है। ये ड्रोन 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकते हैं। इनकी मारक क्षमता 1,000 किलोमीटर तक है। ये यूएवी 25 किलोग्राम तक विस्फोटक ले जा सकते हैं। इन खूबियों की वजह से ये ड्रोन किसी भी युद्ध के मैदान में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

कामिकेज ड्रोन को लॉइटेरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है। इन ड्रोन का इस्तेमाल आधुनिक युद्धों में काफी बढ़ा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा में इजराइल-हमास संघर्ष में इन ड्रोनों का जमकर इस्तेमाल हुआ है। यूक्रेनी सेना ने इन ड्रोनों का इस्तेमाल करके रूसी पैदल सेना और बख्तरबंद गाड़ियों को निशाना बनाया है। ये ड्रोन लंबे समय तक किसी खास इलाके में मंडराते रहते हैं। इनमें विस्फोटक लदे होते हैं। ये कंट्रोल रूम से आदेश मिलने पर किसी भी लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इन ड्रोनों को झुंड में भी तैनात किया जा सकता है। इससे दुश्मन के रक्षा तंत्र और रडार को धोखा देना आसान हो जाता है।

इन स्वदेशी ड्रोन को विकसित करना एक बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) कर रही है। सीएसआईआर ने इस प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। सीएसआईआर-एनएएल इस प्रोजेक्ट की अगुवाई कर रहा है। देश की प्रमुख इंजीनियरिंग प्रयोगशालाएं भी इस प्रोजेक्ट में अपनी भागीदारी दे रही हैं। इस प्रोजेक्ट का मकसद एक मजबूत और भरोसेमंद रक्षा तकनीक विकसित करना है। इससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। इन ड्रोनों की एक खासियत यह भी है कि ये बिना जीपीएस के भी काम कर सकते हैं। इन यूएवी में भारतीय नाविक प्रणाली लगी है। इससे ये ड्रोन उन इलाकों में भी काम कर सकते हैं जहां जीपीएस सिग्नल जाम हो या उपलब्ध न हो। यह क्षमता इन ड्रोनों को और भी घातक बनाती है।

एनएएल के निदेशक डॉ. अभय पाशिलकर इस रिसर्च का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने इन ड्रोनों के महत्व के बारे में बताया है। उन्होंने कहा, ‘भारत इन स्वदेशी कामिकेज ड्रोनों को विकसित कर रहा है, ये 21वीं सदी की नई पीढ़ी की युद्ध मशीन हैं।’ उन्होंने आगे बताया कि भारतीय लॉइटेरिंग म्यूनिशन लगभग नौ घंटे तक हवा में रह सकता है। इससे यह किसी भी इलाके में लगातार मंडरा सकता है। डॉ. पाशिलकर ने कहा, ‘दूसरे देशों की ओर से तैनात किए गए ऐसे ड्रोनों ने आधुनिक युद्धों में अपनी उपयोगिता साबित की है।’

कामिकेज मिशन का कॉन्सेप्ट कोई नया नहीं है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के समय से चला आ रहा है। उस समय जापानी पायलट मित्र देशों की सेनाओं पर अपने विमानों से हमला करते थे। वे खुद को कुर्बान करके दुश्मन को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते थे। हालांकि, आधुनिक कामिकेज ड्रोन मानव रहित हैं। इन्हें रिमोट से नियंत्रित किया जाता है। इन ड्रोनों से बिना किसी पायलट को जोखिम में डाले सटीक हमले किए जा सकते हैं।

इन स्वदेशी कामिकेज ड्रोनों का निर्माण भारत की रक्षा क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ड्रोन लंबे समय तक किसी खास इलाके में मंडराते रहते हैं। इनमें विस्फोटक लदे होते हैं। ये कंट्रोल रूम से आदेश मिलने पर किसी भी लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इन ड्रोनों को झुंड में भी तैनात किया जा सकता है। इससे दुश्मन के रक्षा तंत्र और रडार को धोखा देना आसान हो जाता है।भारत अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। ऐसे में इन उन्नत यूएवी का विकास भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और उसकी तकनीकी प्रगति को बढ़ाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। ये ड्रोन आधुनिक युद्ध के तरीकों को बदल सकते हैं। भारत की रक्षा रणनीति में इन ड्रोनों की अहम भूमिका होगी। ये ड्रोन यह सुनिश्चित करेंगे कि भारत वैश्विक रक्षा तकनीक में सबसे आगे रहे।

स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी के संबोधन के लिए क्या बोला विपक्ष?

हाल ही में विपक्ष ने स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी के संबोधन के लिए एक बयान दिया है! स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी के भाषण को लेकर विपक्षी दल हमलावर हैं। विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया है कि पीएम मोदी लोगों को एकजुट करने, प्रेरित करने और राष्ट्र के महत्वपूर्ण मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहे। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने यह कह कर संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर का घोर अपमान किया है कि आजादी के बाद से अब तक देश में ‘सांप्रदायिक नागरिक संहिता’ है। रमेश ने दावा किया कि आंबेडकर, हिंदू पर्सनल लॉ में जिन सुधारों के बड़े पैरोकार थे, उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ ने पुरजोर विरोध किया था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के महासचिव डी राजा ने कहा कि भारत के 78वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के भाषण में लोगों को एकजुट करने और प्रेरित करने की कोई बात शामिल नहीं थी। राजा ने कहा, ‘उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह आरएसएस के भयावह, विभाजनकारी एजेंडे के अनुरूप है।’ उन्होंने आरोप लगाया, ‘प्रधानमंत्री 2047 के बारे में बोलते हैं लेकिन वह देश की बहुलता और विविधता के मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहे। वह देश पर एकरूपता थोपने की कोशिश कर रहे हैं।’

राष्ट्रीय जनता दल के नेता मनोज झा ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस बात का एहसास नहीं है कि देश में केवल एक ही प्रधानमंत्री है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने विपक्ष को वोट दिया, उनका कोई अलग प्रधानमंत्री नहीं है। उन्होंने कहा, ‘सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक बात यह है कि 11वीं बार भी नरेंद्र मोदी यह समझने में विफल रहे हैं कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं। विपक्ष या जिन लोगों ने आपको वोट नहीं दिया, उनके लिए कोई अलग प्रधानमंत्री नहीं है।’ झा ने कहा, ‘आज उन्होंने धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता के बारे में बात की। धर्मनिरपेक्षता एक प्रक्रिया है, इसे आत्मसात करना होगा। हर बार जब हम उम्मीद करते हैं कि प्रधानमंत्री संकीर्ण मानसिकता छोड़ देंगे और व्यापक सोच रखेंगे, तो वह निराश करते हैं।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में देश में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता (एससीसी) की जोरदार पैरवी करते हुए भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने का संकल्प और ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का सपना साकार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, ‘देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मानता है कि जिस नागरिक संहिता को लेकर हम लोग जी रहे हैं, वह सचमुच में साम्प्रदायिक और भेदभाव करने वाली संहिता है। मैं चाहता हूं कि इस पर देश में गंभीर चर्चा हो और हर कोई अपने विचार लेकर आए।’ यही नहीं बता सकता कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने यह कह कर संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर का घोर अपमान किया है कि आजादी के बाद से अब तक देश में ‘सांप्रदायिक नागरिक संहिता’ है। उन्होंने दावा किया कि आंबेडकर हिंदू पर्सनल लॉ में जिन सुधारों के बड़े पैरोकार थे, उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ ने पुरजोर विरोध किया था।

डी राजा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री 2047 के बारे में बोलते हैं लेकिन वह देश की बहुलता और विविधता के मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहे। वह देश पर एकरूपता थोपने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के मनोज झा ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस बात का एहसास नहीं है कि देश में केवल एक ही प्रधानमंत्री है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने विपक्ष को वोट दिया, उनका कोई अलग प्रधानमंत्री नहीं है। झा ने कहा कि चिंताजनक बात यह है कि 11वीं बार भी नरेन्द्र मोदी यह समझने में विफल रहे हैं कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं।

बता दें कि मनोज झा ने कहा कि आज उन्होंने, पीएम धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता के बारे में बात की। धर्मनिरपेक्षता एक प्रक्रिया है। इसे आत्मसात करना होगा। हर बार जब हम उम्मीद करते हैं कि प्रधानमंत्री संकीर्ण मानसिकता छोड़ देंगे और व्यापक सोच रखेंगे तब वह निराश करते हैं।  बता दें कि गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में देश में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता (एससीसी) की वकालत की। पीएम ने देश को ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने का संकल्प व ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का सपना साकार करने का आह्वान किया।

क्या शेख हसीना ने हिंदुओं को बचाने के लिए छोड़ा था अपना पद?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शेख हसीना ने हिंदुओं को बचाने के लिए अपना पद छोड़ा था या नहीं! शेख हसीना के अचानक सत्ता छोड़ने के बाद बांग्लादेश में उथल-पुथल मची हुई है। इस विश्लेषण में हम तीन मुख्य पहलुओं पर गौर करेंगे – हसीना ने क्या अच्छा काम किया, आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति कैसे आगे बढ़ेगी और इस पूरे घटनाक्रम में भारत का क्या रुख होना चाहिए। शेख हसीना ने बांग्लादेश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई। 2009 में उनकी सरकार आने के बाद से देश में स्थिरता आई जिसकी वजह से बांग्लादेश में निवेश बढ़ा और वह रेडीमेड गारमेंट्स के निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। इसके साथ ही, बांग्लादेश में एक नवजात दवा उद्योग ने भी पांव जमा लिया। 2016 से 2019 तक ढाका में उच्चायुक्त के रूप में मैंने बांग्लादेश में हसीना द्वारा लाए गए कुछ बड़े आर्थिक बदलावों को देखा है। एक समय बांग्लादेश को एक असफल राष्ट्र माना जाता था। विडंबना यह है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण बहाल करने का आदेश बांग्लादेश की अदालतों ने दिया था। दरअसल हसीना सरकार ने 2018 में 50% से अधिक सरकारी नौकरियों में आरक्षण को समाप्त कर दिया था। सभी जानकारों का मानना है कि पूर्व पीएम ने सरकार की बागडोर छोड़ने की सलाह का विरोध नहीं किया। उन्होंने पद छोड़ने की सलाह मानकर देश को बचा लिया। अगर वह पद पर बनी रहतीं तो बांग्लादेश की स्थिति बेकाबू हो सकती थी। हसीना के पद छोड़ने से शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन का रास्ता साफ हुआ है। लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बांग्लादेश सेना की निगरानी में अंतरिम सरकार बनाने के लिए किन राजनीतिक दलों को बुलाया जाता है।

आरक्षण के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई छात्र कर रहे थे, लेकिन बाद में जमात-ए-इस्लामी ने इसमें घुसपैठ कर ली। जमात की छात्र इकाई ‘छात्र शिबिर’ ही देश में ज्यादातर हिंसा के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा बांग्लादेश में महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमले और मेट्रो स्टेशनों को आग के हवाले करने के पीछे कोई और वजह कैसे हो सकती है? यहां तक कि ‘बंगबंधु’ शेख मुजीब उर रहमान की प्रतिमा और उनके संग्रहालय को जानबूझकर नुकसान पहुंचाना किसका काम हो सकता है?ढाका में क्या हो रहा है, यह समझने के लिए इन बातों पर गौर करना जरूरी है। ऐसी खबरें हैं कि नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख नियुक्त किया जाएगा। वह हसीना के विरोधी माने जाते हैं। साथ ही, वह अमेरिका के भी करीबी हैं। क्लिंटन और वॉशिंगटन डीसी के अन्य प्रमुख लोगों के करीबी यूनुस न तो पक्के राजनेता हैं और न ही इस्लामी कट्टरपंथी। वो एक टेक्नोक्रेट हैं जो भारत के साथ संबंध बनाए रखने की जरूरत को समझेंगे।

लेकिन यूनुस के नेतृत्व में भी अंतरिम सरकार की रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं है। विभिन्न दबावों को देखते हुए इसके गठन में कुछ समय लग सकता है। ऐसी भी संभावना है कि स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए मार्शल लॉ लगाया जा सकता है। बांग्लादेश में एक राष्ट्रपति हैं। यहां केयरटेकर गवर्नमेंट्स का इतिहास रहा है और समय-समय पर सैन्य सरकारों का भी रिकॉर्ड रहा है। इससे वर्तमान स्थिति से निपटने के लिए एक तरकीब मिल जाती है।

अब यह देखना होगा कि कौन सत्ता संभालता है – क्या सेना प्रमुख, अन्य प्रभावशाली सेना अधिकारी, राष्ट्रपति, जमात ए इस्लामी या विवादास्पद तारिक रहमान के नेतृत्व में नई ऊर्जा से लबरेज विपक्षी दल बीएनपी को हाथ सत्ता आएगी। संभव है कि इनमें से कुछ प्लेयर्स मिलजुलकर सत्ता पर काबिज हों।

स्थिति को नियंत्रण में लाया जा सकता है। हालांकि, इसमें कोई दो राय नहीं कि कानून व्यवस्था और बिगड़ सकती है और प्रमुख समूह नियंत्रण कर सकते हैं और कमजोर, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर हमले हो सकते हैं। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि बांग्लादेश में ऐसी सरकार न हो जो उसके हितों के लिए हानिकारक हो। इससे शरणार्थियों के बड़े पैमाने पर पलायन और पिछले 15 वर्षों में बहुत प्रयासों से स्थापित कनेक्टिविटी, व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों के उलट जाने से बचा जा सकेगा।

यह भी महत्वपूर्ण है कि बांग्लादेश की नई सरकार ऐसे तरीके से काम न करे जो भारत के हितों के लिए हानिकारक हो। भारत को ढाका में ऐसी सरकार को लेकर अपनी आशंकाएं हैं जिसमें जमात जैसे कट्टरपंथी तत्व शामिल हों। अतीत में हमने देखा है कि इससे हमारे सुरक्षा हितों को कैसे नुकसान पहुंचा है। जब एक नई सरकार बनेगी, तो भारत उस सरकार के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए जुड़ेगा। पिछले डेढ़ दशक में भारत ने बांग्लादेश के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने में निवेश किया है, जिसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं – जिसमें हमारे पूर्वोत्तर का विकास भी शामिल है। बांग्लादेश हमारी ‘पड़ोसी पहले’ नीति का एक प्रमुख स्तंभ रहा है और एक स्थिर, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश भारत के हित में है।

व्यापार और निवेश सहित आर्थिक संबंधों का विस्तार हुआ है; सड़क, रेल, वायु और जलमार्ग लिंक को बढ़ाया गया है; और, लोगों से लोगों तक और नागरिक समाज के संपर्क बढ़े हैं। सीधे शब्दों में कहें तो द्विपक्षीय संपर्क बिंदुओं की संख्या बढ़ी है और लगातार बढ़ रही है। इससे भारत और बांग्लादेश दोनों को लाभ होता है। भारत दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाएगा क्योंकि बांग्लादेश और वहां के लोगों को अपने लिए समाधान खुद खोजना होगा।

अब बांग्लादेश में डेढ़ करोड़ हिंदुओं का क्या होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब बांग्लादेश में डेढ़ करोड़ हिंदुओं का आखिर क्या होगा! बांग्लादेश में 48 साल बाद साल बाद फिर तख्ता पलट हो गया है। शेख हसीना फिर अपने ही वतन से बेदखल हो चुकी हैं। उन्हें छात्र आंदोलन की आड़ में अराजकता फैला रहे कट्टरपंथी तबकों के आगे झुकना पड़ा। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की सह पर विरोधी दलों ने छात्रों के कंधों पर बंदूक रखकर शेख हसीना सरकार को निशाना बनाया और वो अपने मकसद में सफल रहे। अब शेख हसीना भारत में हैं और बांग्लादेश अराजकता के आगोश में है। सेना ने बांग्लादेश की जनता से अपील की है कि वो किसी तरह की हिंसा और अराजकता से बचें। सैन्य प्रमुख ने ऐलान किया है कि बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा। हालांकि, इसका क्या तरीका होगा, इसका खुलासा अभी नहीं हुआ है। इन सारी घटनाओं के बीच भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है कि वहां 1.3 करोड़ के करीब हिंदुओं का क्या होगा? शेख हसीना पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के निशाने पर इसलिए रहीं कि उन्होंने बांग्लादेश में कट्टरपंथ पर लगाम लगाए रखा था। हसीना की सरकार में बांग्लादेश में उदारवादी विचारों को संरक्षण मिला था जिस कारण देश लगातार तरक्की की सीढ़ियां चढ़ता चला गया।अब जब शेख हसीना बांग्लादेश में नहीं हैं तो इस कट्टरपंथी तबके पर नियंत्रण ढीला पड़ने की आशंका है जिस कारण हिंदुओं पर आफत आ सकती है। वैसे भी आईएसआई बांग्लादेश में हिंदुओं को प्रताड़ित करने के पीछे अपना दम लगा देगा। एक मुस्लिम देश होते हुए भी महिलाओं को वर्कफोर्स का हिस्सा बनने की न केवल अनुमति दी गई बल्कि बढ़ावा दिया गया। इस्लाम का स्वघोषित ठेकेदार पाकिस्तान को दुनिया के किसी भी कोने में इस्लाम में उदारता से बहुत चिढ़ होती है। यही वजह है कि वह खुद वैश्विक आतंक का गढ़ तो है ही, उसने तरक्की करते बांग्लादेश को भी कट्टरता की आग में झोंकने की ठान ली।

यही वजह है कि सुरक्षा विशेषज्ञ शेष पॉल वैद ने ताजा घटनाक्रम के मद्देनजर बांग्लादेश के हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स के जरिए भारत सरकार से गुहार लगाई है कि वो बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वहां की सेना से बात करे। वैद ने लिखा कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने इस्तीफा देकर देश छोड़ दिया है। भारत सरकार को चाहिए कि वो बांग्लादेश में करीब 1 करोड़, 30 लाख हिंदुओं की सुरक्षा के लिए बांग्लादेशी आर्मी चीफ से बात करे क्योंकि वहां हिंदू दंगाइयों के निशाने पर हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर खतरे की एक बड़ी वजह यह भी है कि भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार है। पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, वहां का कट्टरपंथी तबका मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी मानता है और अपनी खीझ निकालने के लिए हिंदुओं को निशाना बनाता है। अब जब शेख हसीना बांग्लादेश में नहीं हैं तो इस कट्टरपंथी तबके पर नियंत्रण ढीला पड़ने की आशंका है जिस कारण हिंदुओं पर आफत आ सकती है। वैसे भी आईएसआई बांग्लादेश में हिंदुओं को प्रताड़ित करने के पीछे अपना दम लगा देगा।

शेख हसीना भारत समर्थक रही हैं। अब भी वो ढाका से निकलीं तो उन्होंने भारत का ही रुख किया। ऐसे में आईएसआई को बांग्लादेशी कट्टरपंथियों को हिंदुओं के खिलाफ उकसाना और भी आसान हो जाएगा। कुल मिलाकर देखें तो बांग्लादेश में हिंदुओं की जान आफत में है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। बता दें कि सेना ने बांग्लादेश की जनता से अपील की है कि वो किसी तरह की हिंसा और अराजकता से बचें। सैन्य प्रमुख ने ऐलान किया है कि बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा। हालांकि, इसका क्या तरीका होगा, इसका खुलासा अभी नहीं हुआ है। इन सारी घटनाओं के बीच भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है कि वहां 1.3 करोड़ के करीब हिंदुओं का क्या होगा? शेख हसीना पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के निशाने पर इसलिए रहीं कि उन्होंने बांग्लादेश में कट्टरपंथ पर लगाम लगाए रखा था।सुरक्षा विशेषज्ञ शेष पॉल वैद ने ताजा घटनाक्रम के मद्देनजर बांग्लादेश के हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। पाकिस्तान ने अपने यहां हिंदुओं की जो दुर्दशा की है, वो किसी से छिपी नहीं है। उसे बांग्लादेश में भी हिंदू विरोधी अभियान चलाने का मौका मिला है तो वह कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि भारत सरकार त्वरित कदम उठाते हुए बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

बांग्लादेशी हिंदुओं के बारे में क्या बोले बांग्लादेश के पूर्व चीफ जस्टिस?

हाल ही में बांग्लादेश के पूर्व चीफ जस्टिस ने बांग्लादेशी हिंदुओं के बारे में एक बयान दिया है! बांग्लादेश में हालात अब भी नाजुक हैं। हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद से ही बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं हैं, जिससे भारत समेत पूरी दुनिया में रहने वाले हिंदुओं की चिंता बढ़ गई है। बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेशी हिंदुओं को सुरक्षा का आश्वासन दिया है। बांग्लादेश के पहले पूर्व हिंदू चीफ जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा ने बांग्लादेश के मौजूदा हालातों और वहां हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को लेकर बातचीत की। बता दें कि सिन्हा को हसीना सरकार ने असंवैधानिक तरीके से हटा दिया था। कोई भी तानाशाह अनंत काल तक सत्ता में नहीं रह सकता। हसीना के शासनकाल में कई क्रूर घटनाएं हुई हैं। यहां तक कि उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश को भी पद से हटा दिया। यह उनके तानाशाह होने का सबसे बड़ा सबूत है। पिछले 53 सालों से बंगलादेश के राजनेता नाकाम साबित हुए हैं। लेकिन हाल ही में छात्रों के आंदोलन ने यह दिखा दिया है कि अगर नीयत साफ हो तो कुछ भी संभव है। अगर हसीना मुख्य न्यायाधीश को बाहर का रास्ता दिखा सकती हैं, तो उनके तानाशाह होने का और क्या सबूत चाहिए? हसीना का सत्ता से हटना मैं बंगलादेश की जनता की एक बड़ी उपलब्धि मानता हूं।

यूनुस हाल ही में ढाकेश्वरी गए थे। वहां उन्होंने हिंदू समुदाय के नेताओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाया। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि अल्पसंख्यक हमेशा से हसीना का साथ देते आए हैं। लेकिन हसीना उनकी रक्षा नहीं कर पाईं। दो साल पहले दुर्गा पूजा के दौरान कई मंदिरों और पंडालों में तोड़फोड़ की गई थी। लेकिन उनकी सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। किसी पर भी मामला दर्ज नहीं किया गया। दोषियों को सजा न मिलने की संस्कृति बांग्लादेश में लंबे समय से चली आ रही समस्या है। बांग्लादेश में तीन तरह के लोग अत्याचार करते हैं – कट्टरपंथी , मौका परस्त गुंडे और राजनीतिक रूप से प्रेरित लोग। ये लोग जो अराजकता फैलाना चाहते हैं। इसका खामियाजा हमेशा अल्पसंख्यकों को ही भुगतना पड़ता है। लेकिन हसीना उनकी रक्षा नहीं कर पाईं।

यह बात साफ है की धर्मनिरपेक्षता और राज्‍य धर्म एक साथ नहीं चल सकते। कानूनों को निष्पक्ष होना चाहिए। ‘वैस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट’ जैसे कानून नहीं होने चाहिए, जिसने हिंदू संपत्तियों को जब्त कर लिया। इसी तरह, हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के लिए अलग कानून नहीं होना चाहिए। किसी के लिए कोई छूट नहीं। अगर असली लोकतंत्र, कानून का राज और समानता कायम रहती है, तो हिंदू बांग्लादेश में सुरक्षित रहेंगे। सभी हिंदू भारत नहीं आ सकते।

बांग्लादेश की नींव कभी मजबूत नहीं रही, ये बात खुद वहां के हालात बताते हैं। कैसे शेख मुजीबुर रहमान ने खुद बांग्लादेश के शुरुआती लोकतंत्र को कमजोर किया। 1974 में वो पाकिस्तान में OIC की बैठक में शामिल हुए थे और उन्होंने एक दलीय व्यवस्था लागू करने की कोशिश भी की थी। उन्होंने ताजुद्दीन अहमद जैसे बड़े नेताओं को दरकिनार कर दिया था। 1991 तक बांग्लादेश में दो बार मार्शल लॉ लगा। 1996 में शेख हसीना की सरकार पहली बार सत्ता में आई थी और ये समय बांग्लादेश के लिए अच्छा माना जाता है। लेकिन 2009 में दोबारा सत्ता में आने के बाद से शेख हसीना की कार्यशैली अलग ही रही। बांग्लादेश का संविधान संसदीय प्रणाली की बात करता है लेकिन हसीना ने राष्ट्रपति शैली में देश चलाया। 2015 में बांग्लादेश की सर्वोच्च अदालत ने भारत के केशवानंद भारती मामले की तरह ही संविधान की बुनियादी संरचना को पवित्र बताते हुए कई फैसले दिए। लेकिन शेख हसीना ने संविधान में कई तरह के बदलाव लाकर व्यवस्था को और उलझा दिया।

हसीना ने भारत भागने का फैसला किया है। अगर दिल्ली में उन्हें रहने दिया जाता है तो भारत मुश्किल में पड़ सकता है। हसीना गंभीर अपराधों की दोषी हैं। उनके शासन ने 300 से ज्यादा छात्रों को मार डाला है। हसीना को वापस भेजना चाहिए। अगर भारत ने ऐसा नहीं किया तो भविष्य में भारत-बांग्लादेश संबंध खराब होंगे। बांग्लादेश में नए चीफ जस्टिस के चुनाव पर सवाल उठ रहे हैं। नए CJ काबिल हैं, लेकिन उन्हें चुनने का तरीका सही नहीं था। राष्ट्रपति को पहले CJ को इस्तीफा देने के लिए कहना चाहिए था। संविधान अभी भी काम कर रहा है। अगर इस तरह की गैरकानूनी चीजें जायज हैं, तो दूसरी गैरकानूनी चीजों को भी जायज ठहराना होगा। लेकिन बांग्लादेश में जरूरी मुद्दों को संविधान को नजरअंदाज करके हल किया जाता है।

क्या बांग्लादेश में फिर से आ सकता है हसीना परिवार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बांग्लादेश में फिर से हसीना परिवार आ सकता है या नहीं !बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने कहा है कि देश में अवामी लीग के कार्यकर्ताओं पर अत्याचार हो रहा है। ऐसे में उनका परिवार चुप नहीं बैठ सकता। वाजेद ने इस बयान को ये संकेत माना जा रहा है कि शेख हसीना या उनका परिवार बांग्लादेश की राजनीति में वापसी की योजना बना रहा है। इसके पहले वाजेद ने कहा था कि उनकी मां शेख हसीना या उनके परिवार का कोई भी सदस्य अब बांग्लादेश की राजनीति में नहीं लौटेगा।

एक वीडियो संदेश में वाजेद ने कहा, ‘मैंने कहा था कि मेरा परिवार फिर कभी राजनीति नहीं करेगा, लेकिन जब हमारे नेताओं और कार्यकर्ताओं को सताया जा रहा है तो हम चुप नहीं बैठ सकते।’ सजीब वाजेद ने इसके साथ ही बयान में बातचीत की भी पेशकश की। उन्होंने कहा, ‘इस समय देश की कमान जिस किसी के हाथ में है, मैं उससे कहना चाहता हूं कि हम भी आतंकवाद मुक्त बांग्लादेश चाहते हैं। इसके लिए हम किसी से भी बातचीत शुरू करने को तैयार हैं। बशर्ते वे आतंकवाद को छोड़ें।’ उन्होंने बांग्लादेश के हालात को अराजकता भरा बताया और अवामी लीग के नेताओं की हत्या की बात कही।

वॉशिंगटन में रह रहे पूर्व प्रधानमंत्री हसीना के बेटे ने कहा, ‘अवामी लीग सबसे बड़ी लोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी है। यह खत्म नहीं हुई है। अवामी लीग ने बांग्लादेश को आजाद कराया है। इसे मिटाना आसान नहीं होगा।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘अवामी लीग के बिना एक नया लोकतांत्रिक देश बनाना संभव नहीं है।’ उसके साथ ही उन्होंने अवामी लीग के नेताओं से अपील की।

‘मैं अवामी लीग के सभी नेताओं से आह्वान करता हूं कि वे मजबूती से खड़ें हों। यह बात जान लीजिए कि हम आपके साथ हैं। राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान, जिनके नेतृत्व में हमें एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आत्मसम्मान मिला, अपनी पहचान मिली और एक स्वतंत्र देश मिला, उनका अपमान किया गया है।’ उन्होंने लाखों शहीदों के खून का अपमान किया। मैं देशवासियों से न्याय चाहती हूं। मैं आपसे 15 अगस्त को राष्ट्रीय शोक दिवस को उचित गरिमा और गंभीरता के साथ मनाने की अपील करती हूं।शेख हसीना मरी नहीं हैं। हम बंगबंधु (शेख मुजीबुर रहमान) का परिवार हैं। हम कहीं नहीं गए हैं। हम देश और अवामी लीग को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।’

सोमवार को शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़कर जाने के कुछ घंटो बाद ही सजीब ने बीबीसी से कहा था कि वह अब राजनीति में वापसी नहीं करेंगी। इसके बाद कई अन्य इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि उनकी मां, न ही वह और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य राजनीति में प्रवेश करेगा। इस बीच गोपालगंग में अवामी लीग नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शेख हसीना को वापस लाने की कसम खाई। तुंगीपारा से मार्च करके अवामी लीग कार्यकर्ता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की समाधि पर पहुंचे, जहां गोपालगंज अवामी लीग के अध्यक्ष महबूब अली खान ने शपथ दिलाई।पिछले जुलाई से अब तक आंदोलन के नाम पर तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा में कई लोगों की जान जा चुकी है। छात्र, शिक्षक, पुलिस यहां तक कि महिला पुलिस, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, कामकाजी लोग, अवामी लीग के नेता और संबंद्ध संगठनों के कार्यकर्ता, पैदल यात्री और विभिन्न संस्थानों के कार्यकर्ता जो आतंकवादी हमले का शिकार होकर मारे गए हैं।

कार्यक्रम में अवामी लीग नेताओं ने कहा कि वे राजनीतिक रूप से लड़ेंगे और आंदोलन तब तक जारी रखेंगे, जब तक वे हसीना और उनकी बहन शेख रिहाना को देश वापस नहीं ले आते। बता दें कि बांग्लादेश की इस अपदस्थ प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, हम दो बहनों ने 15 अगस्त, 1975 को धनमंडी बंगबंधु भवन में हुई नृशंस हत्याओं की स्मृति रखने वाले उस घर को बंगाल के लोगों को समर्पित किया। एक स्मारक संग्रहालय बनाया गया था। देश के आम लोगों से लेकर देश-विदेश के गणमान्य लोग इस सदन में आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह संग्रहालय आजादी का स्मारक है। यह बहुत दुखद है कि जो स्मृति हमारे जीवित रहने का आधार थी, वह जलकर राख हो गयी है। हम आपकी सेवा कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य बांग्लादेश के पीड़ित लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाना है, अपने प्रियजनों के नुकसान की याद को अपने दिलों में बनाए रखना है। इसका शुभ फल भी आपको मिलना शुरू हो गया है। बांग्लादेश विश्व में विकासशील देश का दर्जा प्राप्त कर चुका है।” 

बांग्लादेश छोड़ने से पहले क्या बोली थी शेख हसीना ?

आज हम आपको बताएंगे कि बांग्लादेश छोड़ने से पहले शेख हसीना क्या बोली थी! शेख हसीना ने बांग्लादेश से भागने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से बयान दिया है। हसीना का यह बयान उनके खिलाफ बांग्लादेश में हत्या का मामला दर्ज करने के बाद आया है। इस बयान में उन्होंने बांग्लादेश में हुई हिंसा की उचित जांच करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि इस हिंसा के दोषियों को पहचान कर उन्हें उचित सजा दी जाए। उनके बयान को बेटे सजीब वाजेद जॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किया है। इस बयान में उन्होंने बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्तियों के अपमान और उनके निवास स्थान पर हुई आगजनी को लेकर भी अपना दुख जाहिर किया है। शेख हसीना ने अपने बयान की शुरुआत बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या से की। उन्होंने लिखा, “भाइयों और बहनों, 15 अगस्त 1975 को बांग्लादेश के राष्ट्रपति बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की निर्मम हत्या कर दी गई थी। मेरे मन में उनके प्रति गहरा सम्मान है। उस समय मेरी मां बेगम फजीलतुन्नैसा, मेरे तीन भाई स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन शेख कमाल, स्वतंत्रता सेनानी लेफ्टिनेंट शेख जमाल, कमाल और जमाल की नवविवाहित पत्नी सुल्ताना कमाल, मेरा छोटा भाई जो उस समय केवल 10 वर्ष का थ, उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।” अपने पत्र में उन्होंने इस दौरान मारे गए अन्य दूसरे लोगों के नाम भी लिखे और उन्हें श्रद्धांजलि दी। अपने प्रियजनों के नुकसान की याद को अपने दिलों में बनाए रखना है। इसका शुभ फल भी आपको मिलना शुरू हो गया है। बांग्लादेश विश्व में विकासशील देश का दर्जा प्राप्त कर चुका है।”उन्होंने लिखा, “15 अगस्त को शहीद हुए सभी लोगों की आत्मा को शांति मिले और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।”

हसीना ने आगे लिखा, “पिछले जुलाई से अब तक आंदोलन के नाम पर तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा में कई लोगों की जान जा चुकी है। छात्र, शिक्षक, पुलिस यहां तक कि महिला पुलिस, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, कामकाजी लोग, अवामी लीग के नेता और संबंद्ध संगठनों के कार्यकर्ता, पैदल यात्री और विभिन्न संस्थानों के कार्यकर्ता जो आतंकवादी हमले का शिकार होकर मारे गए हैं। इन सभी लोगों की मौत पर मैं शोक व्यक्त करती हूं और उनकी आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करती हूं।”बंगबंधु भवन पर पुष्प अर्पित कर और प्रार्थना कर सभी आत्माओं की मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। अल्लाह सर्वशक्तिमान बांग्लादेश के लोगों को आशीर्वाद दे। जॉय बांग्ला जॉय बंगबंधु।” उन्होंने आगे लिखा, “मेरे जैसे उन लोगों के प्रति मेरी संवेदनाएं हैं, जो किसी प्रियजन को खोने के दर्द के साथ जी रहे हैं। मैं मांग करता हूं कि इन हत्याओं और बर्बरता में शामिल लोगों की उचित जांच की जाए और दोषियों की पहचान कर उन्हें उचित सजा दी जाए।”

बांग्लादेश की इस अपदस्थ प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, हम दो बहनों ने 15 अगस्त, 1975 को धनमंडी बंगबंधु भवन में हुई नृशंस हत्याओं की स्मृति रखने वाले उस घर को बंगाल के लोगों को समर्पित किया। एक स्मारक संग्रहालय बनाया गया था। देश के आम लोगों से लेकर देश-विदेश के गणमान्य लोग इस सदन में आ चुके हैं। यह संग्रहालय आजादी का स्मारक है। यह बहुत दुखद है कि जो स्मृति हमारे जीवित रहने का आधार थी, वह जलकर राख हो गयी है। हम आपकी सेवा कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य बांग्लादेश के पीड़ित लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाना है, अपने प्रियजनों के नुकसान की याद को अपने दिलों में बनाए रखना है। इसका शुभ फल भी आपको मिलना शुरू हो गया है। बांग्लादेश विश्व में विकासशील देश का दर्जा प्राप्त कर चुका है।”

हसीना ने यह भी कहा, “राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान, जिनके नेतृत्व में हमें एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आत्मसम्मान मिला, अपनी पहचान मिली और एक स्वतंत्र देश मिला, उनका अपमान किया गया है।’ उन्होंने लाखों शहीदों के खून का अपमान किया। बता दें कि उस समय मेरी मां बेगम फजीलतुन्नैसा, मेरे तीन भाई स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन शेख कमाल, स्वतंत्रता सेनानी लेफ्टिनेंट शेख जमाल, कमाल और जमाल की नवविवाहित पत्नी सुल्ताना कमाल, मेरा छोटा भाई जो उस समय केवल 10 वर्ष का थ, उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।” मैं देशवासियों से न्याय चाहती हूं। मैं आपसे 15 अगस्त को राष्ट्रीय शोक दिवस को उचित गरिमा और गंभीरता के साथ मनाने की अपील करती हूं। बंगबंधु भवन पर पुष्प अर्पित कर और प्रार्थना कर सभी आत्माओं की मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। अल्लाह सर्वशक्तिमान बांग्लादेश के लोगों को आशीर्वाद दे। जॉय बांग्ला जॉय बंगबंधु।”

संसद में वक्फ बिल के लिए अब क्या हो रहा है नया?

आज हम आपको बताएंगे कि वक्फ बिल के लिए संसद में अब क्या नया हो रहा है! बीजेपी के वरिष्ठ लोकसभा सांसद जगदंबिका पाल वक्फ (संशोधन) विधेयक पर विचार करने के लिए बनाई गई 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष होंगे। लोकसभा सचिवालय की तरफ से जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जगदंबिका पाल को 31 सदस्यों की समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इस विधेयक के प्रावधानों पर लोकसभा में विपक्ष ने जोरदार विरोध किया था। जिसके बाद सरकार ने इसे दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेजने का फैसला किया था। 31 सदस्यों वाली इस संयुक्त समिति में लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सांसद सदस्य होंगे।

अगले सत्र तक यह समिति अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। इस मामले में लोकसभा और राज्यसभा ने शुक्रवार को केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा पेश एक प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। जिसमें समिति का हिस्सा बनने के लिए सदस्यों को नामित किया गया था। समिति में लोकसभा के 21 सदस्यों में बीजेपी से आठ और कांग्रेस के तीन सांसद शामिल हैं।

जबकि राज्यसभा से समिति में बीजेपी से चार और एक-एक सदस्य कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कषगम, वाईएसआर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के हैं। एक मनोनीत सदस्य को भी समिति का हिस्सा बनाया गया है। लोकसभा सदस्यों में बीजेपी से जगदंबिका पाल, निशिकांत दुबे, तेजस्वी सूर्या, अपराजिता सारंगी, संजय जायसवाल, दिलीप सैकिया, अभिजीत गंगोपाध्याय और डीके अरूणा को इसका हिस्सा बनाया गया है। जबकि कांग्रेस से गौरव गोगोई, इमरान मसूद और मोहम्मद जावेद इसके सदस्य हैं। समाजवादी पार्टी से मौलाना मोहिबुल्ला नदवी, तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी, द्रमुक के ए राजा, टीडीपी से लावू श्री कृष्णा और एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी भी इसके सदस्य हैं।

केंद्र सरकार ने वक्फ संशोधन अधिनियम बिल 2024 के लिए आज जेपीसी के सदस्यों के नाम का ऐलान कर दिया। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कुल 31 सदस्यों के नाम का ऐलान किया। गुरुवार को लोकसभा में बहस के बाद बिल को जेपीसी को भेजने का फैसला किया गया था। लोकसभा के 21 सदस्यों के अलावा राज्यसभा के भी 10 सदस्यों के नाम जेपीसी में शामिल किए गए हैं।

रिजिजू ने राज्यसभा से 10 नामों की संस्तुति करने का आग्रह किया है। आज राज्यसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने से पहले राज्यसभा के 10 सदस्यों के नाम भी घोषित कर दिए गएहैं। जेपीसी का कोरम कुल सदस्यों का एक तिहाई माना जाएगा। कमिटी इस बारे में अपनी रिपोर्ट अगले सत्र के आखिरी सप्ताह में सदन को सौंपेगी। बता दें कि संसद में एक नया विधेयक लाया गया है जो 1995 के वक्फ कानून में बदलाव करेगा। इसका मकसद वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता लाना और महिलाओं को इन बोर्ड में शामिल करना है। सरकार के अनुसार मुस्लिम समुदाय के भीतर से उठ रही मांगों को देखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। हाल ही में कैबिनेट की ओर से समीक्षा किए गए इस विधेयक का उद्देश्य मौजूदा वक्फ अधिनियम के कई खंडों को रद्द करना है। ये रद्दीकरण मुख्य रूप से वक्फ बोर्डों के मनमाने अधिकार को कम करने के उद्देश्य से हैं, जो वर्तमान में उन्हें अनिवार्य सत्यापन के बिना किसी भी संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में दावा करने की अनुमति देता है। 

वक्फ इस्लामी कानून के तहत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए विशेष रूप से समर्पित संपत्तियों को संभालने का काम करता है। एक बार वक्फ के रूप में नामित होने के बाद संपत्ति दान करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को ट्रांसफर हो जाती है और यह अपरिवर्तनीय होती है। इन संपत्तियों का प्रबंधन वक्फ या सक्षम प्राधिकारी की ओर से नियुक्त मुतव्वली द्वारा किया जाता है।रेलवे और रक्षा विभाग के बाद वक्फ बोर्ड कथित तौर पर भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूमि धारक है। वक्फ बोर्ड भारत भर में 9.4 लाख एकड़ में फैली 8.7 लाख संपत्तियों को नियंत्रित करते हैं, जिनकी अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपये है। उत्तर प्रदेश और बिहार में दो शिया वक्फ बोर्ड सहित 32 वक्फ बोर्ड हैं। राज्य वक्फ बोर्ड का नियंत्रण लगभग 200 व्यक्तियों के हाथों में है।यह बिल मौजूदा वक्फ कानून में लगभग 40 बदलावों का प्रस्ताव रखता है। इसके तहत वक्फ बोर्डों को सभी संपत्ति दावों के लिए अनिवार्य सत्यापन से गुजरना होगा, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।

इसका उद्देश्य वक्फ बोर्डों की संरचना और कामकाज को बदलने के लिए धारा 9 और 14 में संशोधन करना है, जिसमें महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व को शामिल किया गया है।इसके अलावा, विवादों को निपटाने के लिए वक्फ बोर्डों द्वारा दावा की गई संपत्तियों का नया सत्यापन किया जाएगा और दुरुपयोग को रोकने के लिए, जिला मजिस्ट्रेट वक्फ संपत्तियों की निगरानी में शामिल हो सकते हैं।यह कानून वक्फ बोर्डों की मनमानी शक्तियों को लेकर व्यापक चिंताओं के कारण लाया जा रहा है। उदाहरण के लिए, सितंबर 2022 में, तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने मुख्य रूप से हिंदू बहुल तिरुचेंदुरई गांव पर अपना दावा जताया था।

जब जोधपुर में ट्यूब पर सवार हुई पुलिस!

हाल ही में जोधपुर में वहां की पुलिस बाढ़ में ट्यूब पर सवार होती हुई नजर आई! लोहावट और आसपास के इलाकों में रविवार रात से हो रही लगातार बारिश ने मंगलवार सुबह तक तबाही मचाई रखी। कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात बन गए हैं, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। विशेषकर लोहावट कस्बा और आसपास के गांवों में स्थिति गंभीर बनी हुई है, कई ढाणियां पानी में डूब गई हैं और विशनावास और जाटावास कस्बों के बीच संपर्क टूट गया है। पानी भरने के कारण स्थानीय लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा है। सियागों की ढाणी के लिखमाराम सियाग ने बताया कि उन्हें मंगलवार को अपने पशुओं को पांच फीट पानी से बाहर निकालना पड़ा।लोहावट कस्बे में मुख्य बाजार की कई गलियां, बिश्नोई धर्मशाला रोड, सालासर हॉस्पिटल से पुलिया रोड, अस्पताल रोड, पोस्ट ऑफिस, पुलिस थाना, सीनियर स्कूल विशनावास और संगीत कॉलोनी में चार से पांच फीट तक पानी भर गया है। बता दें कि मोरिया गांव में एक गड्ढे में डूबने से 14 वर्षीय शाहरुख की मौत हो गई। उपखंड प्रशासन ने दोपहर को पानी निकालने के लिए JCB मशीन लगाई। लगातार चार दिनों से हो रही बारिश के कारण लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। स्थिति को देखते हुए मंगलवार को ग्रामीणों ने सालासर हॉस्पिटल के आगे सड़क पर पत्थर रखकर रास्ता बंद कर दिया ताकि कोई भी अनजान वाहन चालक पानी में न फंस जाए।

पुलिस थाने में भी बाढ़ जैसे हालात हैं। पुलिस कर्मियों को आने-जाने के लिए ट्यूब पर लकड़ी और लोहे के पाटे रखकर नाव जैसा इंतजाम करना पड़ा। क्वार्टर और थाना भवन में आने-जाने के लिए भी ट्यूब का सहारा लेना पड़ रहा है। थाने के कमरों में पानी रोकने के लिए रेत के कट्टे भरे गए हैं। बारिश के कारण 150 से अधिक ढाणियों के ढहने की खबर है और एक व्यक्ति की मौत हो गई है।

मौसम विभाग के अनुसार यहां 24 घंटों में 132 MM बारिश दर्ज की गई है, जबकि रविवार से अब तक कुल 196 MM बारिश हो चुकी है। कई इलाकों में बिजली गुल है। बारिश के कारण जाटाबास स्कूल की 100 फीट दीवार ढह गई है। सदरी में आंगनबाड़ी केंद्र और ढेलाणा में 20 से अधिक मकान ढह गए हैं। विश्नोईया बास, संगीत कॉलोनी, सदरी, राजाला, ढेलाणा, जम्भेश्वर नगर, विष्णुनगर, जाटाबास, पश्चिमी ढाणी, चिकनी नाडी गांवों में भी कई कच्चे-पक्के मकान ढह गए हैं और कई मवेशियों की मौत हो गई है। रेलवे लाइन किमी संख्या 109 हेमजी ढाणी के आगे भाखर के पास निर्माणाधीन रेलवे अंडरपास के पास रात को मिट्टी बहने से ट्रैक क्षतिग्रस्त हो गया, जिसे सुबह रेत डालकर ठीक किया गया। मोरिया गांव में एक गड्ढे में डूबने से 14 वर्षीय शाहरुख की मौत हो गई। उपखंड प्रशासन ने दोपहर को पानी निकालने के लिए JCB मशीन लगाई। लगातार चार दिनों से हो रही बारिश के कारण लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

शुक्रवार रात को हुई बारिश का पानी मंगलवार को खाबड़ा खुर्द से होते हुए चेराई महादेवनगर, पांचला खुर्द और चण्डालिया क्षेत्र तक पहुंच गया, जिससे इन इलाकों में भी पानी भर गया है। पानी भरने के कारण स्थानीय लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा है। सियागों की ढाणी के लिखमाराम सियाग ने बताया कि उन्हें मंगलवार को अपने पशुओं को पांच फीट पानी से बाहर निकालना पड़ा।

बाढ़ के हालात देखते हुए मंगलवार सुबह तहसीलदार और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने इलाके का दौरा किया। बता दें कि लोहावट कस्बे में मुख्य बाजार की कई गलियां, बिश्नोई धर्मशाला रोड, सालासर हॉस्पिटल से पुलिया रोड, अस्पताल रोड, पोस्ट ऑफिस, पुलिस थाना, सीनियर स्कूल विशनावास और संगीत कॉलोनी में चार से पांच फीट तक पानी भर गया है। तिंवरी तहसीलदार सुरजपालसिंह, विकास अधिकारी संपत गोदारा, पुलिस वृत्ताधिकारी मदन रॉयल के साथ सरपंच भी रहे। पुलिस थाने में भी बाढ़ जैसे हालात हैं। पुलिस कर्मियों को आने-जाने के लिए ट्यूब पर लकड़ी और लोहे के पाटे रखकर नाव जैसा इंतजाम करना पड़ा। मौसम विभाग के अनुसार यहां 24 घंटों में 132 MM बारिश दर्ज की गई है, जबकि रविवार से अब तक कुल 196 MM बारिश हो चुकी है। कई इलाकों में बिजली गुल है।क्वार्टर और थाना भवन में आने-जाने के लिए भी ट्यूब का सहारा लेना पड़ रहा है।महादेवनगर सरपंच करनाराम मेहरड़ा, पांचला खुर्द सरपंच प्रतिनिधि ओमप्रकाश जाणी ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया और लोगों की मदद के साथ-साथ पानी निकासी के प्रयास किए।

आखिर आसाराम और राम रहीम की जमानत में क्या अंतर है ?

आज हम आपको बताएंगे कि आसाराम और राम रहीम की जमारत में आखिर क्या अंतर है! यौन उत्पीड़न मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट ने आसाराम को इलाज के लिए 7 दिन की पैरोल मंजूर की है। ऐसे में 11 साल में यह पहली बार होगा जब आसाराम जेल से बाहर आएगा। उसे इलाज के लिए महाराष्ट्र ले जाया जाएगा। इससे पहले डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम को 21 दिन की फरलो मंजूर हो गई। अपने आश्रम में दो महिलाओं के साथ रेप मामले में दोषी राम रहीम को 20 साल की सजा मिली हुई है। फरलो के बाद वह भी जेल से बाहर आ सकेगा। ऐसे में जानते हैं कि आखिर यह पैरोल और फरलो क्या होता है। दरअसल पैरोल और फर्लो वर्ष 1894 के कारागार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं।पैरोल कैदी के जेल से आने की एक व्यवस्था है। इसमें कैदी की सशर्त रिहाई होती है। यह आमतौर पर कैदी के व्यवहार पर निर्भर करती है। पैरोल कैदी का अधिकार नहीं है। यह कैदी को विशेष परिस्थितियों में दिया है। इसमें इलाज, परिवार या सगे संबधियों की शादी या मौत जैसी वजह शामिल है।तबीयत बिगड़ने पर उसे जोधपुर के एम्स में भर्ती कराया गया था। इसके बाद अब आसाराम ने फिर से पैरोल के लिए अर्जी दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया । कोर्ट ने आसाराम को इलाज के लिए 7 दिन की पैरोल दे दी गई। यदि सक्षम प्राधिकारी यह मानता है कि कैदी के बाहर आना समाज के हित में नहीं होगा तो उसे पैरोल नहीं दी जाती है। पैरोल भी दो तरह की होती है-कस्टडी पैरोल और दूसरा नियमित पैरोल। कस्टडी पैरोल में कैदी कस्टडी में ही बाहर आता है। यदि किसी से मिलना है तो भी वह पुलिस की मौजूदगी में ही मिलेगा। वहीं, रेगुलर पैरोल में वह स्वतंत्र रूप से घूम फिर सकता है।

फरलो भी सजा के दौरान छुट्टी की एक व्यवस्था है। यह आमतौर पर सजायाफ्ता कैदियों के लिए होती है। फरलो कैदी का अधिकार होता है। यह उसे समय-समय पर दिया जाता है। यह लंबी अवधि के कारावास के मामलों में दिया जाता है। कभी-कभी यह बिना किसी कारण के कैदी को अपने परिवार के साथ संपर्क बनाए रखने के साथ ही सजा के नाकारात्मक परिणाम कम करने के लिए भी दिया जाता है। हालांकि, अगर जेल अधिकारी को लगता है कि कैदी का बाहर आना शांति के लिए खतरा है तो उसे फरलो नहीं दी जाती है। फरलो जेल सुपरिटेंडेंट की राय के आधार पर ही दिया जाता है। फरलो साल में 14 दिन के लिए हो सकता है। हालांकि, इसे बढ़ाया भी जा सकता है।

 बता दे कि आसाराम पहले भी जोधपुर के एक निजी आयुर्वेदिक अस्पताल में इलाज करवा चुका हैं। यहां उसे पुलिस सुरक्षा में रखा गया था। इस दौरान उसका इलाज पुणे के डॉक्टरों की देखरेख में करवाया गया था। बाद में तबीयत बिगड़ने पर उसे जोधपुर के एम्स में भर्ती कराया गया था। इसके बाद अब आसाराम ने फिर से पैरोल के लिए अर्जी दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया । कोर्ट ने आसाराम को इलाज के लिए 7 दिन की पैरोल दे दी गई।

आसाराम इससे पहले भी अपनी बीमारी का हवाला देकर पैरोल मांग चुके हैं, लेकिन उसकी मांग पूरी नहीं हो सकी थी। 20 जून को, आसाराम ने 20 दिन की पैरोल के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन पैरोल कमेटी ने इसे मंजूर नहीं किया था। बता दें कि 85 वर्षीय आसाराम 2013 से जोधपुर जेल में बंद हैं। बता दें कि पैरोल और फर्लो वर्ष 1894 के कारागार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं।पैरोल कैदी के जेल से आने की एक व्यवस्था है। इसमें कैदी की सशर्त रिहाई होती है। यह आमतौर पर कैदी के व्यवहार पर निर्भर करती है। पैरोल कैदी का अधिकार नहीं है। यह कैदी को विशेष परिस्थितियों में दिया है। फरलो भी सजा के दौरान छुट्टी की एक व्यवस्था है। यह आमतौर पर सजायाफ्ता कैदियों के लिए होती है। फरलो कैदी का अधिकार होता है। यह उसे समय-समय पर दिया जाता है।जोधपुर पुलिस ने आसाराम को 2013 में इंदौर से गिरफ्तार किया था। उस पर अपने आश्रम में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने का आरोप था। पांच साल तक चले मुकदमे के बाद, 25 अप्रैल 2018 को अदालत ने आसाराम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।