Monday, March 16, 2026
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क्या 2009 में भी था शेख हसीना को खतरा ?

2009 में भी शेख हसीना को खतरा था! बता दे कि 26 फरवरी, 2009 की शाम। भारत के पैराशूट रेजिमेंट की छठी बटालियन के मेजर कमलदीप सिंह संधू को एक आपातकालीन कोड मिला। यह कोड वही था जो किसी भी आपात स्थिति में सेना की त्वरित तैनाती के लिए भेजा जाता है। इस बार, यह कोड बांग्लादेश के लिए था। बांग्लादेश में उस समय एक गंभीर संकट चल रहा था। देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को अपनी ही सेना के एक हिस्से, बीडीआर (बांग्लादेश राइफल्स) के विद्रोह का सामना करना पड़ रहा था। बीडीआर के जवानों ने अपने ही अधिकारियों और उनके परिवारों पर हमला कर दिया था। हसीना की सरकार का सेना से भरोसा डिग गया। उन्होंने भारत से मदद मांगी। आज 15 वर्ष बाद शेख हसीना फिर भारत की मदद से ही बांग्लादेश से सुरक्षित निकल सकीं। 2009 में हसीना की गुहार पर भारत ने तुरंत कार्रवाई की थी। 1,000 से ज्यादा भारतीय पैराशूट सैनिकों को पश्चिम बंगाल के कालाकुंडा एयर फोर्स स्टेशन पर भेजा गया। भारत के तत्कालीन विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और चीन के राजनयिकों से संपर्क किया और उनसे हसीना को समर्थन देने की अपील की। दूसरी तरफ, भारत ने बांग्लादेश में सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी कर ली थी। भारतीय सैनिकों को जोरहट और अगरतला से भी बुलाया गया था। योजना थी कि भारतीय सैनिक बांग्लादेश में तीनों तरफ से प्रवेश करेंगे और ढाका के जिया इंटरनैशनल एयरपोर्ट (जिसे बाद में हजरत शाह जलाल इंटरनैशनल एयरपोर्ट नाम दिया गया) और तेजगांव एयरपोर्ट पर कब्जा कर लेंगे। इसके बाद, वे प्रधानमंत्री के आवास गणभवन पर कब्जा करेंगे और हसीना को सुरक्षित स्थान पर ले जाएंगे।

भारतीय सेना के कमांडर ने अपने सैनिकों को गोला-बारूद बांटना शुरू कर दिया था, जो युद्ध के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। यह एक असामान्य कदम था, जो इस बात का संकेत था कि स्थिति कितनी गंभीर है। भारतीय सेना को यह चिंता थी कि पता नहीं बांग्लादेशी सेना की क्या प्रतिक्रिया होगी। अगर बांग्लादेशी जनरल हसीना के खिलाफ हो जाते, तो वे भारतीय सैनिकों का विरोध करते। भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने कहा कि भारत ने अपनी सेना को अलर्ट पर रखा था और हसीना की सुरक्षा के बारे में चिंतित था। लेकिन, भारत ने बांग्लादेश में हस्तक्षेप नहीं किया। ढाका में बीडीआर के विद्रोहियों ने अपने डीजी और उनकी पत्नी की हत्या कर दी थी। बांग्लादेशी सेना के प्रमुख जनरल मोइनुद्दीन अहमद पर विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव था। लेकिन, अगर वह ऐसा करते तो इससे और भी हिंसा हो सकती थी और हसीना की जान को खतरा हो सकता था। भारत ने बांग्लादेशी सेना को बल प्रयोग रोकने की चेतावनी दी थी।

बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश सचिव तौहीद हुसैन के मुताबिक, बांग्लादेश को साफ बता दिया गया था कि अगर सेना बल प्रयोग करेगी तो भारतीय पैराशूट सैनिक एक घंटे के भीतर ढाका में उतर जाएंगे। भारत ने सिर्फ चेतावनी नहीं दी थी बल्कि इसे अमल में लाने के लिए पूरी तरह तैयार था। लेकिन, आखिरकार भारत ने हस्तक्षेप नहीं किया। हुसैन ने कहा, ‘मुझे बताया गया कि बांग्लादेशी सैन्य प्रमुख से साफ-साफ कह दिया गया है कि वो बल प्रयोग नहीं करें वरना भारतीय पैराट्रूपर्स ढाका कूच करने को तैयार हैं।’ भारत के एक शीर्ष अधिकारी ने हुसैन के दावों का समर्थन किया। उन्होंने कहा, ‘भारत भभकी नहीं दे रहा था बल्कि पूरी तैयारी थी कि अगर हालात काबू से बाहर हुए तो बांग्लादेश पर चढ़ाई कर दी जाएगी।’

अब सवाल है कि आखिर भारत ने अपने कदम वापस क्यों खींच लिए? यह सवाल आज भी कई लोगों के मन में है। इस घटना के बारे में कई तरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन सच्चाई क्या है? अविनाश पालीवाल ने अपनी पुस्तक ‘इंडियाज नीयर ईस्ट: ए न्यू हिस्ट्री’ में इस घटना का विस्तार से उल्लेख किया है। उन्होंने बांग्लादेश में सैन्य विद्रोह के पीछे के कारणों और भारत की भूमिका का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि भारत ने बांग्लादेश में सैन्य हस्तक्षेप करने का फैसला इसलिए नहीं किया क्योंकि इससे बांग्लादेश की संप्रभुता को ठेस पहुंच सकती थी और भारत की छवि को नुकसान हो सकता था। दूसरी तरफ, पाकिस्तान को बांग्लादेश में भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने का मौका मिल जाता।

वैसे तो भारत के हस्तक्षेप ने बांग्लादेश के इतिहास को बदल दिया होता, लेकिन ऐसा नहीं करने का भी एक बड़ा प्रभाव पड़ा। भारत ने हसीना को बचाने के लिए बल प्रयोग करने की धमकी देकर बांग्लादेशी सेना को इतना कमजोर कर दिया कि हसीना अपने विरोधियों का सामना करने के लिए स्वतंत्र हो गईं। भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कई प्रयास किए थे, लेकिन वहां हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और पूर्वोत्तर भारत में विद्रोहियों को समर्थन देने के मामले में बांग्लादेश ने भारत की चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया। भारत ने बांग्लादेश में हस्तक्षेप न करके एक बड़ा जोखिम उठाया था, लेकिन इसने हसीना को सत्ता में मजबूत होने में मदद की। 15 वर्ष पूर्व का वह वाकया भारत और बांग्लादेश के संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

दिल्ली में स्थित बांग्लादेशी स्टूडेंट क्या कह रहे हैं?

आज हम आपको बताएंगे कि दिल्ली में स्थित बांग्लादेशी स्टूडेंट आखिर क्या कह रहे हैं! बांग्लादेश में भारी विरोध प्रदर्शन और हिंसा के बीच नई अंतरिम सरकार का गठन हो गया है। लेकिन अभी भी बांग्लादेश के हालात ठीक नहीं हुए हैं। अलग-अलग जगहों से हिंसा की खबरें आ रही हैं। जिसका असर अब दिल्ली में पढ़ रहे बांग्लादेशी छात्रों पर भी पड़ने लगा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU), जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU), जामिया मिलिया इस्लामिया और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी जैसे बड़े-बड़े संस्थानों में पढ़ने का सपना लिए हर साल ढेर सारे बांग्लादेशी छात्र दिल्ली आते हैं। लेकिन इस बार अपने देश में हो रहे उथल-पुथल की वजह से ये छात्र दोराहे पर फंस गए हैं। एक तरफ उन्हें भारत में सुरक्षित महसूस होता है, तो दूसरी तरफ अपने परिवार की चिंता उन्हें खाए जा रही है। कुछ छात्रों के ऊपर आर्थिक बोझ भी अचानक से बढ़ गया है, खासकर उन पर जो स्कॉलरशिप पर नहीं हैं। उनके परिवारों के लिए पैसे भेजना मुश्किल हो गया है। अबू ओबैदा अरीन ने कहा, ‘घर में हालात ठीक नहीं हैं, इसलिए सफर के दौरान भी मैं हर मिनट अपनी सुरक्षा और अपने देश में हो रही अशांति के बारे में सोचता रहा।’ अरीन पिछले साल बांग्लादेश के सतखीरा जिले से DU से सूचना प्रौद्योगिकी में बीटेक की डिग्री लेने भारत आए थे। उन्हें आमतौर प्लेन से दिल्ली पहुंचने में लगभग तीन घंटे लगते हैं, लेकिन पिछले शुक्रवार को वे ढाका से कोलकाता के लिए सड़क मार्ग से यात्रा करके राजधानी पहुंचे। इस पूरी यात्रा में उन्हें 26 घंटे लगे।

उन्होंने आगे कहा, ‘जब 1 अगस्त को यूनिवर्सिटी खुली, तो मेरे माता-पिता मुझे वापस भेजने से डर रहे थे, लेकिन क्योंकि दिल्ली में चीजें बेहतर हैं, इसलिए उन्होंने मुझे अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी।’ लेकिन अरीन उन छात्रों में से हैं जो बिना किसी छात्रवृत्ति के शहर में पढ़ाई कर रहे हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे पिता एक प्रिंटिंग प्रेस चलाते हैं लेकिन मौजूदा राजनीतिक संकट के कारण प्रेस को बंद करना पड़ा और मेरे परिवार को अब आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। मुझे उमीद है कि यूनिवर्सिटी से कुछ मदद मिल सकती है।’

22 वर्षीय बैभव मजूमदार, दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) में कानून की पढ़ाई करने के लिए चांदपुर से आए थे और जब से उनके बांग्लादेश में अशांति शुरू हुई है, वे दिल्ली में ही हैं। उन्होंने कहा, ‘जब से उथल-पुथल शुरू हुई है, मैं अपने परिवार को लेकर परेशान हूं। मेरे गांव के आसपास हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें आ रही हैं, जिससे मैं चिंतित हूं। मेरे माता-पिता अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर चले गए हैं।’ मजूमदार अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर भी चिंतित हैं। उन्होंने बताया, ‘NLU में एक विदेशी छात्र के लिए फीस काफी अधिक है और अगर बांग्लादेश में आर्थिक स्थिरता नहीं है, तो मेरे परिवार के लिए मेरे खर्चों को वहन करना मुश्किल होगा।’

20 वर्षीय कशिश अग्रवाल भी कई दिनों तक चिंतित रहीं, क्योंकि खराब इंटरनेट कनेक्शन के कारण वह अपने परिवार से बात नहीं कर पा रही थीं। वह अपने स्कूल के दिनों से ही दिल्ली में पढ़ाई कर रही हैं, लेकिन इतने समय में उन्हें अपने परिवार को लेकर कभी कोई घबराहट नहीं हुई जितनी अब हो रही है। NLU में कानून की तीसरे वर्ष की छात्रा ने कहा कि शुक्र है कि अब वह अपने माता-पिता से बात कर पा रही हैं। लेकिन बांग्लादेश में बैंकिंग और अन्य व्यावसायिक सेवाओं के बंद होने से वह कॉलेज फीस का भुगतान नहीं कर पा रही हैं।बता दें कि अरीन पिछले साल बांग्लादेश के सतखीरा जिले से DU से सूचना प्रौद्योगिकी में बीटेक की डिग्री लेने भारत आए थे। उन्हें आमतौर प्लेन से दिल्ली पहुंचने में लगभग तीन घंटे लगते हैं, लेकिन पिछले शुक्रवार को वे ढाका से कोलकाता के लिए सड़क मार्ग से यात्रा करके राजधानी पहुंचे। इस पूरी यात्रा में उन्हें 26 घंटे लगे। जब से उथल-पुथल शुरू हुई है, मैं अपने परिवार को लेकर परेशान हूं। मेरे गांव के आसपास हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें आ रही हैं, जिससे मैं चिंतित हूं। मेरे माता-पिता अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर चले गए हैं।’अग्रवाल ने कहा, ‘मैंने इस बारे में कॉलेज से बात की है और उन्हें बताया है कि फीस में देरी बांग्लादेश में हो रही हिंसा के कारण हुई है और मैं आभारी हूं कि वे मेरी स्थिति को समझ गए। बांग्लादेशी छात्र बहुत तनाव में हैं।’

आने वाले समय में आखिर कैसा रहेगा देश का मौसम?

आज हम आपको बताएंगे कि आने वाले समय में देश का मौसम कैसा रहेगा! दिल्ली-NCR ही नहीं पहाड़ी इलाकों में भी इस बार वीकेंड की शुरुआत बारिश के साथ हुई। राजधानी के सुबह हल्की बारिश के बाद कई इलाकों में दोपहर होते-होते आसमान में काले बादल छा गए और फिर झमाझम बरसने लगे। दिल्ली-यूपी समेत उत्तर भारत में हो रही बारिश से तापमान में गिरावट आई है। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दो दिनों में देशभर के अधिकांश हिस्सों में गरज के साथ बारिश हो सकती है। IMD ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पूर्वी हिस्से, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा में भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। आइए जानते हैं कल कैसा रहेगा देशभर का मौसम? राजधानी में बीते दो-तीन दिनों से पड़ रही बारिश की वजह से उमस की छुट्टी हो गई है। आज वीकेंड की शुरुआत भी दिल्ली में बारिश के साथ हुई। वहीं मौसम विभाग के अनुसार कल यानी रविवार को राजधानी कूल-कूल रहने वाला है और कुछ इलाकों में गरज के साथ बारिश हो सकती है। बारिश की वजह से दिल्ली के तापमान में भी कमी आई है। कल राजधानी का अधिकतम तापमान 32 डिग्री और न्यूनतम तापमान 26 डिग्री रहने की संभावना है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार दिल्लीवासियों के लिए ये रविवार बारिश के साथ गुजरने वाला है।

हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में भारी बारिश, भूस्खलन और बाढ़ के कारण राज्य में 128 सड़कें बंद हो गई हैं। पल-पल बदल रहे मौसम को देखते हुए मौसम विभाग ने राज्य में 16 अगस्त तक भारी बारिश का येलो अलर्ट जारी किया है। शुक्रवार शाम से नाहन (सिरमौर) में सबसे अधिक 168.3 मिमी बारिश दर्ज की गई, इसके बाद संधोल में 106.4 मिमी, नगरोटा सूरियां में 93.2 मिमी, धौलाकुआं में 67 मिमी, जुब्बरहट्टी में 53.2 मिमी और कण्डाघाट में 45.6 मिमी बारिश हुई।मौसम विभाग ने रविवार सुबह तक मंडी, सिरमौर, शिमला और कुल्लू जिले के अलग-अलग हिस्सों में हल्के से मध्यम स्तर की बाढ़ का खतरा होने की चेतावनी भी दी है।

मॉनसून के एक बार फिर से एक्टिव होने की वजह से देशभर के अधिकांश हिस्सों में बारिश हो रही है। मौसम विभाग ने आने वाले चार दिनों के लिए अलग-अलग राज्यों में बारिश का पूर्वानुमान जारी किया है। IMD के अनुसार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में 14 अगस्त तक भारी बारिश की संभावना है। वहीं जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश 10, 11 अगस्त को मध्यम से भारी बारिश हो सकती है। पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ में 14 अगस्त तक मौसम विभाग ने भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। वहीं पहाड़ों पर भी 14 अगस्त तक बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।

दिल्ली में अगले कुछ दिनों तक मौसम विभाग ने रिमझिम बारिश की संभावना जताई है। IMD ने रविवार तक के लिए मौसम की भविष्यवाणी जारी कर दी है। जिसके अनुसार शुक्रवार यानी आज राजधानी में बारिश का अलर्ट है। जबकि शनिवार और रविवार को मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार तीनों दिन आसमान में बादल छाए रहेंगे जो कुछ जगहों पर बरस भी सकते हैं। आज दिल्ली का अधिकतम तापमान 34 डिग्री और न्यूनतम तापमान 26 डिग्री रहने की संभावना है।

उत्तर प्रदेश में भी मॉनसून काफी मेहरबान होता दिख रहा है। गुरुवार को अयोध्या में 34.4 मिमी, सुल्तानपुर में 33 मिमी, शाहजहांपुर में 31 मिमी, लखनऊ में 15 मिमी, वाराणसी में 7 मिमी, बाराबंकी में 6 मिमी बारिश हुई। मौसम विभाग की मानें तो आज भी उत्तर प्रदेश में काफी जिलों में झमाझम बारिश हो सकती है। IMD ने बांदा, चित्रकूट, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, संत रविदास नगर, गाजीपुर, श्रावस्ती, बहराइच, कानपुर, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा के आसपास के इलाकों में आज भारी बारिश की चेतावनी जारी है। वहीं बांदा, चित्रकूट, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, संत रविदास नगर, जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, हरदोई, फरुखाबाद, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर नगर, उन्नाव, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, अयोध्या, अम्बेडकर नगर, गाजियाबाद, हापुड़, गौतम बुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, कासगंज, एटा, आगरा, फिरोजाबाद में वज्रपात की अलर्ट जारी किया है।

हिमाचल प्रदेश में बारिश और बादल फटने से काफी तबाही मच गई है। बीते कुछ दिनों से रोजाना हो रही बारिश के कारण कई इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है। IMD ने आज सिरमौर, चंबा, शिमला, कुल्लू और मंडी जिलों के अलग-अलग हिस्सों में हल्के से मध्यम स्तर के बाढ़ के खतरे की भी चेतावनी दी है।वहीं रविवार तक राज्य में मौसम विभाग ने गरज-चमक और आंधी के साथ भारी से बहुत भारी बारिश का पूर्वानुमान जताया है। बता दें कि अभी तक अगस्त में हिमाचल प्रदेश में सामान्य बारिश 78.5 मिमी की तुलना में 80.8 मिमी बारिश दर्ज की गई है।

संसद में वक्फ संशोधन बिल के लिए क्या हो रहा है?

आज हम आपको बताएंगे कि संसद में वक्फ संशोधन बिल के लिए आखिर क्या हो रहा है! लोकसभा ने वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 को संयुक्त संसदीय समिति, जेपीसी के पास भेज दिया है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद के इस निचले सदन में गुरुवार को विधेयक पेश किया। उससे पहले विधेयक पर एक संक्षिप्त चर्चा हुई जिसमें पक्ष-विपक्ष के सांसदों ने हिस्सा लिया। फिर विपक्ष के उठाए सवालों का मंत्री रिजिजू ने जवाब दिया। आखिर में उन्होंने कहा कि अगर सदस्य विधेयक को विचार के लिए जेपीसी के पास भेजा जाए तो सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। उसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्षी सदस्यों को आश्वासन दिया कि विधेयक पर विचार के लिए जेपीसी का गठन किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में यह मामला थोड़ा हटकर है जब सरकार किसी विधेयक को इतनी आसानी से जेपीसी के पास भेजने पर सहमत हो गई। तो सवाल उठता है कि क्या इसके पीछे मोदी सरकार की कोई सोची-समझी रणनीति है? वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 को लोकसभा में तो पेश कर दिया गया, लेकिन राज्यसभा में इसे अगले सत्र में पेश किया जाएगा। संसद का शीतकालीन सत्र नवंबर-दिसंबर महीने में आहूत होगा। तब तक राज्यसभा का समीकरण सत्ताधारी दल बीजेपी के पक्ष में आ जाएगा। जिससे राज्यसभा में कांग्रेस सांसदों की संख्या बढ़कर 27 हो जाएगी। राज्यसभा में विपक्ष का नेता पद हासिल करने के लिए कम-से-कम 25 सदस्यों की दरकार होती है। अभी 26 सदस्यों के साथ राज्यसभा में कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खरगे विपक्ष के नेता पद पर आसीन हैं।3 सितंबर को राज्यसभा की 12 सीटों पर होने वाले चुनावों में सत्ताधारी एनडीए के सदस्य चुने जाने की उम्मीद है। अगले सत्र से पहले अगर राज्यसभा के चार नामित सदस्यों की खाली सीटों को भर दिया गया तो सदन में सरकार का हाथ और मजबूत हो जाएगा। पिछले महीने ही ये चारों सीटें खाली हुई हैं। ये चार सदस्य आ गए तो सरकार को राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए एआईएडीएमके जैसे बाहरी सहयोगियों की राह नहीं तकनी होगी।

राज्यसभा में अभी छह नामित और दो निर्दलीय सदस्य हैं। इन्हें मिलाकर एनडीए के खेमे में राज्यसभा के कुल 117 सदस्य हैं जबकि 237 सदस्यों के सदन में बहुमत का आकंड़ा 119 का होता है। इस लिहाज से एनडीए को सिर्फ दो सदस्यों की दरकार है। अभी राज्यसभा की आठ सीटें खाली हैं जिन पर चुनाव होने वाले हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर की चार और चार नामित सदस्यों की सीटें हैं। सरकार ने चार सदस्य नामित कर दिए तो सदन की स्ट्रेंग्थ बढ़कर 241 हो जाएगी, तब बहुमत का आंकड़ा 121 हो जाएगा। चूंकि चारों नामित सदस्य एनडीए के होंगे, इसलिए उसके खेमे में 117+4 यानी कुल 121 का आंकड़ा आ जाएगा। यानी पूर्ण बहुमत।

राज्यसभा में अकेले बीजेपी के 87 सदस्य हैं। उम्मीद के मुताबिक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिशा, त्रिपुरा, असम, महाराष्ट्र और बिहार में बीजेपी कैंडिडेट जीते तो यह पार्टी के राज्यसभा सदस्यों की संख्या बढ़कर 94 हो जाएगी। बिहार और महाराष्ट्र में बीजेपी के गठबंधन साथियों के जीतने की उम्मीद है। 3 सितंबर के चुनावों में कांग्रेस की सीटें भी बढ़ेंगी। उसे तेलंगाना से एक सीट मिल सकती है जिससे राज्यसभा में कांग्रेस सांसदों की संख्या बढ़कर 27 हो जाएगी। राज्यसभा में विपक्ष का नेता पद हासिल करने के लिए कम-से-कम 25 सदस्यों की दरकार होती है। अभी 26 सदस्यों के साथ राज्यसभा में कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खरगे विपक्ष के नेता पद पर आसीन हैं।

3 सितंबर को जिन 12 सीटों पर चुनाव होने वाले हैं, वो सात राज्यों में बीजेपी, कांग्रेस और आरजेडी के राज्यसभा सांसदों के लोकसभा चुनावों में जीतने के बाद खाली हुए हैं। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में यह मामला थोड़ा हटकर है जब सरकार किसी विधेयक को इतनी आसानी से जेपीसी के पास भेजने पर सहमत हो गई। तो सवाल उठता है कि क्या इसके पीछे मोदी सरकार की कोई सोची-समझी रणनीति है? वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 को लोकसभा में तो पेश कर दिया गया, लेकिन राज्यसभा में इसे अगले सत्र में पेश किया जाएगा। राज्यसभा में अभी छह नामित और दो निर्दलीय सदस्य हैं। इन्हें मिलाकर एनडीए के खेमे में राज्यसभा के कुल 117 सदस्य हैं जबकि 237 सदस्यों के सदन में बहुमत का आकंड़ा 119 का होता है। इस लिहाज से एनडीए को सिर्फ दो सदस्यों की दरकार है।वहीं, तेलंगाना और ओडिशा से भी एक-एक राज्यसभा सांसद ने राज्यसभा की सदस्यता छोड़कर पार्टी बदल ली है। तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के सदस्य के केशव राव ने कांग्रेस जबकि बीजेडी मेंबर ममता मोहंता ने बीजेपी जॉइन की है।

क्या आने वाले समय में भी शेख हसीना की रक्षा करेगा भारत?

आज हम आपको बताएंगे कि क्या आने वाले समय में भी शेख हसीना की भारत रक्षा करेगा या नहीं! जब बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल हो रही थी, तब भारत को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तुरंत कार्रवाई करनी पड़ी। शेख हसीना उस समय अपना देश छोड़ रही थीं। सुरक्षा एजेंसियों ने हर संभावना के लिए तैयारी की क्योंकि हसीना वायु सेना के एक जेट विमान से भारत की ओर बढ़ रही थीं। दोपहर करीब तीन बजे, भारतीय वायु सेना के रडार ने बांग्लादेश से भारतीय सीमा की ओर एक कम उड़ान वाला विमान आते हुए देखा। भारत ने हाई प्रोफाइल यात्री के बारे में जागरूक सुरक्षा कर्मियों ने विमान को भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दी। सुरक्षा प्रदान करने के लिए, पश्चिम बंगाल के हाशिमारा वायु सेना बेस से 101 स्क्वाड्रन के दो राफेल लड़ाकू विमानों को बिहार और झारखंड के ऊपर तैनात किया गया। विमान ने अपने तय किए गए रास्ते पर उड़ान भरी। वहीं, जमीन पर मौजूद एजेंसियों ने लगातार नजर रखी। विमान और भारत के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के बीच लगातार संपर्क बना रहा।

वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी और थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने स्थिति पर कड़ी नजर रखी। इसके बाद एक हाई लेवल बैठक बुलाई गई। इसमें खुफिया एजेंसियों के प्रमुख, जनरल द्विवेदी और इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जॉनसन फिलिप मैथ्यू शामिल हुए। जब शाम करीब साढ़े पांच बजे हसीना का जहाज़ हिंडन एयर बेस पर उतरा, तो उनका स्वागत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने किया। दोनों ने एक घंटे तक बैठक की जिसमें बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति और हसीना की आगे की योजनाओं पर चर्चा हुई। इसके बाद डोभाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति को जानकारी दी। दिन भर प्रधानमंत्री को पूरी जानकारी दी जाती रही थी।

हसीना के इस्तीफे और देश छोड़ने के बाद सोमवार से बांग्लादेश में अफरा-तफरी मच गई थी। नौकरी कोटे के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए थे जो बाद में हसीना के खिलाफ पूरे पैमाने पर आंदोलन बन गए थे। इन प्रदर्शनों पर जबरदस्त कार्रवाई के बाद हसीना ने इस्तीफा दे दिया था। जैसे ही हसीना के इस्तीफे की खबर फैली, उग्र भीड़ सड़कों पर उतर आई। इसी बीच बांग्लादेश के प्रदर्शनकारियों की मांग है कि शेख हसीना के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए और कानून के अनुसार सजा दी जाए। हालांकि, प्रदर्शनकारियों की इस मांग पर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने चुप्पी साध रखी है। बांग्लादेश के मुस्लिम कट्टरपंथियों और विपक्षी नेताओं ने भारत में शेख हसीना का घेराव करने का भी आह्वान किया था। शेख हसीना भारत में कब तक रुकेंगी, इसे लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है। कुछ लोगों ने उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की प्रतिमा को तोड़ दिया। राष्ट्र के नाम संबोधन में सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने घोषणा की कि एक अंतरिम सरकार बनाई जाएगी और उन्होंने देश की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए अधिकांश राजनीतिक दलों के सदस्यों से मुलाकात की है।

बता दे कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के गृह मामलों के सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल सेवानिवृत्त एम सखावत हुसैन ने सोमवार को प्रदर्शनकारियों से 19 अगस्त तक सभी अवैध और अनधिकृत हथियार जमा करने को कहा, जिनमें हालिया हिंसा के दौरान एजेंसियों से लूटी गई राइफल भी शामिल हैं। यह जानकारी एक मीडिया रिपोर्ट में दी गई। ‘द डेली स्टार’ अखबार की खबर के अनुसार, हुसैन ने कहा कि अगर ये हथियार पास के थानों में नहीं जमा किए जाते तो अधिकारी तलाशी अभियान चलाएंगे और अगर किसी के पास अनधिकृत शस्त्र पाए जाते हैं तो उसके खिलाफ आरोप दर्ज किए जाएंगे। बता दें कि ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक सखावत हुसैन ने सोमवार को शेख हसीना को संबोधित करते हुए कहा, ‘हमें पता चला है कि आप देश लौटने की योजना बना रही हैं। सवाल है कि आप यहां से गई ही क्यों थीं। आप अपनी मर्जी से गईं ना कि किसी ने आप पर दबाव डाला। यह आपका देश है और हम आपका सम्मान करते हैं। आप वापस आने का फैसला करती हैं तो आपका स्वागत है। बस इतनी गुजारिश है कि वापस आकर लोगों को भड़काने या अराजकता फैलाने की कोशिश करने से बचें। आप ऐसा करती हैं तो फिर मुश्किल हो सकती है।’

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस, एम सखावत और दूसरे अहम नेताओं ने हिंदू छात्रों और युवाओं के साथ बैठक की है। इस बैठक के बाद गृह मंत्रालय में प्रेस से बात करते हुए सखावत ने हसीना की वापसी के सवासल पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कहा कि जातीय पार्टी के नेता हुसैन मुहम्मद इरशाद को देश छोड़ने या जेल जाने का विकल्प दिया गया था तो इरशाद ने जेल जाना चुना था। हम कहेंगे कि शेख हसीना को भी वापस लौटना चाहिए।

क्या विनेश फोगाट के हक के लिए लड़ेगी भारत सरकार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विनेश फोगाट के हक के लिए भारत सरकार लड़ेगी या नहीं! ओलंपिक में भारतीय पहलवान विनेश फोगाट के 50 किलोग्राम भार वर्ग में प्रतियोगिता से अयोग्य ठहराए जाने के बाद केंद्र सरकार ने आज लोकसभा में बयान दिया। केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने बताया कि आखिर विनेश के साथ क्या हुआ था। मांडविया ने बताया कि विनेश का वजन 50 किलो 100 ग्राम पाया गया। भारत ने इस मामले को लेकर अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ से कड़ा विरोध जताया है। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने भारतीय ओलंपिक संघ की प्रमुख पी टी उषा से बात करके इस मामले में उचित कार्रवाई के लिए कहा है। केंद्रीय खेल मंत्री ने लोकसभा में बताया कि विनेश मंगलवार 6 अगस्त को 3 मुकाबले जीतकर 50 Kg रेसलिंग ओलिंपिक में फाइनल में पहुंचने वालीं पहली भारतीय महिला रेसलर बनी थीं। सेमीफाइनल में उन्होंने क्यूबा की पहलवान गुजमान लोपेजी को, क्वार्टरफाइनल में यूक्रेन की ओकसाना लिवाच और प्री-क्वार्टरफाइनल में वर्ल्ड चैंपियन जापान की युई सुसाकी को 3-2 से मात दी थी।

उन्हें बुधवार 7 अगस्त की रात करीब 10 बजे गोल्ड मेडल के लिए अमेरिकी रेसलर सारा एन हिल्डरब्रांट से मुकाबला करना था। जहां तक उनकी तैयारी हेतु सहायता का प्रश्न है, भारत सरकार ने विनेश फोगाट की उनकी आवश्यकता के अनुसार हर संभव सहायता प्रदान की है। उनके लिए पर्सनल स्टाफ भी नियुक्त किए गए हैं जो अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। उनके साथ हंगरी के विख्यात कोच वोलेर अकोस और फिजियो अश्विनी पाटिल हमेशा रहते हैं। इनको ओलम्पिक के लिए इनके अतिरिक्त व्यक्तिगत सहायक स्टाफ जैसे विभिन्न स्पारिंग पार्टनर्स, स्ट्रेंथ और कंडीशनिंग विशेषज्ञ, के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई!

खेल मंत्री ने आगे बताया कि पेरिस ओलंपिक के लिए कुल 70.45 लाख रुपये दिए गए। इनमें टॉप्स के तहत 53.35 लाख रुपये और ACTC के तहत 17.10 लाख रुपये दिए गए। इससे पहले टोक्यो ओलंपिक के लिए 1.66 करोड़ रुपये दिए गए थे। वहीं बुल्गारिया में 23 दिनों की ट्रेनिंग के लिए 5.44 लाख रुपये दिए गए, बुडापेस्ट में 16 दिनों की ट्रेनिंग 10.54 लाख रुपये दिए गए।

गौरतलब है कि विनेश को 50 किलो से ज्यादा भार के कारण इस प्रतियोगिता के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। इस बार विनेश का मेडल पक्का हो चुका था बस उसका रंग बदलना बाकी थी। लेकिन वजन के कारण विनेश समेत पूरे 140 करोड़ देशवासियों का सपना टूट गया। इस घटना के बाद विनेश के चाचा महावीर फोगाट ने कहा कि अब इसमें कुछ नहीं हो सकता है और कोई मेडल नहीं आने वाला है। विनेश के प्रतियोगिता से बाहर होने के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट कर उन्हें असली चैंपियन बताया था। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी ट्वीट कर उन्हें चैंपियन बताया है। बता दें कि यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग के तय नियमों के तहत पहलवानों का वजन मुकाबले के पहले दिन लिया जाता है। मुकाबले से पहले हर दिन वजन लिया जाता है। जो लोग किसी भी दिन अपनी तय कैटेगरी में वजन कायम रख पाने में फेल हो जाते हैं तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाता है और पूरी प्रतियोगिता में अपनी रैंक खो देते हैं। फोगाट ने प्रतियोगिता के पहले दिन अपना वजन बढ़ा लिया था, दूसरे दिन फाइनल मुकाबले से पहले उनका वजन अधिक पाया गया, जिस वजह से पहले दिन अपने सभी विरोधियों को सफलतापूर्वक हराकर फाइनल में पहुंचने के बावजूद उन्होंने अपनी रैंक गंवा दी।

इस बीच, भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि इस मामले में विनेश की कोई गलती नहीं है। बता दें कि इस वजह से फाइनल में पहुंचने के लिए जीते गए मुकाबले के बावजूद वह सिल्वर मेडल के लिए योग्य नहीं रह गई थीं।UWW के अंतरराष्ट्रीय कुश्ती नियमों के चैप्टर 3 की धारा 11 में कहा गया है कि सभी प्रतियोगिताओं के लिए हर सुबह संबंधित भार वर्ग में वजन मापा जाता है। वेट इन और मेडिकल प्रॉसेल करीब 30 मिनट तक चलता है। दूसरे दिन सुबह संबंधित भार वर्ग में केवल रेपेचेज और फाइनल में भाग लेने वाले पहलवानों को ही वजन के लिए आना होता है। फोगाट ने अपने एडवोकेट के माध्यम से यह तर्क दिया है कि क्वॉर्टर फाइनल और सेमी फाइनल मुकाबले जब उन्होंने जीत लिए थे तो दूसरे दिन के फाइनल मुकाबले के आधार पर उन्हें सिल्वर मेडल से क्यों वंचित किया जा रहा है? दूसरा, फोगाट यह भी दावा कर सकती हैं कि अधिक वजन होने के कारण उन्हें प्रतियोगिता के दूसरे दिन ही अयोग्य ठहराया जा सकता है और इसका प्रतियोगिता के पहले दिन के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।उन्होंने कहा कि इसके लिए कोच और न्यूट्रिनिस्ट जिम्मेदार हैं।

क्या खाली पेट के फूलने से भी बढ़ सकता है वजन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या खाली पेट के फूलने से भी वजन बढ़ सकता है या नहीं! रेसलर विनेश फोगाट को 100 ग्राम ज्यादा वजन पाए जाने के बाद पेरिस ओलंपिक में अयोग्य घोषित कर दिया गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मैच खेलने के बाद मंगलवार शाम को उनका वजन उनकी 50 किलोग्राम कैटेगरी में लिमिट से दो किलोग्राम अधिक था। बताया जा रहा है कि इस बढ़े हुए वजन को कम करने के लिए विनेश और उनके साथ की पूरी टीम ने जी-जान लगा दी, मगर बुधवार तक उनका वजन 50 किलो से 100 ग्राम ज्यादा निकला। इसके बाद ओलंपिक नियमों के अनुसार, विनेश को फाइनल मुकाबला खेलने पर रोक लगा दी गई। इस फैसले से निराश आखिरकार विनेश ने भी संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। सोशल मीडिया और विपक्ष का एक वर्ग ऐसा है जो विनेश की अयोग्यता को लेकर कॉन्सिपिरेशी थ्योरी पेश कर रहा है। तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने कहा- बहादुर विनेश ने सत्ता से लड़ाई लड़ी, उसे न्याय मिलना चाहिए। कुछ गड़बड़ है। बहुत गड़बड़ है। सच्चाई सामने आनी चाहिए। इस स्टोरी में हेल्थ एक्सपर्ट और कुश्ती कोच से जानते हैं कि विनेश के वजन बढ़ने में कितनी साजिश हे और क्या है हकीकत, इसे समझते हैं। विनेश के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक धड़ा बार-बार यह सवाल उठा रहा है कि 12 घंटे में खासकर पहला मैच जीतने के बाद उनका वजन तय सीमा से 2 किलो ज्यादा कैसे बढ़ गया। यानी शाम तक विनेश का वजन 52 किलो से ज्यादाचुका था। ओलंपिक में विनेश ने छह अगस्त की रात को महिला कुश्ती के 50 किलोग्राम के भार वर्ग मुकाबले में क्यूबा की पहलवान को शिकस्त दी थी। इसके बाद विनेश की तरफ से गोल्ड या सिल्वर मेडल जीतने की उम्मीद बंध गई थी।

अंतरराष्ट्रीय महिला कुश्ती में देश को सिल्वर मेडल दिलाने वालीं शिवानी पंवार और अर्जुन अवॉर्डी दिव्या काकरान जैसी एथलीट्स के इंटरनेशनल कोच रहे विक्रम सोनकर के अनुसार, 2018 में भी जकार्ता में हुए एशियाई खेलों के वक्त भी विनेश फोगाट का वजन 3-3.5 किलो बढ़ गया था। उस वक्त भी विनेश 50 किलोग्राम की फ्री स्टाइल रेसलिंग में हिस्सा ले रही थीं। उस वक्त भी उनके कोच ने उन्हें कंबल ओढ़ाकर रेसलिंग हॉल के भीतर खूब दौड़ाया था, जिससे जमकर पसीना निकला था। हालांकि, उस वक्त उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया था।

विक्रम सोनकर पुरानी दिल्ली स्थित गुरु प्रेमनाथ अखाड़े में लड़के-लड़कियों दोनों को ही कुश्ती के दांव-पेंच सिखाते हैं। इस अखाड़े को स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) ने अडॉप्ट भी किया हे। उनके अनुसार, विनेश के साथ साजिश की बात कहना बेकार की बात है। ओलंपिक के नियम सबको पहले से पता होते हैं। वजन बढ़ने से लेकर हर चीज का ख्याल रखा जाता है। विनेश का ध्यान रखने वाली टीम को भी यह चीज अच्छे से पता होती हे कि उनका एक भी गलत कदम उन्हें प्रतिस्पर्धा से बाहर कर सकता है।

सोनकर कहते हें कि विनेश क्या किसी भी खिलाड़ी का वजन कभी भी बढ़ सकता है। इसके पीछे खान-पान से लेकर कई कारण हो सकते हैं। विनेश तो 53 किलो के वर्ग में खेलती थीं। पेरिस ओलंपिक के लिए वह अपना वजन 50 किलो से नीचे लाने में कामयाब रही थीं। इसीलिए उन्होंने इसी कैटेगरी में खेलने का फैसला किया था। वह अपना वजन 56-57 किलो से घटाकर 50 किलो से नीचे लेकर आई थीं। ऐसे में जरा सी भी चूक से वजन रातोंरात बढ़ सकता है। यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है। जरा सा भी कुछ खाया-पिया या पानी भी पिया तो 2-3 किलो वजन बढ़ सकता है।

वहीं, रांची में इंटरनेशनल मेडिसिन के डॉक्टर रविकांत चतुर्वेदी कहते हैं कि किसी एथलीट का रात भर में या 12 घंटे में वजन बढ़ सकता है। वजह ये है कि उस एथलीट का मौजूदा वजन उसका सामान्य औसत वजन नहीं है। उसे वह कड़ी मेहनत के बाद हासिल करता है। ऐसा वजन किसी भी वजह से बढ़ सकता है। यहां तक कि अगर एथलीट ने पानी भी पी लिया तो भी उसका वजन बढ़ सकता है। यहां तक कि वो कुछ भी न खाए या भूखे रहे तो भी पेट में गैस बनने या पेट फूलने से भी वजन बढ़ सकता है, क्योंकि इससे भी पेट में प्रेशर बढ़ जाता है।

मुकाबले से पहले महिला रेसलर का वजन होता है। दिन के मुकाबले के लिए सुबह वजन किया जाता है। यह वजन तकनीकी टीम और कोच की देखरेख में होता है। खिलाड़ी को एक तय समयसीमा में ही वजन देता होता है। अगर पहलवान वजन देने में देरी करता है, तो भी वजन लेने से मना किया जा सकता है। अगर मैच जीत कर कोई खिलाड़ी सेमीफाइनल या फाइनल में पहुंचता है, तो सुबह के वक्त उसका वजन किया जाता है। कई बार ऐसा होता है कि खिलाड़ी के प्रयास करने के बाद भी वजन कम नहीं होता। पहले से ही वजन दो-तीन किलो बढ़ा है, तो उसे कम करने में बेहद मुश्किल आती है। ऐसे में प्रैक्टिस या खून देने या बाल कटाने जैसी कोशिशों से भी वजन घट नहीं पाता है।

क्या आने वाले समय में विनेश फोगाट को मिल सकता है सिल्वर मेडल ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आने वाले समय में विनेश फोगाट को सिल्वर मेडल मिल सकता है या नहीं! रेसलर विनेश फोगाट को क्या सिल्वर मेडल मिल सकता है? आखिर उन्होंने पहला मुकाबला तो जीता ही था। भले ही वो 100 ग्राम वजन ज्यादा पाए जाने पर फाइनल मुकाबले से बाहर हो गई हों, मगर उनका पिछला जीता हुआ मेडल तो मिलना ही चाहिए…कुछ ऐसा ही सवाल सोशल मीडिया पर पूरा देश पूछ रहा है? विनेश ने इसके लिए अंतरराष्ट्रीय खेल पंचाट न्यायालय यानी कोर्ट ऑफ ऑर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट्स (CAS) का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने भी उनकी अपील मंजूर कर ली है। विनेश ने अपनी अपील में संयुक्त रूप से सिल्वर मेडल से सम्मानित किए जाने का अनुरोध किया है। इससे विनेश के सिल्वर पाने की उम्मीद लगाने वालों के लिए एक किरण दिखाई दे रही है। आइए- जानते हैं कि क्या है खेल पंचाट न्यायालय, इसके नियम क्या हैं और क्या इसका फैसला बाध्यकारी होगा? क्योंकि विनेश की पूरी लड़ाई अब गोल्ड से हटकर सिल्वर पर आ गई है। खेल पंचाट न्यायालय एक अंतरराष्ट्रीय और सर्वोच्च अपीलीय निकाय है, जिसकी स्थापना 1984 में खेल से संबंधित विवादों को मध्यस्थता के माध्यम से निपटाने के लिए की गई थी। यह कोर्ट स्विट्जरलैंड के लॉजेन में स्थित है। यह किसी भी खेल संगठन से स्वतंत्र रूप से काम करता है। इस कोर्ट के पास एथलीटों, कोच और खेल महासंघों से जुड़े विवादों पर अधिकार क्षेत्र है। न्यायालय को खेल-संबंधी विवादों को सुलझाने और खेलों में निष्पक्ष खेल और न्याय के सिद्धांतों को कायम रखने के लिए सर्वोच्च प्राधिकरण के रूप में मान्यता प्राप्त है। CAS में 87 देशों के लगभग 300 एक्सपर्ट्स हैं, जिन्हें मध्यस्थता और खेल कानून के उनकी विशेषाता के लिए चुना गया है। हर साल CAS लगभग 300 मामले दर्ज करता है। इसका फैसला बाध्यकारी माना जाता है।

पेरिस, 2024 ओलंपिक खेलों के लिए CAS के पेरिस में दो अस्थायी कार्यालय हैं। उनमें से एक सीएएस अस्थायी डिवीजन है, जिसका काम खेलों के दौरान पैदा होने वाले किसी भी कानूनी विवाद को हल करना है। इस तरह के अस्थायी न्यायाधिकरण 1996 से ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन ओलंपिक खेलों के हर संस्करण के साथ-साथ अन्य प्रमुख खेल आयोजनों में भी मौजूद हैं। रिपोर्टों के अनुसार, पेरिस बार ने पेरिस में सीएएस के तदर्थ डिवीजन के समक्ष फोगाट का प्रतिनिधित्व करने के लिए हरीश सॉल्वे समेत चार एडवोकेट मुहैया कराए हैं, जिसकी सुनवाई आज से शुरू होनी है। हालांकि, इस मामले में फैसला आने में कुछ समय लग सकता है।

बताया जा रहा है कि फोगाट ने अपने एडवोकेट के माध्यम से यह तर्क दिया है कि क्वॉर्टर फाइनल और सेमी फाइनल मुकाबले जब उन्होंने जीत लिए थे तो दूसरे दिन के फाइनल मुकाबले के आधार पर उन्हें सिल्वर मेडल से क्यों वंचित किया जा रहा है? दूसरा, फोगाट यह भी दावा कर सकती हैं कि अधिक वजन होने के कारण उन्हें प्रतियोगिता के दूसरे दिन ही अयोग्य ठहराया जा सकता है और इसका प्रतियोगिता के पहले दिन के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। ऐसा कहा जा रहा है कि विनेश फोगाट की टीम ने कोर्ट के समक्ष यह अनुरोध किया है कि प्रतियोगिता के पहले दिन में उनकी रैंकिंग को बरकरार रखते हुए उन्हें संयुक्त रजत पदक दिया जाए, क्योंकि उन्होंने सभी नियमों के मुताबिक उस दिन तीनों मुकाबले जीते थे।

ओलंपिक में कुश्ती आयोजनों की देखरेख करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (UWW) का नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी एथलीट जो प्रतियोगिता के दोनों दिनों में अपना वजन बढ़ा लेता है तो उसे खुद ही अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा और पूरी प्रतियोगिता में अंतिम स्थान पर रखा जाएगा। दरअसल, फोगाट को 100 ग्राम अधिक वजन होने के कारण अंतिम मुकाबले में प्रतिस्पर्धा करने से अयोग्य घोषित कर दिया गया था, जबकि 50 किलोग्राम वर्ग के लिए प्रतिस्पर्धा करते समय उनका वजन 50.1 किलोग्राम था।

यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग के तय नियमों के तहत पहलवानों का वजन मुकाबले के पहले दिन लिया जाता है। मुकाबले से पहले हर दिन वजन लिया जाता है। जो लोग किसी भी दिन अपनी तय कैटेगरी में वजन कायम रख पाने में फेल हो जाते हैं तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाता है और पूरी प्रतियोगिता में अपनी रैंक खो देते हैं। फोगाट ने प्रतियोगिता के पहले दिन अपना वजन बढ़ा लिया था, दूसरे दिन फाइनल मुकाबले से पहले उनका वजन अधिक पाया गया, जिस वजह से पहले दिन अपने सभी विरोधियों को सफलतापूर्वक हराकर फाइनल में पहुंचने के बावजूद उन्होंने अपनी रैंक गंवा दी। इस वजह से फाइनल में पहुंचने के लिए जीते गए मुकाबले के बावजूद वह सिल्वर मेडल के लिए योग्य नहीं रह गई थीं।

UWW के अंतरराष्ट्रीय कुश्ती नियमों के चैप्टर 3 की धारा 11 में कहा गया है कि सभी प्रतियोगिताओं के लिए हर सुबह संबंधित भार वर्ग में वजन मापा जाता है। वेट इन और मेडिकल प्रॉसेल करीब 30 मिनट तक चलता है। दूसरे दिन सुबह संबंधित भार वर्ग में केवल रेपेचेज और फाइनल में भाग लेने वाले पहलवानों को ही वजन के लिए आना होता है। यह वेट-इन 15 मिनट तक चलेगा। फोगाट भी नियमों के तहत दी गई 15 मिनट की अवधि के दौरान अपना वजन 50.1 किलोग्राम से कम करने में असमर्थ रही, जिसके कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।

वक्फ संशोधन बिल 2024 के लिए क्या बोल जदयू?

हाल ही में वक्फ संशोधन बिल 2024 के लिए जदयू ने भी अपना बयान दे दिया है ! वक्फ बोर्ड में पारदर्शिता को लेकर केंद्र सरकार की ओर से नया बिल लाया गया है। गुरुवार को लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल 2024 पेश कर दिया गया। कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने ये बिल लोकसभा में पेश किया। जैसे ही ये बिल सदन के पटल पर रखा गया कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, सपा समेत प्रमुख विपक्षी दलों ने विधेयक का विरोध किया। वहीं एनडीए में शामिल जेडीयू ने बिल का सपोर्ट कर दिया है। जेडीयू सांसद ललन सिंह ने कहा कि ये बिल कहां मुसलमान विरोधी है। मंदिर-संस्था में फर्क मालूम नहीं है। ललन सिंह ने कहा कि कई माननीय सदस्यों की मैंने बात सुनी। जेडीयू एक पार्टी है। हमें अपनी बात कहनी होगी। कई सदस्यों की बात सुनने से जैसे यह जो संशोधन लाया गया वो मुसलमान विरोधी है, कहां से मुसलमान विरोधी है। यहां अयोध्या मंदिर का उदाहरण दिया जा रहा है, मंदिर और संस्था में फर्क नहीं मालूम है। आपके मस्जिद को छेड़छाड़ करने का प्रयास नहीं किया जा रहा है, यह एक कानून से बना हुआ संस्था है।

ललन सिंह ने कहा कि उस संस्था को पारदर्शी बनाने के लिए कानून बनाया जा रहा है, कोई निरंकुश, कोई भी कानून से वक्फ बोर्ड किसी कानून से बना है, कानून से बना कोई भी संस्ता निरंकुश होगा, तो उसमें सरकार को हक है कानून बनाने का। इसका मंदिर से कहां मतलब है। कोई धर्म के नाम पर बंटवारा नहीं हो रहा है।मुंगेर से जेडीयू सांसद ललन सिंह ने कहा कि ये अल्पसंख्यक की बात कर रहे हैं, केसी वेणुगोपाल अल्पसंख्यक की बात करते हैं। इस देश में हजारों पंजाबी सिखों को किसने मारने का काम किया था। आपकी पार्टी ने किया था, हम उसके गवाह हैं। कौन सा सिख ड्राइवर था जिसने सिखों की हत्या की थी। इस बिल को आना चाहिए, पारदर्शिता आनी चाहिए, कोई भी संस्था पारदर्शी तरीके से काम करे यही आग्रह है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार वक्फ बोर्ड के अधिकारों को कम करने का प्लान बना रही। जल्द ही वक्फ बोर्ड अधिनियम में संशोधन का बिल संसद में पेश किया जाएगा। ऐसी उम्मीद है कि 5 अगस्त को ही सरकार इसे संसद में लाने जा रही है। इस नए बिल में किसी जमीन को अपनी संपत्ति यानी वक्फ की संपत्ति बताने वाली पावर पर रोक लगेगी। सूत्रों के मुताबिक, शुक्रवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में वक्फ कानून से जुड़े 40 संसोधन पर चर्चा के बाद इसे मंजूरी दे दी गई। प्रस्तावित बिल में मौजूदा कानून से जुड़े कई क्लॉज हटाए जा सकते हैं। आइये समझते हैं कि वक्फ बोर्ड क्या है, इसे कौन-कौन सी पावर मिली हुई है। वक्फ का मतलब होता है ‘अल्लाह के नाम’, यानी ऐसी जमीनें जो किसी व्यक्ति या संस्था के नाम नहीं है। वक्फ बोर्ड का एक सर्वेयर होता है। वही तय करता है कि कौन सी संपत्ति वक्फ की है, कौन सी नहीं। इस निर्धारण के तीन आधार होते हैं- अगर किसी ने अपनी संपत्ति वक्फ के नाम कर दी, अगर कोई मुसलमान या मुस्लिम संस्था जमीन की लंबे समय से इस्तेमाल कर रहा है या फिर सर्वे में जमीन का वक्फ की संपत्ति होना साबित हुआ। वक्फ बोर्ड मुस्लिम समाज की जमीनों पर नियंत्रण रखने के लिए बनाया गया था। जिससे इन जमीनों के बेजा इस्तेमाल को रोकने और गैरकानूनी तरीकों से बेचने पर रोक के लिए बनाया गया था।

वक्फ बोर्ड देशभर में जहां भी कब्रिस्तान की घेरेबंदी करवाता है, उसके आसपास की जमीन को भी अपनी संपत्ति करार दे देता है। इन मजारों और आसपास की जमीनों पर वक्फ बोर्ड का कब्जा हो जाता है। चूंकि 1995 का वक्फ एक्ट कहता है कि अगर वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई जमीन वक्फ की संपत्ति है तो यह साबित करने की जिम्मेदारी उसकी नहीं, बल्कि जमीन के असली मालिक की होती है कि वो बताए कि कैसे उसकी जमीन वक्फ की नहीं है। 1995 का कानून यह जरूर कहता है कि किसी निजी संपत्ति पर वक्फ बोर्ड अपना दावा नहीं कर सकता, लेकिन यह तय कैसे होगा कि संपत्ति निजी है? अगर वक्फ बोर्ड को सिर्फ लगता है कि कोई संपत्ति वक्फ की है तो उसे कोई दस्तावेज या सबूत पेश नहीं करना है। सारे कागज और सबूत उसे देने हैं जो अब तक दावेदार रहा है। कौन नहीं जानता है कि कई परिवारों के पास जमीन का पुख्ता कागज नहीं होता है। वक्फ बोर्ड इसी का फायदा उठाता है क्योंकि उसे कब्जा जमाने के लिए कोई कागज नहीं देना है।

क्या अब सरकार करेगी वक्फ बोर्ड की हैसियत कम?

आने वाले समय में अब सरकार वक्फ बोर्ड की हैसियत काम करने जा रही है! केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड संशोधन बिल आज लोकसभा में पेश होने जा रहा है। इसे लेकर लोकसभा के बिजनेस अडवाइजरी कमिटि में चर्चा हुई। जब से इस बिल के संसद में आने की बात और बिल के मसौदा सामने आया है, मुस्लिम समाज से लेकर मुस्लिम नेताओं और विपक्ष में इसे लेकर खासा रोष दिखाई दे रहा है। इसकी वजह मानी जा रही है कि संशोधित बिल के जरिए सरकार वक्फ बोर्ड की ताकत व हैसियत कम करने जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस बिल के जरिए सरकार देश के वक्फ बोर्ड्स की पूरी प्रक्रिया जवाबदेह व पारदर्शी बनाना चाहती है। हालांकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने इस बिल के मद्देनजर कहा है कि वह मौजूदा वक्फ कानून में किसी तरह का कोई बदलाव मंजूर नहीं करेगा। इस बिल को लेकर विवाद का सबसे बड़ा बिंदु वक्फ बोर्ड की संपत्ति है। दरअसल, देश में कुल 32 वक्फ बोर्ड हैं। इनके बीच तालमेल के लिए केंद्र सरकार के अल्पसंयख्क मामलों के मंत्रालय की ओर से सेंट्रल वक्फ काउंसिल बनाया गया। यह वक्फ बोर्डों के कामकाज के मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देती है। वर्ष 1995 में वक्फ एक्ट में बदलाव भी किया गया और हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में वक्फ बोर्ड बनाने की मंजूरी दी गई। है। देश के कुल वक्फ बोर्ड के पास फिलहाल आठ लाख एकड़ जमीन है। साल 2009 में यह संपत्ति चार लाख एकड़ हुआ करती थी। इन जमीनों में ज्यादातर हिस्सों में मस्जिद, मदरसा और कब्रिस्तान हैं। दिसंबर 2022 तक वक्फ बोर्ड के पास कुल 8,65,644 अचल संपत्तियां थीं। अचल सपंत्ति के लिहाज से देखा जाए तो वक्फ बोर्ड देश में रेल व सेना के बाद तीसरे सबसे बड़े जमीन के मालिक हैं।

दरअसल, 2013 में यूपीए सरकार के समय में वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन कर इन्हें असीमित अधिकार दे दिए गए थे। मौजूदा कानून के तहत केंद्र सरकार, राज्य सरकार या कोर्ट तक संपत्ति विवाद के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। अगर किसी जमीन को लेकर कोई विवाद होता है तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड की नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी की होती है। बोर्ड को अपना मालिकाना हक साबित करने के लिए किसी तरह तरह का कोई सबूत या दस्तावेज नहीं देना होता। बिल लाने की वजह यह भी है कि इनके पास जितनी जमीन है और इनके द्वारा जो रेवेन्यु दिखाया जा रहा है, उनमें आपस में मेल नहीं दिखता। वक्फ बोर्ड महज साल का 200 करोड़ का राजस्व दिखाता है। इन्हीं बिंदुओं के चलते वक्फ बोर्ड के पास मौजूद इन असीम शक्तियों को लेकर कई ओर से विरोध के सुर उठते रहे। यहां तक कि सच्चर कमिटि ने भी अपनी रिपोर्ट में वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता की बात कही। उल्लेखनीय है कि यूपीए सरकार में हुए बदलाव के बाद से आम मुस्लिम, गरीब मुस्लिम महिलाएं, तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के बच्चे, शिया व बोहरा जैसे समुदाय लंबे समय से मौजूदा कानून में बदलाव की मांग कर रहे थे। इन लोगों की दलील थी कि वक्फ में आज आम मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, सिर्फ रसूखदार लोगों को ही जगह मिलती है।

बिल पर मुस्लिम समुदाय के अलावा राजनीतिक स्तर पर इसका विरोध देखा जा रहा है। एआईएमआईएम चीफ व हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहते है कि वक्फ एक्ट में प्रस्तावित संशोधन वक्फ संपत्तियों को छीनने के इरादे से किया जा रहा है। उन्होंने इन संशोधनों को संविधान में दिए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रहार करार देते हुए कहा कि संघ की मंशा शुरू से ही वक्फ संपत्तियों को छीनने की रही है। जबकि आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने केंद्र पर निशाना साधते हुए मीडिया में कहा कि केंद्र सरकार की निगाह कहीं, निशाना कहीं और है। उन्होंने आरोप लगाया कि किसी धर्म विशेष को टारगेट करना और विवादित मुद्दों पर बहस करना असल मकसद है। असली मुद्दों पर चर्चा ना हो, इसलिए सरकार इन मुद्दों पर बहस करती है। सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा की बिजनेस अडवाइजरी कमिटि में विपक्षी दलों द्वारा कहा गया है कि इस बिल को सदन में पेश करने के बाद इसे संसद की स्थायी समिति के पास विचार के लिए भेजा जाए।

यह बिल मोदी सरकार के तीसरे टर्म का पहला शक्ति परीक्षण होगा। जहां एक ओर विपक्ष इसे स्थायी समिति के पास भेजने की अपनी मांग पर खड़ा दिखेगा, वहीं देखना होगा कि एनडीए सरकार में बीजेपी के दो प्रमुख घटक दल जेडीयू व टीडीपी सदन के भीतर इस बिल पर अपना क्या रुख अपनाते हैं। इन दोनों ही दलों को मुस्लिम समुदाय में अपना वोट आधार है। ऐसे में उनके सरोकारों की अनदेखी कर क्या ये दोनों दल बीजेपी के साथ खड़े होना चाहेंगे? दरअसल, लोकसभा व राज्यसभा दोनों ही जगह बीजेपी के पास इतना संख्याबल नहीं है कि वह अपने दम पर बिल पास करा ले जाए। बिल को पास कराने के लिए उसे लोकसभा में जेडीयू व टीडीपी की जरूरत पड़ेगी, वहीं राज्यसभा में भी उसे एनडीए के घटक दलों का साथ चाहिए होगा।